देवी भागवत उत्तरार्द्ध — पृष्ठ 391–400
देवी भागवत उत्तरार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 391–400
पृष्ठ 391
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
३८२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १५ अथ पञ्चदशोऽध्यायः तुलसीके कथा - प्रसंगमें नारद उवाच
नारायणप्रिया साध्वी कथं सा च बभूव ह ।
तुलसी कुत्र सम्भूता का वा सा पूर्वजन्मनि ॥
कस्य वा सा कुले जाता कस्य कन्या कुले सती ।
केन वा तपसा सा च सम्प्राप्ता प्रकृतेः परम् ॥
निर्विकारं निरीहं च सर्वविश्वस्वरूपकम् ।
नारायणं परं ब्रह्म परमेश्वरमीश्वरम् ॥
सर्वाराध्यं च सर्वेशं सर्वज्ञं सर्वकारणम् ।
सर्वाधारं सर्वरूपं सर्वेषां परिपालकम् ॥
कथमेतादृशी देवी वृक्षत्वं समवाप ह ।
कथं साप्यसुरग्रस्ता सम्बभूव तपस्विनी ॥
सुस्निग्धं मे मनो लोलं प्रेरयन्मां मुहुर्मुहुः ।
छेत्तुमर्हसि सन्देहं सर्वं सन्देहभञ्जन ॥
श्रीनारायण उवाच
मनुश्च दक्षसावर्णिः पुण्यवान् वैष्णवः शुचिः ।
यशस्वी कीर्तिमांश्चैव विष्णोरंशसमुद्भवः ॥
तत्पुत्रो ब्रह्मसावर्णिर्धर्मिष्ठो वैष्णवः शुचिः ।
तत्पुत्रो धर्मसावर्णिर्वैष्णवश्च जितेन्द्रियः ॥
तत्पुत्रो रुद्रसावर्णिर्भक्तिमान्विजितेन्द्रियः ।
तत्पुत्रो देवसावर्णिर्विष्णुव्रतपरायणः ॥
तत्पुत्र इन्द्रसावर्णिर्महाविष्णुपरायणः ।
वृषध्वजश्च तत्पुत्रो वृषध्वजपरायणः ॥
यस्याश्रमे स्वयं शम्भुरासीद्देवयुगत्रयम् ।
पुत्रादपि पर: स्नेहो नृपे तस्मिञ्छिवस्य च ॥
न च नारायणं मेने न लक्ष्मीं न सरस्वतीम् ।
पूजां च सर्वदेवानां दूरीभूतां चकार सः ॥
राजा वृषध्वजका चरित्र - वर्णन नारदजी बोले - परम साध्वी तुलसी भगवान् श्रीहरिकी प्रिय भार्या कैसे बनीं, वे कहाँ उत्पन्न हुई १ थीं, पूर्वजन्ममें कौन थीं, किसके कुलमें उत्पन्न हुई थीं और वे सती किसके कुलमें कन्याके रूपमें प्रादुर्भूत हुईं और अपने किस तपस्याके प्रभावसे वे तुलसी २ प्रकृतिसे परे, विकाररहित, निष्काम, सर्वविश्वरूप, नारायण, परब्रह्म, परमेश्वर, ईश्वर, सबके आराध्य, सर्वेश, सब कुछ जाननेवाले, सम्पूर्ण जगत् के कारण, ३ सर्वाधार, सर्वरूप तथा सभी प्राणियोंका पालन करनेवाले भगवान् श्रीहरिको पत्नीरूपमें प्राप्त हुईं? ऐसी साध्वी ४ देवी कैसे वृक्ष बन गयीं और वे तपस्विनी किस प्रकारसे असुरके द्वारा गृहीत हुईं । समस्त शंकाओंका निवारण करनेवाले हे प्रभो! यह सब जाननेके लिये ५ मेरा कोमल तथा चंचल मन मुझे बार - बार प्रेरित कर रहा है । आप मेरे सम्पूर्ण सन्देहको दूर करनेकी कृपा कीजिये ॥१-६ ॥ ६ श्रीनारायण बोले- - विष्णुके अंशसे उत्पन्न दक्ष - सावर्णि मनु परम पवित्र, यशस्वी, कीर्तिमान्, पुण्यशाली तथा विष्णुभक्त थे । उनके पुत्र ब्रह्मसावर्णि थे, जो धर्म - परायण, भगवान् विष्णुके भक्त तथा परम ७ पवित्र थे । उनके पुत्र धर्मसावर्णि थे, जो विष्णुके भक्त तथा जितेन्द्रिय थे । उनके पुत्र रुद्रसावर्णि भक्तिपरायण ८ तथा जितेन्द्रिय थे । उन रुद्रसावर्णिके पुत्र देवसावर्णि थे, जो सर्वदा विष्णु - भगवान्का व्रत करनेमें संलग्न रहते थे । उन देवसावर्णिके पुत्र इन्द्रसावर्णि महाविष्णुके ९ भक्त थे । उन इन्द्रसावर्णिका पुत्र वृषध्वज हुआ, जो भगवान् शिवकी भक्तिमें आसक्ति रखता था; उसके आश्रममें स्वयं भगवान् शंकर तीन युगोंतक स्थित १० रहे । राजा वृषध्वजके प्रति शिवजीका स्नेह पुत्रसे भी बढ़कर था ॥ ७-११ ॥ ११ वह भगवान् नारायण, लक्ष्मी, सरस्वती - इनमें किसीके भी प्रति आस्था नहीं रखता था और उसने अन्य सभी देवताओंकी पूजाका परित्याग कर दिया १२ | था ॥ १२ ॥
पृष्ठ 392
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० १५ ]
भाद्रे मासि महालक्ष्मीपूजां मत्तो बभञ्ज ह ।
तथा माघीयपञ्चम्यां विस्तृतां सर्वदैवतैः ॥
पापः सरस्वतीपूजां दूरीभूतां चकार सः ।
यज्ञं च विष्णुपूजां च निन्दन्तं तं दिवाकरः ॥
चुकोप देवो भूपेन्द्रं शशाप शिवकारणात् ।
भ्रष्टश्रीस्त्वञ्च भवेति तं शशाप दिवाकरः ॥
शूलं गृहीत्वा तं सूर्यमधावच्छङ्करः स्वयम् ।
पित्रा सार्धं दिनेशश्च ब्रह्माणं शरणं ययौ ॥
शिवस्त्रिशूलहस्तश्च ब्रह्मलोकं ययौ कुधा ।
