देवी भागवत उत्तरार्द्ध — पृष्ठ 451–460

देवी भागवत उत्तरार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 451–460

पृष्ठ 451

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४४२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २४

अतीव विस्तृतास्यं च द्विचक्रं विकटं सति ।

नरसिंहं सुविज्ञेयं सद्यो वैराग्यदं नृणाम् ॥

द्विचक्रं विस्तृतास्यं च वनमालासमन्वितम् ।

लक्ष्मीनृसिंहं विज्ञेयं गृहिणां च सुखप्रदम् ॥

द्वारदेशे द्विचक्रं च सश्रीकं च समं स्फुटम् ।

वासुदेवं तु विज्ञेयं सर्वकामफलप्रदम् ॥

प्रद्युम्नं सूक्ष्मचक्रं च नवीननीरदप्रभम् ।

सुषिरच्छिद्रबहुलं गृहिणां च सुखप्रदम् ॥

द्वे चक्रे चैकलग्ने च पृष्ठं यत्र तु पुष्कलम् ।

सङ्कर्षणं सुविज्ञेयं सुखदं गृहिणां सदा ॥

अनिरुद्धं तु पीताभं वर्तुलं चातिशोभनम् ।

सुखप्रदं गृहस्थानां प्रवदन्ति मनीषिणः ॥

शालग्रामशिला यत्र तत्र सन्निहितो हरिः ।

तत्रैव लक्ष्मीर्वसति सर्वतीर्थसमन्विता ॥

यानि कानि च पापानि ब्रह्महत्यादिकानि च ।

तानि सर्वाणि नश्यन्ति शालग्रामशिलार्चनात् ॥

छत्राकारे भवेद्राज्यं वर्तुले च महाश्रियः ।

दुःखञ्च शकटाकारे शूलाग्रे मरणं ध्रुवम् ॥

जो अत्यन्त विस्तृत मुखवाला हो, दो चक्रके चिह्नोंसे सुशोभित हो, जो देखनेमें बड़ा विकट लगता ६ ९हो, मनुष्योंको शीघ्र वैराग्य प्रदान करनेवाले ऐसे पाषाणको भगवान् ' नरसिंह ' का स्वरूप समझना चाहिये ॥ ६ ९ ॥ जिसमें दो चक्र हों, जो विस्तृत मुखवाला हो ७० तथा वनमालासे सुशोभित हो, गृहस्थोंको सुख प्रदान करनेवाले ऐसे पाषाणको ' लक्ष्मीनृसिंह ' का स्वरूप समझना चाहिये ॥ ७० ॥

जिसके द्वारदेशमें दो चक्र तथा ' श्री ' का चिह्न ७१ स्पष्ट रूपसे अंकित हो, समस्त कामनाओंका फल प्रदान करनेवाले उस पाषाणको भगवान् ' वासुदेव ' का विग्रह जानना चाहिये ॥ ७१ ॥

जो सूक्ष्म चक्र के चिह्नसे युक्त हो, नवीन मेघके समान श्यामवर्णका हो और जिसके मुखपर बहुतसे ७२ छोटे - छोटे छिद्र विद्यमान हों, गृहस्थोंको सुख प्रदान करनेवाले उस पाषाणको ' प्रद्युम्न ' का स्वरूप जानना चाहिये ॥ ७२ ॥

जिसमें परस्पर सटे हुए दो चक्रोंके चिह्न ७३ विद्यमान हों तथा जिसका पृष्ठभाग विशाल हो, गृहस्थोंको निरन्तर सुख प्रदान करनेवाले उस पाषाणको भगवान् ' संकर्षण ' का ही रूप समझना चाहिये ॥ ७३ ॥

जो अत्यन्त सुन्दर, गोलाकार तथा पीत ७४ आभावाला हो, गृहस्थोंको सुख प्रदान करनेवाले उस पाषाणको विद्वान् पुरुष भगवान् ' अनिरुद्ध ' का स्वरूप कहते हैं ॥ ७४ ॥

जहाँ शालग्रामकी शिला रहती है, वहाँ भगवान् ७५ श्रीहरि विराजमान रहते हैं और वहींपर भगवती लक्ष्मी भी सभी तीर्थोंको साथ लेकर सदा निवास करती हैं ॥ ७५ ॥

ब्रह्महत्या आदि जो भी पाप हैं, वे सब शालग्रामकी शिलाके पूजनसे नष्ट हो जाते हैं ॥ ७६ ॥

७६ छत्राकार शालग्रामके पूजनसे राज्य, गोलाकार शालग्रामके पूजनसे महालक्ष्मी, शकटके आकारवाले शालग्रामके पूजनसे कष्ट तथा शूलके समान अग्रभागवाले शालग्रामके पूजनसे निश्चितरूपसे ७७ । मृत्यु होती है ॥ ७७ ॥

पृष्ठ 452

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अ ० २४ ] नवम स्कन्ध ४४३

विकृतास्ये च दारिद्र्यं पिङ्गले हानिरेव च ।

भग्नचक्रे भवेद्व्याधिर्विदीर्णे मरणं ध्रुवम् ॥

व्रतं दानं प्रतिष्ठा च श्राद्धं च देवपूजनम् ।

शालग्रामस्य सान्निध्यात्प्रशस्तं तद्भवेदिति ॥

स स्नातः सर्वतीर्थेषु सर्वयज्ञेषु दीक्षितः ।

सर्वयज्ञेषु तीर्थेषु व्रतेषु च तपःसु च ॥

पाठे चतुर्णां वेदानां तपसां करणे सति ।

तत्पुण्यं लभते नूनं शालग्रामशिलार्चनात् ॥

( शालग्रामशिलातोयैर्योऽभिषेकं सदा चरेत् । सर्वदानेषु यत्पुण्यं प्रदक्षिणं भुवो यथा ॥ )

