देवी भागवत उत्तरार्द्ध — पृष्ठ 471–480
देवी भागवत उत्तरार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 471–480
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४६२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २ ९ अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः सावित्री - धर्मराजके प्रश्नोत्तर श्रीनारायण उवाच
सावित्रीवचनं श्रुत्वा जगाम विस्मयं यमः ।
प्रहस्य वक्तुमारेभे कर्मपाकं तु जीविनाम् ॥
धर्म उवाच
कन्या द्वादशवर्षीया वत्से त्वं वयसाधुना ।
ज्ञानं ते पूर्वविदुषां ज्ञानिनां योगिनां परम् ॥
सावित्रीवरदानेन त्वं सावित्री कला सती ।
प्राप्ता पुरा भूभृता च तपसा तत्समा सुते ॥
यथा श्रीः श्रीपतेः क्रोडे भवानी च भवोरसि ।
यथादितिः कश्यपे च यथाहल्या च गौतमे ॥
यथा शची महेन्द्रे च यथा चन्द्रे च रोहिणी । यथा रतिः कामदेवे यथा स्वाहा हुताशने ।
यथा स्वधा च पितृषु यथा सन्ध्या दिवाकरे ।
वरुणानी च वरुणे यज्ञे च दक्षिणा यथा ॥
यथा वराहे पृथिवी देवसेना च कार्तिके ।
सौभाग्या सुप्रिया त्वं च तथा सत्यवतः प्रिये ॥
अयं तुभ्यं वरो दत्तोऽप्यपरं च यथेप्सितम् ।
वृणु देवि महाभागे ददामि सकलेप्सितम् ॥
सावित्र्युवाच
सत्यवत औरसानां पुत्राणां शतकं मम ।
भविष्यति महाभाग वरमेतन्मदीप्सितम् ॥
मत्पितुः पुत्रशतकं श्वशुरस्य च चक्षुषी ।
राज्यलाभो भवत्वेवं वरमेतन्मदीप्सितम् ॥
अन्ते सत्यवता सार्धं यास्यामि हरिमन्दिरम् ।
समतीते लक्षवर्षे देहीदं मे जगत्प्रभो ॥
और धर्मराजद्वारा सावित्रीको वरदान श्रीनारायण बोले - [ हे नारद! ] सावित्रीकी बात सुनकर यमराज आश्चर्यमें पड़ गये और हँसकर १ उन्होंने प्राणियोंके कर्मफलके विषयमें बताना आरम्भ किया ॥१ ॥
धर्म बोले- हे वत्से! इस समय तुम्हारी अवस्था तो मात्र बारह वर्षकी है, किंतु तुम्हारा २ ज्ञान बड़े - बड़े विद्वानों, ज्ञानियों और योगियोंसे भी बढ़कर है ॥ २ ॥
हे पुत्रि! तुम भगवती सावित्रीके वरदानसे ३ उन्हींकी कलासे जन्म लेकर सती सावित्री नामसे विख्यात हो । प्राचीन कालमें राजा अश्वपतिने अपनी की गयी तपस्याके द्वारा उन्हीं सावित्रीके सदृश तुम्हें ४ कन्यारूपमें प्राप्त किया है ॥३ ॥
जिस प्रकार लक्ष्मी विष्णुकी गोदमें तथा भवानी भगवान् शिवके वक्षःस्थलपर विराजमान रहती हैं एवं ५ जैसे अदिति कश्यपके, अहल्या गौतमके, शची महेन्द्रके, रोहिणी चन्द्रमाके, रति कामदेवके, स्वाहा अग्निके, स्वधा पितरोंके, सन्ध्या सूर्यके, वरुणानी ६ वरुणके, दक्षिणा यज्ञके, पृथ्वी वाराहके और देवसेना कार्तिकेयके पास उनकी सौभाग्यवती प्रिया बनकर सुशोभित होती हैं, उसी प्रकार हे प्रिये! तुम भी ७ सत्यवान्की सौभाग्यवती प्रियाके रूपमें सुशोभित होओ । यह वर मैंने तुम्हें प्रदान कर दिया । हे देवि! ८ हे महाभागे! इसके अतिरिक्त और भी जो दूसरा वर तुम्हें अभीष्ट हो, उसे माँग लो; मैं तुम्हें सभी अभिलषित वर प्रदान करूँगा ॥४-८ ॥ सावित्री बोली - हे महाभाग! सत्यवान्से मुझे ९ सौ औरस पुत्र प्राप्त हों, यह मेरा अभीष्ट वर है । मेरे पिताके भी सौ पुत्र हों, मेरे श्वसुरको नेत्र - ज्योति मिल जाय और उन्हें राज्य भी प्राप्त हो जाय - यह मेरा १० अभिलषित वर है । हे जगत्प्रभो! अन्तमें एक लाख वर्ष बीतनेके पश्चात् मैं सत्यवान् के साथ भगवान् श्रीहरिके धाम चली जाऊँ - यह वर भी आप मुझे ११ | दीजिये ॥ ९ –११ ॥
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अ ० २ ९ ]
जीवकर्मविपाकं च श्रोतुं कौतूहलं मम ।
विश्वनिस्तारबीजं च तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥
धर्मराज उवाच
भविष्यति महासाध्वि सर्वं मानसिकं तव ।
जीवकर्मविपाकं च कथयामि निशामय ॥
शुभानामशुभानां च कर्मणां जन्म भारते ।
पुण्यक्षेत्रे च नान्यत्र सर्वं च भुञ्जते जनाः ॥
सुरा दैत्या दानवाश्च गन्धर्वा राक्षसादयः ।
नराश्च कर्मजनका न सर्वे जीविनः सति ॥
विशिष्टजीविनः कर्म भुञ्जते सर्वयोनिषु ।
शुभाशुभं च सर्वत्र स्वर्गेषु नरकेषु च ॥
विशेषतो जीविनश्च भ्रमन्ते सर्वयोनिषु ।
शुभाशुभं भुञ्जते च कर्म पूर्वार्जितं परम् ॥
