देवी भागवत उत्तरार्द्ध — पृष्ठ 461–470

देवी भागवत उत्तरार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 461–470

पृष्ठ 461

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४५२ विष्णुमन्त्रविहीनश्च त्रिसन्ध्यारहितो द्विजः एकादशीविहीनश्च विषहीनो यथोरगः हरेरनैवेद्यभोजी वृषवाहकः शूद्रान्नभोजी यो विप्रो विषहीनो यथोरगः ॥ शूद्राणां शवदाही यः स विप्रो वृषलीपतिः शूद्राणां सूपकारश्च विषहीनो यथोरगः शूद्राणां च प्रतिग्राही शूद्रयाजी च यो द्विजः । मसिजीवी असिजीवी विषहीनो यथोरगः

यः कन्याविक्रयी विप्रो यो हरेर्नामविक्रयी ।

यो विप्रोऽवीरान्नभोजी ऋतुस्नातान्नभोजकः ॥

भगजीवी बार्धुषिको विषहीनो यथोरगः ।

यो विद्याविक्रयी विप्रो विषहीनो यथोरगः ॥

सूर्योदये स्वपेद्यो हि मत्स्यभोजी च यो द्विजः । शिवापूजादिरहितो विषहीनो यथोरगः

इत्युक्त्वा च मुनिश्रेष्ठः सर्वपूजाविधिक्रमम् ।

तमुवाच च सावित्र्या ध्यानादिकमभीप्सितम् ॥

दत्त्वा सर्वं नृपेन्द्राय ययौ च स्वाश्रमे मुने ।

राजा सम्पूज्य सावित्रीं ददर्श वरमाप च ॥

नारद उवाच

किं वा ध्यानं च सावित्र्याः किं वा पूजाविधानकम् ।

स्तोत्रं मन्त्रं च किं दत्त्वा प्रययौ स पराशरः ॥

नृपः केन विधानेन सम्पूज्य श्रुतिमातरम् ।

वरं च कं वा सम्प्राप सम्पूज्य तु विधानतः ॥

1898 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ द्वितीय खण्ड ] —15 D श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २६ । जो द्विविष्णु मन्त्र से विहीन है, त्रिकालसन्ध्यासे ॥ ३२ । रहित है और एकादशी व्रतसे वंचित है; वह विषहीन सर्पकी भाँति निस्तेज होता है ॥ ३२ ॥

। जो ब्राह्मण भगवान् श्रीहरिको अर्पण किया गया नैवेद्य प्रसादरूपमें ग्रहण नहीं करता, धोबीका ३३ काम करता है, बैलपर बोझा ढोनेका काम करता है, शूद्रोंका अन्न खाता है; वह विषहीन सर्पके । समान है ॥३३ ॥

॥ ३४ जो ब्राह्मण शूद्रोंका शव जलाता है, शूद्र स्त्रीका पति बनता है और शूद्रोंके लिये भोजन तैयार करता है; वह विषहीन सर्पकी भाँति निस्तेज होता है ॥ ३४ ॥

॥ ३५ जो द्विज शूद्रोंसे दान लेता है, शूद्रोंका यज्ञ कराता है, मुनीमीका काम करता है और तलवार लेकर पहरेदारी करके जीविकोपार्जन करता है; वह विषहीन सर्पकी भाँति तेजशून्य होता है ॥ ३५ ॥

३६ जो ब्राह्मण कन्या - विक्रय करता है, भगवान्का नाम बेचता है, पति तथा पुत्रसे हीन और ऋतुस्नाता स्त्रीके यहाँ भोजन करता है, स्त्रियोंके व्यभिचारसे ३७ अपनी आजीविका चलाता है और सूदखोर होता है; वह विषहीन सर्पके समान तेजरहित होता है । जो द्विज विद्याका विक्रय करता है, वह भी विषहीन ॥ ३८ सर्प सदृश होता है । जो ब्राह्मण सूर्योदय हो जानेके बाद सोता रहता है, भोजनमें मछली ग्रहण करता है और भगवतीकी पूजासे वंचित है; वह विषहीन सर्पके समान निस्तेज है ॥ ३६–३८ ॥ ३ ९ हे मुने! ऐसा कहकर मुनिश्रेष्ठ पराशरने राजा अश्वपतिको सावित्रीकी पूजाके सम्पूर्ण विधान तथा ध्यान आदि आवश्यक प्रयोग बतला दिये । महाराज ४० अश्वपतिको सम्पूर्ण उपदेश देकर मुनि अपने आश्रम चले गये । तत्पश्चात् राजाने भगवती सावित्रीकी विधिवत् उपासना करके उनके दर्शन प्राप्त किये तथा उन्हें अभीष्ट वर भी प्राप्त हो गया ॥ ३ ९ -४० ॥ नारदजी बोले – उन मुनि पराशरने राजा ४१ अश्वपतिको सावित्रीके किस ध्यान, पूजा - विधान, स्तोत्र तथा मन्त्रका उपदेश देकर प्रस्थान किया था? साथ ही राजाने किस विधानसे वेदमाता सावित्रीकी ४२ | भलीभाँति पूजा की और इस प्रकार उनकी विधिवत्

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अ ० २६ ]

