देवी भागवत उत्तरार्द्ध — पृष्ठ 491–500

देवी भागवत उत्तरार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 491–500

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४८२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ३२

वह्निकुण्डं तप्तकुण्डं क्षारकुण्डं भयानकम् ।

विट्कुण्डं मूत्रकुण्डं च श्लेष्मकुण्डं च दुःसहम् ॥ ८

गरकुण्डं दूषिकुण्डं वसाकुण्डं तथैव च ।

शुक्रकुण्डमसृक्कुण्डमश्रुकुण्डं च कुत्सितम् ॥ ९

कुण्डं गात्रमलानां च कर्णविट्कुण्डमेव च ।

मज्जाकुण्डं मांसकुण्डं नक्रकुण्डं च दुस्तरम् ॥ १०

लोमकुण्डं केशकुण्डमस्थिकुण्डं च दुस्तरम् ।

ताम्रकुण्डं लोहकुण्डं प्रतप्तं क्लेशदं महत् ॥ ११

चर्मकुण्डं तप्तसुराकुण्डं च परिकीर्तितम् ।

तीक्ष्णकण्टककुण्डं च विषोदं विषकुण्डकम् ॥ १२

प्रतप्तकुण्डं तैलस्य कुन्तकुण्डं च दुर्वहम् ।

कृमिकुण्डं पूयकुण्डं सर्पकुण्डं दुरन्तकम् ॥ १३

मशकुण्डं दंशकुण्डं भीमं गरलकुण्डकम् ।

कुण्डं च वज्रदंष्ट्राणां वृश्चिकानां च सुव्रते ॥ १४

शरकुण्डं शूलकुण्डं खड्गकुण्डं च भीषणम् ।

गोलकुण्डं नक्रकुण्डं काककुण्डं शुचास्पदम् ॥ १५

मन्थानकुण्डं बीजकुण्डं वज्रकुण्डं च दुःसहम् ।

तप्तपाषाणकुण्डं च तीक्ष्णपाषाणकुण्डकम् ॥ १६

लालाकुण्डं मसीकुण्डं चूर्णकुण्डं तथैव च ।

चक्रकुण्डं वक्रकुण्डं कूर्मकुण्डं महोल्बणम् ॥ १७

ज्वालाकुण्डं भस्मकुण्डं दग्धकुण्डं शुचिस्मिते ।

तप्तसूचीमसिपत्रं क्षुरधारं सूचीमुखम् ॥ १८

गोकामुखं नक्रमुखं गजदंशं च गोमुखम् ।

कुम्भीपाकं कालसूत्रं मत्स्योदं कृमितन्तुकम् ॥ १ ९

पांसुभोज्यं पाशवेष्टं शूलप्रोतं प्रकम्पनम् ।

उल्कामुखमन्धकूपं वेधनं ताडनं तथा ॥ २०

जालरन्ध्रं देहचूर्णं दलनं शोषणं कषम् ।

शूर्पं ज्वालामुखं चैव धूमान्धं नागवेष्टनम् ॥ २१

कुण्डान्येतानि सावित्रि पापिनां क्लेशदानि च ।

नियुतैः किङ्करगणै रक्षितानि च सन्ततम् ॥ २२

दण्डहस्तैः पाशहस्तैर्मदमत्तैर्भयङ्करैः ।

शक्तिहस्तैर्गदाहस्तैरसिहस्तैः सुदारुणैः ॥ २३ ।