ब्रह्मा सूर्यं पुरस्कृत्य वैकुण्ठं च ययौ भिया ॥
ब्रह्मकश्यपमार्तण्डाः सन्त्रस्ताः शुष्कतालुकाः ।
नारायणं च सर्वेशं ते ययुः शरणं भिया ॥
मूर्ध्ना प्रणेमुस्ते गत्वा तुष्टुवुश्च पुनः पुनः ।
सर्वं निवेदनं चक्रुर्भयस्य कारणं हरौ ॥
नारायणश्च कृपया तेभ्यश्च ह्यभयं ददौ ।
स्थिरा भवत हे भीता भयं किञ्च मयि स्थिते ॥
स्मरन्ति ये यत्र तत्र मां विपत्तौ भयान्विताः ।
तांस्तत्र गत्वा रक्षामि चक्रहस्तस्त्वरान्वितः ॥
पाताहं जगतां देवाः कर्ता च सततं सदा ।
स्रष्टा च ब्रह्मरूपेण संहर्ता शिवरूपतः ॥
शिवोऽहं त्वमहं चापि सूर्योऽहं त्रिगुणात्मकः ।
विधाय नानारूपं च करोमि सृष्टिपालनम् ॥
नवम स्कन्ध ३८३ अभिमानमें चूर होकर वह भाद्रपद महीनेमें १३ महालक्ष्मीकी पूजामें विघ्न उत्पन्न करता था । इसी प्रकार उस पापीने माघ शुक्ल पंचमीके दिन समस्त देवताओं द्वारा विस्तृत रूपसे की जानेवाली सरस्वती-पूजाका भी त्याग कर दिया था । इस तरह केवल १४ शिवकी आराधनामें निरत रहनेवाले और यज्ञ तथा विष्णुकी पूजाकी निन्दा करनेवाले उस राजेन्द्र वृषध्वजपर भगवान् सूर्यदेव कुपित हो गये और उन्होंने उसे शाप १५ दे दिया ' तुम श्रीविहीन हो जाओ ' - यह शाप सूर्यने उसे दे दिया था ॥ १३–१५ ॥ इसपर स्वयं भगवान् शिव हाथमें त्रिशूल लेकर सूर्यके पीछे दौड़े । तब सूर्य अपने पिता कश्यपके साथ १६ ब्रह्माकी शरण में गये ॥ १६ ॥
तदनन्तर भगवान् शंकर हाथमें त्रिशूल लिये हुए अत्यन्त क्रुद्ध होकर ब्रह्मलोकके लिये प्रस्थित हुए । १७ इसपर भयभीत ब्रह्माजीने सूर्यको आगे करके वैकुण्ठलोकके लिये प्रस्थान कर दिया ॥ १७ ॥
वे सन्तप्त तथा शुष्क तालुवाले ब्रह्मा, कश्यप तथा सूर्य भयपूर्वक सर्वेश्वर नारायणकी शरणमें १८ | गये ॥ १८ ॥
उन तीनोंने वहाँ पहुँचकर मस्तक झुकाकर भगवान् श्रीहरिको प्रणाम किया और बार- बार उनकी १ ९ स्तुति की । तत्पश्चात् उन्होंने श्रीहरिसे भयका समस्त कारण बताया ॥ १ ९ ॥ तब भगवान् नारायणने कृपापूर्वक [ यह कहकर ] उन्हें अभय प्रदान किया - हे भयभीत देवगण! २० आपलोग स्थिरचित्त हो जाइये । मेरे रहते आपलोगोंको भय कैसा? विपत्तिमें भयत्रस्त जो लोग जहाँ भी मुझे याद करते हैं, मैं हाथमें चक्र धारण किये वहाँ २१ तत्काल पहुँचकर उनकी रक्षा करता हूँ ॥ २०-२१ ॥ हे देवतागण! मैं सदा निरन्तर सम्पूर्ण लोकोंकी रचना तथा रक्षा किया करता हूँ । मैं ही ब्रह्मारूपसे जगत् की सृष्टि करनेवाला और शिवरूपसे संहार २२ करनेवाला हूँ । मैं ही शिव हूँ, आप भी मेरे ही रूप हो और ये सूर्य भी मेरे ही स्वरूप हैं । तीनों गुणोंसे युक्त मैं ही अनेकविध रूप धारण करके सृष्टि - पालन २३ | करता हूँ ॥ २२-२३ ॥
पृष्ठ 393
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
३८४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १५
यूयं गच्छत भद्रं वो भविष्यति भयं कुतः ।
अद्यप्रभृति मद्वरेण भयं वो नास्ति शङ्करात् ॥
सर्वेशो वै स भगवाञ्छङ्करश्च सतां पतिः ।
भक्ताधीनश्च भक्तानां भक्तात्मा भक्तवत्सलः ॥
सुदर्शनः शिवश्चैव मम प्राणाधिकः प्रियः ।
ब्रह्माण्डेषु न तेजस्वी हे ब्रह्मन्ननयोः परः ॥
शक्तः स्रष्टुं महादेवः सूर्यकोटिं च लीलया ।
कोटिं च ब्रह्मणामेवं नासाध्यं शूलिनः प्रभोः ॥
बाह्यज्ञानं नैव किञ्चिद्ध्यायते मां दिवानिशम् ।
मन्मन्त्रान्मद्गुणान्भक्त्या पञ्चवक्त्रेण गायति ॥
अहमेवं चिन्तयामि तत्कल्याणं दिवानिशम् ।
ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् ॥
शिवस्वरूपो भगवाञ्छिवाधिष्ठातृदेवता ।
शिवं भवति तस्माच्च शिवं तेन विदुर्बुधाः ॥
एतस्मिन्नन्तरे तत्र जगाम शङ्करः स्थितः ।
शूलहस्तो वृषारूढो रक्तपङ्कजलोचनः ॥
अवरुह्य वृषात्तूर्णं भक्तिनम्रात्मकन्धरः ।
ननाम भक्त्या तं शान्तं लक्ष्मीकान्तं परात्परम् ॥
रत्नसिंहासनस्थं च रत्नालङ्कारभूषितम् ।
किरीटिनं कुण्डलिनं चक्रिणं वनमालिनम् ॥
नवीननीरदश्यामं सुन्दरं च चतुर्भुजम् ।
चतुर्भुजैः सेवितं च श्वेतचामरवायुना ॥