तत्सर्वं श्रोतुमिच्छामि सावित्र्याः परमं महत् ।

रहस्यातिरहस्यं च श्रुतिसिद्धं समासतः ॥

श्रीनारायण उवाच

ज्येष्ठकृष्णत्रयोदश्यां शुद्धकाले च यत्नतः ।

व्रतमेव चतुर्दश्यां व्रती भक्त्या समाचरेत् ॥

व्रतं चतुर्दशाब्दं च द्विसप्तफलसंयुतम् ।

दत्त्वा द्विसप्तनैवेद्यं पुष्पधूपादिकं चरेत् ॥

वस्त्रं यज्ञोपवीतं च भोजनं विधिपूर्वकम् ।

संस्थाप्य मङ्गलघटं फलशाखासमन्वितम् ॥

गणेशं च दिनेशं च वह्निं विष्णुं शिवं शिवाम् ।

सम्पूज्य पूजयेदिष्टं घटे आवाहिते द्विजः ॥

शृणु ध्यानं च सावित्र्याश्चोक्तं माध्यन्दिने च यत् ।

स्तोत्रं पूजाविधानं च मन्त्रं च सर्वकामदम् ॥

तप्तकाञ्चनवर्णाभां ज्वलन्तीं ब्रह्मतेजसा ।

ग्रीष्ममध्याह्नमार्तण्डसहस्त्रसम्मितप्रभाम् ॥

ईषद्धास्यप्रसन्नास्यां रत्नभूषणभूषिताम् ।

वह्निशुद्धां शुकाधानां भक्तानुग्रहविग्रहाम् ॥

सुखदां मुक्तिदां शान्तां कान्तां च जगतां विधेः ।

सर्वसम्पत्स्वरूपां च प्रदात्रीं सर्वसम्पदाम् ॥

वेदाधिष्ठातृदेवीं च वेदशास्त्रस्वरूपिणीम् ।

वेदबीजस्वरूपां च भजे तां वेदमातरम् ॥

ध्यात्वा ध्यानेन नैवेद्यं दत्त्वा पाणिं स्वमूर्धनि । पुनर्ध्यात्वा घटे भक्त्या देवीमावाहयेद् व्रती नवम स्कन्ध ४५३ पूजा करके उन्होंने कौन - सा वर प्राप्त किया? [ हे ४३ प्रभो! ] सावित्रीका वह परम महिमामय, अत्यन्त रहस्ययुक्त और वेदप्रमाणित सम्पूर्ण प्रसंग संक्षेपमें सुनना चाहता हूँ ॥ ४१–४३ ॥ श्रीनारायण बोले - [ हे नारद! ] ज्येष्ठमासके कृष्णपक्षकी त्रयोदशी तिथिको संयमपूर्वक रहकर व्रतीको ४४ चतुर्दशीतिथिमें व्रत करके शुद्ध समयमें भक्तिपूर्वक सावित्रीकी पूजा करनी चाहिये ॥४४ ॥

यह व्रत चौदह वर्षका है । इसमें चौदह फलसहित ४५ चौदह प्रकारके नैवेद्य अर्पण किये जाते हैं । पुष्प, धूप, वस्त्र तथा यज्ञोपवीत आदिसे विधिपूर्वक पूजन करके नैवद्य अर्पण करना चाहिये । एक मंगल कलश स्थापित करके उसपर पल्लव रख दे । तत्पश्चात् गणेश, सूर्य, ४६ अग्नि, विष्णु, शिव तथा पार्वतीकी सम्यक् पूजा करके द्विजको आवाहित कलशपर अपनी इष्टदेवी सावित्रीका ध्यान करना चाहिये ॥ ४५–४७ ॥ ४७ माध्यन्दिनी शाखामें भगवती सावित्रीका जो ध्यान, स्तोत्र, पूजा - विधान तथा सर्वकामप्रद मन्त्र प्रतिपादित किया गया है, उसे आप सुनिये ॥ ४८ ॥

४८ ध्यान इस प्रकार है— ' भगवती सावित्रीका वर्ण तप्त सुवर्णकी प्रभाके समान है, ये ब्रह्मतेजसे देदीप्यमान हैं, ये ग्रीष्म ऋतुके मध्याह्नकालीन हजारों सूर्योकी सम्मिलित प्रभासे सम्पन्न हैं, इनका मुखमण्डल ४ ९ प्रसन्नता तथा मुसकानसे युक्त है, ये रत्नमय आभूषणोंसे अलंकृत हैं, अग्निके समान विशुद्ध वस्त्र इन्होंने धारण कर रखा है, भक्तोंपर कृपा करनेके लिये ही ५० इन्होंने यह विग्रह धारण किया है, ये सुख प्रदान करनेवाली हैं, मुक्ति देनेवाली हैं, ये शान्त स्वभाववाली हैं, जगत्की रचना करनेवाले ब्रह्माजीकी प्रिया हैं, ये ५१ सर्वसम्पत्तिस्वरूपिणी हैं, सभी प्रकारकी सम्पदाएँ प्रदान करनेवाली हैं, वेदकी अधिष्ठात्री देवी हैं तथा समस्त वेद - शास्त्र इन्हींके स्वरूप हैं- ऐसी उन वेदबीजस्वरूपा वेदमाता सावित्रीकी मैं उपासना करता ५२ हूँ । ' इस ध्यानके द्वारा देवी सावित्रीका ध्यान करके नैवेद्य अर्पण करना चाहिये, तदनन्तर हाथोंको सिरसे लगाकर पुनः ध्यान करके भक्तिपूर्वक व्रतीको कलशपर देवी ॥ ५३ । सावित्रीका आवाहन करना चाहिये ॥४ ९ –५३ ॥

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४५४ दत्त्वा षोडशोपचारं वेदोक्तं मन्त्रपूर्वकम् सम्पूज्य स्तुत्वा प्रणमेद्देवदेवीं विधानतः

आसनं पाद्यमर्घ्यं च स्नानीयं चानुलेपनम् ।

धूपं दीपं च नैवेद्यं ताम्बूलं शीतलं जलम् ॥

वसनं भूषणं माल्यं गन्धमाचमनीयकम् ।

मनोहरं सुतल्पं च देयान्येतानि षोडश ॥

दारुसारविकारं च हेमादिनिर्मितं च वा ।

देवाधारं पुण्यदं च मया तुभ्यं निवेदितम् ॥

तीर्थोदकं च पाद्यं च पुण्यदं प्रीतिदं महत् ।

पूजाङ्गभूतं शुद्धं च मया तुभ्यं निवेदितम् ॥

पवित्ररूपमर्घ्यं च दूर्वापुष्पदलान्वितम् ।

पुण्यदं शङ्खतोयाक्तं मया तुभ्यं निवेदितम् ॥

सुगन्धं गन्धतोयं च स्नेहं सौगन्धकारकम् ।

मया निवेदितं भक्त्या स्नानीयं प्रतिगृह्यताम् ॥

गन्धद्रव्योद्भवं पुण्यं प्रीतिदं दिव्यगन्धदम् । या निवेदितं भक्त्या गन्धतोयं तवाम्बिके ।