शालग्रामशिलातोयं नित्यं भुङ्क्ते च यो नरः ।

सुरेप्सितं प्रसादं च लभते नात्र संशयः ॥

तस्य स्पर्शं च वाञ्छन्ति तीर्थानि निखिलानि च ।

जीवन्मुक्तो महापूतोऽप्यन्ते याति हरेः पदम् ॥

तत्रैव हरिणा सार्धमसंख्यं प्राकृतं लयम् ।

यास्यत्येव हि दास्ये च नियुक्तो दास्यकर्मणि ॥

यानि कानि च पापानि ब्रह्महत्यासमानि च ।

तं दृष्ट्वा च पलायन्ते वैनतेयादिवोरगाः ॥

तत्पादरजसा देवी सद्यः पूता वसुन्धरा ।

पुंसां लक्षं तत्पितॄणां निस्तरेत्तस्य जन्मतः ॥

शालग्रामशिलातोयं मृत्युकाले च यो लभेत् ।

सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुलोकं स गच्छति ॥

निर्वाणमुक्तिं लभते कर्मभोगात्प्रमुच्यते ।

विष्णोः पदे प्रलीनश्च भविष्यति न संशयः ॥

विकृत मुखवाले शालग्रामसे दरिद्रता, पिंगलवर्ण-७८ वालेसे हानि, खण्डित चक्रवालेसे व्याधि तथा विदीर्ण शालग्रामसे निश्चय ही मरण होता है ॥ ७८ ॥

व्रत, स्नान, प्रतिष्ठा, श्राद्ध तथा देवपूजन आदि ७ ९ जो भी कर्म शालग्रामकी सन्निधिमें किया जाता है, वह प्रशस्त माना जाता है और वह कर्ता मानो सभी तीर्थोंमें स्नान कर चुका और सभी यज्ञोंमें दीक्षित हो गया । इस प्रकार उसे सम्पूर्ण यज्ञों, ८० तपस्याओंका फल मिल जाता है । चारों वेदोंके पढ़ने तथा तपस्या प्राप्त होता है, वह पुण्य शालग्रामकी ८१ निश्चितरूपसे सुलभ हो जाता है ॥ तीर्थों, व्रतों और ७ ९ -८० ॥ करनेसे जो पुण्य शिलाके पूजनसे ८१ ॥ ( जो मनुष्य शालग्रामशिलाके जलसे नित्य अभिषेक करता है, वह सभी दान करने तथा पृथ्वीकी प्रदक्षिणा करनेसे जो पुण्य होता है, उसे प्राप्त कर लेता है । ) जो मनुष्य शालग्रामशिलाके जलका नित्य पान करता है, वह देवाभिलषित प्रसाद प्राप्त कर लेता ८२ है, इसमें सन्देह नहीं है । समस्त तीर्थ उसका स्पर्श करना चाहते हैं । वह जीवन्मुक्त तथा परम पवित्र मनुष्य अन्तमें भगवान् श्रीहरिके लोक चला जाता है । ८३ वहाँपर वह भगवान् श्रीहरिके साथ असंख्य प्राकृत प्रलयपर्यन्त रहता है । वह वहाँ भगवान्‌का दास्यभाव प्राप्त कर लेता है और उनके सेवाकार्यमें नियुक्त हो

८४ जाता है । ८२ – ८४ ॥

ब्रह्महत्यासदृश जो कोई भी पाप हों, वे भी उस व्यक्तिको देखते ही उसी प्रकार भाग जाते हैं, जैसे ८५ गरुड़को देखकर सर्प ॥८५ ॥

उस मनुष्यके चरणकी रजसे पृथ्वीदेवी तुरन्त पवित्र हो जाती हैं और उसके जन्मसे उसके लाखों ८६ पितरोंका उद्धार हो जाता है ॥ ८६ ॥

जो मनुष्य मृत्युके समय शालग्रामशिलाके जलका पान कर लेता है, वह समस्त पापोंसे मुक्त ८७ होकर विष्णुलोकको चला जाता है । इस प्रकार वह सभी कर्मभोगोंसे मुक्त होकर निर्वाणमुक्ति प्राप्त कर लेता है और भगवान् विष्णुके चरणोंमें लीन हो जाता ८८ । है; इसमें संशय नहीं है ॥ ८७-८८ ॥

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४४४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २४