आपलोग जाइये । आपलोगोंका कल्याण २४ होगा, आपलोगोंको भय कहाँ । मेरे वरके प्रभावसे आपलोगोंको आजसे शंकरजीसे भय नहीं होगा । वे सर्वेश्वर भगवान् शिव सज्जनोंके स्वामी, भक्तों के वशमें रहनेवाले, भक्तोंकी आत्मा तथा भक्तवत्सल २५ हैं । हे ब्रह्मन्! सुदर्शन चक्र और भगवान् शिव– ये दोनों ही मुझे प्राणोंसे भी अधिक प्रिय हैं, इन दोनोंसे बढ़कर तेजस्वी ब्रह्माण्डोंमें कोई भी नहीं २६ | है ॥ २४–२६ ॥ वे महादेव खेल - खेलमें करोड़ों सूर्यों तथा करोड़ों ब्रह्माकी रचना कर सकते हैं । उन त्रिशूलधारी प्रभु शिव के लिये कुछ भी दुष्कर नहीं है । वे भगवान् २७ शिव कुछ भी बाह्य ज्ञान न रखते हुए दिन - रात मेरा ही ध्यान करते रहते हैं और अपने पाँचों मुखोंसे भक्तिपूर्वक सदा मेरे मन्त्रोंका जप तथा गुणोंका गान २८ करते रहते हैं ॥ २७-२८ ॥ मैं भी दिन - रात उनके कल्याणका ही चिन्तन करता हूँ; क्योंकि जो लोग जिस प्रकार मेरी उपासना करते हैं, उसी प्रकार मैं भी उनकी सेवामें तत्पर रहता २ ९ हूँ । भगवान् शंकर शिवस्वरूप हैं और वे कल्याणके अधिष्ठातृदेवता हैं, उन्हींसे कल्याण होता है, अतः विद्वान् लोग उन्हें शिव कहते हैं ॥ २ ९ -३० ॥ ३० इसी बीच भगवान् शंकर भी वहाँ पहुँच गये । उनके हाथमें त्रिशूल था, वे वृषभपर सवार थे तथा उनकी आँखें लाल कमलके समान थीं । वहाँ पहुँचते ही उन्होंने तुरंत वृषभसे उतरकर तथा भक्तिसे ३१ परिपूर्ण होनेके कारण अपना मस्तक झुकाकर उन शान्तस्वभाव परात्पर लक्ष्मीपति विष्णुको भक्तिपूर्वक प्रणाम किया ॥ ३१-३२ ॥ ३२ उस समय भगवान् श्रीहरि रत्नमय सिंहासनपर विराजमान थे, रत्ननिर्मित अलंकारोंसे वे अलंकृत थे, वे किरीट; कुण्डल; चक्र और वनमाला धारण किये हुए थे, उनके शरीरकी कान्ति नूतन मेघके ३३ समान श्यामवर्णकी थी, वे परम सुन्दर थे, चार भुजाओंसे सुशोभित थे और चार भुजावाले अनेक पार्षदोंके द्वारा श्वेत चँवर डुलाकर उनकी सेवा की ३४ | जा रही थी ॥ ३३-३४ ॥
पृष्ठ 394
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० १५ ]
चन्दनोक्षितसर्वाङ्गं भूषितं पीतवाससम् ।
लक्ष्मीप्रदत्तताम्बूलं भुक्तवन्तं च नारद ॥
विद्याधरीनृत्यगीतं पश्यन्तं सस्मितं सदा ।
ईश्वरं परमात्मानं भक्तानुग्रहविग्रहम् ॥
तं ननाम महादेवो ब्रह्मणा नमितश्च सः ।
ननाम सूर्यो भक्त्या च सन्त्रस्तश्चन्द्रशेखरम् ॥
कश्यपश्च महाभक्त्या तुष्टाव च ननाम च ।
शिवः संस्तूय सर्वेशं समुवास सुखासने ॥
सुखासने सुखासीनं विश्रान्तं चन्द्रशेखरम् ।
श्वेतचामरवातेन सेवितं विष्णुपार्षदैः ॥
पीयूषतुल्यमधुरं वचनं सुमनोहरम् । विष्णुरुवाच आगतोऽसि कथं चात्र वद कोपस्य कारणम् ॥ महादेव उवाच
वृषध्वजं च मद्भक्तं मम प्राणाधिकं प्रियम् ।
सूर्यः शशाप इति मे प्रकोपस्य तु कारणम् ॥
पुत्रवत्सलशोकेन सूर्यं हन्तुं समुद्यतः । स ब्रह्माणं प्रपन्नश्च सूर्यश्च स विधिस्त्वयि त्वयि ये शरणापन्ना ध्यानेन वचसापि वा । निरापदो विशङ्कास्ते जरा मृत्युश्च तैर्जितः प्रत्यक्षं शरणापन्नास्तत्फलं किं वदामि भोः । हरिस्मृतिश्चाभयदा सर्वमङ्गलदा सदा किं मे भक्तस्य भविता तन्मे ब्रूहि जगत्प्रभो । श्रीहतस्यास्य मूढस्य सूर्यशापेन हेतुना नवम स्कन्ध ३८५ हे नारद! उनका सम्पूर्ण अंग दिव्य चन्दनसे ३५ अनुलिप्त था, वे अनेक प्रकारके आभूषणोंसे अलंकृत थे, उन्होंने पीताम्बर धारण कर रखा था । वे लक्ष्मी द्वारा दिये गये ताम्बूलका सेवन कर रहे थे, मुसकराते हुए वे विद्याधरियोंके नृत्य - गीत ३६ आदिका निरन्तर अवलोकन कर रहे थे । भक्तोंके लिये साक्षात् कृपामूर्ति ऐसे उन परमेश्वर प्रभुको महादेवने प्रणाम किया । ब्रह्माजीने भी महादेवको प्रणाम किया ३७ और अत्यन्त भयभीत सूर्यने भी चन्द्रशेखर शिवको भक्तिपूर्वक प्रणाम किया । इसी प्रकार कश्यपने महान् भक्तिके साथ शिवकी स्तुति की और उन्हें प्रणाम ३८ | किया ॥ ३५ – ३७३ ॥ शिवजी सर्वेश्वर श्रीहरिका स्तवन करके एक सुखप्रद आसनपर विराजमान हो गये । इसके ३ ९ बाद सुखमय आसनपर सुखपूर्वक विराजमान तथा विष्णुके पार्षदोंके द्वारा श्वेत चँवर डुलाकर सेवित होते हुए उन विश्रान्त शिवजीसे भगवान् श्रीहरि अमृतके समान मधुर तथा मनोहर वचन कहने लगे ॥ ३८-३९ ३ ॥ ४० विष्णुजी बोले- आप यहाँ किसलिये आये हैं, आप अपने क्रोधका कारण बताइये ॥ ४० ॥