1898 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ द्वितीय खण्ड ] –16 B वह्निकुण्ड, तप्तकुण्ड, भयानक क्षारकुण्ड, विट्कुण्ड, मूत्रकुण्ड, दु: सह श्लेष्मकुण्ड, गरकुण्ड, दूषिकुण्ड, वसाकुण्ड, शुक्रकुण्ड, असृक्कुण्ड, कुत्सित अश्रुकुण्ड, गात्रमलकुण्ड, कर्णविट्कुण्ड, मज्जाकुण्ड, मांसकुण्ड, दुस्तर नक्रकुण्ड, लोमकुण्ड, केशकुण्ड, दुस्तर अस्थिकुण्ड, ताम्रकुण्ड, प्रतप्त एवं महान् कष्टदायक लोहकुण्ड, चर्मकुण्ड, तप्तसुराकुण्ड, तीक्ष्ण कण्टककुण्ड, विषपूर्ण विषकुण्ड —ये कुण्ड बताये गये हैं ॥ ८-१२ ॥ हे सुव्रते! इसी प्रकार प्रतप्त तैलकुण्ड, दुर्वह कुन्तकुण्ड, कृमिकुण्ड, पूयकुण्ड, अत्यन्त कष्टप्रद सर्पकुण्ड, मशककुण्ड, दंशकुण्ड, भयानक गरलकुण्ड और वज्रके समान दाँतोंवाले बिच्छुओंके भी कुण्ड हैं । हे शुचिस्मिते! शरकुण्ड, शूलकुण्ड, भयंकर खड्गकुण्ड, गोलकुण्ड, नक्रकुण्ड, कष्टदायक काककुण्ड, मन्थानकुण्ड, बीजकुण्ड, दु: सह वज्रकुण्ड, तप्तपाषाणकुण्ड, तीक्ष्णपाषाणकुण्ड, लालाकुण्ड, मसीकुण्ड, चूर्णकुण्ड, चक्रकुण्ड, वक्रकुण्ड, महाभयंकर कूर्मकुण्ड, ज्वालाकुण्ड, भस्मकुण्ड, दग्धकुण्ड, तप्तसूचीकुण्ड, असिपत्रकुण्ड, क्षुरधारकुण्ड, सूचीमुखकुण्ड, गोकामुखकुण्ड, नक्रमुखकुण्ड, गजदंशकुण्ड, गोमुखकुण्ड, कुम्भीपाककुण्ड, कालसूत्रकुण्ड, मत्स्योदकुण्ड, कृमितन्तु कुण्ड, पांसुभोज्यकुण्ड, पाशवेष्टकुण्ड, शूलप्रोतकुण्ड, प्रकम्पनकुण्ड, उल्कामुखकुण्ड, अन्धकूपकुण्ड, वेधनकुण्ड, ताडनकुण्ड, जालरन्ध्रकुण्ड, देहचूर्णकुण्ड, दलनकुण्ड, शोषणकुण्ड, कषकुण्ड, शूर्पकुण्ड, ज्वालामुखकुण्ड, धूमान्धकुण्ड और नागवेष्टनकुण्ड– ये कुण्ड कहे गये हैं ॥ १३–२१ ॥ हे सावित्र! ये सभी कुण्ड पापियोंके लिये क्लेशप्रद हैं । दस लाख अनुचर सदा इन कुण्डों की रखवाली करते रहते हैं । वे सभी निर्दयी, अभिमानमें चूर तथा भयंकर सेवकगण अपने हाथोंमें दण्ड, पाश, शक्ति, गदा और तलवार लिये रहते हैं 1 । वे तमोगुणसे युक्त तथा दयाशून्य रहते हैं और कोई भी उनका प्रतिरोध नहीं कर सकता । उन तेजस्वी तथा निर्भीक अनुचरोंकी आँखें ताँबेके सदृश तथा कुछ - कुछ पीले

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अ ० ३३ ]

