देवी भागवत उत्तरार्द्ध — पृष्ठ 51–60
देवी भागवत उत्तरार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 51–60
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५० तस्य पुत्रशतं राजन्निक्ष्वाकोरिति विश्रुतम् । विकुक्षिः प्रथमस्तेषां बलवीर्यसमन्वितः अयोध्यायां स्थितो राजा इक्ष्वाकुरिति विश्रुतः शकुनिप्रमुखाः पुत्राः पञ्चाशद् बलवत्तराः उत्तरापथदेशस्य रक्षितारः कृताः किल दक्षिणस्यां तथा राजन्नादिष्टास्तेन ते सुताः चत्वारिंशत्तथाष्टौ च रक्षणार्थं महात्मना अन्यौ द्वौ संस्थितौ पार्श्वे सेवार्थं तस्य भूपतेः श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ९ हे राजन्! ऐसा सुना गया है कि उन इक्ष्वाकुके ॥ ५३ एक सौ पुत्र हुए । उनमें सबसे बड़े विकुक्षि थे, जो बल तथा पराक्रमसे सम्पन्न थे ॥ ५३ ॥
। वे इक्ष्वाकु राजाके रूपमें अयोध्यामें निवास ॥ ५४ करते थे - यह बात प्रसिद्ध है । उनके शकुनि आदि पचास परम बलवान् पुत्र उत्तरापथ नामक देशके । रक्षक नियुक्त किये गये और हे राजन्! उनके जो ॥ ५५ अड़तालीस पुत्र थे, वे सब उन महात्मा इक्ष्वाकुके द्वारा दक्षिणी देशोंकी रक्षाके लिये आदेशित किये । गये । इनके अतिरिक्त अन्य दो पुत्र राजा इक्ष्वाकुकी ॥ ५६ । सेवाके लिये उनके पास रहने लगे ॥ ५४–५६ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां सप्तमस्कन्धे इक्ष्वाकुवंशवर्णनं नामाष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥
अथ नवमोऽध्यायः सूर्यवंशी राजाओंके वर्णनके क्रममें राजा व्यास उवाच
कदाचिदष्टकाश्राद्धे विकुक्षिं पृथिवीपतिः ।
आज्ञापयदसंमूढ मांसमानय सत्वरम् ॥ १
मेध्यं श्राद्धार्थमधुना वने गत्वा सुतादरात् ।
इत्युक्तोऽसौ तथेत्याशु जगाम वनमस्त्रभृत् ॥ २
गत्वा जघान बाणैः स वराहान्सूकरान्मृगान् ।
शशांश्चापि परिश्रान्तो बभूवाथ बुभुक्षितः ॥ ३
विस्मृता चाष्टका तस्य शशं चाददसौ वने ।
शेषं निवेदयामास पित्रे मांसमनुत्तमम् ॥ ४
प्रोक्षणाय समानीतं मांसं दृष्ट्वा गुरुस्तदा ।
अनर्हमिति तज्ज्ञात्वा चुकोप मुनिसत्तमः ॥ ५
भुक्तशेषं तु न श्राद्धे प्रोक्षणीयमिति स्थितिः ।
राज्ञे निवेदयामास वसिष्ठः पाकदूषणम् ॥ ६
ककुत्स्थ, युवनाश्व और मान्धाताकी कथा व्यासजी बोले – हे राजन्! किसी समय अष्टका - श्राद्धके अवसरपर बुद्धिमान् भूपति इक्ष्वाकुने विकुक्षिको आज्ञा दी कि हे पुत्र! इस समय वनमें जाकर श्राद्धके लिये शीघ्र ही आदरपूर्वक पवित्र कव्य ले आओ ॥ १३ ॥
राजाके इस प्रकार कहनेपर विकुक्षि आयुध धारण करके तुरंत वनकी ओर चल पड़ा । वहाँ जाकर वह थक गया तथा भूखसे व्याकुल हो उठा । इस कारणसे वह अष्टका - श्राद्धकी बात भूल गया और उसने वनमें ही एकत्रित किये गये श्राद्धद्रव्यके कुछ अंशका भक्षण कर लिया और बचा हुआ लाकर पिताजीको दे दिया । तब प्रोक्षणके निमित्त समक्ष लाये गये उस कव्यको देखकर और फिर उसे श्राद्धके लिये अनुपयुक्त जानकर मुनिश्रेष्ठ गुरु वसिष्ठ अत्यन्त कुपित हो उठे ॥ २–५ ॥ ' भोजनसे शेष बचे हुए द्रव्यका श्राद्धमें प्रोक्षण नहीं करना चाहिये - ऐसा नियम है ' – इस पाकदोषके । विषयमें वसिष्ठने राजाको बता दिया ॥ ६ ॥
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अ ० ९ ] सप्तम
पुत्रस्य कर्म तज्ज्ञात्वा भूपतिर्गुरुणोदितम् ।
चुकोप विधिलोपात्तं देशान्निःसारयत्ततः ॥ ७ ।
शशाद इति विख्यातो नाम्ना जातो नृपात्मजः ।
गतो वने शशादस्तु पितृकोपादसम्भ्रमः ॥ ८
वन्येन वर्तयन्कालं नीतवान् धर्मतत्परः ।
पितर्युपरते राज्यं प्राप्तं तेन महात्मना ॥ ९
शशादस्त्वकरोद्राज्यमयोध्यायाः पतिः स्वयम् ।
यज्ञाननेकशः पूर्णांश्चकार सरयूतटे ॥ १०
शशादस्याभवत्पुत्रः ककुत्स्थ इति विश्रुतः ।
तस्यैव नामभेदाद्वै इन्द्रवाहः पुरञ्जयः ॥ ११
जनमेजय उवाच
नामभेदः कथं जातो राजपुत्रस्य चानघ ।
कारणं ब्रूहि मे सर्वं कर्मणा येन चाभवत् ॥ १२
व्यास उवाच शशादे स्वर्गते राजा ककुत्स्थ इति चाभवत् । ( राज्यं चकार धर्मज्ञः पितृपैतामहं बलात् । ) एतस्मिन्नन्तरे देवा दैत्यैः सर्वे पराजिताः ॥ १३