महादेवजी बोले – [ हे भगवन्! ] सूर्यने मेरे लिये प्राणोंसे भी अधिक प्रिय मेरे भक्त वृषध्वजको ४१ शाप दे दिया है - यही मेरे क्रोधका कारण है । जब मैं अपने पुत्रतुल्य भक्तके शोकसे प्रभावित होकर सूर्यको मारनेके लिये उद्यत हुआ, तब उस सूर्यने ॥ ४२ ब्रह्माकी शरण ली और पुनः सूर्य तथा ब्रह्मा — ये दोनों आपकी शरण में आ गये ॥ ४१-४२ ॥ [ हे प्रभो! ] जो लोग ध्यानसे अथवा वचनसे भी आपकी शरण ग्रहण कर लेते हैं, वे विपत्ति तथा ॥ ४३ भयसे पूर्णतः मुक्त हो जाते हैं । वे जरा तथा मृत्युतकको जीत लेते हैं । ये लोग तो प्रत्यक्ष शरणागत हुए हैं । इस शरणागतिका फल क्या बताऊँ! आप ॥ ४४ । श्रीहरिका स्मरण सदा अभय तथा सर्वविध मंगल प्रदान करता है । हे जगत्प्रभो! सूर्यके शापके कारण श्रीरहित तथा विवेकहीन मेरे भक्तका क्या होगा? इसे ॥ ४५ | मुझे बतायें ॥ ४३–४५ ॥ 1898 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ द्वितीय खण्ड ] -13A
पृष्ठ 395
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
३८६ विष्णुरुवाच कालोऽतियातो दैवेन युगानामेकविंशतिः वैकुण्ठं घटिकार्धेन शीघ्रं गच्छ त्वमालयम् वृषध्वजो मृतः कालाद्दुर्निवार्यात्सुदारुणात् । रथध्वजश्च तत्पुत्रो मृतः सोऽपि श्रिया हतः तत्पुत्रौ च महाभागौ धर्मध्वजकुशध्वजौ । हृतश्रियौ सूर्यशापात्स्मृतौ परमवैष्णवौ
राज्यभ्रष्टौ श्रिया भ्रष्टौ कमलातपसा रतौ ।
तयोश्च भार्ययोर्लक्ष्मीः कलया च भविष्यति ॥
सम्पद्युक्तौ तदा तौ च नृपश्रेष्ठौ भविष्यतः । श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १६ विष्णुजी बोले - [ हे शिव! ] दैवकी प्रेरणासे । इक्कीस युगोंका बहुत बड़ा समय व्यतीत हो गया, यद्यपि वैकुण्ठमें अभी आधी घड़ीका समय ॥ ४६ बीता है । अतः अब आप शीघ्र अपने स्थान चले जाइये । किसी भी नियन्त्रित न किये जा सकनेवाले अत्यन्त भीषण कालने वृषध्वजको मार डाला है । ॥ ४७ उसका पुत्र रथध्वज था, वह भी श्रीसे हीन होकर मृत्युको प्राप्त हो गया । उस रथध्वजके भी धर्मध्वज तथा कुशध्वज नामक दो महान् भाग्यशाली पुत्र भी सूर्यके शापसे श्रीहीन हो गये हैं । वे दोनों विष्णु ॥ ४८ । महान् भक्तके रूपमें प्रसिद्ध हैं । राज्य तथा श्रीसे भ्रष्ट वे दोनों लक्ष्मी तपमें रत हैं । उन दोनोंकी भार्याओंसे भगवती लक्ष्मी अपनी कलासे आविर्भूत होंगी । उस समय वे दोनों महान् सम्पदासे सम्पन्न होकर ४ ९ श्रेष्ठ राजाके रूपमें पुनः प्रतिष्ठित होंगे । हे शम्भो! आपका भक्त मर चुका है; अब आप यहाँ से जाइये । हे देवतागण! अब आप सबलोग भी यहाँसे प्रस्थान कीजिये ॥ ४६–५० ॥ मृतस्ते सेवकः शम्भो गच्छ यूयं च गच्छत ॥५० [ हे नारद! ] ऐसा कहकर वे भगवान् श्रीहरि सभासे उठकर लक्ष्मीके साथ अन्तः पुरमें चले गये । इत्युक्त्वा च सलक्ष्मीकः सभातोऽभ्यन्तरं गतः । तत्पश्चात् परम प्रसन्नतासे युक्त देवतागण भी परम देवा जग्मुः सम्प्रहृष्टाः स्वाश्रमं परया मुदा । आनन्दका अनुभव करते हुए अपने - अपने आश्रमके लिये प्रस्थित हो गये । तब परिपूर्णतम भगवान् शिव शिवश्च तपसे शीघ्रं परिपूर्णतमो ययौ ॥ ५१ भी तपस्याके उद्देश्यसे वहाँसे चल दिये ॥ ५१ ॥
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां नवमस्कन्धे नारायणनारदसंवादे शक्तिप्रादुर्भावो नाम पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥
अथ षोडशोऽध्यायः वेदवतीकी कथा, इसी प्रसंगमें भगवान् श्रीरामके चरित्रके एक अंशका कथन, भगवती सीता तथा श्रीनारायण उवाच लक्ष्मीं तौ च समाराध्य चोग्रेण तपसा मुने वरमिष्टं च प्रत्येकं सम्प्रापतुरभीप्सितम् ॥ महालक्ष्मीवरेणैव तौ पृथ्वीशौ बभूवतुः पुण्यवन्तौ पुत्रवन्तौ धर्मध्वजकुशध्वजौ 1898 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ द्वितीय खण्ड ] —13 B द्रौपदी के पूर्वजन्मका वृत्तान्त श्रीनारायण बोले- हे मुने! उन दोनोंने । कठिन तपस्याद्वारा भगवती लक्ष्मीकी आराधना करके १ अपना मनोवांछित वर प्राप्त कर लिया ॥ १ ॥
महालक्ष्मीके वरदानसे ही वे धर्मध्वज । और कुशध्वज महान् पुण्यशाली तथा पुत्रवान् ॥ २ | राजा हो गये ॥२ ॥
पृष्ठ 396
