देवी भागवत उत्तरार्द्ध — पृष्ठ 291–300
देवी भागवत उत्तरार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 291–300
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२८२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २३
येऽवटेषु कुसूलादिगुहादिषु निरुन्धते ।
तानमुत्रोद्यतकराः कीनाशपरिसेवकाः ॥
तेष्वेवोपविशित्वा च सगरेण च वह्निना ।
धूमेन च निरुन्धन्ति पापकर्मरतान्नरान् ॥
योऽतिथीन्समयप्राप्तान्दिधक्षुरिव चक्षुषा ।
पापेनेहालोकयेच्च स्वयं गृहपतिर्द्विजः ॥
तस्यापि पापदृष्टेर्हि निरये यमकिङ्कराः ।
अक्षिणी वज्रतुण्डा ये कङ्काः काकवटादयः ॥
गृध्राः क्रूरतराश्चापि प्रसह्योत्पाटयन्ति हि ।
य आढ्याभिमतिर्याति अहङ्कृत्यातिगर्वितः ॥
तिर्यक्प्रेक्षण एवात्राभिविशङ्की नराधमः ।
चिन्तयार्थस्य सर्वत्रायतिव्ययस्वरूपया ॥
शुष्यद्धृदयवक्त्रश्च निर्वृतिं नैव गच्छति ।
ग्रहवद्रक्षते चार्थं स प्रेतो यमकिङ्करैः ॥
सूचीमुखे च नरके पात्यते निजकर्मणा ।
वित्तग्रहं च पुरुषं वायका इव याम्यकाः ॥
किङ्कराः सर्वतोऽङ्गेषु सूत्रैः परिवयन्ति हि ।
एते बहुविधा विप्र नरकाः पापकर्मणाम् ॥
नराणां शतशः सन्ति यातनास्थानभूमयः ।
सहस्त्रशोऽपि देवर्षे उक्तानुक्तांस्तथापि हि ॥
विशन्ति नरकानेतान्यातनाबहुलान्मुने ।
तथा धर्मपराश्चापि लोकान्यान्ति सुखोद्गतान् ॥
स्वधर्मो बहुधा गीतो यथा तवं महामुने ।
देवीपूजनरूपो हि देव्याराधनलक्षणः ॥
जो अन्धकूपोंमें, प्रकाशरहित घर आदिमें अथवा १ ९ अन्धकारयुक्त गुफाओंमें प्राणियोंको बन्द कर देते हैं, उन पापकर्मपरायण लोगोंको यमराजके दूत मरनेके उपरान्त [ अवटारोध नामक नरकमें गिराते हैं और ] २० उनका हाथ पकड़कर विषैली अग्निके धुएँसे भरे हुए उसी प्रकारके अँधेरे स्थानोंमें प्रवेश कराकर उन्हें बन्द कर देते हैं ॥ १ ९ -२० ॥ जो द्विज स्वयं गृहका स्वामी होकर अपने यहाँ २१ समयपर आये हुए अतिथियोंको पापपूर्ण नेत्रसे इस प्रकार देखता है, मानो उसे भस्म ही कर डालेगा, मरनेपर उस पापदृष्टिवाले पुरुषको यमराज २२ सेवक पर्यावर्तन नामक नरकमें गिराते हैं । वहाँपर वज्रतुल्य चोंचोंवाले कंक, काक, वट, गीध आदि महान् क्रूर पक्षी बलपूर्वक उसकी आँखें निकाल २३ | लेते हैं ॥ २१-२२३ ॥ जो अधम मनुष्य अपनेको वैभवसम्पन्न मानकर अभिमानसे अत्यन्त गर्वित होकर दूसरोंको वक्रदृष्टिसे २४ देखता है, जो सबके प्रति शंकाभाव रखता है, जो अपने चित्तमें सदा धन कमाने किंतु व्यय न करनेकी ही भावना रखता है तथा ग्रहकी भाँति सदा धनकी २५ रक्षा करता है, वह सूखते हुए हृदय तथा मुखवाला प्राणी कभी शान्तिको प्राप्त नहीं होता है । मरनेपर यमराजके सेवकोंद्वारा वह अपने पापकर्मके कारण २६ सूचीमुख नामक नरकमें गिराया जाता है । यमराजके दूत उस अर्थपिशाचके सम्पूर्ण अंगोंको उसी प्रकार सिल देते हैं, जैसे दर्जी सूई - धागेसे वस्त्र सिलते हैं ॥ २३–२६३ ॥ २७ हे विप्र! पापकर्म करनेवाले मनुष्योंको यातना देनेके लिये ये अनेक प्रकारके नरक हैं । इसी तरह और भी सैकड़ों तथा हजारों नरक हैं । हे देवर्षे! २८ उनमेंसे कुछ ही बताये गये हैं, मैंने बहुत - से नरकोंका वर्णन ही नहीं किया । हे मुने! पापी मनुष्य अनेक यातनाओंसे भरे इन नरकोंमें जाते हैं और धर्मपरायणलोग २ ९ सुखप्रद लोकोंमें जाते हैं ॥ २७–२९ ॥ हे महामुने! मैंने जिस प्रकार आपसे भगवतीके पूजनके स्वरूप और देवीकी आराधनाके लक्षणोंका ३० | वर्णन विस्तारसे किया है, वही अपना धर्म है; जिसके
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अ ० २४ ] अष्टम स्कन्ध २८३ येनानुष्ठितमात्रेण नरो न नरकं व्रजेत् । अनुष्ठानमात्रसे मनुष्य नरकमें नहीं जाता । सम्यक् प्रकारसे पूजित होनेपर वे भगवती संसाररूपी समुद्रसे सा देवी भवपाथोधेरुद्ध पूजिता नृणाम् ॥ ३१ | प्राणियोंका उद्धार कर देती हैं ॥ ३०-३१ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायामष्टमस्कन्धे-ऽवशिष्टनरकवर्णनं नाम त्रयोविंशोऽध्यायः ॥ २३ ॥
O ~ 0 अथ चतुर्विंशोऽध्यायः देवीकी उपासनाके विविध प्रसंगोंका वर्णन नारद उवाच
