देवी भागवत उत्तरार्द्ध — पृष्ठ 371–380
देवी भागवत उत्तरार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 371–380
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३६२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १२ दत्त्वा सम्पूजयेद् ब्रह्मन्नुपचाराणि षोडश । चाहिये । आसन, पाद्य, अर्घ्य, स्नान, अनुलेपन, धूप, आसनं पाद्यमर्घ्यं च स्नानीयं चानुलेपनम् ॥ १३ दीप, नैवेद्य, ताम्बूल, शीतल जल, वस्त्र, आभूषण, माला, धूपं दीपं च नैवेद्यं ताम्बूलं शीतलं जलम् वसनं भूषणं माल्यं गन्धमाचमनीयकम् मनोहरं सुतल्पं च देयान्येतानि षोडश दत्त्वा भक्त्या च प्रणमेत्संस्तूय सम्पुटाञ्जलिः सम्पूज्यैवं प्रकारेण सोऽश्वमेधफलं लभेत् नारद उवाच श्रोतुमिच्छामि देवेश लक्ष्मीकान्त जगत्पते विष्णोर्विष्णुपदीस्तोत्रं पापघ्नं पुण्यकारकम् श्रीनारायण उवाच शृणु नारद वक्ष्यामि पापघ्नं पुण्यकारकम् शिवसङ्गीतसंमुग्धश्रीकृष्णाङ्गसमुद्भवाम् राधाङ्गद्रवसंयुक्तां तां गङ्गां प्रणमाम्यहम् यज्जन्म सृष्टेरादौ च गोलोके रासमण्डले सन्निधाने शङ्करस्य तां गङ्गां प्रणमाम्यहम् गोपैर्गोपीभिराकीर्णे शुभे राधामहोत्सवे कार्तिकीपूर्णिमायां च तां गङ्गां प्रणमाम्यहम् कोटियोजनविस्तीर्णा दैर्घ्यं लक्षगुणा ततः समावृता या गोलोके तां गङ्गां प्रणमाम्यहम् ॥ षष्टिलक्षयोजना या ततो दैर्घ्यं चतुर्गुणा समावृता या वैकुण्ठे तां गङ्गां प्रणमाम्यहम् ॥ त्रिंशल्लक्षयोजना या दैर्घ्यं पञ्चगुणा ततः आवृता ब्रह्मलोके या तां गङ्गां प्रणमाम्यहम् त्रिंशल्लक्षयोजना या दैर्घ्यं चतुर्गुणा ततः आवृता शिवलोके या तां गङ्गां प्रणमाम्यहम्
लक्षयोजनविस्तीर्णा दैर्घ्यं सप्तगुणा ततः ।
आवृता ध्रुवलोके या तां गङ्गां प्रणमाम्यहम् ॥
चन्दन, आचमन और मनोहर शय्या - ये अर्पणयोग्य । सोलह उपचार हैं । इन्हें भक्तिपूर्वक गंगाको अर्पण करके ॥१४ दोनों हाथ जोड़कर स्तुति करके उन्हें प्रणाम करे । इस । विधिसे गंगाकी विधिवत् पूजा करके वह मनुष्य अश्व-मेधयज्ञका फल प्राप्त करता है । १२ - १५३ ॥ ॥ १५ नारदजी बोले - हे देवेश! हे लक्ष्मीकान्त! । हे जगत्पते! अब मैं भगवान् विष्णुकी चिरसंगिनी विष्णुपदी गंगाके पापनाशक तथा पुण्यदायक स्तोत्रका श्रवण करना चाहता हूँ ॥ १६३ ॥
॥ १६ श्रीनारायण बोले – हे नारद! सुनिये, अब मैं । उस पापनाशक तथा पुण्यप्रद स्तोत्रको कहूँगा । जो भगवान् शिवके संगीतसे मुग्ध श्रीकृष्णके अंगसे आविर्भूत तथा राधाके अंगद्रवसे सम्पन्न हैं, उन ॥ १७ गंगाको मैं प्रणाम करता हूँ॥१७-१८ ॥ । सृष्टिके आरम्भमें गोलोकके रासमण्डलमें जिनका ॥ १८ आविर्भाव हुआ है और जो सदा शंकरके सान्निध्यमें रहती हैं, उन गंगाको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ १ ९ ॥ । जो कार्तिक - पूर्णिमाके दिन गोप तथा गोपियोंसे ॥ १ ९ भरे राधा - महोत्सवके शुभ अवसरपर सदा विद्यमान । रहती हैं, उन गंगाको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ २० ॥
जो गोलोक करोड़ योजन चौड़ाई तथा उससे ॥ २० भी लाख गुनी लम्बाई में फैली हुई हैं, उन गंगाको मैं । प्रणाम करता हूँ ॥ २१ ॥
२१ जो साठ लाख योजन चौड़ाई तथा उससे भी चार गुनी लम्बाईसे वैकुण्ठलोकमें फैली हुई हैं, उन । गंगाको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ २२ ॥
२२ जो ब्रह्मलोकमें तीन लाख योजन चौड़ाई तथा । उससे भी पाँच गुनी लम्बाईमें फैली हुई हैं, उन गंगाको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ २३ ॥
॥ २३ जो तीन लाख योजन चौड़ी और उससे भी चार । गुनी लम्बी होकर शिवलोकमें विद्यमान हैं, उन ॥ २४ गंगाको मैं प्रणाम करता हूँ ॥२४ ॥
जो ध्रुवलोकमें एक लाख योजन चौड़ाई तथा उससे भी सात गुनी लम्बाईसे विराजमान हैं, उन २५ । गंगाको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ २५ ॥
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अ ० १२ ]
लक्षयोजनविस्तीर्णा दैर्घ्य पञ्चगुणा ततः ।
आवृता चन्द्रलोके या तां गङ्गां प्रणमाम्यहम् ॥
षष्टिसहस्त्रयोजना या दैर्घ्यं दशगुणा ततः ।
आवृता सूर्यलोके या तां गङ्गां प्रणमाम्यहम् ॥
लक्षयोजनविस्तीर्णा दैर्घ्यं पञ्चगुणा ततः ।
आवृता या तपोलोके तां गङ्गां प्रणमाम्यहम् ॥
सहस्त्रयोजनायामा दैर्घ्यं दशगुणा ततः ।