जग्मुस्त्रिलोकाधिपतिं विष्णुं शरणमव्ययम् ।
तान्प्रोवाच महाविष्णुस्तदा देवान्सनातनः ॥ १४
विष्णुरुवाच
पाणिग्राहं महीपालं प्रार्थयन्तु शशादजम् ।
स हनिष्यति वै दैत्यान्संग्रामे सुरसत्तमाः ॥ १५
आगमिष्यति धर्मात्मा साहाय्यार्थं धनुर्धरः ।
पराशक्तेः प्रसादेन सामर्थ्यं तस्य चातुलम् ॥ १६
हरेः सुवचनाद्देवा ययुः सर्वे सवासवाः ।
अयोध्यायां महाराज शशादतनयं प्रति ॥ १७
तानागतान् सुरान् राजा पूजयामास धर्मतः ।
पप्रच्छागमने राजा प्रयोजनमतन्द्रितः ॥ १८
स्कन्ध ५१ गुरु वसिष्ठके कथनानुसार अपने पुत्र विकुक्षिका वह दुष्कर्म जानकर विधिलोपके कारण उन्होंने उसे अपने देशसे बाहर निकाल दिया । वह राजकुमार तभीसे ' शशाद ' – इस नामसे विख्यात हो गया । वह शशाद पिता कोपसे किंचित् भयभीत होकर वनमें चला गया ॥ ७-८ ॥ वह विकुक्षि वहाँ वन्य आहारपर जीवनयापन करते हुए धर्मपरायण होकर रहने लगा । तत्पश्चात् पिताकी मृत्यु हो जानेपर उस मनस्वी शशादको राज्य प्राप्त हो गया और वह शासन करने लगा । उस अयोध्यापति शशादने स्वयं सरयूनदीके तटपर अनेक यज्ञ सम्पन्न किये ॥ ९ -१० ॥ उस शशादको एक पुत्र हुआ जो ' ककुत्स्थ ' -इस नामसे प्रसिद्ध हुआ । उस ककुत्स्थके इन्द्रवाह और पुरंजय - ये दो नाम और भी थे ॥ ११ ॥
जनमेजय बोले — हे निष्पाप मुने! उस राजकुमारके अनेक नाम कैसे हुए? उसके जिस - जिस कर्मके कारण ये नाम हुए, वह सब मुझे बताइये ॥ १२ ॥
व्यासजी बोले - हे राजन्! शशादके स्वर्गवासी हो जानेपर ‘ ककुत्स्थ ' राजा बने । ( वे धर्मज्ञ ककुत्स्थ पिता - पितामहसे परम्पराप्राप्त राज्यपर बलपूर्वक शासन करने लगे । ) उसी समय सभी देवगण दैत्योंसे पराजित होकर तीनों लोकोंके स्वामी अविनाशी भगवान् विष्णुकी शरणमें गये । तब सनातन भगवान् श्रीहरि उन देवताओंसे कहने लगे॥१३-१४ ॥ भगवान् विष्णु बोले – हे श्रेष्ठ देवगण! आपलोग शशादपुत्र राजा ककुत्स्थसे युद्धमें सहायक बननेके लिये प्रार्थना कीजिये । वे ही युद्धमें दैत्योंको मार सकेंगे । वे धर्मात्मा ककुत्स्थ धनुष धारण करके सहायता के लिये अवश्य आयेंगे । भगवती पराशक्तिकी कृपासे उनके पास अतुलनीय सामर्थ्य है ॥ १५-१६ ॥ हे महाराज! भगवान् विष्णुकी यह उत्तम वाणी सुनकर इन्द्रसमेत सभी देवतागण अयोध्यामें रहनेवाले शशादपुत्र महाराज ककुत्स्थके पास जा पहुँचे ॥ १७ ॥
राजा ककुत्स्थने उन आये हुए देवताओंका धर्मपूर्वक अत्यन्त उत्साहके साथ पूजन किया और । इसके बाद वे उनसे आनेका प्रयोजन पूछने लगे ॥ १८ ॥
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५२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ९ राजोवाच
धन्योऽहं पावितश्चास्मि जीवितं सफलं मम ।
यदागत्य गृहे देवा ददुश्च दर्शनं महत् ॥
ब्रुवन्तु कृत्यं देवेशा दुःसाध्यमपि मानवैः ।
करिष्यामि महत्कार्यं सर्वथा भवतां महत् ॥
देवा ऊचुः
साहाय्यं कुरु राजेन्द्र सखा भव शचीपतेः ।
संग्रामे जय दैत्येन्द्रान्दुर्जयांस्त्रिदशैरपि ॥
पराशक्तिप्रसादेन दुर्लभं नास्ति ते क्वचित् ।
विष्णुना प्रेरिताश्चैवमागतास्तव सन्निधौ ॥
राजोवाच
पाणिग्राहो भवाम्यद्य देवानां सुरसत्तमाः ।
इन्द्रो मे वाहनं तत्र भवेद्यदि सुराधिपः ॥
संग्रामं तु करिष्यामि दैत्यैर्देवकृतेऽधुना ।
आरुह्येन्द्रं गमिष्यामि सत्यमेतद् ब्रवीम्यहम् ॥
तदोचुर्वासवं देवाः कर्तव्यं कार्यमद्भुतम् ।
पत्रं भव नरेन्द्रस्य त्यक्त्वा लज्जां शचीपते ॥
लज्जमानस्तदा शक्रः प्रेरितो हरिणा भृशम् ।
बभूव वृषभस्तूर्णं रुद्रस्येवापरो महान् ॥
तमारुरोह राजासौ संग्रामगमनाय वै ।
स्थितः ककुदि येनास्य ककुत्स्थस्तेन चाभवत् ॥
इन्द्रो वाहः कृतो येन तेन नाम्नेन्द्रवाहकः ।
पुरं जितं तु दैत्यानां तेनाभूच्च पुरञ्जयः ॥
जित्वा दैत्यान्महाबाहुर्धनं तेषां प्रदत्तवान् ।
पप्रच्छ चैवं राजर्षेरिति सख्यं बभूव ह ॥