धर्मश्च कीदृशस्तात देव्याराधनलक्षणः ।
कथमाराधिता देवी सा ददाति परं पदम् ॥
आराधनविधिः को वा कथमाराधिता कदा ।
केन सा दुर्गनरकाद्दुर्गा त्राणप्रदा भवेत् ॥
श्रीनारायण उवाच
देवर्षे शृणु चित्तैकाग्रयेण मे विदुषां वर ।
यथा प्रसीदते देवी धर्माराधनतः स्वयम् ॥
स्वधर्मो यादृशः प्रोक्तस्तं च मे शृणु नारद ।
अनादाविह संसारे देवी सम्पूजिता स्वयम् ॥
परिपालयते घोरसङ्कटादिषु सा मुने ।
सा देवी पूज्यते लोकैर्यथावत्तद्विधिं शृणु ॥
प्रतिपत्तिथिमासाद्य देवीमाज्येन पूजयेत् ।
घृतं दद्याद् ब्राह्मणाय रोगहीनो भवेत्सदा ॥
द्वितीयायां शर्करया पूजयेज्जगदम्बिकाम् ।
शर्करां प्रददेद्विप्रे दीर्घायुर्जायते नरः ॥
तृतीयादिवसे देव्यै दुग्धं पूजनकर्मणि ।
क्षीरं दत्त्वा द्विजाग्रयाय सर्वदुःखातिगो भवेत् ॥
चतुर्थ्यां पूजनेऽपूपा देया देव्यै द्विजाय च ।
अपूपा एव दातव्या न विघ्नैरभिभूयते ॥
नारदजी बोले - हे तात! देवीके आराधनरूपी धर्मका स्वरूप क्या है? किस प्रकारसे उपासना करनेपर वे देवी परम पद प्रदान करती हैं? उनकी आराधना की विधि क्या है? कैसे, कब और किस स्तोत्रसे आराधना करनेपर वे भगवती दुर्गा कष्टप्रद नरकरूपी दुर्गसे उद्धार करके त्राणदायिनी होती हैं? ॥ १-२ ॥ २ श्रीनारायण बोले- हे विद्वद्वर! हे देवर्षे! जिस प्रकार धर्मपूर्वक आराधना करनेसे देवी स्वयं प्रसन्न हो जाती हैं, उसे अब आप एकाग्रचित्त होकर मुझसे सुनिये । हे नारद! जैसा स्वधर्मका स्वरूप ३ बताया गया है, उसे भी आप मुझसे सुनिये ॥ ३३ ॥
हे मुने! इस अनादि संसारमें सम्यक्रूपसे पूजित होनेपर वे देवी घोर संकटोंमें स्वयं रक्षा करती हैं । वे ४ भगवती जिस प्रकार लोकमें पूजी जाती हैं, वह विधि सुनिये ॥ ४-५ ॥ [ शुक्लपक्षकी ] प्रतिपदा तिथिमें घृतसे देवीकी ५ पूजा करनी चाहिये और ब्राह्मणको घृतका दान करना चाहिये; ऐसा करनेवाला सदा निरोग रहता है ॥६ ॥
द्वितीया तिथिको शर्करासे जगदम्बाका पूजन करना ६ चाहिये और विप्रको शर्कराका ही दान करना चाहिये; ऐसा करनेवाला मनुष्य दीर्घजीवी होता है ॥ ७ ॥
तृतीया तिथिको भगवतीके पूजनकर्ममें उन्हें ७ दुग्ध अर्पण करना चाहिये और श्रेष्ठ ब्राह्मणको दुग्धका दान करना चाहिये; ऐसा करनेसे मनुष्य सभी प्रकारके दुःखोंसे मुक्त हो जाता है ॥८ ॥
८ चतुर्थीके दिन पूआ अर्पण करके देवीका पूजन करना चाहिये और ब्राह्मणको पूआ ही दान करना चाहिये; ऐसा करनेसे मनुष्य विघ्न - बाधाओंसे आक्रान्त ९ नहीं होता ॥ ९ ॥
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२८४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २४
पञ्चम्यां कदलीजातं फलं देव्यै निवेदयेत् ।
तदेव ब्राह्मणे देयं मेधावान्पुरुषो भवेत् ॥
षष्ठीतिथौ मधु प्रोक्तं देवीपूजनकर्मणि ।
ब्राह्मणाय च दातव्यं मधु कान्तिर्यतो भवेत् ॥
सप्तम्यां गुडनैवेद्यं देव्यै दत्त्वा द्विजाय च ।
गुडं दत्त्वा शोकहीनो जायते द्विजसत्तम ॥
नारिकेलमथाष्टम्यां देव्यै नैवेद्यमर्पयेत् ।
ब्राह्मणाय प्रदातव्यं तापहीनो भवेन्नरः ॥
नवम्यां लाजमम्बायै चार्पयित्वा द्विजाय च ।
दत्त्वा सुखाधिको भूयादिह लोके परत्र च ॥
दशम्यामर्पयित्वा तु देव्यै कृष्णतिलान्मुने ।
ब्राह्मणाय प्रदत्त्वा तु यमलोकाद्भयं न हि ॥
एकादश्यां दधि तथा देव्यै चार्पयते तु यः ।
ददाति ब्राह्मणायैतद्देवीप्रियतमो भवेत् ॥
द्वादश्यां पृथुकान्देव्यै दत्त्वाचार्याय यो ददेत् ।
तानेव च मुनिश्रेष्ठ स देवीप्रियतां व्रजेत् ॥
त्रयोदश्यां च दुर्गायै चणकान्प्रददाति च ।
तानेव दत्त्वा विप्राय प्रजासन्ततिमान्भवेत् ॥
चतुर्दश्यां च देवर्षे देव्यै सक्तून्प्रयच्छति ।
तानेव दद्याद्विप्राय शिवस्य दयितो भवेत् ॥
पायसं पूर्णिमातिथ्यामपर्णायै प्रयच्छति ।
ददाति च द्विजाग्र्याय पितॄनुद्धरतेऽखिलान् ॥
पंचमी तिथिको भगवतीका पूजन करके उन्हें केला अर्पण करे और ब्राह्मणको केलेका ही दान करे; १० ऐसा करनेसे मनुष्य बुद्धिमान् होता है ॥ १० ॥
षष्ठी तिथिको भगवतीके पूजनकर्ममें मधुको प्रधान बताया गया है । ब्राह्मणको मधु ही देना ११ चाहिये; ऐसा करनेसे मनुष्य दिव्य कान्तिवाला हो जाता है ॥११ ॥
