देवी भागवत उत्तरार्द्ध — पृष्ठ 441–450

देवी भागवत उत्तरार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 441–450

पृष्ठ 441

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४३२ मुष्ट्या जघान तं देवी महाकोपेन वेगतः । बभ्राम च तया दैत्यः क्षणं मूर्च्छामवाप च क्षणेन चेतनां प्राप्य समुत्तस्थौ प्रतापवान् न चकार बाहुयुद्धं देव्या सह ननाम ताम् देव्याश्चास्त्रं स चिच्छेद जग्राह च स्वतेजसा नास्त्रं चिक्षेप तां भक्तो मातृभक्त्या तु वैष्णवः गृहीत्वा दानवं देवी भ्रामयित्वा पुनः पुनः । ऊर्ध्वं च प्रापयामास महावेगेन कोपिता ऊर्ध्वात्पपात वेगेन शङ्खचूडः प्रतापवान् । निपत्य च समुत्तस्थौ प्रणम्य भद्रकालिकाम् रत्नेन्द्रसारनिर्माणं विमानं सुमनोहरम् आरुरोह हर्षयुक्तो न विश्रान्तो महारणे दानवानां च क्षतजं सा देवी च पपौ क्षुधा । पीत्वा भुक्त्वा भद्रकाली जगाम शङ्करान्तिकम् उवाच रणवृत्तान्तं पौर्वापर्यं यथाक्रमम् श्रुत्वा जहास शम्भुश्च दानवानां विनाशनम् लक्षं च दानवेन्द्राणामवशिष्टं रणेऽधुना । श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २२ इसके बाद देवीने अत्यन्त क्रोध करके बड़ी तेजीसे ॥ ६५ उसपर मुष्टिप्रहार किया । उसके फलस्वरूप उसे चक्कर आ गया और वह क्षणभरके लिये मूर्च्छित हो गया । वह । प्रतापी शंखचूड़ अपने तेजसे थोड़ी ही देरमें फिर चेतनामें आकर उठ खड़ा हुआ । उसने देवीके साथ बाहुयुद्ध ॥ ६६ नहीं किया, बल्कि उन्हें प्रणाम करने लगा ॥ ६५-६६ ॥ । उस शंखचूड़ने अबतक भगवतीके अस्त्रोंको अपने तेजसे काट दिया था अथवा उनके अस्त्रोंको ॥ ६७ पकड़ लिया था, किंतु उस वैष्णव भक्तने मातृभक्तिके कारण उनपर अस्त्र नहीं चलाया था ॥ ६७ ॥

तदनन्तर देवीने उस दानवको पकड़कर कई बार ॥ ६८ घुमाया और कुपित होकर बड़े वेगसे उसे ऊपरकी ओर फेंक दिया । वह प्रतापी शंखचूड़ ऊपरसे बड़े वेगसे गिरा और नीचे गिरते ही उठकर खड़ा हो ॥ ६ ९ गया । तदनन्तर भद्रकालीको प्रणाम करके वह अत्यन्त मनोहर रत्ननिर्मित विमानपर हर्षपूर्वक आरूढ़ हो । गया । उस महारणमें उसने थोड़ी देर भी विश्राम नहीं ॥ ७० किया ॥ ६८-७० ॥ इसके बाद भगवती भूखके कारण दानवोंका रक्त पीने लगीं । इस प्रकार दानवोंका रक्तपान तथा भक्षण ॥ ७१ करके वे भद्रकाली शंकरके पास चली गयीं ॥७१ ॥

[ वहाँ पहुँचकर ] उन्होंने आरम्भसे लेकर अन्ततक । युद्ध - सम्बन्धी सभी वृत्तान्त क्रमसे बतलाया । दानवोंका विनाश सुनकर भगवान् शंकर हँसने लगे । भद्रकालीने ॥ ७२ यह भी कहा – हे ईश्वर! रणभूमिमें इस समय भी एक लाख दानव बच गये हैं । जब मैं उन दानवोंको खा रही थी, उस समय कुछ दानव खानेसे बचकर भुञ्जन्त्या निर्गतं वक्त्रात्तदन्यं भुक्तमीश्वर ॥ ७३ मेरे मुखसे निकल गये थे । जब मैं संग्राममें दानवेन्द्र संग्रामे दानवेन्द्रं च हन्तुं पाशुपतेन वै । अवध्यस्तव राजेति वाग्बभूवाशरीरिणी राजेन्द्रश्च महाज्ञानी महाबलपराक्रमः न च चिक्षेप मय्यस्त्रं चिच्छेद मम सायकम् शंखचूड़को मारनेके लिये पाशुपतास्त्र छोड़नेको उद्यत हुई, उसी समय यह आकाशवाणी हुई ' राजा शंखचूड़ ॥ ७४ तुमसे अवध्य है । ' महान् ज्ञानी तथा असीम बल एवं पराक्रमसे सम्पन्न राजेन्द्र शंखचूड़ने मुझपर अस्त्र । नहीं चलाया, अपितु मेरे द्वारा छोड़े गये बाणको वह ॥ ७५ काट दिया करता था ॥ ७२–७५ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां नवमस्कन्धे नारायणनारदसंवादे कालीशङ्खचूडयुद्धवर्णनं नाम द्वाविंशोऽध्यायः ॥ २२ ॥

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अ ० २३ ] नवम स्कन्ध ४३३ अथ त्रयोविंशोऽध्यायः भगवान् शंकर और शंखचूड़का युद्ध, भगवान् श्रीहरिका वृद्ध ब्राह्मणके वेशमें शंखचूड़से कवच माँग लेना तथा शंखचूड़का रूप धारणकर तुलसीसे हास - विलास करना, शंखचूड़का भस्म होना और श्रीनारायण उवाच