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० १६ ] नवम
कुशध्वजस्य पत्नी च देवी मालावती सती ।
सा सुषाव च कालेन कमलांशां सुतां सतीम् ॥ ३
सा च भूयिष्ठकालेन ज्ञानयुक्ता बभूव ह ।
कृत्वा वेदध्वनिं स्पष्टमुत्तस्थौ सूतिकागृहात् ॥ ४
वेदध्वनिं सा चकार जातमात्रेण कन्यका ।
तस्मात्तां च वेदवतीं प्रवदन्ति मनीषिणः ॥ ५
जातमात्रेण सुस्नाता जगाम तपसे वनम् ।
सर्वैर्निषिद्धा यत्नेन नारायणपरायणा ॥ ६
एकमन्वन्तरं चैव पुष्करे च तपस्विनी ।
अत्युग्रां च तपस्यां च लीलया हि चकार सा ॥ ७
तथापि पुष्टा न क्लिष्टा नवयौवनसंयुता ।
सुश्राव सा च सहसा सुवाचमशरीरिणीम् ॥ ८
जन्मान्तरे च ते भर्ता भविष्यति हरिः स्वयम् ।
ब्रह्मादिभिर्दुराराध्यं पतिं लप्स्यसि सुन्दरि ॥ ९
इति श्रुत्वा च सा हृष्टा चकार ह पुनस्तपः । अतीव निर्जनस्थाने पर्वते गन्धमादने । १०
तत्रैव सुचिरं तप्त्वा विश्वस्य समुवास सा ।
ददर्श पुरतस्तत्र रावणं दुर्निवारणम् ॥ ११
दृष्ट्वा सातिथिभक्त्या च पाद्यं तस्मै ददौ किल ।
सुस्वादुभूतं च फलं जलं चापि सुशीतलम् ॥ १२
तच्च भुक्त्वा स पापिष्ठश्चोवास तत्समीपतः ।
चकार प्रश्नमिति तां का त्वं कल्याणि वर्तसे ॥ १३
तां दृष्ट्वा स वरारोहां पीनश्रोणिपयोधराम् ।
शरत्पद्मोत्सवास्यां च सस्मितां सुदतीं सतीम् ॥ १४
मूर्च्छामवाप कृपणः कामबाणप्रपीडितः ।
स करेण समाकृष्य शृङ्गारं कर्तुमुद्यतः ॥ १५
स्कन्ध ३८७ कुशध्वजकी मालावती नामक साध्वी भार्या थी । उस देवीने दीर्घकाल बीतनेपर यथासमय लक्ष्मीके अंशसे सम्पन्न एक साध्वी कन्याको जन्म दिया । उसे जन्मसे ही ज्ञान प्राप्त था । वह कन्या स्पष्ट वाणीमें वेद - मन्त्रोंका उच्चारणकर सूतिकागृहसे बाहर निकल आयी । उस कन्याने जन्म लेते ही वेदध्वनि की थी, इसलिये विद्वान् लोग उसे ' वेदवती ' कहने लगे ॥ ३–५ ॥ जन्म लेते ही उस कन्याने विधिवत् स्नान किया और तपस्याके लिये वनको प्रस्थान कर दिया; यद्यपि | सभी लोगोंने श्रीहरिके चिन्तनमें तत्पर रहनेवाली उस कन्याको ऐसा करनेसे प्रयत्नपूर्वक रोका था ॥ ६ ॥
उस तपस्विनी कन्याने एक मन्वन्तरतक पुष्कर-क्षेत्रमें रहकर लीलापूर्वक अत्यन्त कठोर तप किया, फिर भी वह दुर्बल नहीं हुई; अपितु स्वस्थ और नवयौवनसे सम्पन्न बनी रही ॥ ७३ ॥
उसने सहसा स्पष्ट शब्दोंवाली यह आकाशवाणी सुनी - हे सुन्दरि! दूसरे जन्ममें स्वयं भगवान् श्रीहरि तुम्हारे पति होंगे । ब्रह्मा आदिके द्वारा भी बड़ी कठिनता से प्रसन्न होनेवाले भगवान् श्रीहरिको तुम पतिरूपमें प्राप्त करोगी ॥ ८ - ९ ॥ यह आकाशवाणी सुनकर वह कन्या अत्यन्त प्रसन्न हो गयी और गन्धमादनपर्वतपर निर्जन स्थानमें पुनः तप करने लगी ॥ १० ॥
वहाँ दीर्घकालतक तपश्चर्या करती हुई वह निश्चिन्त होकर रहती थी । एक बार उसने अपने समक्ष उपस्थित ढीठ रावणको देखा ॥ ११ ॥
उसे देखकर वेदवतीने अतिथिभक्तिसे युक्त होकर उसे पाद्य, परम स्वादिष्ट फल और शीतल जल प्रदान किया । उन्हें ग्रहण करके वह पापी रावण उसके पास बैठ गया और उससे यह प्रश्न करने लगा ' हे कल्याणि! तुम कौन हो? ' ॥ १२-१३ ॥ स्थूल नितम्बदेश तथा वक्ष: स्थलवाली, शरऋतुके विकसित कमलकी भाँति प्रसन्न मुखवाली, मुसकानयुक्त तथा स्वच्छ दाँतोंवाली उस परम साध्वी सुन्दरीको देखकर कामबाणसे आहत होकर वह नीच रावण मूच्छित हो गया । वह वेदवतीको हाथसे खींचकर । शृंगारिक चेष्टाएँ करने लगा ॥ १४-१५ ॥ 1898 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ द्वितीय खण्ड ] —13 C
पृष्ठ 397
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
३८८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १६
सती चुकोप दृष्ट्वा तं स्तम्भितं च चकार ह ।
स जडो हस्तपादैश्च किञ्चिद्वक्तुं न च क्षमः ॥
तुष्टाव मनसा देवीं प्रययौ पद्मलोचनाम् ।
सा तुष्टा तस्य स्तवनं सुकृतं च चकार ह ॥
सा शशाप मदर्थे त्वं विनंक्ष्यसि सबान्धवः ।
स्पृष्टाहं च त्वया कामाद् बलं चाप्यवलोकय ॥
इत्युक्त्वा सा च योगेन देहत्यागं चकार ह ।
गङ्गायां तां च संन्यस्य स्वगृहं रावणो ययौ ॥
अहो किमद्भुतं दृष्टं किं कृतं वानयाधुना ।
इति सञ्चिन्त्य सञ्चिन्त्य विललाप पुनः पुनः ॥
सा च कालान्तरे साध्वी बभूव जनकात्मजा ।
