देवी भागवत उत्तरार्द्ध — पृष्ठ 431–440

देवी भागवत उत्तरार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 431–440

पृष्ठ 431

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४२२ उत्तस्थुरागतं दृष्ट्वा सर्वे नन्दीश्वरादयः परस्परं च भाषन्ते चक्रुस्तत्र च साम्प्रतम् । राजा कृत्वा च सम्भाषामुवास शिवसन्निधौ प्रसन्नात्मा महादेवो भगवांस्तमुवाच ह । महादेव उवाच विधाता जगतां ब्रह्मा पिता धर्मस्य धर्मवित् ॥ मरीचिस्तस्य पुत्रश्च वैष्णवाश्चापि धार्मिकः । कश्यपश्चापि तत्पुत्रो धर्मिष्ठश्च प्रजापतिः दक्षः प्रीत्या ददौ तस्मै भक्त्या कन्यास्त्रयोदश । तास्वेका च दनुः साध्वी तत्सौभाग्यविवर्धिता चत्वारिंशद्दनोः पुत्रा दानवास्तेजसोल्बणाः । तेष्वेको विप्रचित्तिश्च महाबलपराक्रमः

तत्पुत्रो धार्मिको दम्भो विष्णुभक्तो जितेन्द्रियः ।

जजाप परमं मन्त्रं पुष्करे लक्षवत्सरम् ॥

शुक्राचार्यं गुरुं कृत्वा कृष्णस्य परमात्मनः ।

तदा त्वां तनयं प्राप परं कृष्णपरायणम् ॥

पुरा त्वं पार्षदो गोपो गोपेष्वपि सुधार्मिकः ।

अधुना राधिकाशापाद्भारते दानवेश्वरः ॥

आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तं तुच्छं मेने च वैष्णवः ।

सालोक्यसाष्टिसायुज्यसामीप्यं च हरेरपि ॥

दीयमानं न गृह्णन्ति वैष्णवाः सेवनं विना ।

ब्रह्मत्वममरत्वं वा तुच्छं मेने च वैष्णवः ॥

इन्द्रत्वं वा मनुत्वं वा न मेने गणनासु च ।

कृष्णभक्तस्य ते किं वा देवानां विषये भ्रमे ॥

श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २१ ॥ २ ९ शंखचूड़को वहाँ आया देखकर नन्दीश्वर आदि सभी गण उठकर खड़े हो गये और परस्पर सामयिक बातें करने लगे । उनसे बातचीत करके ॥ ३० राजा शंखचूड़ शिवके समीप बैठ गया, तब प्रसन्न चित्तवाले भगवान् महादेव उससे कहने लगे ॥ २ ९ -३०३ ॥ महादेवजी बोले – सम्पूर्ण जगत् की रचना ३१ करनेवाले धर्मात्मा ब्रह्मा धर्मके पिता हैं, परम वैष्णव तथा धर्मपरायण मरीचि उन धर्मके पुत्र हैं और उन मरीचिके पुत्र धर्मपरायण कश्यप हैं । ॥ ३२ प्रजापति दक्षने प्रसन्नतापूर्वक उन्हें अपनी तेरह कन्याएँ सौंप दी थीं । उन्हीं कन्याओंमें एक परम साध्वी दनु भी है, जो उस वंशका सौभाग्य बढ़ानेवाली हुई ॥ ३१–३३ ॥ ॥ ३३ उस दनुके चालीस पुत्र हुए, जो तेजसम्पन्न प्रबल दानवके रूपमें विख्यात थे । उन पुत्रोंमें महान् बल तथा पराक्रमसे युक्त एक पुत्र विप्रचित्ति था । ॥ ३४ उसका पुत्र दम्भ था; जो परम धार्मिक, विष्णुभक्त तथा जितेन्द्रिय था । उसने शुक्राचार्यको गुरु बनाकर परमात्मा श्रीकृष्णके उत्तम मन्त्रका पुष्करक्षेत्रमें एक ३५ लाख वर्षतक जप किया; तब उसने कृष्णकी भक्ति में सदा संलग्न रहनेवाले तुम जैसे श्रेष्ठ पुरुषको पुत्ररूपमें

प्राप्त किया । ३४–३६ ॥

३६ पूर्वजन्ममें तुम भगवान् कृष्णके पार्षद और गोपोंमें परम धार्मिक गोप थे । इस समय तुम राधिकाके शापसे भारतवर्ष में दानवेश्वर बन गये ३७ | हो ॥ ३७ ॥

भगवान् विष्णुका भक्त ब्रह्मासे लेकर तृणपर्यन्त सभीको तुच्छ समझता है । वैष्णव श्रीहरिकी सेवाको ३८ छोड़कर सालोक्य, साष्टि, सायुज्य और सामीप्य– इन मुक्तियोंको दिये जानेपर भी स्वीकार नहीं करते । वैष्णव ब्रह्मत्व अथवा अमरत्वको भी तुच्छ मानता है, ३ ९ इन्द्रत्व अथवा मनुष्यत्वको तो वह किन्हीं भी गणनाओंमें स्थान नहीं देता है; तो फिर तुम - जैसे कृष्णभक्तको देवताओंके भ्रमात्मक राज्यसे क्या ४० | प्रयोजन! ॥ ३८ - ४० ॥