शिवस्तत्त्वं समाकर्ण्य तत्त्वज्ञानविशारदः ।

ययौ स्वयं च समरे स्वगणैः सह नारद ॥

शङ्खचूडः शिवं दृष्ट्वा विमानादवरुह्य च । ननाम परया भक्त्या शिरसा दण्डवद्भुवि

तं प्रणम्य च वेगेन विमानमारुरोह सः ।

तूर्णं चकार सन्नाहं धनुर्जग्राह दुर्वहम् ॥

शिवदानवयोर्युद्धं पूर्णमब्दशतं पुरा । न बभूवतुरन्योन्यं ब्रह्मञ्जयपराजयौ न्यस्तशस्त्रश्च भगवान् न्यस्तशस्त्रश्च दानवः रथस्थः शङ्खचूडश्च वृषस्थो वृषभध्वजः दानवानां च शतकमुद्धृतं च बभूव ह । रणे ये ये मृताः शम्भुर्जीवयामास तान्विभुः एतस्मिन्नन्तरे वृद्धब्राह्मणः परमातुरः आगत्य च रणस्थानमुवाच दानवेश्वरम् ॥ वृद्धब्राह्मण उवाच देहि भिक्षां च राजेन्द्र मह्यं विप्राय साम्प्रतम् त्वं सर्वसम्पदां दाता यन्मे मनसि वाञ्छितम् निरीहाय च वृद्धाय तृषिताय च साम्प्रतम् पश्चात्त्वां कथयिष्यामि पुरः सत्यं च कुर्विति

ओमित्युवाच राजेन्द्रः प्रसन्नवदनेक्षणः ।

कवचार्थी जनश्चाहमित्युवाचातिमायया ॥

सुदामागोपके रूपमें गोलोक पहुँचना श्रीनारायण बोले - हे नारद! तत्त्वज्ञानके पूर्ण विद्वान् शिवजी सम्पूर्ण बातें सुनकर अपने गणों के १ साथ स्वयं संग्राम - भूमिमें गये ॥ १ ॥

शिवजीको देखकर उस शंखचूड़ने तत्काल विमानसे उतरकर परमभक्तिपूर्वक पृथ्वीपर मस्तक ॥ २ टेककर दण्डवत् प्रणाम किया ॥ २ ॥

उन्हें प्रणाम करके वह बड़े वेगसे रथपर चढ़ गया और शीघ्रतापूर्वक कवच धारणकर उसने अपना ३ दुर्वह धनुष उठा लिया ॥३ ॥

हे ब्रह्मन्! भगवान् शिव तथा दानव शंखचूड़का वह युद्ध पूरे सौ वर्षोंतक होता रहा । वे एक - दूसरेको ॥४ न तो जीत पाते थे और न एक - दूसरेसे पराजित ही हो रहे थे ॥ ४ ॥

। कभी अपना शस्त्र रखकर भगवान् शिव वृषभपर विश्राम करने लगते और कभी शस्त्र रखकर दानव ॥ ५ शंखचूड़ रथपर ही विश्राम करने लगता था ॥ ५ ॥

असंख्य दानवोंका संहार हुआ । साथ ही रणमें देवपक्षके जो योद्धा मारे गये थे, उन्हें भगवान् शिवने ॥ ६ पुनः जीवित कर दिया ॥ ६ ॥

इसी बीच एक परम आतुर बूढ़े ब्राह्मणदेवता । • रणभूमिमें आकर दानवेन्द्र शंखचूड़से कहने लगे ॥७ ॥

७ वृद्ध ब्राह्मण बोले – हे राजेन्द्र! मुझ ब्राह्मणको भिक्षा प्रदान कीजिये । इस समय आप सम्पूर्ण सम्पदाओं को देनेमें समर्थ हैं, अतः मेरे मनमें जो । अभिलषित है, उसे दीजिये । इस समय पहले आप ॥ ८ मुझ निरीह, वृद्ध तथा तृषित ब्राह्मणको देनेके लिये सत्य - प्रतिज्ञा कीजिये, तब बादमें मैं अपनी अभिलाषा । बताऊँगा ॥ ८ - ९ ॥ ॥ ९ इसपर प्रफुल्लित मुख तथा नेत्रोंवाले राजेन्द्र शंखचूड़ने ' हाँ - हाँ, ठीक है ' - ऐसा कहा । तत्पश्चात् वृद्ध ब्राह्मणरूपधारी श्रीहरिने अत्यधिक मायाके साथ १० कहा ' मैं तुम्हारा कवच चाहता हूँ'॥१० ॥

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४३४

तच्छ्रुत्वा कवचं दिव्यं जग्राह हरिरेव च ।

शङ्खचूडस्य रूपेण जगाम तुलसीं प्रति ॥

गत्वा तस्यां मायया च वीर्याधानं चकार ह ।

अथ शम्भुर्हरेः शूलं जग्राह दानवं प्रति ॥

ग्रीष्ममध्याह्नमार्तण्डप्रलयाग्निशिखोपमम् ।

दुर्निवार्यं च दुर्धर्षमव्यर्थं वैरिघातकम् ॥

तेजसा चक्रतुल्यं च सर्वशस्त्रास्त्रसारकम् । श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २३ उनकी बात सुनकर शंखचूड़ने कवच दे दिया ११ और भगवान् श्रीहरिने उसे ले लिया । तत्पश्चात् वे शंखचूड़का रूप धारणकर तुलसीके पास गये । वहाँ पहुँचकर उन्होंने मायापूर्वक उस तुलसीमें अपने तेजका आधान किया ॥ ११ ॥

१२ उसी समय शंकरजीने श्रीहरिका दिया हुआ त्रिशूल शंखचूड़पर चलानेके लिये हाथमें ले लिया । वह त्रिशूल ग्रीष्म ऋतुमें मध्याह्नकालीन सूर्य और प्रलयाग्निकी शिखाके समान तेजवान् था, किसीसे भी १३ रोका न जा सकनेवाला, प्रचण्ड, अव्यर्थ तथा शत्रुघाती वह त्रिशूल तेजमें भगवान् विष्णुके चक्रके समान था, वह सभी शस्त्रास्त्रोंका सारस्वरूप था, वह शिवकेशवयोरन्यैर्दुर्वहं च भयङ्करम् ॥१४ भयंकर त्रिशूल शिव तथा केशवके अतिरिक्त अन्य

