देवी भागवत उत्तरार्द्ध — पृष्ठ 381–390
देवी भागवत उत्तरार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 381–390
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३७२ त्वया मच्छब्दमात्रेण तिरोधानं कृतं पुरा । देहं तत्याज विरजा नदीरूपा बभूव सा कोटियोजनविस्तीर्णा ततो दैर्घ्यं चतुर्गुणा । अद्यापि विद्यमाना सा तव सत्कीर्तिरूपिणी
गृहं मयि गतायां च पुनर्गत्वा तदन्तिके ।
उच्चै रुरोद विरजे विरजे चेति संस्मरन् ॥
तदा तोयात्समुत्थाय सा योगात्सिद्धयोगिनी ।
सालङ्कारा मूर्तिमती ददौ तुभ्यं च दर्शनम् ॥
ततस्तां च समाक्षिप्य वीर्याधानं कृतं त्वया ।
ततो बभूवुस्तस्यां च समुद्राः सप्त एव च ॥
दृष्टस्त्वं शोभया गोप्या युक्तश्चम्पककानने ।
सद्यो मच्छब्दमात्रेण तिरोधानं कृतं त्वया ॥
शोभा देहं परित्यज्य जगाम चन्द्रमण्डले ।
ततस्तस्याः शरीरं च स्निग्धं तेजो बभूव ह ॥
संविभज्य त्वया दत्तं हृदयेन विदूयता । श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १३ मेरी ध्वनि सुनते ही आप उस समय छिप गये ॥ ४७ थे । विरजाने वह शरीर त्याग दिया और उसने नदीका रूप धारण कर लिया था ॥ ४७ ॥
वे देवी आज भी एक करोड़ योजन चौड़ाई ॥ ४८ तथा उससे भी चार गुनी लम्बाईवाली आपकी सत्कीर्तिस्वरूपिणी नदीके रूपमें विद्यमान हैं ॥ ४८ ॥
मेरे घर चले जानेपर आप पुनः उसके पास ४ ९ जाकर विरजे! विरजे! ऐसा कहते हुए जोर - जोरसे रोने लगे थे ॥ ४ ९ ॥ ५० तब उस सिद्धयोगिनीने योगबलके प्रभावसे जलसे बाहर निकलकर अलंकारयुक्त मूर्तिमती सुन्दरीके रूपमें आपको दर्शन दिया था ॥ ५० ॥
५१ उस समय आपने उसमें अपने तेजका आधान किया था और समयानुसार उससे सात समुद्र उत्पन्न हुए ॥५१ ॥
५२ इसी प्रकार मैंने आपको शोभा नामक गोपीके साथ चम्पक वनमें देखा था । उस समय भी मेरी ५३ ध्वनि सुनते ही आप छिप गये थे और वह शोभा शरीर छोड़कर चन्द्रमण्डलमें चली गयी थी । तब उसका शरीर परम सुन्दर तथा तेजोमय हो गया रत्नाय किञ्चित्स्वर्णाय किञ्चिन्मणिवराय च ॥५४ था ॥ ५२-५३ ॥
किञ्चित्स्त्रीणां मुखाब्जेभ्यः चिञ्चिद्राज्ञे च किञ्चन ।
किञ्चित्किसलयेभ्यश्च पुष्पेभ्यश्चापि किञ्चन ॥
किञ्चित्फलेभ्यः पक्वेभ्यः सस्येभ्यश्चापि किञ्चन ।
नृपदेवगृहेभ्यश्च संस्कृतेभ्यश्च किञ्चन ॥
किञ्चिन्नूतनपत्रेभ्यो दुग्धेभ्यश्चापि किञ्चन ।
दृष्टस्त्वं प्रभया गोप्या युक्तो वृन्दावने वने ॥
सद्यो मच्छब्दमात्रेण तिरोधानं कृतं त्वया ।
प्रभा देहं परित्यज्य जगाम सूर्यमण्डले ॥
ततस्तस्याः शरीरं च तीव्रं तेजो बभूव ह ।
संविभज्य त्वया दत्तं प्रेम्णा प्ररुदता पुरा ॥
विसृष्टं चक्षुषोः कृष्ण लज्जया मद्भयेन च ।
हुताशनाय किञ्चिच्च यक्षेभ्यश्चापि किञ्चन ॥
तत्पश्चात् आपने दुःखित हृदयसे उस तेजको विभक्त करके कुछ तेज रत्नको, कुछ स्वर्णको, कुछ ५५ श्रेष्ठ मणियोंको, कुछ स्त्रियोंके मुखकमलको, कुछ राजाको, कुछ नव पल्लवोंको, कुछ पुष्पोंको, कुछ ५६ पके फलोंको, कुछ फसलोंको, कुछ राजाओंके सुसज्जित महलोंको, कुछ नये पत्तोंको और कुछ तेज दुग्धको प्रदान कर दिया ॥५४–५६३ ॥ ५७ इसी प्रकार मैंने वृन्दावनमें आपको प्रभा नामक गोपीके साथ देखा था । उस समय आप मेरा शब्द सुनते ही शीघ्रतापूर्वक छिप गये थे और प्रभा अपनी ५८ देह त्यागकर सूर्यमण्डलमें चली गयी थी॥५७-५८ ॥ उस समय उसका शरीर अत्यन्त तेजोमय हो ५ ९ गया था और आपने रोते - रोते उस तेजको प्रेमपूर्वक विभाजित करके जगह - जगह स्थान प्रदान कर दिया था । हे कृष्ण! लज्जा तथा मेरे भयके कारण आपकी ६० | आँखोंसे निकले हुए उस तेजको आपने कुछ अग्निको
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अ ० १३ ]
किञ्चित्पुरुषसिंहेभ्यो देवेभ्यश्चापि किञ्चन ।
किञ्चिद्विष्णुजनेभ्यश्च नागेभ्योऽपि च किञ्चन ॥
ब्राह्मणेभ्यो मुनिभ्यश्च तपस्विभ्यश्च किञ्चन ।
स्त्रीभ्यः सौभाग्ययुक्ताभ्यो यशस्विभ्यश्च किञ्चन ॥
तत्तु दत्त्वा च सर्वेभ्यः पूर्वं प्ररुदितं त्वया ।
शान्तिगोप्या युतस्त्वं च दृष्टोऽसि रासमण्डले ॥
वसन्ते पुष्पशय्यायां माल्यवांश्चन्दनोक्षितः ।