आवृता जनलोके या तां गङ्गां प्रणमाम्यहम् ॥
दशलक्षयोजना या दैर्घ्यं पञ्चगुणा ततः ।
आवृता या महर्लोके तां गङ्गां प्रणमाम्यहम् ॥
सहस्त्रयोजनायामा दैर्घ्यं शतगुणा ततः ।
आवृता या च कैलासे तां गङ्गां प्रणमाम्यहम् ॥
शतयोजनविस्तीर्णा दैर्घ्यं दशगुणा ततः ।
मन्दाकिनी येन्द्रलोके तां गङ्गां प्रणमाम्यहम् ॥
पाताले भोगवती च विस्तीर्णा दशयोजना ।
ततो दशगुणा दैर्घ्यं तां गङ्गां प्रणमाम्यहम् ॥
क्रोशैकमात्रविस्तीर्णा ततः क्षीणा च कुत्रचित् ।
क्षितौ चालकनन्दा या तां गङ्गां प्रणमाम्यहम् ॥
सत्ये या क्षीरवर्णा च त्रेतायामिन्दुसन्निभा ।
द्वापरे चन्दनाभा या तां गङ्गां प्रणमाम्यहम् ॥
जलप्रभा कलौ या च नान्यत्र पृथिवीतले ।
स्वर्गे च नित्यं क्षीराभा तां गङ्गां प्रणमाम्यहम् ॥
यत्तोयकणिकास्पर्शे पापिनां ज्ञानसम्भवः ।
ब्रह्महत्यादिकं पापं कोटिजन्मार्जितं दहेत् ॥
नवम स्कन्ध ३६३ जो एक लाख योजन चौड़ी तथा उससे भी २६ पाँच गुनी लम्बी होकर चन्द्रलोकमें फैली हुई हैं, उन गंगाको मैं प्रणाम करता हूँ ॥२६ ॥
जो सूर्यलोकमें साठ हजार योजन चौड़े तथा २७ | उससे भी दस गुने लम्बे प्रस्तारमें फैली हुई हैं, उन गंगाको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ २७ ॥
जो तपोलोकमें एक लाख योजन चौड़ी तथा उससे भी पाँच गुनी लम्बी होकर प्रतिष्ठित हैं, उन २८ गंगाको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ २८ ॥
जो जनलोकमें एक हजार योजन चौड़ाई तथा | उससे भी दस गुनी लम्बाई में फैली हुई हैं, उन गंगाको २ ९ मैं प्रणाम करता हूँ ॥ २ ९ ॥ जो दस लाख योजन चौड़ी तथा उससे भी पाँच गुनी लम्बी होकर महर्लोकमें फैली हुई हैं, उन ३० गंगाको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ३० ॥
जो चौड़ाईमें एक हजार योजन और लम्बाई में उससे भी सौ गुनी होकर कैलासपर फैली हुई हैं, उन ३१ गंगाको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ३१ ॥
जो एक सौ योजन चौड़ी तथा उससे भी दस गुनी लम्बी होकर ' मन्दाकिनी ' नामसे इन्द्रलोकमें ३२ प्रतिष्ठित हैं, उन गंगाको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ३२ ॥
जो दस योजन चौड़ी तथा लम्बाईमें उससे भी दस गुनी होकर पाताललोकमें ' भोगवती ' नामसे ३३ विद्यमान हैं, उन गंगाको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ३३ ॥
जो एक कोसभर चौड़ी तथा कहीं - कहीं इससे भी कम चौड़ी होकर ‘ अलकनन्दा ' नामसे पृथ्वीलोकमें प्रतिष्ठित हैं, उन गंगाको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ३४ ॥
३४ जो सत्ययुगमें दुग्धवर्ण, त्रेतायुगमें चन्द्रमाकी प्रभा और द्वापरमें चन्दनकी आभावाली रहती हैं; उन गंगाको मैं प्रणाम करता हूँ । जो कलियुगमें केवल ३५ पृथ्वीतलपर जलकी प्रभावाली तथा स्वर्गलोकमें सर्वदा दुग्धके समान आभावाली रहती हैं, उन गंगाको मैं प्रणाम करता हूँ । जिनके जलकणोंका स्पर्श होते ही ३६ पापियोंके हृदयमें उत्पन्न हुआ ज्ञान उनके करोड़ों जन्मोंके संचित ब्रह्महत्या आदि पापोंको भस्म कर देता है, [ उन भगवती गंगाको मैं प्रणाम करता ३७ | हूँ ] ॥ ३५–३७ ॥
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३६४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १२
इत्येवं कथिता ब्रह्मन् गङ्गापद्यैकविंशतिः ।
स्तोत्ररूपं च परमं पापघ्नं पुण्यजीवनम् ॥
नित्यं यो हि पठेद्भक्त्या सम्पूज्य च सुरेश्वरीम् ।
सोऽश्वमेधफलं नित्यं लभते नात्र संशयः ॥
अपुत्रो लभते पुत्रं भार्याहीनो लभेत्स्त्रियम् ।
रोगात्प्रमुच्यते रोगी बन्धान्मुक्तो भवेद् ध्रुवम् ॥
अस्पष्टकीर्तिः सुयशा मूर्खो भवति पण्डितः ।
यः पठेत्प्रातरुत्थाय गङ्गास्तोत्रमिदं शुभम् ॥
शुभं भवेच्च दुःस्वप्ने गङ्गास्नानफलं लभेत् । श्रीनारायण उवाच स्तोत्रेणानेन गङ्गां च स्तुत्वा चैव भगीरथः ॥ जगाम तां गृहीत्वा च यत्र नष्टाश्च सागराः । वैकुण्ठं ते ययुस्तूर्णं गङ्गायाः स्पर्शवायुना
भगीरथेन सा नीता तेन भागीरथी स्मृता ।
इत्येवं कथितं सर्वं गङ्गोपाख्यानमुत्तमम् ॥
पुण्यदं मोक्षदं सारं किं भूयः श्रोतुमिच्छसि । नारद उवाच कथं गङ्गा त्रिपथगा जाता भुवनपावनी
कुत्र वा केन विधिना तत्सर्वं वद मे प्रभो ।
तत्रस्थाश्च जना ये ये ते च किं चक्रुरुत्तमम् ॥