शुभेन कर्मणा याति स्वर्लोकादिकमेव च ।
कर्मणा चाशुभेनैव भ्रमन्ति नरकेषु च ॥
कर्मनिर्मूलने भक्तिः सा चोक्ता द्विविधा सति ।
निर्वाणरूपा भक्तिश्च ब्रह्मणः प्रकृतेरिह ॥
रोगी कुकर्मणा जीवश्चारोगी शुभकर्मणा ।
दीर्घजीवी च क्षीणायुः सुखी दुःखी च कर्मणा ॥
अन्धादयश्चाङ्गहीनाः कर्मणा कुत्सितेन च ।
सिद्ध्यादिकमवाप्नोति सर्वोत्कृष्टेन कर्मणा ॥
सामान्यं कथितं देवि विशेषं शृणु सुन्दरि ।
सुदुर्लभं सुगोप्यं च पुराणेषु स्मृतिष्वपि ॥
नवम स्कन्ध ४६३ जीवके कर्मोंका फल तथा संसारसे उसके १२ उद्धारका उपाय सुननेके लिये मुझे बहुत कौतूहल हो रहा है, अतः वह सब मुझे बतानेकी आप कृपा कीजिये ॥ १२ ॥
धर्मराज बोले- हे महासाध्वि! तुम्हारे सभी मनोरथ पूर्ण होंगे । अब मैं जीवोंके कर्मफलके १३ विषयमें बता रहा हूँ, तुम ध्यानपूर्वक सुनो ॥ १३ ॥
पुण्यभूमि भारतवर्षमें ही शुभ और अशुभ कर्मोंकी उत्पत्ति होती है, अन्यत्र नहीं । दूसरी जगह १४ लोग केवल कर्मोंका फल भोगते हैं । हे पतिव्रते! देवता, दैत्य, दानव, गन्धर्व और राक्षसादि ये ही शुभाशुभ कर्म करनेवाले हैं, दूसरे पशु आदि प्राणी नहीं । देवादि विशिष्ट प्राणी ही सभी योनियों का १५ फल भोगते हैं, सभी योनियोंमें भटकते हैं और शुभाशुभ कर्मोंका फल स्वर्ग तथा नरकमें भोगते हैं ॥ १४–१६ ॥ १६ वे विशिष्ट प्राणी समस्त योनियोंमें भ्रमण करते रहते हैं और पूर्वजन्ममें अर्जित किये गये शुभ तथा अशुभ कर्मोंका फल भोगते रहते हैं १७ शुभ कर्मके प्रभावसे प्राणी स्वर्गादि लोकोंमें जाते हैं तथा अशुभ कर्मके कारण वे विभिन्न नरकोंमें पड़ते हैं॥१७-१८ ॥ कर्मके नि: शेष हो जानेपर भक्ति उत्पन्न होती १८ है । हे साध्वि! वह भक्ति दो प्रकारकी बतलायी गयी है । एक निर्वाणस्वरूपा भक्ति है और दूसरी ब्रह्मरूपिणी भगवती प्रकृतिके लिये की जानेवाली भक्ति है ॥ १ ९ ॥ १ ९ प्राणी पूर्वजन्ममें किये गये कुकर्मके कारण रोगी और शुभ कर्मके कारण रोगरहित होता है । इस प्रकार अपने कर्मसे ही जीव दीर्घजीवी, अल्प आयुवाला, २० सुखी तथा दुःखी होता है । प्राणी अपने कुत्सित कर्मके प्रभावसे नेत्रहीन तथा अंगहीन होता है । सर्वोत्कृष्ट कर्मके द्वारा प्राणी अपने दूसरे जन्ममें सिद्धि आदि भी प्राप्त कर लेता है । २०-२१ ॥ २१ हे देवि! साधारण बात कह चुका, अब विशेष बात सुनो । हे सुन्दरि! यह अत्यन्त दुर्लभ विषय पुराणों और स्मृतियोंमें वर्णित है । इसे पूर्णरूपसे गुप्त २२ । रखना चाहिये ॥ २२ ॥
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४६४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २ ९
दुर्लभा मानुषी जाति: सर्वजातिषु भारते ।
सर्वेभ्यो ब्राह्मणः श्रेष्ठः प्रशस्तः सर्वकर्मसु ॥
ब्रह्मनिष्ठो द्विजश्चैव गरीयान् भारते सति ।
निष्कामश्च सकामश्च ब्राह्मणो द्विविधः सति ॥
सकामाच्च प्रधानश्च निष्कामो भक्त एव च ।
कर्मभोगी सकामश्च निष्कामो निरुपद्रवः ॥
स याति देहं त्यक्त्वा च पदं यत्तन्निरामयम् ।
पुनरागमनं नास्ति तेषां निष्कामिनां सति ॥
सेवन्ते द्विभुजं कृष्णं परमात्मानमीश्वरम् ।
गोलोकं प्रति ते भक्ता दिव्यरूपविधारिणः ॥
सकामिनो वैष्णवाश्च गत्वा वैकुण्ठमेव च ।
भारतं पुनरायान्ति तेषां जन्म द्विजातिषु ॥
काले गते च निष्कामा भवन्त्येव क्रमेण च । भक्तिं च निर्मलां तेभ्यो दास्यामि निश्चितं पुनः ।
ब्राह्मणा वैष्णवाश्चैव सकामाः सर्वजन्मसु ।
न तेषां निर्मला बुद्धिर्विष्णुभक्तिविवर्जिताः ॥
तीर्थाश्रिताद्विजा ये च तपस्यानिरताः सति ।
ते यान्ति ब्रह्मलोकं च पुनरायान्ति भारते ॥
स्वधर्मनिरता ये च तीर्थान्यत्रनिवासिनः ।
व्रजन्ति ते सत्यलोकं पुनरायान्ति भारते ॥
स्वधर्मनिरता विप्राः सूर्यभक्ताश्च भारते ।
व्रजन्ति ते सूर्यलोकं पुनरायान्ति भारते ॥
मूलप्रकृतिभक्ता ये निष्कामा धर्मचारिणः ।
मणिद्वीपं प्रयान्त्येव पुनरावृत्तिवर्जितम् ॥
