देवी भागवत उत्तरार्द्ध — पृष्ठ 401–410

देवी भागवत उत्तरार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 401–410

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३ ९ २ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १७ कथितं पुण्यमाख्यानं पुण्यदं पापनाशनम् ॥ ६२ इस प्रकार मैंने यह पवित्र, पुण्यदायक तथा पापनाशक आख्यान आपसे कह दिया । मूर्तिमान् रूपमें सततं मूर्तिमन्तश्च वेदाश्चत्वार एव च । चारों वेद उसकी जिह्वा अग्रभागपर निरन्तर विराजमान सन्ति यस्याश्च जिह्वाग्रे सा च वेदवती श्रुता ॥ ६३ रहते थे, इसीलिये वह वेदवती नामसे प्रसिद्ध थी । अब मैं आपको धर्मध्वजकी कन्याका आख्यान बता रहा धर्मध्वजसुताख्यानं निबोध कथयामि ते ॥ ६४ हूँ; ध्यानपूर्वक सुनिये ॥ ६२–६४ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां नवमस्कन्धे महालक्ष्म्या वेदवतीरूपेण राजगृहे जन्मवर्णनं नाम षोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥

अथ सप्तदशोऽध्यायः भगवती तुलसीके श्रीनारायण उवाच

धर्मध्वजस्य पत्नी माधवीति च विश्रुता ।

नृपेण सार्धं सारामे रेमे च गन्धमादने ॥ १

शय्यां रतिकरीं कृत्वा पुष्पचन्दनचर्चिताम् ।

चन्दनालिप्तसर्वाङ्गीं पुष्पचन्दनवायुना ॥ २

स्त्रीरत्नमतिचार्वङ्गी रत्नभूषणभूषिता ।

कामुकी रसिका सृष्टा रसिकेन च संयुता ॥ ३

सुरते विरतिर्नास्ति तयोः सुरतिविज्ञयोः ।

गतं देववर्षशतं न ज्ञातं च दिवानिशम् ॥ ४

ततो राजा मतिं प्राप्य सुरताद्विरराम च ।

कामुकी सुन्दरी किञ्चिन्न च तृप्तिं जगाम सा ॥ ५

दधार गर्भं सा सद्यो दैवादब्दशतं सती ।

श्रीगर्भा श्रीयुता सा च सम्बभूव दिने दिने ॥ ६

शुभे क्षणे शुभदिने शुभयोगे च संयुते ।

शुभलग्ने शुभांशे च शुभस्वामिग्रहान्विते ॥ ७

कार्तिकीपूर्णिमायां तु सितवारे च पाद्मज ।

सुषाव सा च पद्मांशां पद्मिनीं तां मनोहराम् ॥ ८

प्रादुर्भावका प्रसंग श्रीनारायण बोले – [ हे नारद! ] राजा धर्मध्वजकी पत्नी माधवी नामसे प्रसिद्ध थी । वह राजाके साथ गन्धमादनपर्वतपर एक सुरम्य उपवनमें विहार करती थी ॥ १ ॥

पुष्प और चन्दनसे सुरभित सुखदायी शय्यापर अपने समस्त अंगोंको चन्दनसे सुसज्जितकर, रत्नाभरणोंसे विभूषित हो पुष्प - चन्दनादिसे सुगन्धित पवनका सुख लेते हुए वह स्त्रीरत्नस्वरूपिणी सर्वांगसुन्दरी अपने रसिक पतिके साथ कामोपभोगमें लगी रहती थी॥२-३ ॥ रतिक्रीड़ाके विज्ञ वे दोनों कभी भी भोगसे विरत नहीं होते थे । इस प्रकार उनके दिव्य सौ वर्ष व्यतीत हो गये, किंतु उन्हें दिन - रातका भी ज्ञान नहीं रहा ॥ ४ ॥

तदनन्तर राजाके हृदयमें कुछ ज्ञानका उदय होनेपर वे भोगसे विरत हो गये, किंतु वह कामासक्त सुन्दरी पूर्ण रूपसे तृप्त नहीं हुई । दैवयोगसे उसने शीघ्र ही गर्भ धारण कर लिया । श्रीस्वरूप गर्भवाली वह दिनों - दिन सौन्दर्यसम्पन्न होती गयी । उस साध्वीका गर्भ सौ वर्षोंतक रहा॥५-६ ॥ हे नारद! उस माधवीने कार्तिकपूर्णिमा तिथिमें शुक्रवारको शुभ दिन, शुभ योग, शुभ क्षण, शुभ लग्न, शुभ अंश तथा शुभ स्वामिग्रहसे युक्त उत्तम मुहूर्तमें लक्ष्मीकी अंशस्वरूपिणी तथा पद्मिनीतुल्य एक मनोहर कन्याको जन्म दिया ॥ ७-८ ॥

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अ ० १७ ] शरत्पार्वणचन्द्रास्यां शरत्पङ्कजलोचनाम् पक्वबिम्बाधरोष्ठीं च पश्यन्तीं सस्मितां गृहम् ॥