एतत्सर्वं तु विस्तीर्णं कृत्वा वक्तुमिहार्हसि । हे ब्रह्मन्! इस प्रकार इक्कीस श्लोकोंमें गंगाकी ३८ यह स्तुति कही गयी है । यह श्रेष्ठ स्तोत्र पापोंका नाश तथा पुण्योंकी उत्पत्ति करनेवाला है ॥ ३८ ॥
जो मनुष्य सुरेश्वरी गंगाकी भक्तिपूर्वक पूजा करके प्रतिदिन इस स्तोत्रका पाठ करता है, वह नित्य ३ ९ ही अश्वमेध यज्ञका फल प्राप्त करता है; इसमें कोई संशय नहीं है ॥ ३ ९ ॥ इस स्तोत्रके प्रभावसे पुत्रहीन मनुष्य पुत्र प्राप्त कर लेता है, स्त्रीहीन मनुष्यको स्त्रीकी ४० प्राप्ति हो जाती है, रोगी मनुष्य रोगरहित हो जाता है, बन्धनमें पड़ा हुआ प्राणी बन्धनमुक्त हो जाता है, कीर्तिरहित मनुष्य सुन्दर यशसे सम्पन्न हो ४१ जाता है और मूर्ख व्यक्ति विद्वान् हो जाता है; यह सर्वथा सत्य है । जो प्रातःकाल उठकर इस पवित्र गंगास्तोत्रका पाठ करता है, दुःस्वप्नमें भी उसका मंगल ही होता है और वह गंगा स्नानका फल प्राप्त
कर लेता है । ४०-४११३ ॥
श्रीनारायण बोले- हे नारद! इस स्तोत्रके ४२ द्वारा गंगाकी स्तुति करके और फिर उन्हें अपने साथ लेकर वे भगीरथ उस स्थानपर पहुँचे, जहाँ राजा सगरके पुत्र जलकर भस्म हो गये थे । गंगाका स्पर्श ॥ ४३ करके बहनेवाली वायुके सम्पर्कमें आते ही वे सगरपुत्र तत्काल वैकुण्ठ चले गये । वे गंगा भगीरथके द्वारा लायी गयीं, इसलिये ' भागीरथी ' नामसे विख्यात हुईं ॥ ४२-४३३ ॥ ४४ [ हे नारद! ] इस प्रकार मैंने सारभूत और पुण्य तथा मोक्ष प्रदान करनेवाले उत्तम गंगोपाख्यानका सम्पूर्ण वर्णन कर दिया! अब आप आगे और क्या सुनना चाहते हैं ॥ ४४ ॥
नारदजी बोले - हे प्रभो! तीन मार्गों से ॥ ४५ संचरण करनेवाली तथा समस्त लोकोंको पवित्र करनेवाली गंगा किसलिये, कहाँ और किस प्रकारसे आविर्भूत हुईं? यह सब मुझे बतलाइये । वहाँपर जो-जो लोग स्थित थे, उन्होंने क्या श्रेष्ठ कार्य किया? ४६ आप इन सभी बातोंको विस्तारपूर्वक बतानेकी कृपा कीजिये ॥ ४५-४६३ ॥
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अ ० १२ ] नवम श्रीनारायण उवाच कार्तिक्यां पूर्णिमायां तु राधायाः सुमहोत्सवः ॥ ४७
कृष्णः सम्पूज्य तां राधामुवास रासमण्डले ।
कृष्णेन पूजितां तां तु सम्पूज्य हृष्टमानसाः ॥ ४८
ऊषुर्ब्रह्मादयः सर्वे ऋषयः शौनकादयः ।
एतस्मिन्नन्तरे कृष्णसङ्गीता च सरस्वती ॥ ४ ९
जगौ सुन्दरतालेन वीणया च मनोहरम् ।
तुष्टो ब्रह्मा ददौ तस्यै रत्नेन्द्रसारहारकम् ॥५०
शिवो मणीन्द्रसारं तु सर्वब्रह्माण्डदुर्लभम् ।
कृष्णः कौस्तुभरत्नं च सर्वरत्नात्परं वरम् ॥ ५१
अमूल्यरत्ननिर्माणं हारसारं च राधिका ।
नारायणश्च भगवान् ददौ मालां मनोहराम् ॥ ५२
अमूल्यरत्ननिर्माणं लक्ष्मीः कनककुण्डलम् ।
विष्णुमाया भगवती मूलप्रकृतिरीश्वरी ॥ ५३
दुर्गा नारायणीशाना ब्रह्मभक्तिं सुदुर्लभाम् ।
धर्मबुद्धिं च धर्मश्च यशश्च विपुलं भवे ॥ ५४
वह्निशुद्धांशुकं वह्निर्वायुश्च मणिनूपुरान् ।
एतस्मिन्नन्तरे शम्भुर्ब्रह्मणा प्रेरितो मुहुः ॥ ५५
जौ श्रीकृष्णसङ्गीतं रासोल्लाससमन्वितम् ।
मूर्च्छा प्रापुः सुराः सर्वे चित्रपुत्तलिका यथा ॥ ५६
कष्टेन चेतनां प्राप्य ददृशू रासमण्डले ।
स्थलं सर्वं जलाकीर्णं राधाकृष्णविहीनकम् ॥ ५७
अत्युच्चै रुरुदुः सर्वे गोपा गोप्यः सुरा द्विजाः ।
ध्यानेन ब्रह्मा बुबुधे सर्वं तीर्थमभीप्सितम् ॥ ५८
गतश्च राधया सार्धं श्रीकृष्णो द्रवतामिति ।
ततो ब्रह्मादयः सर्वे तुष्टुवुः परमेश्वरम् ॥ ५ ९
स्वमूर्ति दर्शय विभो वाञ्छितं वरमेव नः । स्कन्ध ३६५ श्रीनारायण बोले - – एक समयकी बात है-कार्तिक पूर्णिमाके अवसरपर राधा - महोत्सव मनाया जा रहा था । भगवान् श्रीकृष्ण राधाकी विधिवत् पूजा करके रासमण्डलमें विराजमान थे । तत्पश्चात् ब्रह्मा आदि देवता तथा शौनक आदि ऋषिगण श्रीकृष्णके द्वारा पूजित उन राधाकी प्रसन्नचित्त होकर विधिवत् पूजा करके वहीं पर स्थित हो गये ॥ ४७-४८३ ॥ इतनेमें भगवान् श्रीकृष्णको संगीत सुनानेवाली देवी सरस्वती वीणा लेकर सुन्दर ताल - स्वरके साथ मनोहर गीत गाने लगीं ॥ ४ ९ ३ ॥ तब ब्रह्माजीने प्रसन्न होकर उन सरस्वतीको सर्वोत्तम रत्नोंसे निर्मित एक हार समर्पित किया । इसी प्रकार शिवजीने उन्हें अखिल ब्रह्माण्डके लिये दुर्लभ एक उत्तम मणि; भगवान् श्रीकृष्णने सभी रत्नोंसे श्रेष्ठतम कौस्तुभमणि, राधाने अमूल्य रत्नोंसे निर्मित एक श्रेष्ठ हार, भगवान् नारायणने एक मनोहर माला, लक्ष्मीजीने बहुमूल्य रत्नोंसे जटित स्वर्ण- -कुण्डल; विष्णुमाया, ईश्वरी, दुर्गा, नारायणी और ईशाना नामसे विख्यात भगवती मूलप्रकृतिने अत्यन्त दुर्लभ ब्रह्मभक्ति; धर्मने धार्मिक बुद्धि तथा लोकमें महान् यशका वरदान; अग्निदेवताने अग्निके समान पवित्र वस्त्र तथा पवनदेवने मणिनिर्मित नूपुर भगवती सरस्वतीको प्रदान किये ॥ ५०–५४३ ॥ इतनेमें ब्रह्माजीसे रासके उल्लासको श्रीकृष्णसम्बन्धी मधुर सभी देवता सम्मोहित पुतलेकी भाँति प्रतीत किसी प्रकार चेतना प्रेरित होकर भगवान् शंकर बढ़ानेकी शक्तिसे सम्पन्न गीत गाने लगे । उसे सुनकर हो गये और चित्र - विचित्र होने लगे । बड़ी कठिनाईसे लौटनेपर उन्होंने देखा कि रासमण्डलमें सम्पूर्ण स्थल जलमय हो गया है और वह राधा तथा श्रीकृष्णसे रहित है ॥ ५५ - ५७ ॥ तब सभी गोप, गोपियाँ, देवता और द्विज उच्च स्वरसे विलाप करने लगे । वहाँ उपस्थित ब्रह्माजीने ध्यानके द्वारा श्रीकृष्णका सारा पवित्र विचार जान लिया कि वे श्रीकृष्ण ही राधाके साथ मिलकर द्रवमय हो गये हैं । तदनन्तर ब्रह्मा आदि सभी देवता परमेश्वर श्रीकृष्णकी स्तुति करने लगे । पुनः उन्होंने कहा — हे विभो! हमलोगों का यही अभिलषित वर है कि आप हमें अपने श्रीविग्रहका दर्शन करा दें । ५८-५९ ३ ॥
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३६६ एतस्मिन्नन्तरे तत्र वाग्बभूवाशरीरिणी तामेव शुश्रुवुः सर्वे सुव्यक्तां मधुरान्विताम् सर्वात्माहमियं शक्तिर्भक्तानुग्रहविग्रहा ममाप्यस्याश्च देहेन कर्तव्यं च किमावयोः । मनवो मानवाः सर्वे मुनयश्चैव वैष्णवाः मन्मन्त्रपूता मां द्रष्टुमागमिष्यन्ति मत्पदम् मूर्तिं द्रष्टुं च सुव्यक्तां यदीच्छथ सुरेश्वराः करोतु शम्भुस्तत्रैवं मदीयं वाक्यपालनम् स्वयं विधातस्त्वं ब्रह्मन्नाज्ञां कुरु जगद्गुरुम् कर्तुं शास्त्रविशेषं च वेदाङ्गं सुमनोहरम् अपूर्वमन्त्रनिकरैः सर्वाभीष्टफलप्रदैः स्तोत्रैश्च निकरैर्ध्यानैर्युतं पूजाविधिक्रमैः मन्मन्त्रकवचस्तोत्रं कृत्वा यत्नेन गोपनम् भवन्ति विमुखा येन जना मां तत्करिष्यति सहस्त्रेषु शतेष्वेको मन्मन्त्रोपासको भवेत् जना मन्मन्त्रपूताश्च गमिष्यन्ति च मत्पदम् अन्यथा न भविष्यन्ति सर्वे गोलोकवासिनः निष्फलं भविता सर्वं ब्रह्माण्डं चैव ब्रह्मणः जनाः पञ्चप्रकाराश्च युक्ताः स्रष्टुं भवे भवे पृथिवीवासिनः केचित्केचित्स्वर्गनिवासिनः इदं कर्तुं महादेवः करोति देवसंसदि प्रतिज्ञां सुदृढां सद्यस्ततो मूर्ति च द्रक्ष्यति श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १२ ॥ ६० इसी बीच आकाशवाणी हुई । पूर्णरूपसे स्पष्ट तथा मधुरतायुक्त उस वाणीको सभी लोगोंने सुना कि । ' मैं सर्वात्मा श्रीकृष्ण हूँ तथा मेरी शक्तिस्वरूपा यह राधा भक्तोंपर अनुग्रह करनेवाली हैं । [ हम दोनोंने ही ॥ ६१ यह जलमय विग्रह धारण किया है । ] मेरे तथा इन राधाके देहसे आप सबको क्या करना है? हे सुरेश्वरो! मनु, मानव, मुनि तथा वैष्णव- ये सभी ॥ ६२ लोग मेरे मन्त्रोंसे पवित्र होकर मेरा दर्शन करनेके लिये मेरे धाममें आयेंगे । इसी प्रकार यदि आपलोग भी मेरे । वास्तविक श्रीविग्रहका प्रत्यक्ष दर्शन करना चाहते हैं, तो आपलोग ऐसा प्रयत्न कीजिये जिससे शिवजी ॥ ६३ वहींपर रहकर मेरी आज्ञाका पालन करें । हे विधातः! हे ब्रह्मन्! आप स्वयं जगद्गुरु शिवको आदेश । कीजिये कि वे सम्पूर्ण अभीष्ट फल प्रदान करनेवाले ॥ ६४ बहुत - से अपूर्व मन्त्रों, स्तोत्रों, ध्यानों तथा पूजनकी विधियोंसे युक्त वेदांगस्वरूप अत्यन्त मनोहर तथा विशिष्ट शास्त्रकी रचना करें । मेरे मन्त्र, कवच और । स्तोत्रसे सम्पन्न वह शिवरचित शास्त्र यत्नपूर्वक गुप्त ॥ ६५ । रखा जाना चाहिये । मेरे जिन मन्त्रोंके गुप्त रखनेसे पापीलोग मुझसे विमुख रहें, वैसा ही कीजिये । किंतु । हजारों सैकड़ोंमें यदि कोई मेरे मन्त्रका उपासक ॥ ६६ पुण्यात्मा मिल जाय, तो उसके समक्ष मेरे मन्त्रका प्रकाशन कर देना चाहिये; क्योंकि सर्वथा गोपनीय रखनेसे शास्त्र - रचना ही व्यर्थ हो जायगी । इस प्रकार । मेरे मन्त्रसे पवित्र होकर वे लोग मेरे धामको प्राप्त ॥ ६७ होंगे, नहीं तो शास्त्रके अभावमें कोई भी मेरे लोकमें नहीं जा पायेगा । साथ ही पुण्यात्माओंके लिये प्रकाशित । किये गये पूर्वोक्त मन्त्रोपदेशके कारण यदि परम्परानुसार सभी लोग उस मन्त्रके प्रभावसे गोलोकवासी हो ॥ ६८ जायँगे, तब तो सम्पूर्ण ब्रह्माण्डके अन्तर्गत प्राणियोंके अभावके कारण ब्रह्माजीका यह ब्रह्माण्ड ही निष्फल । हो जायगा । अतः हे ब्रह्मन्! आप सात्त्विक आदि भेदसे ॥ ६ ९ पाँच प्रकारके लोगोंकी रचना प्रत्येक सृष्टिके अन्तर्गत कीजिये, यही सर्वथा समीचीन है । ऐसा होनेपर कुछ । लोग पृथ्वीपर रहेंगे और कुछ लोग स्वर्गमें रहेंगे । हे ब्रह्मन्! यदि शिवजी तन्त्रशास्त्रकी रचनाहेतु देव-॥ ७० सभामें दृढ़ प्रतिज्ञा करेंगे, तो वे शीघ्र ही मेरे विग्रहका । साक्षात् दर्शन भी प्राप्त कर लेंगे ' ॥ ६० - ७० ॥
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अ ० १३ ] नवम स्कन्ध ३६७ इत्येवमुक्त्वा गगने विरराम सनातनः ॥ ७१
तच्छ्रुत्वा जगतां धाता तमुवाच शिवं मुदा ।
ब्रह्मणो वचनं श्रुत्वा ज्ञानेशो ज्ञानिनां वरः ॥ ७२
गङ्गातोयं करे कृत्वा स्वीकारं च चकार सः ।
संयुक्तं विष्णुमायाया मन्त्रौघैः शास्त्रमुत्तमम् ॥ ७३
वेदसारं करिष्यामि प्रतिज्ञापालनाय च ।
गङ्गातोयमुपस्पृश्य मिथ्या यदि वदेज्जनः ॥ ७४
स याति कालसूत्रं च यावद्वै ब्रह्मणो वयः ।
इत्युक्ते शङ्करे ब्रह्मन् गोलोके सुरसंसदि ॥ ७५
आविर्बभूव श्रीकृष्णो राधया सहितस्ततः ।
सुदृष्ट्वा च संहृष्टास्तुष्टुवुः पुरुषोत्तमम् ॥ ७६
परमानन्दपूर्णाश्च चक्रुश्च पुनरुत्सवम् ।
कालेन शम्भुर्भगवान् मुक्तिदीपं चकार सः ॥ ७७
इत्येवं कथितं सर्वं सुगोप्यं च सुदुर्लभम् ।
स एव द्रवरूपा सा गङ्गा गोलोकसम्भवा ॥ ७८
राधाकृष्णाङ्गसम्भूता भुक्तिमुक्तिफलप्रदा ।
स्थाने स्थाने स्थापिता सा कृष्णेन च परात्मना ।
कृष्णस्वरूपा परमा सर्वब्रह्माण्डपूजिता ॥ ७ ९
आकाशवाणीके रूपमें इस प्रकार कहकर सनातन श्रीकृष्ण चुप हो गये । उनकी वाणी सुनकर जगत्की व्यवस्था करनेवाले ब्रह्माजीने उन भगवान् शिवसे प्रसन्नतापूर्वक वह बात कही ॥ ७१३ ॥
ब्रह्माजीकी बात सुनकर ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ ज्ञानेश्वर उन भगवान् शिवने हाथमें गंगाजल लेकर आज्ञाका पालन करना स्वीकार कर लिया ॥ ७२३ ॥
उन्होंने कहा कि मैं प्रतिज्ञापालनके लिये विष्णुमायाके मन्त्र - समूहोंसे सम्पन्न तथा वेदोंके सारभूत उत्तम तन्त्रशास्त्रकी रचना करूँगा । यदि कोई मनुष्य हाथमें गंगाजल लेकर झूठी प्रतिज्ञा करता है तो वह ' कालसूत्र ' नरकमें जाता है और ब्रह्माकी आयुपर्यन्त
वहाँपर उसे रहना पड़ता है । ७३-७४३ ॥
हे ब्रह्मन्! गोलोकमें देवसभामें शंकरजीके ऐसा कहते ही भगवान् श्रीकृष्ण भगवती राधाके साथ वहाँ प्रकट हो गये । तब उन पुरुषोत्तम श्रीकृष्णको प्रत्यक्ष देखकर सभी देवता परम प्रसन्न होकर उनकी स्तुति करने लगे और परम आनन्दसे परिपूर्ण होकर फिरसे उत्सव मनाने लगे ॥ ७५-७६३ ॥ [ हे नारद! ] समयानुसार उन भगवान् शिवने मुक्तिदीपस्वरूप तन्त्रशास्त्रका निर्माण किया । इस प्रकार मैंने आपसे अत्यन्त गोपनीय तथा दुर्लभ प्रसंगका वर्णन कर दिया । गोलोकसे आविर्भूत तथा राधा और श्रीकृष्णके विग्रहसे उत्पन्न वे द्रवरूपिणी गंगा भोग तथा मोक्ष प्रदान करनेवाली हैं । परमेश्वर भगवान् श्रीकृष्णने स्थान - स्थानपर उन गंगाकी स्थापना की है । श्रीकृष्णस्वरूपा ये अतिश्रेष्ठ गंगा समस्त ब्रह्माण्डोंमें पूजी जाती हैं॥७७–७९ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां नवमस्कन्धे गङ्गोपाख्यानवर्णनं नाम द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥
O अथ त्रयोदशोऽध्यायः श्रीराधाजीके रोषसे भयभीत गंगाका श्रीकृष्णके चरणकमलोंकी शरण लेना, श्रीकृष्णके प्रति राधाका उपालम्भ, ब्रह्माजीकी स्तुतिसे राधाका प्रसन्न होना तथा गंगाका प्रकट होना नारद उवाच नारदजी बोले - हे सुरेश्वर! कलिके पाँच हजार कलेः पञ्चसहस्त्राब्दे समतीते सुरेश्वर । वर्ष व्यतीत हो जानेपर वे गंगा कहाँ चली गयीं? हे क्व गता सा महाभाग तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥ १ | महाभाग! मुझे वह प्रसंग बतानेकी कृपा कीजिये ॥ १ ॥
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३६८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १३ श्रीनारायण उवाच
