देवी भागवत उत्तरार्द्ध — पृष्ठ 41–50
देवी भागवत उत्तरार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 41–50
पृष्ठ 41
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
४० श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ६
तमाह च्यवनस्तत्र कथमेतौ रवेः सुतौ ।
न ग्रहार्हौ च नासत्यौ ब्रूहि सत्यं शचीपते ॥
न सङ्करौ समुत्पन्नौ धर्मपत्नीसुतौ रवेः ।
केन दोषेण देवेन्द्र नाह सोमं भिषग्वरौ ॥
निर्णयोऽत्र मखे शक्र कर्तव्यः सर्वदैवतैः ।
ग्राहयिष्याम्यहं सोमं कृतौ तौ सोमपौ मया ॥
प्रेरितोऽसौ मया राजा मखाय मघवन्किल ।
एतदर्थं करिष्यामि सत्यं मे वचनं विभो ॥
आभ्यामुपकृतं शक्र तथा दत्तं नवं वयः ।
तस्मात्प्रत्युपकारस्तु कर्तव्यः सर्वथा मया ॥
इन्द्र उवाच
चिकित्सकौ कृतावेतौ नासत्यौ निन्दितौ सुरैः ।
उभावेतौ न सोमाह मा गृहाणैतयोर्ग्रहम् ॥
च्यवन उवाच
अहल्याजार संयच्छ कोपं चाद्य निरर्थकम् ।
वृत्रघ्न किं हि नासत्यौ न सोमा सुरात्मजौ ॥
एवं विवादे समुपस्थिते च न कोऽपि वाचं तमुवाच भूप । ग्रहं तयोर्भार्गवतिग्मतेजाः संग्राहयामास तपोबलेन ॥ तब च्यवनमुनिने इन्द्रसे कहा- ये सूर्यपुत्र ५४ अश्विनीकुमार सोमरस ग्रहण करनेके अधिकारी कैसे नहीं हैं? हे शचीपते! आप इस बातको प्रमाणित कीजिये ॥ ५४ ॥
ये वर्णसंकर नहीं हैं, अपितु सूर्यकी धर्मपत्नीसे ५५ उत्पन्न हुए हैं । तब हे देवेन्द्र! ये दोनों श्रेष्ठ चिकित्सक किस दोषके कारण सोमपानके योग्य नहीं हैं? ॥ ५५ ॥
हे इन्द्र! इस यज्ञमें उपस्थित सभी देवता ही ५६ इसका निर्णय कर दें । मैं तो इन्हें सोमरस अवश्य पिलाऊँगा; क्योंकि मैंने इन्हें सोमपानका अधिकारी बना दिया है ॥ ५६ ॥
५७ हे मघवन्! मैंने ही इस यज्ञके लिये राजा शर्यातिको प्रेरित किया है । हे विभो! इनके लिये मैं ऐसा अवश्य करूँगा; मेरा यह कथन सत्य है ॥ ५७ ॥
हे शक्र! मुझे नवीन अवस्था प्रदान करके ५८ इन्होंने मेरा बड़ा उपकार किया है, अतः उसके बदलेमें मुझे सभी प्रकारसे इनका प्रत्युपकार करना चाहिये ॥ ५८ ॥
इन्द्र बोले – चिकित्सावृत्तिवाले ये दोनों अश्विनीकुमार देवताओंके द्वारा निन्दनीय माने गये हैं । ५ ९ अतः ये सोमपानके अधिकारी नहीं हैं । इनके लिये सोमरसका भाग मत ग्रहण कीजिये ॥ ५ ९ ॥ च्यवनमुनि बोले - हे अहल्याजार! इस समय व्यर्थ कोप मत करो । वृत्रका वध करनेवाले हे इन्द्र! ये देवपुत्र अश्विनीकुमार सोमपानके अधिकारी क्यों ६० नहीं हैं? ॥ ६० ॥
[ व्यासजी बोले- ] हे राजन्! इस प्रकारका विवाद छिड़ जानेपर वहाँ उपस्थित कोई भी देवता च्यवनमुनिसे कुछ भी नहीं कह सका । तब अपने तपोबलके द्वारा अत्यन्त तेजस्वी च्यवनमुनिने सोमरसका भाग लेकर अश्विनीकुमारोंको ६१ | दे दिया ॥ ६१ ॥
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां सप्तमस्कन्धे च्यवनेनाश्विनोः कृते सोमपानाधिकारत्वचेष्टावर्णनं नाम षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥
पृष्ठ 42
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० ७ ] सप्तम स्कन्ध ४१ अथ सप्तमोऽध्यायः क्रुद्ध इन्द्रका विरोध करना; परंतु च्यवनके प्रभावको देखकर शान्त हो जाना, शर्यातिके बादके सूर्यवंशी राजाओंका विवरण व्यास उवाच
दत्ते ग्रहे तु राजेन्द्र वासवः कुपितो भृशम् ।
प्रोवाच च्यवनं तत्र दर्शयन्बलमात्मनः ॥
मा ब्रह्मबन्ध मर्यादामिमां त्वं कर्तुमर्हसि ।
वधिष्यामि द्विषन्तं त्वां विश्वरूपमिवाऽपरम् ॥
च्यवन उवाच
मावमंस्था महात्मानौ रूपद्रविणवर्चसा ।
यौ चक्रतुर्मां मघवन् वृन्दारकमिवापरम् ॥
ऋते त्वां विबुधाश्चान्ये कथं वाददते ग्रहम् ।
अश्विनावपि देवेन्द्र देवौ विद्धि परन्तपौ ॥
इन्द्र उवाच
भिषजौ नार्हतः कामं ग्रहं यज्ञे कथञ्चन ।
यदि दित्ससि मन्दात्मन् शिरश्छेत्स्यामि साम्प्रतम् ॥
व्यास उवाच
अनादृत्य तु तद्वाक्यं वासवस्य च भार्गवः ।
ग्रहं तु ग्राहयामास भर्त्सयन्निव तं भृशम् ॥
सोमपात्रं यदा ताभ्यां गृहीतं तु पिपासया ।
समीक्ष्य बलभिद्देव इदं वचनमब्रवीत् ॥
आभ्यामर्थाय सोमं त्वं ग्राहयिष्यसि चेत्स्वयम् ।
वज्रं तु प्रहरिष्यामि विश्वरूपमिवापरम् ॥