हस्तपादतलारक्तां निम्ननाभिं मनोरमाम् ।

तदधस्त्रिवलीयुक्तां नितम्बयुगवर्तुलाम् ॥

शीते सुखोष्णसर्वाङ्गीं ग्रीष्मे च सुखशीतलाम् ।

श्यामां सुकेशीं रुचिरां न्यग्रोधपरिमण्डलाम् ॥

पीतचम्पकवर्णाभां सुन्दरीष्वेव सुन्दरीम् ।

नरा नार्यश्च तां दृष्ट्वा तुलनां दातुमक्षमाः ॥

तेन नाम्ना च तुलसीं तां वदन्ति मनीषिणः ।

सा च भूमिष्ठमात्रेण योग्या स्त्री प्रकृतिर्यथा ॥

सर्वैर्निषिद्धा तपसे जगाम बदरीवनम् ।

तत्र देवाब्दलक्षं च चकार परमं तपः ॥

मनसा नारायणः स्वामी भवितेति च निश्चिता ।

ग्रीष्मे पञ्चतपाः शीते तोयवस्त्रा च प्रावृषि ॥

आसनस्था वृष्टिधाराः सहन्तीति दिवानिशम् ।

विंशत्सहस्रवर्षं च फलतोयाशना च सा ॥

त्रिंशत्सहस्रवर्षं च पत्राहारा तपस्विनी ।

चत्वारिंशत्सहस्त्राब्दं वाय्वाहारा कृशोदरी ॥

ततो दशसहस्त्राब्दं निराहारा बभूव सा ।

निर्लक्ष्यां चैकपादस्थां दृष्ट्वा तां कमलोद्भवः ॥

समाययौ वरं दातुं परं बदरिकाश्रमम् ।

चतुर्मुखं च सा दृष्ट्वा ननाम हंसवाहनम् ॥

तामुवाच जगत्कर्ता विधाता जगतामपि । नवम स्कन्ध ३ ९ ३ । उस कन्याका मुख शरत् - पूर्णिमाके चन्द्रमाके ९ समान था, उसके नेत्र शरत्कालीन कमलके समान थे, ओष्ठ पके हुए बिम्बाफलके सदृश थे, उस समय वह कन्या मुसकराती हुई अपने घरको देख रही थी, उसके हाथ - पैर के तलवे लाल थे, उसकी नाभि १० गम्भीर थी, उसका विग्रह मनको मुग्ध कर देनेवाला था, उसका कटिप्रदेश तीन वलियोंसे युक्त था । उसके दोनों नितम्ब गोल थे । शीतकालमें सुख देनेके लिये ११ वह सम्पूर्ण उष्ण अंगोंवाली और ग्रीष्मकालमें शीतल अंगोंवाली थी । वह श्यामा सुन्दरी वटवृक्षको घेरकर शोभित होनेवाले वरोहोंकी भाँति बड़े सुन्दर केशपाशसे १२ सुसज्जित थी, वह पीत चम्पकके वर्णके समान आभावाली थी, वह सुन्दरियोंकी भी सुन्दरी थी - ऐसे अनुपम सौन्दर्यवाली उस कन्याको देखकर सभी स्त्री और पुरुष किसीके साथ उसकी तुलना करनेमें १३ असमर्थ थे, इसलिये विद्वान् पुरुष उसे तुलसी नामसे पुकारते हैं । पृथ्वीपर आते ही वह प्रकृतिदेवी - जैसी योग्य स्त्री हो गयी ॥ ९ –१३ ॥ १४ सभी लोगों द्वारा मना किये जानेपर भी वह तपस्या करनेके उद्देश्यसे बदरीवन चली गयी और वहाँ उसने दिव्य एक लाख वर्षोंतक कठिन तप १५ किया । स्वयं भगवान् नारायण मेरे स्वामी हों — ऐसा अपने मनमें निश्चय करके वह ग्रीष्मकालमें पंचाग्नि तापती थी, जाड़ेके समयमें गीले वस्त्र पहनती थी और वर्षाऋतुमें एक आसनपर बैठकर जलधाराओंको १६ सहती हुई दिन - रात तप करती थी । वह तपस्विनी बीस हजार वर्षोंतक फल और जलके आहारपर, तीस हजार वर्षोंतक पत्तोंके आहारपर और चालीस हजार १७ वर्षोंतक वायुके आहारपर रही । तत्पश्चात् वह कृशोदरी

दस हजार वर्षोंतक निराहार रही ॥। १४ - १७३ ॥

इस प्रकार उसे निर्लक्ष्य होकर एक पैरपर स्थित १८ रहकर तपस्या करते हुए देखकर ब्रह्माजी उसे वर प्रदान करनेके लिये उत्तम बदरिकाश्रम आये ॥ १८३ ॥

हंसपर विराजमान चतुर्मुख ब्रह्माको देखकर उस तुलसीने प्रणाम किया । तब जगत्की सृष्टि करनेवाले १ ९ तथा सम्पूर्ण लोकोंका विधान करनेवाले ब्रह्मा उससे कहने लगे – ॥ १ ९ ३ ॥

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३ ९ ४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १७ ब्रह्मोवाच वरं वृणीष्व तुलसि यत्ते मनसि वाञ्छितम् ॥ हरिभक्तिं हरेर्दास्यमजरामरतामपि । तुलस्युवाच शृणु तात प्रवक्ष्यामि यन्मे मनसि वाञ्छितम् ॥

सर्वज्ञस्यापि पुरतः का लज्जा मम साम्प्रतम् ।

अहं तु तुलसी गोपी गोलोकेऽहं स्थिता पुरा ॥

कृष्णप्रिया किंकरी च तदंशा तत्सखी प्रिया ।

गोविन्दरतिसम्भुक्तामतृप्तां मां च मूर्च्छिताम् ॥

रासेश्वरी समागत्य ददर्श रासमण्डले ।

गोविन्दं भर्त्सयामास मां शशाप रुषान्विता ॥

याहि त्वं मानवीं योनिमित्येवं च शशाप ह ।

मामुवाच स गोविन्दो मदंशं च चतुर्भुजम् ॥

लभिष्यसि तपस्तप्त्वा भारते ब्रह्मणो वरात् ।

इत्येवमुक्त्वा देवेशोऽप्यन्तर्धानं चकार सः ॥

देव्या भिया तनुं त्यक्त्वा प्राप्तं जन्म गुरो भुवि ।

अहं नारायणं कान्तं शान्तं सुन्दरविग्रहम् ॥

साम्प्रतं तं पतिं लब्धुं वरये त्वं च देहि मे । ब्रह्मदेव उवाच सुदामा नाम गोपश्च श्रीकृष्णाङ्गसमुद्भवः ॥

तदंशश्चातितेजस्वी लेभे जन्म च भारते ।

साम्प्रतं राधिकाशापाद्दनुवंशसमुद्भवः ॥

शङ्खचूडेति विख्यातस्त्रैलोक्ये न च तत्समः ।

गोलोके त्वां पुरा दृष्ट्वा कामोन्मथितमानसः ॥

ब्रह्माजी बोले- हे तुलसि! हरिकी भक्ति, हरिकी दासता और अजरता - अमरता – इनमेंसे जो भी २० तुम्हारे मनमें अभीष्ट हो, उसे माँग लो ॥ २०३ ॥