राजा बोले- हे देवगण! हो गया; मेरा जीवन सार्थक हो लोगोंने मेरे घर पधारकर मुझे १ ९ दिया है । हे देवेश्वरो! आप विषयमें बतलाएँ । आपका वह लिये परम दुःसाध्य ही हो, मैं मैं धन्य और पवित्र गया, जो कि आप -अपना महनीय दर्शन मुझे अपने कार्यके कार्य चाहे मनुष्यों के वह महान् कार्य हर २० प्रकारसे सम्पन्न करूँगा ॥ १ ९ -२० ॥ देवता बोले- हे राजेन्द्र! हमारी सहायता कीजिये; शचीपति इन्द्रके सखा बन जाइये और देवताओंके लिये भी अजेय महान् दैत्योंको युद्धमें २१ परास्त कर दीजिये । पराशक्ति जगदम्बाके अनुग्रहसे आपके लिये कुछ भी दुर्लभ नहीं है । भगवान् विष्णुके भेजने पर ही हमलोग आपके पास आये २२ हैं॥२१-२२ ॥ राजा बोले- हे श्रेष्ठ देवतागण! यदि इन्द्र उस युद्धमें मेरा वाहन बनें तो मैं अभी देवताओंकी ओरसे सेनापति बन जाऊँगा । मैं इसी समय इन्द्रपर आरूढ़ २३ होकर युद्धक्षेत्रमें जाऊँगा और देवताओंके लिये युद्ध करूँगा, मैं यह सत्य कह रहा हूँ ॥ २३-२४ ॥ तब देवताओंने इन्द्रसे कहा- हे शचीपते । [ इस २४ समय ] आपको यह अद्भुत कार्य करना है । आप लज्जा छोड़कर राजा ककुत्स्थका वाहन बन जाइये ॥ २५ ॥
उस समय इन्द्र बड़े संकोचमें पड़ गये, फिर २५ भगवान् श्रीहरिके बार - बार प्रेरणा करनेपर वे तुरंत एक ऐसे वृषभके रूपमें प्रकट हो गये मानो भगवान् रुद्रके दूसरे महान् नन्दी ही हों ॥ २६ ॥
तब संग्राममें जानेके लिये वे राजा उस वृषभपर २६ चढ़े और उसके ककुदपर बैठे, इसी कारणसे वे ' ककुत्स्थ ' नामवाले हो गये । उन्होंने इन्द्रको अपना वाहन बनाया था, इसलिये वे ' इन्द्रवाहक ' नामसे २७ प्रसिद्ध हुए और उन्होंने दैत्योंके पुर ( नगर ) –पर विजय प्राप्त की थी, इसलिये वे ' पुरंजय ' नामवाले भी हो गये ॥ २७-२८ ॥ २८ तत्पश्चात् उन महाबाहु ककुत्स्थने दैत्योंको जीतकर उनका धन देवताओंको दे दिया और [ फिर वहाँसे प्रस्थान करनेके लिये देवताओंसे ] पूछा । इस २ ९ । प्रकार इन्द्रके साथ राजर्षि ककुत्स्थकी मैत्री हुई ॥ २ ९ ॥
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अ ० ९ ] सप्तम
ककुत्स्थश्चातिविख्यातो नृपतिस्तस्य वंशजाः ।
काकुत्स्था भुवि राजानो बभूवुर्बहुविश्रुताः ॥ ३०
ककुत्स्थस्याभवत्पुत्रो धर्मपत्न्यां महाबलः ।
अनेना विश्रुतस्तस्य पृथुः पुत्रश्च वीर्यवान् ॥ ३१
विष्णोरंशः स्मृतः साक्षात्पराशक्तिपदार्थकः ।
विश्वरन्धिस्तु विज्ञेयः पृथोः पुत्रो नराधिपः ॥ ३२
चन्द्रस्तस्य सुतः श्रीमान् राजा वंशकरः स्मृतः ।
तत्सुतो युवनाश्वस्तु तेजस्वी बलवत्तरः ॥ ३३
शावन्तो युवनाश्वस्य जज्ञे परमधार्मिकः ।
शावन्ती निर्मिता तेन पुरी शक्रपुरीसमा ॥ ३४
बृहदश्वस्तु पुत्रोऽभूच्छावन्तस्य महात्मनः ।
कुवलयाश्वः सुतस्तस्य बभूव पृथिवीपतिः ॥ ३५
धुन्धुर्नामा हतो दैत्यस्तेनासौ पृथिवीतले ।
धुन्धुमारेति विख्यातं नाम प्रापातिविश्रुतम् ॥ ३६
पुत्रस्तस्य दृढाश्वस्तु पालयामास मेदिनीम् ।
दृढाश्वस्य सुतः श्रीमान्हर्यश्व इति कीर्तितः ॥ ३७
निकुम्भस्तत्सुतः प्रोक्तो बभूव पृथिवीपतिः ।
बर्हणाश्वो निकुम्भस्य कृशाश्वस्तस्य वै सुतः ॥ ३८
प्रसेनजित्कृशाश्वस्य बलवान्सत्यविक्रमः ।
तस्य पुत्रो महाभागो यौवनाश्वेति विश्रुतः ॥ ३ ९
यौवनाश्वसुतः श्रीमान्मान्धातेति महीपतिः ।
अष्टोत्तरसहस्त्रं तु प्रासादा येन निर्मिताः ॥ ४०
भगवत्यास्तु तुष्ट्यर्थं महातीर्थेषु मानद ।
मातृगर्भे न जातोऽसावुत्पन्नो जनकोदरे ॥ ४१
निःसारितस्ततः पुत्रः कुक्षिं भित्त्वा पितुः पुनः । स्कन्ध ५३ महाराज ककुत्स्थ महान् प्रसिद्ध राजा थे । उनके वंशमें उत्पन्न सभी राजा ' काकुत्स्थ ' नामसे पृथ्वीलोकमें अत्यधिक प्रसिद्ध हुए ॥३० ॥
राजा ककुत्स्थकी धर्मपत्नीके गर्भसे एक महाबली पुत्र हुआ, जो ' अनेना ' नामसे विख्यात हुआ । उस ‘ अनेना ' को एक पृथु नामक पराक्रमी पुत्र हुआ; उसे साक्षात् भगवान् विष्णुका अंश कहा गया है । वह पराशक्ति जगदम्बाके चरणोंका उपासक था, उन पृथुके पुत्ररूपमें राजा विश्वन्धिको जानना चाहिये ॥ ३१-३२ ॥ उन ' विश्वरन्धि ' के चन्द्र नामक परम ऐश्वर्यशाली पुत्र हुए, वे चन्द्रवंशकी वृद्धि करनेवाले कहे जाते हैं । उनके पुत्र युवनाश्व थे, जो परम तेजस्वी तथा महान् बलशाली थे ॥ ३३ ॥
