देवी भागवत उत्तरार्द्ध — पृष्ठ 421–430
देवी भागवत उत्तरार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 421–430
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४१२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १ ९ गोलोकस्य क्षणार्धेन चैकं मन्वन्तरं भवेत् । हे सम्पूर्ण जगत्की रक्षा करनेवाले पृथिव्यां जगतां धातरित्येव वचनं ध्रुवम् ॥ ८६ ब्रह्मन्! गोलोकके आधे क्षणमें ही पृथ्वीलोकपर एक इत्येवं शङ्खचूडश्च पुनस्तत्रैव यास्यति । महाबलिष्ठो योगेशः सर्वमायाविशारदः
मम शूलं गृहीत्वा च शीघ्रं गच्छत भारतम् ।
शिवः करोतु संहारं मम शूलेन रक्षसः ॥
ममैव कवचं कण्ठे सर्वमङ्गलकारकम् ।
बिभर्ति दानवः शश्वत्संसारे विजयी ततः ॥
तस्मिन् ब्रह्मन् स्थिते चैव न कोऽपि हिंसितुं क्षमः ।
तद्याचनां करिष्यामि विप्ररूपोऽहमेव च ॥
सतीत्वहानिस्तत्पल्या यत्र काले भविष्यति ।
तत्रैव काले तन्मृत्युरिति दत्तो वरस्त्वया ॥
तत्पल्याश्चोदरे वीर्यमर्पयिष्यामि निश्चितम् ।
तत्क्षणे चैव तन्मृत्युर्भविष्यति न संशयः ॥
पश्चात्सा देहमुत्सृज्य भविष्यति मम प्रिया ।
इत्युक्त्वा जगतां नाथो ददौ शूलं हराय च ॥
शूलं दत्त्वा ययौ शीघ्रं हरिरभ्यन्तरे मुदा ।
भारतं च ययुर्देवा ब्रह्मरुद्रपुरोगमाः ॥
मन्वन्तरका समय व्यतीत हो जाता है; यह बात बिलकुल सत्य है । इस प्रकार यह सब कुछ पूर्वनिश्चित व्यवस्थाके अनुसार ही हो रहा है । अतः सम्पूर्ण ॥ ८७ मायाओंका पूर्ण ज्ञाता, महान् बलशाली तथा योगेश्वर शंखचूड़ समय आनेपर पुन: उसी गोलोकमें वापस चला जायगा ॥ ८६-८७ ॥ अब आपलोग मेरा त्रिशूल लेकर शीघ्र भारतवर्ष में ८८ चलें और वहाँपर शंकरजी मेरे त्रिशूलसे उस राक्षसका संहार करें ॥ ८८ ॥
वह दानव शंखचूड़ अपने कण्ठमें मेरा सर्वमंगलकारी कवच निरन्तर धारण किये रहता है । ८ ९ इसीसे वह सदा संसार - विजयी बना हुआ है ॥ ८ ९ ॥ हे ब्रह्मन्! उसके कण्ठमें उस कवचके रहते उसे मारनेमें कोई प्राणी समर्थ नहीं है । अतः मैं ही ९ ० ब्राह्मणका रूप धारणकर उससे कवचकी याचना करूँगा ॥ ९ ० ॥ जिस समय उसकी पत्नीका सतीत्व नष्ट होगा, उसी समय उसकी मृत्यु होगी - ऐसा आपने उसे वर ९ १ भी दे रखा है ॥ ९ १ ॥ इसके लिये मैं अवश्य ही उसकी पत्नीके उदरमें अपना तेज स्थापित करूँगा, जिससे उसी क्षण उस शंखचूड़की मृत्यु हो जायगी; इसमें सन्देह नहीं है । ९ २ तब उसकी पत्नी अपना शरीर त्यागकर पुन: मेरी प्रिया बन जायगी ॥ ९ २३ ॥ ऐसा कहकर जगत् के स्वामी भगवान् ९ ३ श्रीहरिने शंकरजीको त्रिशूल दे दिया और त्रिशूल देकर वे श्रीहरि प्रसन्नतापूर्वक तत्काल अन्तःपुरमें चले गये । इसके बाद सभी देवताओंने ब्रह्मा तथा शंकरजीको आगे करके भारतवर्षके लिये प्रस्थान ९ ४ | किया ॥ ९ ३ - ९ ४ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां नवमस्कन्धे शङ्खचूडेन सह तुलसीसङ्गमवर्णनं नामैकोनविंशोऽध्यायः ॥ १ ९ ॥
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अ ० २० ] नवम स्कन्ध ४१३ अथ विंशोऽध्यायः पुष्पदन्तका शंखचूड़के पास जाकर भगवान् शंकरका सन्देश सुनाना, युद्धकी बात सुनकर तुलसीका सन्तप्त होना और शंखचूड़का उसे ज्ञानोपदेश देना श्रीनारायण उवाच
ब्रह्मा शिवं संनियोज्य संहारे दानवस्य च ।
जगाम स्वालयं तूर्णं यथास्थानं सुरोत्तमाः ॥
चन्द्रभागानदीतीरे वटमूले मनोहरे ।
तत्र तस्थौ महादेवो देवविस्तारहेतवे ॥
दूतं कृत्वा चित्ररथं गन्धर्वेश्वरमीप्सितम् ।
शीघ्रं प्रस्थापयामास शङ्खचूडान्तिकं मुदा ॥
सर्वेश्वराज्ञया शीघ्रं ययौ तन्नगरं परम् ।
महेन्द्रनगरोत्कृष्टं कुबेरभवनाधिकम् ॥
पञ्चयोजनविस्तीर्णं दैर्घ्यं तद् द्विगुणं भवेत् ।
स्फटिकाकारमणिभिर्निर्मितं यानवेष्टितम् ॥
सप्तभिः परिखाभिश्च दुर्गमाभिः समन्वितम् ।
ज्वलदग्निनिभैः शश्वत्कल्पितं रत्नकोटिभिः ॥
युक्तं च वीथीशतकैर्मणिवेदिविचित्रितैः ।
परितो वणिजां सौधैर्नानावस्तुविराजितैः ॥
सिन्दूराकारमणिभिर्निर्मितैश्च विचित्रितैः ।
भूषितं भूषितैर्दिव्यैराश्रमैः शतकोटिभिः ॥
गत्वा ददर्श तन्मध्ये शङ्खचूडालयं परम् ।
अतीव वलयाकारं यथा पूर्णेन्दुमण्डलम् ॥
ज्वलदग्निशिखाक्ताभिः परिखाभिश्चतसृभिः ।
तद्दुर्गमं च शत्रूणामन्येषां सुगमं सुखम् ॥
अत्युच्चैर्गगनस्पर्शिमणिशृङ्गविराजितम् I राजितं द्वादशद्वारैर्द्वारपालसमन्वितम् ॥