धनुः सहस्त्रं दैर्घ्येण प्रस्थेन शतहस्तकम् ।

सजीवं ब्रह्मरूपं च नित्यरूपमनिर्दिशम् ॥

संहर्तुं सर्वब्रह्माण्डमलं यत्स्वीयलीलया ।

चिक्षेप तोलनं कृत्वा शङ्खचूडे च नारद ॥

राजा चापं परित्यज्य श्रीकृष्णचरणाम्बुजम् ।

ध्यानं चकार भक्त्या च कृत्वा योगासनं धिया ॥

शूलं च भ्रमणं कृत्वा पपात दानवोपरि ।

चकार भस्मसात्तं च सरथं चाथ लीलया ॥

राजा धृत्वा दिव्यरूपं किशोरं गोपवेषकम् ।

द्विभुजं मुरलीहस्तं रत्नभूषणभूषितम् ॥

रत्नेन्द्रसारनिर्माणं वेष्टितं गोपकोटिभिः ।

गोलोकादागतं यानमारुरोह पुरं ययौ ॥

लोगोंके लिये दुर्वह तथा भयंकर था । वह लम्बाई में हजार धनुषैके बराबर तथा चौड़ाईमें सौ हाथकी मापवाला था, वह त्रिशूल साक्षात् सजीव ब्रह्मस्वरूप १५ ही था, वह नित्यस्वरूप था, उसे सभी लोग देख नहीं सकते थे ॥ १२ – १५ ॥ हे नारद! भगवान् शंकरने सम्पूर्ण ब्रह्माण्डका संहार करनेमें समर्थ उस त्रिशूलको अपनी लीलासे १६ हाथपर सँभालकर शंखचूड़पर फेंक दिया ॥ १६ ॥

[ तब सभी रहस्य समझकर ] राजा शंखचूड़ अपना धनुष त्यागकर तथा बुद्धिपूर्वक योगासन लगाकर भक्तिके साथ श्रीकृष्णके चरणकमलका १७ ध्यान करने लगा ॥ १७ ॥

वह त्रिशूल कुछ समयतक चक्कर काटकर दानव शंखचूड़के ऊपर जा गिरा । उस त्रिशूलने १८ रथसमेत शंखचूड़को लीलापूर्वक जलाकर भस्म कर दिया ॥ १८ ॥

तदनन्तर शंखचूड़ने किशोर अवस्था तथा दिव्य रूपवाले एक गोपका वेष धारण कर लिया । वह दो १ ९ भुजाओंसे सुशोभित था, उसके हाथमें मुरली थी तथा वह रत्नमय आभूषणोंसे अलंकृत था । वह उसी समय गोलोकसे आये हुए तथा करोड़ों गोपोंसे घिरे हुए एक सर्वोत्तम रत्ननिर्मित विमानपर आरूढ़ होकर गोलोक २० चला गया ॥ १ ९ -२० ॥ * चार हाथके बराबर लम्बाईकी नापको ' धनुष ' कहा जाता है ।

पृष्ठ 444

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अ ० २३ ] नवम

गत्वा ननाम शिरसा स राधाकृष्णयोर्मुने ।

भक्त्या च चरणाम्भोजं रासे वृन्दावने वने ॥ २१

सुदामानं च तौ दृष्ट्वा प्रसन्नवदनेक्षणौ ।

क्रोडे चक्रतुरत्यन्तं प्रेम्णातिपरिसंयुतौ ॥ २२

अथ शूलं च वेगेन प्रययौ तं च सादरम् ।

अस्थिभिः शङ्खचूडस्य शङ्खजातिर्बभूव ह ॥ २३

नानाप्रकाररूपेण शश्वत्पूता सुरार्चने ।

प्रशस्तं शङ्खतोयं च देवानां प्रीतिदं परम् ॥ २४

तीर्थतोयस्वरूपं च पवित्रं शम्भुना विना ।

शङ्खशब्दो भवेद्यत्र तत्र लक्ष्मीः सुसंस्थिरा ॥ २५

स स्नातः सर्वतीर्थेषु यः स्नातः शङ्खवारिणा ।

शङ्खो हरेरधिष्ठानं यत्र शङ्खस्ततो हरिः ॥ २६

तत्रैव वसते लक्ष्मीर्दूरीभूतममङ्गलम् ।

स्त्रीणां च शङ्खध्वनिभिः शूद्राणां च विशेषतः ॥ २७

भीता रुष्टा याति लक्ष्मीस्तत्स्थलादन्यदेशतः ।

शिवोऽपि दानवं हत्वा शिवलोकं जगाम ह ॥ २८

प्रहृष्टो वृषभारूढः स्वगणैश्च समावृतः ।

सुराः स्वविषयं प्रापुः परमानन्दसंयुताः ॥ २ ९

नेदुर्दुन्दुभयः स्वर्गे जगुर्गन्धर्वकिन्नराः ।

बभूव पुष्पवृष्टिश्च शिवस्योपरि सन्ततम् ।

प्रशशंसुः सुरास्तं च मुनीन्द्रप्रवरादयः ॥ ३०

स्कन्ध ४३५ हे मुने! वहाँ पहुँचकर उसने वहाँके वृन्दावनमें रासमण्डलके मध्य विराजमान श्रीकृष्ण और राधाके चरणकमलमें भक्तिपूर्वक मस्तक झुकाकर प्रणाम किया ॥ २१ ॥

उस सुदामागोपको देखकर उन दोनोंके मुख तथा नेत्र प्रसन्नतासे खिल उठे और उन्होंने अत्यन्त प्रेमके साथ उसे अपनी गोदमें बैठा लिया ॥ २२ ॥

तदनन्तर वह त्रिशूल वेगपूर्वक आदरके साथ श्रीकृष्णके पास लौट आया । शंखचूड़की हड्डियोंसे शंखजाति की उत्पत्ति हुई । वही शंख अनेक प्रकारके रूपोंमें निरन्तर विराजमान होकर देवताओंकी पूजामें पवित्र माना जाता है । अत्यन्त प्रशस्त, पवित्र तथा तीर्थजलस्वरूप शंखजल केवल शंकरजीको छोड़कर अन्य देवताओंके लिये परम प्रीतिदायक है । जहाँ शंखकी ध्वनि होती है, वहाँ लक्ष्मीजी स्थिररूपसे सदा विराजमान रहती हैं ॥ २३–२५ ॥ जो शंखके जलसे स्नान कर लेता है, उसने मानो समस्त तीर्थोंमें स्नान कर लिया । शंख भगवान् श्रीहरिका अधिष्ठानस्वरूप है । जहाँ शंख रहता है, वहाँ भगवान् श्रीहरि विराजमान रहते हैं, वहींपर भगवती लक्ष्मी भी निवास करती हैं तथा उस स्थानसे सारा अमंगल दूर भाग जाता है, किंतु स्त्रियों और विशेषरूपसे शूद्रोंके द्वारा की गयी शंखध्वनियोंसे भयभीत तथा रुष्ट होकर लक्ष्मीजी उस स्थानसे अन्य देशको चली जाती हैं ॥ २६ - २७ ॥ दानव शंखचूड़को मारकर शिवजी भी वृषभपर सवार होकर अपने गणोंके साथ प्रसन्नतापूर्वक शिवलोक चले गये । देवताओंने अपना राज्य प्राप्त कर लिया और वे परम आनन्दित हो गये । स्वर्गमें दुन्दुभियाँ बजने लगीं, गन्धर्व तथा किन्नर गाने लगे, भगवान् शिवके ऊपर निरन्तर पुष्प वृष्टि होने लगी और देवता तथा श्रेष्ठ मुनीश्वर आदि उन शिवजीकी प्रशंसा करने लगे ॥ २८–३० ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां नवमस्कन्धे शङ्खचूडवधवर्णनं नाम त्रयोविंशोऽध्यायः ॥ २३ ॥