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अ ० २१ ] नवम स्कन्ध ४२३

देहि राज्यं च देवानां मत्प्रीतिं रक्ष भूमिप ।

सुखं स्वराज्ये त्वं तिष्ठ देवास्तिष्ठन्तु वै पदे ॥

अलं भूतविरोधेन सर्वे कश्यपवंशजाः ।

यानि कानि च पापानि ब्रह्महत्यादिकानि च ॥

ज्ञातिद्रोहस्य पापानि कलां नार्हन्ति षोडशीम् ।

स्वसम्पदां च हानिं च यदि राजेन्द्र मन्यसे ॥

सर्वावस्था च समतां केषां याति च सर्वदा ।

ब्रह्मणश्च तिरोभावो लये प्राकृतिके सदा ॥

आविर्भावः पुनस्तस्य प्रभावादीश्वरेच्छया ।

ज्ञानवृद्धिश्च तपसा स्मृतिलोपश्च निश्चितम् ॥

करोति सृष्टिं ज्ञानेन स्रष्टा सोऽपि क्रमेण च ।

परिपूर्णतमो धर्मः सत्ये सत्याश्रये सदा ॥

त्रिभागः सोऽपि त्रेतायां द्विभागो द्वापरे स्मृतः ।

एकभागः कलौ पूर्वं तदंशश्च क्रमेण च ॥

कलामात्रं कलेः शेषे कुह्वां चन्द्रकला यथा ।

यादृक् तेजो रवेग्रष्मे न तादृक् शिशिरे पुनः ॥

दिनेषु यादृङ्मध्याह्ने सायं प्रातर्न तत्समम् ।

उदयं याति कालेन बालतां च क्रमेण च ॥

प्रकाण्डतां च तत्पश्चात्कालेऽस्तं पुनरेति सः ।

दिने प्रच्छन्नतां याति कालेन दुर्दिने घने ॥

हे राजन्! तुम देवताओंका राज्य वापस कर दो ४१ और मेरी प्रीतिकी रक्षा करो । तुम अपने राज्यमें सुखपूर्वक रहो और देवता अपने स्थानपर रहें । प्राणियोंमें परस्पर विरोध नहीं होना चाहिये; क्योंकि सभी तो मुनि कश्यपके ही वंशज हैं । ब्रह्महत्या ४२ आदिसे होनेवाले जितने पाप हैं, वे जाति - द्रोह करनेसे लगनेवाले पापकी सोलहवीं कलाके भी बराबर नहीं हैं ॥ ४१-४२३ ॥ हे राजेन्द्र! यदि तुम इसे अपनी सम्पत्तिकी हानि ४३ मानते हो तो यह सोचो कि किन लोगोंकी सभी स्थितियाँ सदा एकसमान रहती हैं । प्राकृतिक प्रलयके समय ब्रह्माका भी सदा तिरोधान हो जाया करता है तदनन्तर ईश्वरके प्रभाव तथा उनकी इच्छासे पुनः ४४ उनका प्राकट्य होता है । उस समय उनकी स्मृति लुप्त रहती है, फिर तपस्याके द्वारा उनके ज्ञानमें वृद्धि हो जाती है, यह निश्चित है । तत्पश्चात् वे ब्रह्मा ४५ ज्ञानपूर्वक क्रमशः सृष्टि करते हैं॥४३–४५३ ॥ सत्ययुगमें लोग सदा सत्यके आश्रयपर रहते हैं, इसलिये उस युगमें धर्म अपने परिपूर्णतम स्वरूपमें विद्यमान रहता है । वही धर्म त्रेतायुगमें तीन भागसे, ४६ द्वापरमें दो भागसे तथा कलिमें एक भागसे युक्त कहा गया है । इस प्रकार क्रमसे उसका एक - एक अंश कम होता रहता है । कलिके अन्तमें अमावस्या चन्द्रमाकी भाँति धर्मकी कला केवल नाममात्र रह ४७ जाती है ॥ ४६-४७३ ॥ ग्रीष्म ऋतु सूर्यका जैसा तेज रहता है, वैसा शिशिर ऋतुमें नहीं रह जाता । दिनमें भी सूर्यका जैसा तेज मध्याह्नकालमें होता है, उसके समान तेज प्रातः ४८ तथा सायंकालमें नहीं रहता । सूर्य समयसे उगते हैं, फिर क्रमसे बालसूर्यके रूपमें हो जाते हैं, तत्पश्चात् प्रचण्डरूपसे प्रकाशित होने लगते हैं और पुनः ४ ९ यथासमय अस्त हो जाते हैं । वह काल ऐसा भी कर देता है कि सूर्यको दिनमें ही मेघाच्छन्न आकाशमें छिप जाना पड़ता है । वे ही सूर्य राहुसे ग्रसित होनेपर काँपने लगते हैं और फिर थोड़ी ही देरमें प्रसन्न हो ५० | जाते हैं ॥ ४८ - ५० ॥

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४२४

राहुग्रस्ते कम्पितश्च पुनरेव प्रसन्नताम् ।

परिपूर्णतमश्चन्द्रः पूर्णिमायां च जायते ॥

तादृशो न भवेन्नित्यं क्षयं याति दिने दिने ।

पुनश्च पुष्टिमायाति परं कुह्वा दिने दिने ॥

सम्पद्युक्तः शुक्लपक्षे कृष्णे म्लानश्च यक्ष्मणा ।

राहुग्रस्ते दिने म्लानो दुर्दिने न विरोचते ॥

काले चन्द्रो भवेच्छुक्लो भ्रष्ट श्रीः कालभेदतः ।

भविष्यति बलिश्चेन्द्रो भ्रष्टश्रीः सुतलेऽधुना ॥

कालेन पृथ्वी सस्याढ्या सर्वाधारा वसुन्धरा ।

काले जले निमग्ना सा तिरोभूताम्बुविप्लुता ॥

काले नश्यन्ति विश्वानि प्रभवन्त्येव कालतः ।

चराचराश्च कालेन नश्यन्ति प्रभवन्ति च ॥

ईश्वरस्यैव समता ब्रह्मणः परमात्मनः ।

अहं मृत्युञ्जयो यस्मादसंख्यं प्राकृतं लयम् ॥

आदर्श चापि द्रक्ष्यामि वारं वारं पुनः पुनः ।

स च प्रकृतिरूपश्च स एव पुरुषः स्मृतः ॥

स चात्मा स च जीवश्च नानारूपधरः परः ।

करोति सततं यो हि तन्नामगुणकीर्तनम् ॥

काले मृत्युं स जयति जन्मरोगभयं जराम् ।

स्रष्टा कृतो विधिस्तेन पाता विष्णुः कृतो भवेत् ॥

अहं कृतश्च संहर्ता वयं विषयिणः कृताः । श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २१ जैसे पूर्णिमा तिथिको चन्द्रमा पूर्णतम रहते हैं, ५१ वैसे वे सदा नहीं रहते, अपितु प्रतिदिन उनकी कला में क्रमशः क्षय होता रहता है । तत्पश्चात् अमावस्यासे इनमें दिनोंदिन वृद्धि होने लगती है और ये पुनः पुष्ट हो जाते हैं । चन्द्रमा शुक्लपक्षमें शोभायुक्त रहते हैं ५२ और कृष्णपक्षमें क्षयके द्वारा म्लान हो जाते हैं । राहु द्वारा ग्रसित होनेके अवसरपर ये शोभाहीन हो जाते हैं और आकाशके मेघाच्छन्न होनेके समय ये प्रकाशित नहीं होते; इस प्रकार कालभेदसे चन्द्रमा ५३ किसी समय तेजस्वी और किसी समय शोभाविहीन हो जाते हैं ॥ ५१-५३३ ॥ इस समय श्रीविहीन राजा बलि भविष्य में ५४ सुतललोकके इन्द्र होंगे । सबकी आधारस्वरूपा पृथ्वी कालके प्रभावसे सस्योंसे सम्पन्न हो जाती है और फिर वही पृथ्वी कालके प्रभावसे [ प्रलयकालीन ] जलमें निमग्न हो जाती है और तिरोहित होकर ५५ आप्लावित हो जाती है ॥ ५४-५५ ॥ एक निश्चित समयपर सभी लोक नष्ट हो जाते हैं और फिर समयपर उत्पन्न भी हो जाते हैं । इस प्रकार जगत् के सम्पूर्ण चराचर पदार्थ कालके ही ५६ प्रभावसे नष्ट होते हैं तथा उत्पन्न होते हैं ॥ ५६ ॥