तमोयुक्तैर्दयाहीनैर्निवार्यैश्च न सर्वतः ।

तेजस्विभिश्च निःशङ्खैराताम्रपिङ्गलोचनैः ॥

योगयुक्तैः सिद्धियुक्तैर्नानारूपधरैर्भटैः ।

आसन्नमृत्युभिर्दृष्टैः पापिभिः सर्वजीविभिः ॥

स्वकर्मनिरतैः सर्वैः शाक्तैः सौरैश्च गाणपैः ।

अदृश्यैः पुण्यकृद्भिश्च सिद्धैर्योगिभिरेव च ॥

स्वधर्मनिरतैर्वापि विततैर्वा स्वतन्त्रकैः ।

बलवद्भिश्च निःशङ्खैः स्वप्नदृष्टैश्च वैष्णवैः ॥

एतत्ते कथितं साध्वि कुण्डसंख्यानिरूपणम् ।

येषां निवासो यत्कुण्डे निबोध कथयामि ते ॥

नवम स्कन्ध ४८३ वर्णकी हैं । योगयुक्त तथा सिद्धियोंसे सम्पन्न वे सभी २४ सेवक अनेक प्रकारके रूप धारण कर लिया करते हैं । वे सेवक समस्त पापी प्राणियोंको उनकी मृत्यु निकट आनेपर दिखायी पड़ते हैं । शक्ति, सूर्य तथा गणपति २५ उपासकों एवं अपने कर्मोंमें लगे रहनेवाले पुण्यशाली सिद्धों तथा योगियोंको वे दिखायी नहीं पड़ते । इसी प्रकार जो सदा अपने धर्ममें लगे रहते हैं, जिनका हृदय विशाल है, जो पूर्ण स्वतन्त्र हैं तथा जिन्हें २६ स्वप्नमें या कहीं भी अपने इष्टदेवका दर्शन हो चुका है - ऐसे वैष्णवजनोंको वे बलवान् तथा निःशंक यमदूत कभी दिखायी नहीं पड़ते ॥ २२ - २७ ॥ २७ साध्वि! यह मैंने तुमसे कुण्डोंकी संख्याका निरूपण कर दिया । जिन - जिन पापियोंका जिन - जिन कुण्डोंमें वास होता है, अब मैं तुम्हें यह बता रहा २८ । हूँ, ध्यानसे सुनो ॥ २८ ॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां नवमस्कन्धे नारायणनारदसंवादे सावित्र्युपाख्याने कुण्डसंख्यानिरूपणं नाम द्वात्रिंशोऽध्यायः ॥ ३२ ॥

अथ त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः विभिन्न नरककुण्डों में जानेवाले धर्मराज उवाच

हरिसेवारतः शुद्धो योगसिद्धो व्रती सति ।

तपस्वी ब्रह्मचारी च न याति नरकं ध्रुवम् ॥ १

कटुवाचा बान्धवांश्च बललेपेन यो नरः ।

दग्धान्करोति बलवान् वह्निकुण्डं प्रयाति सः ॥ २

स्वगात्रलोममानाब्दं तत्र स्थित्वा हुताशने ।

पशुयोनिमवाप्नोति रौद्रदग्धां त्रिजन्मनि ॥ ३

ब्राह्मणं तृषितं तप्तं क्षुधितं गृहमागतम् ।

न भोजयति यो मूढस्तप्तकुण्डं प्रयाति सः ॥ ४

तत्र तल्लोममानं च वर्षं स्थित्वा च दुःखदे ।

तप्तस्थले वह्नितल्पे पक्षी च सप्तजन्मसु ॥ ५

1898 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ द्वितीय खण्ड ] –16 C पापियों तथा उनके पापोंका वर्णन धर्मराज बोले- हे साध्वि! भगवान् श्रीहरिकी सेवामें संलग्न रहनेवाला, विशुद्धात्मा, योगसिद्ध, व्रती, तपस्वी तथा ब्रह्मचारी पुरुष निश्चित ही नरकमें नहीं जाता ॥ १ ॥

जो बलशाली मनुष्य बलके अभिमानमें आकर अपने कटुवचनसे बान्धवोंको दग्ध करता है, वह वह्निकुण्ड नामक नरकमें जाता है और अपने शरीरमें विद्यमान रोमोंकी संख्याके बराबर वर्षोंतक उस वह्निकुण्डमें वास करके वह तीन जन्मोंतक रौद्रदग्ध पशुयोनि प्राप्त करता है॥२-३ ॥ जो मूर्ख घरपर आये हुए भूखे - प्यासे दुःखी ब्राह्मणको भोजन नहीं कराता है, वह तप्तकुण्ड नामक नरकमें जाता है । उस ब्राह्मणके शरीर में विद्यमान रोमोंकी संख्याके बराबर वर्षोंतक उस दुःखप्रद नरकमें वास करके वह सात जन्मोंतक पक्षीकी योनिमें पैदा होकर तपते हुए स्थानपर वह्निशय्यापर यातना भोगता है॥४-५ ॥

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४८४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ३३