रत्नप्रदीपैर्युक्ते च रत्ननिर्माणमन्दिरे ॥
रत्नभूषणभूषाढ्यो रत्नभूषितया सह ।
तया दत्तं च ताम्बूलं भुक्तवांश्च पुरा विभो ॥
सद्यो मच्छब्दमात्रेण तिरोधानं कृतं त्वया ।
शान्तिर्देहं परित्यज्य भिया लीना त्वयि प्रभो ॥
ततस्तस्याः शरीरं च गुणश्रेष्ठं बभूव ह ।
संविभज्य त्वया दत्तं प्रेम्णा प्ररुदता पुरा ॥
विश्वे तु विपिने किञ्चिद्ब्रह्मणे च मयि प्रभो ।
शुद्धसत्त्वस्वरूपायै किञ्चिल्लक्ष्म्यै पुरा विभो ॥
त्वन्मन्त्रोपासकेभ्यश्च शाक्तेभ्यश्चापि किञ्चन ।
तपस्विभ्यश्च धर्माय धर्मिष्ठेभ्यश्च किञ्चन ॥
मया पूर्वं च त्वं दृष्टो गोप्या च क्षमया सह ।
सुवेषयुक्तो मालावान् गन्धचन्दनचर्चितः ॥
रत्नभूषितया गन्धचन्दनोक्षितया सह ।
सुखेन मूच्छितस्तल्पे पुष्पचन्दनचर्चिते ॥
श्लिष्टो निद्रितया सद्यः सुखेन नवसङ्गमात् । मया प्रबोधिता सा च भवांश्च स्मरणं कुरु नवम स्कन्ध ३७३ कुछ यक्षोंको, कुछ राजाओंको, कुछ देवताओंको, ६१ कुछ विष्णुभक्तोंको, कुछ नागोंको, कुछ ब्राह्मण - मुनि तथा तपस्वियोंको और कुछ तेज सौभाग्यवती स्त्रियों तथा यशस्वी पुरुषोंको प्रदान कर दिया । इस प्रकार इन सबको वह तेज प्रदान करके पूर्व कालमें आपने ६२ बहुत रुदन किया था ॥ ५ ९ –६२३ ॥ इसी तरह एक बार मैंने आपको शान्ति नामक गोपीके साथ रासमण्डलमें देखा था । वसन्त ६३ ऋतुमें रत्नमय दीपकोंसे युक्त रत्ननिर्मित महलमें आप माला धारण किये तथा शरीरमें चन्दन लगाकर और विभिन्न प्रकारके आभूषण पहनकर अनेकविध ६४ रत्नाभूषणोंसे अलंकृत उसके साथ पुष्पकी शय्या पर विराजमान थे । हे विभो! पूर्वकालमें उसने आपको ताम्बूल दिया और आपने उसे प्रेमपूर्वक ग्रहण कर ६५ लिया था ॥ ६३-६५ ॥ हे प्रभो! उस समय मेरा शब्द सुनकर आप तुरन्त छिप गये थे और वह शान्ति भयसे अपना देह त्यागकर आपमें समाविष्ट हो गयी थी ॥ ६६ ॥
६६ तब उसका शरीर उत्तम गुणोंके रूपमें परिणत हो गया । तदनन्तर रोते हुए आपने उसे विभाजित करके प्रेमपूर्वक विश्वमें बाँट दिया था । हे प्रभो! ६७ उसका कुछ अंश निकुंजमें, कुछ भाग ब्राह्मणोंमें और कुछ भाग मुझ राधामें समाहित हो गया । हे विभो! फिर आपने उसका कुछ भाग शुद्धस्वरूपा ६८ लक्ष्मीको, कुछ भाग अपने मन्त्रके उपासकोंको, कुछ भाग शक्तिकी आराधना करनेवालोंको, कुछ भाग तपस्वियोंको, कुछ भाग धर्मको और कुछ भाग ६ ९ । धर्मात्मा पुरुषोंको दे दिया॥६७–६९ ॥ इसी तरह पूर्वकालमें मैंने आपको क्षमा नामक गोपीके साथ देखा था । आप सुन्दर वेष धारण करके, माला पहनकर तथा शरीरमें गन्ध और चन्दनका लेप ७० करके रत्नोंके आभूषणोंसे अलंकृत और गन्ध– चन्दनचर्चित उस क्षमाके साथ पुष्प तथा चन्दनसे सुरभित शय्यापर सुखपूर्वक अचेतावस्थामें विराजमान ७१ थे । उस निद्राग्रस्त सुन्दरीके साथ आप सुखपूर्वक क्रीडामें संसक्त थे । उसी समय पहुँचकर मैंने उस क्षमाको तथा आपको जगाया था, इस बातको आप ॥ ७२ | स्मरण कीजिये ॥ ७०-७२ ॥
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गृहीतं पीतवस्त्रं च मुरली च मनोहरा ।
वनमालाकौस्तुभश्चाप्यमूल्यं रत्नकुण्डलम् ॥
पश्चात्प्रदत्तं प्रेम्णा च सखीनां वचनादहो । लज्जया कृष्णवर्णोऽभूद्भवान् पापेन यः प्रभो
क्षमा देहं परित्यज्य लज्जया पृथिवीं गता ।
ततस्तस्याः शरीरं च गुणश्रेष्ठं बभूव ह ॥
संविभज्य त्वया दत्तं प्रेम्णा प्ररुदता पुनः । किञ्चिद्दत्तं विष्णवे च वैष्णवेभ्यश्च किञ्चन धार्मिकेभ्यश्च धर्माय दुर्बलेभ्यश्च किञ्चन । तपस्विभ्योऽपि देवेभ्यः पण्डितेभ्यश्च किञ्चन
एतत्ते कथितं सर्वं किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ।
त्वद्गुणं चैव बहुशो न जानामि परं प्रभो ॥
इत्येवमुक्त्वा सा राधा रक्तपङ्कजलोचना ।
गङ्गां वक्तुं समारेभे नम्रास्यां लज्जितां सतीम् ॥
गङ्गा रहस्यं विज्ञाय योगेन सिद्धयोगिनी ।
तिरोभूय सभामध्ये स्वजलं प्रविवेश सा ॥
राधा योगेन विज्ञाय सर्वत्रावस्थितां च ताम् ।
पानं कर्तुं समारेभे गण्डूषात्सिद्धयोगिनी ॥
गङ्गा रहस्यं विज्ञाय योगेन सिद्धयोगिनी ।
श्रीकृष्णचरणाम्भोजे विवेश शरणं ययौ ॥