सीतादेवीति विख्याता यदर्थे रावणो हतः ॥
महातपस्विनी सा च तपसा पूर्वजन्मतः ।
लेभे रामं च भर्तारं परिपूर्णतमं हरिम् ॥
सम्प्राप तपसाराध्यं दुराराध्यं जगत्पतिम् ।
सा रमा सुचिरं रेमे रामेण सह सुन्दरी ॥
जातिस्मरा न स्मरति तपसश्च क्लमं पुरा ।
सुखेन तज्जहौ सर्वं दुःखं चापि सुखं फले ॥
नानाप्रकारविभवं चकार सुचिरं सती ।
सम्प्राप्य सुकुमारं तमतीव नवयौवना ॥
गुणिनं रसिकं शान्तं कान्तं देवमनुत्तमम् ।
स्त्रीणां मनोज्ञं रुचिरं तथा लेभे यथेप्सितम् ॥
यह देखकर वह साध्वी अत्यन्त क्रोधित हो १६ उठी और उसने [ तपोबलसे ] उसे स्तम्भित कर दिया । वह हाथों तथा पैरोंसे निश्चेष्ट हो गया और कुछ भी बोल सकनेमें समर्थ नहीं रहा ॥ १६ ॥
वह मन - ही - मन उस कमलनयनी देवीकी शरण में १७ गया और उसने उसका स्तवन किया । देवी वेदवती उसपर प्रसन्न हो गयी और [ परलोकमें ] उसे स्तुतिका फल देना स्वीकार कर लिया । साथ ही उसने यह शाप भी दिया - ' तुम मेरे ही कारण अपने बान्धवोंसहित विनष्ट १८ हो जाओगे; क्योंकि काम - भावनासे तुमने मेरा स्पर्श किया है । अब तुम मेरा बल देख लो ' ॥ १७ - १८ ॥ ऐसा कहकर उसने योगबलसे अपने शरीरका १ ९ त्याग कर दिया । इसके बाद रावणने उसे गंगामें छोड़कर अपने घरकी ओर प्रस्थान किया- ' अहो, इस समय मैंने यह कैसा अद्भुत दृश्य देखा है, इस देवीने इस समय क्या कर डाला ' - ऐसा सोच - सोचकर वह २० रावण बार - बार विलाप करता रहा ॥ १ ९ -२० ॥ [ हे मुने! ] वही साध्वी वेदवती दूसरे जन्ममें जनककी पुत्रीके रूपमें आविर्भूत हुईं और वे देवी २१ ' सीतादेवी ' – इस नामसे विख्यात हुईं, जिनके कारण रावण मारा गया । पूर्वजन्मकी तपस्याके प्रभावसे उस महान् तपस्विनी वेदवतीने परिपूर्णतम भगवान् श्रीरामको पतिरूपमें प्राप्त किया । तपस्याके द्वारा उस देवीने २२ अत्यन्त कठिनतासे सन्तुष्ट होनेवाले तथा सबके आराध्य जगत्पति श्रीरामको प्राप्त किया था । उस सुन्दरी सीताने अत्यन्त दीर्घ कालतक भगवान् श्रीरामके २३ साथ विलास किया ॥ २१ - २३ ॥ उसे पूर्वजन्मकी बातोंका स्मरण था, फिर भी पूर्व समयमें तपस्या कष्टपर उसने ध्यान नहीं दिया । उसने सुखपूर्वक उस क्लेशका त्याग कर दिया था; २४ क्योंकि परिणामके उत्तम होनेपर दुःख भी सुखके रूपमें हो जाता है ॥ २४ ॥
उन सुकुमार श्रीरामको प्राप्त करके उस नवयौवना साध्वीने दीर्घकालतक नाना प्रकारके २५ ऐश्वर्यको प्राप्त किया । उसने अपनी अभिलाषाके अनुरूप ही गुणवान्, रसिक, शान्त, कमनीय, स्त्रियोंके लिये कामदेवतुल्य मनोहर एवं सर्वश्रेष्ठ देवको २६ | प्राप्त किया था ॥ २५-२६ ॥ 1898 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ द्वितीय खण्ड ] –13 D
पृष्ठ 398
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० १६ ]
पितुः सत्यपालनार्थं सत्यसन्धो रघूद्वहः ।
जगाम काननं पश्चात्कालेन च बलीयसा ॥
तस्थौ समुद्रनिकटे सीतया लक्ष्मणेन च ।
ददर्श तत्र वह्निं च विप्ररूपधरं हरिः ॥
रामं च दुःखितं दृष्ट्वा स च दुःखी बभूव ह ।
उवाच किञ्चित्सत्येष्टं सत्यं सत्यपरायणः ॥
द्विज उवाच
भगवञ्छ्रयतां राम कालोऽयं यदुपस्थितः ।
सीताहरणकालोऽयं तवैव समुपस्थितः ॥
दैवं च दुर्निवार्यं च न च दैवात्परो बली ।
जगत्प्रसूं मयि न्यस्य छायां रक्षान्तिकेऽधुना ॥
दास्यामि सीतां तुभ्यं च परीक्षासमये पुनः ।
देवैः प्रस्थापितोऽहं च न च विप्रो हुताशनः ॥
रामस्तद्वचनं श्रुत्वा न प्रकाश्य च लक्ष्मणम् ।
स्वीकारं वचसश्चक्रे हृदयेन विदूयता ॥
वह्निर्योगेन सीताया मायासीतां चकार ह ।
तत्तुल्यगुणसर्वाङ्गां ददौ रामाय नारद ॥
सीतां गृहीत्वा स ययौ गोप्यं वक्तुं निषिध्य च ।
लक्ष्मणो नैव बुबुधे गोप्यमन्यस्य का कथा ॥
एतस्मिन्नन्तरे रामो ददर्श कानकं मृगम् ।
सीता तं प्रेरयामास तदर्थे यत्नपूर्वकम् ॥
संन्यस्य लक्ष्मणं रामो जानक्या रक्षणे वने ।
स्वयं जगाम तूर्णं तं विव्याध सायकेन च ॥
नवम स्कन्ध ३८ ९ तदनन्तर रघुकुलकी वृद्धि करनेवाले सत्यसंकल्प २७ श्रीराम बलवान् कालसे प्रेरित होकर अपने पिताके वचनको सत्य करनेके लिये वनमें चले गये ॥ २७ ॥