पृष्ठ 445

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४३६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २४ अथ चतुर्विंशोऽध्यायः शंखचूड़रूपधारी श्रीहरिका तुलसीके भवनमें जाना, तुलसीका श्रीहरिको पाषाण होनेका शाप देना, तुलसी - महिमा, शालग्रामके नारद उवाच

नारायणश्च भगवान्वीर्याधानं चकार ह ।

तुलस्यां केन रूपेण तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥ १

श्रीनारायण उवाच

नारायणश्च भगवान्देवानां साधनेषु च ।

शङ्खचूडस्य कवचं गृहीत्वा विष्णुमायया ॥ २

पुनर्विधाय तद्रूपं जगाम तत्सतीगृहम् ।

पातिव्रतस्य नाशेन शङ्खचूडजिघांसया ॥ ३

दुन्दुभिं वादयामास तुलसीद्वारसन्निधौ ।

जयशब्दं च तद्द्वारे बोधयामास सुन्दरीम् ॥ ४

तच्छ्रुत्वा च रवं साध्वी परमानन्दसंयुता ।

राजमार्गे गवाक्षेण ददर्श परमादरात् ॥ ५

ब्राह्मणेभ्यो धनं दत्त्वा कारयामास मङ्गलम् ।

वन्दिभ्यो भिक्षुकेभ्यश्च वाचिभ्यश्च धनं ददौ ॥ ६

अवरुह्य रथाद्देवो देव्याश्च भवनं ययौ ।

अमूल्यरत्ननिर्माण सुन्दरं सुमनोहरम् ॥ ७

दृष्ट्वा च पुरतः कान्तं सा तं कान्तं मुदान्विता ।

तत्पादं क्षालयामास ननाम च रुरोद च ॥ ८

रत्नसिंहासने रम्ये वासयामास कामुकी ।

ताम्बूलं च ददौ तस्मै कर्पूरादिसुवासितम् ॥ ९

अद्य मे सफलं जन्म जीवनं च बभूव ह ।

रणे गतं च प्राणेशं पश्यन्त्याश्च पुनर्गृहे ॥ १० ।

विभिन्न लक्षण एवं माहात्म्यका वर्णन नारदजी बोले – भगवान् नारायणने कौन - सा रूप धारणकर तुलसीमें वीर्याधान किया था, उसे मुझे बताइये ॥ १ ॥

श्रीनारायण बोले - [ हे नारद! ] देवताओंका कार्य सिद्ध करनेमें सदा तत्पर रहनेवाले भगवान् श्रीहरि वैष्णवी मायाके द्वारा शंखचूड़का कवच लेकर और फिर उसी शंखचूड़का रूप धारणकर उसकी पत्नीका पातिव्रत्य नष्ट करके शंखचूड़को मारने की इच्छासे साध्वी तुलसीके घर गये थे ॥ २-३ ॥ उन्होंने तुलसीके भवनके द्वारके पास दुन्दुभि बजवायी और उस द्वारपर जयकार लगवाकर सुन्दरी तुलसीको यह ज्ञात कराया कि उसके पति विजयी होकर आ गये हैं ॥ ४ ॥

वह ध्वनि सुनकर साध्वी तुलसी परम आनन्दित हुई और अत्यन्त आदरके साथ [ पतिदर्शनकी कामनासे ] खिड़कीमेंसे राजमार्गकी ओर देखने लगी ॥ ५ ॥

तत्पश्चात् उसने ब्राह्मणोंको धन प्रदान करके मंगलाचार करवाया और बन्दीजनों, भिक्षुकों तथा सूत - मागधोंको [ न्यौछावरस्वरूप ] धन दिया ॥ ६ ॥

तदनन्तर भगवान् श्रीहरि रथसे उतरकर देवी तुलसीके सुन्दर, अत्यन्त मनोहर तथा अमूल्य रत्ननिर्मित भवनमें गये ॥७ ॥

अपने कान्तिमान् पतिको समक्ष देखकर वह बहुत प्रसन्न हुई । उसने प्रेमपूर्वक उनका चरण धोया, फिर उन्हें प्रणाम किया और वह रोने लगी ॥ ८ ॥

तत्पश्चात् उस कामिनी तुलसीने उन्हें अत्यन्त मनोहर रत्नमय सिंहासनपर बैठाया, पुनः उसने कपूर आदिसे सुगन्धित ताम्बूल उन्हें प्रदान किया । [ इसके बाद तुलसीने कहा - ] आज मेरा जन्म तथा जीवन - ये दोनों सफल हो गये; क्योंकि मैं युद्धभूमिमें गये हुए अपने प्राणनाथको फिरसे घरमें देख रही हूँ॥९ -१० ॥