गोलोके सा च वैकुण्ठे ब्रह्मलोकादिके तथा ।
ददर्श राधा सर्वत्र नैव गङ्गां ददर्श सा ॥
सर्वत्र जलशून्यं च शुष्कपङ्कं च गोलकम् ।
जलजन्तुसमूहैश्च मृतदेहैः समन्वितम् ॥
श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १३ उस समय मैंने आपका पीताम्बर, मनोहर ७३ मुरली, वनमाला, कौस्तुभ और बहुमूल्य रत्नमय कुण्डल ले लिया था । किंतु बादमें सखियोंके प्रेमपूर्वक कहने पर उसे आपको लौटा दिया था । ॥ ७४ हे प्रभो! उस समय आप लज्जा तथा पापसे कृष्णवर्णके हो गये थे॥७३-७४ ॥ तत्पश्चात् लज्जाके कारण क्षमा अपना शरीर त्यागकर पृथ्वीमें समा गयी और उसका शरीर ७५ उत्तम गुणोंके रूपमें परिणत हो गया । तब रोते हुए आपने उस क्षमाका विभाजन करके उसे प्रेमपूर्वक अनेक लोगोंको दे दिया । उसका कुछ अंश विष्णुको, ॥ ७६ कुछ विष्णुभक्तोंको, कुछ धार्मिक पुरुषोंको, कुछ धर्मको, कुछ दुर्बलोंको, कुछ तपस्वियोंको, कुछ देवताओंको और कुछ भाग पण्डितोंको आपने दे ॥ ७७ दिया था ॥ ७५–७७ ॥ हे प्रभो! यह सब मैंने आपको बता दिया । अब आप और क्या सुनना चाहते हैं? आपके और भी बहुत-७८ से बड़े - बड़े गुण हैं, किंतु मैं सब नहीं जानती ॥ ७८ ॥
श्रीकृष्णसे ऐसा कहकर लालकमलके समान नेत्रोंवाली उन राधाने नीचेकी ओर मुख की हुई ७ ९ लज्जित साध्वी गंगासे कहना आरम्भ किया, तभी सिद्धयोगिनी वे गंगा योगके द्वारा सभी रहस्य समझकर सभाके मध्य में अन्तर्धान होकर अपने जलमें प्रविष्ट ८० हो गयीं ॥ ७ ९ -८० ॥ तब सिद्धयोगिनी राधा योगबलके प्रभावसे इस रहस्यको जानकर सर्वत्र विद्यमान उन जलस्वरूपिणी ८१ गंगाको अंजलिसे उठाकर मुँहसे पान करने लगीं ॥ ८१ ॥
तत्पश्चात् सिद्धयोगिनी गंगा योगबल से इस रहस्यको जान लेनेके उपरान्त भगवान् श्रीकृष्णके चरणकमलमें प्रवेश कर गयीं और उनके शरणागत ८२ हो गयीं ॥ ८२ ॥
तब राधाने गोलोक, वैकुण्ठ तथा ब्रह्मलोक आदि सभी स्थानोंमें गंगाको खोजा, किंतु उन्हें कहीं ८३ भी गंगा दिखायी नहीं दीं ॥८३ ॥
उस समय सर्वत्र जलका अभाव हो गया तथा सूखा कीचड़ और गोला दिखायी दे रहा था, जो ८४ । जलचर जन्तुओंके मृत शरीरोंसे युक्त था ॥८४ ॥
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अ ० १३ ] नवम स्कन्ध ३७५ ब्रह्मविष्णुशिवानन्तधर्मेन्द्रेन्दुदिवाकराः मनवो मुनयः सर्वे देवसिद्धतपस्विनः ॥
गोलोकं च समाजग्मुः शुष्ककण्ठोष्ठतालुकाः ।
सर्वे प्रणेमुर्गोविन्दं सर्वेशं प्रकृतेः परम् ॥
वरं वरेण्यं वरदं वरिष्ठं वरकारणम् ।
गोपिकागोपवृन्दानां सर्वेषां प्रवरं प्रभुम् ॥
निरीहं च निराकारं निर्लिप्तं च निराश्रयम् ।
निर्गुणं च निरुत्साहं निर्विकारं निरञ्जनम् ॥
स्वेच्छामयं च साकारं भक्तानुग्रहकारकम् ।
सत्त्वस्वरूपं सत्येशं साक्षिरूपं सनातनम् ॥
परं परेशं परमं परमात्मानमीश्वरम् ।
प्रणम्य तुष्टुवुः सर्वे भक्तिनम्रात्मकन्धराः ॥
सगद्गदाः साश्रुनेत्राः पुलकाङ्कितविग्रहाः ।
सर्वे संस्तूय सर्वेशं भगवन्तं परात्परम् ॥
ज्योतिर्मयं परं ब्रह्म सर्वकारणकारणम् ।
अमूल्यरत्ननिर्माणचित्रसिंहासनस्थितम् ॥
सेव्यमानं च गोपालैः श्वेतचामरवायुना ।
गोपालिकानृत्यगीतं पश्यन्तं सस्मितं मुदा ॥
प्राणाधिकप्रियतमं राधावक्षःस्थलस्थितम् ।
तया प्रदत्तं ताम्बूलं भुक्तवन्तं सुवासितम् ॥
परिपूर्णतमं रासे ददृशुश्च सुरेश्वरम् ।
मुनयो मनवः सिद्धास्तापसाश्च तपस्विनः ॥
प्रहृष्टमनसः सर्वे जग्मुः परमविस्मयम् ।
परस्परं समालोक्य प्रोचुस्ते च चतुर्मुखम् ॥
निवेदितं जगन्नाथं स्वाभिप्रायमभीप्सितम् ।
ब्रह्मा तद्वचनं श्रुत्वा विष्णुं कृत्वा स्वदक्षिणे ॥
वामतो वामदेवं च जगाम कृष्णसन्निधिम् ।
परमानन्दयुक्तं च परमानन्दरूपिणीम् ॥