ऐश्वर्यसम्पन्न परब्रह्म परमात्माकी ही समता कालसे हो सकती है । उन्हींकी कृपासे मैं मृत्युंजय हो सका हूँ, मैंने असंख्य प्राकृत प्रलय देखे हैं ५७ तथा आगे भी बार - बार देखूँगा । वे ही प्रकृतिरूप हैं और वे ही परम पुरुष भी कहे गये हैं । वे परमेश्वर ही आत्मा हैं, वे ही जीव हैं और वे ही ५८ अनेक प्रकारके रूप धारण करके सर्वत्र विराजमान हैं ॥ ५७-५८३ ॥ जो मनुष्य उन परमेश्वरके नामों तथा गुणोंका सतत कीर्तन करता है, वह यथासमय जन्म, ५ ९ मृत्यु, रोग, भय तथा बुढ़ापेपर विजय प्राप्त कर लेता है । उन्हीं परमेश्वरने ब्रह्माको सृजनकर्ता, विष्णुको पालनकर्ता तथा मुझ महादेवको संहारकर्ता के रूपमें स्थापित किया है । इस प्रकार उन्हींके द्वारा ६० हमलोग अपने - अपने कार्योंमें नियुक्त किये गये हैं ॥ ५ ९ -६०३ ॥

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अ ० २१ ] नवम स्कन्ध ४२५ कालाग्निरुद्रं संहारे नियोज्य विषये नृप ॥

अहं करोमि सततं तन्नामगुणकीर्तनम् ।

तेन मृत्युञ्जयोऽहं च ज्ञानेनानेन निर्भयः ॥

मृत्युर्मृत्युभयाद्याति वैनतेयादिवोरगाः ।

इत्युक्त्वा स च सर्वेशः सर्वभावेन तत्परः ॥

विरराम च शम्भुश्च सभामध्ये च नारद ।

राजा तद्वचनं श्रुत्वा प्रशशंस पुनः पुनः ॥

उवाच मधुरं देवं परं विनयपूर्वकम् । शङ्खचूड उवाच त्वया यत्कथितं देव नान्यथा वचनं स्मृतम् ॥

तथापि किञ्चिद्यथार्थं श्रूयतां मन्निवेदनम् ।

ज्ञातिद्रोहे महत्पापं त्वयोक्तमधुना च यत् ॥

गृहीत्वा तस्य सर्वस्वं कुतः प्रस्थापितो बलिः ।

मया समुद्धृतं सर्वमूर्ध्वमैश्वर्यमीश्वर ॥

सुतलाच्च समुद्धर्तुं नालं तत्र गदाधरः ।

सभ्रातृको हिरण्याक्षः कथं देवैश्च हिंसितः ॥

शुम्भादयश्चासुराश्च कथं देवैर्निपातिताः ।

पुरा समुद्रमथने पीयूषं भक्षितं सुरैः ॥

क्लेशभाजो वयं तत्र ते सर्वे फलभोगिनः ।

क्रीडाभाण्डमिदं विश्वं प्रकृतेः परमात्मनः ॥

यस्मै यत्र स ददाति तस्यैश्वर्यं भवेत्तदा ।

देवदानवयोर्वादः शश्वन्नैमित्तिकः सदा ॥

६१ हे राजन्! इस समय मैं कालाग्नि रुद्रको संहार-कार्यमें नियुक्त करके उन्हीं परमात्माके नाम और गुणका निरन्तर कीर्तन कर रहा हूँ । इसीसे मैं मृत्युको जीत लेनेवाला हो गया हूँ और इस ज्ञानसे सम्पन्न ६२ हुआ मैं सदा निर्भय रहता हूँ । मेरे पास आनेसे मृत्यु भी अपनी मृत्युके भयसे उसी प्रकार भाग जाती है, जैसे गरुडके भयसे सर्प ॥ ६१-६२३ ॥ ६३ हे नारद! पूर्णरूपसे तत्पर होकर सभाके बीच अपने सम्पूर्ण भावोंको प्रदर्शित करते हुए सर्वेश्वर महादेव शंखचूड़से ऐसा कहकर चुप हो गये । उनकी बात सुनकर राजा शंखचूड़ने बार - बार उनकी ६४ प्रशंसा की और वह विनम्रतापूर्वक उन परम प्रभुसे यह मधुर वचन कहने लगा ॥ ६३-६४३ ॥ शंखचूड़ बोला - [ हे भगवन्! ] आपने जो बात कही है, उसे अन्यथा नहीं कहा जा सकता, ६५ परन्तु मेरा भी कुछ यथार्थ निवेदन है, उसे आप सुन लीजिये ॥ ६५३ ॥

आपने अभी यह कहा है कि जाति - द्रोह करनेमें महान् पाप होता है, तो फिर बलिका सर्वस्व छीनकर ६६ आपलोगोंने उसे सुतललोकमें क्यों भेज दिया? हे प्रभो! मैं ही बलिके समस्त ऐश्वर्यको पातालसे उठाकर यहाँ लाया हूँ, [ अतः इसपर मेरा ही पूर्ण ६७ अधिकार है । ] उस समय मैं बलिको सुतललोकसे लानेमें समर्थ नहीं था; क्योंकि भगवान् श्रीहरि गदा धारण किये वहाँ स्थित थे । देवताओंने भाईसहित हिरण्याक्षका वध क्यों किया और उन्होंने शुम्भ आदि ६८ असुरोंको क्यों मार डाला? इसी प्रकार प्राचीन कालमें समुद्र - मन्थनके समय देवता सारा अमृत पी गये थे । उस समय कष्ट तो हम दानवोंने उठाया था और ६ ९ उसके अमृतरूपी फलका भोग उन समस्त देवताओंने किया था ॥ ६६-६९ ३ ॥ यह विश्व प्रकृतिस्वरूप उन परमात्माका क्रीडाभाण्ड है । वे जिस व्यक्तिको जहाँ जो सम्पत्ति देते हैं, वह ७० उस समय उसीकी हो जाती है । किसी निमित्तको लेकर देवता तथा दानवोंके बीच विवाद सदासे निरन्तर चला आ रहा है । किसी समय उनकी जीत ७१ अथवा हार होती है और समयानुसार कभी हमारी