तुलसी बोली - हे तात! सुनिये, मेरे मनमें जो अभिलाषा है, उसे बता रही हूँ; क्योंकि सब कुछ जाननेवाले आप ब्रह्माके समक्ष अपनी बात कहने में २१ मुझे अब लाज ही क्या है? मैं पूर्वजन्ममें तुलसी नामकी गोपी थी और गोलोकमें निवास करती थी । उस समय मैं भगवान् श्रीकृष्णकी प्रिया, उनकी २२ अनुचरी, उनकी अंशस्वरूपा तथा उनकी प्रेयसी सखीके रूपमें प्रतिष्ठित थी ॥ २१-२२३ ॥ एक समय जब मैं भगवान् श्रीकृष्णके साथ २३ विहारमें अचेत तथा अतृप्त अवस्थामें थी, तभी रासकी अधिष्ठात्री देवी भगवती राधाने रासमण्डलमें आकर मुझे देख लिया । उन्होंने श्रीकृष्णकी बहुत २४ भर्त्सना की और कुपित होकर मुझे शाप दे दिया था — ' तुम मनुष्ययोनि प्राप्त करो ' – यह शाप उन्होंने मुझे दे दिया | २३ - २४३ ॥ तब उन गोविन्दने मुझसे कहा - ' भारतवर्षमें २५ जन्म लेकर घोर तपस्या करके तुम ब्रह्माजीके वरदानसे मेरे अंशस्वरूप चतुर्भुज विष्णुको पतिरूपमें प्राप्त करोगी ' । इस प्रकार कहकर वे देवेश्वर श्रीकृष्ण २६ अन्तर्धान हो गये । हे गुरो! देवी राधाके भयसे अपना वह शरीर त्यागकर मैंने अब भूमण्डलपर जन्म लिया है और सुन्दर विग्रहवाले तथा शान्तस्वभाव भगवान् २७ नारायण जो उस समय मेरे पति थे, उन्हींको अब भी पतिरूपमें प्राप्त करनेके लिये वर माँग रही हूँ, आप

मुझे यह वर दीजिये । २५–२७३ ॥

ब्रह्मदेव बोले — भगवान् श्रीकृष्णके अंगसे प्रादुर्भूत, उन्हींके अंशस्वरूप तथा परम तेजस्वी २८ सुदामा नामक गोपने भी इस समय भारतवर्षमें जन्म लिया है । वह राधाके शापसे दनुवंशमें उत्पन्न हुआ है और शंखचूड़ नामसे विख्यात है, उसके समान २ ९ तीनों लोकोंमें कोई भी नहीं है ॥ २८-२९ ३ ॥ पूर्वकालमें एक बार गोलोकमें तुम्हें देखकर उसके मनमें कामभावना उत्पन्न हो गयी, किंतु ३० राधिकाके प्रभावके कारण वह तुम्हें नहीं पा सका

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अ ० १७ ] नवम स्कन्ध ३ ९ ५

विलम्भितुं न शशाक राधिकायाः प्रभावतः ।

स च जातिस्मरस्तस्मात्सुदामाभूच्च सागरे ॥

जातिस्मरा त्वमपि सा सर्वं जानासि सुन्दरि ।

अधुना तस्य पत्नी त्वं सम्भविष्यसि शोभने ॥

पश्चान्नारायणं शान्तं कान्तमेव वरिष्यसि ।

शापान्नारायणस्यैव कलया दैवयोगतः ॥

भविष्यसि वृक्षरूपा त्वं पूता विश्वपावनी ।

प्रधाना सर्वपुष्पेषु विष्णुप्राणाधिका भवेः ॥

त्वया विना च सर्वेषां पूजा च विफला भवेत् ।

वृन्दावने वृक्षरूपा नाम्ना वृन्दावनीति च ॥

त्वत्पत्रैर्गोपिगोपाश्च पूजयिष्यन्ति माधवम् ।

वृक्षाधिदेवीरूपेण सार्धं कृष्णेन सन्ततम् ॥

विहरिष्यसि गोपेन स्वच्छन्दं मद्वरेण च ।

इत्येवं वचनं श्रुत्वा सस्मिता हृष्टमानसा ॥

प्रणनाम च ब्रह्माणं तं च किञ्चिदुवाच सा । तुलस्युवाच यथा मे द्विभुजे कृष्णे वाञ्छा च श्यामसुन्दरे ॥

सत्यं ब्रवीमि हे तात न तथा च चतुर्भुजे ।

अतृप्ताहं च गोविन्दे दैवाच्छृङ्गारभङ्गतः ॥

गोविन्दस्यैव वचनात्प्रार्थयामि चतुर्भुजम् ।

त्वत्प्रसादेन गोविन्दं पुनरेव सुदुर्लभम् ॥

ध्रुवमेव लभिष्यामि राधाभीतिं प्रमोचय । ब्रह्मदेव उवाच गृहाण राधिकामन्त्रं ददामि षोडशाक्षरम् ॥ था । वह सुदामा इस समय समुद्रमें उत्पन्न हुआ ३१ है । भगवान् श्रीकृष्णका अंश होनेसे उसे पूर्वजन्मक सभी बातोंका स्मरण है । हे सुन्दरि! तुम्हें भी पूर्वजन्मकी बातोंका स्मरण है, अत: तुम सब कुछ भलीभाँति जाननेवाली हो । हे शोभने! अब इस ३२ जन्ममें तुम उसी सुदामाकी पत्नी बनोगी और बादमें शान्तस्वरूप भगवान् नारायणका पतिरूपमें वरण करोगी ॥ ३० – ३२३ ॥ ३३ दैवयोगसे उन्हीं भगवान् नारायणके शापसे तुम अपनी कलासे विश्वको पवित्र करनेवाली पावन वृक्षरूपमें प्रतिष्ठित होओगी । तुम समस्त ३४ पुष्पोंमें प्रधान मानी जाओगी और भगवान् विष्णुके लिये प्राणोंसे भी अधिक प्रिय रहोगी । तुम्हारे बिना की गयी सभी देवताओंकी पूजा व्यर्थ समझी ३५ जायगी । वृन्दावनमें वृक्षरूप तुम वृन्दावनी नामसे विख्यात रहोगी । समस्त गोप और गोपिकाएँ तुम्हारे पत्रोंसे ही भगवान् माधवकी पूजा करेंगे । तुम मेरे ३६ वरके प्रभावसे वृक्षोंकी अधिष्ठात्री देवी बनकर गोपस्वरूप भगवान् श्रीकृष्णके साथ स्वेच्छापूर्वक निरन्तर विहार करोगी ॥ ३३ - – ३६३ ॥ [ हे नारद! ] ब्रह्माजीकी यह वाणी सुनकर ३७ तुलसी मुसकराने लगी और उसका चित्त प्रफुल्लित हो गया । उसने ब्रह्माजीको प्रणाम किया और फिर वह उनसे कुछ कहने लगी ॥ ३७३ ॥