वे सीता और लक्ष्मणके साथ समुद्रके समीप स्थित थे । उसी समय भगवान्ने विप्ररूपधारी अग्निदेवको २८ वहाँ देखा । तब श्रीरामको दु: खित देखकर अग्नि भी बहुत दुःखी हुए । इसके बाद सत्यपरायण वे अग्निदेव सत्यप्रेमी भगवान् श्रीरामसे यह सत्यवचन कहने २ ९ लगे ॥ २८-२९ ॥ द्विज बोले- हे भगवन्! हे श्रीराम! सुनिये, यह जो काल आपके समक्ष उपस्थित है, वह सीता-हरणके समयके रूपमें ही आया हुआ है । दैवका प्रतिकार अत्यन्त कठिन है, उस दैवसे बढ़कर बलवान् ३० अन्य कोई नहीं है । अतः आप इस समय जगज्जननी सीताको मुझमें स्थापित करके छायामयी सीताको अपने साथ रख लीजिये । इनकी परीक्षाका समय ३१ आनेपर मैं इन सीताको पुनः आपको सौंप दूंगा । मैं ब्राह्मण नहीं हूँ, अपितु इसी कार्यहेतु देवताओंके द्वारा भेजा गया साक्षात् अग्निदेव हूँ ॥ ३०-३२ ॥ ३२ श्रीरामने उनकी यह बात सुनकर लक्ष्मणको बताये बिना ही अत्यन्त दु: खी मनसे वह वचन स्वीकार कर लिया ॥ ३३ ॥
हे नारद! तत्पश्चात् अग्निदेवने योगबलसे सीताके ३३ ही समान एक माया - सीताकी रचना की । इसके बाद अग्निने गुण और स्वरूपमें उस सीताके ही तुल्य माया- सीताको श्रीरामको सौंप दिया ॥ ३४ ॥
३४ श्रीराम इस गुप्त रहस्यको प्रकट करनेका निषेध करके माया- सीताको साथ लेकर चल पड़े । लक्ष्मणतक इस रहस्यको नहीं जान पाये तो दूसरेकी बात ही ३५ क्या ॥ ३५ ॥
इसी बीच श्रीरामने एक स्वर्णमृग देखा । तब सीता जिस किसी भी यत्नसे उसे लानेके लिये श्रीरामको प्रेरित करने लगीं ॥ ३६ ॥
३६ श्रीराम उस वनमें सीताकी रक्षाके लिये लक्ष्मणको वहीं पर नियुक्त करके स्वयं शीघ्रतापूर्वक मृगकी ओर दौड़ पड़े और बाणसे उसका वध कर ३७ | दिया ॥ ३७ ॥
पृष्ठ 399
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
३ ९ ० श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १६
लक्ष्मणेति च शब्दं स कृत्वा च मायया मृगः ।
प्राणांस्तत्याज सहसा पुरो दृष्ट्वा हरिं स्मरन् ॥ ३८ ।
मृगदेहं परित्यज्य दिव्यरूपं विधाय च ।
रत्ननिर्माणयानेन वैकुण्ठं स जगाम ह ॥३ ९
वैकुण्ठलोकद्वार्यासीत्किङ्करो द्वारपालयोः ।
पुनर्जगाम तद्द्वारमादेशाद् द्वारपालयोः ॥ ४०
अथ शब्दं च सा श्रुत्वा लक्ष्मणेति च विक्लवम् ।
तं हि सा प्रेरयामास लक्ष्मणं रामसन्निधौ ॥ ४१
गते च लक्ष्मणे रामं रावणो दुर्निवारणः ।
सीतां गृहीत्वा प्रययौ लङ्कामेव स्वलीलया ॥ ४२
विषसाद च रामश्च वने दृष्ट्वा च लक्ष्मणम् ।
तूर्णं च स्वाश्रमं गत्वा सीतां नैव ददर्श सः ॥ ४३ ।
मूर्च्छा सम्प्राप सुचिरं विललाप भृशं पुनः ।
पुनः पुनश्च बभ्राम तदन्वेषणपूर्वकम् ॥ ४४
कालेन प्राप्य तद्वार्तां गोदावरीनदीतटे ।
सहायान्वानरान्कृत्वा बबन्ध सागरं हरिः ॥ ४५
लङ्कां गत्वा रघुश्रेष्ठो जघान सायकेन च ।
कालेन प्राप्य तं हत्वा रावणं बान्धवैः सह ॥ ४६
तां च वह्निपरीक्षां च कारयामास सत्वरम् ।
हुताशस्तत्र काले तु वास्तवीं जानकीं ददौ ॥ ४७
उवाच छाया वह्निं च रामं च विनयान्विता ।
करिष्यामीति किमहं तदुपायं वदस्व मे ॥ ४८
श्रीरामाग्नी ऊचतुः
त्वं गच्छ तपसे देवि पुष्करं च सुपुण्यदम् ।
कृत्वा तपस्यां तत्रैव स्वर्गलक्ष्मीर्भविष्यसि ॥ ४ ९
सा च तद्वचनं श्रुत्वा प्रतप्य पुष्करे तपः ।
दिव्यं त्रिलक्षवर्षं च स्वर्गलक्ष्मीर्बभूव ह ॥ ५०
उस मायामृगने ‘ हा लक्ष्मण ' - यह शब्द करके अपने समक्ष भगवान् श्रीहरिका दर्शन प्राप्त करके उनका स्मरण करते हुए सहसा अपने प्राण त्याग दिये ॥ ३८ ॥
मृगका शरीर त्यागकर दिव्य स्वरूप धारण करके वह रत्ननिर्मित विमानसे वैकुण्ठ चला गया । वह मारीच पूर्वजन्ममें दोनों द्वारपालोंके सेवकके रूपमें वैकुण्ठके द्वारपर रहता था । अब द्वारपालोंके आदेशानुसार वह फिर वैकुण्ठके द्वारपर पहुँच गया ॥ ३ ९ -४० ॥ इधर ' हा लक्ष्मण ' – यह आर्तनाद सुनकर सीताने रामके पास जानेके लिये लक्ष्मणको प्रेरित किया ॥ ४१ ॥
रामके पास लक्ष्मणके चले जानेपर अत्यन्त दुर्धर्ष वह रावण अपनी मायासे सीताका हरण करके लंकाकी ओर चल दिया ॥ ४२ ॥