वासवेनैवमुक्तस्तु भार्गवश्चातिगर्वितः ।
जग्राह विधिवत्सोममश्विभ्यामतिमन्युमान् ॥
इन्द्रोऽपि प्राक्षिपत्कोपाद्वज्रमस्मै स्वमायुधम् ।
पश्यतां सर्वदेवानां सूर्यकोटिसमप्रभम् ॥
व्यासजी बोले- हे राजेन्द्र! [ च्यवनमुनिके द्वारा अश्विनीकुमारोंको ] सोमभाग दे दिये जानेपर १ इन्द्र अत्यन्त कुपित हुए और उन्होंने अपना पराक्रम दिखाते हुए मुनिसे कहा – हे ब्रह्मबन्धो! आप इस प्रकारकी अनुचित मर्यादा स्थापित मत कीजिये, २ अन्यथा मेरा विरोध करनेवाले आप मुनिका भी दूसरे विश्वरूपकी भाँति वध कर डालूँगा ॥ १-२ ॥ च्यवन बोले - हे मघवन्! जिन महात्मा अश्विनी कुमारोंने रूपसम्पदाके तेजके द्वारा मुझे दूसरे ३ देवताकी भाँति बना दिया है, उनका अपमान मत कीजिये । हे देवेन्द्र! आपके अतिरिक्त अन्य देवता सोमभाग क्यों पाते हैं? परम तपस्वी इन अश्विनीकुमारोंको ४ भी आप देवता समझें ॥३-४ ॥ इन्द्र बोले – हे मन्दात्मन्! ये दोनों चिकित्सक किसी प्रकार भी यज्ञमें सोमभाग पानेके अधिकारी नहीं हैं । यदि आप इन्हें सोमरस देंगे, तो मैं अभी ५ आपका सिर काट दूंगा ॥ ५ ॥
व्यासजी बोले - [ हे जनमेजय! ] इन्द्रकी उस बातकी उपेक्षा करके उनकी बहुत भर्त्सना करते हुए च्यवनमुनिने अश्विनीकुमारोंको यज्ञ - भाग प्रदान कर दिया ॥ ६ ॥
जब उन दोनोंने पीनेकी इच्छासे सोमपात्र ग्रहण किया, तब शत्रुसेनाका भेदन करनेवाले ७ इन्द्रने मुनिसे यह वचन कहा - यदि आप इन्हें सोमरस देंगे, तो मैं स्वयं आपके ऊपर वज्रसे उसी प्रकार प्रहार करूँगा, जैसे मैंने विश्वरूपको वज्रसे ८ मार डाला था ॥ ७-८ ॥ इन्द्रके ऐसा कहनेपर [ तपोबलसे ] गर्वित च्यवनमुनि अत्यन्त कुपित हो उठे और उन्होंने विधिपूर्वक ९ अश्विनीकुमारोंको सोमरस दे दिया॥९॥
इसपर इन्द्रने भी क्रोध करके करोड़ों सूर्योके समान प्रभावाला अपना आयुध वज्र सभी देवताओंके १० सामने ही च्यवनमुनिपर चला दिया ॥१० ॥
पृष्ठ 43
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
४२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ७
प्रेरितं चाशनिं प्रेक्ष्य च्यवनस्तपसा ततः ।
स्तम्भयामास वज्रं स शक्रस्यामिततेजसः ॥ ११
कृत्यया स महाबाहुरिन्द्रं हन्तुमिहोद्यतः । जुहावाग्नौ शृतं हव्यं मन्त्रेण मुनिसत्तमः । १२
तत्र कृत्या समुत्पन्ना च्यवनस्य तपोबलात् ।
प्रबलः पुरुषः क्रूरो बृहत्कायो महासुरः ॥ १३
मदो नाम महाघोरो भयदः प्राणिनामिह ।
शरीरे पर्वताकारस्तीक्ष्णदंष्ट्रो भयानकः ॥ १४
चतस्त्रश्चायता दंष्ट्रा योजनानां शतं शतम् ।
इतरे त्वस्य दशना बभूवुर्दशयोजनाः ॥ १५
बाहू पर्वतसंकाशावायतौ क्रूरदर्शनौ ।
जिह्वा तु भीषणा क्रूरा लेलिहाना नभस्तलम् ॥ १६
ग्रीवा तु गिरिशृङ्गाभा कठिना भीषणा भृशम् ।
नखा व्याघ्रनखप्रख्याः केशाश्चातीवभीषणाः ॥ १७
शरीरं कज्जलाभं च तस्य चास्यं भयानकम् ।
नेत्रे दावानलप्रख्ये भीषणेऽतिभयानके ॥ १८
हनुरेका स्थिता तस्य भूमावेका दिवं गता ।
एवंविधः समुत्पन्नो मदो नाम बृहत्तनुः ॥ १ ९
तं विलोक्य सुराः सर्वे भयमाजग्मुरंहसा ।
इन्द्रोऽपि भयसंत्रस्तो युद्धाय न मनो दधे ॥ २०
दैत्योऽपि वदने कामं वज्रमादाय संस्थितः ।
व्याप्तं नभो घोरदृष्टिर्ग्रसन्निव जगत्त्रयम् ॥ २१
तब अमित तेजवाले इन्द्रके चलाये गये उस वज्रको देखकर च्यवनमुनिने अपने तपोबलसे उसे स्तम्भित कर दिया ॥ ११ ॥
इसके बाद वे महाबाहु मुनियोंमें श्रेष्ठ च्यवन कृत्या राक्षसीके द्वारा इन्द्रको मरवा डालनेके लिये उद्यत हो गये और पकाये गये हव्यसे मन्त्रसहित अग्निमें आहुति देने लगे ॥ १२ ॥
उन च्यवनके तपोबलसे वहाँपर कृत्या उत्पन्न हो गयी । अत्यन्त बलशाली तथा क्रूर पुरुषके रूपमें वह आविर्भूत हुई । उस पुरुषका शरीर महान् दैत्यके समान बहुत विशाल था ॥ १३ ॥