शालग्रामशिलां धृत्वा मिथ्यावाक्यं वदेत्तु यः ।

स याति कुम्भीपाके च यावद्वै ब्रह्मणो वयः ॥

शालग्रामशिलां धृत्वा स्वीकारं यो न पालयेत् ।

स प्रयात्यसिपत्रं च लक्षमन्वन्तरावधि ॥

तुलसीपत्रविच्छेदं शालग्रामे करोति यः ।

तस्य जन्मान्तरे कान्ते स्त्रीविच्छेदो भविष्यति ॥

तुलसीपत्रविच्छेदं शङ्खे यो हि करोति च ।

भार्याहीनो भवेत्सोऽपि रोगी च सप्तजन्मसु ॥

शालग्रामं च तुलसीं शङ्खं चैकत्र एव च ।

यो रक्षति महाज्ञानी स भवेच्छ्रीहरेः प्रियः ॥

सकृदेव हि यो यस्यां वीर्याधानं करोति च ।

तद्विच्छेदे तस्य दुःखं भवेदेव परस्परम् ॥

त्वं प्रिया शङ्खचूडस्य चैकमन्वन्तरावधि ।

शङ्खेन सार्धं त्वद्भेदः केवलं दुःखदस्तथा ॥

इत्युक्त्वा श्रीहरिस्तां च विरराम च नारद ।

सा च देहं परित्यज्य दिव्यरूपं विधाय च ॥

यथा श्रीश्च तथा सा चाप्युवास हरिवक्षसि ।

स जगाम तया सार्धं वैकुण्ठं कमलापतिः ॥

लक्ष्मी: सरस्वती गङ्गा तुलसी चापि नारद ।

हरेः प्रियाश्चतस्त्रश्च बभूवुरीश्वरस्य च ॥

सद्यस्तद्देहजाता च बभूव गण्डकी नदी ।

ईश्वरः सोऽपि शैलश्च तत्तीरे पुण्यदो नृणाम् ॥

कुर्वन्ति तत्र कीटाश्च शिलां बहुविधां मुने ।

पतन्ति या याश्च फलदास्ताश्च निश्चितम् ॥

शालग्रामशिलाको हाथमें लेकर जो मनुष्य मिथ्या ८ ९ वचन बोलता है, वह कुम्भीपाकनरकमें जाता है और ब्रह्माकी आयुपर्यन्त वहाँ निवास करता है ॥ ८ ९ ॥ जो शालग्रामशिलाको हाथमें लेकर अपने द्वारा ९ ० की गयी प्रतिज्ञाका पालन नहीं करता, वह असिपत्र नामक नरक में जाता है और वहाँ एक लाख मन्वन्तरकी अवधितक रहता है ॥ ९ ० ॥ हे कान्ते! जो मनुष्य शालग्रामशिलासे तुलसीपत्रको ९ १ हटा देता है, वह दूसरे जन्ममें स्त्रीसे वियुक्त हो जाता है । उसी प्रकार जो पुरुष शंखसे तुलसीपत्रको अलग करता है, वह भी सात जन्मोंतक भार्याविहीन तथा ९ २ रोगयुक्त रहता है ॥९ १ - ९ २ ॥ जो महाज्ञानी व्यक्ति शालग्राम, तुलसी और शंखको एकत्र रखता है, वह भगवान् श्रीहरिके लिये ९ ३ अत्यन्त प्रिय हो जाता है॥९ ३ ॥ जो पुरुष एक बार भी जिस किसी स्त्रीके साथ एकान्तवास कर लेता है, वियोग होनेपर उसका ९ ४ दुःख उन दोनोंको परस्पर होता है । तुम एक मन्वन्तरकी अवधितक शंखचूड़की भार्या रह चुकी हो, अतः उसके साथ तुम्हारा वियोग कष्टदायक तो

९ ५ होगा ही । ९ ४ - ९ ५ ॥

हे नारद! उस तुलसीसे ऐसा कहकर भगवान् श्रीहरि चुप हो गये । तुलसी अपना वह शरीर ९ ६ त्यागकर और दिव्य रूप धारण करके श्रीहरि वक्ष: स्थलपर लक्ष्मीकी भाँति सुशोभित होने लगी । इसके बाद वे लक्ष्मीपति श्रीहरि उसके साथ वैकुण्ठलोक चले गये ॥ ९ ६ - ९ ७ ॥ ९ ७ हे नारद! इस प्रकार लक्ष्मी, सरस्वती, गंगा और तुलसी – ये चारों देवियाँ भगवान् श्रीहरिकी पत्नियाँ हुईं ॥ ९ ८ ॥ ९ ८ उसी समय तुरन्त तुलसीके शरीरसे गण्डकीनदी उत्पन्न हुई और भगवान् श्रीहरि उसीके तटपर मनुष्योंके लिये पुण्यप्रद शालग्राम बन गये ॥ ९९ ॥

९९ हे मुने! वहाँ रहनेवाले कीट शिलाको काट-काटकर उन्हें अनेक प्रकारके रूपोंवाला बना देते हैं । जो - जो शिलाएँ जलमें गिरती हैं, वे निश्चितरूपसे १०० । उत्तम फल देनेवाली होती हैं । जो शिलाएँ धरतीपर

पृष्ठ 454

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अ ० २५ ] नवम स्कन्ध ४४५ स्थलस्थाः पिङ्गला ज्ञेयाश्चोपतापाद्रवेरिति । गिरी रहती हैं, वे सूर्यके तापके कारण पीली पड़ जाती हैं, उन्हें पिंगला शिला समझना चाहिये । इस प्रकार मैंने सारा प्रसंग कह दिया, अब पुनः क्या सुनना

इत्येवं कथितं सर्वं किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥ १०१ । चाहते हैं? ॥ १०० - १०१ ॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्रयां संहितायां नवमस्कन्धे नारायणनारदसंवादे तुलसीमाहात्म्येन सह शालग्राममहत्त्ववर्णनं नाम चतुर्विंशोऽध्यायः ॥ २४ ॥

अथ पञ्चविंशोऽध्यायः तुलसी - पूजन, ध्यान, नामाष्टक तथा तुलसीस्तवनका वर्णन नारद उवाच

तुलसी च यदा पूज्या कृता नारायणप्रिया ।

अस्याः पूजाविधानं च स्तोत्रं च वद साम्प्रतम् ॥

केन पूजा कृता केन स्तुता प्रथमतो मुने ।

तत्र पूज्या सा बभूव केन वा वद मामहो ॥

सूत उवाच

नारदस्य वचः श्रुत्वा प्रहस्य मुनिपुङ्गवः ।

कथां कथितुमारेभे पुण्यां पापहरां पराम् ॥

श्रीनारायण उवाच

हरिः सम्पूज्य तुलसीं रेमे च रमया सह ।

रमासमानसौभाग्यां चकार गौरवेण च ॥

सेहे च लक्ष्मीर्गङ्गा च तस्याश्च नवसङ्गमम् ।

सौभाग्यगौरवं कोपात्ते न सेहे सरस्वती ॥

सा तां जघान कलहे मानिनी हरिसन्निधौ ।

व्रीडया चापमानेन सान्तर्धानं चकार ह ॥

सर्वसिद्धेश्वरी देवी ज्ञानिनां सिद्धियोगिनी ।

जगामादर्शनं कोपात्सर्वत्र च हरेरहो ॥

हरिर्न दृष्ट्वा तुलसीं बोधयित्वा सरस्वतीम् ।

तदनुज्ञां गृहीत्वा च जगाम तुलसीवनम् ॥

नारदजी बोले - जिस समय विष्णुप्रिया तुलसीकी पूजा की गयी थी, उस समय उनके लिये किये गये १ पूजन - विधान तथा स्तोत्रको अब आप मुझे बताइये । हे मुने! सर्वप्रथम किसने उनकी पूजा की, किसने उनका स्तवन किया और किस प्रकार वे सर्वत्र पूज्य २ । हुईं - यह सब आप मुझे बताइये ॥ १-२ ॥ सूतजी बोले- हे मुनीश्वरो! नारदका वचन सुनकर मुनिश्रेष्ठ भगवान् नारायणने हँसकर सभी पापों का नाश करनेवाली, पुण्यमयी तथा श्रेष्ठ कथा कहना आरम्भ किया ॥ ३ ॥

३ श्रीनारायण बोले- भगवान् श्रीहरि तुलसीकी विधिवत् पूजा करके उस साध्वी के साथ आनन्द करने लगे । उन्होंने तुलसीको गौरव प्रदान करके उसे लक्ष्मीके समान सौभाग्यवती बना दिया ॥ ४ ॥

४ लक्ष्मी और गंगाने तो उस तुलसीके नवसमागम तथा सौभाग्य - गौरवको सहन कर लिया, किंतु अत्यधिक क्षोभ उत्पन्न होनेके कारण सरस्वती इसे सहन नहीं ५ कर सकीं ॥ ५ ॥