भारतं भारतीशापात्समागत्येश्वरेच्छया ।
जगाम तत्र वैकुण्ठे शापान्ते पुनरेव सा ॥
भारती भारतं त्यक्त्वा तज्जगाम हरेः पदम् ।
पद्मावती च शापान्ते गङ्गा सा चैव नारद ॥
गङ्गा सरस्वती लक्ष्मीश्चैतास्तिस्त्रः प्रिया हरेः ।
तुलसीसहिता ब्रह्मंश्चतस्त्रः कीर्तिताः श्रुतौ ॥
नारद उवाच
केनोपायेन सा देवी विष्णुपादाब्जसम्भवा ।
ब्रह्मकमण्डलुस्था च श्रुता शिवप्रिया च सा ॥
बभूव सा मुनिश्रेष्ठ गङ्गा नारायणप्रिया ।
अहो केन प्रकारेण तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥
श्रीनारायण उवाच
पुरा बभूव गोलोके सा गङ्गा द्रवरूपिणी ।
राधाकृष्णाङ्गसम्भूता तदंशा तत्स्वरूपिणी ॥
द्रवाधिष्ठातृदेवी या रूपेणाप्रतिमा भुवि ।
नवयौवनसम्पन्ना सर्वाभरणभूषिता ॥
शरन्मध्याह्नपद्मास्या सस्मिता सुमनोहरा ।
तप्तकाञ्चनवर्णाभा शरच्चन्द्रसमप्रभा ॥
स्निग्धप्रभातिसुस्निग्धा शुद्धसत्त्वस्वरूपिणी ।
सुपीनकठिनश्रोणिः सुनितम्बयुगंधरा ॥
पीनोन्नतं सुकठिनं स्तनयुग्मं सुवर्तुलम् ।
सुचारुनेत्रयुगलं सुकटाक्षं सुवंक्रिमम् ॥
वंक्रिमं कबरीभारं मालतीमाल्यसंयुतम् ।
सिन्दूरबिन्दुललितं सार्धं चन्दनबिन्दुभिः ॥
श्रीनारायण बोले- हे नारद! सरस्वतीके शापके प्रभावसे वे गंगा भारतवर्षमें आयीं और पुनः शापकी २ अवधि बीत जानेपर श्रीहरिकी इच्छासे वैकुण्ठ चली गयीं । इसी प्रकार सरस्वती और पद्मावतीनदी -स्वरूपिणी वे लक्ष्मी भी शापके अन्तमें भारत छोड़कर उन विष्णु लोकमें चली गयीं ॥ २-३ ॥ ३ हे ब्रह्मन्! गंगा, सरस्वती और लक्ष्मी- ये तीनों ही भगवान् श्रीहरिकी भार्याएँ हैं । साथ ही तुलसीसहित भगवान् श्रीहरिकी चार स्त्रियाँ वेदोंमें ४ कही गयी हैं ॥ ४ ॥
नारदजी बोले - हे भगवन्! विष्णुके चरण-कमलोंसे प्रकट होकर वे गंगाजी किस प्रकार ब्रह्माके कमण्डलुमें स्थित हुईं और शिवकी प्रियाके रूपमें ५ कैसे विख्यात हुईं? हे मुनिश्रेष्ठ! वे गंगा भगवान् नारायणकी भी प्रेयसी किस प्रकार हुईं, वह सब मुझे बतानेकी कृपा कीजिये ॥ ५-६ ॥ ६ श्रीनारायण बोले- [ हे नारद! ] प्राचीन कालमें द्रवरूपिणी वे गंगा गोलोकमें विराजमान थीं । राधा और श्रीकृष्णके अंगसे आविर्भूत वे गंगा उन्हींके अंश तथा स्वरूपवाली हैं ॥ ७ ॥
७ जलमयी गंगाकी जो अधिष्ठात्री देवी हैं, वे अनुपम रूप धारणकर पृथ्वीलोकमें आयीं । उनका श्रीविग्रह नूतन यौवनसे सम्पन्न तथा सभी प्रकार ८ अलंकारोंसे विभूषित था ॥ ८ ॥
शरद् ऋतुके मध्याह्नकालमें खिले हु कमल समान प्रतीत होनेवाला उनका मुखमण्डल मुसकानसे युक्त तथा अत्यन्त मनोहर था । उनके शरीरका वर्ण ९ तप्त स्वर्णकी आभाके समान तथा कान्ति शरत्कालीन चन्द्रमाके समान थी॥९॥
वे स्निग्ध प्रभावाली देवी अत्यन्त दयालु मुद्रामें १० थीं । उनका स्वरूप शुद्ध तथा सात्त्विक था । उनके जघन स्थूल तथा कठोर थे । उनके नितम्बयुगल अत्यन्त सुन्दर थे ॥ १० ॥
११ उनका वक्षःस्थल उन्नत, स्थूल, कठोर तथा गोल था । कटाक्षयुक्त तथा वक्राकार उनकी दोनों आँखें बड़ी सुन्दर थीं । मालतीके पुष्प हारसे सुसज्जित १२ । उनके केशपाश घुँघराले थे । उनका ललाट चन्दनके
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अ ० १३ ]
कस्तूरीपत्रिकायुक्तं गण्डयुग्मं मनोरमम् ।
बन्धूककुसुमाकारमधरोष्ठं च सुन्दरम् ॥
पक्वदाडिमबीजाभदन्तपंक्तिसमुज्ज्वलम् ।
वाससी वह्निशुद्धे च नीवीयुक्ते च बिभ्रती ॥
सा सकामा कृष्णपार्श्वे समुवास सुलज्जिता ।
वाससा मुखमाच्छाद्य लोचनाभ्यां विभोर्मुखम् ॥
निमेषरहिताभ्यां च पिबन्ती सततं मुदा ।
प्रफुल्लवदना हर्षान्नवसङ्गमलालसा ॥
मूर्च्छिता प्रभुरूपेण पुलकाङ्कितविग्रहा ।
एतस्मिन्नन्तरे तत्र विद्यमाना च राधिका ॥
गोपीत्रिंशत्कोटियुक्ता चन्द्रकोटिसमप्रभा ।
कोपेनारक्तपद्मास्या रक्तपङ्कजलोचना ॥
पीतचम्पकवर्णाभा गजेन्द्रमन्दगामिनी ।
अमूल्यरत्ननिर्माणनानाभूषणभूषिता ॥
अमूल्यरत्नखचितममूल्यं वह्निशौचकम् ।
पीतवस्त्रस्य युगलं नीवीयुक्तं च बिभ्रती ॥
स्थलपद्मप्रभामुष्टं कोमलं च सुरञ्जितम् ।
कृष्णदत्तार्घ्यसंयुक्तं विन्यसन्ती पदाम्बुजम् ॥
रत्नेन्द्रसारनिर्माणविमानादवरुह्य सा ।
सेव्यमाना च ऋषिभिः श्वेतचामरवायुना ॥
कस्तूरीबिन्दुभिर्युक्तं चन्दनेन समन्वितम् ।
दीप्तदीपप्रभाकारं सिन्दूरं बिन्दुशोभितम् ॥