तुलसी बोली - हे तात! मैं यह सत्य कह रही ३८ हूँ कि दो भुजाओं वाले श्यामसुन्दर श्रीकृष्णके प्रति जैसी मेरी रुचि है, वैसी चार भुजाओंवाले श्रीविष्णुके लिये नहीं है; क्योंकि मैं दैवयोगसे शृंगार - भंग होनेके ३ ९ कारण गोविन्दसे अभी भी अतृप्त ही हूँ । मैं तो उन गोविन्दकी आज्ञामात्रसे ही चतुर्भुज श्रीहरिके लिये प्रार्थना कर रही हूँ । अब तो मैं आपकी कृपासे उन अत्यन्त दुर्लभ गोविन्दको निश्चितरूप से प्राप्त कर ४० लूँगी । हे प्रभो! साथ ही आप मुझे राधाके भयसे भी मुक्त कर दीजिये ॥ ३८–४०३ ॥ ब्रह्मदेव बोले – हे सुभगे! मैं तुम्हें भगवती राधिकाका सोलह अक्षरोंवाला मन्त्र प्रदान करता हूँ; ४१ । तुम इसे ग्रहण कर लो । तुम मेरे वरके प्रभावसे उन

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३ ९ ६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १८

तस्याश्च प्राणतुल्या त्वं मद्वरेण भविष्यसि ।

शृङ्गारं युवयोर्गोप्यं न ज्ञास्यति च राधिका ॥

राधासमा त्वं सुभगे गोविन्दस्य भविष्यसि ।

इत्येवमुक्त्वा दत्त्वा च देव्या वै षोडशाक्षरम् ॥

मन्त्रं चैव जगद्धाता स्तोत्रं च कवचं परम् ।

सर्वं पूजाविधानं च पुरश्चर्याविधिक्रमम् ॥

परां शुभाशिषं चैव पूजां चैव चकार सा ।

बभूव सिद्धा सा देवी तत्प्रसादाद्रमा यथा ॥

सिद्धं मन्त्रेण तुलसी वरं प्राप यथोदितम् ।

बुभुजे च महाभोगं यद्विश्वेषु च दुर्लभम् ॥

प्रसन्नमनसा देवी तत्याज तपसः क्लमम् ।

सिद्धे फले नराणां च दुःखं च सुखमुत्तमम् ॥

भुक्त्वा पीत्वा च सन्तुष्टा शयनं च चकार सा ।

तल्पे मनोरमे तत्र पुष्पचन्दनचर्चिते ॥

राधाके लिये प्राणतुल्य हो जाओगी । तुम दोनों ४२ ( श्रीकृष्ण और तुलसी ) - के गुप्त प्रेमको राधिका नहीं जान पायेंगी । राधाके समान ही तुम गोविन्दकी प्रेयसी हो जाओगी ॥ ४१-४२३ ॥ [ हे मुने! ] ऐसा कहकर जगत्की रचना करनेवाले ४३ ब्रह्माने देवी तुलसीको भगवती राधाके षोडशाक्षर– मन्त्र, स्तोत्र, उत्तम कवच, समस्त पूजाविधान और पुरश्चर्याविधिके क्रम बता करके उसे उत्तम शुभाशीर्वाद ४४ प्रदान किया । तत्पश्चात् तुलसीने [ पूर्वोक्त विधिसे भगवती राधाका ] पूजन किया और उनकी कृपासे वह देवी तुलसी भगवती लक्ष्मीके समान सिद्ध हो ४५ | गयी ॥ ४३–४५ ॥ ब्रह्माजीने जैसा कहा था, उस मन्त्रके प्रभावसे ठीक वैसा ही वर तुलसीको प्राप्त हो गया । उसने ४६ विश्वमें दुर्लभ महान् सुखोंका भोग किया । मन प्रसन्न हो जानेके कारण उस देवीके तपस्याजनित सभी कष्ट दूर हो गये; क्योंकि फलकी प्राप्ति हो जानेके बाद मनुष्योंका दुःख उत्तम सुखमें परिणत हो

४७ जाता है । ४६-४७ ॥

तदनन्तर भोजन - पानादि करके तथा सन्तुष्ट होकर उस तुलसीने पुष्प - चन्दनसे चर्चित मनोहर ४८ शय्यापर शयन किया ॥ ४८ ॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां नवमस्कन्धे नारायणनारदसंवादे धर्मध्वजसुतातुलस्युपाख्यानवर्णनं नाम सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७ ॥

अथाष्टादशोऽध्यायः तुलसीको स्वप्न में शंखचूड़का दर्शन, ब्रह्माजीका शंखचूड़ तथा तुलसीको श्रीनारायण उवाच तुलसी परितुष्टा च सुष्वाप हृष्टमानसा नवयौवनसम्पन्ना वृषध्वजवराङ्गना चिक्षेप पञ्चबाणश्च पञ्चबाणांश्च तां प्रति पुष्पायुधेन सा दग्धा पुष्पचन्दनचर्चिता विवाहके लिये आदेश देना श्रीनारायण बोले- [ हे नारद! ] एक समयकी । बात है— वृषध्वजकी नवयौवनसम्पन्न कन्या तुलसी ॥ १ अत्यन्त सन्तुष्ट तथा प्रसन्नचित्त होकर शयन कर रही थी ॥ १ ॥

उसी समय कामदेवने उसपर अपने पाँचों बाण चला दिये । पुष्प तथा चन्दनसे अनुलिप्त अंगोंवाली । वह कन्या कामदेवके पुष्प - बाणसे परितप्त हो गयी । ॥ २ उसका सारा अंग पुलकित हो उठा, उसके शरीर में

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अ ० १८ ]