मुनिश्रेष्ठ! सप्तमी तिथिको भगवतीको गुड़का १२ नैवेद्य अर्पण करके ब्राह्मणको गुड़का दान करनेसे मनुष्य सभी प्रकारके शोकोंसे मुक्त हो जाता है ॥ १२ ॥
अष्टमीको भगवतीको नारियलका नैवेद्य अर्पित करना चाहिये और ब्राह्मणको भी नारियलका दान १३ करना चाहिये; ऐसा करनेवाला मनुष्य सभी सन्तापोंसे रहित हो जाता है ॥ १३ ॥
नवमी के दिन भगवतीको लावा अर्पण करनेके १४ बाद ब्राह्मणको भी लावाका दान करनेसे मनुष्य इस लोकमें तथा परलोकमें परम सुखी रहता है ॥ १४ ॥
हे मुने! दशमी तिथिको भगवतीको काले तिल अर्पित करने और ब्राह्मणको उसी तिलका दान करनेसे १५ मनुष्यको यमलोकका भय नहीं रह जाता ॥१५ ॥
जो मनुष्य एकादशी तिथिको भगवतीको दधि अर्पित करता है और ब्राह्मणको भी दधि प्रदान करता १६ है, वह देवीका परम प्रिय हो जाता है ॥ १६ ॥
हे मुनिश्रेष्ठ! जो द्वादशीके दिन भगवतीको चिउड़ेका भोग लगाकर आचार्यको भी चिउड़ेका दान करता है, वह भगवतीका प्रियपात्र बन जाता है ॥ १७ ॥
१७ जो त्रयोदशीको भगवतीको चना अर्पित करता है और ब्राह्मणको चनेका दान करता है, वह प्रजाओं तथा सन्तानोंसे सदा सम्पन्न रहता है ॥ १८ ॥
१८ हे देवर्षे! जो मनुष्य चतुर्दशीके दिन भगवतीको सत्तू अर्पण करता है और ब्राह्मणको भी सत्तू प्रदान करता है, वह भगवान् शंकरका प्रिय १ ९ हो जाता है ॥१ ९ ॥ जो पूर्णिमा तिथिको भगवती अपर्णाको खीरका भोग लगाता है और श्रेष्ठ ब्राह्मणको खीर प्रदान करता है, वह अपने सभी पितरोंका उद्धार २० | कर देता है ॥२० ॥
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अ ० २४ ] अष्टम
तत्तिथौ हवनं प्रोक्तं देवीप्रीत्यै महामुने ।
तत्तत्तिथ्युक्तवस्तूनामशेषारिष्टनाशनम् ॥२१
रविवारे पायसं च नैवेद्यं परिकीर्तितम् ।
सोमवारे पयः प्रोक्तं भौमे च कदलीफलम् ॥ २२
बुधवारे च सम्प्रोक्तं नवनीतं नवं द्विज ।
गुरुवारे शर्करां च सितां भार्गववासरे ॥ २३
शनिवारे घृतं गव्यं नैवेद्यं परिकीर्तितम् ।
सप्तविंशतिनक्षत्रनैवेद्यं श्रूयतां मुने ॥ २४
घृतं तिलं शर्करां च दधि दुग्धं किलाटकम् ।
दधिकूर्ची मोदकं च फेणिकां घृतमण्डकम् ॥ २५
कंसारं वटपत्रं च घृतपूरमतः परम् ।
वटकं कोकरसकं पूरणं मधु सूरणम् ॥ २६
गुडं पृथुकद्राक्षे च खर्जूरं चैव चारकम् ।
अपूपं नवनीतं च मुद्गं मोदक एव च ॥ २७
मातुलिङ्गमिति प्रोक्तं भनैवेद्यं च नारद ।
विष्कम्भादिषु योगेषु प्रवक्ष्यामि निवेदनम् ॥ २८
पदार्थानां कृतेष्वेषु प्रीणाति जगदम्बिका ।
गुडं मधु घृतं दुग्धं दधि तक्रं त्वपूपकम् ॥ २ ९
नवनीतं कर्कटीं च कूष्माण्डं चापि मोदकम् ।
पनसं कदलं जम्बुफलमाम्रफलं तिलम् ॥ ३०
नारङ्गं दाडिमं चैव बदरीफलमेव च ।
धात्रीफलं पायसञ्च पृथुकं चणकं तथा ॥ ३१ ।
नारिकेलं जम्भफलं कसेरुं सूरणं तथा ।
एतानि क्रमशो विप्र नैवेद्यानि शुभानि च ॥ ३२
विष्कम्भादिषु योगेषु निर्णीतानि मनीषिभिः ।
अथ नैवेद्यमाख्यास्ये करणानां पृथङ्मुने ॥ ३३
कंसारं मण्डकं फेणी मोदकं वटपत्रकम् ।
लड्डुकं घृतपूरं च तिलं दधि घृतं मधु ॥ ३४
करणानामिदं प्रोक्तं देवीनैवेद्यमादरात् । स्कन्ध २८५ हे महामुने! देवीकी प्रसन्नताके लिये उसी तिथिको हवन भी बताया गया है । जिस तिथिमें नैवेद्यके लिये जो वस्तु बतायी गयी है, उसी वस्तुसे उन - उन तिथियोंमें हवन करनेसे सभी विपत्तियोंका नाश हो जाता है ॥ २१ ॥
रविवारको खीरका नैवेद्य अर्पण करना चाहिये । सोमवारको दूध और मंगलवारको केलेका भोग लगाना बताया गया है ॥ २२ ॥
हे द्विज! बुधको ताजा मक्खन भोगके लिये कहा गया है । गुरुवारको रक्त शर्करा, शुक्रवारको श्वेत शर्करा और शनिवारको गायका घृत नैवेद्यके रूपमें बताया गया है ॥ २३३ ॥