उस मानिनी सरस्वतीने कलहमें श्रीहरिके समक्ष तुलसीको बहुत पीड़ित किया । इससे लज्जा और ६ अपमानके कारण तुलसी अन्तर्धान हो गयीं ॥ ६ ॥

ज्ञानियोंके लिये सर्वसिद्धेश्वरी तथा सिद्धयोगिनी देवी तुलसी कोपके कारण भगवान् श्रीहरिकी आँखोंसे ७ | ओझल हो गयीं ॥ ७ ॥

जब भगवान् श्रीहरिने तुलसीको कहीं नहीं देखा, तब सरस्वतीको समझा - बुझाकर तथा उससे ८ आज्ञा लेकर वे तुलसीवनकी ओर चल दिये ॥ ८ ॥

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४४६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २५ तत्र गत्वा च सुस्नातो हरिः स तुलसीं सतीम् पूजयामास तां ध्यात्वा स्तोत्रं भक्त्या चकार ह लक्ष्मीमायाकामवाणीबीजपूर्वं दशाक्षरम् वृन्दावनीति ङेऽन्तं च वह्निजायान्तमेव च अनेन कल्पतरुणा मन्त्रराजेन नारद पूजयेद्यो विधानेन सर्वसिद्धिं लभेद् ध्रुवम् घृतदीपेन धूपेन सिन्दूरचन्दनेन च । नैवेद्येन च पुष्पेण चोपचारेण नारद हरिस्तोत्रेण तुष्टा सा चाविर्भूता महीरुहात् प्रसन्ना चरणाम्भोजे जगाम शरणं शुभा वरं तस्यै ददौ विष्णुः सर्वपूज्या भवेरिति अहं त्वां धारयिष्यामि सुरूपां मूर्ध्नि वक्षसि सर्वे त्वां धारयिष्यन्ति स्वमूर्ध्नि च सुरादयः इत्युक्त्वा तां गृहीत्वा च प्रययौ स्वालयं विभुः नारद उवाच किं ध्यानं स्तवनं किं वा किं वा पूजाविधानकम् । तुलस्याश्च महाभाग तन्मे व्याख्यातुमर्हसि श्रीनारायण उवाच अन्तर्हितायां तस्यां च हरिर्वृन्दावने तदा । तस्याश्चक्रे स्तुतिं गत्वा तुलसीं विरहातुरः श्रीभगवानुवाच

वृन्दरूपाश्च वृक्षाश्च यदैकत्र भवन्ति च ।

विदुर्बुधास्तेन वृन्दां मत्प्रियां तां भजाम्यहम् ॥

। वहाँ पहुँचकर श्रीहरिने विधिवत् स्नान ॥ ९ किया और उन साध्वी तुलसीका पूजन किया । तत्पश्चात् उनका ध्यान करके भगवान्ने भक्तिपूर्वक । उनकी स्तुति की । उन्होंने लक्ष्मीबीज ( श्रीं ), मायाबीज ( ह्रीं ), कामबीज ( क्लीं ) और वाणीबीज ( ऐं ) इन ॥ १० बीजोंको पूर्वमें लगाकर ' वृन्दावनी ’ – इस शब्दके अन्तमें ' ङे ' ( चतुर्थी ) विभक्ति लगाकर तथा अन्तमें । वह्निजाया ( स्वाहा ) - का प्रयोग करके दशाक्षर मन्त्र ॥ ११ ( श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं वृन्दावन्यै स्वाहा ) - से पूजन किया था ॥ ९ -१० ॥ हे नारद! जो इस कल्पवृक्षरूपी मन्त्रराजसे विधिपूर्वक तुलसीकी पूजा करता है, वह निश्चितरूपसे ॥ १२ समस्त सिद्धियाँ प्राप्त कर लेता है ॥ ११ ॥

हे नारद! घृतका दीपक, धूप, सिन्दूर, चन्दन, । नैवेद्य और पुष्प आदि उपचारों तथा स्तोत्रसे भगवान् ॥ १३ श्रीहरिके द्वारा सम्यक् पूजित होकर तुलसीदेवी वृक्षसे तत्काल प्रकट हो गयीं । वे कल्याणकारिणी तुलसी । प्रसन्न होकर श्रीहरिके चरणकमलकी शरणमें चली ॥ १४ गयीं ॥ १२-१३ ॥ तब भगवान् विष्णुने उन्हें यह वर प्रदान । किया- ' तुम सर्वपूज्या हो जाओ । सुन्दर रूपवाली तुमको मैं अपने मस्तक तथा वक्षःस्थलपर धारण ॥ १५ करूँगा और समस्त देवता आदि भी तुम्हें अपने मस्तकपर धारण करेंगे ' - ऐसा कहकर भगवान् श्रीहरि उन तुलसीको साथ लेकर अपने स्थानपर चले गये ॥ १४-१५ ॥ ॥ १६ नारदजी बोले - हे महाभाग! तुलसीका ध्यान क्या है, स्तवन क्या है तथा पूजा - विधान क्या है? यह मुझे बतानेकी कृपा कीजिये ॥ १६ ॥

श्रीनारायण बोले - [ हे नारद! ] उस समय तुलसीके अन्तर्धान हो जानेपर भगवान् श्रीहरि विरहसे ॥ १७ व्यथित हो उठे और वृन्दावन जाकर उन तुलसीकी इस प्रकार स्तुति * करने लगे ॥ १७ ॥

श्रीभगवान् बोले w -- जब वृन्दा ( तुलसी ) - - रूप वृक्ष तथा अन्य वृक्ष एकत्र होते हैं, तब विद्वान् लोग उसे ' वृन्दा ' कहते हैं । ऐसी ' वृन्दा ' नामसे प्रसिद्ध १८ । अपनी प्रियाकी मैं उपासना करता हूँ ॥१८ ॥

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अ ० २५ ]