भारतवर्षमें समस्त योनियोंमें मानवयोनि २३ परम दुर्लभ है । सभी मनुष्योंमें ब्राह्मण श्रेष्ठ होता है । वह सम्पूर्ण कर्मोंमें प्रशस्त माना गया है । हे साध्वि! उनमें ब्रह्मनिष्ठ ब्राह्मण भारतवर्षमें अधिक २४ गरिमामय माना जाता है । हे साध्वि! सकाम तथा निष्काम भेदसे ब्राह्मण दो प्रकारके होते हैं । सकाम होनेसे वह कर्मप्रधान होता है । निष्काम केवल भक्त होता है । सकाम कर्मफल भोगता है और २५ निष्काम समस्त सुखासुख भोगोंके उपद्रवोंसे रहित रहता है । हे साध्वि! वह शरीर त्यागकर भगवान्का जो निरामय धाम है, उसे प्राप्त करता है और २६ हे साध्वि! उन निष्काम जनोंको पुनः इस लोकमें नहीं आना पड़ता । वे द्विभुज परमात्मा श्रीकृष्णकी उपासना करते हैं और अन्तमें वे भक्त दिव्यरूप धारणकर २७ गोलोकको प्राप्त होते हैं ॥ २३ – २७ ॥ सकाम वैष्णव वैकुण्ठधाममें जाकर समयानुसार पुनः भारतवर्षमें लौट आते हैं और यहाँपर द्विजातियोंके २८ कुलमें उनका जन्म होता है । वे सभी कुछ समय बीतनेपर क्रमशः निष्काम भक्त बन जाते हैं और मैं उन्हें अपनी निर्मल भक्ति प्रदान कर देता हूँ; यह सर्वथा निश्चित २ ९ है । जो सकाम ब्राह्मण तथा वैष्णवजन हैं, अनेक जन्मोंमें भी विष्णुभक्तिसे रहित होनेके कारण उनकी बुद्धि निर्मल नहीं हो पाती ॥ २८-३० ॥ ३० हे साध्वि! जो द्विज तीर्थोंमें रहकर सदा तपस्यामें संलग्न रहते हैं, वे ब्रह्मलोक जाते हैं और समयानुसार पुनः भारतवर्ष में आते हैं ॥ ३१ ॥
जो तीर्थोंमें अथवा कहीं अन्यत्र रहकर सदा ३१ अपने ही धर्म - कर्ममें लगे रहते हैं, वे सत्यलोक पहुँचते हैं और पुनः भारतवर्षमें जन्म लेते हैं ॥ ३२ ॥
जो ब्राह्मण अपने धर्ममें संलग्न रहकर ३२ भारतवर्षमें सूर्यकी उपासना करते हैं, वे सूर्यलोक जाते हैं और समयानुसार लौटकर पुनः भारतवर्षमें जन्म लेते हैं ॥ ३३ ॥
३३ जो धर्मपरायण तथा निष्काम मानव मूलप्रकृति भगवती जगदम्बाकी भक्ति करते हैं, वे मणिद्वीप लोकमें जाते हैं और फिर वहाँसे लौटकर नहीं ३४ | आते ॥ ३४ ॥
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अ ० २ ९ ] नवम स्कन्ध ४६५
स्वधर्मे निरता भक्ताः शैवा: शाक्ताश्च गाणपाः ।
ते यान्ति शिवलोकं च पुनरायान्ति भारते ॥ ३५
ये विप्रा अन्यदेवेज्याः स्वधर्मनिरताः सति ।
ते यान्ति सर्वलोकं च पुनरायान्ति भारते ॥ ३६
हरिभक्ताश्च निष्कामाः स्वधर्मनिरता द्विजाः ।
ते च यान्ति हरेर्लोकं क्रमाद्भक्तिबलादहो ॥ ३७
स्वधर्मरहिता विप्रा देवान्यसेवनाः सदा ।
भ्रष्टाचाराश्च कामाश्च ते यान्ति नरकं ध्रुवम् ॥ ३८
स्वधर्मनिरता एव वर्णाश्चत्वार एव च ।
भवन्त्येव शुभस्यैव कर्मणः फलभोगिनः ॥ ३ ९
स्वकर्मरहिता ये च नरकं यान्ति ते ध्रुवम् ।
भारते न भवन्त्येव कर्मणः फलभोगिनः ॥ ४०
स्वधर्मनिरता एव वर्णाश्चत्वार एव च ।
स्वधर्मनिरता विप्राः स्वधर्मनिरताय च ॥४१
कन्यां ददति विप्राय चन्द्रलोकं प्रयान्ति ते ।
वसन्ति तत्र ते साध्वि यावदिन्द्राश्चतुर्दश ॥ ४२
सालङ्कृताया दानेन द्विगुणं फलमुच्यते ।
सकामा यान्ति तल्लोकं न निष्कामाश्च साधवः ॥ ४३
प्रयान्ति विष्णुलोकं फलसङ्घातवर्जिताः ।
गव्यं च रजतं स्वर्णं वस्त्रं सर्पिः फलं जलम् ॥ ४४
ये ददत्येव विप्रेभ्यश्चन्द्रलोकं प्रयान्ति ते ।
वसन्ति ते च तल्लोके यावन्मन्वन्तरं सति ॥ ४५
सुचिरात्सुचिरं वासं कुर्वन्ति तेन ते जनाः । जो अपने धर्मोंमें संलग्न रहते हुए शिव, शक्ति और गणपतिकी उपासना करते हैं; वे शिवलोक जाते हैं और कुछ समय पश्चात् वहाँसे पुनः भारतवर्षमें लौट आते हैं ॥ ३५ ॥
हे साध्वि! जो ब्राह्मण अपने धर्ममें निरत रहकर अन्य देवताओंकी उपासना करते हैं, वे विभिन्न लोकोंमें जाते हैं और समयानुसार पुनः भारतवर्षमें जन्म लेते हैं ॥ ३६ ॥
जो द्विज अपने धर्ममें संलग्न रहते हुए निष्काम भावसे भगवान् श्रीहरिकी भक्ति करते हैं, वे उस भक्तिके प्रभावसे क्रमसे श्रीहरिके लोकको प्राप्त होते हैं ॥ ३७ ॥
जो विप्र सदा अपने धर्मसे विमुख, आचारहीन, कामलोलुप तथा देवाराधनसे रहित हैं, वे अवश्य ही नरकमें पड़ते हैं ॥ ३८ ॥
चारों वर्णोंके लोग अपने - अपने धर्ममें संलग्न रहकर ही शुभ कर्मका फल भोगनेके अधिकारी होते हैं ॥ ३ ९ ॥ जो अपने कर्तव्यसे विमुख हैं, वे अवश्य ही नरकमें जाते हैं और अपने कर्मका फल भोगते हैं । वे भारतवर्षमें नहीं आ सकते । अतः चारों वर्णोंके लोगों को अपने - अपने धर्मका पालन करना चाहिये ॥ ४०३ ॥