सर्वमङ्गलरूपं च सर्वं च मङ्गलप्रदम् ।

पुण्यदं च सुधूपं तं गृहाण परमेश्वरि ॥

सुगन्धयुक्तं सुखदं मया तुभ्यं निवेदितम् ।

जगतां दर्शनार्थाय प्रदीपं दीप्तिकारकम् ॥

अन्धकारध्वंसबीजं मया तुभ्यं निवेदितम् ।

तुष्टिदं पुष्टिदं चैव प्रीतिदं क्षुद्विनाशनम् ॥

पुण्यदं स्वादुरूपं च नैवेद्यं प्रतिगृह्यताम् । श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २६ । तदनन्तर वेदोक्त मन्त्रोंका उच्चारण करते हुए ॥ ५४ सोलह प्रकारके पूजनोपचार अर्पण करके विधिपूर्वक महादेवी सावित्रीकी पूजा तथा स्तुति करके उन्हें प्रणाम करना चाहिये । आसन, पाद्य, अर्घ्य, स्नान, ५५ अनुलेपन, धूप, दीप, नैवेद्य, ताम्बूल, शीतल जल, वस्त्र, भूषण, माला, चन्दन, आचमन और मनोहर शय्या - ये ही देनेयोग्य सोलह उपचार हैं ( इनके निम्न मन्त्र हैं ) ॥ ५४-५६ ॥ ५६ [ आसन- - ] हे देवि! श्रेष्ठ काष्ठसे निर्मित अथवा स्वर्णनिर्मित यह देवताओंका आधारस्वरूप पुण्यप्रद आसन मैंने आपको श्रद्धापूर्वक निवेदित ५७ | किया है ॥ ५७ ॥

[ पाद्य- ] परम प्रीति उत्पन्न करनेवाला, पुण्यप्रद तथा पूजाका अंगभूत यह पवित्र तीर्थजल मेरे ५८ द्वारा आपको पाद्यरूपमें अर्पित किया गया है ॥ ५८ ॥

[ अर्घ्य - ] दूर्वा, पुष्प, तुलसी तथा शंखजलसे समन्वित यह पवित्र तथा पुण्यदायक अर्घ्य मैंने ५ ९ आपको अर्पण किया है ॥ ५ ९ ॥ [ स्नान— ] चन्दन मिलाकर सुगन्धित किया गया जल तथा सुगन्ध फैलानेवाला यह तैल आपको स्नानहेतु भक्तिपूर्वक निवेदित किया है, आप इसे ६० स्वीकार करें ॥ ६० ॥

[ अनुलेपन - ] हे अम्बिके! सुगन्धित द्रव्योंसे निर्मित, दिव्य गन्ध प्रदान करनेवाला तथा चन्दनजलसे ६१ मिश्रित यह पवित्र तथा प्रीतिदायक अनुलेपन मैंने आपको भक्तिपूर्वक अर्पण किया है ॥ ६१ ॥

[ धूप - ] हे परमेश्वरि! समस्त मंगल प्रदान ६२ करनेवाला, पुण्यदायक, सुगन्धयुक्त, सुखदायक तथा सर्वमंगलरूप यह उत्तम धूप मैंने आपको अर्पण किया है, आप ग्रहण करें ॥ ६२३ ॥

६३ [ दीप - ] अन्धकारके नाशके बीजस्वरूप, प्रकाश फैलानेवाला यह दीपक मैंने आपको जगत्के दर्शनार्थ अर्पित किया है ॥ ६३३ ॥

[ नैवेद्य - ] सन्तुष्टि, पुष्टि, प्रीति तथा पुण्य ६४ प्रदान करनेवाले एवं भूख शान्त करनेवाले इस स्वादिष्ट नैवेद्यको आप स्वीकार करें ॥ ६४३ ॥

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अ ० २६ ] ताम्बूलप्रवरं रम्यं कर्पूरादिसुवासितम् ॥

तुष्टिदं पुष्टिदं चैव मया तुभ्यं निवेदितम् ।

सुशीतलं वारि शीतं पिपासानाशकारणम् ॥

जगतां जीवनरूपं च जीवनं प्रतिगृह्यताम् ।

देहशोभास्वरूपं च सभाशोभाविवर्धनम् ॥

कार्पासजं च कृमिजं वसनं प्रतिगृह्यताम् ।

काञ्चनादिविनिर्माणं श्रीकरं श्रीयुतं सदा ॥

सुखदं पुण्यदं रत्नभूषणं प्रतिगृह्यताम् ।

नानावृक्षसमुद्भूतं नानारूपसमन्वितम् ॥

फलस्वरूपं फलदं फलं च प्रतिगृह्यताम् ।

सर्वमङ्गलरूपं च सर्वमङ्गलमङ्गलम् ॥

नानापुष्पविनिर्माणं बहुशोभासमन्वितम् ।

प्रीतिदं पुण्यदं चैव माल्यं च प्रतिगृह्यताम् ॥

पुण्यदं च सुगन्धाढ्यं गन्धं च देवि गृह्यताम् ।

सिन्दूरं च वरं रम्यं भालशोभाविवर्धनम् ॥

भूषणानां च प्रवरं सिन्दूरं प्रतिगृह्यताम् ।

विशुद्धं ग्रन्थिसंयुक्तं पुण्यसूत्रविनिर्मितम् ॥

पवित्रं वेदमन्त्रेण यज्ञसूत्रं च गृह्यताम् ।

द्रव्याण्येतानि मूलेन दत्त्वा स्तोत्रं पठेत्सुधीः ॥

ततो विप्राय भक्त्या च व्रती दद्याच्च दक्षिणाम् । सावित्रीति चतुर्थ्यन्तं वह्निजायान्तमेव च लक्ष्मीमायाकामपूर्वं मन्त्रमष्टाक्षरं विदुः । माध्यन्दिनोक्तं स्तोत्रं च सर्वकामफलप्रदम् विप्रजीवनरूपं च निबोध कथयामि ते । नवम स्कन्ध ४५५ ६५ [ ताम्बूल— ] कर्पूर आदिसे सुवासित, तुष्टिदायक, पुष्टिप्रद तथा रम्य यह उत्तम ताम्बूल मैंने आपको निवेदित किया है ॥ ६५३ ॥

६६ [ शीतल जल- ] प्यासका शमन करनेवाले, जगत्के जीवन तथा प्राणरूप इस परम शीतल जलको आप स्वीकार करें ॥ ६६३ ॥

६७ [ वस्त्र— ] कपास तथा रेशमसे निर्मित, देहके शोभास्वरूप तथा सभाओंमें सौन्दर्यकी वृद्धि करनेवाले इस वस्त्रको आप स्वीकार करें ॥ ६७३ ॥

[ आभूषण - ] सुवर्ण आदिसे निर्मित, प्रभायुक्त, ६८ सदा शोभा बढ़ानेवाले, सुखदायक तथा पुण्यप्रद इस रत्नमय आभूषणको आप स्वीकार करें ॥ ६८ ॥