मणीन्द्रसारनिर्माणैः शोभितं लक्षमन्दिरैः ।
शोभितं रत्नसोपानै रत्नस्तम्भविराजितम् ॥
श्रीनारायण बोले - [ हे नारद! ] उस दानवके संहारकार्यमें शिवजीको नियुक्तकर ब्रह्माजी तत्काल १ अपने स्थानपर चले गये और अन्य देवता भी अपने-अपने स्थानके लिये प्रस्थित हो गये ॥ १ ॥
तदनन्तर महादेवजी देवताओंके अभ्युदयके २ उद्देश्यसे चन्द्रभागानदीके तटपर एक मनोहर वटवृक्षके नीचे आसीन हो गये ॥ २ ॥
उन्होंने अपने अत्यन्त प्रिय गन्धर्वराज चित्ररथ ३ ( पुष्पदन्त ) - को दूत बनाकर तुरन्त प्रसन्नतापूर्वक शंखचूड़के पास भेजा ॥ ३ ॥
सर्वेश्वर शिवकी आज्ञा पाकर चित्ररथ तत्काल ४ शंखचूड़के उत्तम नगरमें गया, जो इन्द्रपुरीसे भी उत्कृष्ट तथा कुबेरके भवनसे भी अधिक सुन्दर था ॥ ४ ॥
वह नगर पाँच योजन चौड़ा तथा उससे दुगुना लम्बा था । वह स्फटिकके आकारवाली मणियोंसे निर्मित था तथा उसके चारों ओर अनेक वाहन स्थित थे । वह नगर सात दुर्गम खाइयोंसे युक्त था । प्रज्वलित अग्निके समान निरन्तर चमकनेवाले करोड़ों रत्नोंसे उसका निर्माण किया गया था । वह नगर सैकड़ों वीथियों तथा मणिमय ७ विचित्र वेदियोंसे सम्पन्न था । वह व्यापारियोंके बड़े-बड़े महलोंसे आवृत था, जिनमें अनेक प्रकारकी सामग्रियाँ विराजमान थीं । उसी प्रकार वह नगर सिन्दूरके समान ८ लाल मणियोंद्वारा निर्मित विचित्र, सुन्दर तथा दिव्य करोड़ों आश्रमोंसे सुशोभित था॥५–८ ॥ हेमुने! नगरमें पहुँचकर पुष्पदन्तने उसके मध्यमें ९ स्थित शंखचूड़का श्रेष्ठ भवन देखा, जो पूर्णचन्द्र-मण्डलकी भाँति पूर्णतः वलयाकार था, प्रज्वलित अग्निकी लपटोंके समान प्रतीत होनेवाली चार परिखाओंसे १० सुरक्षित था, शत्रुओंके लिये अत्यन्त दुर्गम था, किंतु दूसरे लोगोंके लिये सुगम एवं सुखप्रद था, अत्यन्त ११ ऊँचाईवाले गगनस्पर्शी मणि - निर्मित कंगूरोंसे सुशोभित था, द्वारपालोंसे युक्त बारह द्वारोंसे सुसज्जित था और सर्वोत्कृष्ट मणियोंसे निर्मित लाखों मन्दिरों, सोपानों १२ । तथा रत्नमय खम्भोंसे मण्डित था ॥ ९ –१२ ॥
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४१४ तद् दृष्ट्वा पुष्पदन्तोऽपि वरं द्वारं ददर्श सः । द्वारे नियुक्तं पुरुषं शूलहस्तं च सस्मितम् तिष्ठन्तं पिङ्गलाक्षं च ताम्रवर्णं भयङ्करम् कथयामास वृत्तान्तं जगाम तदनुज्ञया ॥ अतिक्रम्य च तद्द्वारं जगामाभ्यन्तरं पुनः । न कोऽपि रक्षति श्रुत्वा दूतरूपं रणस्य च
गत्वा सोऽभ्यन्तरद्वारं द्वारपालमुवाच ह ।
रणस्य सर्ववृत्तान्तं विज्ञापयत माचिरम् ॥
स च तं कथयित्वा च दूतो गन्तुमुवाच ह ।
स गत्वा शङ्खचूडं तं ददर्श सुमनोहरम् ॥
राजमण्डलमध्यस्थं स्वर्णसिंहासने स्थितम् ।
मणीन्द्ररचितं दिव्यं रत्नदण्डसमन्वितम् ॥
रत्नकृत्रिमपुष्पैश्च प्रशस्तैः शोभितं सदा ।
भृत्येन मस्तकन्यस्तं स्वर्णच्छत्रं मनोहरम् ॥
सेवितं पार्षदगणै रुचिरैः श्वेतचामरैः ।
सुवेषं सुन्दरं रम्यं रत्नभूषणभूषितम् ॥
माल्येन लेपनं सूक्ष्मं सुवस्त्रं दधतं मुने ।
दानवेन्द्रैः परिवृतं सुवेषैश्च त्रिकोटिभिः ॥
शतकोटिभिरन्यैश्च भ्रमद्भिरस्त्रपाणिभिः ।
एवंभूतञ्च तं दृष्ट्वा पुष्पदन्तः सविस्मयः ॥
उवाच स च वृत्तान्तं यदुक्तं शङ्करेण च । पुष्पदन्त उवाच राजेन्द्र शिवभृत्योऽहं पुष्पदन्ताभिधः प्रभो ॥
यदुक्तं शङ्करेणैव तद् ब्रवीमि निशामय ।
राज्यं देहि च देवानामधिकारं च साम्प्रतम् ॥
श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २० उसे देखकर पुष्पदन्तने एक दूसरा प्रधान द्वार ॥ १३ देखा । उस द्वारपर सुरक्षाहेतु नियुक्त एक पुरुष हाथमें त्रिशूल धारण किये मुसकराता हुआ वहाँ स्थित था ॥ पुष्पदन्तने पीली आँखोंवाले तथा ताम्र वर्णके शरीरवा १४ उस भयंकर पुरुषसे सारी बातें बतायीं और फिर उसकी आज्ञासे वह आगे बढ़ा । उस द्वारको पार करके वह भीतर चला गया । यह युद्धका सन्देश ॥ १५ देनेवाला दूत है - यह जानकर कोई उसे रोकता भी नहीं था ॥ १३ – १५ ॥ भीतरी द्वारपर पहुँचकर उसने द्वारपालसे १६ कहा – युद्धका सम्पूर्ण वृत्तान्त [ राजाको ] बता दो, इसमें विलम्ब मत करो । उस द्वारपालसे ऐसा कहकर वह दूत [ पुष्पदन्त ] स्वयं जानेके लिये बोला । वहाँ जाकर उसने राजमण्डलीके मध्यमें स्वर्णके १७ सिंहासनपर बैठे हुए परम मनोहर शंखचूड़को देखा । उस दिव्य सिंहासनमें सर्वोत्तम मणियाँ जड़ी थीं, वह रत्नमय दण्डोंसे युक्त था, वह रत्ननिर्मित १८ कृत्रिम तथा उच्च कोटिके पुष्पोंसे सदा सुशोभित था, एक सेवक शंखचूडके सिरके ऊपर स्वर्णका मनोहर छत्र लगाये खड़ा था, सुन्दर तथा श्वेत चँवर १ ९ डुलाते हुए पार्षदगण उसकी सेवामें संलग्न थे, सुन्दर वेष धारण करने तथा रत्नमय आभूषणोंसे अलंकृत होनेके कारण वह रमणीय प्रतीत हो रहा था । हे मुने! २० वह माला पहने था, शरीरमें चन्दनका लेप किये हुआ था और दो महीन तथा सुन्दर वस्त्र धारण किये हुआ था । वह शंखचूड़ सुन्दर वेष धारण करनेवाले २१ तीन करोड़ दानवेन्द्रोंसे घिरा हुआ था । इसी प्रकार हाथमें अस्त्र धारण किये हुए सैकड़ों करोड़ अन्य दानव भी उसके चारों ओर इधर - उधर घूम रहे २२ । थे । इस प्रकारके उस शंखचूड़को देखकर परम विस्मयको प्राप्त उस पुष्पदन्तने शंकरजीके द्वारा जो युद्धविषयक समाचार कहा गया था, उसे बताना आरम्भ किया ॥ १६–२२३ ॥ २३ पुष्पदन्त बोला- हे राजेन्द्र! हे प्रभो! मैं शंकरजीका सेवक हूँ, मेरा नाम पुष्पदन्त है | शंकरजीने जो कुछ कहा है, मैं वही कह रहा हूँ, आप सुनिये-२४ | अब आप देवताओंका राज्य तथा अधिकार लौटा
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अ ० २० ] नवम स्कन्ध ४१५
देवाश्च शरणापन्ना देवेशं श्रीहरिं परम् ।
हरिर्दत्त्वास्य शूलं च तेन प्रस्थापितः शिवः ॥ २५
पुष्पभद्रानदीतीरे वटमूले त्रिलोचनः ।
विषयं देहि तेषां च युद्धं वा कुरु निश्चितम् ॥ २६
गत्वा वक्ष्यामि किं शम्भुमथ तद्वद मामपि ।
दूतस्य वचनं श्रुत्वा शङ्खचूडः प्रहस्य च ॥ २७
प्रभातेऽहं गमिष्यामि त्वं च गच्छेत्युवाच ह ।
स गत्वोवाच तं तूर्णं वटमूलस्थमीश्वरम् ॥ २८
शङ्खचूडस्य वचनं तदीयं तन्मुखोदितम् ।
एतस्मिन्नन्तरे स्कन्द आजगाम शिवान्तिकम् ॥ २ ९
वीरभद्रश्च नन्दी च महाकालः सुभद्रकः ।
विशालाक्षश्च बाणश्च पिङ्गलाक्षो विकम्पनः ॥ ३०
विरूपो विकृतिश्चैव मणिभद्रश्च बाष्कलः ।
कपिलाख्यो दीर्घदंष्ट्रो विकटस्ताम्रलोचनः ॥ ३१ ।
कालकण्ठो बलीभद्रः कालजिह्वः कुटीचर: ।
बलोन्मत्तो रणश्लाघी दुर्जयो दुर्गमस्तथा ॥ ३२
अष्टौ च भैरवा रौद्रा रुद्राश्चैकादश स्मृताः ।
वसवोऽष्टौ वासवश्च आदित्या द्वादश स्मृताः ॥ ३३
हुताशनश्च चन्द्रश्च विश्वकर्माश्विनौ च तौ ।
कुबेरश्च यमश्चैव जयन्तो नलकूबरः ॥ ३४
वायुश्च वरुणश्चैव बुधश्च मङ्गलस्तथा ।
धर्मश्च शनिरीशानः कामदेवश्च वीर्यवान् ॥ ३५
उग्रदंष्ट्रा चोग्रदण्डा कोटरा कैटभी तथा ।
स्वयं चाष्टभुजा देवी भद्रकाली भयङ्करी ॥ ३६
रत्नेन्द्रसारनिर्माणविमानोपरि संस्थिता ।
रक्तवस्त्रपरीधाना रक्तमाल्यानुलेपना ॥ ३७
नृत्यन्ती च हसन्ती च गायन्ती सुस्वरं मुदा ।
अभयं ददाति भक्तेभ्योऽभया सा च भयं रिपुम् ॥ ३८
बिभ्रती विकटां जिह्वां सुलोलां योजनायताम् ।
शङ्खचक्रगदापद्मखङ्गचर्मधनुः शरान् ॥३ ९
खर्परं वर्तुलाकारं गम्भीरं योजनायतम् ।
त्रिशूलं गगनस्पर्शि शक्तिं च योजनायताम् ॥ ४०
दीजिये; क्योंकि वे देवता देवेश श्रेष्ठ श्रीहरिकी शरणमें गये थे । उन श्रीहरिने अपना त्रिशूल देकर आपके विनाशार्थ शिवजीको भेजा है । वे त्रिलोचन शिव इस समय भद्रशीला नदीके तटपर वटवृक्षके नीचे विराजमान हैं । अतः आप उन देवताओंका राज्य लौटा दीजिये अथवा युद्ध कीजिये । अब आप मुझे यह भी बता दीजिये कि मैं शिवजीके पास जाकर उनसे क्या कहूँ? ॥२३–२६३ ॥ [ हे नारद! ] दूतकी बात सुनकर शंखचूड़ने हँसकर कहा —— तुम चलो, मैं प्रात: काल वहाँ पहुँचूँगा ' ॥ २७३ ॥
तदनन्तर पुष्पदन्तने वटवृक्षके नीचे विराजमान परमेश्वर शिवके पास पहुँचकर शंखचूड़के मुखसे कही गयी वह बात ज्यों - की - त्यों उनसे कह दी ॥ २८३ ॥