हे साध्वि! अपने धर्ममें तत्पर रहनेवाले जो ब्राह्मण अपने धर्ममें संलग्न ब्राह्मणको अपनी कन्या प्रदान करते हैं, वे चन्द्रलोकमें जाते हैं और वहाँपर चौदह इन्द्रोंकी स्थितिपर्यन्त निवास करते हैं । कन्याको अलंकारोंसे विभूषित करके दान करनेसे दुगुना फल कहा जाता है । सकाम भावसे दान करनेवाले उसी चन्द्रलोकमें जाते हैं, किंतु निष्काम भावसे दान करनेवाले साधुपुरुष वहाँ नहीं जाते, फलकी इच्छासे रहित वे विष्णुलोकको प्राप्त होते हैं ॥ ४१-४३३ ॥ जो लोग ब्राह्मणोंको गव्य, चाँदी, सोना, वस्त्र, घृत, फल और जल प्रदान करते हैं; वे चन्द्रलोकमें जाते हैं और हे साध्वि! वे उस लोकमें एक मन्वन्तरतक निवास करते हैं । उस दानके प्रभावसे ही वे लोग वहाँ इतने दीर्घकालतक सुखपूर्वक निवास करते हैं ॥ ४४-४ -४५१३ ॥
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४६६ ये ददति सुवर्णांश्च गाश्च ताम्रादिकं सति ते यान्ति सूर्यलोकं च शुचये ब्राह्मणाय च वसन्ति ते तत्र लोके वर्षाणामयुतं सति विपुले सुचिरं वासं कुर्वन्ति च निरामयाः ददाति भूमिं विप्रेभ्यो धनानि विपुलानि च स याति विष्णुलोकं च श्वेतद्वीपं मनोहरम् तत्रैव निवसत्येव यावच्चन्द्रदिवाकरौ विपुले विपुलं वासं करोति पुण्यवान्मुने गृहं ददति विप्राय ये जना भक्तिपूर्वकम् ॥
ते यान्ति विष्णुलोकं च सुचिरं सुखदायकम् ।
गृहरेणुप्रमाणं च विष्णुलोके महत्तमे ॥
विपुले विपुलं वासं कुर्वन्ति मानवाः सति । श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २ ९ ॥ ४६ हे साध्वि! जो लोग पवित्र ब्राह्मणको सुवर्ण, गौ और ताम्र आदि देते हैं, वे सूर्यलोकमें जाते हैं । और हे साध्वि! वे वहाँ उस लोकमें दस ॥ ४७ हजार वर्षोंतक निवास करते हैं । वे उस विस्तृत लोकमें निर्विकार होकर दीर्घकालतक निवास । करते हैं ॥ ४६-४७ ॥ ॥ ४८ जो मनुष्य ब्राह्मणको भूमि तथा प्रचुर धन प्रदान करता है, वह भगवान् विष्णुके श्वेतद्वीप नामक । मनोहर लोकमें पहुँच जाता है और वहाँपर चन्द्र-सूर्यकी स्थितिपर्यन्त निवास करता है । हे मुने! वह ॥ ४ ९ पुण्यवान् मनुष्य उस महान् लोकमें विपुल कालतक वास करता है॥४८-४९ ३ ॥ । जो लोग विप्रको भक्तिपूर्वक गृहका दान करते ५० हैं, वे चिरकालतक स्थिर रहनेवाले सुखदायी विष्णुलोकको प्राप्त होते हैं । हे साध्वि! वे मनुष्य दानमें दिये गये उस गृहके रजकणकी संख्याके बराबर वर्षोंतक उस ५१ अत्यन्त श्रेष्ठ तथा विशाल विष्णुलोकमें निवास करते हैं । जो मनुष्य जिस किसी भी देवताके उद्देश्यसे मन्दिरका दान करता है, वह उस देवताके लोकमें यस्मै यस्मै च देवाय यो ददाति गृहं नरः ॥। ५२ जाता है और उस लोकमें उतने ही वर्षोंतक वास
स याति तस्य लोकं च रेणुमानाब्दमेव च ।
सौधे चतुर्गुणं पुण्यं देशे शतगुणं फलम् ॥
प्रकृष्टे द्विगुणं तस्मादित्याह कमलोद्भवः ।
यो ददाति तडागं च सर्वपापापनुत्तये ॥
स याति जनलोकं च रेणुमानाब्दमेव च ।
वाप्यां फलं दशगुणं प्राप्नोति मानवः सदा ॥
स तु वापीप्रदानेन तडागस्य फलं लभेत् ।
धनुश्चतुः सहस्त्रेण दैर्घ्यमानेन निश्चितम् ॥
न्यूना वा तावती प्रस्थे सा वापी परिकीर्तिता ।
दशवापीसमा कन्या यदि पात्रे प्रदीयते ॥
करता है, जितने उस मन्दिरमें रजकण होते हैं । अपने घरपर दान करनेसे चार गुना, किसी पवित्र तीर्थमें दान करनेसे सौ गुना और किसी श्रेष्ठ स्थानमें दान करनेसे ५३ दुगुना पुण्यफल प्राप्त होता है - ऐसा ब्रह्माजीने कहा है ॥ ५०–५३३ ॥ जो व्यक्ति समस्त पापोंसे मुक्त होनेके लिये ५४ तड़ागका दान करता है, वह जनलोक जाता है और उस तड़ागमें विद्यमान रेणु - संख्याके बराबर वर्षोंतक उस लोकमें रहता है । वापीका दान करनेसे मनुष्य ५५ उससे भी दस गुना फल प्राप्त कर लेता है । वापी दानसे तड़ाग - दानका फल स्वतः प्राप्त हो जाता है । चार हजार धनुषके बराबर लम्बा तथा उतना ही अथवा उससे कुछ कम चौड़ा जिसका प्रमाण हो, ५६ उसे वापी कहा गया है ॥ ५४–५६३ ॥ यदि कन्या किसी योग्य वरको प्रदान की जाती है, तो वह दान दस वापीके दानके समान होता है ५७ | और यदि कन्या अलंकारोंसे सम्पन्न करके दी जाती