पृष्ठ 446

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अ ० २४ ] नवम

सस्मिता सकटाक्षं च सकामा पुलकाङ्किता ।

पप्रच्छ रणवृत्तान्तं कान्तं मधुरया गिरा ॥ ११

तुलस्युवाच

असंख्यविश्वसंहत्र सार्धमाजौ तव प्रभो ।

कथं बभूव विजयस्तन्मे ब्रूहि कृपानिधे ॥ १२

तुलसीवचनं श्रुत्वा प्रहस्य कमलापतिः ।

शङ्खचूडस्य रूपेण तामुवाचामृतं वचः ॥ १३

श्रीभगवानुवाच

आवयोः समरः कान्ते पूर्णमब्दं बभूव ह ।

नाशो बभूव सर्वेषां दानवानां च कामिनि ॥ १४

प्रीतिञ्च कारयामास ब्रह्मा च स्वयमावयोः ।

देवानामधिकारश्च प्रदत्तस्तस्य चाज्ञया ॥ १५

मयागतं स्वभवनं शिवलोकं शिवो गतः ।

इत्युक्त्वा जगतां नाथः शयनं च चकार ह ॥ १६

रेमे रमापतिस्तत्र रामया सह नारद ।

सा साध्वी सुखसम्भोगादाकर्षणव्यतिक्रमात् ॥ १७

सर्वं वितर्कयामास कस्त्वमेवेत्युवाच सा । तुलस्युवाच को वा त्वं वद मायेश भुक्ताहं मायया त्वया ॥ १८

दूरीकृतं मत्सतीत्वं यदतस्त्वां शपामि है ।

तुलसीवचनं श्रुत्वा हरिः शापभयेन च ॥ १ ९

दधार लीलया ब्रह्मन् सुमूर्तिं सुमनोहराम् ।

ददर्श पुरतो देवी देवदेवं सनातनम् ॥ २०

नवीननीरदश्यामं शरत्पङ्कजलोचनम् ।

कोटिकन्दर्पलीलाभं रत्नभूषणभूषितम् ॥ २१

ईषद्धास्यं प्रसन्नास्यं शोभितं पीतवाससम् ।

तं दृष्ट्वा कामिनी कामं मूर्च्छा सम्प्राप लीलया ॥ २२

पुनश्च चेतनां प्राप्य पुनः सा तमुवाच ह । स्कन्ध ४३७ तत्पश्चात् मुसकानयुक्त, तिरछी दृष्टिसे देखती हुई, काममदसे विह्वल और पुलकित अंगोंवाली तुलसी अपने प्राणनाथसे मधुर वाणीमें युद्धसम्बन्धी समाचार पूछने लगी ॥ ११ ॥

तुलसी बोली - प्रभो! असंख्य ब्रह्माण्डोंका संहार करनेवाले शिवजीके साथ हुए युद्धमें आपकी विजय कैसे हुई? हे कृपानिधे! इसे मुझे बताइये ॥ १२ ॥

तुलसीका वचन सुनकर शंखचूड़रूपधारी लक्ष्मीकान्त श्रीहरि उस तुलसीसे हँसकर अमृतमय वाणीमें कहने लगे ॥ १३ ॥

श्रीभगवान् बोले — हे प्रिये! हम दोनोंका युद्ध पूरे एक वर्षतक होता रहा । हे कामिनि! उस युद्धमें सभी दानवोंका विनाश हो गया । तब स्वयं ब्रह्माजीने हम दोनोंमें प्रेम करवा दिया और फिर उनकी आज्ञासे मैंने देवताओंको उनका सम्पूर्ण अधिकार लौटा दिया । इसके बाद मैं अपने घर चला आया और शिवजी अपने लोकको चले गये ॥ १४-१५३ ॥ हे नारद! यह कहकर जगन्नाथ रमापति श्रीहरि शय्यापर सो गये और जब उस रमणीके साथ विहार करने लगे, तब उस साध्वी तुलसीने अपने मनमें विचार करके सब कुछ जान लिया और ' तुम कौन हो? ' - ऐसा वह उनसे पूछने लगी ॥ १६ - १७३ ॥ तुलसी बोली - हे मायेश! तुम कौन हो, यह मुझे बताओ । तुमने छलपूर्वक मेरा सतीत्व नष्ट किया, । अतः मैं तुम्हें शाप देती हूँ ॥ १८३ ॥

हे ब्रह्मन्! तुलसीका वचन सुनकर भगवान् श्रीहरिने शापके भयसे लीलापूर्वक अपना मनोहर विष्णुरूप धारण कर लिया ॥ १ ९ ३ ॥ तब देवी तुलसीने नूतन मेघके समान श्याम वर्णवाले, शरत्कालीन कमलके समान नेत्रोंवाले, करोड़ों कामदेवके समान सुन्दर प्रतीत होनेवाले, रत्नमय आभूषणोंसे अलंकृत, मन्द मन्द मुसकानसे युक्त | प्रसन्न मुख - मण्डलवाले, पीताम्बर धारण किये हुए तथा अनुपम शोभासम्पन्न देवाधिदेव सनातन श्रीहरिको अपने समक्ष देखा । उन्हें देखकर कामिनी तुलसी लीलापूर्वक पूर्णतः मूर्च्छित हो गयी और कुछ देर बाद चेतना प्राप्त करके वह उन श्रीहरिसे पुनः कहने लगी ॥ २०–२२३ ॥

पृष्ठ 447

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४३८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २४ तुलस्युवाच हे नाथ ते दया नास्ति पाषाणसदृशस्य च ॥ २३