इतनेमें ही कार्तिकेयजी भगवान् शंकरके पास आ गये । वीरभद्र, नन्दी, महाकाल, सुभद्र, विशालाक्ष, बाण, पिंगलाक्ष, विकम्पन, विरूप, विकृति, मणिभद्र, बाष्कल, कपिलाख्य, दीर्घदंष्ट्र, विकट, ताम्रलोचन, कालकण्ठ, बलीभद्र, कालजिह्व, कुटीचर, बलोन्मत्त, रणश्लाघी, दुर्जय, दुर्गम तथा जो आठ भैरव, ग्यारह रुद्र, आठ वसु और बारह आदित्य कहे गये हैं- वे सब, अग्नि, चन्द्रमा, विश्वकर्मा, दोनों अश्विनीकुमार, कुबेर, यमराज, जयन्त, नलकूबर, वायु, वरुण, बुध, मंगल, धर्म, शनि, ईशान तथा ओजस्वी कामदेव भी वहाँ आ गये ॥ २ ९ –३५ ॥ उग्रद्रंष्ट्रा, उग्रचण्डा, कोटरा तथा कैटभी आदि देवियाँ भी वहाँ पहुँच गयीं । इसी प्रकार आठ भुजाएँ धारण करनेवाली तथा भय उत्पन्न करनेवाली साक्षात् भगवती भद्रकाली भी वहाँ पहुँच गयीं । वे सर्वोत्तम रत्नोंसे निर्मित विमानपर विराजमान थीं । वे लाल वस्त्र तथा लाल पुष्पोंकी माला धारण किये थीं और लाल चन्दनसे अनुलिप्त थीं । वे प्रसन्नतापूर्वक नाचती, हँसती तथा मधुर स्वरमें गाती हुई सुशोभित हो रही थीं । वे देवी अभया भक्तोंको अभय तथा शत्रुओंको भय प्रदान करती हैं । वे योजनभर लम्बी तथा लपलपाती हुई भयंकर जीभ, शंख, चक्र, गदा, पद्म, खड्ग, ढाल, धनुष, बाण, एक योजन विस्तृत वर्तुलाकार गम्भीर खप्पर, आकाशको छूता हुआ विशाल त्रिशूल,
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४१६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २०
मुद्गरं मुसलं वज्रं खेटं फलकमुज्ज्वलम् ।
वैष्णवास्त्रं वारुणास्त्रं वाह्णेयं नागपाशकम् ॥
नारायणास्त्रं गान्धर्वं ब्रह्मास्त्रं गारुडं तथा ।
पर्जन्यास्त्रं पाशुपतं जृम्भणास्त्रं च पार्वतम् ॥
माहेश्वरास्त्रं वायव्यं दण्डं सम्मोहनं तथा ।
अव्यर्थमस्त्रकं दिव्यं दिव्यास्त्रशतकं परम् ॥
आगत्य तत्र तस्थौ च योगिनीनां त्रिकोटिभिः ।
सार्धं च डाकिनीनां च विकटानां त्रिकोटिभिः ॥
भूतप्रेतपिशाचाश्च कूष्माण्डा ब्रह्मराक्षसाः ।
वेताला राक्षसाश्चैव यक्षाश्चैव तु किन्नराः ॥
ताभिश्चैव सह स्कन्दः प्रणम्य चन्द्रशेखरम् ।
पितुः पार्श्वे सहायार्थं समुवास तदाज्ञया ॥
अथ दूते गते तत्र शङ्खचूडः प्रतापवान् ।
उवाच तुलसीं वार्तां गत्वाभ्यन्तरमेव च ॥
रणवार्तां च सा श्रुत्वा शुष्ककण्ठोष्ठतालुका ।
उवाच मधुरं साध्वी हृदयेन विदूयता ॥
तुलस्युवाच
हे प्राणबन्धो हे नाथ तिष्ठ मे वक्षसि क्षणम् ।
हे प्राणाधिष्ठातृदेव रक्ष मे जीवितं क्षणम् ॥
भुंक्ष्व जन्म समासाद्य यन्मे मनसि वाञ्छितम् ।
पश्यामि त्वां क्षणं किञ्चिल्लोचनाभ्यां च सादरम् ॥
आन्दोलयन्ते प्राणा मे मनो दग्धं च सन्ततम् ।
दुःस्वप्नश्च मया दृष्टश्चाद्यैव चरमे निशि ॥
तुलसीवचनं श्रुत्वा भुक्त्वा पीत्वा नृपेश्वरः ।
उवाच वचनं प्राज्ञो हितं सत्यं यथोचितम् ॥
शङ्खचूड उवाच
कालेन योजितं सर्वं कर्मभोगनिबन्धनम् ।
शुभं हर्षः सुखं दुःखं भयं शोकश्च मङ्गलम् ॥
एक योजन लम्बी शक्ति, मुद्गर, मुसल, वज्र, ४१ खेटक, प्रकाशमान फलक, वैष्णवास्त्र, वारुणास्त्र, आग्नेयास्त्र, नागपाश, नारायणास्त्र, गन्धर्वास्त्र, ब्रह्मास्त्र, गरुडास्त्र, पर्जन्यास्त्र, पाशुपतास्त्र, जृम्भणास्त्र, पर्वतास्त्र, ४२ माहेश्वरास्त्र, वायव्यास्त्र, सम्मोहन दण्ड, दिव्य अमोघ अस्त्र तथा दिव्य श्रेष्ठ सैकड़ों अस्त्र धारणकर तीन करोड़ योगिनियों और तीन करोड़ भयंकर ४३ किनियोंको साथ लिये वहाँ आकर विराजमान हो गयीं ॥ ३६–४४ ॥ ४४ भूत, प्रेत, पिशाच, कूष्माण्ड, ब्रह्मराक्षस, बेताल, राक्षस, यक्ष और किन्नर भी वहाँ उपस्थित हो गये । उन सभी देवियों [ तथा अन्य देवगणों ] -को साथ ४५ लेकर कार्तिकेय अपने पिता शिवको प्रणाम करके सहायता प्रदान करनेके उद्देश्यसे उनकी आज्ञासे उनके
पास बैठ गये । ४५-४६ ॥
४६ इधर, दूतके चले जानेपर प्रतापी शंखचूड़ने अन्तःपुरमें जाकर तुलसीको सारी बात बतायी ॥ ४७ ॥
४७ युद्धकी बात सुनकर उस तुलसीके कण्ठ, ओष्ठ और तालु सूख गये और वह साध्वी तुलसी दुःखी मनसे मधुर वाणीमें कहने लगी ॥ ४८ ॥
४८ तुलसी बोली - हे प्राणबन्धो! हे नाथ! हे प्राणेश्वर! मेरे वक्ष: स्थलपर क्षणभरके लिये विराजिये । हे प्राणाधिष्ठातृदेव! क्षणभर मेरे प्राणोंकी रक्षा कीजिये । ४ ९ मैं क्षणभर अपने नेत्रोंसे आदरपूर्वक आपको देख लूँ और यह जन्म पाकर आप मेरे मनमें विहारकी जो अभिलाषा है, उसे पूर्ण कीजिये । आज ही रात्रिके ५० अन्तमें मैंने एक दुःस्वप्न देखा है, जिससे मेरे प्राण काँप रहे हैं और मनमें लगातार जलन हो रही है ॥ ४ ९ –५१ ॥ ५१ तुलसीकी बात सुनकर परम ज्ञानसम्पन्न राजेन्द्र शंखचूड भोजन - पानादिसे निवृत्त होकर ५२ तुलसीसे हितकर, सत्य तथा यथोचित वचन कहने लगा ॥५२ ॥
शंखचूड़ बोला— कल्याण, हर्ष, सुख, दुःख, भय, शोक और मंगल - ये समस्त कर्मभोगके बन्धन ५३ । कालके साथ बँधे हुए हैं ॥ ५३ ॥