उन युवनाश्वके ' शावन्त ' नामक परम धार्मिक पुत्र उत्पन्न हुए । उन्होंने इन्द्रपुरीके समान प्रतीत होनेवाली शावन्ती नामकी पुरीका निर्माण कराया ॥ ३४ ॥
उन महात्मा शावन्तके ' बृहदश्व ' नामक पुत्र हुए और बृहदश्वके पुत्र राजा कुवलयाश्व हुए । उन कुवलयाश्वने ' धुन्धु ' नामक दैत्यका संहार किया, तभीसे उन्होंने पृथ्वीलोकमें ' धुन्धुमार ' नामसे परम
प्रसिद्धि प्राप्त की । ३५-३६ ॥
उनके पुत्र दृढाश्व हुए, जिन्होंने पृथ्वीकी भलीभाँति रक्षा की । उन दृढाश्वके पुत्र श्रीमान् हर्यश्व कहे गये हैं ॥ ३७ ॥
उन हर्यश्वके ' निकुम्भ ' नामक पुत्र कहे गये हैं । वे महान् राजा हुए; निकुम्भके पुत्र बर्हणाश्व और उनके पुत्र कृशाश्व हुए ॥ ३८ ॥
उन कृशाश्वके प्रसेनजित् नामक बलवान् तथा सत्यपराक्रमी पुत्र उत्पन्न हुए और प्रसेनजित्के एक भाग्यशाली पुत्र उत्पन्न हुए, वे ' यौवनाश्व ' – इस नामसे प्रसिद्ध हुए ॥ ३ ९ ॥ उन यौवनाश्वके पुत्र श्रीमान् राजा मान्धाता थे । हे मानद! उन्होंने भगवती जगदम्बाको प्रसन्न करने के लिये महातीर्थों में एक हजार आठ देवालयोंका निर्माण कराया था । ये माताके गर्भ से जन्म न लेकर पिताके उदरसे उत्पन्न हुए थे । पिताकी कुक्षिका भेदनकर उन्हें वहाँसे निकाला गया था ॥ ४० - ४१३ ॥
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५४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ९ राजोवाच न श्रुतं न च दृष्टं वा भवता तदुदाहृतम् असम्भाव्यं महाभाग तस्य जन्म यथोदितम् विस्तरेण वदस्वाद्य मान्धातुर्जन्मकारणम् राजोदरे यथोत्पन्नः पुत्रः सर्वाङ्गसुन्दरः व्यास उवाच यौवनाश्वोऽनपत्योऽभूद्राजा परमधार्मिकः भार्याणां च शतं तस्य बभूव नृपतेर्नृप राजा चिन्तापरः प्रायश्चिन्तयामास नित्यशः अपत्यार्थे यौवनाश्वो दुःखितस्तु वनं गतः ऋषीणामाश्रमे पुण्ये निर्विण्णः स च पार्थिवः मुमोच दुःखितः श्वासांस्तापसानां च पश्यताम् दृष्ट्वा तु दुःखितं विप्रा बभूवुश्च कृपालवः तमूचुर्ब्राह्मणा राजन्कस्माच्छोचसि पार्थिव किं ते दुःखं महाराज ब्रूहि सत्यं मनोगतम् ॥ प्रतीकारं करिष्यामो दुःखस्य तव सर्वथा यौवनाश्व उवाच राज्यं धनं सदश्वाश्च वर्तन्ते मुनयो मम भार्याणां च शतं शुद्धं वर्तते विशदप्रभम् नारातिस्त्रिषु लोकेषु कोऽप्यस्ति बलवान्मम आज्ञाकरास्तु सामन्ता वर्तन्ते मन्त्रिणस्तथा एकं सन्तानजं दुःखं नान्यत्पश्यामि तापसाः अपुत्रस्य गतिर्नास्ति स्वर्गो नैव च नैव च तस्माच्छोचामि विप्रेन्द्राः सन्तानार्थं भृशं ततः राजा बोले- हे महाभाग [ व्यासजी! ] उन ॥ ४२ महाराज मान्धाताके जन्मके विषयमें जैसा आपने कहा है, वह तो असम्भव - सी घटना है, मैंने ऐसा न । तो सुना है और न देखा ही है । अब आप राजा ॥४३ मान्धाताके जन्मका वृत्तान्त विस्तारपूर्वक बताइये । वह सर्वांगसुन्दर पुत्र राजा यौवनाश्वके उदरसे जिस । प्रकार उत्पन्न हुआ, उसे कहिये ॥ ४२-४३३ ॥ व्यासजी बोले- हे राजन्! परम धर्मनिष्ठ राजा यौवनाश्व सन्तानहीन थे । उन महाराजकी ॥ ४४ एक सौ रानियाँ थीं, किंतु किसीसे भी सन्तान न होनेके कारण वे प्रायः चिन्तित रहते और । सन्तानके लिये नित्य सोचमें पड़े रहते थे । अन्तमें ॥ ४५ अत्यन्त दुःखित होकर वे यौवनाश्व वनमें चले गये ॥ ४४-४५३ ॥ । वहाँ ऋषियोंके पवित्र आश्रममें रहते हुए ॥ ४६ वे महाराज यौवनाश्व सदा खिन्न रहते थे और व्यथित होकर सदा दीर्घ श्वास छोड़ते रहते थे, । इसे वहाँ रहनेवाले तपस्वीजन बराबर देखा करते थे । उन्हें इस प्रकार दु: खित देखकर सभी विप्रोंको ॥ ४७ उनपर दया आ गयी । ब्राह्मणोंने उनसे पूछा-। हे राजन्! आप यह चिन्ता किसलिये कर रहे हैं? हे पार्थिव! आपको कौन - सा कष्ट है? हे महाराज! ४८ आप अपने मनकी बात सच - सच बताइये, हमलोग हर तरहसे आपका दुःख दूर करनेका उपाय । करेंगे ॥ ४६–४८३ ॥ यौवनाश्व बोले- हे मुनियो! मेरे पास राज्य, ॥ ४ ९ धन तथा उत्तम कोटिके बहुत - से घोड़े विद्यमान हैं; दिव्य प्रभासे युक्त एक सौ साध्वी रानियाँ मेरे पास हैं, । तीनों लोकोंमें मेरा कोई भी बलवान् शत्रु नहीं है और मेरे सभी मन्त्री तथा सामन्त सदा मेरे आज्ञापालनमें ॥ ५० तत्पर रहते हैं ॥४ ९ -५० ॥ । हे तपस्वियो! मुझे एकमात्र दुःख सन्तान न होनेका है; इसके अतिरिक्त दूसरा कोई भी दुःख ॥ ५१ मेरी दृष्टिमें नहीं है । हे विप्रेन्द्रो! पुत्रहीन व्यक्तिकी न तो सद्गति होती है और न उसे स्वर्ग ही मिलता । है, अतः सन्तानके लिये मैं सदा अत्यधिक शोकाकुल ॥ ५२ । रहता हूँ । हे तपस्वियो! आपलोग महान् परिश्रम