हे मुने! अब सत्ताईस नक्षत्रोंमें दिये जानेवाले नैवेद्य विषयमें सुनिये । घी, तिल, चीनी, दही, दूध, मलाई, लस्सी, लड्डू, फेणिका, घृतमण्ड ( शक्करपारा ), कंसार ( गेहूँ के आटे तथा गुड़से निर्मित पदार्थ विशेष ), वटपत्र ( पापड़ ), घेवर, वटक ( बड़ा ), कोकर ( खजूरका रस ), घृतमिश्रित चनेका चूर्ण, मधु, सूरन, गुड़, चिउड़ा, दाख, खजूर, चारक, पूआ, मक्खन, मूँगका लड्डू और विजौरा नींबू - हे नारद! ये सत्ताईस नक्षत्रोंके नैवेद्य बताये गये हैं । २४ - २७ ॥ अब विष्कम्भ आदि योगोंमें नैवेद्य अर्पणके विषयमें कहूँगा । इन पदार्थोंको अर्पित करनेसे जगदम्बिका प्रसन्न होती हैं । गुड़, मधु, घी, दूध, दही, मट्ठा, पूआ, मक्खन, ककड़ी, कोंहड़ा, लड्डू, कटहल, केला, जामुन, आम, तिल, संतरा, अनार, बेरका फल, आमला, खीर, चिउड़ा, चना, नारियल, जम्भफल ( जम्भीरा ), कसेरू और सूरन - हे विप्र! ये शुभ नैवेद्य क्रमशः विष्कम्भ आदि योगोंमें [ भगवतीको ] अर्पण करनेके लिये विद्वानोंके द्वारा निश्चित किये गये हैं । २८ – ३२३ ॥ हे मुने! इसके बाद अब मैं भिन्न - भिन्न करणोंके नैवेद्यके बारेमें बताऊँगा । कंसार, मण्डक, फेनी, मोदक, वटपत्र, लड्डू, घृतपूर, तिल, दही, घी और मधु - ये करणोंके नैवेद्य बताये गये हैं, जिन्हें आदरपूर्वक भगवतीको अर्पण करना चाहिये ॥ ३३-३४३ ॥
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२८६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २४ अथान्यत्सम्प्रवक्ष्यामि देवीप्रीतिकरं परम् ॥
विधानं नारदमुने शृणु तत्सर्वमादृतः ।
चैत्रशुद्धतृतीयायां नरो मधुकवृक्षकम् ॥
पूजयेत्पञ्च खाद्यं च नैवेद्यमुपकल्पयेत् ।
एवं द्वादशमासेषु तृतीयातिथिषु क्रमात् ॥
शुक्लपक्षे विधानेन नैवेद्यमभिदध्महे ।
वैशाखमासे नैवेद्यं गुडयुक्तं च नारद ॥
ज्येष्ठमासे मधु प्रोक्तं देवीप्रीत्यर्थमेव तु ।
आषाढे नवनीतं च मधुकस्य निवेदनम् ॥
श्रावणे दधि नैवेद्यं भाद्रमासे च शर्करा ।
आश्विने पायसं प्रोक्तं कार्तिके पय उत्तमम् ॥
मार्गे फेण्युत्तमा प्रोक्ता पौषे च दधिकूर्चिका ।
माघे मासि च नैवेद्यं घृतं गव्यं समाहरेत् ॥
नारिकेलं च नैवेद्यं फाल्गुने परिकीर्तितम् ।
एवं द्वादशनैवेद्यैर्मासे च क्रमतोऽर्चयेत् ॥
मङ्गला वैष्णवी माया कालरात्रिर्दुरत्यया ।
महामाया मतङ्गी च काली कमलवासिनी ॥
शिवा सहस्रचरणा सर्वमङ्गलरूपिणी ।
एभिर्नामपदैर्देवीं मधूके परिपूजयेत् ॥
ततः स्तुवीत देवेशीं मधूकस्थां महेश्वरीम् ।
सर्वकामसमृद्ध्यर्थं व्रतपूर्णत्वसिद्धये ॥
नमः पुष्करनेत्रायै जगद्धात्र्यै नमोऽस्तु ते ।
माहेश्वर्यै महादेव्यै महामङ्गलमूर्तये ॥
परमा पापहन्त्री च परमार्गप्रदायिनी ।
परमेश्वरी प्रजोत्पत्तिः परब्रह्मस्वरूपिणी ॥
मददात्री मदोन्मत्ता मानगम्या महोन्नता ।
मनस्विनी मुनिध्येया मार्तण्डसहचारिणी ॥
३५ हे नारदमुने! अब मैं देवीको प्रसन्न करनेवाले दूसरे श्रेष्ठ विधानका वर्णन करूँगा, उस सम्पूर्ण विधानको आदरपूर्वक सुनिये । चैत्रमासके शुक्ल-३६ पक्षमें तृतीया तिथिको महुएके वृक्षमें भगवतीकी भावना करके उनका पूजन करे और नैवेद्यमें पाँच प्रकारके भोज्य - पदार्थ अर्पित करे । इसी प्रकार बारहों ३७ महीनोंके शुक्लपक्षकी तृतीया तिथिको पूजन - विधानके साथ क्रमशः नैवेद्य अर्पित करे । हे नारद! वैशाख-३८ मासमें गुड़मिश्रित पदार्थ निवेदित करना चाहिये । ज्येष्ठ महीनेमें भगवतीकी प्रसन्नताके लिये मधु अर्पित करना चाहिये । आषाढ़ महीनेमें नवनीत और ३ ९ महुएके रससे बना हुआ पदार्थ अर्पित करना चाहिये ॥ ३५ – ३ ९ ॥ श्रावण - मासमें दही, भाद्रपद मासमें शर्करा, ४० आश्विन - मासमें खीर तथा कार्तिक मासमें दूधका नैवेद्य उत्तम कहा गया है । मार्गशीर्ष - महीनेमें फेनी ४१ एवं पौष माह में दधिकूर्चिका ( लस्सी ) - का नैवेद्य उत्तम कहा गया है । माघके महीनेमें गायके घीका नैवेद्य अर्पण करना चाहिये; फाल्गुनके महीनेमें ४२ नारियलका नैवेद्य बताया गया है । इस प्रकार बारह महीनोंमें बारह नैवेद्योंसे क्रमशः भगवतीकी पूजा करनी चाहिये ॥ ४०–४२ ॥ ४३ मंगला, वैष्णवी, माया, कालरात्रि, दुरत्यया, महामाया, मतंगी, काली, कमलवासिनी, शिवा, ४४ सहस्रचरणा और सर्वमंगलरूपिणी – इन नामोंका उच्चारण करते हुए महुएके वृक्षमें भगवतीकी पूजा करनी चाहिये । तत्पश्चात् सभी कामनाओंकी ४५ सिद्धि तथा व्रतकी पूर्णताके लिये महुएके वृक्षमें स्थित देवेशी महेश्वरीकी इस प्रकार स्तुति करनी चाहिये ॥ ४३–४५ ॥ ४६ कमलके समान नेत्रोंवाली आप जगद्धात्रीको नमस्कार है । आप महामंगलमूर्तिस्वरूपा महेश्वरी ४७ महादेवीको नमस्कार है । [ हे देवि! ] परमा, पापहन्त्री, परमार्गप्रदायिनी, परमेश्वरी, प्रजोत्पत्ति, परब्रह्मस्वरूपिणी, मददात्री, मदोन्मत्ता, मानगम्या, महोन्नता, मनस्विनी, ४८ । मुनिध्येया, मार्तण्डसहचारिणी - ये आपके नाम हैं । हे