दधती भालमध्ये च सीमन्ताधः स्थलोज्ज्वले ।
पारिजातप्रसूनानां मालायुक्तं सुवंक्रिमम् ॥
नवम स्कन्ध ३६ ९ तिलकके साथ - साथ सिन्दूरकी बिन्दियोंसे सुशोभित १३ हो रहा था । उनके दोनों गण्डस्थलोंपर कस्तूरीसे मनोहर पत्र - रचनाएँ की हुई थीं । उनका अधरोष्ठ बन्धूकके पुष्पके समान अत्यन्त सुन्दर था । उनके दाँतोंकी अति उज्वल पंक्ति पके हुए अनारके दानोंकी १४ भाँति चमक रही थी । वे अग्निके समान पवित्र तथा नीवीयुक्त दो वस्त्र धारण किये हुए थीं । कामभाववाली वे गंगाजी वस्त्रसे मुँह ढँककर लज्जित १५ होती हुई श्रीकृष्णके पास विराजमान हो गयीं और प्रसन्न होकर अपलक नेत्रोंसे प्रभुके मुख- सौन्दर्यका निरन्तर पान करने लगीं । हर्षके कारण नवीन संगमकी १६ लालसासे युक्त उन गंगाका मुखमण्डल प्रसन्नतासे खिल उठा और उनके शरीरका रोम - रोम पुलकित हो गया । प्रभु श्रीकृष्णके रूपसे वे चेतनारहित - सी हो १७ गयी थीं ॥ ११ - – १६३ ॥ इसी बीच राधिका वहाँ आकर विराजमान हो गयीं । उनके साथ तीस करोड़ गोपियाँ भी थीं । उनके १८ शरीरकी कान्ति करोड़ों चन्द्रमाओंकी प्रभाके समान थी; कोपके कारण उनके मुख तथा नेत्र लाल कमलके समान प्रतीत हो रहे थे; उनके श्रीविग्रहका १ ९ वर्ण पीले चम्पक- पुष्पके समान आभावाला था; वे मत्त गजराजकी भाँति मन्द गतिवाली थीं; बहुमूल्य रत्नोंसे निर्मित अनेक प्रकारके आभूषणोंसे अलंकृत २० थीं; वे अपने शरीरपर अमूल्य रत्नोंसे जटित तथा अग्निके समान पवित्र दो नीवीयुक्त बहुमूल्य पीले वस्त्र धारण किये हुए थीं, वे स्थल - कमलकी कान्तिको तिरस्कृत करनेवाले, कोमल, सुरंजित तथा २१ भगवान् श्रीकृष्णके द्वारा प्रदत्त अर्घ्यसे सुशोभित चरण - कमलोंको धीरे - धीरे रख रही थीं; वे देवी सर्वोत्तम रत्नोंसे बने हुए विमानसे उतरकर वहाँ २२ उपस्थित हुई थीं; स्वच्छ चँवरकी वायुसे ऋषियोंके द्वारा उनकी सेवा की जा रही थी; कस्तूरीके बिन्दुओंसे युक्त, चन्दन - मिश्रित, प्रज्वलित दीपकके २३ समान आकारवाला तथा बिन्दुरूपमें शोभायमान सिन्दूर उनके ललाटके मध्य भागमें सुशोभित हो रहा था, उनके सीमन्त ( माँग ) - का निचला भाग परम स्वच्छ २४ | था, पारिजातके पुष्पोंकी मालासे सुशोभित अपनी
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३७० सुचारुकबरीभारं कम्पयन्ती सुकम्पिता सुचारुरागसंयुक्तमोष्ठं कम्पयती रुषा गत्वोवास कृष्णपार्श्वे रत्नसिंहासने शुभे सखीनां च समूहैश्च परिपूर्णा विभोः प्रिया तां दृष्ट्वा च समुत्तस्थौ कृष्णः सादरपूर्वकम् । सम्भाष्य मधुरालापैः सस्मितश्च ससंभ्रमः प्रणेमुरतिसन्त्रस्ता गोपा नम्रात्मकन्धराः । तुष्टुवुस्ते च भक्त्या च तुष्टाव परमेश्वरः
उत्थाय गङ्गा सहसा स्तुतिं बहु चकार सा ।
कुशलं परिपप्रच्छ भीतातिविनयेन च ॥
नम्रभागस्थिता त्रस्ता शुष्ककण्ठोष्ठतालुका ।
ध्यानेन शरणायत्ता श्रीकृष्णचरणाम्बुजे ॥
तां हृत्पद्मस्थितां कृष्णो भीतायै चाभयं ददौ ।
बभूव स्थिरचित्ता सा सर्वेश्वरवरेण च ॥
ऊर्ध्वसिंहासनस्थां च राधां गङ्गा ददर्श सा ।
सुस्निग्धां सुखदृश्यां च ज्वलन्तीं ब्रह्मतेजसा ॥
असंख्यब्रह्मणः कर्त्रीमादिसृष्टेः सनातनीम् ।
सदा द्वादशवर्षीयां कन्याभिनवयौवनाम् ॥
विश्ववृन्दे निरुपमां रूपेण च गुणेन च ।
शान्तां कान्तामनन्तां तामाद्यन्तरहितां सतीम् ॥
शुभां सुभद्रां सुभगां स्वामिसौभाग्यसंयुताम् ।
सौन्दर्यसुन्दरीं श्रेष्ठां सर्वासु सुन्दरीषु च ॥
श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १३ । घुँघराली तथा सुन्दर अलकावलीको कँपाती हुई वे ॥ २५ स्वयं भी कम्पित हो रही थीं, ऐसी वे राधा रोषके कारण अपने सुन्दर तथा रागयुक्त ओष्ठ कँपाती हुई । भगवान् श्रीकृष्णके पास जाकर रत्नमय सुन्दर सिंहासनपर विराजमान हो गयीं । प्रभु श्रीकृष्णकी प्रिया उन ॥ २६ राधाके साथ सखियोंका महान् समुदाय विद्यमान था ॥ १७–२६ ॥ उन्हें देखते ही भगवान् श्रीकृष्ण आदरपूर्वक ॥ २७ उठ खड़े हुए और आश्चर्यपूर्ण मुद्रामें मुसकराते हुए उनसे मधुर बातें करने लगे ॥ २७ ॥
उस समय अत्यन्त भयभीत गोपोंने सिर झुकाकर भगवती राधिकाको प्रणाम किया और फिर वे ॥ २८ भक्तिपूर्वक उनकी स्तुति करने लगे । साथ ही परमेश्वर श्रीकृष्णने भी राधिकाकी स्तुति की ॥ २८ ॥