[ फल- — ] अनेक वृक्षोंसे उत्पन्न, विविध ६ ९ रूपोंवाले, फलस्वरूप तथा फल प्रदान करनेवाले इस फलको आप स्वीकार करें ॥ ६ ९ ३ ॥ [ पुष्पमाला - ] सभी मंगलोंका मंगल करनेवाली, ७० सर्वमंगलरूपा, अनेक प्रकारके पुष्पोंसे विनिर्मित, परम शोभासे सम्पन्न, प्रीतिदायिनी तथा पुण्यमयी इस मालाको आप स्वीकार करें ॥ ७०-७१ ॥ ७१ [ सिन्दूर - ] हे देवि! पुण्यप्रद तथा सुगन्धपूर्ण इस गन्धको आप स्वीकार करें । ललाटकी शोभा बढ़ानेवाले, भूषणोंमें परम श्रेष्ठ तथा अत्यन्त मनोहर ७२ इस सिन्दूरको आप स्वीकार करें ॥ ७२३ ॥

[ यज्ञोपवीत - ] पवित्र सूत्रोंसे निर्मित, विशुद्ध, ग्रन्थि ( गाँठ ) -से युक्त तथा वैदिक मन्त्रोंसे शुद्ध किये ७३ गये इस यज्ञोपवीतको आप स्वीकार करें ॥७३३ ॥

[ हे नारद! ] विद्वान् पुरुष मूलमन्त्रोंका उच्चारण करते हुए इन द्रव्योंको भगवती सावित्रीके लिये अर्पण करके स्तोत्र - पाठ करे और इसके बाद व्रती ब्राह्मणको ७४ भक्तिपूर्वक दक्षिणा प्रदान करे । ' सावित्री ' – इस शब्दमें चतुर्थी विभक्ति लगाकर उसके अन्तमें स्वाहा तथा उसके पूर्व में लक्ष्मी, माया और कामबीजोंको लगानेसे ॥७५ ' श्रीं ह्रीं क्लीं सावित्र्यै स्वाहा ' - यह अष्टाक्षर मन्त्र कहा गया है । माध्यन्दिनीशाखामें वर्णित, सभी कामनाओंका फल प्रदान करनेवाले तथा विप्रोंके ॥ ७६ जीवनस्वरूप सावित्री - स्तोत्रको आपके सामने व्यक्त करता हूँ - इसे ध्यानपूर्वक सुनिये ॥ ७४-७६३ ॥

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४५६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २६ कृष्णेन दत्तां सावित्रीं गोलोके ब्रह्मणे पुरा ॥ ७७

नायाति सा तेन सार्धं ब्रह्मलोके च नारद ।

ब्रह्मा कृष्णाज्ञया भक्त्या तुष्टाव वेदमातरम् ॥ ७८

तदा सा परितुष्टा च ब्रह्माणं चकमे पतिम् । ब्रह्मोवाच सच्चिदानन्दरूपे त्वं मूलप्रकृतिरूपिणि ॥ ७ ९

हिरण्यगर्भरूपे त्वं प्रसन्ना भव सुन्दरि ।

तेज: स्वरूपे परमे परमानन्दरूपिणि ॥ ८०

द्विजातीनां जातिरूपे प्रसन्ना भव सुन्दरि ।

नित्ये नित्यप्रिये देवि नित्यानन्दस्वरूपिणि ॥ ८१

सर्वमङ्गलरूपे च प्रसन्ना भव सुन्दरि ।

सर्वस्वरूपे विप्राणां मन्त्रसारे परात्परे ॥ ८२

सुखदे मोक्षदे देवि प्रसन्ना भव सुन्दरि ।

विप्रपापेधमदाहाय ज्वलदग्निशिखोपमे ॥ ८३

ब्रह्मतेजः प्रदे देवि प्रसन्ना भव सुन्दरि ।

कायेन मनसा वाचा यत्पापं कुरुते नरः ॥ ८४

तत्त्वत्स्मरणमात्रेण भस्मीभूतं भविष्यति ।

इत्युक्त्वा जगतां धाता तस्थौ तत्रैव संसदि ॥ ८५

सावित्री ब्रह्मणा सार्धं ब्रह्मलोकं जगाम सा ।

अनेन स्तवराजेन संस्तूयाश्वपतिर्नृपः ॥ ८६

ददर्श तां च सावित्रीं वरं प्राप मनोगतम् ।

स्तवराजमिमं पुण्यं सन्ध्यां कृत्वा च यः पठेत् ।

पाठे चतुर्णां वेदानां यत्फलं लभते च तत् ॥ ८७ ।

हे नारद! प्राचीन कालकी बात है - गोलोकमें विराजमान श्रीकृष्णने सावित्रीको ब्रह्माके पास जानेकी आज्ञा दी, किंतु वे सावित्री उनके साथ ब्रह्मलोक जानेको तैयार नहीं हुईं । तब कृष्णके कहनेपर ब्रह्माजी भक्तिपूर्वक वेदमाता सावित्रीका स्तवन करने लगे । तदनन्तर उन सावित्रीने परम प्रसन्न होकर ब्रह्माको पति बनाना स्वीकार कर लिया ॥ ७७-७८३ ॥ ब्रह्माजी बोले- सच्चिदानन्द विग्रहवाली, मूलप्रकृति - स्वरूपिणी तथा हिरण्यगर्भरूपवाली हे सुन्दरि! आप मुझपर प्रसन्न हों । परम तेजमय विग्रहवाली, परमानन्दस्वरूपिणी तथा द्विजातियोंके लिये जातिस्वरूपा हे सुन्दरि! आप मुझपर प्रसन्न हों । नित्या, नित्यप्रिया, नित्यानन्दस्वरूपिणी तथा सर्वमंगलमयी हे देवि! हे सुन्दरि! आप मुझपर प्रसन्न हों । ब्राह्मणोंकी सर्वस्वरूपिणी, मन्त्री सारभूता, परात्परा, सुख प्रदान करनेवाली तथा मोक्षदायिनी हे देवि! हे सुन्दरि! आप मुझपर प्रसन्न हों । विप्रोंके पापरूपी ईंधनको दग्ध करनेके लिये प्रज्वलित अग्निकी शिखाके समान तथा ब्रह्मतेज प्रदान करनेवाली हे देवि! हे सुन्दरि! आप मुझपर प्रसन्न हों । मनुष्य मन, वाणी अथवा शरीरसे जो भी पाप करता है, वह सब आपके स्मरणमात्रसे जलकर भस्म हो जायगा ॥ ७ ९ -८४३ ॥ इस प्रकार स्तुति करके जगत्की रचना करनेवाले ब्रह्माजी वहीं पर सभा - भवनमें विराजमान हो गये । तब वे सावित्री ब्रह्माजीके साथ ब्रह्मलोकके लिये प्रस्थित हो गयीं ॥ ८५३ ॥