उसका नाम ' मद ' था । वह अत्यन्त उग्र तथा संसारके प्राणियोंके लिये बहुत भयदायक था । वह शरीरसे पर्वतके आकारका था, उसके दाँत तीक्ष्ण थे, वह बड़ा ही भयावह था । उसके चार दाँत तो सौ-सौ योजन लम्बे थे और इसके अन्य दाँत दस योजनके विस्तारवाले थे । देखनेमें क्रूर लगनेवाली उसकी दोनों भुजाएँ पर्वतके समान दूरतक फैली हुई थीं । अत्यन्त क्रूर तथा भयानक लगनेवाली उसकी जिह्वा आकाश और पातालको चाट रही थी॥१४–१६ ॥ उसकी अत्यन्त डरावनी तथा कठोर गर्दन पर्वतकी चोटीके समान थी, उसके नाखून बाघके नाखूनके सदृश थे, उसके केश तो अत्यन्त भयंकर थे । उसका शरीर काजलकी आभावाला तथा मुख भयानक था और उसके अत्यन्त भीषण तथा भयावह दोनों नेत्र दावानलके समान प्रतीत हो रहे थे । उसका एक ओठ पृथ्वीपर स्थित था तो दूसरा ओठ आकाशतक गया हुआ था । इस प्रकारका विशाल शरीरवाला ' मद ' नामक दानव उत्पन्न हुआ ॥ १७–१९ ॥ उसे देखते ही सभी देवता शीघ्र ही भयभीत हो गये । इन्द्र भी भयसे व्याकुल हो उठे और उनके मनमें युद्धका विचार नहीं रह गया ॥२० ॥
वह दैत्य वज्रको मुखमें लेकर सम्पूर्ण आकाशको व्याप्त करके सामने खड़ा था । ऐसा प्रतीत होता था मानो भयावनी दृष्टिवाला वह दानव तीनों लोकोंको | निगल जायगा ॥ २१ ॥
पृष्ठ 44
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० ७ ] सप्तम स्कन्ध ४३
स भक्षयिष्यन्संक्रुद्धः शतक्रतुमुपाद्रवत् ।
चक्रुशुश्च सुराः सर्वे हा हताः स्मेति संस्थिताः ॥
इन्द्रः स्तम्भितबाहुस्तु मुमुक्षुर्वज्रमन्तिकात् ।
न शशाक पविं तस्मिन्प्रहर्तुं पाकशासनः ॥
वज्रहस्तः सुरेशानस्तं वीक्ष्य कालसन्निभम् ।
सस्मार मनसा तत्र गुरुं समयकोविदम् ॥
स्मरणादाजगामाशु बृहस्पतिरुदारधीः ।
गुरुस्तत्समयं दृष्ट्वा विपत्तिसदृशं महत् ॥
विचार्य मनसा कृत्यं तमुवाच शचीपतिम् ।
दुःसाध्योऽयं महामन्त्रैस्त्वयं वज्रेण वासव ॥
असुरो मदसंज्ञस्तु यज्ञकुण्डात्समुत्थितः ।
तपोबलमृषेः सम्यक् च्यवनस्य महाबलः ॥
अनिवार्यो ह्ययं शत्रुस्त्वया देवैस्तथा मया ।
शरणं याहि देवेश च्यवनस्य महात्मनः ॥
स निवारयिता नूनं कृत्यामात्मकृतां किल ।
न निवारयितुं शक्ताः शक्तिभक्तरुषं क्वचित् ॥
व्यास उवाच
इत्युक्तो गुरुणा शक्रस्तदागच्छन्मुनिं प्रति ।
प्रणम्य शिरसा नम्रस्तमुवाच भयान्वितः ॥
क्षमस्व मुनिशार्दूल शमयासुरमुद्यतम् ।
प्रसन्नो भव सर्वज्ञ वचनं ते करोम्यहम् ॥
सोमार्हावश्विनावेतावद्यप्रभृति भार्गव ।
भविष्यतः सत्यमेतद्वचो विप्र प्रसीद मे ॥
इन्द्रको खा जानेके विचारसे वह क्रोधित २२ होकर उनकी ओर दौड़ा । इसपर ' हाय, हम सब मारे गये ' – ऐसा कहकर सभी देवता जोर - जोरसे चीखने - चिल्लाने लगे ॥ २२ ॥
इन्द्र वज्र चलाना चाहते थे, किंतु भुजाओंके २३ कुण्ठित हो जानेके कारण वे उसपर वज्र - प्रहार करनेमें समर्थ नहीं हुए ॥ २३ ॥
तब हाथमें वज्र धारण करनेवाले देवराज इन्द्रने २४ काल - सदृश उस दानवको देखकर सामयिक समस्याका समाधान करनेमें कुशल देवगुरु बृहस्पतिका मन - ही-मन स्मरण किया ॥ २४ ॥
२५ इन्द्रके स्मरण करते ही उदार बुद्धिवाले गुरु बृहस्पति वहाँ शीघ्र आ गये । इन्द्रकी बड़ी दयनीय दशा देखकर तथा मन - ही - मन सारे २६ कृत्यपर विचार करके वे शचीपति इन्द्रसे कहने लगे - ॥ २५३ ॥
हे इन्द्र! मद नामक इस असुरको महामन्त्रोंसे अथवा वज्रसे मार पाना अत्यन्त कठिन है । च्यवनमुनिका २७ तपोबलस्वरूप यह महाबली दैत्य सम्यक् रूपसे यज्ञकुण्डसे उत्पन्न हुआ है । यह शत्रु तुम्हारे, देवगणोंके तथा मेरे द्वारा भी पराभूत नहीं किया जा २८ सकता । अतः हे देवेश! आप महात्मा च्यवनकी शरणमें जायँ, वे अपने द्वारा उत्पन्न की गयी इस ' कृत्या ' का शमन अवश्य कर देंगे । आदिशक्तिके २ ९ भक्तका रोष निवारण करनेमें कोई भी समर्थ नहीं है ॥ २६–२९ ॥ व्यासजी बोले --- गुरु बृहस्पतिके यह कहनेपर इन्द्र च्यवनमुनिके पास गये और नम्रतापूर्वक सिर झुकाकर प्रणाम करके भयभीत होते हुए उनसे ३० बोले - हे मुनिश्रेष्ठ! क्षमा कीजिये । संहारके लिये तत्पर इस असुरको शान्त कीजिये । आप प्रसन्न हो जाइये | हे सर्वज्ञ! मैं आपकी आज्ञाका पालन अवश्य ३१ करूँगा ॥ ३०-३१ ॥ हे भार्गव! ये दोनों अश्विनीकुमार आजसे सोमपानके अधिकारी हो जायँगे T । हे विप्र! मेरा यह ३२ वचन सत्य है, अब आप प्रसन्न हो जायँ ॥ ३२ ॥
पृष्ठ 45
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
४४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ७
मिथ्या ते नोमो ह्येष भवत्वेव तपोधन ।
जाने त्वमपि धर्मज्ञ मिथ्या नैव करिष्यसि ॥