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अ ० २० ] नवम स्कन्ध ४१७ काले भवन्ति वृक्षाश्च स्कन्धवन्तश्च कालतः क्रमेण पुष्पवन्तश्च फलवन्तश्च कालतः तेषां फलानि पक्वानि प्रभवन्त्येव कालतः ते सर्वे फलिताः काले पातं यान्ति च कालतः काले भवन्ति विश्वानि काले नश्यन्ति सुन्दरि । कालात्स्रष्टा च सृजति पाता पाति च कालतः संहर्ता संहरेत्काले क्रमेण सञ्चरन्ति ते ब्रह्मविष्णुशिवादीनामीश्वरः प्रकृतिः परा स्रष्टा पाता च संहर्ता स चात्मा कालनर्तकः काले स एव प्रकृतिं स्वाभिन्नां स्वेच्छया प्रभुः निर्माय कृतवान्सर्वान्विश्वस्थांश्च चराचरान् सर्वेशः सर्वरूपश्च सर्वात्मा परमेश्वरः जनं जनेन जनिता जनं पाति जनेन यः जनं जनेन हरते तं देवं भज साम्प्रतम् यस्याज्ञया वाति वातः शीघ्रगामी च साम्प्रतम् यस्याज्ञया च तपनस्तपत्येव यथाक्षणम् यथाक्षणं वर्षतीन्द्रो मृत्युश्चरति जन्तुषु यथाक्षणं दहत्यग्निश्चन्द्रो भ्रमति शीतवान् मृत्योर्मृत्युं कालकालं यमस्य च यमं परम् विभुं स्रष्टुश्च स्रष्टारं मातुश्च मातृकं भवे संहर्तारं च संहर्तुस्तं देवं शरणं व्रज को वा बन्धुश्च केषां वा सर्वबन्धुं भज प्रिये अहं को वा च त्वं का वा विधिना योजितः पुरा त्वया सार्धं कर्मणा च पुनस्तेन वियोजितः । समयसे ही वृक्ष उगते हैं, समयसे ही ॥ ५४ उनमें शाखाएँ निकलती हैं और फिर क्रमशः पुष्प तथा फल भी उनमें कालानुसार ही लगते हैं ॥ तत्पश्चात् उन वृक्षोंके फल भी समयसे ही पकते ॥ ५५ हैं । अन्तमें फलयुक्त वे सभी वृक्ष समयानुसार नष्ट भी हो जाते हैं ॥ ५४-५५ ॥ हे सुन्दरि! समयसे विश्व बनते हैं और समयपर ॥ ५६ नष्ट हो जाते हैं । कालकी प्रेरणासे ही ब्रह्मा सृष्टि करते हैं, विष्णु पालन करते हैं और विश्वके संहारक । शम्भु संहार करते हैं । वे सब क्रमशः कालानुसार ही अपने - अपने कार्यमें नियुक्त होते हैं । ब्रह्मा, विष्णु, ॥ ५७ शिव आदि देवताओंकी नियामिका वे पराप्रकृति ही । हैं । वही परमेश्वर सृष्टि, रक्षा तथा संहार करनेवाला है और वही परमात्मा कालको नचानेवाला है । उन्हीं ॥ ५८ प्रभुने समयानुसार इच्छा - पूर्वक अपनेसे अभिन्न प्रकृतिका निर्माणकर विश्वमें रहनेवाले समस्त स्थावर - जंगम । जीवों की रचना की है । वे ही सबके ईश्वर हैं, सभी ॥ ५ ९ रूपोंमें वे ही विद्यमान हैं, वे ही सबकी आत्मा हैं और वे ही परम ईश्वर हैं ॥ ५६–५९ ॥ । जो जनसे जनकी उत्पत्ति करता है, जनसे ॥ ६० जनकी रक्षा करता है और जनसे जनका संहार करता है, उन्हीं प्रभुकी अब तुम उपासना करो ॥ ६० ॥
। जिनकी आज्ञासे शीघ्रगामी पवनदेव प्रवाहित ॥ ६१ होते हैं, सूर्य यथासमय तपते हैं, इन्द्र समयानुसार वृष्टि करते हैं, मृत्यु सभी जीवोंमें विचरण करती है, । अग्निदेव यथासमय दाह उत्पन्न करते हैं, शीतल ॥ ६२ चन्द्रमा आकाशमें परिभ्रमण करते हैं - उन्हीं मृत्युके भी मृत्यु, कालके भी काल, यमराजसे भी बड़े । यमराज, सृष्टिकर्ता ब्रह्माके भी स्रष्टा, जगत् में माताकी ॥ ६३ माता, संहार करनेवाले शिवके भी संहर्ता परमप्रभु परमेश्वरकी शरणमें जाओ । हे प्रिये! इस जगत्में । कौन किसका बन्धु है; अतः सभी प्राणियोंके बन्धुस्वरूप ॥ ६४ उन प्रभुकी उपासना करो ॥ ६१- -६४ ॥ मैं कौन हूँ और तुम कौन हो? ब्रह्माने पहले । मुझे तुम्हारे साथ संयुक्त कर दिया और फिर उन्हींके ॥ ६५ द्वारा कर्मानुसार वियुक्त भी कर दिया जाऊँगा । शोक 1898 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ द्वितीय खण्ड ] —14 A
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४१८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २०
अज्ञानी कातरः शोके विपत्तौ न च पण्डितः ।
सुखे दुःखे भ्रमत्येव कालनेमिक्रमेण च ॥
नारायणं तं सर्वेशं कान्तं यास्यसि निश्चितम् ।
तपः कृतं यदर्थं च पुरा बदरिकाश्रमे ॥
मया त्वं तपसा लब्धा ब्रह्मणस्तु वरेण च ।
हर्यर्थे यत्तव तपो हरिं प्राप्स्यसि कामिनि ॥
वृन्दावने च गोविन्दं गोलोके त्वं लभिष्यसि ।
अहं यास्यामि तल्लोकं तनुं त्यक्त्वा च दानवीम् ॥
तत्र द्रक्ष्यसि मां त्वं च द्रक्ष्यामि त्वां च साम्प्रतम् ।
अगमं राधिकाशापाद्भारतं च सुदुर्लभम् ॥
पुनर्यास्यामि तत्रैव कः शोको मे शृणु प्रिये ।
त्वं च देहं परित्यज्य दिव्यरूपं विधाय च ॥
तत्कालं प्राप्स्यसि हरिं मा कान्ते कातरा भव ।
इत्युक्त्वा च दिनान्ते च तया सार्धं मनोहरम् ॥