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४२६

पराजय जयस्तेषां कालेऽस्माकं क्रमेण च ।

तदावयोर्विरोधे वागमनं निष्फलं परम् ॥

समसम्बन्धिनो बन्धोरीश्वरस्य महात्मनः ।

इयं ते महती लज्जा युद्धेऽस्माभिः सहाधुना ॥

जये ततोऽधिका कीर्तिर्हानिश्चैव पराजये ।

इत्येतद्वचनं श्रुत्वा प्रहस्य च त्रिलोचनः ॥

यथोचितमुत्तरं तमुवाच दानवेश्वरम् । महादेव उवाच युष्माभिः सह युद्धे मे ब्रह्मवंशसमुद्भवैः ॥

का लज्जा महती राजन्नकीर्तिर्वा पराजये ।

युद्धमादौ हरेरेव मधुना कैटभेन च ॥

हिरण्यकशिपोश्चैव सह तेनात्मना नृप ।

हिरण्याक्षस्य युद्धं च पुनस्तेन गदाभृता ॥

त्रिपुरैः सह युद्धं च मयापि च पुरा कृतम् ।

सर्वेश्वर्याः सर्वमातुः प्रकृत्याश्च बभूव ह ॥

सह शुम्भादिभिः पूर्वं समरः परमाद्भुतः ।

पार्षदप्रवरस्त्वं च कृष्णस्य परमात्मनः ॥

ये ये हताश्च दैतेया नहि केऽपि त्वया समाः ।

का लज्जा महती राजन् मम युद्धे त्वया सह ॥

सुराणां शरणस्यैव प्रेषितश्च हरेरहो ।

देहि राज्यं च देवानामिति मे निश्चितं वचः ॥

युद्धं वा कुरु मत्सार्धं वाग्व्यये किं प्रयोजनम् ।

इत्युक्त्वा शङ्करस्तत्र विरराम च नारद ।

उत्तस्थौ शङ्खचूडश्च ह्यमात्यैः सह सत्वरम् ॥

श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २१ जीत - हार होती है । अतः ऐसी स्थितिमें देवता तथा ७२ दानव दोनोंके समान सम्बन्धी तथा बन्धुस्वरूप आप महात्मा परमेश्वरका हम दोनोंके विरोधके बीचमें आना निरर्थक है । यदि इस समय हमलोगोंके साथ ७३ आप युद्ध करेंगे, तो यह आपके लिये महान् लज्जाकी बात होगी । हमारी जीत होनेपर पहलेसे भी अधिक हम दानवोंकी कीर्ति बढ़ जायगी और पराजय होनेपर ७४ आपकी मानहानि होगी ॥ ७० – ७३३ ॥ [ हे नारद! ] शंखचूड़की यह बात सुनकर तीन नेत्रोंवाले भगवान् शिवने हँसकर उस दानवेन्द्रको समुचित उत्तर देना आरम्भ किया ॥ ७४३ ॥

७५ महादेवजी बोले – हे राजन्! ब्रह्माके ही वंशमें उत्पन्न हुए तुमलोगोंके साथ युद्ध करनेमें मुझे कौन - सी बड़ी लज्जा होगी और हारनेपर अपकीर्ति ही ७६ क्या होगी? हे नृप! इसके पहले भी तो मधु और कैटभसे श्रीहरिका युद्ध हो चुका है । एक बार उनके साथ हिरण्यकशिपुका युद्ध हुआ था और इसके बाद ७७ श्रीहरिने गदा लेकर हिरण्याक्षके साथ भी युद्ध किया था । मैं भी तो पूर्वकालमें त्रिपुर राक्षसके साथ युद्ध कर चुका हूँ । इसी प्रकार पूर्व समयमें शुम्भ आदि ७८ दानवोंके साथ सर्वेश्वरी, सर्वजननी पराप्रकृतिका भी अत्यन्त विस्मयकारी युद्ध हुआ था ॥ ७५ - ७८३ ॥ तुम तो परमात्मा श्रीकृष्णके प्रधान पार्षद ७ ९ रहे हो । जो - जो दैत्य मारे गये हैं, वे तुम्हारे - जैसे नहीं थे । अतः हे राजन्! तुम्हारे साथ युद्ध करनेमें मुझे कौन - सी बड़ी लज्जा है? सभी देवता ८० श्रीहरिकी शरणमें गये थे, तब देवताओंकी सहायताके लिये उन्होंने मुझे भेजा है । तुम देवताओंका राज्य वापस कर दो - यह मेरा निश्चित वचन है, अन्यथा ८१ मेरे साथ युद्ध करो । वाणीका अपव्यय करनेसे क्या लाभ? ॥ ७ ९ – ८१३ ॥ हे नारद! ऐसा कहकर भगवान् शंकर चुप हो गये; और शंखचूड़ भी मन्त्रियोंके साथ शीघ्र ही उठ ८२ | खड़ा हुआ ॥८२ ॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां नवमस्कन्धे नारायणनारदसंवादे शङ्खचूडकृते प्रबोधवाक्यवर्णनं नामैकविंशोऽध्यायः ॥ २१ ॥

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अ ० २२ ] नवम स्कन्ध ४२७ अथ द्वाविंशोऽध्यायः कुमार कार्तिकेय और भगवती भद्रकालीसे शंखचूड़का भयंकर युद्ध और आकाशवाणीका पाशुपतास्त्रसे श्रीनारायण उवाच