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अ ० २४ ] अष्टम स्कन्ध २८७
जय लोकेश्वरि प्राज्ञे प्रलयाम्बुदसन्निभे ।
महामोहविनाशार्थं पूजितासि सुरासुरैः ॥
यमलोकाभावकर्त्री यमपूज्या यमाग्रजा ।
यमनिग्रहरूपा च यजनीये नमो नमः ॥
समस्वभावा सर्वेशी सर्वसङ्गविवर्जिता ।
सङ्गनाशकरी काम्यरूपा कारुण्यविग्रहा ॥
कङ्कालक्रूरा कामाक्षी मीनाक्षी मर्मभेदिनी ।
माधुर्यरूपशीला च मधुरस्वरपूजिता ॥
महामन्त्रवती मन्त्रगम्या मन्त्रप्रियङ्करी ।
मनुष्यमानसगमा मन्मथारिप्रियङ्करी ॥
अश्वत्थवटनिम्बाम्रकपित्थबदरीगते पनसार्ककरीरादिक्षीरवृक्षस्वरूपिणी ॥
दुग्धवल्लीनिवासार्ह दयनीये दयाधिके ।
दाक्षिण्यकरुणारूपे जय सर्वज्ञवल्लभे ॥
एवं स्तवेन देवेश पूजनान्ते स्तुवीत ताम् ।
व्रतस्य सकलं पुण्यं लभते सर्वदा नरः ॥
नित्यं यः पठते स्तोत्रं देवीप्रीतिकरं नरः ।
आधिव्याधिभयं नास्ति रिपुभीतिर्न तस्य हि ॥
अर्थार्थी चार्थमाप्नोति धर्मार्थी धर्ममाप्नुयात् ।
कामानवाप्नुयात्कामी मोक्षार्थी मोक्षमाप्नुयात् ॥
ब्राह्मणो वेदसम्पन्नो विजयी क्षत्रियो भवेत् ।
वैश्यश्च धनधान्याढ्यो भवेच्छूद्रः सुखाधिकः ॥
स्तोत्रमेतच्छ्राद्धकाले यः पठेत्प्रयतो नरः ।
पितॄणामक्षया तृप्तिर्जायते कल्पवर्तिनी ॥
लोकेश्वर! हे प्राज्ञे! आपकी जय हो । हे प्रलयकालीन मेघ के समान प्रतीत होनेवाली! देवता और दानव ४ ९ महामोह विनाशके लिये आपकी उपासना करते हैं ॥ ४६–४९ ॥ ५० आप यमलोक मिटानेवाली, यमराजपूज्या, यमकी अग्रजा और यमनिग्रहस्वरूपिणी हैं । हे परमाराध्ये! आपको बार- बार नमस्कार है । आप समस्वभावा, सर्वेशी, सर्वसंगविवर्जिता, संगनाशकरी, काम्यरूपा, ५१ कारुण्यविग्रहा, कंकालक्रूरा, कामाक्षी, मीनाक्षी, मर्मभेदिनी, माधुर्यरूपशीला, मधुरस्वरपूजिता, महामन्त्रवती, मन्त्रगम्या, मन्त्रप्रियंकरी, मनुष्य-५२ मानसगमा और मन्मथारिप्रियंकरी - इन नामोंसे विख्यात हैं॥५०–५३ ॥ पीपल, वट, नीम, आम, कैथ एवं बेरमें निवास ५३ करनेवाली आप कटहल, मदार, करील, जामुन आदि क्षीरवृक्षस्वरूपिणी हैं । दुग्धवल्लीमें निवास करनेवाली, दयनीय, महान् दयालु, कृपालुता एवं करुणाकी ५४ साक्षात् मूर्तिस्वरूपा एवं सर्वज्ञजनोंकी प्रियस्वरूपिणि! आपकी जय हो ॥ ५४-५५ ॥ इस प्रकार पूजनके पश्चात् इस स्तोत्रसे उन ५५ देवेश्वरीकी स्तुति करनी चाहिये । ऐसा करनेवाला मनुष्य व्रतका सम्पूर्ण पुण्य प्राप्त कर लेता है ॥ ५६ ॥
जो मनुष्य भगवतीको प्रसन्न करनेवाले इस ५६ स्तोत्रका नित्य पाठ करता है, उसे किसी प्रकारके शारीरिक या मानसिक रोगका भय नहीं होता और उसे शत्रुओंका भी कोई भय नहीं रहता । इस ५७ स्तोत्रके प्रभावसे अर्थ चाहनेवाला अर्थ प्राप्त कर लेता है, धर्म अभिलाषीको धर्मकी प्राप्ति हो जाती है, कामीको काम सुलभ हो जाते हैं और मोक्षकी ५८ । इच्छा रखनेवालेको मोक्ष प्राप्त हो जाता है । इस स्तोत्रके पाठसे ब्राह्मण वेदसम्पन्न, क्षत्रिय विजयी, वैश्य धनधान्यसे परिपूर्ण और शूद्र परम सुखी हो ५ ९ जाता है । जो मनुष्य श्राद्धके समय मनको एकाग्र करके इस स्तोत्रका पाठ करता है, उसके पितरोंकी एक कल्पतक स्थायी रहनेवाली अक्षय तृप्ति हो ६० | जाती है॥५७–६० ॥
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२८८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २४
एवमाराधनं देव्याः समुक्तं सुरपूजितम् ।
यः करोति नरो भक्त्या स देवीलोकभाग्भवेत् ॥
देवीपूजनतो विप्र सर्वे कामा भवन्ति हि ।
सर्वपापहतिः शुद्धा मतिरन्ते प्रजायते ॥
यत्र तत्र भवेत्पूज्यो मान्यो मानधनेषु च ।
जायते जगदम्बायाः प्रसादेन विरञ्चिज ॥
नरकाणां न तस्यास्ति भयं स्वप्नेऽपि कुत्रचित् ।