सोमपावश्विनावेतौ त्वत्कृतौ च सदैव हि ।
भविष्यतश्च शर्यातेः कीर्तिस्तु विपुला भवेत् ॥
मया यद्धि कृतं कर्म सर्वथा मुनिसत्तम ।
परीक्षार्थं तु विज्ञेयं तव वीर्यप्रकाशनम् ॥
प्रसादं कुरु मे ब्रह्मन् मदं संहर चोत्थितम् ।
कल्याणं सर्वदेवानां तथा भूयो विधीयताम् ॥
एवमुक्तस्तु शक्रेण च्यवनः परमार्थवित् ।
संजहार तपः कोपं समुत्पन्नं विरोधजम् ॥
देवमाश्वास्य संविग्नं भार्गवस्तु मदं ततः ।
व्यभजत्स्त्रीषु पानेषु द्यूतेषु मृगयासु च ॥
मदं विभज्य देवेन्द्रमाश्वास्य चकितं भिया ।
संस्थाप्य च सुरान्सर्वान्मखं तस्य न्यवर्तयत् ॥
ततस्तु संस्कृतं सोमं वासवाय महात्मने ।
अश्विभ्यां सर्वधर्मात्मा पाययामास भार्गवः ॥
एवं तौ च्यवनेनार्यावश्विनौ रविपुत्रकौ ।
विहितौ सोमपौ राजन् सर्वथा तपसो बलात् ॥
सरस्तदपि विख्यातं जातं यूपविमण्डितम् ।
आश्रमस्तु मुनेः सम्यक् पृथिव्यां विश्रुतोऽभवत् ॥
शर्यातिरपि सन्तुष्टो ह्यभवत्तेन कर्मणा ।
यज्ञं समाप्य नगरे जगाम सचिवैर्वृतः ॥
हे तपोधन! अश्विनीकुमारोंको ३३ अधिकारी बनानेका आपका उद्यम व्यर्थ यह उचित ही है । हे धर्मज्ञ! मैं जानता निष्प्रयोजन कोई भी कार्य नहीं करेंगे । अश्विनीकुमारोंको सोमपानका अधिकारी ३४ अतः अब ये यज्ञोंमें सदा सोमरसका पान साथ ही राजा शर्यातिका महान् यश भी जायगा ॥ ३३-३४ ॥ सोमपानका नहीं हुआ; हूँ कि आप आपने इन बना दिया, कर सकेंगे । स्थापित हो ३५ हे मुनिश्रेष्ठ! मैंने यह जो भी कार्य किया है, उसे आपके पराक्रमको प्रकट करनेके उद्देश्यसे ही किया है - ऐसा आप समझिये ॥ ३५ ॥
३६ हे ब्रह्मन्! आप मेरे ऊपर कृपा कीजिये । अपने द्वारा उत्पन्न किये गये इस ' मद ' नामक दैत्यको तिरोहित कर दीजिये और ऐसा करके सभी देवताओंका पुनः कल्याण कीजिये ॥ ३६ ॥
३७ इन्द्रके इस प्रकार प्रार्थना करनेपर परमार्थ-तत्त्वके ज्ञाता च्यवनमुनिने विरोधके कारण उत्पन्न अपने क्रोधको दबा लिया । तत्पश्चात् उद्विग्न चित्तवाले देवराज इन्द्रको सान्त्वना देकर भृगुवंशी च्यवनमुनिने ३८ स्त्री, मदिरापान, द्यूत और आखेट – इन सबमें ‘ मद ’ को स्थापित कर दिया ॥ ३७-३८ ॥ इस प्रकार ' मद ' को विभिन्न जगहोंपर विभक्त ३ ९ करके, भयसे घबराये हुए इन्द्रको आश्वासन देकर तथा सभी देवताओंको अपने - अपने कार्यपर लगाकर च्यवनमुनिने राजा शर्यातिका यज्ञ सम्पन्न कराया ॥ ३ ९ ॥ तदनन्तर सभी धर्मोंके आत्मास्वरूप भृगुवंशी ४० च्यवनमुनिने महात्मा इन्द्रको तथा दोनों अश्विनी-कुमारोंको परिष्कृत सोमरस पिलाया ॥ ४० ॥
हे राजन्! इस प्रकार च्यवनमुनिने अपने तपके ४१ प्रभावसे उन दोनों सूर्यपुत्र श्रेष्ठ अश्विनीकुमारोंको पूर्णरूपसे सोमपानका अधिकारी बना दिया ॥ ४१ ॥
उसी समयसे यज्ञ - स्तम्भसे सुशोभित वह सरोवर भी विख्यात हो गया तथा मुनिके आश्रमकी प्रसिद्धि ४२ सम्यक् - रूपसे पृथ्वीपर सर्वत्र व्याप्त हो गयी ॥४२ ॥
उस कर्मसे राजा शर्याति भी सन्तुष्ट हो गये और यज्ञसम्पन्न करके मन्त्रियोंके साथ नगरको ४३ | चले गये ॥ ४३ ॥
पृष्ठ 46
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ०८ ] सप्तम स्कन्ध ४५
राज्यं चकार धर्मज्ञो मनुपुत्रः प्रतापवान् ।
आनर्तस्तस्य पुत्रोऽभूदानर्ताद्रेवतोऽभवत् ॥
सोऽन्तः समुद्रे नगरीं विनिर्माय कुशस्थलीम् ।
आस्थितोऽभुङ्क्त विषयानानर्तादीनरिन्दमः ॥
तस्य पुत्रशतं जज्ञे ककुद्मिज्येष्ठमुत्तमम् ।
पुत्री च रेवती नाम्ना सुन्दरी शुभलक्षणा ॥
वरयोग्या यदा जाता तदा राजा च रेवतः ।
चिन्तयामास राजेन्द्रो राजपुत्रान्कुलोद्भवान् ॥
रैवतं नाम च गिरिमाश्रितः पृथिवीपतिः ।
चकार राज्यं बलवानानर्तेषु नराधिपः ॥
विचिन्त्य मनसा राजा कस्मै देया मया सुता ।
गत्वा पृच्छामि ब्रह्माणं सर्वज्ञं सुरपूजितम् ॥
इति सञ्चिन्त्य भूपालः सुतामादाय रेवतीम् ।
ब्रह्मलोकं जगामाशु प्रष्टुकामः पितामहम् ॥
यत्र देवाश्च यज्ञाश्च छन्दांसि पर्वतास्तथा ।
अब्धयः सरितश्चापि दिव्यरूपधराः स्थिताः ॥
ऋषयः सिद्धगन्धर्वाः पन्नगाश्चारणास्तथा ।
तस्थुः प्राञ्जलयः सर्वे स्तुवन्तश्च पुरातनाः ॥