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अ ० २ ९ ]
फलं ददाति द्विगुणं यदि सालङ्कृता भवेत् ।
यत्फलं च तडागे च तदुद्धारे च तत्फलम् ॥
वाप्याश्च पङ्कोद्धरणे वापीतुल्यफलं लभेत् ।
अश्वत्थवृक्षमारोप्य प्रतिष्ठां यः करोति च ॥
स प्रयाति तपोलोकं वर्षाणामयुतं सति ।
पुष्पोद्यानं यो ददाति सावित्रि सर्वभूतये ॥
स वसेद् ध्रुवलोके च वर्षाणामयुतं ध्रुवम् ।
यो ददाति विमानं च विष्णवे भारते सति ॥
विष्णुलोके वसेत्सोऽपि यावन्मन्वन्तरं परम् ।
चित्रयुक्ते च विपुले फलं तस्य चतुर्गुणम् ॥
तस्यार्धं शिबिकादाने फलमेव लभेद् ध्रुवम् ।
यो ददाति भक्तियुक्तो हरये दोलमन्दिरम् ॥
विष्णुलोके वसेत्सोऽपि यावन्मन्वन्तरं शतम् । राजमार्गं सौधयुक्तं यः करोति पतिव्रते वर्षाणामयुतं सोऽपि शक्रलोके महीयते । ब्राह्मणेभ्योऽथ देवेभ्यो दाने समफलं लभेत् यद्धि दत्तं च तद्भुङ्गे न दत्तं नोपतिष्ठते । भुक्त्वा स्वर्गादिजं सौख्यं पुण्यवाञ्जन्म भारते लभेद्विप्रकुलेष्वेव क्रमेणैवोत्तमादिषु भारते पुण्यवान्विप्रो भुक्त्वा स्वर्गादिकं फलम् पुनः सोऽपि भवेद्विप्रश्चैवं च क्षत्रियादयः क्षत्रियो वाथ वैश्यो वा कल्पकोटिशतेन च तपसा ब्राह्मणत्वं च न प्राप्नोति श्रुतौ श्रुतम् नवम स्कन्ध ४६७ है, तो उससे भी दुगुना फल प्राप्त होता है । जो फल तड़ागके दानसे मिलता है, वही फल ५८ उस तड़ागके जीर्णोद्धारसे भी प्राप्त हो जाता है । किसी वापीका कीचड़ दूर कराकर उसका उद्धार करनेसे वापी - दानके समान पुण्य प्राप्त हो जाता ५ ९ है ॥ ५७-५८३ ॥ हे साध्वि! जो मनुष्य पीपलका वृक्ष लगाकर उसकी प्रतिष्ठा करता है, वह तपोलोक पहुँचता है ६० और वहाँपर दस हजार वर्षोंतक निवास करता है । हे सावित्रि! जो व्यक्ति समस्त प्राणियोंके लिये पुष्पोद्यानका दान करता है, वह दस हजार वर्षोंतक ध्रुवलोकमें ६१ निश्चितरूपसे निवास करता है ॥५ ९ -६०३ ॥ हे साध्वि! जो मनुष्य विष्णुके उद्देश्यसे भारतमें विमानका दान करता है, वह पूरे एक मन्वन्तरतक विष्णुलोक में निवास करता है । चित्रयुक्त तथा विशाल ६२ विमानका दान करनेपर उसके दानका चौगुना फल होता है । शिविकाका दान करनेसे मनुष्य उसका आधा फल प्राप्त करता है - यह निश्चित है । जो ६३ व्यक्ति भगवान् श्रीहरिके उद्देश्यसे भक्तिपूर्वक दोला-मन्दिरका दान करता है, वह भी विष्णुलोकमें सौ मन्वन्तरतक निवास करता है ॥ ६१-६३३ ॥ ॥ ६४ हे पतिव्रते! जो मनुष्य आरामगृहोंसे युक्त राजमार्गका निर्माण कराता है, वह दस हजार वर्षोंतक इन्द्रलोकमें प्रतिष्ठित होता है ॥ ६४ ॥
ब्राह्मणों अथवा देवताओंको दिया हुआ दान ॥ ६५ समान फल प्रदान करता है । जो पूर्वजन्ममें दिया गया है, जन्मान्तरमें उसीका फल प्राप्त होता है और जो नहीं दिया गया है, उसका फल नहीं मिलता । ॥ ६६ पुण्यवान् मनुष्य स्वर्ग आदि लोकोंके सुख भोगकर भारतवर्षमें क्रमशः उत्तमसे उत्तम ब्राह्मणकुलोंमें । जन्म ग्रहण करता है । इस प्रकार वह पुण्यवान् विप्र ॥ ६७ भी पुनः स्वर्गमें अपने कर्मफलका भोग करके भारतवर्षमें ब्राह्मण होकर जन्म प्राप्त करता है ॥ क्षत्रिय आदिके लिये भी ऐसा ही है । क्षत्रिय हो अथवा वैश्य — कोई करोड़ों कल्पके तपस्याके प्रभावसे ॥ ६८ भी ब्राह्मणत्व नहीं प्राप्त कर सकता– - ऐसा श्रुतियों में । सुना गया है ॥ ६५ – ६८३ ॥
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४६८ नाभुक्तं क्षीयते कर्म कल्पकोटिशतैरपि अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम् देवतीर्थसहायेन कायव्यूहेन शुध्यति एतत्ते कथितं किञ्चित् किं भूयः श्रोतुमिच्छसि श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ३० ॥६ ९ करोड़ों कल्प बीत जानेपर भी बिना भोग प्राप्त किये कर्मका क्षय नहीं होता । अपने द्वारा किये गये शुभ अथवा अशुभ कर्मका फल मनुष्यको भोगना ही । पड़ता है । देवता और तीर्थकी सहायतासे तथा कायव्यूह ( तप ) - से प्राणी शुद्ध हो जाता है । हे । साध्वि! ये कुछ बातें मैंने तुम्हें बतला दीं; अब आगे ॥ ७० क्या सुनना चाहती हो? ॥ ६ ९ -७० ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां नवमस्कन्धे नारायणनारदसंवादे सावित्र्युपाख्याने कर्मविपाकवर्णनं नामैकोनत्रिंशोऽध्यायः ॥ २ ९ ॥ अथ त्रिंशोऽध्यायः दिव्य लोकोंकी प्राप्ति सावित्र्युवाच