महामायाप्रसादेन पुत्रपौत्रादिवर्धनः ॥
देवीभक्तो भवत्येव नात्र कार्या विचारणा ।
इत्येवं ते समाख्यातं नरकोद्धारलक्षणम् ॥
पूजनं हि महादेव्याः सर्वमङ्गलकारकम् ।
मधूकपूजनं तद्वन्मासानां क्रमतो मुने ॥
सर्वं समाचरेद्यस्तु पूजनं मधुकाह्वयम् ।
न तस्य रोगबाधादिभयमुद्भवतेऽनघ ॥
अथान्यदपि वक्ष्यामि प्रकृतेः पञ्चकं परम् ।
नाम्ना रूपेण चोत्पत्त्या जगदानन्ददायकम् ॥
साख्यानं च समाहात्म्यं प्रकृतेः पञ्चकं मुने ।
कुतूहलकरं चैव शृणु मुक्तिविधायकम् ॥
[ हे नारद! ] इस प्रकार मैंने देवताओंके द्वारा ६१ देवीकी की गयी आराधना तथा पूजाके विषयमें आपको भलीभाँति बता दिया । जो मनुष्य भक्तिपूर्वक भगवतीकी उपासना करता है, वह देवीलोकका अधिकारी हो जाता है ॥ ६१ ॥
६२ हे विप्र! भगवतीके पूजनसे मनुष्यकी सभी कामनाएँ सिद्ध हो जाती हैं और अन्तमें उसकी बुद्धि सभी पापोंसे रहित होकर निर्मल हो जाती है ॥ ६२ ॥
६३ हे ब्रह्मपुत्र! भगवतीके अनुग्रहसे मनुष्य जहाँ - तहाँ पूजित होता है और मानको ही धन माननेवाले पुरुषोंमें सम्माननीय हो जाता है । उसे ६४ स्वप्न में भी नरकोंका भय नहीं रहता । महामाया भगवतीकी कृपासे देवीका भक्त पुत्र तथा पौत्रोंसे सदा सम्पन्न रहता है, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं करना चाहिये ॥ ६३-६४१ ॥ ६५ [ हे नारद! ] यह जो मैंने आपसे महादेवीके पूजनका वर्णन किया है, वह नरकसे उद्धार करनेवाला तथा सम्पूर्ण रूपसे मंगलकारी है । हे मुने! चैत्र आदि ६६ महीनोंमें क्रमसे महुए के वृक्षमें भगवतीकी पूजा करनी चाहिये । हे अनघ! जो मनुष्य मधूक नामक वृक्षमें सम्यक्रूपसे पूजन करता है; उसे रोग, बाधा आदिका ६७ कोई भय उत्पन्न नहीं होता॥६५–६७ ॥ अब मैं देवी मूलप्रकृतिके श्रेष्ठ पंचकसे सम्बन्धित अन्य प्रसंगका वर्णन कर रहा हूँ । यह प्रसंग अपने नाम, रूप और प्रादुर्भावसे सम्पूर्ण ६८ जगत्को आनन्दित कर देनेवाला है । हे मुने! यह प्रकृतिपंचक कुतूहल उत्पन्न करनेवाला तथा मुक्तिप्रदायक है; आख्यान तथा माहात्म्यसहित इसका ६ ९ श्रवण कीजिये ॥ ६८-६९ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायामष्टमस्कन्धे देवीपूजनविधिनिरूपणं नाम चतुर्विंशोऽध्यायः ॥ २४ ॥
॥ अष्टमः स्कन्धः समाप्तः ॥
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॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥ ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ श्रीमद्देवीभागवतमहापुराण नवमः स्कन्धः अथ प्रथमोऽध्यायः प्रकृतितत्त्वविमर्श; प्रकृतिके अंश, कला एवं कलांशसे उत्पन्न देवियोंका वर्णन श्रीनारायण उवाच
गणेशजननी दुर्गा राधा लक्ष्मीः सरस्वती ।
सावित्री च सृष्टिविधौ प्रकृतिः पञ्चधा स्मृता ॥
नारद उवाच
आविर्बभूव सा केन का वा सा ज्ञानिनांवर ।
किं वा तल्लक्षणं साधो बभूव पञ्चधा कथम् ॥
सर्वासां चरितं पूजाविधानं गुण ईप्सितः ।
अवतारः कुत्र कस्यास्तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥
श्रीनारायण उवाच
प्रकृतेर्लक्षणं वत्स को वा वक्तुं क्षमो भवेत् ।
किञ्चित्तथापि वक्ष्यामि यच्छुतं धर्मवक्त्रतः ॥
प्रकृष्टवाचकः प्रश्च कृतिश्च सृष्टिवाचकः ।
सृष्टौ प्रकृष्टा या देवी प्रकृतिः सा प्रकीर्तिता ॥
गुणे सत्त्वे प्रकृष्टे च प्रशब्दो वर्तते श्रुतः ।
मध्यमे रजसि कृश्च तिशब्दस्तमसि स्मृतः ॥
त्रिगुणात्मस्वरूपा या सा च शक्तिसमन्विता ।
प्रधाना सृष्टिकरणे प्रकृतिस्तेन कथ्यते ॥
प्रथमे वर्तते प्रश्च कृतिश्च सृष्टिवाचकः ।
सृष्टेरादौ च या देवी प्रकृतिः सा प्रकीर्तिता ॥
1898 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ द्वितीय खण्ड ] –10 A श्रीनारायण बोले- सृष्टिविधानमें मूलप्रकृति पाँच प्रकारकी कही गयी है - गणेशजननी दुर्गा, १ राधा, लक्ष्मी, सरस्वती और सावित्री ॥ १ ॥