शिवं प्रणम्य शिरसा दानवेन्द्रः प्रतापवान् ।

समारुरोह यानं च सहामात्यैः स सत्वरः ॥

शिवः स्वसैन्यं देवांश्च प्रेरयामास सत्वरम् ।

दानवेन्द्रः ससैन्यश्च युद्धारम्भे बभूव ह ॥

स्वयं महेन्द्रो युयुधे सार्धं च वृषपर्वणा ।

भास्करो युयुधे विप्रचित्तिना सह सत्वरः ॥

दम्भेन सह चन्द्रश्च चकार परमं रणम् ।

कालस्वरेण कालश्च गोकर्णेन हुताशनः ॥

कुबेर: कालकेयेन विश्वकर्मा मयेन च ।

भयङ्करेण मृत्युश्च संहारेण यमस्तथा ॥

विकङ्कणेन वरुणश्चञ्चलेन समीरणः ।

बुधश्च घृतपृष्ठेन रक्ताक्षेण शनैश्चरः ॥

जयन्तो रत्नसारेण वसवो वर्चसां गणैः ।

अश्विनौ च दीप्तिमता धूम्रेण नलकूबरः ॥

धुरन्धरेण धर्मश्च उषाक्षेण च मङ्गलः ।

शोभाकरेण वै भानुः पिठरेण च मन्मथः ॥

गोधामुखेन चूर्णेन खड्गेन च ध्वजेन च । काञ्चीमुखेन पिण्डेन धूम्रेण सह नन्दिना ।

विश्वेन च पलाशेनादित्याद्या युयुधुः परे ।

एकादश च रुद्रा वै एकादशभयङ्करैः ॥

महामारी च युयुधे चोग्रचण्डादिभिः सह ।

नन्दीश्वरादयः सर्वे दानवानां गणैः सह ॥

युयुधुश्च महायुद्धे प्रलयेऽपि भयङ्करे ।

वटमूले च शम्भुश्च तस्थौ काल्या सुतेन च ॥

सर्वे च युयुधुः सैन्यसमूहाः सततं मुने ।

रत्नसिंहासने रम्ये कोटिभिर्दानवैः सह ॥

उवास शङ्खचूडश्च रत्नभूषणभूषितः । शंखचूड़की अवध्यताका कारण बताना श्रीनारायण बोले- [ हे नारद! ] दानवराज प्रतापी शंखचूड़ सिर झुकाकर शिवजीको प्रणाम १ करके मन्त्रियोंके साथ तत्काल यानपर सवार हुआ । उसी समय महादेवजीने अपनी सेना तथा देवताओंको तुरंत युद्धके लिये आज्ञा दे दी और २ दानवेन्द्र शंखचूड़ भी अपनी सेनाको साथ लेकर युद्धके लिये तैयार हो गया ॥ २ ॥

३ स्वयं महेन्द्र वृषपर्वाके साथ और सूर्यदेव विप्रचित्तिके साथ वेगपूर्वक युद्ध करने लगे । इसी ४ तरह दम्भके साथ चन्द्रमाने भीषण युद्ध किया । उस समय कालस्वरके साथ काल, गोकर्णके साथ अग्निदेव, कालकेयके साथ कुबेर, मयके साथ विश्वकर्मा, भयंकरके साथ मृत्यु, संहारके साथ यम, विकंकणके साथ वरुण, चंचलके साथ पवनदेव, ६ घृतपृष्ठके साथ बुध, रक्ताक्षके साथ शनैश्चर, रत्नसारके साथ जयन्त, वर्चसगणोंके साथ सभी ७ वसु, दीप्तिमान्‌के साथ दोनों अश्विनीकुमार, धूम्रके साथ नलकूबर, धुरन्धरके साथ धर्म, उषाक्षके साथ ८ मंगल, शोभाकरके साथ भानु, पिठरके साथ मन्मथ; गोधामुख, चूर्ण, खड्ग, ध्वज, कांचीमुख, पिण्ड, धूम्र, नन्दी, विश्व और पलाश आदि दानवोंके साथ ९ आदित्यगण युद्ध करने लगे । इसी तरह ग्यारह भयंकर दानवोंके साथ ग्यारहों रुद्र, उग्रचण्डा आदिके साथ १० महामारी और दानवगणोंके साथ सभी नन्दीश्वर आदि गण प्रलयसदृश भयंकर महासंग्राममें युद्ध करने ११ लगे ॥ ३ –११३ ॥ हे मुने! जब दोनों ओरके सभी सैनिक निरन्तर युद्ध कर रहे थे, उस समय भगवान् शंकर भगवती १२ काली तथा पुत्र कार्तिकेयके साथ वटवृक्षके नीचे विराजमान थे । उधर रत्नमय आभूषणोंसे अलंकृत १३ शंखचूड़ करोड़ों दानवोंके साथ रत्ननिर्मित रम्य सिंहासनपर बैठा हुआ था ॥ १२-१३३ ॥

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४२८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २२ शङ्करस्य च ये योधा दानवैश्च पराजिताः ॥