छलेन धर्मभङ्गेन मम स्वामी त्वया हतः ।

पाषाणहृदयस्त्वं हि दयाहीनो यतः प्रभो ॥ २४

तस्मात्पाषाणरूपस्त्वं भवे देव भवाधुना ।

ये वदन्ति च साधुं त्वां ते भ्रान्ता हि न संशयः ॥ २५

भक्तो विनापराधेन परार्थे च कथं हतः ।

भृशं रुरोद शोकार्ता विललाप मुहुर्मुहुः ॥ २६

ततश्च करुणां दृष्ट्वा करुणारससागरः ।

नयेन तां बोधयितुमुवाच कमलापतिः ॥ २७

श्रीभगवानुवाच

तपस्त्वया कृतं भद्रे मदर्थे भारते चिरम् ।

त्वदर्थे शङ्खचूडश्च चकार सुचिरं तपः ॥ २८

कृत्वा त्वां कामिनीं सोऽपि विजहार च तत्क्षणात् ।

अधुना दातुमुचितं तवैव तपसः फलम् ॥ २ ९

इदं शरीरं त्यक्त्वा च दिव्यदेहं विधाय च ।

रामे रम मया सार्धं त्वं रमासदृशी भव ॥३०

इयं तनुर्नदीरूपा गण्डकीति च विश्रुता ।

पूता सुपुण्यदा नॄणां पुण्ये भवतु भारते ॥ ३१

तव केशसमूहश्च पुण्यवृक्षो भविष्यति ।

तुलसीकेशसम्भूता तुलसीति च विश्रुता ॥ ३२

त्रिषु लोकेषु पुष्पाणां पत्राणां देवपूजने ।

प्रधानरूपा तुलसी भविष्यति वरानने ॥ ३३

स्वर्गे मर्त्ये च पाताले गोलोके मम सन्निधौ ।

भव त्वं तुलसी वृक्षवरा पुष्पेषु सुन्दरी ॥ ३४ ।

तुलसी बोली - हे नाथ! आप पाषाणसदृश हो गये हैं, आपमें दया नहीं है । आपने छलपूर्वक मेरा धर्म नष्ट करके मेरे स्वामीको मार डाला । हे प्रभो! आप पाषाण - हृदयवाले हैं तथा दयाहीन हो गये हैं, अतः हे देव! आप इसी समय लोकमें पाषाणरूप हो जायँ । जो लोग आपको साधु कहते हैं, वे भ्रमित हैं; इसमें सन्देह नहीं है । दूसरेका हित साधनेके लिये आपने अपने भक्तको क्यों मार डाला? ॥ २३ - २५३ ॥ [ हे नारद! ] इस प्रकार शोक सन्तप्त तुलसीने बहुत रुदन तथा बार - बार विलाप किया । तदनन्तर करुणारसके सागर कमलापति श्रीहरि तुलसीकी कारुणिक अवस्था देखकर नीतियुक्त वचनोंसे उसे समझाते हुए कहने लगे ॥ २६-२७ ॥ श्रीभगवान् बोले - – हे भद्रे! तुमने भारतमें रहकर मेरे लिये बहुत समयतक तपस्या की है, साथ ही इस शंखचूड़ने भी उस समय तुम्हारे लिये दीर्घ समयतक तपस्या की थी ॥ २८ ॥

तुम्हें पत्नीरूपमें प्राप्त करके उसने तपस्याका फल प्राप्त करके तुम्हारे साथ विहार किया है I अब तुम्हें तुम्हारेद्वारा की गयी तपस्याका फल

देना उचित है । २ ९ ॥

हे रामे! अब तुम इस शरीरको त्यागकर तथा दिव्य देह धारण करके मेरे साथ आनन्द करो और [ मेरे लिये ] लक्ष्मीके समान हो जाओ ॥ ३० ॥

तुम्हारा यह शरीर गण्डकीनदीके रूपमें प्रसिद्ध होगा । वह पवित्र नदी पुण्यमय भारतवर्षके मनुष्योंको उत्तम पुण्य देनेवाली होगी ॥ ३१ ॥

तुम्हारा केशसमूह पुण्य वृक्षके रूपमें प्रतिष्ठित होगा । तुम्हारे केशसे उत्पन्न वह वृक्ष तुलसी नाम से प्रसिद्ध होगा ॥ ३२ ॥

हे वरानने! देवपूजनमें प्रयुक्त होनेवाले त्रिलोकीके समस्त पुष्पों तथा पत्रोंमें तुलसी प्रधानरूपवाली मानी जायगी ॥ ३३ ॥

स्वर्गलोक, मृत्युलोक, पाताल तथा गोलोक -इन सभी स्थानोंमें तुम मेरे सान्निध्यमें रहोगी । वृक्षश्रेष्ठ उत्तम तुलसी नामसे तुम पुष्पोंके मध्य सदा प्रतिष्ठित रहोगी ॥ ३४ ॥ ·

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अ ० २४ ]

गोलोके विरजातीरे रासे वृन्दावने वने ।

भाण्डीरे चम्पकवने रम्ये चन्दनकानने ॥

माधवीकेतकीकुन्दमालिकामालतीवने I वासस्तेऽत्रैव भवतु पुण्यस्थानेषु पुण्यदः ॥

तुलसीतरुमूलेषु पुण्यदेशेषु पुण्यदम् ।

अधिष्ठानं च तीर्थानां सर्वेषां च भविष्यति ॥

तत्रैव सर्वदेवानां ममाधिष्ठानमेव च ।

तुलसीपत्रपतनप्राप्तये च वरानने ॥

स स्नातः सर्वतीर्थेषु सर्वयज्ञेषु दीक्षितः ।

तुलसीपत्रतोयेन योऽभिषेकं समाचरेत् ॥

सुधाघटसहस्राणां या तुष्टिस्तु भवेद्धरेः ।

सा च तुष्टिर्भवेन्नूनं तुलसीपत्रदानतः ॥

गवामयुतदानेन यत्फलं तत्फलं भवेत् ।

तुलसीपत्रदानेन तत्फलं कार्तिके सति ॥।

तुलसीपत्रतोयं च मृत्युकाले च यो लभेत् ।

मुच्यते सर्वपापेभ्यो विष्णुलोके महीयते ॥

नित्यं यस्तुलसीतोयं भुंक्ते भक्त्या च मानवः ।

लक्षाश्वमेधजं पुण्यं सम्प्राप्नोति स मानवः ॥

तुलसीं स्वकरे कृत्वा धृत्वा देहे च मानवः ।

प्राणांस्त्यजति तीर्थेषु विष्णुलोकं च गच्छति ॥

तुलसीकाष्ठनिर्माणमालां गृह्णाति यो नरः ।

पदे पदेऽश्वमेधस्य लभते निश्चितं फलम् ॥

तुलसीं स्वकरे कृत्वा स्वीकारं यो न रक्षति ।

स याति कालसूत्रं च यावच्चन्द्रदिवाकरौ ॥

करोति मिथ्याशपथं तुलस्यां योऽत्र मानवः ।

स याति कुम्भीपाकं च यावदिन्द्राश्चतुर्दश ॥

नवम स्कन्ध ४३ ९ गोलोक, विरजानदीके तट, रासमण्डल, वृन्दावन, ३५ | भाण्डीरवन, चम्पकवन, मनोहर चन्दनवन, माधवी, केतकी, कुन्द, मालिका, मालतीवन - इन सभी पुण्यमय स्थानोंमें तुम्हारा पुण्यप्रद वास होगा ॥ ३५-३६ ॥ ३६ तुलसीवृक्षके मूलोंके सान्निध्यवाले पुण्यमय स्थानोंमें समस्त तीर्थोंका पुण्यप्रद अधिष्ठान होगा । हे वरानने! तुलसीके पत्र अपने ऊपर पड़ें इस उद्देश्यसे वहाँपर ३७ मेरा तथा सभी देवताओंका निवास होगा ॥ ३७-३८ ॥ तुलसी - पत्रके जलसे जो व्यक्ति स्नान करता है, उसने मानो सभी तीर्थोंमें स्नान कर लिया और वह ३८ सभी यज्ञोंमें दीक्षित हो गया ॥३ ९ ॥ हजारों अमृतकलशोंसे भगवान् श्रीहरिको जो सन्तुष्टि होती है, वह उन्हें तुलसीका एक पत्र अर्पण ३ ९ करनेसे अवश्य ही मिल जाती है ॥४० ॥