[ हे मुने! ] इसी स्तोत्रराजसे राजा अश्वपतिने भगवती सावित्रीकी स्तुति करके उनका दर्शन किया और उनसे मनोभिलषित वर भी प्राप्त किया । जो मनुष्य सन्ध्या करके इस स्तोत्रराजका पाठ करता है, वह उस फलको प्राप्त कर लेता है, जो चारों वेदोंका पाठ करनेसे मिलता है॥८६-८७ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां नवमस्कन्धे सावित्रीपूजाविधिकथनं नाम षड्विंशोऽध्यायः ॥ २६ ॥

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अ ० २७ ] नवम स्कन्ध ४५७ अथ सप्तविंशोऽध्यायः भगवती सावित्रीकी उपासनासे राजा अश्वपतिको सावित्री नामक कन्याकी प्राप्ति, सत्यवान्‌के साथ सावित्रीका विवाह, सत्यवान्की मृत्यु, सावित्री और यमराजका संवाद श्रीनारायण उवाच

स्तुत्वानेन सोऽश्वपतिः सम्पूज्य विधिपूर्वकम् ।

ददर्श तत्र तां देवीं सहस्त्रार्कसमप्रभाम् ॥ १

उवाच सा च राजानं प्रसन्ना सस्मिता सती ।

यथा माता स्वपुत्रं च द्योतयन्ती दिशस्त्विषा ॥ २

सावित्र्युवाच

जानाम्यहं महाराज यत्ते मनसि वाञ्छितम् ।

वाञ्छितं तव पत्न्याश्च सर्वं दास्यामि निश्चितम् ॥ ३

साध्वी कन्याभिलाषं च करोति तव कामिनी ।

त्वं प्रार्थयसि पुत्रं च भविष्यति क्रमेण च ॥ ४

इत्युक्त्वा सा तदा देवी ब्रह्मलोकं जगाम ह ।

राजा जगाम स्वगृहं तत्कन्यादौ बभूव ह ॥ ५

आराधनाच्च सावित्र्या बभूव कमला परा ।

सावित्रीति च तन्नाम चकाराश्वपतिर्नृपः ॥ ६

कालेन सा वर्धमाना बभूव च दिने दिने ।

रूपयौवनसम्पन्ना शुक्ले चन्द्रकला यथा ॥ ७

सा वरं वरयामास द्युमत्सेनात्मजं तदा ।

सत्यवन्तं सत्यशीलं नानागुणसमन्वितम् ॥ ८

राजा तस्मै ददौ तां च रत्नभूषणभूषिताम् ।

सोऽपि सार्धं कौतुकेन तां गृहीत्वा गृहं ययौ ॥ ९

श्रीनारायण बोले- हे नारद! राजा अश्वपतिने विधिपूर्वक भगवती सावित्रीकी पूजा करके इस स्तोत्रसे उनकी स्तुति करनेके अनन्तर उसी स्थानपर हजारों सूर्योंके समान तेजसे सम्पन्न उन देवीके दर्शन किये ॥ १ ॥

अपने प्रभामण्डलसे दिशाओंको आलोकित करती हुई प्रसन्नवदना भगवतीने मुसकराते हुए इस प्रकार राजाको सम्बोधित किया, जैसे माता अपने पुत्रको कहती है ॥२ ॥

सावित्री बोलीं- हे महाराज! मैं जानती हूँ कि आपके मनमें क्या कामना है और आपकी पत्नी क्या चाहती है, मैं निश्चितरूपसे वह सब प्रदान करूँगी ॥३ ॥

आपकी साध्वी पत्नी कन्याकी कामना करती है । और आप पुत्रकी इच्छा रखते हैं, ये दोनों ही अभिलाषाएँ क्रमसे पूर्ण होंगी ॥ ४ ॥

ऐसा कहकर वे भगवती सावित्री ब्रह्मलोक चली गयीं और राजा अश्वपति अपने घर लौट गये । उन्हें समयपर पहले कन्या उत्पन्न हुई । भगवती सावित्रीकी आराधनाके प्रभावसे श्रेष्ठ देवी कमला ही पुत्रीरूपमें उत्पन्न हुई थीं । राजा अश्वपतिने उस कन्याका नाम ' सावित्री ' रखा ॥ ५-६ ॥ वह कन्या शुक्लपक्षके चन्द्रमाके समान दिनोंदिन बढ़ने लगी और यथासमय रूप तथा यौवनसे सम्पन्न हो गयी ॥७ ॥

उसने द्युमत्सेनके सत्यनिष्ठ तथा अनेक गुणोंसे युक्त पुत्र सत्यवान्‌का पतिरूपमें वरण किया । तब राजाने रत्नमय भूषणोंसे अलंकृत उस कन्याको उन्हें समर्पित कर दिया । सत्यवान् भी बड़े हर्षके साथ उस कन्याको लेकर अपने घर चले गये ॥ ८ - ९ ॥

पृष्ठ 467

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४५८ स च संवत्सरेऽतीते सत्यवान् सत्यविक्रमः जगाम फलकाष्ठार्थं प्रहर्षं पितुराज्ञया जगाम साध्वी तत्पश्चात्सावित्री दैवयोगतः निपत्य वृक्षाद्दैवेन प्राणांस्तत्याज सत्यवान् यमस्तं पुरुषं दृष्ट्वा बद्ध्वाङ्गुष्ठसमं मुने श्रीमद्देवीभागवत । एक वर्ष बीतनेके ॥ १० । सत्यवान् अपने पिताकी फल तथा लकड़ी लानेके । साध्वी सावित्री भी ॥ ११ दैवयोगसे सत्यवान् वृक्षसे । निकल गये ॥११ ॥