प्रयान्ति स्वर्गमन्यं च येनैव कर्मणा यम ।
मानवाः पुण्यवन्तश्च तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥
धर्मराज उवाच
अन्नदानं च विप्राय यः करोति च भारते ।
अन्नप्रमाणवर्षं च शिवलोके महीयते ॥
अन्नदानं महादानमन्येभ्योऽपि करोति यः ।
अन्नदानप्रमाणं च शिवलोके महीयते ॥
अन्नदानात्परं दानं न भूतं न भविष्यति ।
नात्र पात्रपरीक्षा स्यान्न कालनियमः क्वचित् ॥
देवेभ्यो ब्राह्मणेभ्यो वा ददाति चासनं यदि ।
महीयते विष्णुलोके वर्षाणामयुतं सति ॥
यो ददाति च विप्राय दिव्यां धेनुं पयस्विनीम् ।
तल्लोममानवर्षं च विष्णुलोके महीयते ॥।
चतुर्गुणं पुण्यदिने तीर्थे शतगुणं फलम् ।
दानं नारायणक्षेत्रं फलं कोटिगुणं भवेत् ॥
करानेवाले पुण्यकर्मोंका वर्णन सावित्री बोली- हे यम! जिस कर्मके प्रभावसे पुण्यवान् मनुष्य स्वर्ग आदि अन्य लोकोंमें जाते हैं, १ उसे मुझे बतानेकी कृपा कीजिये ॥ १ ॥
धर्मराज बोले - [ हे साध्वि! ] जो भारतवर्षमें विप्रको अन्नका दान करता है, वह दान दिये गये अन्नकी संख्या बराबर वर्षोंतक शिवलोकमें प्रतिष्ठित होता है । अन्नदान महादान है । जो अन्य लोगोंको भी २ अन्नदान करता है, वह भी अन्नके दानोंकी संख्या बराबर वर्षोंतक शिवलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है 1 ३ अन्नदानसे बढ़कर न कोई दान हुआ है और न होगा । इस दानमें पात्र - परीक्षा अथवा समय - सम्बन्धी नियमकी कोई आवश्यकता नहीं होती है ॥ २४ ॥
हे साध्वि! यदि कोई मनुष्य देवताओं अथवा ४ ब्राह्मणोंको आसनका दान करता है, तो वह दस हजार वर्षोंतक विष्णुलोकमें निवास करता है ॥५ ॥
जो मनुष्य ब्राह्मणको ५ प्रदान करता है, वह उस रोमोंकी संख्याके बराबर प्रतिष्ठित रहता है ॥ ६ ॥
६ [ साधारण दिनोंकी दिये गये गोदानका फल दूध देनेवाली दिव्य गाय गायके शरीरमें विद्यमान वर्षोंतक विष्णुलोकमें अपेक्षा ] पुण्य - दिनमें चार गुना, तीर्थमें सौ गुना और नारायणक्षेत्रमें गोदानका फल करोड़ गुना ७ | होता है ॥ ७ ॥
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अ ० ३०
गां यो ददाति विप्राय भारते भक्तिपूर्वकम् ।
वर्षाणामयुतं चैव चन्द्रलोके महीयते ॥
यश्चोभयमुखीदानं करोति ब्राह्मणाय च ।
तल्लोममानवर्षं च विष्णुलोके महीयते ॥
यो ददाति ब्राह्मणाय श्वेतच्छत्रं मनोहरम् ।
वर्षाणामयुतं सोऽपि मोदते वरुणालये ॥
विप्राय पीडिताङ्गाय वस्त्रयुग्मं ददाति च ।
महीयते वायुलोके वर्षाणामयुतं सति ॥
यो ददाति ब्राह्मणाय शालग्रामं सवस्त्रकम् ।
महीयते स वैकुण्ठे यावच्चन्द्रदिवाकरौ ॥
यो ददाति ब्राह्मणाय दिव्यां शय्यां मनोहराम् ।
महीयते चन्द्रलोके यावच्चन्द्रदिवाकरौ ॥
यो ददाति प्रदीपं च देवेभ्यो ब्राह्मणाय च ।
यावन्मन्वन्तरं सोऽपि वह्निलोके महीयते ॥
करोति गजदानं च यदि विप्राय भारते ।
यावदिन्द्रो नरस्तावदिन्द्रस्यार्धासने वसेत् ॥
भारते योऽश्वदानं च करोति ब्राह्मणाय च ।
मोदते वारुणे लोके यावदिन्द्राश्चतुर्दश ॥
प्रकृष्टां शिबिकां यो हि ददाति ब्राह्मणाय च । मोदते वारुणे लोके यावदिन्द्राश्चतुर्दश प्रकृष्टां वाटिकां यो हि ददाति ब्राह्मणाय च । महीयते वायुलोके यावन्मन्वन्तरं सति नवम स्कन्ध ४६ ९ जो मनुष्य भारतवर्ष में भक्तिपूर्वक ब्राह्मणको ८ गाय प्रदान करता है, वह दस हजार वर्षोंतक चन्द्रलोकमें निवास करता है ॥ ८ ॥
जो व्यक्ति किसी ब्राह्मणको उभयमुखी ( प्रसव करती हुई ) गायका दान करता है, वह उस गायके ९ शरीरमें विद्यमान रोमोंकी संख्याके बराबर वर्षोंतक विष्णुलोक में प्रतिष्ठित होता है ॥ ९ ॥
जो मनुष्य ब्राह्मणको स्वच्छ तथा मनोहर छत्र १० प्रदान करता है, वह दस हजार वर्षोतक वरुणलोकमें आनन्दित रहता है ॥ १० ॥
हे साध्वि! जो मनुष्य पीड़ित शरीरवाले ११ दुःखी ब्राह्मणको एक जोड़ा वस्त्र प्रदान करता है, वह दस हजार वर्षोंतक वायुलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है ॥११ ॥