पुरा बभूव या देवी त्वादौ वृन्दावने वने ।

तेन वृन्दावनी ख्याता सौभाग्यां तां भजाम्यहम् ॥

असंख्येषु च विश्वेषु पूजिता या निरन्तरम् ।

तेन विश्वपूजिताख्यां पूजितां च भजाम्यहम् ॥

असंख्यानि च विश्वानि पवित्राणि त्वया सदा ।

तां विश्वपावनीं देवीं विरहेण स्मराम्यहम् ॥

देवा न तुष्टाः पुष्पाणां समूहेन यया विना ।

तां पुष्पसारां शुद्धां च द्रष्टुमिच्छामि शोकतः ॥

विश्वे यत्प्राप्तिमात्रेण भक्तानन्दो भवेद् ध्रुवम् ।

नन्दिनी तेन विख्याता सा प्रीता भवतादिह ॥

यस्या देव्यास्तुला नास्ति विश्वेषु निखिलेषु च ।

तुलसी तेन विख्याता तां यामि शरणं प्रियाम् ॥

कृष्णजीवनरूपा सा शश्वत्प्रियतमा सती ।

तेन कृष्णजीवनी सा सा मे रक्षतु जीवनम् ॥

इत्येवं स्तवनं कृत्वा तस्थौ तत्र रमापतिः ।

ददर्श तुलसीं साक्षात्पादपद्मनतां सतीम् ॥

रुदतीमवमानेन मानिनीं मानपूजिताम् ।

प्रियां दृष्ट्वा प्रियः शीघ्रं वासयामास वक्षसि ॥

भारत्याज्ञां गृहीत्वा च स्वालयं च ययौ हरिः ।

भारत्या सह तत्प्रीतिं कारयामास सत्वरम् ॥

वरं विष्णुर्ददौ तस्यै सर्वपूज्या भवेरिति ।

शिरोधार्या च सर्वेषां वन्द्या मान्या ममेति च ॥

विष्णोर्वरेण सा देवी परितुष्टा बभूव च ।

सरस्वती तामाकृष्य वासयामास सन्निधौ ॥

नवम स्कन्ध ४४७ जो देवी प्राचीन कालमें सर्वप्रथम वृन्दावनमें १ ९ प्रकट हुई थी और इसलिये जो ' वृन्दावनी ' नामसे प्रसिद्ध हुई, उस सौभाग्यवती देवीकी मैं उपासना करता हूँ ॥ १ ९ ॥ असंख्य विश्वोंमें सदा जिसकी पूजा की जाती है, इसलिये ' विश्वपूजिता ' नामसे प्रसिद्ध २० उस सर्वपूजित भगवती तुलसीकी मैं उपासना करता हूँ ॥ २० ॥ तुम असंख्य विश्वोंको सदा पवित्र करती

हो, अतः तुम ' विश्वपावनी ' नामक देवीका मैं २१ विरहसे आतुर होकर स्मरण करता हूँ ॥ २१ ॥ जिसके

विना प्रचुर पुष्प अर्पित करनेपर भी देवता प्रसन्न नहीं होते हैं, मैं शोकाकुल होकर ' पुष्पसारा ' नामसे २२ विख्यात, पुष्पोंकी सारभूत तथा शुद्धस्वरूपिणी उस देवी तुलसीके दर्शनकी कामना करता हूँ ॥ २२ ॥

संसारमें जिसकी प्राप्तिमात्रसे भक्तको निश्चय ही २३ आनन्द प्राप्त होता है, इसलिये ' नन्दिनी ' नामसे विख्यात वह देवी अब मुझपर प्रसन्न हो ॥ २३ ॥

सम्पूर्ण विश्वोंमें जिस देवीकी कोई तुलना नहीं है, अतः ' तुलसी ' नामसे विख्यात अपनी उस प्रियाकी मैं २४ शरण ग्रहण करता हूँ ॥ २४ ॥ वह साध्वी तुलसी

श्रीकृष्णकी जीवनस्वरूपा तथा उन्हें निरन्तर प्रेम प्रदान करनेवाली है, इसलिये ' कृष्णजीवनी ' नामसे २५ प्रसिद्ध वह देवी मेरे जीवनकी रक्षा करे ॥ २५ ॥

इस प्रकार स्तुति करके लक्ष्मीपति भगवान् श्रीहरि वहीं विराजमान हो गये । तभी उन्होंने साक्षात् २६ तुलसीको सामने देखा । वह साध्वी उन श्रीहरिके चरणकमलोंमें अपना मस्तक झुकाये हुए थी और अपमानके कारण वह मानिनी तुलसी रो रही थी । २७ ऐसी मानपूजित प्रियाको देखकर प्रेममूर्ति श्रीहरिने उसे अपने वक्षपर स्थान दिया ॥ २६-२७ ॥ तत्पश्चात् सरस्वतीसे आज्ञा लेकर श्रीहरि उसे अपने भवनमें ले गये और वहाँ शीघ्र २८ साथ उसकी प्रीति करवायी । श्रीहरिने किया- ' तुम सबके लिये तथा मेरे सिरपर धारण करने योग्य, वन्दनीय २ ९ | जाओ ' ॥ २८-२९ ॥ भगवान् विष्णुके इस वरदानसे परम सन्तुष्ट हो गयीं और सरस्वतीने ३० । अपने पास बैठा लिया ॥ ३० ॥

ही सरस्वतीके उसे वर प्रदान लिये पूजनीय, तथा मान्य हो वे देवी तुलसी उन्हें पकड़कर

पृष्ठ 457

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४४८ लक्ष्मीर्गङ्गा सस्मिता च तां समाकृष्य नारद गृहं प्रवेशयामास विनयेन सतीं तदा वृन्दा वृन्दावनी विश्वपूजिता विश्वपावनी पुष्पसारा नन्दनी च तुलसी कृष्णजीवनी एतन्नामाष्टकञ्चैव स्तोत्रं नामार्थसंयुतम् यः पठेत्तां च सम्पूज्य सोऽश्वमेधफलं लभेत् कार्तिक्यां पूर्णिमायां च तुलस्या जन्म मङ्गलम् तत्र तस्याश्च पूजा च विहिता हरिणा पुरा तस्यां यः पूजयेत्तां च भक्त्या वै विश्वपावनीम् सर्वपापाद्विनिर्मुक्तो विष्णुलोकं स गच्छति कार्तिके तुलसीपत्रं यो ददाति च विष्णवे गवामयुतदानस्य फलं प्राप्नोति निश्चितम् अपुत्रो लभते पुत्रं प्रियाहीनो लभेत्प्रियाम् । बन्धुहीनो लभेद् बन्धून् स्तोत्र श्रवणमात्रतः रोगी प्रमुच्यते रोगाद् बद्धो मुच्येत बन्धनात् । भयान्मुच्येत भीतस्तु पापान्मुच्येत पातकी इत्येवं कथितं स्तोत्रं ध्यानं पूजाविधिं शृणु । त्वमेव वेदे जानासि कण्वशाखोक्तमेव च