[ अ ० २७ पश्चात् वे सत्यपराक्रमी आज्ञाके अनुसार हर्षपूर्वक लिये वनमें गये ॥१० ॥

उनके पीछे - पीछे गयी । गिर पड़े और उनके प्राण गृहीत्वा गमनं चक्रे तत्पश्चात्प्रययौ सती ॥ १२ हे मुने! सत्यवान्‌को मृत देखकर जब यमराजने पश्चात्तां सुदतीं दृष्ट्वा यमः संयमनीपतिः उवाच मधुरं साध्वीं साधूनां प्रवरो महान् धर्मराज उवाच

अहो क्व यासि सावित्रि गृहीत्वा मानुषीं तनुम् ।

यदि यास्यसि कान्तेन सार्धं देहं तदा त्यज ॥

गन्तुं मर्त्यो न शक्नोति गृहीत्वा पाञ्चभौतिकम् ।

देहं च मम लोकं च नश्वरं नश्वरः सदा ॥

भर्तुस्ते पूर्णकालो वै बभूव भारते सति ।

स्वकर्मफलभोगार्थं सत्यवान् याति मद्गृहम् ॥

कर्मणा जायते जन्तुः कर्मणैव प्रलीयते ।

सुखं दुःखं भयं शोकः कर्मणैव प्रणीयते ॥

कर्मणेन्द्रो भवेज्जीवो ब्रह्मपुत्रः स्वकर्मणा ।

स्वकर्मणा हरेर्दासो जन्मादिरहितो भवेत् ॥

स्वकर्मणा सर्वसिद्धिममरत्वं लभेद् ध्रुवम् ।

लभेत्स्वकर्मणा विष्णोः सालोक्यादिचतुष्टयम् ॥

सुरत्वं च मनुत्वं च राजेन्द्रत्वं लभेन्नरः ।

कर्मणा च शिवत्वं च गणेशत्वं तथैव च ॥

कर्मणा च मुनीन्द्रत्वं तपस्वित्वं स्वकर्मणा । उनके अंगुष्ठ - प्रमाण सूक्ष्म शरीरको साथ लेकर प्रस्थान । किया, तब साध्वी सावित्री भी उनके पीछे जाने लगी ॥ १२ ॥

॥ १३ संयमनीपुरीके स्वामी और साधुओंमें परम श्रेष्ठ धर्मराज सुन्दर दाँतोंवाली उस सावित्रीको अपने पीछे-पीछे आते देखकर मधुर वाणीमें उससे कहने लगे ॥ १३ ॥

धर्मराज बोले- हे सावित्रि! तुम यह मानव-१४ शरीर धारण किये कहाँ जा रही हो? यदि तुम अपने पतिके साथ जानेकी इच्छा रखती हो, तो पहले इस १५ शरीरका त्याग करो ॥ १४ ॥

विनाशशील मनुष्य अपने इस नश्वर तथा पांच-भौतिक शरीरको लेकर मेरे लोक कभी नहीं जा १६ | सकता है ॥१५ ॥

हे साध्वि! भारतवर्षमें आये हुए तुम्हारे पतिकी आयु अब पूर्ण हो चुकी है । अपने कर्मोंका फल भोगने के १७ लिये अब यह सत्यवान् मेरे लोकमें जा रहा है ॥ १६ ॥

प्राणी कर्मके अनुसार ही जन्म प्राप्त करता है १८ और कर्मानुसार ही मृत्युको भी प्राप्त होता है । सुख-दुःख, भय और शोक भी कर्मसे ही मिलते रहते हैं I । जीव अपने कर्मके प्रभावसे इन्द्र हो सकता है, वह १ ९ | अपने कर्मसे ब्रह्मपुत्र बन सकता है और अपने कर्मके द्वारा वह हरिका दास बनकर जन्म - मरणके बन्धनसे मुक्त हो जाता है । मनुष्य अपने कर्मके प्रभावसे सम्पूर्ण २० सिद्धियाँ, अमरत्व और भगवान् विष्णुके सालोक्य आदि चार प्रकारके मोक्षपद निश्चितरूपसे प्राप्त कर सकता स्वकर्मणा क्षत्रियत्वं वैश्यत्वं च स्वकर्मणा ॥ २१ है ॥ १७-१९ ॥ कर्मणैव च म्लेच्छत्वं लभते नात्र संशयः । मनुष्यको अपने कर्मके द्वारा देवता, मनु, राजेन्द्र, शिव तथा गणेशतकका पद सुलभ हो जाता स्वकर्मणा जङ्गमत्वं शैलत्वं च स्वकर्मणा ॥ २२ | है । उसी प्रकार अपने कर्मके प्रभावसेही मनुष्य

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अ ० २८ ] नवम स्कन्ध ४५ ९ कर्मणा राक्षसत्वं च किन्नरत्वं स्वकर्मणा । श्रेष्ठ मुनि, तपस्वी ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा म्लेच्छ कर्मणैवाधिपत्यं च वृक्षत्वं च स्वकर्मणा ॥ २३ बन जाता है; इसमें कोई सन्देह नहीं है । अपने कर्मणैव पशुत्वं च वनजीवी स्वकर्मणा । कर्मानुसार ही प्राणीको जंगम, पर्वत, राक्षस, किन्नर, अधिपति, वृक्ष, पशु, वनके प्राणी, अत्यन्त सूक्ष्म कर्मणा क्षुद्रजन्तुत्वं कृमित्वं च स्वकर्मणा ॥ २४ जन्तु, कीट, दैत्य, दानव तथा असुर आदि योनियाँ दैतेयत्वं दानवत्वमसुरत्वं स्वकर्मणा । प्राप्त होती हैं । सावित्रीसे ऐसा कहकर वे यमराज

इत्येतदुक्त्वा सावित्रीं विरराम स वै यमः ॥ २५ । चुप हो गये ॥ २० - २५ ॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्रयां संहितायां नवमस्कन्धे सावित्र्युपाख्याने यमसावित्रीसंवादवर्णनं नाम सप्तविंशोऽध्यायः ॥ २७ ॥