नारदजी बोले - हे ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ! आप कृपापूर्वक बतायें कि किस निमित्त उनका आविर्भाव होता है, उनका स्वरूप क्या है, उनका लक्षण क्या २ है तथा वे किस प्रकार पाँच रूपोंमें प्रकट हुईं । हे साधो! इन सभी स्वरूपोंका चरित्र, पूजाविधान, अभीष्ट गुण तथा किसका अवतार कहाँ हुआ - यह ३ सब विस्तारपूर्वक मुझे बतायें ॥ २-३ ॥ श्रीनारायण बोले- हे वत्स! देवी प्रकृतिके सम्पूर्ण लक्षण कौन बता सकता है? फिर भी धर्मराजके मुखसे मैंने जो सुना है, उसे यत्किंचित् ४ । रूपसे बताता हूँ ॥४ ॥
' प्र ' अक्षर प्रकृष्टका वाचक है और ' कृति ' से सृष्टिका बोध होता है । जो देवी सृष्टिप्रक्रियामें प्रकृष्ट ५ हैं, वे ही प्रकृति कही गयी हैं । ‘ प्र ’ शब्द प्रकृष्ट सत्त्वगुण, ‘ कृ ' रजोगुण और ' ति ' शब्द तमोगुणका प्रतीक कहा गया है । जो त्रिगुणात्मिका हैं, वे ही ६ सर्वशक्तिसे सम्पन्न होकर प्रधानरूपसे सृष्टिकार्यमें संलग्न रहती हैं, अतः उन्हें ' प्रकृति ' या ' प्रधान ’ ७ कहा जाता है ॥ ५–७ ॥ प्रथमका बोधक ‘ प्र ' और सृष्टिवाचक ' कृति ' शब्दके संयोगसे सृष्टिके प्रारम्भमें जो देवी विद्यमान ८ रहती हैं, उन्हें प्रकृति कहा गया है ॥ ८ ॥
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२ ९ ० श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १ योगेनात्मा सृष्टिविधौ द्विधारूपो बभूव सः पुमांश्च दक्षिणार्धाङ्गो वामार्धा प्रकृतिः स्मृता सा च ब्रह्मस्वरूपा च नित्या सा च सनातनी यथात्मा च तथा शक्तिर्यथाग्नौ दाहिका स्थिता ॥
अत एव हि योगीन्द्रैः स्त्रीपुम्भेदो न मन्यते ।
सर्वं ब्रह्ममयं ब्रह्मञ्छश्वत्सदपि नारद ॥
स्वेच्छामयस्येच्छया च श्रीकृष्णस्य सिसृक्षया ।
साविर्बभूव सहसा मूलप्रकृतिरीश्वरी ॥
तदाज्ञया पञ्चविधा सृष्टिकर्मविभेदिका ।
अथ भक्तानुरोधाद्वा भक्तानुग्रहविग्रहा ॥
गणेशमाता दुर्गा या शिवरूपा शिवप्रिया ।
नारायणी विष्णुमाया पूर्णब्रह्मस्वरूपिणी ॥
ब्रह्मादिदेवैर्मुनिभिर्मनुभिः पूजिता स्तुता ।
सर्वाधिष्ठातृदेवी सा शर्वरूपा सनातनी ॥
धर्मसत्यपुण्यकीर्तिर्यशोमङ्गलदायिनी 1 सुखमोक्षहर्षदात्री शोकार्तिदुःखनाशिनी ॥ शरणागतदीनार्तपरित्राणपरायणा I तेज: स्वरूपा परमा तदधिष्ठातृदेवता ॥
सर्वशक्तिस्वरूपा च शक्तिरीशस्य सन्ततम् ।
सिद्धेश्वरी सिद्धिरूपा सिद्धिदा सिद्धिरीश्वरी ॥
बुद्धिर्निद्रा क्षुत्पिपासा छाया तन्द्रा दया स्मृतिः ।
जातिः क्षान्तिश्च भ्रान्तिश्च शान्तिः कान्तिश्च चेतना ॥
तुष्टिः पुष्टिस्तथा लक्ष्मीर्धृतिर्माया तथैव च ।
सर्वशक्तिस्वरूपा सा कृष्णस्य परमात्मनः ॥
1898 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ द्वितीय खण्ड ] —10 B । सृष्टिके लिये योगमायाका आश्रय लेकर परमात्मा ॥ ९ दो रूपोंमें विभक्त हो गये, जिनका दक्षिणार्ध भाग पुरुष और वामार्ध भाग प्रकृति कहा जाता है॥९॥
। वे ब्रह्मस्वरूपा हैं, नित्या हैं और सनातनी १० हैं । जैसे अग्निमें दाहिका शक्ति अभिन्नरूपसे स्थित है, वैसे ही परमात्मा और प्रकृतिरूपा शक्ति भी अभिन्न हैं ॥१० ॥
हे ब्रह्मन्! हे नारद! इसीलिये योगीजन परमात्मामें ११ स्त्री और पुरुषभावसे भेद नहीं मानते और सब कुछ ब्रह्ममय है - ऐसा निरन्तर चिन्तन करते हैं ॥ ११ ॥
स्वतन्त्रभाववाले श्रीकृष्णकी इच्छासे वे १२ मूलप्रकृति भगवती सृष्टि करनेकी कामनासे सहसा प्रकट हो गयीं । उनकी आज्ञासे भिन्न - भिन्न कर्मोंकी अधिष्ठात्री होकर एवं भक्तोंके अनुरोधसे उनपर १३ अनुग्रह करनेहेतु विग्रह धारण करनेवाली वे पाँच रूपोंमें अवतरित हुईं ॥ १२-१३ ॥ जो गणेशमाता दुर्गा शिवप्रिया तथा शिवरूपा हैं, १४ वे ही विष्णुमाया नारायणी हैं तथा पूर्णब्रह्म स्वरूपा हैं । ब्रह्मादि देवता, मुनि तथा मनुगण सभी उनकी पूजा - स्तुति करते हैं । वे सबकी अधिष्ठात्रीदेवी हैं, १५ सनातनी हैं तथा शिवस्वरूपा हैं ॥ १४-१५ ॥ वे धर्म, सत्य, पुण्य तथा कीर्तिस्वरूपा हैं; वे यश, कल्याण, सुख, प्रसन्नता और मोक्ष भी १६ देती हैं तथा शोक, दुःख और संकटोंका नाश करनेवाली हैं ॥ १६ ॥
वे अपनी शरणमें आये हुए दीन और आर्तजनोंकी निरन्तर रक्षा करती हैं । वे ज्योतिस्वरूपा हैं, उनका १७ विग्रह परम तेजस्वी है और वे भगवान् श्रीकृष्णके तेजकी अधिष्ठातृदेवता हैं ॥ १७ ॥