ब्रह्मा, विष्णु, शिव, अनन्त, धर्म, इन्द्र, चन्द्रमा, ८५ सूर्य, मनुगण, मुनिवृन्द, देवता, सिद्ध और तपस्वी-ये सभी गोलोक चले गये । उस समय उनके कण्ठ, ओष्ठ और तालु सूख गये थे । वहाँ पहुँचकर ८६ उन सबने प्रकृतिसे भी परे, सर्वेश्वर, श्रेष्ठ, पूज्य, वरदायक, वरिष्ठ, वरके कारणस्वरूप, सभी गोपों ८७ तथा गोपिकाओंके समुदायमें सर्वश्रेष्ठ, कामनारहित, निराकार, आसक्तिहीन, निराश्रय, निर्गुण, निरुत्साह, निर्विकार, निर्दोष, अपनी इच्छासे साकार रूपमें प्रकट ८८ होनेवाले, भक्तोंपर कृपा करनेवाले, सत्त्वस्वरूप, सत्येश, सबके साक्षीस्वरूप तथा सनातन प्रभु श्रीकृष्णको प्रणाम किया । उन परम परमेश्वर परमात्मा सर्वेश्वर ८ ९ श्रीकृष्णको प्रणाम करके वे सब भक्तिके कारण अपने मस्तक झुकाकर उनकी स्तुति करने लगे । उस समय ९ ० उनकी वाणी गद्गद हो गयी थी, उनकी आँखोंमें आँसू भर आये थे और उनके शरीरके रोम - रोम पुलकित हो गये थे || ८५ - ९ ० ३ || ९ १ इस प्रकार उन सबने सर्वेश्वर, परात्पर, ज्योतिर्मय विग्रहवाले, परब्रह्म तथा सभी कारणोंके भी कारण, बहुमूल्य रत्नोंसे निर्मित, विचित्र सिंहासनपर ९ २ विराजमान, गोपालोंके द्वारा श्वेत चँवर डुलाकर सेवा किये जाते हुए, प्रसन्नतापूर्वक मुसकराते ९ ३ हुए, गोपिकाओंका नृत्यसंगीत देखनेमें संलग्न, राधाके लिये प्राणोंसे भी अधिक प्रिय, राधाके वक्षःस्थलमें स्थित तथा उन राधाके द्वारा दिये गये ९ ४ सुवासित ताम्बूलका सेवन करते हुए उन परिपूर्णतम सुरेश्वर भगवान्की स्तुति करके उन्हें रासमण्डलमें ९ ५ विराजमान देखा । सभी मुनि, स्वायम्भुव आदि मनु, सिद्ध और तपस्वी महात्मा प्रसन्नचित्त हो गये, उन्हें महान् आश्चर्य हुआ । एक - दूसरेको देखकर वे सभी ९ ६ लोग जगत्प्रभु चतुर्मुख ब्रह्मासे अपना वांछित अभिप्राय कहने लगे॥९ १ – ९ ६३ ॥ उनका वचन सुनकर ब्रह्माजी भगवान् विष्णुको ९ ७ दाहिने और महादेवको बायें करके परम आनन्दसे परिपूर्ण श्रीकृष्ण तथा परमानन्दस्वरूपिणी राधाके ९ ८ | पास पहुँचे ॥ ९ ७ - ९ ८ ॥
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सर्वं कृष्णमयं धाता ददर्श रासमण्डले ।
सर्वं समानवेषं च समानासनसंस्थितम् ॥
द्विभुजं मुरलीहस्तं वनमालाविभूषितम् ।
मयूरपिच्छचूडं च कौस्तुभेन विराजितम् ॥
अतीव कमनीयं च सुन्दरं शान्तविग्रहम् ।
गुणभूषणरूपेण तेजसा वयसा त्विषा ॥
परिपूर्णतमं सर्वं सर्वैश्वर्यसमन्वितम् ।
किं सेव्यं सेवकं किं वा दृष्ट्वा निर्वक्तुमक्षमः ॥
क्षणं तेजःस्वरूपं च रूपं तत्र स्थितं क्षणम् ।
निराकारं च साकारं ददर्श द्विविधं क्षणम् ॥
एकमेव क्षणं कृष्णं राधया रहितं परम् ।
प्रत्येकासनसंस्थं च तया सार्धं च तत्क्षणम् ॥
राधारूपधरं कृष्णं कृष्णरूपं कलत्रकम् ।
किं स्त्रीरूपं च पुरुषं विधाता ध्यातुमक्षमः ॥
हृत्पद्मस्थं च श्रीकृष्णं ध्यात्वा ध्यानेन चक्षुषा ।
चकार स्तवनं भक्त्या परिहारमनेकधा ॥
ततः स्वचक्षुरुन्मील्य पुनश्च तदनुज्ञया ।
ददर्श कृष्णमेकं च राधावक्षःस्थलस्थितम् ॥
स्वपार्षदैः परिवृतं गोपीमण्डलमण्डितम् ।
पुनः प्रणेमुस्तं दृष्ट्वा तुष्टुवुः परमेश्वरम् ॥
श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १३ उस समय ब्रह्माजीने रासमण्डलमें सब कुछ ९९ श्रीकृष्णमय देखा । सबकी वेष - भूषा एक समान थी, सभी लोग समान आसनपर विराजमान थे, सभी लोगों ने दो भुजाओंवाले श्रीकृष्णके रूपमें हाथमें मुरली ले रखी थी, सभी लोग वनमालासे सुशोभित थे, सबके १०० मुकुटमें मोरके पंख लगे थे, सभी लोग कौस्तुभमणिसे शोभायमान हो रहे थे, गुण- भूषण - रूप - तेज- आयु और कान्तिसे सम्पन्न उन सबका विग्रह अत्यन्त कोमल, सुन्दर तथा शान्त था, सब - के - सब परिपूर्णतम १०१ और सम्पूर्ण ऐश्वर्योंसे सम्पन्न थे, उन्हें देखकर कौन सेव्य है तथा कौन सेवक है, यह बता सकने में वे ब्रह्मा असमर्थ थे, भगवान् श्रीकृष्ण क्षणभरमें तेजः स्वरूप हो जाते थे और क्षणभरमें ही विग्रहवान् होकर १०२ आसनपर विराजित हो जाते थे, इस प्रकार ब्रह्माजीने एक ही क्षणमें उनके साकार तथा निराकार दोनों प्रकारके रूपों को देखा॥९९ –१०३ ॥ १०३ तदनन्तर एक ही क्षणमें ब्रह्माजीने देखा कि वे परमेश्वर श्रीकृष्ण राधासे रहित हैं और फिर उसी क्षण वे राधिकाके साथ प्रत्येक आसनपर विराजमान दिखायी देने लगे । ब्रह्माजीने श्रीकृष्णको राधाका रूप १०४ धारण किये हुए तथा राधाको श्रीकृष्णका रूप धारण किये हुए देखा । इस प्रकार वहाँ कौन स्त्रीरूपमें तथा कौन पुरुषरूपमें है - इस रहस्यको जाननेमें वे ब्रह्मा भी अक्षम हो गये | १०४-१०५ ॥ १०५ तत्पश्चात् ब्रह्माजीने अपने हृदयकमलपर विराजमान श्रीकृष्णका ध्यान करके ध्याननेत्रसे उनका दर्शन किया और स्त्री - पुंभावविषयक संशयका अनेक प्रकारसे १०६ निराकरण करते हुए भक्तिपूर्वक उनका स्तवन किया ॥ १०६ ॥