देवाश्च दुद्रुवुः सर्वे भीताश्च क्षतविग्रहाः ।

चकार कोपं स्कन्दश्च देवेभ्यश्चाभयं ददौ ॥

बलं च स्वर्गणानां च वर्धयामास तेजसा ।

सोऽयमेकश्च युयुधे दानवानां गणैः सह ॥

अक्षौहिणीनां शतकं समरे च जघान सः ।

असुरान्पातयामास काली कमललोचना ॥

पपौ रक्तं दानवानामतिक्रुद्धा ततः परम् ।

दशलक्षगजेन्द्राणां शतलक्षं च कोटिशः ॥

समादायैकहस्तेन मुखे चिक्षेप लीलया ।

कबन्धानां सहस्त्रं च ननर्त समरे मुने ॥

स्कन्दस्य शरजालेन दानवाः क्षतविग्रहाः ।

भीताश्च दुद्रुवुः सर्वे महारणपराक्रमाः ॥

वृषपर्वा विप्रचित्तिर्दम्भश्चापि विकङ्कणः ।

स्कन्देन सार्धं युयुधुस्ते सर्वे विक्रमेण च ॥

महामारी च युयुधे न बभूव पराङ्मुखी ।

बभूवुस्ते च संक्षुब्धाः स्कन्दस्य शक्तिपीडिताः ॥

न दुद्रुवुर्भयात्स्वर्गे पुष्पवृष्टिर्बभूव ह ।

स्कन्दस्य समरं दृष्ट्वा महारौद्रं समुल्बणम् ॥

दानवानां क्षयकरं यथा प्राकृतिको लयः ।

राजा विमानमारुह्य चकार बाणवर्षणम् ॥

नृपस्य शरवृष्टिश्च घनस्य वर्षणं यथा ।

महाघोरान्धकारश्च वह्न्युत्थानं बभूव च ॥

देवाः प्रदुद्रुवुः सर्वेऽप्यन्ये नन्दीश्वरादयः ।

एक एव कार्तिकेयस्तस्थौ समरमूर्धनि ॥

१४ उस युद्धमें दानवोंने शंकरजीके अनेक योद्धाओंको परास्त कर दिया । सभी देवताओंके अंग क्षत - विक्षत हो गये और वे भयभीत होकर भाग १५ चले । [ यह देखकर ] कार्तिकेय कुपित हो उठे और उन्होंने देवताओंको अभय प्रदान किया । उन्होंने अपने तेजसे अपने गणोंके बलमें वृद्धि की । तदनन्तर १६ वे अकेले ही दानवगणोंके साथ युद्ध करने लगे । उन्होंने संग्राममें एक सौ अक्षौहिणी सेनाको मार डाला ॥ १४–१६३ ॥ १७ उस युद्धमें कमलके समान नेत्रवाली कालीने बहुतसे असुरोंको धराशायी कर दिया और उसके बाद अत्यन्त क्रुद्ध होकर वे दानवोंका रक्त पीने लगीं । वे १८ दस लाख हाथियों तथा करोड़ों - करोड़ों सैनिकोंको एक हाथसे पकड़ - पकड़कर लीलापूर्वक अपने मुखमें डालने लगीं । हे मुने! उस समय हजारों मुण्डविहीन १ ९ धड़ रणभूमिमें नाचने लगे ॥१७- १ ९ ॥ रणमें महान् पराक्रम प्रदर्शित करनेवाले समस्त दानव कार्तिकेयकी बाणवर्षासे क्षत - विक्षत शरीरवाले २० हो गये और भयभीत होकर भागने लगे । तत्पश्चात् वृषपर्वा, विप्रचित्ति, दम्भ और विकंकण - ये सभी दानव पराक्रमी कार्तिकेयके साथ युद्ध करने लगे । २१ भगवती महामारी भी युद्ध करने लगीं, उन्होंने युद्धसे मुख नहीं मोड़ा । उधर स्वामी कार्तिकेयकी शक्तिसे २२ पीड़ित होकर दानव क्षुब्ध हो उठे, किंतु वे भयके कारण रणसे नहीं भागे । कार्तिकेयका वह महाभयंकर तथा भीषण युद्ध देखकर स्वर्गसे पुष्पवृष्टि होने लगी । २३ दानवोंका क्षय करनेवाला वह युद्ध प्राकृतिक प्रलय समान था ॥ २० - २३३ ॥ [ दानवोंकी यह स्थिति देखकर ] राजा २४ शंखचूड़ विमानपर चढ़कर बाणोंकी वर्षा करने लगा । राजाकी बाणवर्षा मेघोंकी वृष्टिके समान थी । इससे चारों ओर महाघोर अन्धकार छा गया और २५ सर्वत्र अग्निकी लपटें निकलने लगीं । इससे सभी देवता तथा अन्य नन्दीश्वर आदि गण भी भाग खड़े हुए । उस समय एकमात्र स्वामी कार्तिकेय ही २६ । समरभूमिमें डटे रहे ॥। २४–२६ ॥

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अ ० २२ ]