जो व्यक्ति किसी ब्राह्मणको वस्त्रसहित शालग्रामका १२ अर्पण करता है, वह चन्द्रमा तथा सूर्यकी स्थितिपर्यन्त वैकुण्ठमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है ॥१२ ॥
जो मनुष्य किसी ब्राह्मणको दिव्य तथा मनोहर १३ शय्याका दान करता है, वह चन्द्रमा तथा सूर्यके स्थिति - कालतक चन्द्रलोकमें प्रतिष्ठित होता है ॥ १३ ॥
जो देवताओं तथा ब्राह्मणोंको दीपकका दान करता है, वह मन्वन्तरपर्यन्त अग्निलोकमें वास १४ करता है ॥१४ ॥
भारतवर्षमें जो मनुष्य ब्राह्मणको हाथीका दान करता है, वह इन्द्रकी आयुपर्यन्त उनके आधे आसनपर १५ विराजमान रहता है ॥ १५ ॥
भारतवर्षमें जो मनुष्य ब्राह्मणको अश्वका दान करता है, वह जबतक चौदहों इन्द्रोंकी स्थिति १६ बनी रहती है, तबतक वरुणलोकमें आनन्द प्राप्त करता है ॥ १६ ॥
जो व्यक्ति ब्राह्मणके लिये उत्तम शिबिकाका दान करता है, वह भी चौदह इन्द्रोंकी स्थितितक ॥ १७ वरुणलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है ॥१७ ॥
हे साध्वि! जो मनुष्य ब्राह्मणको उत्तम वाटिका प्रदान करता है, वह मन्वन्तरपर्यन्त वायु-॥ १८ | लोकमें प्रतिष्ठित होता है ॥ १८ ॥
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४७० यो ददाति च विप्राय व्यजनं श्वेतचामरम् महीयते वायुलोके वर्षाणामयुतं ध्रुवम् धान्यं रत्नं यो ददाति चिरञ्जीवी भवेत्सुधीः दाता ग्रहीता तौ द्वौ च ध्रुवं वैकुण्ठगामिनौ
सततं श्रीहरेर्नाम भारते यो जपेन्नरः ।
स एव चिरजीवी च ततो मृत्युः पलायते ॥
यो नरो भारते वर्षे दोलनं कारयेत्सुधीः ।
पूर्णिमारजनीशेषे जीवन्मुक्तो भवेन्नरः ॥
इहलोके सुखं भुक्त्वा यात्यन्ते विष्णुमन्दिरम् ।
निश्चितं निवसेत्तत्र शतमन्वन्तरावधि ॥
फलमुत्तरफल्गुन्यां ततोऽपि द्विगुणं भवेत् ।
कल्पान्तजीवी स भवेदित्याह कमलोद्भवः ॥
तिलदानं ब्राह्मणाय यः करोति च भारते ।
तिलप्रमाणवर्षं च मोदते शिवमन्दिरे ॥
ततः सुयोनिं सम्प्राप्य चिरञ्जीवी भवेत्सुखी ।
ताम्रपात्रस्य दानेन द्विगुणं च फलं लभेत् ॥
सालङ्कृतां च भोग्यां च सवस्त्रां सुन्दरीं प्रियाम् ।
यो ददाति ब्राह्मणाय भारते च पतिव्रताम् ॥
महीयते चन्द्रलोके यावदिन्द्राश्चतुर्दश ।
तत्र स्वर्वेश्यया सार्धं मोदते च दिवानिशम् ॥
ततो गन्धर्वलोके च वर्षाणामयुतं ध्रुवम् ।
दिवानिशं कौतुकेन चोर्वश्या सह मोदते ॥
ततो जन्मसहस्त्रं च प्राप्नोति सुन्दरीं प्रियाम् ।
सतीं सौभाग्ययुक्तां च कोमलां प्रियवादिनीम् ॥
श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ३० । जो व्यक्ति ब्राह्मणको पंखा तथा श्वेत चँवरका ॥ १ ९ दान करता है, वह निश्चितरूपसे दस हजार वर्षोंतक वायुलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है ॥ १ ९ ॥ । जो मनुष्य धान्य तथा रत्नका दान करता है, वह ॥ २० दीर्घायु तथा विद्वान् होता है । दान देनेवाला तथा लेनेवाला — वे दोनों निश्चय ही वैकुण्ठलोकमें चले जाते हैं ॥ २० ॥
जो मनुष्य भारतवर्ष में निरन्तर भगवान् श्रीहरिके २१ नामका जप करता है, वह दीर्घजीवी होता है और मृत्यु उससे सदा दूर रहती है ॥ २१ ॥
भारतवर्षमें जो विद्वान् पुरुष पूर्णिमाकी रातके २२ कुछ शेष रहनेपर दोलोत्सव कराता है, वह जीवन्मुक्त होता है, इस लोकमें सुख भोगकर वह अन्तमें विष्णुके धामको प्राप्त होता है और वहाँ सौ मन्वन्तरकी अवधि-२३ तक निश्चितरूपसे निवास करता है । उत्तराफाल्गुनी नक्षत्रमें यह उत्सव मनानेपर उससे भी दुगुना फल प्राप्त होता है और वह व्यक्ति कल्पपर्यन्त जीवित २४ रहता है - ऐसा ब्रह्माजीने कहा है । २२–२४ ॥ भारतवर्षमें जो मनुष्य ब्राह्मणको तिलका दान करता है, वह तिलोंकी संख्याके बराबर वर्षोंतक २५ शिवजीके धाममें आनन्द प्राप्त करता है । वहाँसे पुन: उत्तम योनिमें जन्म पाकर वह दीर्घकालतक जीवित रहते हुए सुख भोगता है । तिलसे परिपूर्ण ताँबेके २६ | पात्रका दान करनेसे उससे भी दूना फल प्राप्त होता ॥ २५-२६ ॥ भारतमें जो मनुष्य उपभोग करनेयोग्य पतिव्रता २७ तथा सुन्दर कन्याको अलंकारों तथा वस्त्रोंसे विभूषित करके उसे किसी ब्राह्मणको भार्याके रूपमें अर्पण करता है, वह चौदहों इन्द्रोंकी स्थितिपर्यन्त चन्द्रलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है और वहाँपर स्वर्गकी अप्सराओंके २८ साथ दिन - रात आनन्द प्राप्त करता रहता है । उसके बाद वह निश्चय ही गन्धर्वलोकमें दस हजार वर्षोंतक निवास करता है और वहाँपर उर्वशीके साथ क्रीडा २ ९ करते हुए दिन - रात आनन्द प्राप्त करता है । तत्पश्चात् उसे हजारों जन्मतक सुन्दर, साध्वी, सौभाग्यवती, कोमल तथा प्रिय सम्भाषण करनेवाली भार्या प्राप्त ३० | होती है ॥ २७–३० ॥