इसके बाद भगवान्की आज्ञासे उन्होंने अपने नेत्र खोलकर देखा कि वे अद्वितीय श्रीकृष्ण राधिकाके १०७ वक्ष: स्थलपर स्थित हैं, वे अपने पार्षदोंसे घिरे हुए हैं और गोपिकाओंके समुदायसे सुशोभित हो रहे हैं । तदनन्तर उन ब्रह्मा आदि देवताओंने परमेश्वर श्रीकृष्णका दर्शन करके उन्हें प्रणाम किया और फिर उनकी स्तुति १०८ | की ॥ १०७-१०८ ॥
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अ ० १३ ]
तदभिप्रायमाज्ञाय तानुवाच रमेश्वरः ।
सर्वात्मा स च सर्वज्ञः सर्वेशः सर्वभावनः ॥
श्रीभगवानुवाच
आगच्छ कुशलं ब्रह्मन्नागच्छ कमलापते ।
इहागच्छ महादेव शश्वत्कुशलमस्तु वः ॥
आगता हि महाभागा गङ्गानयनकारणात् ।
गङ्गा च चरणाम्भोजे भयेन शरणं गता ॥
राधेमां पातुमिच्छन्ती दृष्ट्वा मत्सन्निधानतः ।
दास्यामीमां च भवतां यूयं कुरुत निर्भयाम् ॥
श्रीकृष्णस्य वचः श्रुत्वा सस्मितः कमलोद्भवः ।
तुष्टाव राधामाराध्यां श्रीकृष्णपरिपूजिताम् ॥
वक्त्रैश्चतुर्भिः संस्तूय भक्तिनम्रात्मकन्धरः ।
धाता चतुर्णां वेदानामुवाच चतुराननः ॥
चतुरानन उवाच
गङ्गा त्वदङ्गसम्भूता प्रभोश्च रासमण्डले ।
युवयोर्द्रवरूपा सा मुग्धयोः शङ्करस्वनात् ॥
कृष्णांशा च त्वदंशा च त्वत्कन्यासदृशी प्रिया ।
त्वन्मन्त्रग्रहणं कृत्वा करोतु तव पूजनम् ॥
भविष्यति पतिस्तस्या वैकुण्ठेशश्चतुर्भुजः ।
भूस्थायाः कलया तस्याः पतिर्लवणवारिधिः ॥
गोलोकस्था च या गङ्गा सर्वत्रस्था तथाम्बिके ।
तदम्बिका त्वं देवेशी सर्वदा सा त्वदात्मजा ॥
नवम स्कन्ध ३७७ तदनन्तर सभी प्राणियोंके आत्मस्वरूप, सब १० ९ कुछ जाननेवाले, सर्वेश्वर तथा सबका सृजन करनेवाले लक्ष्मीपति भगवान् श्रीकृष्ण उन देवताओंका अभिप्राय समझकर उनसे कहने लगे ॥ १० ९ ॥ श्रीभगवान् बोले – हे ब्रह्मन्! आपका कुशल हो, आइये । हे कमलापते! आइये । हे ११० महादेव! यहाँ आइये । आप लोगोंका सदा कुशल हो । आप सभी महाभाग गंगाको ले जानेके लिये यहाँ आये हुए हैं, किंतु गंगाजी तो इस समय भयभीत होकर मेरे चरणकमलमें शरणागत हो गयी हैं । जब १११ वे गंगा मेरे सांनिध्यमें थी, तब उन्हें देखकर पी जानेके लिये राधिका उद्यत हो गयी थीं, इसलिये वे मेरे सांनिध्यमें आ गयीं । मैं आपलोगोंको उन्हें ११२ अवश्य दे दूँगा, किंतु आपलोग पहले उन्हें भयमुक्त कीजिये ॥११०– -११२ ॥ [ हे नारद! ] श्रीकृष्णकी यह बात सुनकर कमलयोनि ब्रह्मा मुसकराने लगे और वे भक्तिके ११३ कारण अपना मस्तक झुकाकर चारों मुखोंसे सबकी आराध्या तथा श्रीकृष्णके द्वारा सुपूजित राधिकाकी स्तुति करने लगे । उनकी स्तुति करके चारों वेदोंको धारण करनेवाले चतुर्मुख ब्रह्मा राधासे इस प्रकार ११४ कहने लगे ॥ ११३-११४ ॥ चतुरानन बोले- भगवान् शंकरकी संगीत-ध्वनिसे मुग्ध आपके तथा प्रभु श्रीकृष्णके द्रवरूपमें परिणत हुए अंगसे वह गंगा रासमण्डलमें प्रकट हुई थीं ॥ ११५ ॥
११५ अतः आप तथा श्रीकृष्णके अंशस्वरूप होनेके कारण आपकी प्रिय पुत्रीके तुल्य ये गंगा आपका मन्त्र ग्रहण करके आपकी पूजा करें । ११६ [ इसके फलस्वरूप ] वैकुण्ठके अधिपति चतुर्भुज भगवान् श्रीहरि इनको पतिके रूपमें प्राप्त होंगे और साथ ही अपनी एक कलासे जब ये भूमण्डलपर ११७ जायँगी, उस समय लवणसमुद्र भी इनके पति बनेंगे ॥ ११६-११७ ॥ अम्बिके! ये गंगा जैसे गोलोकमें हैं, वैसे ही इन्हें सर्वत्र रहना चाहिये । आप देवेश्वरी इनकी माता ११८ । हैं और वे सदा आपकी पुत्री हैं ॥ ११८ ॥
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३७८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १३
ब्रह्मणो वचनं श्रुत्वा स्वीचकार च सस्मिता ।
बहिर्बभूव सा कृष्णपादाङ्गुष्ठनखाग्रतः ॥
तत्रैव सत्कृता शान्ता तस्थौ तेषां च मध्यतः ।
उवास तोयादुत्थाय तदधिष्ठातृदेवता ॥