पुलकाङ्कितसर्वाङ्गी कम्पितारक्तलोचना ।

क्षणं सा शुष्कतां प्राप क्षणं मूर्च्छामवाप ह ॥

क्षणमुद्विग्नतां प्राप क्षणं तन्द्रां सुखावहाम् ।

क्षणं च दहनं प्राप क्षणं प्राप प्रसन्नताम् ॥

क्षणं सा चेतनां प्राप क्षणं प्राप विषण्णताम् ।

उत्तिष्ठन्ती क्षणं तल्पाद् गच्छन्ती निकटे क्षणम् ॥

भ्रमन्ती क्षणमुद्वेगान्निवसन्ती क्षणं पुनः ।

क्षणमेव समुद्वेगात्सुष्वाप पुनरेव सा ॥

पुष्पचन्दनतल्पं च तद् बभूवातिकण्टकम् ।

विषहारि सुखं दिव्यं सुन्दरं च फलं जलम् ॥

निलयं च बिलाकारं सूक्ष्मवस्त्रं हुताशनः ।

सिन्दूरपत्रकं चैव व्रणतुल्यं च दुःखदम् ॥

क्षणं ददर्श तन्द्रायां सुवेषं पुरुषं सती ।

सुन्दरं च युवानं च सस्मितं रसिकेश्वरम् ॥

चन्दनोक्षितसर्वाङ्गं रत्नभूषणभूषितम् ।

आगच्छन्तं माल्यवन्तं पिबन्तं तन्मुखाम्बुजम् ॥

कथयन्तं रतिकथां ब्रुवन्तं मधुरं मुहुः ।

सम्भुक्तवन्तं तल्पे च समाश्लिष्यन्तमीप्सितम् ॥

पुनरेव तु गच्छन्तमागच्छन्तं च सन्निधौ ।

यान्तं क्व यासि प्राणेश तिष्ठत्येवमुवाच सा ॥

पुनश्च चेतनां प्राप्य विललाप पुनः पुनः ।

एवं सा यौवनं प्राप्य तस्थौ तत्रैव नारद ॥

शङ्खचूडो महायोगी जैगीषव्यान्मनोहरम् । कृष्णमन्त्रं च सम्प्राप्य कृत्वा सिद्धं तु पुष्करे । नवम स्कन्ध ३ ९ ७ कँपकँपी होने लगी और उसकी आँखें लाल हो गयीं । ३ वह क्षणभरमें सूख जाती थी और दूसरे क्षणमें मूर्च्छित हो जाती थी, पुनः क्षणभरमें उद्विग्न हो उठती थी और फिर क्षणभरमें सुखदायक तन्द्रासे युक्त हो जाती थी । वह क्षणभरमें उत्तप्त हो जाती थी और फिर तुरंत ४ प्रसन्न हो जाती थी । क्षणभरमें सचेत हो जाती थी और क्षणमें विषादग्रस्त हो जाती थी । वह कभी शय्यासे उठती हुई, कभी क्षणभरमें पासमें ही टहलती ५ हुई, क्षणभरमें उद्वेगपूर्वक घूमती हुई और क्षणभरमें बैठती हुई दिखायी पड़ती थी और फिर क्षणभरमें ही अत्यन्त उद्विग्न होकर अपनी शय्यापर पुनः सो जाती ६ थी॥२–६ ॥ पुष्प तथा चन्दनसे सुसज्जित शय्या उसे काँटों-जैसी लगने लगी, दिव्य सुख और सुन्दर फल तथा ७ जल उसके लिये विषतुल्य हो गये । उसे अपना भव्य भवन बिलके समान, शरीरके कोमल वस्त्र अग्निके समान और मस्तकका सिन्दूर दुःखदायी व्रणके समान ८ लगने लगा ॥ ७-८ ॥ थोड़ी देरमें तन्द्राकी अवस्थामें उस साध्वी तुलसीने सुन्दर वेष धारण किये हुए, अपने सभी ९ अंगोंमें चन्दन लगाये हुए तथा रत्नमय आभूषणोंसे अलंकृत एक सुन्दर युवा अवस्थावाले, मुसकानयुक्त तथा परम रसिक पुरुषको देखा । मालासे सुशोभित १० वह युवक उसके मुखकमलका पान करनेके लिये उसकी ओर आ रहा था, वह निरन्तर रतिक्रीड़ा-सम्बन्धी कथाएँ कह रहा था और मधुर मधुर बोल रहा था तथा सहसा अपनी भुजाओंमें आलिंगित ११ करके शय्यापर विहार कर रहा था । कुछ ही क्षणोंमें वह चला गया और फिर पास आ गया । इसके बाद पुन: जाते हुए उस युवकसे तुलसीने कहा—— -'हे १२ प्राणनाथ! आप कहाँ जा रहे हैं? बैठ जाइये । ' तत्पश्चात् जाग जानेपर वह तुलसी बार - बार विलाप करने लगी । हे नारद! इस प्रकार युवावस्थाको १३ प्राप्तकर वह तुलसी वहींपर स्थित रही॥९ –१३ ॥। शंखचूड़ जैगीषव्यमुनिसे श्रीकृष्णका मनोहर मन्त्र प्राप्त करके और उस मन्त्रको पुष्कर क्षेत्रमें सिद्ध १४ । करके महान् योगी हो गया था । सभी मंगलोंका भी

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३ ९ ८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १८

कवचं च गले बद्ध्वा सर्वमङ्गलमङ्गलम् ।

ब्रह्मणश्च वरं प्राप्य यत्ते मनसि वाञ्छितम् ॥ १५

आज्ञया ब्रह्मणः सोऽपि बदरीं च समाययौ ।

आगच्छन्तं शङ्खचूडं ददर्श तुलसी मुने ॥ १६

नवयौवनसम्पन्नं कामदेवसमप्रभम् ।

श्वेतचम्पकवर्णाभं रत्नभूषणभूषितम् ॥ १७

शरत्पार्वणचन्द्रास्यं शरत्पङ्कजलोचनम् ।

रत्नसारविनिर्माणविमानस्थं मनोहरम् ॥ १८ ।

रत्नकुण्डलयुग्मेन गण्डस्थलविराजितम् ।

पारिजातप्रसूनानां मालावन्तं च सुस्मितम् ॥ १ ९

कस्तूरीकुङ्कुमायुक्तं सुगन्धिचन्दनान्वितम् ।

सा दृष्ट्वा सन्निधावेनं मुखमाच्छाद्य वाससा ॥ २०

सस्मिता तं निरीक्षन्ती सकटाक्षं पुनः पुनः ।

बभूवातिनम्रमुखी नवसङ्गमलज्जिता ॥ २१

शरदिन्दुविनिन्द्यैकस्वमुखेन्दुविराजिता ।

अमूल्यरत्ननिर्माणयावकावलिसंयुता ॥२२

मणीन्द्रसार निर्माणक्वणन्मञ्जीररञ्जिता दधती कबरीभारं मालतीमाल्यसंयुतम् ॥ २३ अमूल्यरत्ननिर्माणमकराकृतिकुण्डला चित्रकुण्डलयुग्मेन गण्डस्थलविराजिता ॥ २४