अथाष्टाविंशोऽध्यायः सावित्री श्रीनारायण उवाच

यमस्य वचनं श्रुत्वा सावित्री च पतिव्रता ।

तुष्टाव परया भक्त्या तमुवाच मनस्विनी ॥

सावित्र्युवाच

किं कर्म तद्भवेत्केन को वा तद्धेतुरेव च ।

को वा देही च देहः कः को वात्र कर्मकारकः ॥

किं वा ज्ञानं च बुद्धिः का को वा प्राणः शरीरिणाम् ।

कानीन्द्रियाणि किं तेषां लक्षणं देवताश्च काः ॥

भोक्ता भोजयिता को वा को वा भोगश्च निष्कृतिः ।

को जीवः परमात्मा कस्तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥

धर्म उवाच

वेदप्रणिहितो धर्मः कर्म यन्मङ्गलं परम् ।

अवैदिकं तु यत्कर्म तदेवाशुभमेव च ॥

अहैतुकी देवसेवा संकल्परहिता सती ।

कर्मनिर्मूलरूपा च सा एव परभक्तिदा ॥

- यमराज - संवाद श्रीनारायण बोले - [ हे मुने! ] यमराजकी बात सुनकर पतिव्रता तथा दृढ़ निश्चयवाली सावित्रीने १ परम भक्तिके साथ उनकी स्तुति की और वह उनसे कहने लगी ॥ १ ॥

सावित्री बोली - कर्म क्या है, वह किससे होता है और उसका हेतु कौन है? देही कौन है, देह कौन है और इस लोकमें २ कराता है? ज्ञान क्या है, शरीरधारियोंका प्राण क्या है? उनके कौन - कौन - से लक्षण हैं ३ भोग करनेवाला कौन है, भोग भोग क्या है, निष्कृति क्या है प्राणियोंसे कौन कर्म बुद्धि क्या है और इन्द्रियाँ क्या हैं तथा और देवता कौन हैं, करानेवाला कौन है, , जीव कौन है तथा परमात्मा कौन हैं? – यह सब आप मुझे कृपा करके ४ बताइये॥२-४ ॥ धर्म बोले- वेदमें जो भी प्रतिपादित है, वह धर्म है, और वही कर्म परम मंगलकारी कर्म है । इसके विपरीत जो कर्म अवैदिक होता है, वह ५ निश्चितरूपसे अशुभ होता है ॥ ५ ॥

देवताओंकी संकल्परहित तथा अहैतुकी सेवा कर्म - निर्मूलरूपा कही जाती है । यही सेवा पराभक्ति ६ प्रदान करनेवाली होती है ॥ ६ ॥

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४६० श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २८

को वा कर्मफलं भुङ्गे को वा निर्लिप्त एव च ।

ब्रह्मभक्तो यो नरश्च स च मुक्तः श्रुतः श्रुतौ ॥

जन्ममृत्युजराव्याधिशोक भीतिविवर्जितः ।

भक्तिश्च द्विविधा साध्वि श्रुत्युक्ता सर्वसम्मता ॥

निर्वाणपददात्री च हरिरूपप्रदा नृणाम् ।

हरिरूपस्वरूपां च भक्तिं वाञ्छन्ति वैष्णवाः ॥

अन्ये निर्वाणमिच्छन्ति योगिनो ब्रह्मवित्तमाः ।

कर्मणो बीजरूपश्च सततं तत्फलप्रदः ॥

कर्मरूपश्च भगवान्परात्मा प्रकृतिः परा ।

सोऽपि तद्धेतुरूपश्च देहो नश्वर एव च ॥

पृथिवी वायुराकाशो जलं तेजस्तथैव च ।

एतानि सूत्ररूपाणि सृष्टिरूपविधौ सतः ॥

कर्मकर्ता च देही च आत्मा भोजयिता सदा ।

भोगो विभवभेदश्च निष्कृतिर्मुक्तिरेव च ॥

सदसद्भेदबीजं च ज्ञानं नानाविधं भवेत् ।

विषयाणां विभागानां भेदि बीजं च कीर्तितम् ॥

बुद्धिर्विवेचना सा च ज्ञानबीजं श्रुतौ श्रुतम् ।

वायुभेदाश्च प्राणाश्च बलरूपाश्च देहिनाम् ॥

इन्द्रियाणां च प्रवरमीश्वरांशमनूहकम् ।

प्रेरकं कर्मणां चैव दुर्निवार्यं च देहिनाम् ॥

अनिरूप्यमदृश्यं च ज्ञानभेदो मनः स्मृतम् । कर्मफलका भोक्ता कौन है और कौन निर्लिप्त ७ है? इसके उत्तरमें श्रुतिका वचन है कि जो मनुष्य ब्रह्मकी भक्ति करता है, वही मुक्त है और वह जन्म-मृत्यु, जरा, व्याधि, शोक तथा भय - इन सबसे रहित हो जाता है ॥ ७३ ॥

८ हे साध्वि! श्रुतिमें दो प्रकारकी सर्वमान्य भक्ति बतायी गयी है । पहली भक्ति निर्वाण पद प्रदान करती है और दूसरे प्रकारकी भक्ति मनुष्योंको ९ साक्षात् श्रीहरिका रूप प्रदान करती है । वैष्णवजन श्रीहरिका सारूप्य प्रदान करनेवाली भक्तिकी कामना करते हैं और अन्य ब्रह्मवेत्ता योगी निर्वाणपद देनेवाली भक्ति चाहते हैं ॥ ८ - ९ ३ ॥ १० कर्मका जो बीजरूप है, वह उसका सदा फल प्रदान करनेवाला है । कर्म परमात्मा भगवान् श्रीहरि तथा परा प्रकृतिका ही रूप है । वे परमात्मा ही कर्मके कारणरूप हैं, यह शरीर तो सदासे ११ नश्वर है ॥ १०-११ ॥ पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश - ये सूत्ररूप पंच महाभूत हैं, जो परमात्माके सृष्टिप्रकरणमें १२ प्रयुक्त होते हैं ॥ १२ ॥

कर्म करनेवाला जीव देही है और वही अन्तर्यामी रूपसे भोजयिता भी है । सुख और दुःखके साक्षात् स्वरूप वैभवको ही भोग कहते हैं और इससे छूटनेको १३ ही ' निष्कृति ' ( मोक्ष ) कहा गया है ॥१३ ॥

सत् तथा असत्में भेद करनेका जो प्रधान बीजरूप हेतु है, वही ज्ञान है और वह ज्ञान अनेक १४ भेदोंवाला होता है । वह ज्ञान घट - पट आदि विषयोंके भेदका कारण कहा गया है ॥ १४ ॥

विवेचनमयी शक्ति ही बुद्धि है । वह श्रुतिमें ज्ञानबीज नाम से विख्यात है । वायुके विभिन्न १५ रूप प्राण हैं । ये देहधारियोंके लिये बलस्वरूप हैं ॥ १५ ॥