तत्तोयं ब्रह्मणा किञ्चित्स्थापितं च कमण्डलौ ।
किञ्चिद्दधार शिरसि चन्द्रार्धकृतशेखरः ॥
गङ्गायै राधिकामन्त्रं प्रददौ कमलोद्भवः ।
तत्स्तोत्रं कवचं पूजां विधानं ध्यानमेव च ॥
सर्वं तत्सामवेदोक्तं पुरश्चर्याक्रमं तथा ।
गङ्गा तामेव सम्पूज्य वैकुण्ठं प्रययौ सह ॥
लक्ष्मी: सरस्वती गङ्गा तुलसी विश्वपावनी ।
एता नारायणस्यैव चतस्त्रो योषितो मुने ॥
अथ तं सस्मितः कृष्णो ब्रह्माणं समुवाच सः ।
सर्वकालस्य वृत्तान्तं दुर्बोधमविपश्चितम् ॥
श्रीकृष्ण उवाच
गृहाण गङ्गां हे ब्रह्मन् हे विष्णो हे महेश्वर ।
शृणु कालस्य वृत्तान्तं मत्तो ब्रह्मन्निशामय ॥
यूयं च येऽन्ये देवाश्च मुनयो मनवस्तथा ।
सिद्धा यशस्विनश्चैव ये येऽत्रैव समागताः ॥
एते जीवन्ति गोलोके कालचक्रविवर्जिते ।
जलाप्लुते सर्वविश्वं जातं कल्पक्षयोऽधुना ॥
ब्रह्माद्या येऽन्यविश्वस्थास्ते विलीनाधुना मयि ।
वैकुण्ठं च विना सर्वं जलमग्नं च पद्मज ॥
गत्वा सृष्टिं कुरु पुनर्ब्रह्मलोकादिकं भवम् ।
स्वं ब्रह्माण्डं विरचय पश्चाद् गङ्गा प्रयास्यति ॥
[ हे नारद! ] ब्रह्माका यह वचन सुनकर राधाने ११ ९ हँसते हुए सभी बातें स्वीकार कर लीं । तब वे गंगा श्रीकृष्णके चरणके अँगूठेके नखके अग्रभागसे बाहर निकलीं । वहाँ सब लोगोंने उनका सत्कार किया और १२० वे सबके मध्य शान्त होकर स्थित रहीं । तब जलस्वरूपा गंगाकी अधिष्ठात्री देवी जलसे निकलकर वहींपर विराजमान हो गयीं ॥ ११ ९ - १२० ॥ १२१ उस समय ब्रह्माजीने गंगाका कुछ जल अपने कमण्डलुमें रख लिया और कुछ जल चन्द्रशेखर भगवान् शिवने अपने मस्तकपर धारण कर लिया ॥ १२१ ॥
तदनन्तर कमलयोनि ब्रह्माने गंगाको राधा - मन्त्र १२२ प्रदान किया और उन्हें राधाके स्तोत्र, कवच, ध्यान और पूजाकी विधि तथा पुरश्चर्याक्रम - इन सभी सामवेद - प्रतिपादित अनुष्ठानोंके विषयमें बतलाया । १२३ गंगाने इन नियमोंके द्वारा उन राधाकी विधिवत् पूजा करके नारायणके साथ वैकुण्ठके लिये प्रस्थान किया ॥ १२२-१२३ ॥ १२४ हे मुने! लक्ष्मी, सरस्वती, गंगा और विश्वपावनी तुलसी – ये चारों देवियाँ भगवान् नारायणकी ही पत्नियाँ हैं ॥ १२४ ॥
१२५ इसके बाद वे श्रीकृष्ण हँसकर उन ब्रह्माको दुर्बोध, सूक्ष्म तथा सामयिक वृत्तान्त बताने लगे ॥ १२५ ॥
श्रीकृष्ण बोले – हे ब्रह्मन्! आप गंगाको ग्रहण कीजिये । हे विष्णो! हे महेश्वर! हे ब्रह्मन्! १२६ आपलोग ध्यानपूर्वक कालका वृत्तान्त मुझसे सुनिये ॥ १२६ ॥
आपलोग तथा अन्य देवता, मुनि, मनुगण, सिद्ध १२७ तथा यशस्वीजन – जो - जो यहाँ आये हुए हैं - केवल ये लोग ही कालचक्र प्रभावसे रहित इस गोलोकमें जीवित हैं । इस समय कल्पक्षयके कारण सम्पूर्ण १२८ । विश्व जलमें आप्लावित हो गया है । अन्य ब्रह्माण्डोंमें रहनेवाले जो ब्रह्मा आदि देवता हैं, वे मुझमें विलीन हो गये हैं । हे पद्मज! इस समय केवल वैकुण्ठको १२ ९ छोड़कर सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड जलमें डूबा हुआ है । आप जाकर ब्रह्मलोक आदि लोकोंकी पुनः सृष्टि कीजिये । आप अपने ब्रह्माण्डकी रचना कीजिये, इसके बाद १३० | गंगा वहाँ जायँगी ॥ १२७–१३० ॥
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अ ० १४ ] नवम स्कन्ध ३७ ९
एवमन्येषु विश्वेषु सृष्टौ ब्रह्मादिकं पुनः ।
करोम्यहं पुनः सृष्टिं गच्छ शीघ्रं सुरैः सह ॥ १३१
गतो बहुतरः कालो युष्माकं च चतुर्मुखाः ।
गताः कतिविधास्ते च भविष्यन्ति च वेधसः ॥ १३२
इत्युक्त्वा राधिकानाथो जगामान्तःपुरे मुने ।
देवा गत्वा पुनः सृष्टिं चक्रुरेव प्रयत्नतः ॥ १३३
गोलोके च स्थिता गङ्गा वैकुण्ठे शिवलोकके ।
ब्रह्मलोके स्थितान्यत्र यत्र यत्र पुरः स्थिता ॥। १३४
तत्रैव सा गता गङ्गा चाज्ञया परमात्मनः ।
निर्गता विष्णुपादाब्जात्तेन विष्णुपदी स्मृता ॥ १३५
इत्येवं कथितं ब्रह्मन् गङ्गोपाख्यानमुत्तमम् ।
सुखदं मोक्षदं सारं किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥ १३६