रत्नेन्द्रसारहारेण स्तनमध्यस्थलोज्वला ।

रत्नकङ्कणकेयूरशङ्खभूषणभूषिता ॥ २५

रत्नाङ्गुलीयकैर्दिव्यैरङ्गुल्यावलिराजिता दृष्ट्वा तां ललितां रम्यां सुशीलां सुन्दरीं सतीम् ॥ २६ उवास तत्समीपे तु मधुरं तामुवाच सः । मंगल करनेवाले उस कवचको गलेमें बाँधकर और ब्रह्माजीसे ' जो तुम्हारे मनमें अभिलषित हो, वह पूर्ण हो जाय ' - ऐसा वर प्राप्तकर वह शंखचूड़ भी ब्रह्माकी आज्ञासे बदरीवन आ गया ॥ १४-१५३ ॥ हे मुने! तुलसीने आते हुए शंखचूड़को देख लिया । वह नवयौवनसे सम्पन्न था, उसकी कान्ति कामदेवके समान थी, उसका वर्ण श्वेत चम्पाकी आभाके समान था, वह रत्नमय आभूषणोंसे सुशोभित था, उसका मुखमण्डल शरत्पूर्णिमाके चन्द्रमाके समान था, उसके नेत्र शरत्कालीन कमलसदृश थे, वह अमूल्य रत्नोंसे निर्मित विमानपर विराजमान था, वह अत्यन्त मनोहर था, दो रत्नमय कुण्डलोंसे उसका गण्डस्थल शोभायमान था, उसने पारिजात पुष्पोंकी माला धारण कर रखी थी, उसका मुखमण्डल मुसकानसे भरा हुआ था और उसका सर्वांग कस्तूरी, कुमकुमसे युक्त तथा सुगन्धित चन्दनसे अनुलिप्त था - ऐसे शंखचूड़को अपने पास देखकर वस्त्रसे अपना मुख ढँककर मुसकराती हुई तथा कटाक्षके साथ बार - बार उसकी ओर देखती हुई तुलसीने नवमिलनके कारण लज्जावश अपना मुख नीचेकी ओर झुका लिया ॥ १६ - २१ ॥ उसका चन्द्रसदृश मुख शरत्पूर्णिमाके चन्द्रमाको भी लज्जित कर रहा था, बहुमूल्य रत्नोंसे निर्मित नूपुरोंकी पंक्तिसे वह सुशोभित हो रही थी, सर्वोत्तम मणिसे निर्मित तथा सुन्दर शब्द करती हुई करधनीसे वह सुशोभित हो रही थी, वह मालतीके पुष्पों की मालासे सम्पन्न केशपाश धारण किये हुई थी, उसने बहुमूल्य रत्नोंसे बने हुए मकराकृत कुण्डल अपने कानोंमें धारण कर रखे थे, चित्रमय दो कुण्डलोंसे उसका गण्डस्थल सुशोभित था, सर्वोत्तम रत्नोंसे निर्मित हारके द्वारा उसके वक्ष: स्थलका मध्यभाग उज्ज्वल दिखायी दे रहा था, रत्नमय कंकण - केयूर - शंख आदि आभूषणोंसे वह सुशोभित थी । रत्नजटित दिव्य अँगूठियाँ उसकी अँगुलियोंको सुशोभित कर रही थीं - ऐसी भव्य, रमणीय, सुशील, सुन्दर तथा साध्वी तुलसीको देखकर वह शंखचूड़ उसके पास बैठ गया और मधुर वाणीमें उससे कहने लगा ॥ २२–२६३ ॥

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अ ० १८ ] नवम स्कन्ध ३ ९९ शङ्खचूड उवाच का त्वं कस्य च कन्या च धन्या मान्या च योषिताम् ॥