तद्वृक्षे पूजयेत्तां च भक्त्या चावाहनं विना ।

तां ध्यात्वा चोपचारेण ध्यानं पातकनाशनम् ॥

तुलसीं पुष्पसारां च सतीं पूतां मनोहराम् ।

कृतपापेध्मदाहाय ज्वलदग्निशिखोपमाम् ॥

श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २५ । हे नारद! उस समय लक्ष्मी और गंगाके ॥ ३१ मुखपर मुसकराहट आ गयी और उन्होंने विनम्रता -पूर्वक उन साध्वी तुलसीको पकड़कर घरमें प्रवेश | करवाया ॥ ३१ ॥

वृन्दा, वृन्दावनी, विश्वपूजिता, विश्वपावनी, ॥ ३२ पुष्पसारा, नन्दिनी, तुलसी तथा कृष्णजीवनी — ये तुलसीके आठ नाम हैं । जो मनुष्य तुलसीकी विधिवत् । पूजा करके नामके अर्थोंसे युक्त आठ नामोंवाले इस ॥ ३३ नामाष्टकस्तोत्रका पाठ करता है, वह अश्वमेधयज्ञका फल प्राप्त करता है ॥ ३२-३३ ॥ कार्तिक पूर्णिमा तिथिको तुलसीका मंगलमय । प्राकट्य हुआ था । उस समय सर्वप्रथम भगवान् ॥ ३४ श्रीहरिने उनकी पूजा सम्पन्न की थी । अतः जो मनुष्य उस दिन उन विश्वपावनी तुलसीकी भक्तिपूर्वक पूजा । करता है, वह समस्त पापोंसे मुक्त होकर विष्णुलोक ॥ ३५ | जाता है ॥ ३४-३५ ॥ जो व्यक्ति कार्तिक महीनेमें भगवान् विष्णुको । तुलसीपत्र अर्पण करता है, वह दस हजार गायोंके दानका फल निश्चितरूपसे प्राप्त करता है ॥ ३६ ॥

॥ ३६ इस नामाष्टकस्तोत्रके श्रवणमात्रसे पुत्रहीनको पुत्र प्राप्त हो जाता है, भार्याहीनको भार्या मिल जाती है, बन्धुविहीनको बन्धुओंकी प्राप्ति हो जाती है, रोगी ॥ ३७ रोगमुक्त हो जाता है, बन्धनमें पड़ा हुआ व्यक्ति बन्धनसे छूट जाता है, भयभीत मनुष्य निर्भय हो जाता है और पापी पापसे छूट जाता है ॥ ३७-३८ ॥ [ हे नारद! ] इस प्रकार मैंने आपको ॥ ३८ तुलसीस्तोत्र बतला दिया । अब उन ध्यान तथा पूजाविधि सुनिये । आप भी तो वेदमें कण्व-शाखाके अन्तर्गत प्रतिपादित इनके ध्यानके विषयमें ॥ ३ ९ जानते ही हैं ॥ ३ ९ ॥ तुलसीका ध्यान पापोंका नाश करनेवाला है, अतः उनका ध्यान करके बिना आवाहन किये ही तुलसीके वृक्षमें विविध पूजनोपचारोंसे पुष्पोंकी सारभूता, ४० पवित्र, अत्यन्त मनोहर और किये गये पापरूपी ईंधनको जलानेके लिये प्रज्वलित अग्निकी शिखाके समान साध्वी तुलसीकी भक्तिपूर्वक पूजा करनी ४१ | चाहिये ॥ ४०-४१ ॥

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अ ० २६ ]

पुष्पेषु तुलना यस्या नास्ति वेदेषु भाषितम् ।

पवित्ररूपा सर्वासु तुलसी सा च कीर्तिता ॥

शिरोधार्या च सर्वेषामीप्सिता विश्वपावनी ।

जीवन्मुक्तां मुक्तिदां च भजे तां हरिभक्तिदाम् ॥

इति ध्यात्वा च सम्पूज्य स्तुत्वा च प्रणमेत् सुधीः । उक्तं तुलस्युपाख्यानं किं भूयः श्रोतुमिच्छसि नवम स्कन्ध ४४ ९ पुष्पोंमें किसीसे भी जिनकी तुलना नहीं है, जिनका महत्त्व वेदोंमें वर्णित है, जो सभी अवस्थाओंमें ४२ सदा पवित्र बनी रहती हैं, जो तुलसी नामसे प्रसिद्ध हैं, जो भगवान् के लिये शिरोधार्य हैं, सबकी अभीष्ट हैं तथा जो सम्पूर्ण जगत्को पवित्र करनेवाली हैं; उन जीवन्मुक्त, मुक्तिदायिनी तथा श्रीहरिकी भक्ति प्रदान करनेवाली भगवती तुलसीकी ४३ मैं उपासना करता हूँ ॥ ४२-४३ ॥ [ हे नारद! ] विद्वान् पुरुषको चाहिये कि इस प्रकारसे देवी तुलसीका ध्यान, पूजन तथा स्तवन करके उन्हें प्रणाम करे । मैंने आपसे तुलसीके उपाख्यानका वर्णन कर दिया; अब आप पुनः क्या सुनना चाहते ॥ ४४ | हैं ॥ ४४ ॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां नवमस्कन्धे तुलसीपूजाविधिवर्णनं नाम पञ्चविंशोऽध्यायः ॥ २५ ॥