रविवारे च संक्रान्त्याममायां श्राद्धवासरे ।

वस्त्राणां क्षारसंयोगं करोति केवलं नरः ॥

स याति क्षारकुण्डं च सूत्रमानाब्दमेव च ।

स व्रजेद्रजकीं योनिं सप्तजन्मसु भारते ॥

मूलप्रकृतिनिन्दां यः कुरुते मानवाधमः ।

वेदनिन्दां शास्त्रनिन्दां पुराणानां तथैव च ॥

ब्रह्मविष्णुशिवादीनां तथा निन्दापरो जनः ।

गौरीवाण्यादिदेवीनां तथा निन्दापरो जनः ॥

सर्वे निरये यान्ति तस्मिन्कुण्डे भयानके ।

नातः परतरं कुण्डं दुःखदं तु भविष्यति ॥

तत्र स्थित्वानेककल्पं सर्पयोनिं व्रजेत्पुनः ।

देवीनिन्दापराधस्य प्रायश्चित्तं न विद्यते ॥

स्वदत्तां परदत्तां वा वृत्तिं च सुरविप्रयोः ।

षष्टिवर्षसहस्राणि विट्कुण्डं च प्रयाति सः ॥

तावन्त्येव च वर्षाणि विड्भोजी तत्र तिष्ठति ।

षष्टिवर्षसहस्राणि विट्कृमिश्च पुनर्भुवि ॥

परकीयतडागे च तडागं यः करोति च ।

उत्सृजेद्दैवदोषेण मूत्रकुण्डं प्रयाति सः ॥

तद्रेणुमानवर्षं च तद्भोजी तत्र तिष्ठति ।

पुनः पूर्णशताब्दं च स वृषो भारते भवेत् ॥

एकाकी मिष्टमश्नाति श्लेष्मकुण्डं प्रयाति च ।

पूर्णमब्दशतं चैव तद्भोजी तत्र तिष्ठति ॥

ततः पूर्णशताब्दं च स प्रेतो भारते भवेत् ।

श्लेष्ममूत्रपरं चैव पूयं भुङ्क्ते ततः शुचिः ॥

जो मनुष्य रविवार, सूर्यसंक्रान्ति, अमावास्या और ६ श्राद्धके अवसरपर क्षार पदार्थोंसे वस्त्र धोता है, वह क्षारकुण्ड नामक नरकमें जाता है और उस वस्त्रमें विद्यमान सूतोंकी संख्याके बराबर वर्षोंतक वहाँ निवास करता है । इसके बाद भारतवर्षमें सात जन्मोंतक ७ रजकयोनिमें उसे जन्म लेना पड़ता है ॥ ६-७ ॥ जो अधम मनुष्य मूलप्रकृति भगवती जगदम्बाकी निन्दा करता है, जो वेद - शास्त्र तथा पुराणोंकी निन्दा ८ करता है, जो ब्रह्मा - विष्णु- शिव आदि देवताओंकी निन्दामें संलग्न रहता है और जो मनुष्य गौरी-सरस्वती आदि देवियोंकी निन्दामें तत्पर रहता है— ९ वे सब उस भयानक नरककुण्डमें जाते हैं, जिससे बढ़कर दुःखदायी दूसरा कोई कुण्ड नहीं होता । उस कुण्डमें अनेक कल्पोंतक वास करके वह मनुष्य १० सर्पयोनिको प्राप्त होता है । भगवतीकी निन्दाके अपराधका कोई प्रायश्चित्त ही नहीं है ॥ ८–११ ॥ जो मनुष्य अपने या दूसरेके द्वारा दी गयी देवता ११ अथवा ब्राह्मणकी वृत्तिको छीनता है, वह साठ हजार वर्षोंके लिये विट्कुण्ड नामक नरकमें जाता है और उतने ही वर्षोंतक विष्ठाभोजी बनकर वहाँ रहता है । १२ इसके बाद वह पुनः पृथ्वीपर साठ हजार वर्षोंतक विष्ठाका कृमि होता है ॥ १२-१३ ॥ जो व्यक्ति दूसरोंके बनवाये तड़ागमें अपने १३ नामसे निर्माण करता है और फिर जनताके लिये उसका उत्सर्ग ( लोकार्पण ) करता है, वह उस दोषके कारण मूत्रकुण्ड नामक नरकमें जाता है । वहाँपर वह उस तड़ागके रज- कणकी संख्या १४ बराबर वर्षोंतक उसी मूत्र आदिको ग्रहण करते हुए रहता है और पुनः भारतवर्षमें पूरे सौ वर्षोंतक वृषकी योनिमें रहता है ॥ १४-१५ ॥ १५ जो अकेले ही मिष्टान्न आदिका भक्षण करता है, वह श्लेष्मकुण्ड नामक नरकमें जाता है और उसी श्लेष्माको खाते हुए पूरे सौ वर्षोंतक वहाँ रहता है । १६ इसके बाद वह भारतवर्षमें पूरे सौ वर्षोंतक प्रेतयोनिमें पड़ा रहता है; यहाँ श्लेष्मा, मूत्र तथा पीव आदिका उसे भक्षण करना पड़ता है, तत्पश्चात् उसकी शुद्धि १७ हो जाती है ॥ १६ - १७ ॥ 1898 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ द्वितीय खण्ड ] –16 D

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अ ० ३३ ]