पर्वतानां च सर्पाणां शिलानां शाखिनां तथा ।

नृपश्चकार वृष्टिं च दुर्वारां च भयङ्करीम् ॥

नृपस्य शरवृष्ट्या च प्रहितः शिवनन्दनः ।

नीहारेण च सान्द्रेण प्रहितो भास्करो यथा ॥

धनुश्चिच्छेद स्कन्दस्य दुर्वहं च भयङ्करः ।

बभञ्ज च रथं दिव्यं चिच्छेद रथपीठकान् ॥

मयूरं जर्जरीभूतं दिव्यास्त्रेण चकार सः ।

शक्तिं चिक्षेप सूर्याभां तस्य वक्षस्य घातिनीम् ॥

क्षणं मूर्च्छा च सम्प्राप बभूव चेतनः पुनः ।

गृहीत्वा तद्धनुर्दिव्यं यद्दत्तं विष्णुना पुरा ॥

रत्नेन्द्रसारनिर्माणयानमारुह्य कार्तिकः ।

शस्त्रास्त्रं च गृहीत्वा च चकार रणमुल्बणम् ॥

सर्पांश्च पर्वतांश्चैव वृक्षांश्च प्रस्तरांस्तथा ।

सर्वांश्चिच्छेद कोपेन दिव्यास्त्रेण शिवात्मज: ॥

वह्निं निर्वापयामास पार्जन्येन प्रतापवान् ।

रथं धनुश्च चिच्छेद शङ्खचूडस्य लीलया ॥

सन्नाहं सारथिं चैव किरीटं मुकुटोज्ज्वलम् ।

चिक्षेप शक्तिं शुक्लाभां दानवेन्द्रस्य वक्षसि ॥

मूर्च्छा सम्प्राप्य राजा च चेतनश्च बभूव ह ।

आरुरोह यानमन्यद्धनुर्जग्राह सत्वरः ॥

चकार शरजालं च मायया मायिनां वरः ।

गुहं चच्छाद समरे शरजालेन नारद ॥

जग्राह शक्तिमव्यग्रां शतसूर्यसमप्रभाम् ।

प्रलयाग्निशिखारूपां विष्णोश्च तेजसावृताम् ॥

चिक्षेप तां च कोपेन महावेगेन कार्तिके ।

पपात शक्तिस्तद्गात्रे वह्निराशिरिवोज्वला ॥

मूर्च्छा सम्प्राप शक्त्या च कार्तिकेयो महाबलः । नवम स्कन्ध ४२ ९ राजा शंखचूड़ पर्वतों, सर्पों, पत्थरों तथा वृक्षोंकी २७ दुर्निवार्य तथा भयंकर वर्षा करने लगा । राजा शंखचूड़की बाणवर्षासे शिवपुत्र कार्तिकेय उसी प्रकार ढँक गये, जैसे घने कुहरेसे सूर्य ढँक जाते हैं । उसने कार्तिकेयके २८ दुर्वह तथा भयंकर धनुषको काट डाला, दिव्य रथको खण्ड - खण्ड कर दिया और रथपीठोंको छिन्न - भिन्न कर दिया । उसने कार्तिकेयके मयूरको अपने दिव्य अस्त्रसे २ ९ जर्जर कर दिया और सूर्यके समान चमकनेवाली प्राण-घातिनी शक्ति उनके वक्षपर चला दी ॥ २७–३० ॥ इससे वे क्षणभरके लिये मूर्च्छित हो गये, फिर ३० थोड़ी ही देरमें सचेत हो गये । तदनन्तर जिस दिव्य धनुषको पूर्वकालमें भगवान् विष्णुने कार्तिकेयको ३१ दिया था, उसे हाथमें लेकर वे सर्वोत्तम रत्नोंसे निर्मित विमानपर आरूढ़ होकर और अनेक शस्त्रास्त्रोंको लेकर भयंकर युद्ध करने लगे ॥ ३१-३२ ॥ ३२ वह दानव सर्पों, पर्वतों, वृक्षों और पत्थरोंकी वर्षा करने लगा, किंतु शिवपुत्र कार्तिकेयने क्रोधित होकर अपने दिव्य अस्त्रसे उन सबको काट डाला । प्रतापी ३३ कार्तिकेयने शंखचूड़द्वारा लगायी गयी आगको अपने पार्जन्य अस्त्रसे बुझा दिया । तत्पश्चात् उन्होंने शंखचूड़के रथ, धनुष, कवच, सारथी, किरीट तथा उज्ज्वल मुकुटको ३४ खेल - खेल में काट डाला और उस दानवेन्द्रके वक्षपर शुक्ल आभावाली शक्ति चला दी ॥ ३३ - ३५ ॥ उसके आघातसे राजा शंखचूड़ मूच्छित हो ३५ गया, किंतु थोड़ी ही देरमें सचेत होनेपर वह तत्काल दूसरे रथपर सवार हो गया और उसने शीघ्र ही दूसरा ३६ धनुष उठा लिया । हे नारद! मायावियोंमें श्रेष्ठ उस शंखचूड़ने अपनी मायासे बाणोंका जाल फैला दिया और उस बाणजालसे कार्तिकेयको आच्छादित कर ३७ दिया ॥ ३६-३७ ॥ उसने कभी भी व्यग्र न होनेवाली, सैकड़ों सूर्योंके समान प्रभायुक्त, प्रलयकालीन अग्निकी शिखाके समान ३८ आकृतिवाली और सदा विष्णुके तेजसे आवृत रहनेवाली शक्ति उठा ली तथा क्रोध करके बड़े वेगसे उसे कार्तिकेयपर चला दिया | अग्नि - राशिके समान उज्ज्वल वह शक्ति ३ ९ उनके शरीरपर गिरी और वे महाबली कार्तिकेय उस शक्तिके प्रभावसे मूर्च्छित हो गये ॥ ३८-३९ ३ ॥

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४३० श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २२ काली गृहीत्वा तं क्रोडे निनाय शिवसन्निधौ ॥

शिवस्तं चापि ज्ञानेन जीवयामास लीलया ।

ददौ बलमनन्तं च समुत्तस्थौ प्रतापवान् ॥

काली जगाम समरं रक्षितुं कार्तिकस्य या ।

वीरास्तामनुजग्मुश्च ते च नन्दीश्वरादयः ॥

सर्वे देवाश्च गन्धर्वा यक्षराक्षसकिन्नराः ।

वाद्यभाण्डाश्च बहुशः शतशो मधुवाहकाः ॥

सा च गत्वाथ संग्रामं सिंहनादं चकार च ।

देव्याश्च सिंहनादेन प्रापुर्मूर्च्छा च दानवाः ॥

अट्टाट्टहासमशिवं चकार च पुनः पुनः ।

दृष्ट्वा पपौ च माध्वीकं ननर्त रणमूर्धनि ॥

उग्रदंष्ट्रा चोग्रदण्डा कोटवी च पपौ मधु ।

योगिनीडाकिनीनां च गणाः सुरगणादयः ॥

दृष्ट्वा कालीं शङ्खचूडः शीघ्रमाजौ समाययौ ।

दानवाश्च भयं प्रापू राजा तेभ्योऽभयं ददौ ॥

काली चिक्षेप वह्निं च प्रलयाग्निशिखोपमम् ।

राजा निर्वापयामास पार्जन्येन च लीलया ॥

चिक्षेप वारुणं सा च तीव्रं च महदद्भुतम् ।

गान्धर्वेण च चिच्छेद दानवेन्द्रश्च लीलया ॥

माहेश्वरं प्रचिक्षेप काली वह्निशिखोपमम् ।

राजा जघान तं शीघ्रं वैष्णवेन च लीलया ॥

नारायणास्त्रं सा देवी चिक्षेप मन्त्रपूर्वकम् ।

राजा ननाम तद् दृष्ट्वा चावरुह्य रथादसौ ॥

ऊर्ध्वं जगाम तच्चास्त्रं प्रलयाग्निशिखोपमम् ।

पपात शङ्खचूडश्च भक्त्या तं दण्डवद्भुवि ॥

४० तब भद्रकाली उन्हें अपनी गोदमें लेकर शिवके पास ले गयीं । शिवने अपने ज्ञानके द्वारा उन्हें लीलापूर्वक चेतनायुक्त कर दिया, साथ ही उन्हें ४१ असीम शक्ति भी प्रदान की । तब प्रतापी कार्तिकेय उठ खड़े हुए॥४०-४१ ॥ कार्तिकेयकी रक्षामें तत्पर जो भद्रकाली थीं, वे ४२ युद्धभूमिके लिये प्रस्थित हो गयीं और नन्दीश्वर आदि जो वीर थे, वे भी उनके पीछे - पीछे चल पड़े । सभी देवता, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, किन्नर, मृदंग आदि बाजे ४३ बजानेवाले तथा मधु ढोनेवाले कई सौ अन्य लोग भी उनके साथ चल दिये ॥ ४२-४३ ॥ रणभूमिमें पहुँचते ही कालीने सिंह - गर्जन किया । ४४ भगवतीके सिंहनादसे बहुतसे दानव मूर्च्छित हो गये । दानवोंको देखकर देवीने बार - बार भीषण अट्टहास किया और मधुपान किया तथा वे रणभूमिमें नाचने ४५ लगीं । उग्रदंष्ट्रा, उग्रदण्डा, कोटवी, योगिनियों तथा डाकिनियोंके गण और देवतालोग भी मधुपान करने लगे ॥ ४४–४६ ॥ ४६ भद्रकालीको देखकर शंखचूड़ भी शीघ्र युद्धभूमिमें आ गया । दानव डरे हुए थे, अतः राजा शंखचूड़ने ४७ उन्हें अभय प्रदान किया ॥ ४७ ॥

भद्रकालीने प्रलयकालीन अग्निकी शिखाके समान प्रकाशमान आग्नेयास्त्र शंखचूड़पर चला दिया । राजाने ४८ । अपने पार्जन्यास्त्रसे खेल - खेल में उसे बुझा दिया ॥ ४८ ॥