लक्ष्मणको वनमें देखकर श्रीराम विषादग्रस्त हो गये । अपने आश्रमपर तत्काल पहुँचकर जब उन्होंने सीताको नहीं देखा तब वे मूर्च्छित हो गये और पुनः [ चेतना आनेपर ] उन्होंने बार- बार बहुत विलाप किया । इसके बाद सीताको खोजते हुए वे बार - बार इधर - उधर भटकने लगे ॥ ४३-४४ ॥ कुछ समय पश्चात् गोदावरीनदीके तटपर सीताका समाचार मिलने पर भगवान् श्रीरामने वानरोंको अपना सहायक बनाकर समुद्रपर पुल बाँधा ॥ ४५ ॥
पुनः समय आनेपर लंका जाकर उन रघुश्रेष्ठ रामने बाणसे रावणको मार डाला । इस प्रकार बान्धवोंसहित उस रावणका वध करके श्रीरामने तत्काल उन सीताकी अग्निपरीक्षा करायी । उसी समय अग्निदेवने वास्तविक सीता श्रीरामको सौंप दी ॥ ४६-४७ ॥ तब छायामयी सीताने विनम्र होकर अग्निदेव और श्रीरामसे कहा- अब मैं क्या करूँ? मुझे वह उपाय बताइये ॥ ४८ ॥
श्रीराम और अग्निदेव बोले- हे देवि! तुम तपस्या करनेके लिये अत्यन्त पुण्यप्रद पुष्करक्षेत्रमें जाओ । वहाँ तपस्या करके तुम स्वर्गलक्ष्मी बनोगी । वे यह वचन सुनकर पुष्करक्षेत्रमें जाकर दिव्य तीन लाख वर्षोंतक कठिन तपस्या करके स्वर्गलक्ष्मीके रूपमें प्रतिष्ठित हो गयीं ॥ ४ ९ -५० ॥
पृष्ठ 400
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० १६ ] सा च कालेन तपसा यज्ञकुण्डसमुद्भवा कामिनी पाण्डवानां च द्रौपदी द्रुपदात्मजा कृते युगे वेदवती कुशध्वजसुता शुभा त्रेतायां रामपत्नी च सीतेति जनकात्मजा तच्छाया द्रौपदी देवी द्वापरे द्रुपदात्मजा त्रिहायणी च सा प्रोक्ता विद्यमाना युगत्रये नारद उवाच प्रियाः पञ्च कथं तस्या बभूवुर्मुनिपुङ्गव इति मच्चित्तसंदेहं भञ्ज संदेहभञ्जन श्रीनारायण उवाच लङ्कायां वास्तवी सीता रामं सम्प्राप नारद रूपयौवनसम्पन्ना छाया च बहुचिन्तया रामाग्न्योराज्ञया तप्तुमुपास्ते शङ्करं परम् कामातुरा पतिव्यग्रा प्रार्थयन्ती पुनः पुनः पतिं देहि पतिं देहि पतिं देहि त्रिलोचन पतिं देहि पतिं देहि पञ्चवारं चकार सा शिवस्तत्प्रार्थनां श्रुत्वा प्रहस्य रसिकेश्वरः प्रिये तव प्रियाः पञ्च भविष्यन्ति वरं ददौ तेन सा पाण्डवानां च बभूव कामिनी प्रिया इति ते कथितं सर्वं प्रस्तावं वास्तवं शृणु अथ सम्प्राप्य लङ्कायां सीतां रामो मनोहराम् विभीषणाय तां लङ्कां दत्त्वायोध्यां ययौ पुनः एकादशसहस्त्राब्दं कृत्वा राज्यं च भारते जगाम सर्वैर्लोकैश्च सार्धं वैकुण्ठमेव च कमलांशा वेदवती कमलायां विवेश सा नवम स्कन्ध ३ ९ १ । कालक्रमसे वे ही देवी तपस्याके प्रभावसे ॥ ५१ यज्ञकुण्डसे उत्पन्न होकर महाराज द्रुपदकी पुत्री तथा पाण्डवोंकी प्रिया द्रौपदी बनीं ॥ ५१ ॥
। इस प्रकार सत्ययुगमें कुशध्वजकी वही ॥५२ कन्या कल्याणमयी वेदवती त्रेतायुगमें जनककी पुत्री सीता हुईं और बादमें वे श्रीरामकी पत्नी बनीं ॥ पुनः वही छायासीता द्वापरमें द्रुपदकी पुत्री देवी ॥ ५३ द्रौपदीके रूपमें आविर्भूत हुईं । अतः तीनों युगोंमें विद्यमान रहनेवाली उस देवीको ' त्रिहायणी ' भी कहा गया है ॥ ५२-५३ ॥ । नारदजी बोले - शंकाओंका समाधान करनेवाले हे मुनिश्रेष्ठ! उस द्रौपदीके पाँच पति कैसे हुए? मेरे ॥ ५४ मनका यह सन्देह दूर कीजिये ॥ ५४ ॥
श्रीनारायण बोले- हे नारद! जब लंकामें वास्तविक सीता भगवान् रामको प्राप्त हो गयीं, तब । रूप एवं यौवनसे सम्पन्न छायासीता महान् चिन्तासे ॥ ५५ व्याकुल हो उठी ॥ ५५ ॥
तदनन्तर भगवान् श्रीराम और अग्निकी आज्ञाके । अनुसार वह भगवान् शंकरकी उपासनामें तत्पर हो ॥ ५६ गयी । कामातुर वह पतिप्राप्तिके लिये व्यग्र होकर बार - बार यही प्रार्थना करने लगी- ' हे त्रिलोचन! । मुझे पति प्रदान कीजिये ' । ऐसा उसने पाँच बार कहा ॥ ५७ था ॥ ५६-५७ ॥ उस प्रार्थनाको सुनकर रसिकेश्वर शंकरने । हँसकर यह वर दे दिया – ' हे प्रिये! तुम्हारे पाँच ॥ ५८ पति होंगे ' । [ हे नारद! ] इसीलिये वे छायासीता [ द्वापरमें ] पाँचों पाण्डवोंकी प्रिय भार्या हुईं । इस । प्रकार मैंने आपको यह सब बता दिया, अब ॥ ५ ९ वास्तविक प्रसंग सुनिये ॥ ५८-५९ ॥ भगवान् श्रीराम लंकामें मनोहारिणी सीताको । पा जानेके अनन्तर वह लंका विभीषणको सौंपकर ॥ ६० अयोध्या वापस चले गये और भारतवर्षमें ग्यारह हजार वर्षोंतक राज्य करके समस्त पुरवासियों-। सहित वैकुण्ठ चले गये । लक्ष्मीके अंशसे प्रादुर्भूत ॥ ६१ वह वेदवती लक्ष्मीके विग्रहमें समाविष्ट हो । गयी ॥ ६०-६१३ ॥