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अ ० ९ ] सप्तम
वेदशास्त्रार्थतत्त्वज्ञास्तापसाश्च कृतश्रमाः ।
इष्टिं सन्तानकामस्य युक्तां ज्ञात्वा दिशन्तु मे ॥ ५३
कुर्वन्तु मम कार्यं वै कृपा चेदस्ति तापसाः । व्यास उवाच तच्छ्रुत्वा वचनं राज्ञः कृपया पूर्णमानसाः ॥ ५४ कारयामासुरव्यग्रास्तस्येष्टिमिन्द्रदेवताम् कलशः स्थापितस्तत्र जलपूर्णस्तु वाडवैः ॥ ५५
मन्त्रितो वेदमन्त्रैश्च पुत्रार्थं तस्य भूपतेः ।
राजा तद्यज्ञसदनं प्रविष्टस्तृषितो निशि ॥ ५६
विप्रान्दृष्ट्वा शयानान्स पपौ मन्त्रजलं स्वयम् ।
भार्यार्थं संस्कृतं विप्रैर्मन्त्रितं विधिनोद्धृतम् ॥ ५७
पीतं राज्ञा तृषार्तेन तदज्ञानान्नृपोत्तम ।
व्युदकं कलशं दृष्ट्वा तदा विप्रा विशङ्किताः ॥ ५८
पप्रच्छुस्ते नृपं केन पीतं जलमिति द्विजाः ।
राज्ञा पीतं विदित्वा ते ज्ञात्वा दैवबलं महत् ॥ ५ ९
इष्टिं समापयामासुर्गतास्ते मुनयो गृहान् ।
गर्भं दधार नृपतिस्ततो मन्त्रबलादथ ॥ ६०
ततः काले स उत्पन्नः कुक्षिं भित्त्वाऽस्य दक्षिणाम् ।
पुत्रं निष्कासयामासुर्मन्त्रिणस्तस्य भूपतेः ॥ ६१
देवानां कृपया तत्र न ममार महीपतिः ।
कं धास्यति कुमारोऽयं मन्त्रिणश्चुकुशुर्भृशम् ॥ ६२
स्कन्ध ५५ करके वेद - शास्त्रोंके रहस्य जाननेवाले हैं, मुझ सन्तानकामीके लिये करणीय जो उपयुक्त यज्ञ हो, उसे सोच - समझकर मुझे बतायें । हे तापसो! यदि मुझपर आपलोगोंकी कृपा हो, तो मेरा यह कार्य सम्पन्न कर दें ॥ ५१–५३३ ॥ व्यासजी बोले - हे राजन्! राजा यौवनाश्वकी बात सुनकर दयासे परिपूर्ण हृदयवाले उन ब्राह्मणोंने इन्द्रको प्रधान देवता बनाकर अत्यन्त सावधानीपूर्वक उन नरेशसे एक यज्ञ करवाया । ब्राह्मणोंने वहाँपर जलसे परिपूर्ण एक कलश स्थापित कराया और राजा यौवनाश्वकी पुत्रप्राप्तिके निमित्त वेदमन्त्रोंके द्वारा उस कलशका अभिमन्त्रण किया ॥ ५४-५५३ ॥ राजा यौवनाश्वको रातमें प्यास लग गयी, जिससे वे यज्ञशालामें चले गये । [ वहाँ कहीं भी जल न देखकर तथा ] ब्राह्मणोंको सोता हुआ देखकर उन्होंने कलशवाला अभिमन्त्रित जल स्वयं ही पी लिया ॥ ५६३ ॥
हे नृपश्रेष्ठ! प्याससे व्याकुल राजा यौवनाश्व ब्राह्मणोंके द्वारा विधिपूर्वक अभिमन्त्रित करके रानीके लिये रखे गये उस पवित्र जलको अज्ञानपूर्वक पी गये ॥ ५७३ ॥
तत्पश्चात् कलशको जल - विहीन देखकर ब्राह्मण सशंकित हो गये । उन विप्रोंने राजा यौवनाश्वसे पूछा कि इस जलको किसने पीया है? ॥ ५८३ ॥
स्वयं राजा यौवनाश्वने जल पीया है – इस बातको जानकर और दैव सबसे बढ़कर बलवान् होता है - यह समझकर उन महर्षियोंने यज्ञ सम्पन्न किया और बादमें वे अपने- अपने घर चले गये ॥ ५ ९ ३ ॥ तदनन्तर मन्त्र के प्रभावसे राजा यौवनाश्वने गर्भ धारण कर लिया । तब गर्भके पूर्ण होनेपर राजाकी दाहिनी कोखका भेदन करके वे ( मान्धाता ) उत्पन्न हुए ॥ ६० ॥
राजाके मन्त्रियोंने पुत्रको बाहर निकाला । देवताओंकी कृपासे राजा यौवनाश्वकी मृत्यु नहीं हुई । तब चिन्तित होकर मन्त्रीलोग यह कहकर जोरसे चिल्ला उठे – यह कुमार किसका दूध पीयेगा? इतनेमें इन्द्रने उसके मुखमें अपनी तर्जनी अँगुली
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५६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १० तदेन्द्रो देशिनीं प्रादान्मां धातेत्यवदद्वचः । डाल दी और यह वचन कहा -'मां धाता ' अर्थात् यह मेरा दुग्ध - पान करेगा । वे ही मान्धाता नामक सोऽभवद् बलवान् राजा मान्धाता पृथिवीपतिः । महान् बलशाली राजा हुए । हे राजन्! इस प्रकार मैंने उनकी उत्पत्तिका विस्तारपूर्वक वर्णन आपसे कर तदुत्पत्तिस्तु भूपाल कथिता तव विस्तरात् ॥ ६३ । दिया ॥ ६१–६३ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां सप्तमस्कन्धे मान्धातोत्पत्तिवर्णनं नाम नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥
अथ दशमोऽध्यायः सूर्यवंशी राजा अरुणद्वारा राजकुमार भगवती जगदम्बाके व्यास उवाच
बभूव चक्रवर्ती स नृपतिः सत्यसङ्गरः ।
मान्धाता पृथिवीं सर्वामजयन्नृपतीश्वरः ॥ १
दस्यवोऽस्य भयत्रस्ता ययुर्गिरिगुहासु च ।
इन्द्रेणास्य कृतं नाम त्रसद्दस्युरिति स्फुटम् ॥ २
तस्य बिन्दुमती भार्या शशबिन्दोः सुताभवत् ।
पतिव्रता सुरूपा च सर्वलक्षणसंयुता ॥ ३
तस्यामुत्पादयामास मान्धाता द्वौ सुतौ नृप ।
पुरुकुत्सं सुविख्यातं मुचुकुन्दं तथापरम् ॥ ४
पुरुकुत्सात्ततोऽरण्यः पुत्रः परमधार्मिकः ।
पितृभक्तिरतश्चाभूद् बृहदश्वस्तदात्मजः ॥ ५
हर्यश्वस्तस्य पुत्रोऽभूद्धार्मिकः परमार्थवित् ।
तस्यात्मजस्त्रिधन्वाभूदरुणस्तस्य चात्मजः ॥ ६
अरुणस्य सुतः श्रीमान्सत्यव्रत इति श्रुतः ।
सोऽभूदिच्छाचरः कामी मन्दात्मा ह्यतिलोलुपः ॥ ७
स पापात्मा विप्रभार्यां हृतवान्काममोहितः ।
विवाहे तस्य विघ्नं स चकार नृपतेः सुतः ॥ ८
सत्यव्रतका त्याग, सत्यव्रतका वनमें मन्त्र जपमें रत होना व्यासजी बोले -- [ हे जनमेजय! ] वे महाराज मान्धाता सत्यप्रतिज्ञ तथा चक्रवर्ती नरेश हुए । उन राजाधिराजने सम्पूर्ण पृथ्वीको जीत लिया था ॥ १ ॥
उनके भयसे त्रस्त होकर सभी दस्यु ( लुटेरे ) पर्वतोंकी गुफाओंमें छिप गये थे । इसी कारण इन्द्रने इन्हें ' त्रसदस्यु ' इस नामसे विख्यात कर दिया ॥२ ॥
महाराज शशबिन्दुकी पुत्री बिन्दुमती उनकी भार्या थीं; जो पतिव्रता, रूपवती तथा सभी शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न थीं ॥ ३ ॥
हे राजन्! मान्धाताने उनसे दो पुत्र उत्पन्न किये । उनमें एक पुत्र पुरुकुत्स तथा दूसरा पुत्र मुचुकुन्द नामसे विख्यात हुआ ॥ ४ ॥
उसके बाद पुरुकुत्ससे अरण्य नामक एक पुत्र हुआ । वे परम धार्मिक तथा पितृभक्त थे । उनके पुत्र बृहदश्व थे । उन बृहदश्वके भी हर्यश्व नामक पुत्र हुए, जो परम धर्मिष्ठ तथा परमार्थज्ञानी थे । उनके पुत्र त्रिधन्वा हुए और त्रिधन्वाके अरुण नामक पुत्र हुए । अरुणका पुत्र सत्यव्रत नामसे प्रसिद्ध हुआ, वह परम ऐश्वर्यसे सम्पन्न था; किंतु वह स्वेच्छाचारी, कामी, मन्दबुद्धि तथा अत्यन्त लोभी निकला ॥ ५–७ ॥ एक समयकी बात है - उस पापीने कामासक्त होकर एक विप्रकी भार्याका अपहरण कर लिया । जब उस विप्रका विवाह कन्याके साथ हो रहा था, उसी समय विवाह - मण्डपमें ही उस राजकुमारने यह विघ्न उपस्थित किया था ॥ ८ ॥
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अ ० १० ]
मिलिता ब्राह्मणास्तत्र राजानमरुणं नृप ।
ऊचुर्भृशं सुदुःखार्ता हा हताः स्मेति चासकृत् ॥
पप्रच्छ राजा तान्विप्रान्दुःखितान्पुरवासिनः ।
किं कृतं मम पुत्रेण भवतामशुभं द्विजाः ॥
तन्निशम्य द्विजा वाक्यं राज्ञो विनयपूर्वकम् ।
तदोचुस्त्वरुणं विप्राः कृताशीर्वचना भृशम् ॥
ब्राह्मणा ऊचुः
राजंस्तव सुतेनाद्य विवाहे प्रहृता किल ।
विवाहिता विप्रकन्या बलेन बलिनांवर ॥
व्यास उवाच
श्रुत्वा तेषां वचस्तथ्यं राजा परमधार्मिकः ।
पुत्रमाह वृथा नाम कृतं ते दुष्टकर्मणा ॥
गच्छ दूरं सुमन्दात्मन्दुराचार गृहान्मम ।
न स्थातव्यं त्वया पाप विषये मम सर्वथा ॥
कुपितं पितरं प्राह क्व गच्छामीति वै मुहुः ।
अरुणस्तमथोवाच श्वपाकैः सह वर्तय ॥
श्वपचस्य कृतं कर्म द्विजदारापहारणम् ।
तस्मात्तैः सह संसर्गं कृत्वा तिष्ठ यथासुखम् ॥
नाहं पुत्रेण पुत्रार्थी त्वया च कुलपांसन ।
यथेष्टं व्रज दुष्टात्मन् कीर्तिनाशः कृतस्त्वया ॥
स निशम्य पितुर्वाक्यं कुपितस्य महात्मनः ।
निश्चक्राम पुरात्तस्मात्तरसा श्वपचान्ययौ ॥
सत्यव्रतस्तदा तत्र श्वपाकैः सह वर्तते ।
धनुर्बाणधरः श्रीमान्कवची करुणालयः ॥
सप्तम स्कन्ध ५७ हे राजन्! तत्पश्चात् सभी ब्राह्मण एक साथ ९ राजा अरुणके पास पहुँचे और अत्यधिक दु: खित होकर बार - बार कहने लगे- ' हाय, हमलोग मारे गये ' ॥ ९ ॥