वे सर्वशक्तिस्वरूपा हैं और महेश्वरकी शाश्वत १८ शक्ति हैं । वे ही साधकोंको सिद्धि देनेवाली, सिद्धिरूपा, सिद्धेश्वरी, सिद्धि तथा ईश्वरी हैं । बुद्धि, निद्रा, क्षुधा, पिपासा, छाया, तन्द्रा, दया, स्मृति, जाति, क्षान्ति, १ ९ भ्रान्ति, शान्ति, कान्ति, चेतना, तुष्टि, पुष्टि, लक्ष्मी, धृति तथा माया - ये इनके नाम हैं । वे परमात्मा श्रीकृष्णके पास सर्वशक्तिस्वरूपा होकर स्थित रहती २० | हैं | १८ -२० ॥
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अ ० १ ] उक्तः श्रुतौ श्रुतगुणश्चातिस्वल्पो यथागमम् । गुणोऽस्त्यनन्तोऽनन्ताया अपरां च निशामय ।
शुद्धसत्त्वस्वरूपा या पद्मा सा परमात्मनः ।
सर्वसम्पत्स्वरूपा सा तदधिष्ठातृदेवता ॥
कान्तातिदान्ता शान्ता च सुशीला सर्वमङ्गला ।
लोभमोहकामरोषमदाहङ्कारवर्जिता ॥
भक्तानुरक्ता पत्युश्च सर्वाभ्यश्च पतिव्रता ।
प्राणतुल्या भगवतः प्रेमपात्रं प्रियंवदा ॥
सर्वसस्यात्मिका देवी जीवनोपायरूपिणी ।
महालक्ष्मीश्च वैकुण्ठे पतिसेवारता सती ॥
स्वर्गे च स्वर्गलक्ष्मीश्च राजलक्ष्मीश्च राजसु ।
गृहेषु गृहलक्ष्मीश्च मर्त्यानां गृहिणां तथा ॥
सर्वप्राणिषु द्रव्येषु शोभारूपा मनोहरा ।
कीर्तिरूपा पुण्यवतां प्रभारूपा नृपेषु च ॥
वाणिज्यरूपा वणिजां पापिनां कलहाङ्कुरा ।
दयारूपा च कथिता वेदोक्ता सर्वसम्मता ॥
सर्वपूज्या सर्ववन्द्या चान्यां मत्तो निशामय ।
वाग्बुद्धिविद्याज्ञानाधिष्ठात्री च परमात्मनः ॥
सर्वविद्यास्वरूपा या सा च देवी सरस्वती ।
साबुद्धिः कविता मेधा प्रतिभा स्मृतिदा नृणाम् ॥
नानाप्रकारसिद्धान्तभेदार्थकलना मता ।
व्याख्याबोधस्वरूपा च सर्वसन्देहभञ्जिनी ॥
विचारकारिणी ग्रन्थकारिणी शक्तिरूपिणी ।
स्वरसङ्गीतसन्धानतालकारणरूपिणी ॥
नवम स्कन्ध २ ९ १ श्रुतियोंमें इनके प्रसिद्ध गुणोंका थोड़ेमें वर्णन २१ किया गया है, जैसा कि आगमोंमें भी वर्णन उपलब्ध है । उन अनन्ताके अनन्त गुण हैं । अब दूसरे स्वरूपके विषयमें सुनिये ॥ २१ ॥
जो शुद्ध सत्त्वरूपा महालक्ष्मी हैं २२ ही शक्ति हैं, वे सर्वसम्पत्स्वरूपिणी अधिष्ठातृदेवता हैं ॥२२ ॥
वे शोभामयी, अति संयमी २३ सर्वमंगलरूपा हैं और लोभ, मोह, अहंकारादिसे रहित हैं ॥ २३ ॥
भक्तोंपर अनुग्रह करनेवाली , वे भी परमात्माकी तथा सम्पत्तियोंकी , शान्त, सुशील, काम, क्रोध, मद, , अपने स्वामीके २४ लिये सबसे अधिक पतिव्रता, प्रभुके लिये प्राणतुल्य, उनकी प्रेमपात्र तथा प्रियवादिनी, सभी धन - धान्यकी अधिष्ठात्री तथा आजीविकास्वरूपिणी वे देवी सती २५ महालक्ष्मी वैकुण्ठमें अपने स्वामी भगवान् विष्णुकी
सेवामें तत्पर रहती हैं । २४-२५ ॥
वे स्वर्गमें स्वर्गलक्ष्मी, राजाओंमें राजलक्ष्मी, २६ गृहस्थ मनुष्योंके घरमें गृहलक्ष्मी और सभी प्राणियों तथा पदार्थोंमें शोभारूपसे विराजमान रहती हैं । वे मनोहर हैं । वे पुण्यवान् लोगोंमें कीर्तिरूपसे, राजपुरुषोंमें २७ प्रभारूपसे, व्यापारियोंमें वाणिज्यरूपसे तथा पापियोंमें कलहरूपसे विराजती हैं । वे दयारूपा कही गयी हैं, वेदोंमें उनका निरूपण हुआ है, वे सर्वमान्य, सर्वपूज्य २८ तथा सबके लिये वन्दनीय हैं । अब आप अन्य स्वरूपके विषयमें मुझसे सुनिये ॥ २६ - २८३ ॥ जो परमात्माकी वाणी, बुद्धि, विद्या तथा ज्ञानकी अधिष्ठात्री हैं; सभी विद्याओंकी विग्रहरूपा हैं, वे २ ९ देवी सरस्वती हैं । वे मनुष्योंको बुद्धि, कवित्व शक्ति, मेधा, प्रतिभा और स्मृति प्रदान करती हैं । वे भिन्न-भिन्न सिद्धान्तोंके भेद - निरूपणका सामर्थ्य रखनेवाली, ३० व्याख्या और बोधरूपिणी तथा सारे सन्देहोंका नाश करनेवाली कही गयी हैं । वे विचारकारिणी, ग्रन्थकारिणी, शक्तिरूपिणी तथा स्वर - संगीत - -सन्धान तथा तालकी ३१ कारणरूपा हैं । वे ही विषय, ज्ञान तथा वाणीस्वरूपा हैं; सभी प्राणियोंकी संजीवनी शक्ति हैं; वे व्याख्या और वाद - विवाद करनेवाली हैं; शान्तिस्वरूपा हैं तथा ३२ । वीणा और पुस्तक धारण करनेवाली हैं । वे शुद्ध 1898 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ द्वितीय खण्ड ] -10 C