पितरं मातरं चैव गुरुं भार्यां सुतं सुताम् ।

यो न पुष्णात्यनाथं च गरकुण्डं प्रयाति सः ॥

पूर्णमब्दशतं चैव तद्भोजी तत्र तिष्ठति ।

ततो व्रजेद्भूतयोनिं शतवर्षं ततः शुचिः ॥

दृष्ट्वातिथिं वक्रचक्षुः करोति यो हि मानवः ।

पितृदेवास्तस्य जलं न गृह्णन्ति च पापिनः ॥

यानि कानि च पापानि ब्रह्महत्यादिकानि च ।

इहैव लभते चान्ते दूषिकाकुण्डमाव्रजेत् ॥

पूर्णमब्दशतं चैव तद्भोजी तत्र तिष्ठति ।

ततो व्रजेद्भूतयोनिं शतवर्षं ततः शुचिः ॥

दत्त्वा द्रव्यं च विप्राय चान्यस्मै दीयते यदि ।

स तिष्ठति वसाकुण्डे तद्भोजी शतवत्सरम् ॥

कृकलासो भवेत्सोऽपि भारते सप्तजन्मसु ।

ततो भवेन्महारौद्रो दरिद्रोऽल्पायुरेव च ॥

पुमांसं कामिनी वापि कामिनीं वा पुमानथ ।

यः शुक्रं पाययत्येव शुक्रकुण्डं प्रयाति सः ॥

पूर्णमब्दशतं चैव तद्भोजी तत्र तिष्ठति ।

कृमियोनिं शताब्दं च व्रजेद्भूत्वा ततः शुचिः ॥

सन्ताड्य च गुरुं विप्रं रक्तपातं च कारयेत् ।

स च तिष्ठत्यसृक्कुण्डे तद्भोजी शतवत्सरम् ॥

ततो लभेयाघ्रजन्म सप्तजन्मसु भारते ।

ततः शुद्धिमवाप्नोति मानवश्च क्रमेण ह ॥

नवम स्कन्ध ४८५ जो मनुष्य माता, पिता, गुरु, पत्नी, पुत्र, पुत्री १८ और अनाथका भरण - पोषण नहीं करता; वह गरकुण्ड ( विषकुण्ड ) नामक नरकमें जाता है और वहाँपर उसी विषको खाते हुए वह पूरे सौ वर्षोंतक पड़ा रहता है । तदनन्तर वह सौ वर्षोंतकके १ ९ लिये भूतयोनिमें जाता है, इसके बाद वह शुद्ध होता है ॥ १८-१९ ॥ जो मनुष्य अतिथिको देखकर [ उसके प्रति २० उपेक्षाभावसे ] अपनी दृष्टिको वक्र कर लेता है, उस पापीके जलको देवता तथा पितर ग्रहण नहीं करते और ब्रह्महत्या आदि जो कुछ भी पाप हैं, उन सबका फल उसे इसी लोकमें भोगना पड़ता है । अन्तमें वह २१ दूषिकाकुण्ड नामक नरकमें जाता है और वहाँपर दूषित पदार्थोंको खाते हुए पूरे सौ वर्षोंतक निवास करता है । तत्पश्चात् सौ वर्षोंतक भूतयोनिमें रहनेके २२ अनन्तर उसकी शुद्धि हो जाती है ॥ २० - २२ ॥ यदि कोई मनुष्य ब्राह्मणको द्रव्यका दान करनेके बाद वह द्रव्य किसी अन्यको दे देता है, तो वह वसाकुण्ड नामक नरकमें जाता है और उसी २३ वसाको खाते हुए उसे सौ वर्षोंतक वहीं रहना पड़ता है । तदनन्तर उसे भारतवर्ष में सात जन्मोंतक गिरगिट होना पड़ता है । उसके बाद वह महान् २४ क्रोधी, दरिद्र तथा अल्पायु प्राणीके रूपमें जन्म लेता है ॥ २३-२४ ॥ यदि कोई स्त्री परपुरुषसे सम्बन्ध रखती है अथवा कोई पुरुष परनारीमें वीर्याधान करता है, वह २५ शुक्रकुण्ड नामक नरकमें जाता है । वहाँपर उसी वीर्यको खाते हुए उसे पूरे सौ वर्षोंतक रहना पड़ता है । इसके बाद वह सौ वर्षोंतक कीटयोनिमें रहता है, २६ । तदनन्तर शुद्ध होता है ॥ २५-२६ ॥ जो व्यक्ति गुरु अथवा ब्राह्मणको मारकर उनके शरीरसे रक्त बहाता है, वह असृक्कुण्ड नामक २७ नरकमें जाता है और उसी रक्तका पान करते हुए उसे वहाँ सौ वर्षोंतक रहना पड़ता है । तदनन्तर वह भारतवर्षमें सात जन्मोंतक व्याघ्रका जन्म प्राप्त करता है । इस प्रकार वह क्रमसे शुद्ध होता है और वह २८ फिरसे मानवयोनिमें जन्म लेता है ॥ २७-२८ ॥