इसके बाद धर्मज्ञ तथा प्रतापी मनुपुत्र शर्याति ४४ राज्य करने लगे । उनके पुत्र ' आनर्त ' हुए और आनर्तसे ' रेवत ' उत्पन्न हुए । शत्रुओंका दमन करनेवाले वे रेवत समुद्रके मध्य कुशस्थली नामक नगरी ४५ स्थापित करके वहीं पर रहकर आनर्त आदि देशोंपर शासन करने लगे ॥ ४४-४५ ॥ उनके सौ पुत्र हुए, उनमें ककुद्मी सबसे ज्येष्ठ ४६ तथा उत्तम था । उनकी रेवती नामक एक पुत्री भी थी, जो परम सुन्दर तथा शुभ लक्षणोंसे युक्त थी ॥ ४६ ॥
जब वह कन्या विवाहके योग्य हो गयी, तब ४७ महाराज रेवत उत्तम कुलमें उत्पन्न राजकुमारोंके विषयमें सोचने लगे ॥ ४७ ॥
उस समय वे बलशाली नरेश ' रैवत ' नामक ४८ पर्वतपर रहते हुए आनर्त आदि देशोंपर राज्य कर रहे थे ॥ ४८ ॥
वे मन - ही - मन सोचने लगे ' मैं यह कन्या किसे ४ ९ प्रदान करूँ, अतः सर्वज्ञ तथा देवपूजित ब्रह्माजीके पास जाकर उन्हींसे पूछ लूँ ' - ऐसा विचार करके ५० राजा रेवत अपनी पुत्री रेवतीको साथ लेकर पितामह ब्रह्माजीसे वर पूछनेकी अभिलाषासे शीघ्र ही ब्रह्मलोक जा पहुँचे; जहाँपर देवता, यज्ञ, छन्द, पर्वत, समुद्र ५१ और नदियाँ दिव्य रूप धारण करके विराजमान थे और सनातन ऋषि, सिद्ध, गन्धर्व, पन्नग तथा चारणवृन्द — ये सभी हाथ जोड़कर स्तुति करते हुए ५२ | खड़े थे ॥ ४ ९ –५२ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां सप्तमस्कन्धे रेवतस्य रेवतीवरार्थं ब्रह्मलोकगमनवर्णनं नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥
PO अथाष्टमोऽध्यायः राजा रेवतकी कथा जनमेजय उवाच जनमेजय बोले- हे ब्रह्मन्! मेरे मनमें यह संशयोऽयं महान् ब्रह्मन् वर्तते मम मानसे । महान् संशय हो रहा है कि स्वयं राजा रेवत अपनी ब्रह्मलोकं गतो राजा रेवतीसंयुतः स्वयम् ॥ १ कन्या रेवतीको साथ लेकर ब्रह्मलोक चले गये । मैंने पूर्वकालमें ब्राह्मणोंसे कथा - प्रसंगमें यह अनेक बार मया पूर्वं श्रुतं कृत्स्नं ब्राह्मणेभ्यः कथान्तरे । सुना है कि ब्रह्मको जाननेवाला शान्त स्वभाव ब्राह्मण ब्राह्मणो ब्रह्मविच्छान्तो ब्रह्मलोकमवाप्नुयात् ॥ २ ही ब्रह्मलोक प्राप्त कर सकता है ॥ १-२ ॥
पृष्ठ 47
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
४६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ८
राजा कथं गतस्तत्र रेवतीसंयुतः स्वयम् ।
सत्यलोकेऽतिदुष्प्रापे भूर्लोकादिति संशयः ॥
मृतः स्वर्गमवाप्नोति सर्वशास्त्रेषु निर्णयः । ( मानुषेण तु देहेन ब्रह्मलोके गतिः कथम् ) स्वर्गात्पुनः कथं लोके मानुषे जायते गतिः ॥
एतन्मे संशयं विद्वंश्छेत्तुमर्हसि साम्प्रतम् ।
यथा राजा गतस्तत्र प्रष्टुकामः प्रजापतिम् ॥
व्यास उवाच
मेरोस्तु शिखरे राजन् सर्वे लोकाः प्रतिष्ठिताः ।
इन्द्रलोको वह्निलोको या च संयमिनी पुरी ॥
तथैव सत्यलोकश्च कैलासश्च तथा पुनः ।
वैकुण्ठश्च पुनस्तत्र वैष्णवं पदमुच्यते ॥
यथार्जुनः शक्रलोके गतः पार्थो धनुर्धरः ।
पञ्चवर्षाणि कौन्तेयः स्थितस्तत्र सुरालये ॥
मानुषेणैव देहेन वासवस्य च सन्निधौ ।
तथैवान्येऽपि भूपालाः ककुत्स्थप्रमुखाः किल ॥
स्वर्लोकगतयः पश्चाद्दैत्याश्चापि महाबलाः ।
जित्वेन्द्रसदनं प्राप्य संस्थितास्तत्र कामतः ॥
महाभिषः पुरा राजा ब्रह्मलोकं गतः स्वराट् ।
आगच्छन्तीं नृपो गङ्गामपश्यच्चातिसुन्दरीम् ॥
वायुनाम्बरमस्यास्तु दैवादपहृतं नृप ।
किञ्चिन्नग्ना नृपेणाथ दृष्टा सा सुन्दरी तथा ॥
स्मितं चकार कामार्तः सा च किञ्चिज्जहास वै ।
ब्रह्मणा तौ तदा दृष्टौ शप्तौ जातौ वसुन्धराम् ॥
वैकुण्ठेऽपि सुराः सर्वे पीडिता दैत्यदानवैः ।
गत्वा हरिं जगन्नाथमस्तुवन्कमलापतिम् ॥
सन्देहो नात्र कर्तव्यः सर्वथा नृपसत्तम । गम्याः सर्वेऽपि लोकाः स्युर्मानवानां नराधिप ।
अवश्यं कृतपुण्यानां तापसानां नराधिप ।
पुण्यसद्भाव एवात्र गमने कारणं नृप ॥
तथैव यजमानानां यज्ञेन भावितात्मनाम् । राजा रेवत अत्यन्त दुष्प्राप्य सत्यलोकमें स्वयं ३ अपनी पुत्री रेवतीके साथ पृथ्वीलोकसे कैसे पहुँच गये - इसी बातका मुझे सन्देह है । सभी शास्त्रोंमें यही निर्णय विद्यमान है कि मृत व्यक्ति ही स्वर्ग प्राप्त कर सकता है; ( इस मानवदेहसे ब्रह्मलोकमें जाना कैसे ४ सम्भव है? ) और स्वर्गसे पुनः इस मनुष्यलोकमें पहुँच जाना कैसे हो सकता है? हे विद्वन्! महाराज ५ रेवत जिस तरह ब्रह्माजीसे अपनी कन्याके लिये वर पूछनेकी इच्छासे वहाँ गये थे - इसे बताकर इस समय मेरे इस सन्देहको दूर करनेकी कृपा करें ॥ ३५ ॥