१० तब राजा अरुणने दुःखसे पीड़ित उन नगरवासी ब्राह्मणोंसे पूछा - हे विप्रगण! मेरे पुत्रने आपलोगोंका क्या अनिष्ट किया है? ॥ १० ॥
तब राजाकी यह वाणी सुनकर विप्रगण ११ विपुल आशीर्वाद देते हुए उनसे विनम्रतापूर्वक कहने लगे ॥११ ॥
ब्राह्मण बोले- बलशालियोंमें श्रेष्ठ हे राजन्! आज आपके पुत्र सत्यव्रतने विवाहमण्डपसे एक १२ ब्राह्मणकी विवाहिता कन्याका बलपूर्वक हरण कर लिया है ॥ १२ ॥
व्यासजी बोले - [ हे महाराज जनमेजय! ] उनकी तथ्यपूर्ण बात सुनकर परम धार्मिक राजा अरुणने पुत्रसे कहा – इस कुकर्मके कारण तुम्हारा १३ ‘ सत्यव्रत ' नाम व्यर्थ हो गया है । हे दुर्बुद्धि! दुराचारी! तुम मेरे घरसे दूर चले जाओ । अरे पापी! अब तुम मेरे राज्यमें ठहरनेके योग्य बिलकुल ही नहीं १४ रह गये हो ॥ १३-१४ ॥ अपने पिताको कुपित देखकर वह बार - बार कहने लगा कि मैं कहाँ जाऊँ? तब राजा अरुणने १५ उससे कहा कि तुम चाण्डालोंके साथ रहो । विप्रकी भार्याका अपहरण करके तुमने चाण्डालका कर्म किया है, इसलिये अब तुम उन्हींके साथ १६ संसर्ग करते हुए स्वेच्छापूर्वक रहो । अरे कुलकलंकी! तुझ जैसे पुत्रसे मैं पुत्रवान् नहीं बनना चाहता । अरे दुष्ट! तुमने मेरी सारी कीर्ति नष्ट कर दी है; इसलिये जहाँ तुम्हारी इच्छा हो, वहाँ चले १७ जाओ ॥ १५–१७ ॥ कोपसे युक्त अपने महात्मा पिताकी बात सुनकर सत्यव्रत उस नगरसे तत्काल निकल गया १८ और चाण्डालोंके पास चला गया । उस समय ऐश्वर्यसम्पन्न तथा करुणालय सत्यव्रत कवच पहनकर तथा धनुष - बाण लेकर उन चाण्डालोंके साथ १ ९ | रहने लगा ॥ १८-१९ ॥
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५८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १०
यदा निष्कासितः पित्रा कुपितेन महात्मना ।
गुरुणाथ वसिष्ठेन प्रेरितोऽसौ महीपतिः ॥
तस्मात्सत्यव्रतस्तस्मिन्बभूव क्रोधसंयुतः ॥
वसिष्ठे धर्मशास्त्रज्ञे निवारणपराङ्मुखे ॥
केनचित्कारणेनाथ पिता तस्य महीपतिः ।
पुत्रार्थेऽसौ तपस्तप्तुं पुरं त्यक्त्वा वनं गतः ॥
न ववर्ष तदा तस्मिन्विषये पाकशासनः ।
समा द्वादश राजेन्द्र तेनाधर्मेण सर्वथा ॥
विश्वामित्रस्तदा दारांस्तस्मिंस्तु विषये नृप ।
संन्यस्य कौशिकीतीरे चचार विपुलं तपः ॥
कातरा तत्र सञ्जाता भार्या वै कौशिकस्य ह ।
कुटुम्बभरणार्थाय दुःखिता वरवर्णिनी ॥
बालकान्क्षुधयाक्रान्तान्रुदतः पश्यती भृशम् ।
याचमानांश्च नीवारान्कष्टमाप पतिव्रता ॥
चिन्तयामास दुःखार्ता तोकान्वीक्ष्य क्षुधातुरान् ।
नृपो नास्ति पुरे ह्यद्य कं याचे वा करोमि किम् ॥
न मे त्रातास्ति पुत्राणां पतिर्मे नास्ति सन्निधौ ।
रुदन्ति बालकाः कामं धिङ्मे जीवनमद्य वै ॥
धनहीनां च मां त्यक्त्वा तपस्तप्तुं गतः पतिः ।
न जानाति समर्थोऽपि दुःखितां धनवर्जिताम् ॥
बालानां भरणं केन करोमि पतिना विना ।
मरिष्यन्ति सुताः सर्वे क्षुधया पीडिता भृशम् ॥
एकं सुतं तु विक्रीय द्रव्येण कियता पुनः ।
पालयामि सुतानन्यानेष मे विहितो विधि: ॥
जब महात्मा राजा अरुणने कुपित होकर अपने पुत्र २० सत्यव्रतको निष्कासित किया था, तब गुरु वसिष्ठने उन्हें इस कार्यके लिये प्रेरित किया था । इसलिये राजकुमार सत्यव्रत निष्कासनसे न रोकनेवाले उन धर्मशास्त्रके २१ ज्ञाता वसिष्ठजीपर कुपित था॥२०-२१ ॥ एक समय किसी प्रसंगवश उस सत्यव्रतके पिता राजा अरुण अयोध्यापुरी छोड़कर पुत्रकी कल्याण-कामनासे तप करनेके लिये वनमें चले गये ॥ २२ ॥
२२ हे महाराज! उस समय उस अधर्मके कारण इन्द्रने उस राज्यमें बारह वर्षोंतक बिलकुल जल नहीं बरसाया ॥ २३ ॥
२३ हे राजन्! उस समय मुनि विश्वामित्र अपनी पत्नीको उस राज्यमें छोड़कर स्वयं कौशिकीनदीके तटपर कठोर तपस्या करने लगे थे ॥ २४ ॥
२४ विश्वामित्रकी सुन्दर रूपवाली भार्या उस अकालके समय कुटुम्बके भरण - पोषणकी समस्याके कारण दुःखित होकर चिन्तासे व्याकुल हो उठीं ॥ २५ ॥
२५ भूखसे पीड़ित होकर रोते - कलपते तथा नीवार अन्न माँगते हुए अपने पुत्रोंको देख - देखकर उस पतिव्रताको महान् कष्ट होता था ॥ २६ ॥