तदनन्तर गंगाने भी तुरन्त उठकर राधिकाकी बहुत स्तुति की । भयभीत उन गंगाने अति विनम्रतापूर्वक २ ९ राधासे कुशल पूछा ॥ २ ९ ॥ वे डरके मारे झुककर खड़ी थीं । उनके कण्ठ, ओष्ठ और तालु सूख गये थे । उन्होंने ध्यानपूर्वक ३० भगवान् श्रीकृष्णके चरणकमलकी शरण ली ॥ ३० ॥
अपने हृदयकमलपर स्थित उन गंगाको देखकर भगवान् श्रीकृष्णने उन भयभीत देवीको अभय प्रदान किया । सर्वेश्वर श्रीकृष्णसे वर पाकर देवी गंगाका ३१ चित्त शान्त हो गया ॥ ३१ ॥
तदनन्तर गंगाने राधाको ऊँचे आसनपर विराजमान देखा । उनका रूप परम मनोहर था, उन्हें देखनेमें ३२ सुख प्राप्त हो रहा था और वे ब्रह्मतेजसे देदीप्यमान हो रही थीं ॥ ३२ ॥
वे सनातन देवी सृष्टिके आरम्भमें असंख्य ब्रह्माओंकी रचना करनेवाली हैं और नवीन यौवनसे ३३ युक्त कन्याके समान सदा बारह वर्षकी अवस्थामें रहती हैं ॥ ३३ ॥
सम्पूर्ण विश्वमें रूप तथा गुणमें उनके समान ३४ कोई नहीं है । वे परम शान्त, कमनीय, अनन्त, आदि-अन्तसे रहित, साध्वी, पवित्र, कल्याणमयी, सुन्दर भाग्यवाली तथा अपने स्वामीके सौभाग्यसे सम्पन्न रहती हैं । वे सम्पूर्ण सुन्दरियोंमें श्रेष्ठ तथा सौन्दर्यसे ३५ | सुशोभित हैं ॥ ३४-३५ ॥
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अ ० १३ ]
कृष्णार्धाङ्गां कृष्णसमां तेजसा वयसा त्विषा ।
पूजितां च महालक्ष्मीं लक्ष्म्या लक्ष्मीश्वरेण च ॥
प्रच्छाद्यमानां प्रभया सभामीशस्य सुप्रभाम् ।
सखीदत्तं च ताम्बूलं भुक्तवन्तीं च दुर्लभम् ॥
अजन्यां सर्वजननीं धन्यां मान्यां च मानिनीम् ।
कृष्णप्राणाधिदेवीं च प्राणप्रियतमां रमाम् ॥
दृष्ट्वा रासेश्वरीं तृप्तिं न जगाम सुरेश्वरी ।
निमेषरहिताभ्यां च लोचनाभ्यां पपौ च ताम् ॥
एतस्मिन्नन्तरे राधा जगदीशमुवाच सा ।
वाचा मधुरया शान्ता विनीता सस्मिता मुने ॥
राधोवाच
केयं प्राणेश कल्याणी सस्मिता त्वन्मुखाम्बुजम् ।
पश्यन्ती सस्मितं पार्श्वे सकामा वक्रलोचना ॥
मूर्च्छा प्राप्नोति रूपेण पुलकाङ्कितविग्रहा ।
वस्त्रेण मुखमाच्छाद्य निरीक्षन्ती पुनः पुनः ॥
त्वं चापि तां संनिरीक्ष्य सकामः सस्मितः सदा ।
मयि जीवति गोलोके भूता दुर्वृत्तिरीदृशी ॥
त्वमेव चैव दुर्वृत्तं वारं वारं करोषि च ।
क्षमां करोमि प्रेम्णा च स्त्रीजातिः स्निग्धमानसा ॥
संगृह्येमां प्रियामिष्टां गोलोकाद् गच्छ लम्पट ।
अन्यथा न हि ते भद्रं भविष्यति व्रजेश्वर ॥
दृष्टस्त्वं विरजायुक्तो मया चन्दनकानने ।
क्षमा कृता मया पूर्वं सखीनां वचनादहो ॥
नवम स्कन्ध ३७१ वे श्रीकृष्णकी अर्धांगिनी हैं । तेज, आयु और ३६ कान्तिमें वे श्रीकृष्णके ही सदृश हैं । लक्ष्मीपति श्रीविष्णुके द्वारा लक्ष्मीसहित वे महालक्ष्मीस्वरूपा राधिका पूजित हैं ॥ ३६ ॥
वे राधिका परमात्मा श्रीकृष्णकी प्रभामयी सभाको ३७ अपनी कान्तिसे सदा आच्छादित किये रहती हैं । वे सखियोंके द्वारा प्रदत्त दुर्लभ ताम्बूलका सदा सेवन करती रहती हैं ॥ ३७ ॥
३८ वे स्वयं अजन्मा होती हुई भी सम्पूर्ण जगत्की जननी हैं । वे भगवान् श्रीकृष्णको प्राणोंसे भी अधिक प्रिय, उनके प्राणोंकी अधिष्ठातृदेवी, धन्य, मान्य तथा ३ ९ मानिनी और मनोरम हैं ॥ ३८ ॥
[ हे नारद! ] उस समय उन रासेश्वरी राधिकाको देखकर सुरेश्वरी गंगा तृप्त नहीं हुईं और वे अपलक नेत्रोंसे राधाकी सौन्दर्य - सुधाका ४० पान करने लगीं ॥ ३ ९ ॥ मुने! इसी बीच शान्त तथा विनम्र स्वभाववाली राधा मुसकराकर मधुर वाणीमें जगदीश्वर श्रीकृष्णसे कहने लगीं ॥ ४० ॥
४१ राधा बोलीं- हे प्राणेश! पासमें बैठकर आपके मुसकानयुक्त मुखकमलको मुसकराकर तिरछी दृष्टिसे देखती हुई यह कामनायुक्त सुन्दरी कौन है? अपना मुख वस्त्रसे ढँककर आपके रूपको बार - बार देखती ४२ हुई पुलकित शरीरवाली यह सुन्दरी चेतनारहित हो जाया करती है ॥ ४१-४२ ॥ आप भी कामनायुक्त होकर उसकी ओर देखकर ४३ हँस रहे हैं । मेरे जीवित रहते गोलोकमें ऐसी दुर्वृत्तवाली स्त्री कैसे आयी? और आप भी बार - बार दुश्चेष्टा करते जा रहे हैं । कोमल स्वभाववाली स्त्री-४४ | जाति होनेके कारण प्रेमवश मैं आपको क्षमा कर दे रही हूँ ॥ ४३-४४ ॥ हे कामी व्रजेश्वर! अपनी इस अभीष्ट प्रेयसीको लेकर आप अभी गोलोकसे चले जाइये, अन्यथा ४५ आपका कल्याण नहीं है ॥ ४५ ॥
एक बार पूर्वमें मैंने आपको चन्दनवनमें विरजाके साथ देखा था । सखियोंका वचन मानकर मैंने उस ४६ । समय क्षमा कर दिया था ॥४६ ॥