व्यासजी बोले – हे राजन्! सुमेरुपर्वतके शिखरपर ६ ही इन्द्रलोक, वह्निलोक, संयमिनीपुरी, सत्यलोक,
कैलास और वैकुण्ठ - ये सभी लोक प्रतिष्ठित हैं ।
७ वैकुण्ठको ही वैष्णव पद कहा जाता है ॥६-७ ॥
जैसे धनुष धारण करनेवाले कुन्तीपुत्र अर्जुन इन्द्रलोक गये थे और वे इसी मनुष्य - शरीरसे उस ८ इन्द्रलोकमें पाँच वर्षतक इन्द्रके सान्निध्यमें रहे, उसी प्रकार ककुत्स्थ आदि अन्य प्रमुख राजा भी स्वर्गलोक ९ जा चुके हैं । इसके अतिरिक्त महाबलशाली दैत्य भी इन्द्रलोकको जीतकर वहाँ पहुँचकर अपनी इच्छाके अनुसार रह चुके हैं ॥ ८-१० ॥ १० पूर्वकालमें महाराज महाभिष भी ब्रह्मलोक गये थे । उन नरेशने परम सुन्दरी गंगाजीको आते देखा । हे राजन्! उस समय दैवयोगसे वायुने उनके वस्त्र ११ उड़ा दिये, जिससे राजाने उन सुन्दरी गंगाको कुछ अनावृत अवस्थामें देख लिया । इसपर कामसे व्यथित १२ राजा मुसकराने लगे और गंगाजी भी हँस पड़ीं । उस समय ब्रह्माजीने उन दोनोंको देख लिया और शाप दे दिया, जिससे उन दोनोंको पृथ्वीपर जन्म लेना पड़ा । १३ दैत्यों और दानवोंसे पीड़ित सभी देवताओंने भी वैकुण्ठधाममें जाकर कमलाकान्त जगत्पति भगवान्
१४ विष्णुकी स्तुति की थी । ११ - १४ ॥
अतएव हे नृपश्रेष्ठ! इस विषयमें किसी भी प्रकारका सन्देह नहीं करना चाहिये । हे नराधिप! पुण्यात्मा, तपस्वी १५ और महापुरुष सभी लोकोंमें जा सकते हैं । हे नरेन्द्र! हे राजन्! जैसे पवित्र सदाचरण ही ब्रह्मादि लोकोंमें जानेका १६ कारण है, वैसे ही पवित्र मनवाले यजमानलोग भी यज्ञके प्रभावसे वहाँ पहुँच जाते हैं ॥ १५-१६३ ॥
पृष्ठ 48
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० ८ ] जनमेजय उवाच रेवतो रेवतीं कन्यां गृहीत्वा चारुलोचनाम् ब्रह्मलोकं गतः पश्चात्किं कृतं तेन भूभुजा ब्रह्मणा किं समादिष्टं कस्मै दत्ता सुता पुनः तत्सर्वं विस्तराद् ब्रह्मन् कथय त्वं ममाधुना व्यास उवाच निशामय महीपाल राजा रेवतकः किल पुत्र्या वरं परिप्रष्टुं ब्रह्मलोकं गतो यदा आवर्तमाने गान्धर्वे स्थितो लब्धक्षणः क्षणम् शृण्वन्नतृप्यद्धृष्टात्मा सभायां तु सकन्यकः समाप्ते तत्र गान्धर्वे प्रणम्य परमेश्वरम् दर्शयित्वा सुतां तस्मै स्वाभिप्रायं न्यवेदयत् राजोवाच वरं कथय देवेश कन्येयं मम पुत्रिका देया कस्मै मया ब्रह्मन् प्रष्टुं त्वां समुपागतः बहवो राजपुत्रा मे वीक्षिताः कुलसम्भवाः
कस्मिश्चिन्मे मनः कामं नोपतिष्ठति चञ्चलम् ।
तस्मात्त्वां देवदेवेश प्रष्टुमत्रागतोऽस्म्यहम् ॥
तदाज्ञापय सर्वज्ञ योग्यं राजसुतं वरम् ।
कुलीनं बलवन्तं च सर्वलक्षणसंयुतम् ॥
दातारं धर्मशीलं च राजपुत्रं समादिश व्यास उवाच तदाकर्ण्य जगत्कर्ता वचनं नृपतेस्तदा तमुवाच हसन्वाक्यं दृष्ट्वा कालस्य पर्ययम् ब्रह्मोवाच राजपुत्रास्त्वया राजन् वरा ये हृदये कृताः ग्रस्ताः कालेन ते सर्वे सपितृपौत्रबान्धवाः सप्तविंशतिमोऽद्यैव द्वापरस्तु प्रवर्तते वंशजास्ते मृताः सर्वे पुरी दैत्यैर्विलुण्ठिता सोमवंशोद्भवस्तत्र राजा राज्यं प्रशास्ति हि सप्तम स्कन्ध ४७ जनमेजय बोले- महाराज रेवत सुन्दर नेत्रोंवाली ॥ १७ अपनी पुत्री रेवतीको साथमें लेकर ब्रह्मलोक पहुँच गये; उसके बाद उन्होंने क्या किया, ब्रह्माजीने उन्हें । क्या आदेश दिया और उन रेवतने अपनी पुत्री किसे ॥ १८ सौंपी? हे ब्रह्मन्! अब आप इन सारी बातोंको । विस्तारपूर्वक मुझको बतलाइये ॥ १७ - १८३ ॥ व्यासजी बोले - हे महीपाल! सुनिये, जब राजा रेवत अपनी पुत्रीके वरके विषयमें पूछनेके लिये ॥ १ ९ ब्रह्मलोक पहुँचे, उस समय गन्धर्वलोगोंका संगीत हो । रहा था । वे अपनी कन्याके साथ कुछ देरतक सभामें ॥ २० रुककर संगीत सुनते हुए परम तृप्त हुए । पुनः गन्धर्वोंका । संगीत समाप्त हो जानेपर परमेश्वर ( ब्रह्माजी ) - को प्रणाम करके उन्हें अपनी कन्या रेवतीको दिखाकर ॥ २१ अपना आशय प्रकट कर दिया ॥ १ ९ - — -२१ ॥ । राजा बोले- हे देवेश! यह कन्या मेरी पुत्री है, मैं इसे किसको प्रदान करूँ - यही पूछनेके लिये ॥ २२ आपके पास आया हूँ । अतः हे ब्रह्मन्! आप इसके योग्य वर बतायें । मैंने उत्तम कुलमें उत्पन्न बहुतसे । राजकुमारोंको देखा है, किंतु किसीमें भी मेरा चंचल ॥ २३ मन स्थिर नहीं होता है । इसलिये हे देवदेवेश! [ वरके विषयमें ] आपसे पूछनेके लिये यहाँ आया हूँ । २४ हे सर्वज्ञ! आप किसी योग्य राजकुमार वरके विषयमें बताइये । ऐसे राजकुमारका निर्देश कीजिये; जो कुलीन, बलवान्, समस्त लक्षणोंसे सम्पन्न, दानी तथा २५ धर्मपरायण हो ॥ २२–२५३ ॥ । व्यासजी बोले- हे राजन्! तब राजाकी बात सुनकर जगत् की रचना करनेवाले ब्रह्माजी कालपर्यय ॥ २६ ( ब्रह्मलोकके थोड़े समयमें पृथ्वीलोकका बड़ा लम्बा समय बीता हुआ ) देखकर हँस करके उनसे कहने । लगे - ॥ २६३ ॥
ब्रह्माजी बोले- हे राजन्! आपने अपने हृदयमें ॥ २७ जिन राजकुमारोंको वरके रूपमें समझ रखा था, वे । सब - के - सब पुत्र - पौत्र तथा बन्धुओंसमेत काल-कवलित हो चुके हैं । इस समय वहाँ सत्ताईसवाँ द्वापर ॥ २८ चल रहा है । आपके सभी वंशज मृत हो चुके हैं और । दैत्योंने आपकी पुरी भी विनष्ट कर डाली है । इस ॥ २ ९ । समय वहाँ चन्द्रवंशी राजा शासन कर रहे हैं । अब
पृष्ठ 49
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
४८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ८
उग्रसेन इति ख्यातो मथुराधिपतिः किल ।
ययातिवंशसम्भूतो राजा माथुरमण्डले ॥
उग्रसेनात्मजः कंसः सुरद्वेषी महाबलः ।
दैत्यांशः पितरं सोऽपि कारागारं न्यवेशयत् ॥
स्वयं राज्यं चकारासौ नृपाणां मदगर्वितः ।
मेदिनी चातिभारार्ता ब्रह्माणं शरणं गता ॥
दुष्टराजन्यसैन्यायां भारेणातिसमाकुला ।
अंशावतरणं तत्र गदितं सुरसत्तमैः ॥
वासुदेवः समुत्पन्नः कृष्णः कमललोचनः ।
देवक्यां देवरूपिण्यां योऽसौ नारायणो मुनिः ॥
तपश्चचार दुःसाध्यं धर्मपुत्रः सनातनः ।
गङ्गातीरे नरसखः पुण्ये बदरिकाश्रमे ॥
सोऽवतीर्णो यदुकुले वासुदेवोऽपि विश्रुतः ।
तेनासौ निहतः पापः कंसः कृष्णेन सत्तम ॥
उग्रसेनाय राज्यं वै दत्तं हत्वा खलं सुतम् ।
कंसस्य श्वशुरः पापो जरासन्धो महाबलः ॥
आगत्य मथुरां क्रोधाच्चकार सङ्गरं मुदा । कृष्णेनासौ जितः संख्ये जरासन्धो महाबलः
प्रेषयामास युद्धाय सबलं यवनं ततः ।
श्रुत्वायान्तं महाशूरं ससैन्यं यवनाधिपम् ॥
( कृष्णस्तु मथुरां त्यक्त्वा पुरीं द्वारावतीमगात् । प्रभग्नां तां पुरीं कृष्णः शिल्पिभिः सह सङ्गतैः कारयामास दुर्गाढ्यां हट्टशालाविमण्डिताम् ।
जीर्णोद्धारं पुरः कृत्वा वासुदेवः प्रतापवान् ।
उग्रसेनं च राजानं चकार वशवर्तिनम् ॥
यादवान्स्थापयामास द्वारवत्यां यदूत्तमः वासुदेवस्तु तत्राद्य वर्तते बान्धवैः सह ॥ मथुरा नामसे प्रसिद्ध उस पुरीके अधिपतिके रूपमें ३० उग्रसेन विख्यात हैं । ययातिवंशमें उत्पन्न वे उग्रसेन सम्पूर्ण मथुरामण्डलके नरेश हैं । उन महाराज उग्रसेनका एक कंस नामक पुत्र हुआ, जो महान् बलशाली तथा ३१ देवताओंसे द्वेष रखनेवाला था । राजाओंमें सबसे अधिक मदोन्मत्त उस दानववंशी कंसने अपने पिताको भी कारागारमें डाल दिया और वह स्वयं राज्य करने ३२ लगा ॥ २७-३१३ ॥ तब पृथ्वी असह्य भारसे व्याकुल होकर ब्रह्माजीकी शरणमें गयी । श्रेष्ठ देवगणोंने ऐसा कहा ३३ है कि दुष्ट राजाओं तथा उनके सैनिकोंके भारसे पृथ्वीके अति व्याकुल होनेपर ही भगवान्का अंशावतार होता है । अतः उस समय कमलके समान नेत्रवाले वसुदेवनन्दन ३४ श्रीकृष्ण देवीस्वरूपा देवकीके गर्भसे उत्पन्न हुए, वे साक्षात् नारायणमुनि ही थे ॥ ३२-३४ ॥ उन सनातन धर्मपुत्र नरसखा नारायणमुनिने ३५ बदरिकाश्रममें गंगाजीके तटपर अत्यन्त कठोर तपस्या की थी । वे ही यदुकुलमें अवतार लेकर ' वासुदेव ' नामसे विख्यात हुए । हे महाभाग! उन्हीं वासुदेव ३६ भगवान् श्रीकृष्णने पापी कंसका संहार किया और इस प्रकार उस दुष्ट राजाको मारकर उन्होंने [ उसके पिता ] उग्रसेनको सम्पूर्ण राज्य दे दिया ॥ ३५-३६३ ॥ ३७ कंसका श्वसुर जरासन्ध महान् बलशाली तथा पापी था । वह अत्यन्त क्रोधित हो मथुरा आकर श्रीकृष्णके साथ आवेगपूर्वक युद्ध करने लगा । अन्तमें ॥ ३८ श्रीकृष्णने उस महाबली जरासन्धको युद्धमें जीत लिया । तब उसने सेनासहित कालयवनको [ कृष्णके साथ ] युद्ध करनेके लिये भेजा ॥ ३७-३८३ ॥ ३ ९ महापराक्रमी यवनाधिप कालयवनको सेनासहित आता सुनकर ( कृष्ण मथुरा छोड़कर द्वारका चले गये । भगवान् श्रीकृष्णने कुशल शिल्पियोंके द्वारा ॥ बड़े - बड़े दुर्ग तथा बाजारोंसे सुशोभित उस नष्ट - भ्रष्ट पुरीका पुनः निर्माण कराया, उस पुरीका जीर्णोद्धार करके प्रतापी श्रीकृष्णने उग्रसेनको वहाँका अपना ) आज्ञाकारी राजा बनाया । ) तत्पश्चात् यदुश्रेष्ठ श्रीकृष्णने उस द्वारकापुरीमें यादवोंको भलीभाँति बसाया । इस I समय वे वासुदेव अपने बन्धु - बान्धवोंके साथ उस ४० । द्वारकामें रह रहे हैं ॥ ३ ९ -४० ॥
पृष्ठ 50
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० ८ ] सप्तम
तस्याग्रजः स विख्यातो बलदेवो हलायुधः ।
शेषांशो मुसली वीरो वरोऽस्तु तव सम्मतः ॥ ४१
सङ्कर्षणाय देह्याशु कन्यां कमललोचनाम् ।
रेवतीं बलभद्राय विवाहविधिना ततः ॥ ४२
दत्त्वा पुत्रीं नृपश्रेष्ठ गच्छ त्वं बदरिकाश्रमम् ।
तपस्तप्तुं सुरारामं पावनं कामदं नृणाम् ॥ ४३
व्यास उवाच
इति राजा समादिष्टो ब्रह्मणा पद्मयोनिना ।
जगाम तरसा राजन् द्वारकां कन्ययान्वितः ॥ ४४
ददौ तां बलदेवाय कन्यां वै शुभलक्षणाम् ।
ततस्तप्त्वा तपस्तीव्रं नृपतिः कालपर्यये ॥ ४५
जगाम त्रिदशावासं त्यक्त्वा देहं सरित्तटे । राजोवाच भगवन्महदाश्चर्यं भवता समुदाहृतम् ॥ ४६
रेवतस्तु स्थितस्तत्र ब्रह्मलोके सुतार्थतः ।
युगानां तु गतं तत्र शतमष्टोत्तरं किल ॥ ४७
कन्या वृद्धा न सञ्जाता राजा वातितरां नु किम् ।
एतावन्तं तथा कालमायुः पूर्णं तयोः कथम् ॥ ४८
व्यास उवाच
न जरा क्षुत्पिपासा वा न मृत्युर्न भयं पुनः ।
न तु ग्लानिः प्रभवति ब्रह्मलोके सदानघ ॥ ४ ९
मेरुं गतस्य शर्यातेः सन्तती राक्षसैर्हता ।
गताः कुशस्थलीं त्यक्त्वा भयभीता इतस्ततः ॥ ५०
मनोश्च क्षुवतः पुत्र उत्पन्नो वीर्यवत्तरः ।
इक्ष्वाकुरिति विख्यातः सूर्यवंशकरस्तु सः ॥ ५१
वंशार्थं तप आतिष्ठद्देवीं ध्यात्वा निरन्तरम् ।
नारदस्योपदेशेन प्राप्य दीक्षामनुत्तमाम् ॥ ५२
स्कन्ध ४ ९ उनके बड़े भाई बलराम हैं । हल तथा मूसलको आयुधके रूपमें धारण करनेवाले वे शूरवीर बलराम शेषके अंशावतार कहे जाते हैं । वे ही आपकी कन्याके लिये उपयुक्त वर हैं ॥४१ ॥
अब आप वैवाहिक विधिके अनुसार शीघ्र ही संकर्षण बलरामको कमलके समान नेत्रोंवाली अपनी कन्या रेवती सौंप दीजिये । हे नृपश्रेष्ठ! उन्हें कन्या प्रदानकर आप तप करनेके लिये देवोद्यान बदरिकाश्रम चले जाइये; क्योंकि तप मनुष्योंकी सारी अभिलाषाएँ पूर्ण कर देता है और उनके अन्तःकरणको पवित्र बना देता है ॥ ४२-४३ ॥ व्यासजी बोले- हे राजन्! पद्मयोनि ब्रह्माजीसे यह आदेश पाकर राजा रेवत अपनी कन्याके साथ शीघ्र ही द्वारका चले गये । वहाँ उन्होंने बलरामजीको शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न अपनी पुत्री सौंप दी । उसके बाद सुदीर्घ कालतक कठोर तपस्या करके वे राजा रेवत नदीके तटपर अपना शरीर त्यागकर देवलोक चले गये ॥ ४४-४५३ ॥ राजा बोले- हे भगवन्! आपने यह तो महान् आश्चर्यजनक बात कही कि राजा रेवत कन्याके योग्य वर जाननेके उद्देश्यसे ब्रह्मलोक गये और उनके वहाँ ठहरे हुए एक सौ आठ युग बीत गये, तबतक वह कन्या तथा वे राजा वृद्ध क्यों नहीं हुए अथवा इतने दीर्घ समयकी पूर्ण आयु ही उन्हें कैसे प्राप्त | हुई? ॥ ४६–४८ ॥ व्यासजी बोले- हे निष्पाप जनमेजय! ब्रह्मलोकमें भूख, प्यास, मृत्यु, भय, वृद्धावस्था तथा ग्लानि– इनमें कोई भी विकार कभी भी उत्पन्न नहीं होता ॥ ४ ९ ॥ जब राजा रेवत वहाँसे सुमेरुपर्वतपर चले गये, तब राक्षसों शर्याति - वंशकी संततियोंको नष्ट कर डाला । वहाँके सभी लोग भयभीत होकर कुशस्थली छोड़कर इधर - उधर भाग गये ॥५० ॥
कुछ समय बाद क्षुव नामक मनुसे एक परम ओजस्वी पुत्र उत्पन्न हुआ । इक्ष्वाकु नामसे विख्यात वे ही सूर्यवंशके प्रवर्तक माने जाते हैं ॥५१ ॥
नारदजीके उपदेशसे और उनसे श्रेष्ठ दीक्षा प्राप्त करके उन्होंने वंशवृद्धिके उद्देश्यसे भगवतीके । ध्यानमें निरन्तर संलग्न रहकर कठोर तपस्या की ॥ ५२ ॥