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४८६ योऽश्रु तत्याज गायन्तं भक्तं दृष्ट्वा सगद्गदम् । श्रीकृष्णगुणसङ्गीते हसत्येव हि यो नरः स वसेदश्रुकुण्डे च तद्भोजी शतवर्षकम् । ततो भवेच्च चाण्डालस्त्रिजन्मनि ततः शुचिः

करोति शठतां तद्वन्नित्यं सुहृदि यो नरः ।

कुण्डं गात्रमलानां च स प्रयाति शताब्दकम् ॥

ततः स गार्दभीं योनिमवाप्नोति त्रिजन्मनि । त्रिजन्मनि च शार्गालीं ततः शुद्धो भवेद् ध्रुवम् बधिरं यो हसत्येव निन्दत्येवाभिमानतः स वसेत्कर्णविट्कुण्डे तद्भोजी शतवत्सरम् ततो भवेत्स बधिरो दरिद्रः सप्तजन्मसु सप्तजन्मन्यङ्गहीनस्ततः शुद्धिं लभेद् ध्रुवम् लोभात्स्वभरणार्थाय जीविनं हन्ति यो नरः मज्जाकुण्डे वसेत्सोऽपि तद्भोजी लक्षवत्सरम् ततो भवेच्च शशको मीनश्च सप्तजन्मसु त्रिजन्मनि वराहश्च कुक्कुटः सप्तजन्मसु एणादयश्च कर्मभ्यस्ततः शुद्धिं लभेद् ध्रुवम् स्वकन्यापालनं कृत्वा विक्रीणाति च यो नरः अर्थलोभान्महामूढो मांसकुण्डं प्रयाति सः कन्यालोमप्रमाणाब्दं तद्भोजी तत्र तिष्ठति श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ३३ भगवान् श्रीकृष्णका प्रेमपूर्वक गुणगान करनेवाले ॥ २ ९ भक्तको देखकर जो मनुष्य खेदपूर्वक आँसू बहाता है तथा उनके गुणसम्बन्धी संगीतके अवसरपर जो उपहास करता है, वह सौ वर्षोंतक अश्रुकुण्ड नामक नरकमें वास करता है और वहाँ उसी अश्रुको भोजनके ॥ ३० रूपमें उसे ग्रहण करना पड़ता है, तत्पश्चात् वह तीन जन्मोंतक चाण्डालकी योनिमें पैदा होता है, तब वह शुद्ध होता है ॥ २ ९ -३० ॥ उसी प्रकार जो मनुष्य सहृदय व्यक्तिके साथ ३१ सदा शठताका व्यवहार करता है, वह गात्रमलकुण्ड नामक नरक में जाता है और सौ वर्षोंतक वहाँ वास करता है । तदनन्तर वह तीन जन्मोंतक गर्दभ-योनिमें तथा तीन जन्मोंतक श्रृंगाल - योनिमें जन्म लेता ॥ ३२ है, इसके बाद वह निश्चित ही शुद्ध हो जाता है ॥ ३१-३२ ॥ जो मनुष्य किसी बहरेको देखकर हँसता है और अभिमानपूर्वक उसकी निन्दा करता है, वह ॥ ३३ कर्णविट्कुण्ड नामक नरकमें सौ वर्षोंतक वास करता है और वहाँ रहते हुए कानकी मैलका भोजन करता है । तत्पश्चात् वह सात जन्मोंतक दरिद्र तथा । बहरा होता है । पुनः सात जन्मोंतक अंगहीन होकर ॥ ३४ वह जन्म लेता है, तदनन्तर उसकी शुद्धि होती है ॥ ३३-३४ ॥ । जो मनुष्य लोभके वशीभूत होकर अपने भरण-पोषणके लिये जीवोंकी हत्या करता है, वह मज्जाकुण्ड ॥ ३५ नामक नरक में लाख वर्षोंतक वास करता है और वहाँपर भोजनमें उसे वही मज्जा ही मिलती है ॥ तदनन्तर वह सात जन्मोंतक खरगोश और मछली. तीन जन्मोंतक सूअर और सात जन्मोंतक कुक्कुट ॥ ३६ होकर जन्म लेता है, फिर कर्मोंके प्रभावसे वह मृग आदि योनियाँ प्राप्त करता है, तत्पश्चात् वह शुद्धि । प्राप्त कर लेता है ॥ ३५-३६३ ॥ ॥ ३७ जो मनुष्य अपनी कन्याको पाल - पोसकर धनके लोभसे उसे बेच देता है, वह महामूर्ख मांसकुण्ड नामक नरक में जाता है । उस कन्याके शरीर में । विद्यमान रोमोंकी संख्याके बराबर वर्षोंतक वह उस ॥ ३८ । नरकमें रहता है और वहाँपर उसे भोजनके रूपमें वही