२६ भूखसे आक्रान्त पुत्रोंको देखकर दुःखसे व्याकुल हो वे सोचने लगीं कि इस समय नरेश भी नगरमें नहीं हैं; अतः अब मैं किससे माँगूँ अथवा अन्य कौन - सा उपाय करूँ ॥२७ ॥
२७ यहाँ मेरे पुत्रोंकी रक्षा करनेवाला कोई नहीं है I । मेरे पतिदेव भी इस समय मेरे पास नहीं हैं । ये बालक बहुत रो रहे हैं, अब तो मेरे जीवनको धिक्कार है ॥ २८ ॥
२८ मैं धनरहित हूँ – ऐसा जानते हुए भी मुझे छोड़कर पतिदेव तप करनेके लिये चले गये । समर्थ होकर भी वे इस बातको नहीं समझते कि धनके २ ९ अभावमें मैं यह कष्ट भोग रही हूँ ॥ २ ९ ॥ पतिकी अनुपस्थितिमें अब मैं किसकी सहायतासे बालकोंका भरण - पोषण करूँ । अब तो भूख से तड़प-३० तड़पकर मेरे सभी पुत्र मर जायँगे । अतः अब एक यह उपाय मुझे सूझ रहा है कि इनमेंसे एक पुत्रको बेचकर जो कुछ भी धन प्राप्त हो, उस धनसे अन्य ३१ पुत्रोंका पालन - पोषण करूँ ॥ ३०-३१ ॥
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अ ० १० ]
सर्वेषां मारणं नाद्धा युक्तं मम विपर्यये ।
कालस्य कलनायाहं विक्रीणामि तथात्मजम् ॥
हृदयं कठिनं कृत्वा संचिन्त्य मनसा सती ।
सा दर्भरज्ज्वा बद्ध्वाथ गले पुत्रं विनिर्गता ॥
मुनिपत्नी गले बद्ध्वा मध्यमं पुत्रमौरसम् ।
शेषस्य भरणार्थाय गृहीत्वा चलिता गृहात् ॥
दृष्टा सत्यव्रतेनार्ता तापसी शोकसंयुता ।
पप्रच्छ नृपतिस्तां तु किं चिकीर्षसि शोभने ॥
रुदन्तं बालकं कण्ठे बद्ध्वा नयसि काधुना ।
किमर्थं चारुसर्वाङ्गि सत्यं ब्रूहि ममाग्रतः ॥
ऋषिपल्युवाच
विश्वामित्रस्य भार्याहं पुत्रोऽयं मे नृपात्मज ।
विक्रेतुमौरसं कामं गमिष्ये विषमे सुतम् ॥
अन्नं नास्ति पतिर्मुक्त्वा गतस्तप्तुं नृप क्वचित् ।
विक्रीणामि क्षुधार्तेनं शेषस्य भरणाय वै ॥
राजोवाच
पतिव्रते रक्ष पुत्रं दास्यामि भरणं तव ।
तावदेव पतिस्तेऽत्र वनाच्चैवागमिष्यति ॥
वृक्षे तवाश्रमाभ्याशे भक्ष्यं किञ्चिन्निरन्तरम् ।
बन्धयित्वा गमिष्यामि सत्यमेतद् ब्रवीम्यहम् ॥
इत्युक्ता सा तदा तेन राज्ञा कौशिककामिनी ।
विबन्धं तनयं कृत्वा जगामाश्रममण्डलम् ॥
सोऽभवद् गालवो नाम गलबन्धान्महातपाः ।
सा तु स्वस्याश्रमे गत्वा मुमोद बालकैर्वृता ॥
सप्तम स्कन्ध ५ ९ इस प्रकार भूखसे सभी पुत्रोंको मार डालना मेरे ३२ विचारसे उचित नहीं है । अतः इस संकटकी स्थितिसे निबटनेके लिये मैं एक पुत्रको बेचूँगी ॥३२ ॥
मन - ही - मन इस तरहका संकल्प करके अपने ३३ हृदयको कठोर बनाकर वह साध्वी एक पुत्रके गलेमें कुकी रस्सी बाँधकर घरसे निकल पड़ी ॥ ३३ ॥
जब वह मुनि - पत्नी शेष पुत्रोंके रक्षार्थ अपने औरस मझले पुत्रके गलेमें रस्सी बाँधकर ३४ उसे लेकर अपने घरसे निकली, तभी [ उसके कुछ दूर जानेपर ] राजकुमार सत्यव्रतने उस शोक-सन्तप्त तथा घबरायी हुई तपस्विनीको देख लिया ३५ और उससे पूछा - हे शोभने! आप क्या करना चाहती हो? हे सर्वांगसुन्दरि! आप कौन हैं और इस रोते हुए बालकके गलेमें रस्सी बाँधकर किसलिये ३६ ले जा रही हैं? यह सब आप मेरे समक्ष सच - सच बताइये ॥ ३४–३६ ॥ ऋषिपत्नी बोलीं- हे राजकुमार! मैं ऋषि विश्वामित्रकी पत्नी हूँ और यह मेरा पुत्र है विषम संकटमें पड़कर मैं अपने इस औरस पुत्रको ३७ बेचनेके लिये जा रही हूँ । हे राजन्! मेरे पास अन्न नहीं है और मेरे पति मुझे छोड़कर तपस्या करनेके लिये कहीं चले गये हैं, अत: भूखसे व्याकुल मैं ३८ अब अपने शेष पुत्रोंके भरण - पोषणके निमित्त इसे बेचूँगी ॥ ३७-३८ ॥ राजा बोले- हे पतिव्रते! आप अपने पुत्रकी रक्षा करें । जबतक आपके पति वनसे यहाँ वापस नहीं ३ ९ आ जाते, तबतक मैं आपके भरण - पोषणका प्रबन्ध कर दे रहा हूँ । मैं आपके आश्रमके समीपवाले वृक्षपर कुछ भोज्य - सामग्री प्रतिदिन बाँधकर चला जाया करूँगा, मैं यह सत्य कह रहा हूँ ॥ ३ ९ -४० ॥ ४० राजकुमारके यह कहनेपर विश्वामित्रकी भार्या अपने पुत्रके गलेसे रस्सी खोलकर अपने आश्रमको लौट गयीं ॥ ४१ ॥
४१ गला बँधनेके कारण उस बालकका नाम
' गालव ' पड़ गया और वह महान् तपस्वी हुआ ।
अपने आश्रममें जाकर वे बालकोंके साथ आनन्द-४२ पूर्वक रहने लगीं ॥ ४२ ॥