अथ षड्विंशोऽध्यायः सावित्रीदेवीकी नारद उवाच

तुलस्युपाख्यानमिदं श्रुतं चातिसुधोपमम् ।

ततः सावित्र्युपाख्यानं तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥

पुरा केन समुद्भूता सा श्रुता च श्रुतेः प्रसूः ।

केन वा पूजिता लोके प्रथमे कैश्च वा परे ॥

श्रीनारायण उवाच

ब्रह्मणा वेदजननी प्रथमे पूजिता मुने ।

द्वितीये च वेदगणैस्तत्पश्चाद्विदुषां गणैः ॥

तदा चाश्वपतिर्भूपः पूजयामास भारते ।

तत्पश्चात्पूजयामासुर्वर्णाश्चत्वार एव च ॥

नारद उवाच

को वा सोऽश्वपतिर्ब्रह्मन् केन वा तेन पूजिता ।

सर्वपूज्या च सा देवी प्रथमे कैश्च वा परे ॥

श्रीनारायण उवाच

मद्रदेशे महाराजो बभूवाश्वपतिर्मुने ।

वैरिणां बलहर्ता च मित्राणां दुःखनाशनः ॥

पूजा - स्तुतिका विधान नारदजी बोले – तुलसीकी यह अमृततुल्य कथा तो मैंने सुन ली, अब आप सावित्रीकी कथा कहनेकी १ कृपा कीजिये । ऐसा सुना गया है कि वे सावित्री वेदोंकी जननी हैं । वे सर्वप्रथम किससे उत्पन्न हुईं, जगत् में सर्वप्रथम इनकी पूजा किसने की और बादमें २ किन लोगोंने इनकी पूजा की? ॥१-२ ॥ श्रीनारायण बोले – हे मुने! सर्वप्रथम ब्रह्माजीने वेदमाता सावित्रीकी पूजा की, इसके बाद ३ वेदोंने और तदनन्तर विद्वद्गणोंने इनका पूजन किया । तत्पश्चात् भारतवर्षमें राजा अश्वपतिने इनका पूजन किया और इसके बाद चारों वर्णके लोग इनकी पूजा ४ करने लगे॥३-४ ॥ नारद बोले – हे ब्रह्मन्! वे अश्वपति कौन थे, सर्वप्रथम उन्होंने सर्वपूज्या उन देवीकी पूजा किस ५ कामनासे की तथा बादमें किन लोगोंने उनका पूजन किया? ॥ ५ ॥

श्रीनारायण बोले- हे मुने! मद्रदेशमें अश्वपति नामक एक महान् राजा हुए । वे अपने शत्रुओंके बलका ६ नाश करनेवाले तथा मित्रोंका दुःख दूर करनेवाले थे ॥ ६ ॥

1898 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ द्वितीय खण्ड ] —15 A

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४५०

आसीत्तस्य महाराज्ञी महिषी धर्मचारिणी ।

मालतीति समाख्याता यथा लक्ष्मीर्गदाभृतः ॥

सा च राज्ञी च वन्ध्या च वसिष्ठस्योपदेशतः ।

चकाराराधनं भक्त्या सावित्र्याश्चैव नारद ॥

प्रत्यादेशं न सा प्राप्ता महिषी न ददर्श ताम् ।

गृहं जगाम दुःखार्ता हृदयेन विदूयता ॥

राजा तां दुःखितां दृष्ट्वा बोधयित्वा नयेन वै ।

सावित्र्यास्तपसे भक्त्या जगाम पुष्करं तदा ॥

तपश्चकार तत्रैव संयतः शतवत्सरम् ।

न ददर्श च सावित्र्याः प्रत्यादेशो बभूव च ॥

शुश्रावाकाशवाणीं च नृपेन्द्रश्चाशरीरिणीम् ।

गायत्र्या दशलक्षं च जपं त्वं कुरु नारद ॥

एतस्मिन्नन्तरे तत्र आजगाम पराशरः ।

प्रणनाम ततस्तं च मुनिर्नृपमुवाच च ॥

मुनिरुवाच

सकृज्जपश्च गायत्र्याः पापं दिनभवं हरेत् ।

दशवारं जपेनैव नश्येत्पापं दिवानिशम् ॥

शतवारं जपश्चैव पापं मासार्जितं हरेत् ।

सहस्रधा जपश्चैव कल्मषं वत्सरार्जितम् ॥

लक्षो जन्मकृतं पापं दशलक्षोऽन्यजन्मजम् ।

सर्वजन्मकृतं पापं शतलक्षाद्विनश्यति ॥

करोति मुक्तिं विप्राणां जपो दशगुणस्ततः ।

करं सर्पफणाकारं कृत्वा तद्रन्ध्रमुद्रितम् ॥

आनम्रमूर्धमचलं प्रजपेत्प्राङ्मुखो द्विजः । श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २६ उनकी महारानी मालती नामसे विख्यात थीं । वे रानी धर्मनिष्ठ थीं । वे उनके लिये उसी प्रकार थीं, जैसे गदाधारी विष्णुके लिये लक्ष्मी ॥ ७ ॥

हे नारद! वे रानी मालती निःसन्तान थीं । अतः उन्होंने ८ वसिष्ठके उपदेशानुसार भगवती सावित्रीकी भक्तिपूर्वक आराधना की । किंतु रानीको देवीसे न तो कोई संकेत मिला और न उनके दर्शन ही हुए, अतः कष्टसे व्याकुल ९ होकर दुःखित मनसे वे घर चली गयीं ॥ ८ - ९ ॥ राजा अश्वपतिने उन्हें दुःखित देखकर नीतिपूर्ण वचनोंसे समझाया । इसके बाद भक्तिपूर्वक सावित्रीकी १० तपस्याके लिये वे पुष्करक्षेत्रमें चले गये । वहाँपर उन्होंने इन्द्रियोंको वशमें करके सौ वर्षतक तपस्या की । उन्हें सावित्रीके दर्शन तो नहीं हुए, किंतु ११ प्रत्यादेश प्राप्त हुआ । हे नारद! उन नृपेन्द्रने यह अशरीरी आकाशवाणी सुनी - [ हे राजेन्द्र! ] तुम गायत्रीका दस लाख जप करो ॥ १० -१२ ॥ १२ इसी बीच वहाँ मुनि पराशर आ गये । राजाने उन्हें प्रणाम किया । तदनन्तर मुनि राजासे कहने लगे ॥ १३ ॥

मुनि बोले - एक बारका गायत्री - जप दिनभरके १३ पापका नाश कर देता है । दस बार गायत्री - जप करनेसे दिन और रातका पाप नष्ट हो जाता है । गायत्रीका सौ बारका जप महीनेभरके संचित पापको हर लेता है और एक हजार बारका जप वर्षभरके १४ संचित पापका नाश कर देता है । गायत्रीका एक लाख जप इस जन्मके किये गये पापों तथा दस लाख जप अन्य जन्मोंमें किये गये पापोंको नष्ट कर देता १५ है । गायत्रीके एक करोड़ जपसे सभी जन्मोंमें किये गये पाप भस्म हो जाते हैं और इससे भी दस गुना जप विप्रोंकी मुक्ति कर देता है । १४ - १६३ ॥ १६ द्विको चाहिये कि हाथको सर्पके फणके आकारका बनाकर अँगुलियोंको परस्पर पूर्णरूपसे सटाकर छिद्ररहित कर ले फिर हाथको नाभिस्थानसे ऊपरकी ओर १७ हृदयदेशतक लाकर कुछ नीचेकी ओर झुकाये हुए उसे स्थिर करके स्वयं पूरबकी ओर मुख करके जप करे । अनामिका मध्य भागसे नीचेकी ओर होते हुए अनामिकामध्यदेशादधोऽवामक्रमेण च ॥१८ | प्रदक्षिण क्रमसे तर्जनीके मूलतक जाना चाहिये,