जो फल दस हजार गायोंका दान करनेसे होता है, वही फल कार्तिकमासमें तुलसीके पत्रके दानसे ४० प्राप्त हो जाता है ॥ ४१ ॥

जिस व्यक्तिको मृत्युके अवसरपर तुलसीपत्रका जल सुलभ हो जाता है, वह सभी पापोंसे मुक्त होकर ४१ विष्णु - लोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है ॥ ४२ ॥

जो मनुष्य प्रतिदिन भक्तिपूर्वक तुलसीका जल ग्रहण करता है, वह एक लाख अश्वमेधयज्ञोंसे ४२ होनेवाला पुण्य प्राप्त कर लेता है ॥ ४३ ॥

जो मनुष्य हाथमें तुलसी लेकर या शरीरमें इसे ४३ धारणकर तीर्थोंमें प्राण त्यागता है, वह विष्णुलोक जाता है ॥४४ ॥

जो मनुष्य तुलसी - काष्ठसे निर्मित मालाको ४४ धारण करता है, वह पद - पदपर अश्वमेधयज्ञका फल निश्चय ही प्राप्त करता है ॥ ४५ ॥

जो मनुष्य तुलसीको अपने हाथपर रखकर ४५ अपने प्रतिज्ञा - वचनकी रक्षा नहीं करता, वह कालसूत्रनरकमें पड़ता है और वहाँपर चन्द्रमा तथा सूर्यकी स्थितिपर्यन्त वास करता है ॥ ४६ ॥

४६ जो मनुष्य इस लोकमें तुलसीके समीप झूठी प्रतिज्ञा करता है, वह कुम्भीपाकनरकमें जाता है और चौदहों इन्द्रोंकी स्थितितक वहाँ पड़ा ४७ | रहता है ॥४७ ॥

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४४०

तुलसीतोयकणिकां मृत्युकाले च यो लभेत् ।

रत्नयानं समारुह्य वैकुण्ठे प्राप्यते ध्रुवम् ॥

पूर्णिमायाममायां च द्वादश्यां रविसंक्रमे । तैलाभ्यङ्गं च कृत्वा च मध्याह्ने निशि सन्ध्ययोः अशौचेऽशुचिकाले ये रात्रिवासोऽन्विता नराः । तुलसीं ये विचिन्वन्ति ते छिन्दन्ति हरेः शिरः

त्रिरात्रं तुलसीपत्रं शुद्धं पर्युषितं सति ।

श्राद्धे व्रते च दाने च प्रतिष्ठायां सुरार्चने ॥

भूगतं तोयपतितं यद्दत्तं विष्णवे सति ।

शुद्धं च तुलसीपत्रं क्षालनादन्यकर्मणि ॥

वृक्षाधिष्ठातृदेवी या गोलोके च निरामये ।

कृष्णेन सार्धं नित्यं च नित्यक्रीडां करिष्यसि ॥

नद्यधिष्ठातृदेवी या भारते च सुपुण्यदा ।

लवणोदस्य सा पत्नी मदंशस्य भविष्यति ॥

त्वं च स्वयं महासाध्वी वैकुण्ठे मम सन्निधौ ।

रमासमा च रामा च भविष्यसि न संशयः ॥

अहं च शैलरूपेण गण्डकीतीरसन्निधौ । श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २४ मृत्युके समय जिस मनुष्यके मुखमें तुलसी-४८ जलका एक कण भी पहुँच जाता है, वह रत्नमय विमानपर आरूढ़ होकर निश्चय ही विष्णुलोकको जाता है ॥ ४८ ॥

॥ ४ ९ पूर्णिमा, अमावास्या, द्वादशी, सूर्य - संक्रान्ति, मध्याह्नकाल, रात्रि, दोनों सन्ध्याएँ, अशौच तथा अपवित्र समयोंमें, रातके कपड़े पहने हुए तथा शरीरमें तेल लगाकर जो लोग तुलसीके पत्र तोड़ते हैं; वे ॥ ५० साक्षात् श्रीहरिका मस्तक ही काटते हैं ॥ ४ ९ -५० ॥ श्राद्ध, व्रत, दान, प्रतिष्ठा तथा देवार्चनके लिये तुलसीपत्र बासी होनेपर भी तीन राततक शुद्ध बना ५१ रहता है ॥ ५१ ॥

पृथ्वीपर पड़ा हुआ अथवा जलमें गिरा हुआ या श्रीविष्णुको चढ़ाया हुआ तुलसीपत्र धो देनेपर दूसरे ५२ कार्योंके लिये शुद्ध होता है ॥५२ ॥

वृक्षोंकी अधिष्ठात्री देवी बनकर तुम शाश्वत गोलोकमें मुझ कृष्णके साथ सदा विहार करोगी । ५३ उसी प्रकार भारतवर्षमें नदियोंकी जो अत्यन्त पुण्यदायिनी अधिष्ठात्री देवी हैं, उस रूपमें भी तुम मेरे ही अंशस्वरूप लवणसमुद्रकी पत्नी बनोगी ॥ ५३-५४ ॥ ५४ स्वयं महासाध्वी तुम वैकुण्ठलोकमें मेरे सन्निकट लक्ष्मीके समान भार्याके रूपमें सदा विराजमान रहोगी; इसमें सन्देह नहीं है ॥ ५५ ॥