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अ ० ३० ]
प्रददाति फलं चारु ब्राह्मणाय च यो नरः ।
फलप्रमाणवर्षं च शक्रलोके महीयते ॥
पुनः सुयोनिं सम्प्राप्य लभते सुतमुत्तमम् ।
सफलानां च वृक्षाणां सहस्रं च प्रशंसितम् ॥
केवलं फलदानं वा ब्राह्मणाय ददाति च ।
सुचिरं स्वर्गवासं च कृत्वा याति च भारते ॥
नानाद्रव्यसमायुक्तं नानासस्यसमन्वितम् ।
ददाति यश्च विप्राय भारते विपुलं गृहम् ॥
सुरलोके वसेत्सोऽपि यावन्मन्वन्तरं शतम् ।
ततः सुयोनिं सम्प्राप्य स महाधनवान्भवेत् ॥
यो नरः सस्यसंयुक्तां भूमिं च रुचिरां सति ।
ददाति भक्त्या विप्राय पुण्यक्षेत्रे च भारते ॥
महीयते च वैकुण्ठे मन्वन्तरशतं ध्रुवम् ।
पुनः सुयोनिं सम्प्राप्य महांश्च भूमिपो भवेत् ॥
तं न त्यजति भूमिश्च जन्मनां शतकं परम् ।
श्रीमांश्च धनवांश्चैव पुत्रवांश्च प्रजेश्वरः ॥
यो व्रजं च प्रकृष्टं च ग्रामं दद्याद् द्विजाय च ।
लक्षमन्वन्तरं चैव वैकुण्ठे स महीयते ॥
पुनः सुयोनिं सम्प्राप्य ग्रामलक्षसमन्वितम् ।
न जहाति च तं पृथ्वी जन्मनां लक्षमेव च ॥
सुप्रजं च प्रकृष्टं च पक्वसस्यसमन्वितम् । नानापुष्करिणीवृक्षफलवल्लीसमन्वितम्
नगरं यश्च विप्राय ददाति भारते भुवि ।
महीयते स कैलासे दशलक्षेन्द्रकालकम् ॥
पुनः सुयोनिं सम्प्राप्य राजेन्द्रो भारते भवेत् ।
नगराणां च नियुतं स लभेन्नात्र संशयः ॥
धरा तं न जहात्येव जन्मनामयुतं ध्रुवम् ।
परमैश्वर्यनियुतो भवेदेव महीतले ॥
नवम स्कन्ध ४७१ जो मनुष्य ब्राह्मणको सुन्दर फल प्रदान करता ३१ है, वह जितने फल दिये गये होते हैं; उतने वर्षोंतक इन्द्रलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है । इसके बाद वह उत्तम योनिमें जन्म लेकर श्रेष्ठ पुत्र प्राप्त करता है । ३२ फलवाले वृक्षोंके दानका फल उससे भी हजार गुना अधिक बताया गया है । जो मनुष्य ब्राह्मणको केवल फलदान करता है, वह भी दीर्घ कालतक स्वर्गमें ३३ निवास करके पुनः भारतवर्षमें जन्म ग्रहण करता है ॥ ३१–३३ ॥ ३४ भारतवर्षमें जो मनुष्य अनेक प्रकारके द्रव्योंसे युक्त तथा नानाविध धान्योंसे परिपूर्ण विशाल भवन ब्राह्मणको प्रदान करता है, वह सौ मन्वन्तरतक देवलोकमें ३५ निवास करता है । तदनन्तर उत्तम योनिमें जन्म पाकर वह महान् धनाढ्य हो जाता है ॥ ३४-३५ ॥ हे साध्वि! पुण्यक्षेत्र भारतवर्षमें जो मनुष्य हरी-३६ भरी फसलोंसे सम्पन्न सुन्दर भूमि भक्तिपूर्वक ब्राह्मणको अर्पण करता है, वह निश्चितरूपसे सौ मन्वन्तरतक ३७ वैकुण्ठलोकमें प्रतिष्ठित होता है । तत्पश्चात् पुनः उत्तम योनिमें जन्म लेकर वह बहुत महान् राजा होता है । सौ जन्मोंतक भूमि उसका त्याग नहीं करती और वह श्रीयुक्त, ३८ धनवान् तथा पुत्रवान् राजा होता है ॥ ३६-३८ ॥ जो व्यक्ति उत्तम गोशाला तथा गाँव ब्राह्मणको प्रदान करता है, वह एक लाख मन्वन्तरतक वैकुण्ठलोकमें ३ ९ प्रतिष्ठित होता है । तत्पश्चात् श्रेष्ठ कुलमें जन्म पाकर वह लाखों गाँवोंसे सम्पन्न हो जाता है और लाख ४० जन्मोंतक भूमि उसका साथ नहीं छोड़ती ॥ ३ ९ -४० ॥ भारतभूमिपर जो मनुष्य ब्राह्मणको उत्तम प्रजाओंसे युक्त, उत्कृष्ट, पकी हुई फसलोंसे सम्पन्न तथा अनेक ॥ ४१ प्रकारके कमलयुक्त जलाशयों, वृक्षों, फलों और लताओंसे सुशोभित नगर प्रदान करता है; वह दस लाख इन्द्रोंकी स्थितिपर्यन्त कैलासमें सुप्रतिष्ठित होता ४२ है । इसके बाद वह भारतवर्षमें उत्तम योनिमें जन्म लेकर राजेश्वर होता है और लाखों नगर प्राप्त करता ४३ है, इसमें सन्देह नहीं है । दस हजार वर्षोंतक धरा उस मनुष्यका साथ नहीं छोड़ती और वह निश्चितरूपसे पृथ्वीतलपर सर्वदा महान् ऐश्वर्यसे सम्पन्न रहता ४४ | है ॥ ४१–४४ ॥