तर्जनीमूलपर्यन्तं जपस्यैवं क्रमः करे । करमालाके जपका यही नियम है ॥ १७ - १८३ ॥

1898 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ द्वितीय खण्ड ] -15 B

पृष्ठ 460

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अ ० २६ ] श्वेतपङ्कजबीजानां स्फटिकानां च संस्कृताम् ॥

कृत्वा वै मालिकां राजन् जपेत्तीर्थे सुरालये ।

संस्थाप्य मालामश्वत्थपत्रे पद्मे च संयतः ॥

कृत्वा गोरोचनाक्तां च गायत्र्या स्नापयेत्सुधीः ।

गायत्रीशतकं तस्यां जपेच्च विधिपूर्वकम् ॥

अथवा पञ्चगव्येन स्नात्वा मालां सुसंस्कृताम् ।

अथ गङ्गोदकेनैव स्नात्वा वातिसुसंस्कृताम् ॥

एवं क्रमेण राजर्षे दशलक्षं जपं कुरु ।

साक्षाद्द्रक्ष्यसि सावित्रीं त्रिजन्मपातकक्षयात् ॥

नित्यं सन्ध्यां च हे राजन् करिष्यसि दिने दिने ।

मध्याह्ने चापि सायाह्ने प्रातरेव शुचिः सदा ॥

सन्ध्याहीनो ऽशुचिर्नित्यमनर्हः सर्वकर्मसु ।

यदह्ना कुरुते कर्म न तस्य फलभाग्भवेत् ॥

नोपतिष्ठति यः पूर्वं नोपास्ते यस्तु पश्चिमाम् ।

स शूद्रवद्बहिष्कार्यः सर्वस्माद् द्विजकर्मणः ॥

यावज्जीवनपर्यन्तं त्रिः सन्ध्यां यः करोति च ।

स च सूर्यसमो विप्रस्तेजसा तपसा सदा ॥

तत्पादपद्मरजसा सद्यः पूता वसुन्धरा ।

जीवन्मुक्तः स तेजस्वी सन्ध्यापूतो हि यो द्विजः ॥

तीर्थानि च पवित्राणि तस्य संस्पर्शमात्रतः ।

ततः पापानि यान्त्येव वैनतेयादिवोरगाः ॥

न गृह्णन्ति सुराः पूजां पितरः पिण्डतर्पणम् ।

स्वेच्छया च द्विजातेश्च त्रिसन्ध्यारहितस्य च ॥

मूलप्रकृत्यभक्तो यस्तन्मन्त्रस्याप्यनर्चकः ।

तदुत्सवविहीनश्च विषहीनो यथोरगः ॥

नवम स्कन्ध ४५१ १ ९ हे राजन्! श्वेतकमलके बीजों अथवा स्फटिक-मणिकी पवित्र माला बनाकर तीर्थमें या किसी देवालयमें जप करना चाहिये । पीपलके पत्र अथवा २० कमलपर संयमपूर्वक मालाको रखकर गोरोचनसे अनुलिप्त करे, फिर गायत्री मन्त्रका उच्चारण करके विद्वान् पुरुष मालाको स्नान कराये । तत्पश्चात् उसी २१ मालासे विधिपूर्वक गायत्री = मन्त्रका सौ बार जप करना चाहिये अथवा पंचगव्य या गंगाजल से स्नान कराकर शुद्ध की हुई मालासे भी जप किया जा २२ सकता है ॥ १ ९ –२२ ॥ हे राजर्षे! इस क्रमसे आप दस लाख गायत्रीका जप कीजिये | इससे आपके तीन जन्मोंके पापोंका नाश हो जायगा और आप भगवती सावित्रीका २३ साक्षात् दर्शन प्राप्त करेंगे ॥ २३ ॥

हे राजन्! आप पवित्र होकर प्रतिदिन प्रातः, २४ मध्याह्न एवं सायंकालकी सन्ध्या सदा कीजिये । सन्ध्या न करनेवाला व्यक्ति अपवित्र रहता है और वह समस्त कर्मोंके लिये अयोग्य हो जाता है । वह दिनमें जो भी सत्कर्म करता है, उसके फलका २५ अधिकारी नहीं रह जाता है ॥ २४-२५ ॥ जो ब्राह्मण प्रातः एवं सायंकालकी सन्ध्या नहीं करता, वह शूद्रके समान है और समस्त ब्राह्मणोचित २६ कर्मोंसे बहिष्कृत कर देनेयोग्य है ॥२६ ॥

जो विप्र जीवनपर्यन्त सदा त्रिकालसन्ध्या करता है, वह तपस्या तथा तेजके कारण सूर्यके समान हो २७ जाता है । उसके चरण कमलकी धूलसे पृथ्वी शीघ्र पवित्र हो जाती है । जो द्विज सन्ध्या करनेके कारण पवित्र हो चुका है, वह तेजसे सम्पन्न तथा जीवन्मुक्त २८ ही है । उसके स्पर्शमात्रसे सभी तीर्थ पवित्र हो जाते हैं और उसके पाससे पाप उसी प्रकार भाग जाते हैं, जैसे गरुडको देखते ही सर्प ॥ २७ - २ ९ ॥ २ ९ जो द्विज त्रिकालसन्ध्या नहीं करता, उसके द्वारा सम्पादित पूजाको देवगण तथा पिण्ड - तर्पणको पितृगण स्वेच्छापूर्वक स्वीकार नहीं करते हैं ॥ ३० ॥

३० जो व्यक्ति मूलप्रकृतिकी भक्ति नहीं करता, उनके मन्त्रकी आराधना नहीं करता और उनका उत्सव नहीं मनाता; वह विषहीन सर्पकी तरह ३१ तेजरहित होता है ॥ ३१ ॥

1898 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ द्वितीय खण्ड ] - 15 C