५५ मैं भी तुम्हारे शापसे पाषाण बनकर भारतवर्षमें गण्डकी नदी के तटके समीप निवास करूँगा । वहाँ रहनेवाले करोड़ों कीट अपने तीक्ष्ण दाँतरूपी श्रेष्ठ अधिष्ठानं करिष्यामि भारते तव शापतः ॥ ५६ आयुधोंसे काट - काटकर उस शिलाके गड्ढेमें मेरे

कोटिसंख्यास्तत्र कीटास्तीक्ष्णदंष्ट्रावरायुधैः ।

तच्छिलाकुहरे चक्रं करिष्यन्ति मदीयकम् ॥

एकद्वारं चतुश्चक्रं वनमालाविभूषितम् ।

नवीननीरदाकारं लक्ष्मीनारायणाभिधम् ॥

एकद्वारं चतुश्चक्रं नवीननीरदोपमम् ।

लक्ष्मीजनार्दनो ज्ञेयो रहितो वनमालया ॥

चक्रका चिह्न बनायेंगे ॥ ५६-५७ ॥

जिसमें एक द्वारका चिह्न होगा, चार चक्र होंगे और जो वनमालासे विभूषित होगा, वह नवीन मेघ ५७ समान वर्णवाला पाषाण ' लक्ष्मीनारायण ' नामसे प्रसिद्ध होगा ॥ ५८ ॥

जिसमें एक द्वारका चिह्न तथा चार ५८ चक्रके चिह्न होंगे, किंतु जो वनमालाकी रेखासे रहित होगा, उस नवीन मेघके समान श्यामवर्ण-वाले पाषाणको ' लक्ष्मी - जनार्दन ' नामवाला समझना ५ ९ | चाहिये ॥ ५ ९ ॥

पृष्ठ 450

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अ ० २४ ] नवम स्कन्ध ४४१

द्वारद्वये चतुश्चक्रं गोष्पदेन विराजितम् ।

रघुनाथाभिधं ज्ञेयं रहितं वनमालया ॥

अतिक्षुद्रं द्विचक्रं च नवीनजलदप्रभम् ।

तद्वामनाभिधं ज्ञेयं रहितं वनमालया ॥

अतिक्षुद्रं द्विचक्रं च वनमालाविभूषितम् ।

विज्ञेयं श्रीधरं रूपं श्रीप्रदं गृहिणां सदा ॥

स्थूलं च वर्तुलाकारं रहितं वनमालया ।

द्विचक्रं स्फुटमत्यन्तं ज्ञेयं दामोदराभिधम् ॥

मध्यमं वर्तुलाकारं द्विचक्रं बाणविक्षतम् ।

रणरामाभिधं ज्ञेयं शरतूणसमन्वितम् ॥

मध्यमं सप्तचक्रञ्च छत्रभूषणभूषितम् ।

राजराजेश्वरं ज्ञेयं राजसम्पत्प्रदं नृणाम् ॥

द्विसप्तचक्रं स्थूलं च नवनीरदसुप्रभम् ।

अनन्ताख्यं च विज्ञेयं चतुर्वर्गफलप्रदम् ॥

चक्राकारं द्विचक्रं च सश्रीकं जलदप्रभम् ।

सगोष्पदं मध्यमं च विज्ञेयं मधुसूदनम् ॥

सुदर्शनं चैकचक्रं गुप्तचक्रं गदाधरम् ।

द्विचक्रं हयवक्त्राभं हयग्रीवं प्रकीर्तितम् ॥

दो द्वार तथा चार चक्रसे युक्त, गायके खुरसे ६० सुशोभित तथा वनमालासे रहित पाषाणको ‘ रघुनाथ ’ नामसे जानना चाहिये ॥ ६० ॥

जिसमें बहुत सूक्ष्म दो चक्रके चिह्न हों और वनमालाकी रेखा न हो, उस नवीन मेघके सदृश वर्णवाले पाषाणको भगवान् ' वामन ' नामसे मानना ६१ चाहिये ॥ ६१ ॥

जिस पाषाणमें अत्यन्त सूक्ष्म आकारके दो चक्र हों तथा जो वनमालासे सुशोभित हो, गृहस्थोंको सदा श्री प्रदान करनेवाले उस पाषाणको भगवान् ' श्रीधर ' ६२ का ही स्वरूप समझना चाहिये ॥६२ ॥

स्थूल, गोलाकार, वनमालासे रहित तथा अत्यन्त स्पष्ट दो चक्रोंसे अंकित पाषाणको भगवान्‌का ' दामोदर ' नामवाला स्वरूप जानना चाहिये ॥ ६३ ॥

६३ जो मध्यम गोलाईके आकारवाला हो, जिसमें दो चक्र बने हों, जिसपर बाण तथा तरकशका चिह्न अंकित हो और जिसके ऊपर बाणसे कट जानेका चिह्न हो, उस पाषाणको रणमें शोभा पानेवाले भगवान् ६४ ' राम ' का विग्रह समझना चाहिये ॥ ६४ ॥

मध्यम आकारवाले, सात चक्रोंके चिह्नोंसे अंकित, छत्र तथा आभूषणसे अलंकृत पाषाणको भगवान् ' राजराजेश्वर ' समझना चाहिये । वह पाषाण मनुष्यों को ६५ विपुल राजसम्पदा प्रदान करनेवाला है ॥६५ ॥

जो पाषाण स्थूल हो, चौदह चक्रोंसे सुशोभित तथा नवीन मेघसदृश प्रभावाला हो; उस धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष - इन चारों प्रकारके फल प्रदान करनेवाले पाषाणको भगवान् ' अनन्त ' का स्वरूप जानना ६६ चाहिये ॥ ६६ ॥

जो चक्र आकारवाला हो; जिसमें दो चक्र, श्री और गोखुरके चिह्न सुशोभित हों, ऐसे मध्यम तथा नवीन मेघके समान वर्णवाले पाषाणको भगवान् ६७ ' मधुसूदन ' का विग्रह समझना चाहिये ॥६७ ॥

सुन्दर दर्शनवाले तथा केवल एक गुप्त चक्रसे युक्त पाषाणको भगवान् ' गदाधर ' तथा दो चक्रसे युक्त एवं अश्वके मुखकी आकृतिवाले पाषाणको ६८ । भगवान् ' हयग्रीव ' का विग्रह कहा गया है ॥ ६८ ॥