इसी प्रकार इस सृष्टिके अवसरपर मैं अन्य ब्रह्माण्डों में भी ब्रह्मा आदिकी रचनाका प्रयत्न कर रहा हूँ । अब आप देवताओंके साथ यहाँसे शीघ्र जाइये । आपका बहुत समय बीत चुका है, न जाने कितने ब्रह्मा समाप्त हो गये और न जाने कितने ब्रह्मा अभी होंगे ॥ १३१-१३२ ॥ हे मुने! ऐसा कहकर राधिकानाथ भगवान् श्रीकृष्ण अन्तःपुरमें चले गये और ब्रह्मा आदि देवता वहाँसे चलकर प्रयत्नपूर्वक सृष्टिकार्यमें संलग्न हो गये ॥ १३३ ॥
तब गोलोक, वैकुण्ठ, शिवलोक और ब्रह्मलोक तथा अन्यत्र भी जिस - जिस स्थानपर गंगाको रहने | लिये परमात्मा श्रीकृष्णने आज्ञा दी थी, उस - उसपर वे गंगा चली गयीं । वे गंगा भगवान् विष्णुके चरणकमलसे निकली हैं, इसलिये वे विष्णुपदी कही गयी हैं ॥ १३४-१३५ ॥ हे ब्रह्मन्! इस प्रकार मैंने आपसे गंगाके इस सर्वोत्तम, सुखदायक, मोक्षप्रद तथा सारगर्भित उपाख्यानका वर्णन कर दिया । अब आप पुनः क्या । सुनना चाहते हैं? ॥ १३६ ॥
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां नवमस्कन्धे गङ्गोपाख्यानवर्णनं नाम त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥
अथ चतुर्दशोऽध्यायः गंगाके विष्णुपत्नी होनेका प्रसंग नारद उवाच
लक्ष्मीः सरस्वती गङ्गा तुलसी विश्वपावनी ।
एता नारायणस्यैव चतस्त्रश्च प्रिया इति ॥
गङ्गा जगाम वैकुण्ठमिदमेव श्रुतं मया ।
कथं सा तस्य पत्नी च बभूवेति च न श्रुतम् ॥
श्रीनारायण उवाच
गङ्गा जगाम वैकुण्ठं तत्पश्चाज्जगतां विधिः ।
गत्वोवाच तया सार्धं प्रणम्य जगदीश्वरम् ॥
नारदजी बोले - [ हे प्रभो! ] यह तो मैंने आपसे सुन लिया कि लक्ष्मी, सरस्वती, गंगा और १ विश्वपावनी तुलसी- ये चारों ही भगवान् नारायणकी पत्नियाँ हैं और उनमें से गंगा वैकुण्ठ चली गयीं । किंतु वे गंगा विष्णुकी पत्नी कैसे हुईं - यह प्रसंग मैंने नहीं सुना॥१-२ ॥ २ श्रीनारायण बोले- [ हे नारद! ] जब गंगाजी वैकुण्ठ चली गयीं, उसके पश्चात् जगत्की रचना करनेवाले ब्रह्माजी भी वहाँ पहुँचे । गंगाके साथ जगदीश्वर विष्णुके पास पहुँचकर उन्हें प्रणाम करके ३ वे उनसे कहने लगे ॥ ३ ॥
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३८० श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १४ ब्रह्मोवाच
राधाकृष्णाङ्गसम्भूता या देवी द्रवरूपिणी ।
नवयौवनसम्पन्ना सुशीला सुन्दरी वरा ॥
शुद्धसत्त्वस्वरूपा च क्रोधाहङ्कारवर्जिता ।
तदङ्गसम्भवा नान्यं वृणोतीयं च तं विना ॥
तत्रातिमानिनी राधा सा च तेजस्विनी वरा ।
समुद्युक्ता पातुमिमां भीतेयं बुद्धिपूर्वकम् ॥
विवेश चरणाम्भोजे कृष्णस्य परमात्मनः ।
सर्वत्र गोलकं शुष्कं दृष्ट्वाहमगमं तदा ॥
गोलोके यत्र कृष्णश्च सर्ववृत्तान्तप्राप्तये ।
सर्वान्तरात्मा सर्वेषां ज्ञात्वाभिप्रायमेव च ॥
बहिश्चकार गङ्गां च पादाङ्गुष्ठनखाग्रतः F दत्त्वास्यै राधिकामन्त्रं पूरयित्वा च गोलकम् ॥
प्रणम्य तां च राधेशं गृहीत्वात्रागमं प्रभो ।
गान्धर्वेण विवाहेन गृहाणेमां सुरेश्वरीम् ॥
सुरेश्वरेषु रसिको रसिकेयं समागता ।
त्वं रत्नं पुंसु देवेश स्त्रीरत्नं स्त्रीष्वियं सती ॥
विदग्धया विदग्धेन सङ्गमो गुणवान् भवेत् ।
उपस्थितां स्वयं कन्यां न गृह्णातीह यः पुमान् ॥
तं विहाय महालक्ष्मी रुष्टा याति न संशयः ।
यो भवेत्पण्डितः सोऽपि प्रकृतिं नावमन्यते ॥
सर्वे प्राकृतिकाः पुंसः कामिन्यः प्रकृतेः कलाः ।
त्वमेव भगवान्नाथो निर्गुणः प्रकृतेः परः ॥
ब्रह्माजी बोले- राधा और श्रीकृष्णके अंगसे आविर्भूत जो द्रवरूपिणी देवी गंगा हैं, वे इस समय नवीन यौवनसे ४ वाली श्रेष्ठ सुन्दरीके देवी शुद्धसत्त्वस्वरूपिणी रहित हैं । उन श्रीकृष्णके ५ छोड़कर किसी अन्यका चाहतीं ॥ ४-५ ॥ किंतु अतिमानिनी सम्पन्न तथा उत्तम स्वभाव-रूपमें विराजमान हैं । ये तथा क्रोध और अहंकारसे अंगसे प्रादुर्भूत ये गंगा उन्हें पतिरूपमें वरण नहीं करना राधा वहाँ विद्यमान हैं । वे ६ श्रेष्ठ तथा तेजस्विनी राधा इन गंगाको पी जानेके लिये उद्यत थीं । इससे अत्यन्त भयभीत ये गंगा बड़ी बुद्धिमानीके साथ परमात्मा श्रीकृष्णके चरणकमलमें समाविष्ट हो गयीं ॥ ६३ ॥