जो इन्द्रियोंमें प्रमुख, ईश्वरका अंशरूप, अतर्क्य, कर्मोंका प्रेरक, देहधारियोंके लिये दुर्निवार्य, १६ अनिरूप्य, अदृश्य तथा बुद्धिका भेदक है; उसीको मन कहा गया है ॥ १६३ ॥

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अ ० २८ ] लोचनं श्रवणं घ्राणं त्वक्च रसनमिन्द्रियम् ॥

अङ्गिनामङ्गरूपं च प्रेरकं सर्वकर्मणाम् ।

रिपुरूपं मित्ररूपं सुखरूपं च दुःखदम् ॥

सूर्यो वायुश्च पृथिवी ब्रह्माद्या देवताः स्मृताः ।

प्राणदेहादिभृद्यो हि स जीवः परिकीर्तितः ॥

परमं व्यापकं ब्रह्म निर्गुणः प्रकृतेः परः ।

कारणं कारणानां च परमात्मा स उच्यते ॥

इत्येवं कथितं सर्वं त्वया पृष्टं यथागमम् ।

ज्ञानिनां ज्ञानरूपं च गच्छ वत्से यथासुखम् ॥

सावित्र्युवाच

त्यक्त्वा क्व यामि कान्तं वा त्वां वा ज्ञानार्णवं ध्रुवम् ।

यद्यत्करोमि प्रश्नं च तद्भवान्वक्तुमर्हति ॥

कां कां योनिं याति जीवः कर्मणा केन वा पुनः ।

केन वा कर्मणा स्वर्गं केन वा नरकं पितः ॥

केन वा कर्मणा मुक्तिः केन भक्तिर्भवेद् गुरौ ।

केन वा कर्मणा योगी रोगी वा केन कर्मणा ॥

केन वा दीर्घजीवी च केनाल्पायुश्च कर्मणा ।

केन वा कर्मणा दुःखी सुखी वा केन कर्मणा ॥

अङ्गहीनश्च काणश्च बधिरः केन कर्मणा ।

अन्धो वा पङ्गुरपि वा प्रमत्तः केन कर्मणा ॥

क्षिप्तोऽतिलुब्धकश्चौरः केन वा कर्मणा भवेत् ।

केन सिद्धिमवाप्नोति सालोक्यादिचतुष्टयम् ॥

केन वा ब्राह्मणत्वं च तपस्वित्वं च केन वा ।

स्वर्गभोगादिकं केन वैकुण्ठं केन कर्मणा ॥

गोलोकं केन वा ब्रह्मन् सर्वोत्कृष्टं निरामयम् ।

नरको वा कतिविधः किंसंख्यो नाम किं च वा ॥

को वा कं नरकं याति कियन्तं तेषु तिष्ठति ।

पापिनां कर्मणा केन को वा व्याधिः प्रजायते ।

यद्यत्प्रियं मया पृष्टं तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥

नवम स्कन्ध ४६१ १७ आँख, कान, नाक, त्वचा और जिह्वा - ये कर्मेन्द्रियाँ प्राणियोंके अंगरूप, सभी कर्मोंकी प्रेरक, शत्रुरूप, मित्ररूप, [ सत्कार्यमें प्रवृत्त होनेपर ] सुख १८ देनेवाली तथा [ बुरे कार्यमें प्रवृत्त होनेपर ] दुःख देनेवाली हैं । सूर्य, वायु, पृथ्वी, ब्रह्मा आदि इन्द्रियों के १ ९ देवता कहे गये हैं ॥ १७-१८३ ॥ जो प्राण तथा देहको धारण करता है, उसे जीव २० कहा गया है । प्रकृतिसे परे तथा कारणका भी कारण जो सर्वव्यापी निर्गुण ब्रह्म है, वही परमात्मा कहा जाता है । [ हे सावित्र! ] इस प्रकार तुमने जो कुछ २१ पूछा था, वह सब मैंने तुम्हें शास्त्रानुसार बतला दिया । यह प्रसंग ज्ञानियोंके लिये ज्ञानरूप है । हे वत्से! अब तुम सुखपूर्वक चली जाओ ॥१ ९ –२१ ॥ सावित्री बोली - [ हे प्रभो! ] मैं अपने इन २२ प्राणनाथ तथा ज्ञानके सागरस्वरूप आपको छोड़कर कहाँ जाऊँ? इस समय मैं आपसे जो - जो प्रश्न कर २३ रही हूँ, उन्हें आप मुझे बताइये ॥ २२ ॥

हे पितः! किस - किस कर्मके प्रभावसे जीव २४ किस - किस योनिमें जाता है, वह किस कर्मसे स्वर्ग तथा किस कर्मसे नरकमें जाता है? ॥ २३ ॥

हे ब्रह्मन्! किस कर्मसे मुक्ति होती है तथा किस २५ कर्मसे गुरुके प्रति भक्ति होती है? उसी तरह किन-किन कर्मोंके प्रभावसे प्राणी योगी, रोगी, दीर्घजीवी, २६ | अल्पायु, दुःखी, सुखी, अंगहीन, काना, बहरा, अन्धा, पंगु, उन्मादी, पागल, अत्यन्त लोभी अथवा चोर हो जाता है? किस कर्मके द्वारा मनुष्य सिद्धि, सालोक्य २७ आदि चारों प्रकारकी मुक्तियाँ, ब्राह्मणत्व, तपस्विता, स्वर्गके भोग आदि, वैकुण्ठ और सर्वोत्तम तथा २८ विशुद्ध गोलोक प्राप्त करता है? ॥ २४ - २८३ ॥ कितने प्रकारके नरक हैं, उनकी संख्या कितनी है, २ ९ उनके नाम क्या - क्या हैं? कौन प्राणी किस नरकमें जाता है और वहाँ कितने समयतक निवास करता है? किस कर्म प्रभावसे पापी मनुष्योंको कौन - सी व्याधि होती है? [ हे प्रभो! ] मैंने अपनी जो - जो प्रिय बात आपसे ३० । पूछी है, उसे कृपा करके मुझे बताइये ॥ २ ९ -३० ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां नवमस्कन्धे नारायणनारदसंवादे सावित्र्युपाख्याने यमसावित्रीसंवादवर्णनं नामाष्टाविंशोऽध्यायः ॥ २८ ॥