का त्वं मानिनि कल्याणि सर्वकल्याणदायिनि ।

मौनीभूते किङ्करे मां सम्भाषां कुरु सुन्दरि ॥

इत्येवं वचनं श्रुत्वा सकामा वामलोचना ।

सस्मिता नम्रवदना सकामं तमुवाच सा ॥

तुलस्युवाच

धर्मध्वजसुताहं च तपस्यायां तपोवने ।

तपस्विन्यहं तिष्ठामि कस्त्वं गच्छ यथासुखम् ॥

कामिनीं कुलजातां च रहस्येकाकिनीं सतीम् ।

न पृच्छति कुले जात इत्येवं मे श्रुतौ श्रुतम् ॥

लम्पटो s सत्कुले जातो धर्मशास्त्रार्थवर्जितः ।

येनाश्रुतः श्रुतेरर्थः स कामीच्छति कामिनीम् ॥

आपातमधुरां मत्तामन्तकां पुरुषस्य ताम् ।

विषकुम्भाकाररूपाममृतास्यां च सन्ततम् ॥

हृदये क्षुरधाराभां शश्वन्मधुरभाषिणीम् ।

स्वकार्यपरिनिष्पत्त्यै तत्परां सततं च ताम् ॥

कार्यार्थे स्वामिवशगामन्यथैवावशां सदा ।

स्वान्तर्मलिनरूपां च प्रसन्नवदनेक्षणाम् ॥

श्रुतौ पुराणे यासां च चरित्रमतिदूषितम् ।

तासु को विश्वसेत्प्राज्ञः प्रज्ञावांश्च दुराशयः ॥

तासां को वा रिपुर्मित्रं प्रार्थयन्ति नवं नवम् ।

दृष्ट्वा सुवेषं पुरुषमिच्छन्ति हृदये सदा ॥

शंखचूड़ बोला- हे मानिनि! हे कल्याणि! २७ हे सर्वकल्याणदायिनि! तुम कौन हो और किसकी कन्या हो? तुम समस्त स्त्रियोंमें धन्य तथा मान्य हो । हे सुन्दरि! स्तब्ध हुए मुझ सेवकसे वार्तालाप करो ॥ २७-२८ ॥ शंखचूड़का यह वचन सुनकर सुन्दर नेत्रोंवाली तथा २८ कामयुक्त तुलसी उस कामपीड़ित शंखचूड़से मुसकराते हुए तथा नीचे की ओर मुख झुकाकर कहने लगी ॥ २ ९ ॥ तुलसी बोली- मैं धर्मध्वजकी पुत्री हूँ और २ ९ | इस तपोवनमें तपस्या करनेके निमित्त एक तपस्विनीके रूपमें रह रही हूँ । आप कौन हैं? आप यहाँसे सुखपूर्वक चले जाइये । श्रेष्ठ कुलमें उत्पन्न पुरुष उच्च कुलमें उत्पन्न किसी अकेली साध्वी कन्या साथ एकान्तमें बातचीत नहीं करते - ऐसा मैंने श्रुतिमें ३० सुना है॥३०-३१ ॥ जो नीच कुलमें उत्पन्न है तथा धर्मशास्त्रके ज्ञानसे वंचित है और जिसे श्रुतिका अर्थ सुननेका ३१ कभी अवसर नहीं मिला, वह दुराचारी व्यक्ति ही कामासक्त होकर परस्त्रीकी कामना करता है । स्त्री ऊपरसे बड़ी मधुर दिखायी देती है, किंतु सदा ३२ अभिमानमें चूर रहती है, पुरुषके लिये विनाशक होती है, वह विषसे परिपूर्ण ऐसे घटके सदृश होती है, जिसके मुखपर अमृत लगा हुआ हो, स्त्रीका हृदय छुरेकी धारके समान तीक्ष्ण होता है, किंतु ऊपरसे वह ३३ सदा मधुर बातें करती है, स्त्री अपना ही प्रयोजन सिद्ध करनेमें सदा तत्पर रहती है, अपने कार्यकी सिद्धिके लिये ही वह स्वामीके वशमें रहती है, ३४ अन्यथा वह सदा वशमें न रहनेवाली है, स्त्रीका हृदय अत्यन्त दूषित रहता है और उसके मुखमण्डल तथा नेत्रोंसे सदा प्रसन्नता झलकती रहती है ॥ ३२–३५ ॥ ३५ श्रुतियों तथा पुराणोंमें जिन स्त्रियोंका चरित्र अत्यन्त दूषित बताया गया है; बुरे विचारवाले व्यक्तिको छोड़कर ऐसा कौन विद्वान् तथा बुद्धिमान् होगा, जो उनपर विश्वास कर सकता है ॥३६ ॥

३६ उनका कौन शत्रु है और कौन मित्र? वे नित्य नये - नये पुरुषकी कामना करती हैं । वे किसी भी सुन्दर वेषयुक्त पुरुषको देखकर उसे मन - ही - मन ३७ । चाहने लगती हैं ॥ ३७ ॥

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४०० बाह्ये स्वार्थं सतीत्वं च ज्ञापयन्ती प्रयत्नतः । शश्वत्कामा च रामा च कामाधारा मनोहरा बाह्ये छलात्खेदयन्ती स्वान्तमैथुनमानसा । कान्तं हसन्ती रहसि बाह्येऽतीव सुलज्जिता मानिनी मैथुनाभावे कोपना कलहाङ्करा । सुप्रीता भूरिसम्भोगात्स्वल्पमैथुनदुःखिता

सुमिष्टान्नाच्छीततोयादाकाङ्क्षन्ती च मानसे ।

सुन्दरं रसिकं कान्तं युवानं गुणिनं सदा ॥

सुतात्परमभिस्नेहं कुर्वती रसिकोपरि ।

प्राणाधिकं प्रियतमं सम्भोगकुशलं प्रियम् ॥

पश्यन्ती रिपुतुल्यं च वृद्धं वा मैथुनाक्षमम् ।

कलहं कुर्वती शश्वत्तेन सार्धं सुकोपना ॥

वाचया भक्षयन्ती तं सर्प आखुमिवोल्बणम् ।

दुःसाहसस्वरूपा च सर्वदोषाश्रया सदा ॥

ब्रह्मविष्णुशिवादीनां दुःसाध्या मोहरूपिणी ।

तपोमार्गाला शश्वन्मोक्षद्वारकपाटिका ॥

हरेर्भक्तिव्यवहिता सर्वमायाकरण्डिका ।

संसारकारागारे च शश्वन्निगडरूपिणी ॥

इन्द्रजालस्वरूपा च मिथ्या च स्वप्नरूपिणी ।

बिभ्रती बाह्यसौन्दर्यमधोऽङ्गमतिकुत्सितम् ॥

नानाविण्मूत्रपूयानामाधारं मलसंयुतम् ।

दुर्गन्धिदोषसंयुक्तं रक्तारक्तमसंस्कृतम् ॥

श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १८ वे बाहरसे अपना हित साधनेके लिये अपने ॥ ३८ सतीत्वका प्रयत्नपूर्वक प्रदर्शन करती हैं, किंतु वास्तवमें सदा कामातुर रहती हैं । मनको आकृष्ट करनेवाली वे स्त्रियाँ कामदेवका आधारस्तम्भ होती हैं ॥ ३८ ॥

स्त्री बाहरसे छलपूर्वक [ अपनेको वासनावृत्तिसे ॥ ३ ९ रहित दिखाती हुई ] अपने प्रेमीको सन्तप्त करती है, किंतु मनमें समागमकी अभिलाषा रखती है । वह बाहरसे अत्यन्त लज्जित दीखती है, किंतु एकान्तमें ॥ ४० अपने प्रेमीके साथ हास - परिहास करती है ॥ ३ ९ ॥ रतिका सुयोग न मिलनेपर मानिनी स्त्री कुपित हो जाती है और कलह करने लगती है । यथेच्छ सम्भोग स्त्री प्रसन्न रहती है और स्वल्प सम्भोगसे ४१ दुःखी हो जाती है ॥४० ॥

स्त्री स्वादिष्ट भोजन और शीतल जलकी अपेक्षा सुन्दर, रसिक, गुणी तथा युवक पतिकी ही ४२ आकांक्षा अपने मनमें रखती है ॥ ४१ ॥

स्त्री अपने पुत्रसे भी अधिक स्नेह रसिक पुरुषपर रखती है । वह सम्भोगमें कुशल प्रेमीको अपने प्राणोंसे भी अधिक प्रिय समझती है ॥ ४२ ॥

४३ स्त्री वृद्ध तथा सम्भोग करनेमें अक्षम पुरुषको शत्रुके समान समझती है और वह अत्यन्त कुपित होकर उस पुरुषके साथ सदा कलह करती रहती है । ४४ जिस प्रकार सर्प चूहेपर झपटता है, उसी प्रकार स्त्री वैसे पुरुषको बात - बातपर खाने दौड़ती है । नारी दुःसाहसकी मूर्ति तथा सर्वदा समस्त दोषोंकी आश्रयस्थली है ॥ ४३-४४ ॥ ४५ ब्रह्मा, विष्णु, शिव आदि देवताओंके लिये भी स्त्री दुःसाध्य है । मोहस्वरूपिणी नारी तपस्याके मार्गमें अर्गलादण्डके समान और मोक्षके द्वारपर ४६ कपाटके समान बाधक होती है । वह भगवान्‌की भक्तिमें बाधा डालनेवाली तथा सभी प्रकारकी मायाकी पिटारी है । वह संसाररूपी कारागारमें सदा जकड़े रखनेके लिये जंजीरके समान है । स्त्री इन्द्रजालस्वरूप ४७ तथा स्वप्नके समान मिथ्या कही गयी है । स्त्री बाह्य सौन्दर्य तो धारण करती है, किंतु इसके भीतरी अंग अत्यन्त कुत्सित रहते हैं । स्त्रीका शरीर विष्ठा - मूत्र-४८ | पीब आदिका आधार, मलयुक्त, दुर्गन्धि - दोषसे परिपूर्ण,