तदनन्तर उस कालीने अत्यन्त तीव्र तथा अद्भुत वारुणास्त्र उसपर चलाया, जिसे उस दानवराजने अपने ४ ९ गान्धर्वास्त्र से लीलापूर्वक काट दिया । तब कालीने अग्निशिखाके सदृश तेजस्वी माहेश्वरास्त्र उसपर चलाया, जिसे राजा शंखचूड़ने अपने वैष्णवास्त्रसे बड़ी सहजता -५० पूर्वक शीघ्र ही विफल कर दिया ॥ ४ ९ -५० ॥ इसके बाद कालीने राजा शंखचूड़पर मन्त्रपूर्वक नारायणास्त्र चलाया । उसे देखते ही उसने रथसे ५१ उतरकर प्रणाम किया और प्रलयाग्निकी शिखाके समान तेजस्वी वह अस्त्र ऊपरकी ओर चला गया । शंखचूड़ भक्तिपूर्वक दण्डकी भाँति जमीनपर पड़कर ५२ । पुनः प्रणाम करने लगा ॥५१-५२ ॥

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अ ० २२ ] नवम स्कन्ध ४३१

ब्रह्मास्त्रं सा च चिक्षेप यत्नतो मन्त्रपूर्वकम् ।

ब्रह्मास्त्रेण महाराजो निर्वापं च चकार सः ॥

तदा चिक्षेप दिव्यास्त्रं सा देवी मन्त्रपूर्वकम् ।

राजा दिव्यास्त्रजालेन तन्निर्वाणं चकार च ॥

तदा चिक्षेप शक्तिं च यत्नतो योजनायताम् ।

राजा दिव्यास्त्रजालेन शतखण्डां चकार ह ॥

जग्राह मन्त्रपूतं च देवी पाशुपतं रुषा ।

निक्षेपणं निरोद्धुं च वाग्बभूवाशरीरिणी ॥

मृत्युः पाशुपते नास्ति नृपस्य च महात्मनः ।

यावदस्ति च मन्त्रस्य कवचं च हरेरिति ॥

यावत्सतीत्वमस्त्येव सत्याश्च नृपयोषितः ।

तावदस्य जरामृत्युर्नास्तीति ब्रह्मणो वचः ॥

इत्याकर्ण्य भद्रकाली न तच्चिक्षेप शस्त्रकम् ।

शतलक्षं दानवानां जग्रास लीलया क्षुधा ॥

ग्रस्तुं जगाम वेगेन शङ्खचूडं भयङ्करी ।

दिव्यास्त्रेण सुतीक्ष्णेन वारयामास दानवः ॥

खड्गं चिक्षेप सा देवी ग्रीष्मसूर्योपमं यथा ।

दिव्यास्त्रेण दानवेन्द्रः शतखण्डं चकार सः ॥

पुनर्ग्रस्तुं महादेवी वेगेन च जगाम तम् ।

सर्वसिद्धेश्वरः श्रीमान्ववृधे दानवेश्वरः ॥

वेगेन मुष्टिना काली कोपयुक्ता भयङ्करी ।

बभञ्ज च रथं तस्य जघान सारथिं सती ॥

सा च शूलं प्रचिक्षेप प्रलयाग्निशिखोपमम् ।

वामहस्तेन जग्राह शङ्खचूडः स्वलीलया ॥

तत्पश्चात् देवीने प्रयत्नशील होकर मन्त्रपूर्वक ५३ ब्रह्मास्त्र चलाया, उस राजा शंखचूड़ने अपने ब्रह्मास्त्रसे उसका शमन कर दिया । तब देवीने मन्त्रपूर्वक दिव्यास्त्र चलाया, राजाने अपने दिव्यास्त्रके जालसे ५४ उसे भी नष्ट कर दिया॥५३-५४ ॥ तत्पश्चात् देवीने प्रयत्नपूर्वक राजापर योजनभर लम्बी शक्ति चलायी । उसने अपने दिव्यास्त्र ५५ जालसे उसके सैकड़ों खण्ड कर दिये । तब देवीने कुपित होकर मन्त्रसे पवित्र किया हुआ पाशुपतास्त्र उठा लिया । इसी बीच उस अस्त्रको चलानेसे रोकने ५६ हेतु यह आकाशवाणी हुई- ' महान् आत्मावाले इस राजाकी मृत्यु पाशुपतास्त्रसे नहीं होगी । जबतक यह भगवान् श्रीहरिके मन्त्रका कवच अपने गलेमें धारण किये रहेगा और जबतक इसकी साध्वी ५७ पत्नीका सतीत्व विद्यमान रहेगा, तबतक जरा और मृत्यु इसपर अपना प्रभाव नहीं डाल सकते'- यह ब्रह्माका वचन है ॥ ५५-५८ ॥ ५८ यह सुनकर भद्रकालीने उस अस्त्रको नहीं चलाया । अब वे क्षुधातुर होकर लीलापूर्वक करोड़ों दानवोंको निगलने लगीं । जब भयंकर भगवती काली ५ ९ शंखचूड़को निगल जानेके लिये वेगपूर्वक उसकी ओर बढ़ीं, तब उस दानवने अपने अत्यन्त तीक्ष्ण दिव्यास्त्रसे उन्हें रोक दिया ॥ ५ ९ -६० ॥ ६० तदनन्तर उन भद्रकालीने ग्रीष्मकालीन सूर्यके समान तेजसम्पन्न खड्ग उसपर चला दिया । तब दानवेन्द्र शंखचूड़ने दिव्यास्त्रसे उसके सैकड़ों टुकड़े ६१ कर दिये । इसके बाद महादेवी उसे खा जानेके लिये वेगपूर्वक उसकी ओर बढ़ीं, तब सर्वसिद्धेश्वर तथा श्रीसम्पन्न दानवेन्द्र शंखचूड़ने अत्यन्त विशाल रूप ६२ धारण कर लिया ॥ ६१-६२ ॥ भयंकर रूपवाली सती कालीने कुपित होकर तेज मुष्टिका - प्रहारसे उसका रथ खण्ड - खण्ड कर ६३ दिया और उसके सारथीको मार डाला ॥ ६३ ॥

तत्पश्चात् उन भद्रकालीने उसके ऊपर प्रलयाग्निकी शिखाके समान त्रिशूल चलाया । शंखचूड़ने अपनी ६४ । लीलासे बायें हाथसे उसे पकड़ लिया ॥६४ ॥