सुष्वाप शोभने तल्पे पुष्पचन्दनचर्चिते ।
नानाप्रकारविभवं चकार रत्नमन्दिरे ॥
रत्नप्रदीपसंयुक्ते स्त्रीरत्नं प्राप्य सुन्दरीम् ।
निनाय रजनीं राजा क्रीडाकौतुकमङ्गलैः ॥
कृत्वा वक्षसि तां कान्तां रुदतीमतिदुःखिताम् ।
कृशोदरीं निराहारां निमग्नां शोकसागरे ॥
पुनस्तां बोधयामास दिव्यज्ञानेन ज्ञानवित् ।
पुरा कृष्णेन यद्दत्तं भाण्डीरे तत्त्वमुत्तमम् ॥
स च तस्यै ददौ सर्वं सर्वशोकहरं परम् ।
ज्ञानं सम्प्राप्य सा देवी प्रसन्नवदनेक्षणा ॥
क्रीडां चकार हर्षेण सर्वं मत्वेति नश्वरम् । तथा विपत्तिमें अज्ञानी मनुष्य भयभीत होता है, न कि ६६ विद्वान् । इस प्रकार मनुष्य कालचक्रके क्रमसे सुख तथा दुःखके चक्रमें भ्रमण करता रहता है । ६५-६६ ॥ अब तुम निश्चय ही सर्वेश्वर भगवान् नारायणको ६७ पतिरूपमें प्राप्त करोगी, जिनके लिये तुमने पूर्वकालमें बदरिकाश्रममें रहकर तप किया था ॥ ६७ ॥
तपस्या तथा ब्रह्माजीके वरदानसे तुम मुझे प्राप्त ६८ हुई हो । हे कामिनि! उस समय जो तुम्हारी तपस्या थी, वह भगवान् श्रीहरिकी प्राप्तिके लिये थी, अतः तुम उन्हीं गोविन्द श्रीहरिको गोलोक - स्थित वृन्दावनमें ६ ९ प्राप्त करोगी । मैं भी अपना यह दानवी शरीर त्यागकर उसी लोकमें चलूँगा, तब वहींपर तुम मुझे देखोगी और मैं तुम्हें देखूँगा । हे प्रिये! सुनो इस समय मैं राधिकाके शापसे ही अगम तथा अत्यन्त दुर्लभ इस ७० भारतवर्षमें आया हूँ और वहींपर पुनः चला जाऊँगा, अतः मेरे लिये शोक क्या? हे कान्ते! तुम भी शीघ्र ही इस शरीरका त्यागकर दिव्य रूप धारण करके ७ ९ उन्हीं श्रीहरिको पतिरूपमें प्राप्त करोगी, अतः दुःखी मत होओ ॥ ६८- ७१३ ॥ यह कहकर वह शंखचूड़ सायंकाल होनेपर ७२ उस तुलसीके साथ पुष्प तथा चन्दनसे चर्चित सुन्दर शय्यापर सो गया और अनेकविध विलास करने लगा । रत्नके दीपकों से सुशोभित अपने रत्नमय भवनमें ७३ स्त्रीरत्नस्वरूपिणी सुन्दरीको पाकर राजा शंखचूड़ने मांगलिक आमोद - प्रमोदोंके द्वारा रात्रि व्यतीत की । तत्पश्चात् अत्यन्त दुःखित होकर रोती हुई, निराहार ७४ रहनेके कारण कृश शरीरवाली तथा शोक - सागरमें निमग्न अपनी उस प्रिया तुलसीको अपने वक्ष: से लगाकर वह ज्ञानसम्पन्न शंखचूड़ दिव्यज्ञानके द्वारा ७५ उसे पुनः समझाने लगा । प्राचीनकालमें भांडीरवनमें स्वयं भगवान् श्रीकृष्णने जिस उत्तम, सभी शोकों को दूर करनेवाले परम ज्ञानका उपदेश उसके लिये ७६ किया था, उसी सम्पूर्ण ज्ञानको शंखचूड़ने उस तुलसीको प्रदान किया । ज्ञान पाकर देवी तुलसीका मुख तथा नेत्र प्रसन्नतासे खिल उठा । ' सब कुछ ७७ नश्वर है ' – ऐसा मानकर वह हर्षपूर्वक विहार करने लगी॥७२–७७ ॥ 1898 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ द्वितीय खण्ड ] –14B
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अ ० २१ ] तौ दम्पती च क्रीडन्तौ निमग्नौ सुखसागरे ॥
पुलकाञ्चितसर्वाङ्गौ मूर्च्छितौ निर्जने मुने ।
अङ्गप्रत्यङ्गसंयुक्तौ सुप्रीतौ सुरतोत्सुकौ ॥
एकाङ्गौ च तथा तौ द्वौ चार्धनारीश्वरो यथा ।
प्राणेश्वरं च तुलसी मेने प्राणाधिकं परम् ॥
प्राणाधिकां च तां मेने राजा प्राणेश्वरीं सतीम् ।
तौ स्थितौ सुखसुप्तौ च तन्द्रितौ सुन्दरौ समौ ॥
सुवेषौ सुखसम्भोगादचेष्टौ सुमनोहरौ ॥
क्षणं सुचेतनौ तौ च कथयन्तौ रसाश्रयात् ॥
कथां मनोरमां दिव्यां हसन्तौ च क्षणं पुनः ।
क्षणं च केलिसंयुक्तौ रसभावसमन्वितौ ॥
सुरते विरतिर्नास्ति तौ तद्विषयपण्डितौ ।
सततं जययुक्तौ द्वौ क्षणं नैव पराजितौ ॥
नवम स्कन्ध ४१ ९ ७८ हे मुने! विहार करते हुए वे दोनों पति - पत्नी सुखके सागरमें निमग्न हो गये । रतिक्रीडाके लिये उत्सुक वे दोनों निर्जन स्थानमें परस्पर अंग - प्रत्यंगके ७ ९ स्पर्शसे मूर्च्छित - जैसे हो गये । उस समय अत्यन्त प्रसन्नचित्त उन दोनोंके सभी अंग पुलकित थे । वे दोनों एक अंगके रूपमें होकर अर्धनारीश्वरके समान प्रतीत हो रहे थे । तुलसी अपने पतिको ८० प्राणोंसे भी अधिक प्रिय समझती थी और राजा शंखचूड़ भी अपनी उस साध्वी प्राणेश्वरीको अपने प्राणोंसे भी अधिक प्रिय समझता था । समान सौन्दर्यवा ८१ वे दोनों ही तन्द्रायुक्त दम्पती सुखपूर्वक सोये हुए थे । सुन्दर वेष धारण किये हुए वे मनोहर दम्पती सम्भोगजनित सुखके कारण अचेत पड़े थे । जब ८२ कभी वे चेतनामें आते, तब परस्पर रसमयी बातें करने लगते तथा मनोरम और दिव्य कथा कहने लगते, फिर हँसने लगते थे, इसके बाद क्षणभरमें ही शृंगार भावसे युक्त होकर क्रीडा करने लगते थे । इस प्रकार ८३ कामकलाके जाननेवाले वे दोनों क्रीडा - विलाससे कभी भी विरत नहीं होते थे । दोनों ही निरन्तर विजयी बने रहकर कभी क्षणभरको भी अपनेको पराजित ८४ | नहीं मानते थे ॥ ७८ – ८४ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां नवमस्कन्धे नारायणनारदसंवादे शङ्खचूडेन सह देवानां सङ्ग्रामोद्योगवर्णनं नाम विंशोऽध्यायः ॥ २० ॥