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अ ० १८ ] नवम

मायारूपा मायिनां च विधिना निर्मिता पुरा ।

विषरूपा मुमुक्षूणामदृश्याप्यभिवाञ्छताम् ॥ ४ ९

इत्युक्त्वा तुलसी तं तु विरराम च नारद ।

सस्मितः शङ्खचूडश्च प्रवक्तुमुपचक्रमे ॥ ५०

शङ्खचूड उवाच

त्वया यत्कथितं देवि न च सर्वमलीककम् ।

किञ्चित्सत्यमलीकं च किञ्चिन्मत्तो निशामय ॥ ५१

निर्मितं द्विविधं धात्रा स्त्रीरूपं सर्वमोहनम् ।

कृत्वा रूपं वास्तवं च प्रशस्यं चाप्रशंसितम् ॥ ५२

लक्ष्मीः सरस्वती दुर्गा सावित्री राधिकादिका ।

सृष्टिसूत्रस्वरूपा च आद्या सृष्टिर्विनिर्मिता ॥ ५३

एतासामंशरूपं च स्त्रीरूपं वास्तवं स्मृतम् ।

तत्प्रशस्यं यशोरूपं सर्वमङ्गलकारकम् ॥५४

शतरूपा देवहूती स्वधा स्वाहा च दक्षिणा ।

छायावती रोहिणी च वरुणानी शची तथा ॥ ५५

कुबेरस्य च पत्नी याप्यदितिश्च दितिस्तथा ।

लोपामुद्रानसूया च कोटभी तुलसी तथा ॥ ५६

अहल्यारुन्धती मेना तारा मन्दोदरी तथा ।

दमयन्ती वेदवती गङ्गा च मनसा तथा ॥ ५७

पुष्टिस्तुष्टिः स्मृतिर्मेधा कालिका च वसुन्धरा ।

षष्ठी मङ्गलचण्डी च मूर्तिश्च धर्मकामिनी ॥ ५८

स्वस्ति: श्रद्धा च शान्तिश्च कान्तिः क्षान्तिस्तथा परा ।

निद्रा तन्द्रा क्षुत्पिपासा सन्ध्या रात्रिदिनानि च ॥ ५ ९

सम्पत्तिर्धृतिकीर्ती च क्रिया शोभा प्रभा शिवा ।

यत्स्त्रीरूपं च सम्भूतमुत्तमं तु युगे युगे ॥ ६०

कलाकलांशरूपं च स्वर्वेश्यादिकमेव च ।

तदप्रशस्यं विश्वेषु पुंश्चलीरूपमेव च ॥ ६१

सत्त्वप्रधानं यद्रूपं तद्युक्तं च प्रभावतः ।

तदुत्तमं च विश्वेषु साध्वीरूपं प्रशंसितम् ॥ ६२

स्कन्ध ४०१ रक्तरंजित तथा अपवित्र रहता है । पूर्व समयमें ब्रह्माने स्त्रीका सृजन मायावी पुरुषोंके लिये मायास्वरूपिणीके रूपमें, मुमुक्षुजनोंके लिये विषस्वरूपिणीके रूपमें तथा उसकी कामना करनेवालोंके लिये अदृश्यरूपिणीके रूपमें किया था॥४५–४९ ॥ हे नारद! उस शंखचूड़से ऐसा कहकर जब तुलसी चुप हो गयी, तब उसने हँसकर कहना आरम्भ किया ॥ ५० ॥

शंखचूड़ बोला- हे देवि! तुमने जो कुछ कहा है, वह सब असत्य नहीं है, किंतु अब मुझसे भी कुछ सत्य तथा कुछ असत्यके विषयमें सुन लीजिये ॥ ५१ ॥

विधाताने सबको मोहित करनेवाला नारीरूप [ वास्तविक और अवास्तविक ] दो प्रकारसे रचा है — वास्तविक रूप प्रशंसनीय और दूसरा रूप निन्दनीय है । लक्ष्मी, सरस्वती, दुर्गा, सावित्री, राधा आदि आद्या शक्तियाँ सृष्टिकी सूत्ररूपा हैं, इन्हींसे सृष्टिका प्रारम्भ हुआ है ॥ ५२-५३ ॥ इन देवियोंके अंशसे प्रकट स्त्रीरूप वास्तविक कहा गया है; वह श्रेष्ठ, यशोरूप तथा समस्त मंगलोंका कारण है । शतरूपा, देवहूति, स्वधा, स्वाहा, दक्षिणा, छायावती, रोहिणी, वरुणानी, शची, कुबेरकी पत्नी, अदिति, दिति, लोपामुद्रा, अनसूया, कोटभी, तुलसी, अहल्या, अरुन्धती, मेना, तारा, मन्दोदरी, दमयन्ती, वेदवती, गंगा, मनसा, पुष्टि, तुष्टि, स्मृति, मेधा, कालिका, वसुन्धरा, षष्ठी, मंगलचण्डी, धर्मपत्नी मूर्ति, स्वस्ति, श्रद्धा, शान्ति, कान्ति, क्षान्ति, निद्रा, तन्द्रा, क्षुधा, पिपासा, सन्ध्या, दिवा, रात्रि, सम्पत्ति, धृति, कीर्ति, क्रिया, शोभा, प्रभा और शिवा — ये देवियाँ जो स्त्रीरूपमें प्रकट हैं, वे प्रत्येक युगमें श्रेष्ठ मानी गयी हैं ॥ ५४–६० ॥ जगदम्बाकी कलाके कलांशसे उत्पन्न जो स्वर्गकी दिव्य अप्सराएँ हैं, उन्हें अप्रशस्त तथा सम्पूर्ण लोकोंमें पुंश्चलीरूप कहा गया है ॥ ६१ ॥

स्त्रियोंका जो सत्त्व - प्रधान रूप है, वही सर्वथा समीचीन है । अपने प्रभावके कारण वे ही उत्तम तथा । साध्वीस्वरूप स्त्रियाँ सम्पूर्ण लोकोंमें प्रशंसित हैं ।