७ उस समय सर्वत्र ब्रह्माण्ड - - गोलकको शुष्क हुआ देखकर मैं गोलोक गया, जहाँपर सर्वान्तर्यामी श्रीकृष्ण सम्पूर्ण वृत्तान्त जाननेके लिये विराजमान ८ थे । उन्होंने सबका अभिप्राय समझकर अपने चरणके अँगुष्ठ- नखके अग्रभागसे गंगाको बाहर निकाल दिया । तब मैंने इन गंगाको राधिका - मन्त्र ९ प्रदानकर इनके जलसे ब्रह्माण्ड - गोलकको पूर्ण करके उन राधा तथा राधापति श्रीकृष्णको प्रणाम करके मैं इन्हें साथ लेकर यहाँ आया । हे प्रभो! अब आप गान्धर्व - विवाहके द्वारा इन सुरेश्वरी १० गंगाको स्वीकार कर लीजिये । श्रेष्ठ देवताओंमें आप परम रसिक हैं और यहाँ विराजमान ये गंगा भी रसिका हैं । हे देवेश! आप पुरुषोंमें रत्न हैं ११ और ये साध्वी गंगा भी स्त्रियोंमें रत्न हैं । विदग्ध नारीका विदग्ध पुरुषके साथ सम्मिलन कल्याणकारी होता है ॥ ७–१ - ११३ ॥ १२ जो पुरुष स्वत: प्राप्त कन्याको नहीं ग्रहण करता, उससे महालक्ष्मी रुष्ट हो जाती हैं और उसे छोड़कर चली जाती हैं; इसमें सन्देह नहीं है । जो विद्वान् होता है, वह कभी प्रकृतिका अपमान नहीं १३ करता ॥ १२-१३ ॥ सभी पुरुष प्रकृतिसे उत्पन्न हुए हैं और स्त्रियाँ भी उसी प्रकृतिकी कलाएँ हैं । केवल आप भगवान् १४ । जगन्नाथ ही निर्गुण और प्रकृतिसे परे हैं ॥ १४ ॥
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अ ० १४ ] नवम
अर्धाङ्गं द्विभुजः कृष्णो योऽर्धाङ्गेन चतुर्भुजः ।
कृष्णवामाङ्गसम्भूता बभूव राधिका पुरा ॥ १५
दक्षिणांश: स्वयं सा च वामांशः कमला तथा ।
तेनेयं त्वां वृणोत्येव यतस्त्वद्देहसम्भवा ॥ १६
एकाङ्गं चैव स्त्रीपुंसोर्यथा प्रकृतिपूरुषौ ।
इत्येवमुक्त्वा धाता तां तं समर्प्य जगाम सः ॥ १७
गान्धर्वेण विवाहेन तां जग्राह हरिः स्वयम् ।
नारायणः करं धृत्वा पुष्पचन्दनचर्चितम् ॥ १८
रेमे रमापतिस्तत्र गङ्गया सहितो मुदा । गङ्गा पृथ्वीं गता या सा स्वस्थानं पुनरागता । १ ९
निर्गता विष्णुपादाब्जात्तेन विष्णुपदीति च ।
मूर्च्छा सम्प्राप सा देवी नवसङ्गमलीलया ॥ २०
रसिका सुखसम्भोगाद्रसिकेश्वरसंयुता ।
तां दृष्ट्वा दुःखिता वाणी पद्मया वर्जितापि च ॥ २१
नित्यमीर्ष्यति तां वाणी न च गङ्गा सरस्वतीम् ।
गङ्गा शशाप कोपेन भारते च हरिप्रिया ॥ २२
गङ्गया सह तस्यैव तिस्त्रो भार्या रमापतेः ।
सार्धं तुलस्या पश्चाच्च चतस्रश्चाभवन्मुने ॥ २३
स्कन्ध ३८१ वे श्रीकृष्ण ही आधे अंगसे दो भुजावाले श्रीकृष्ण बने रहे और आधे भागसे चतुर्भुज हो गये । इसी प्रकार पूर्वकालमें श्रीकृष्णके वाम अंगसे प्रादुर्भूत राधा भी दो भागोंमें विभक्त हो गयी थीं । दाहिने अंशसे तो वे स्वयं राधा बनी रहीं और बायें अंशसे कमला हो गयीं । इसलिये ये गंगा आपको ही पतिरूपमें वरण करना चाहती हैं; क्योंकि ये आपके ही देहसे उत्पन्न हुई हैं । हे प्रभो! प्रकृति और पुरुषकी भाँति स्त्री - पुरुष दोनोंका शरीर एक ही होता है॥१५-१६३ ॥ ऐसा कहकर वे ब्रह्माजी श्रीहरिको गंगा सौंपकर वहाँसे चल दिये । तत्पश्चात् नारायण श्रीहरिने गंगाका पुष्प - चन्दनचर्चित हाथ पकड़कर गान्धर्व विवाह - विधिके अनुसार उन्हें पत्नीरूपमें ग्रहण किया । इसके बाद वे रमापति श्रीहरि गंगा साथ प्रसन्नतापूर्वक विहार करने लगे । इस प्रकार जो गंगा पृथ्वीपर गयी हुई थीं, वे अपने स्थानपर पुनः आ गयीं । ये गंगा भगवान् विष्णुके चरण - कमलसे निकली हैं, इसलिये विष्णुपदी - इस नामसे विख्यात हुईं ॥ १७ – १ ९ ३ ॥ अब रसिकेश्वर भगवान् श्रीहरिके साथ प्रथम रतिक्रीड़ामें अतिशय सुखानुभूतिके कारण वे रसिका देवी गंगा मूर्च्छित हो गयीं । उन गंगाको देखकर सरस्वती नित्य दुःखित रहती थीं । लक्ष्मीके बार - बार मना करनेपर भी सरस्वती उन गंगासे सदा ईर्ष्या करती थीं, किंतु गंगाने सरस्वतीके प्रति ऐसा नहीं किया । अन्तमें विष्णुप्रिया गंगाने कोप करके सरस्वतीको भारतवर्षमें जानेका शाप दे दिया था ॥ २० - २२ ॥ हे मुने! इस प्रकार उन रमापति श्रीहरिकी गंगासहित तीन भार्याएँ हैं । इसके बादमें तुलसीको । लेकर उनकी चार पत्नियाँ हुईं ॥२३ ॥
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां नवमस्कन्धे गङ्गायाः कृष्णपत्नीत्ववर्णनं नाम चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