अथैकविंशोऽध्यायः शंखचूड़ और भगवान् शंकरका विशद वार्तालाप श्रीनारायण उवाच
श्रीकृष्णं मनसा ध्यात्वा रक्षः कृष्णपरायणः ।
ब्राह्मे मुहूर्ते चोत्थाय पुष्पतल्पान्मनोहरात् ॥
रात्रिवासः परित्यज्य स्नात्वा मङ्गलवारिणा ।
धौते च वाससी धृत्वा कृत्वा तिलकमुज्ज्वलम् ॥
चकाराह्निकमावश्यमभीष्टदेववन्दनम् दध्याज्यमधुलाजांश्च ददर्श वस्तु मङ्गलम् ॥ श्रीनारायण बोले- [ हे नारद! ] श्रीकृष्णकी भक्तिमें तत्पर रहनेवाले शंखचूड़ने मनमें श्रीकृष्णका १ | ध्यान करके ब्राह्ममूहूर्तमें ही अपनी मनोहर पुष्प-शय्यासे उठकर स्वच्छ जलसे स्नान करके रातके वस्त्र त्यागकर धुले हुए दो वस्त्र धारण किये । २ तदनन्तर उज्ज्वल तिलक लगाकर उसने अपने इष्ट देवताके वन्दन आदि नित्य कृत्य सम्पन्न किये । उसने दधि, घृत, मधु और धानका लावा आदि मंगलकारी ३ वस्तुओंका दर्शन किया॥१–३ ॥ 1898 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ द्वितीय खण्ड ] - 14 C
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४२० श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २१ रत्नश्रेष्ठं मणिश्रेष्ठं वस्त्रश्रेष्ठं च काञ्चनम् ब्राह्मणेभ्यो ददौ भक्त्या यथा नित्यं च नारद अमूल्यरत्नं यत्किञ्चिन्मुक्तामाणिक्यहीरकम् ददौ विप्राय गुरवे यात्रामङ्गलहेतवे गजरत्नमश्वरत्नं धनरत्नं मनोहरम् ददौ सर्वं दरिद्राय विप्राय मङ्गलाय च ॥
भाण्डाराणां सहस्राणि नगराणां द्विलक्षकम् ।
ग्रामाणां शतकोटिं च ब्राह्मणाय ददौ मुदा ॥
पुत्रं कृत्वा तु राजेन्द्रं सर्वेषु दानवेषु च ।
पुत्रं समर्प्य भार्यां तां राज्यं च सर्वसम्पदम् ॥
प्रजानुचरसङ्घ च भाण्डारं वाहनादिकम् ।
स्वयं सन्नाहयुक्तश्च धनुष्पाणिर्बभूव ह ॥
भृत्यद्वारा क्रमेणैव चकार सैन्यसञ्चयम् ।
अश्वानां च त्रिलक्षेण लक्षेण वरहस्तिनाम् ॥
रथानामयुतेनैव धानुष्काणां त्रिकोटिभिः ।
त्रिकोटिभिर्वर्मिणां च शूलिनां च त्रिकोटिभिः ॥
कृता सेनापरिमिता दानवेन्द्रेण नारद ।
तस्यां सेनापतिश्चैव युद्धशास्त्रविशारदः ॥
महारथः स विज्ञेयो रथिनां प्रवरो रणे ।
त्रिलक्षाक्षौहिणीसेनापतिं कृत्वा नराधिपः ॥
त्रिंशदक्षौहिणीबाधं भाण्डौघं च चकार ह ।
बहिर्बभूव शिविरान्मनसा श्रीहरिं स्मरन् ॥
रत्नेन्द्रसारनिर्माणविमानमारुरोह सः ।
गुरुवर्गान्पुरस्कृत्य प्रययौ शङ्करान्तिकम् ॥
पुष्पभद्रानदीतीरे यत्राक्षयवटः शुभः ।
सिद्धाश्रमं च सिद्धानां सिद्धिक्षेत्रं च नारद ॥
कपिलस्य तपःस्थानं पुण्यक्षेत्रे च भारते ॥ हे नारद! उसने प्रतिदिनकी भाँति ब्राह्मणोंको ॥ ४ श्रद्धापूर्वक उत्तम रत्न श्रेष्ठ मणियाँ, सुन्दर वस्त्र तथा स्वर्ण प्रदान किया । यात्रा मंगलमयी होनेके लिये । उसने बहुमूल्य रत्न, मोती, मणि तथा हीरा आदि जो ॥ ५ कुछ उसके पास था, अपने विप्र गुरुको समर्पित किया । उसने अपने कल्याणार्थ श्रेष्ठ तथा सुन्दर । हाथी, घोड़े और धन - सामग्री सब कुछ दरिद्र ६ ब्राह्मणोंको प्रदान किये । इसी प्रकार शंखचूड़ने ब्राह्मणोंको प्रसन्नतापूर्वक हजारों कोष, भण्डार, दो लाख नगर और सौ करोड़ गाँव प्रदान किये ॥४-७ ॥ तत्पश्चात् उसने अपने पुत्रको सम्पूर्ण दानवोंका राजा बनाकर उसे अपनी पत्नी, राज्य, ८ सम्पूर्ण सम्पत्ति, प्रजा, सेवक वर्ग, कोष और वाहन आदि सौंपकर स्वयं कवच पहन लिया और हाथमें धनुष धारण कर लिया, फिर क्रमसे सेवकोंके ९ माध्यम से सैनिकोंको एकत्र किया । हे नारद! उस दानवराजके द्वारा तीन लाख घोड़ों, एक लाख उत्तम कोटिके हाथियों, दस हजार रथों, तीन करोड़ १० धनुर्धारियों, तीन करोड़ कवचधारियों और तीन करोड़ त्रिशूलधारियोंसे युक्त एक विशाल सेना तैयार कर ली गयी ॥ ८ – ११३ ॥ ११ जो रणमें सभी रथियोंमें श्रेष्ठ होता है, उसे महारथी कहा जाता है । उसने युद्धशास्त्रमें विशारद ऐसे ही एक महारथीको उस सेनाका सेनापति नियुक्त १२ कर दिया । इस प्रकार राजा शंखचूड़ने उसे तीन लाख अक्षौहिणी सेनाका सेनापति बनाकर उसे तीस - तीस १३ अक्षौहिणी सेनाके समूहोंमें रक्षाके लिये सैन्यसामग्रीसे सम्पन्न कर दिया और तत्पश्चात् मनमें भगवान् श्रीहरिका स्मरण करता हुआ वह शिविरसे बाहर १४ निकल गया ॥ १२-१४ ॥ वह सर्वोत्तम रत्नोंसे निर्मित विमानपर आरूढ़ हुआ और गुरुवृन्दोंको आगे करके भगवान् शंकरके १५ पास चल पड़ा ॥१५ ॥
हे नारद! पुष्पभद्रानदीके तटपर एक सुन्दर वटवृक्ष है, वहाँ सिद्ध महात्माओंका सिद्धाश्रम है । १६ उस स्थानको सिद्धिक्षेत्र कहा गया है । भारतमें स्थित वह पुण्यक्षेत्र कपिलमुनिकी तपोभूमि है । वह पश्चिमी 1898 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ द्वितीय खण्ड ] —14 D
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अ ० २१ ] पश्चिमोदधिपूर्वे च मलयस्य च पश्चिमे ॥
श्रीशैलोत्तरभागे च गन्धमादनदक्षिणे ।
पञ्चयोजनविस्तीर्णा दैर्घ्यं शतगुणा तथा ॥
शुद्धस्फटिकसङ्काशा भारते च सुपुण्यदा ।
शाश्वती जलपूर्णा च पुष्पभद्रा नदी शुभा ॥
लवणाब्धिप्रिया भार्या शश्वत्सौभाग्यसंयुता ।
शरावतीमिश्रिता च निर्गता सा हिमालयात् ॥
गोमतीं वामतः कृत्वा प्रविष्टा पश्चिमोदधौ ।
तत्र गत्वा शङ्खचूडो ददर्श चन्द्रशेखरम् ॥
वटमूले समासीनं सूर्यकोटिसमप्रभम् ।
कृत्वा योगासनं दृष्ट्वा मुद्रायुक्तं च सस्मितम् ॥
शुद्धस्फटिकसङ्काशं ज्वलन्तं ब्रह्मतेजसा ।
त्रिशूलपट्टिशधरं व्याघ्रचर्माम्बरं वरम् ॥
भक्तमृत्युहरं शान्तं गौरीकान्तं मनोहरम् ।
तपसां फलदातारं दातारं सर्वसम्पदाम् ॥
आशुतोषं प्रसन्नास्यं भक्तानुग्रहकातरम् ।
विश्वनाथं विश्वबीजं विश्वरूपं च विश्वजम् ॥
विश्वम्भरं विश्ववरं विश्वसंहारकारकम् ।
कारणं कारणानां च नरकार्णवतारणम् ॥
ज्ञानप्रदं ज्ञानबीजं ज्ञानानन्दं सनातनम् ।
अवरुह्य विमानाच्च तं दृष्ट्वा दानवेश्वरः ॥
सर्वैः सार्धं भक्तियुक्तः शिरसा प्रणनाम सः ।
वामतो भद्रकालीं च स्कन्दं च तत्पुरः स्थितम् ॥
आशिषं च ददौ तस्मै काली स्कन्दश्च शङ्करः । नवम स्कन्ध ४२१ १७ | समुद्रके पूर्वमें, मलयपर्वतके पश्चिममें, श्रीशैलपर्वतकी उत्तर दिशामें तथा गन्धमादनपर्वतकी दक्षिण दिशामें स्थित है ॥ १६-१७३ ॥ १८ वहाँ भारतवर्षकी एक पुण्यदायिनी नदी बहती है, जो पाँच योजन चौड़ी तथा उससे सौ गुनी लम्बी है । पुष्पभद्रा नामक वह कल्याणकारिणी, १ ९ शाश्वत तथा शुद्ध स्फटिकमणिके सदृश प्रतीत होनेवाली नदी जलसे सदा परिपूर्ण रहती है । लवण-समुद्रकी प्रिय भार्याके रूपमें प्रतिष्ठित वह नदी सदा सौभाग्यवती बनी रहती है । वह हिमालयसे २० निकली हुई है तथा कुछ दूर जाकर शरावती नदीमें मिल गयी है । वह गोमतीको अपनेसे बायें करके प्रवाहित होती हुई अन्तमें पश्चिमी समुद्रमें समाविष्ट २१ हो जाती है॥१८–२०३ ॥ वहाँ पहुँचकर शंखचूड़ने देखा कि करोड़ों सूर्यके समान प्रकाशमान चन्द्रशेखर भगवान् शिव २२ वटवृक्षके नीचे विराजमान हैं । वे मुद्रासे युक्त होकर योगासनमें स्थित थे और उनके मुखमण्डलपर मुसकान व्याप्त थी । ब्रह्मतेजसे देदीप्यमान वे भगवान् शंकर २३ शुद्ध स्फटिकमणिके समान प्रतीत हो रहे थे । वे अपने हाथोंमें त्रिशूल और पट्टिश तथा शरीरपर श्रेष्ठ
बाघम्बर धारण किये हुए थे । २१ - २३ ॥
२४ अपने भक्तोंकी मृत्युतकको टाल देनेवाले, शान्तस्वभाव, मनोहर, तपस्याओंका फल तथा सभी प्रकारकी सम्पदाएँ प्रदान करनेवाले, शीघ्र प्रसन्न २५ होनेवाले, प्रसादपूर्ण मुखमण्डलवाले, भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये व्याकुल, विश्वनाथ, विश्वबीज, विश्वरूप, विश्वज, विश्वम्भर, विश्ववर, विश्वसंहारक, कारणों के भी कारण, नरकरूपी समुद्रसे पार करनेवाले, ज्ञानप्रद, २६ ज्ञानबीज, ज्ञानानन्द तथा सनातन उन गौरीपति महादेवको देखकर उस दानवेश्वर शंखचूड़ने विमानसे उतरकर सबके साथ वहाँ विद्यमान शंकरको सिर २७ झुकाकर भक्तिपूर्वक प्रणाम किया । शंखचूड़ने शिवके वामभागमें विराजमान भद्रकाली तथा उनके सामने स्थित कार्तिकेयको भी प्रणाम किया । तब भद्रकाली, २८ कार्तिकेय तथा भगवान् शंकरने उसे आशीर्वाद प्रदान किया ॥ २४–२८३ ॥