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अ ० ३३ ] नवम स्कन्ध ४८७

तस्य दण्डप्रहारं च कुर्वन्ति यमकिङ्कराः ।

मांसभारं मूर्ध्नि कृत्वा रक्तभारं लिहेत्क्षुधा ॥

ततो हि भारते पापी कन्याविकृमिगो भवेत् ।

षष्टिवर्षसहस्राणि व्याधश्च सप्तजन्मसु ॥

त्रिजन्मनि वराहश्च कुक्कुटः सप्तजन्मसु ।

मण्डूको हि जलौकाश्च सप्तजन्मसु भारते ॥

सप्तजन्मसु काकश्च ततः शुद्धिं लभेद् ध्रुवम् ।

व्रतानामुपवासानां श्राद्धादीनां च सङ्गमे ॥

करोति यः क्षौरकर्म सोऽशुचिः सर्वकर्मसु ।

स च तिष्ठति कुण्डे च नखादीनाञ्च सुन्दरि ॥

तद्वैवदिनमानाब्दं तद्भोजी दण्डताडितः ।

सकेशं पार्थिवं लिङ्गं यो वार्चयति भारते ॥

स तिष्ठति केशकुण्डे मृद्रेणुमानवर्षकम् ।

तदन्ते यावनीं योनिं प्रयाति हरकोपतः ॥

शताब्दाच्छुद्धिमाप्नोति राक्षसः स भवेद् ध्रुवम् ।

पितॄणां यो विष्णुपदे पिण्डं नैव ददाति च ॥

स च तिष्ठत्यस्थिकुण्डे स्वलोमाब्दं महोल्बणे ।

ततः सुयोनिं सम्प्राप्य कुखञ्जः सप्तजन्मसु ॥

भवेन्महादरिद्रश्च ततः शुद्धो हि देहतः ।

यः सेवते महामूढो गुर्विणीं च स्वकामिनीम् ॥

प्रतप्ते ताम्रकुण्डे च शतवर्षं स तिष्ठति ।

अवीरान्नं च यो भुङ्गे ऋतुस्नातान्नमेव च ॥

मांस खाना पड़ता है । यमदूत उसपर दण्ड - प्रहार ३ ९ करते हैं । उसे मांस तथा रक्तका बोझ मस्तकपर उठाकर ढोना पड़ता है और रक्त आदिको चाटकर वह अपनी क्षुधा शान्त करता है । तत्पश्चात् वह पापी साठ हजार वर्षोंतक भारतवर्षमें उस कन्याकी विष्ठाका ४० कीड़ा बनकर रहता है । इसके बाद भारतवर्षमें सात जन्मोंतक व्याध, तीन जन्मोंतक सूअर, सात जन्मोंतक कुक्कुट, सात जन्मोंतक मेढक और जोंक तथा पुनः ४१ सात जन्मोंतक कौएकी योनि प्राप्त करता है, तत्पश्चात् वह शुद्ध होता है ॥ ३७–४१३ ॥ जो मनुष्य व्रतों, उपवासों और श्राद्धों आदिके अवसरपर क्षौरकर्म करता है, वह सम्पूर्ण कर्मोंके लिये ४२ अपवित्र हो जाता है । हे सुन्दरि! वह नख आदि कुण्डोंमें उन दिनोंकी संख्याके बराबर वर्षोंतक वास करता है, उन्हीं दुष्पदार्थोंका भक्षण करता है और ४३ डण्डोंसे पीटा जाता है ॥ ४२-४३३ ॥ जो भारतवर्ष में केशयुक्त मिट्टीसे बने पार्थिव लिंगकी पूजा करता है, वह उस मृदामें विद्यमान रजकणोंकी संख्याके बराबर वर्षोंतक केशकुण्ड ४४ नामक नरक में निवास करता है । तदनन्तर भगवान् शिवके कोपके कारण वह यवनयोनिमें जन्म लेता है और फिर वह राक्षसयोनिमें जन्म ग्रहण करता है ४५ तथा सौ वर्षके पश्चात् उसकी शुद्धि हो जाती है ॥ ४४-४५३ ॥ जो मनुष्य विष्णुपदतीर्थ ( गयातीर्थ ) - में पितरोंको पिण्ड नहीं देता, वह अपने शरीरके ४६ रोमोंकी संख्याके बराबर वर्षोंतक अस्थिकुण्ड नामक अत्यन्त भयानक कुण्डमें वास करता है । तत्पश्चात् वह मानवयोनि प्राप्तकर सात जन्मोंतक लँगड़ा तथा ४७ महान् दरिद्र होता है । तत्पश्चात् उसकी देहशुद्धि हो जाती है ॥ ४६-४७ ॥ महामूर्ख मनुष्य अपनी गर्भवती स्त्रीके साथ ४८ सहवास करता है, वह सौ वर्षोंतक अत्यन्त तपते हुए ताम्रकुण्ड नामक नरकमें निवास करता है ॥ ४८ ॥

जो व्यक्ति पति - पुत्रहीन स्त्री तथा ऋतुस्नाता स्त्रीका अन्न खाता है, वह जलते हुए लोहकुण्ड ४ ९ नामक नरक में सौ वर्षोंतक रहता है । इसके बाद वह

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४८८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ३३

लोहकुण्डे शताब्दं च स च तिष्ठति तप्तके ।

स व्रजेद्रजकीं योनिं काकानां सप्तजन्मसु ॥

महाव्रणी दरिद्रश्च ततः शुद्धो भवेन्नरः ।

यो हि चर्माक्तहस्तेन देवद्रव्यमुपस्पृशेत् ॥

शतवर्षप्रमाणं च चर्मकुण्डे स तिष्ठति ।

यः शूद्रेणाभ्यनुज्ञातो भुङ्गे शूद्रान्नमेव च ॥

स च तप्तसुराकुण्डे शताब्दं तिष्ठति द्विजः ।

ततो भवेच्छूद्रयाजी ब्राह्मणः सप्तजन्मसु ॥

शूद्रश्राद्धान्नभोजी च ततः शुद्धो भवेद् ध्रुवम् ।

वाग्दुष्टः कटुको वाचा ताडयेत्स्वामिनं सदा ॥

तीक्ष्णकण्टककुण्डे स तद्भोजी तत्र तिष्ठति ।

ताडितो यमदूतेन दण्डेन च चतुर्गुणम् ॥

ततः उच्चैःश्रवाः सप्तजन्मस्वेव ततः शुचिः ।

विषेण जीवनं हन्ति निर्दयो यो हि मानवः ॥

विषकुण्डे च तद्भोजी सहस्त्राब्दं च तिष्ठति ।

ततो भवेन्नृघाती च व्रणी च शतजन्मसु ॥

सप्तजन्मसु कुष्ठी च ततः शुद्धो भवेद् ध्रुवम् ।

दण्डेन ताडयेद् गां हि वृषञ्च वृषवाहकः ॥

भृत्यद्वारा स्वतन्त्र वा पुण्यक्षेत्रे च भारते ।

प्रतप्ते तैलकुण्डेऽग्नौ तिष्ठति स्म चतुर्युगम् ॥

गवां लोमप्रमाणाब्दं वृषो भवति तत्परम् ।

कुन्तेन हन्ति यो जीवं वह्निलोहेन हेलया ॥

सात जन्मोंतक रजक तथा कौएकी योनि पाता है । ५० उस समय वह दरिद्र रहता है और विशाल घावोंसे युक्त रहता है, तदनन्तर वह मनुष्य शुद्ध हो जाता है ॥ ४ ९ -५०३ ॥ जो व्यक्ति चर्मसे स्पर्शित हाथके द्वारा देवद्रव्यका ५१ स्पर्श करता है, वह सौ वर्षोंतक चर्मकुण्ड नामक नरकमें वास करता है ॥ ५११ ॥

ब्राह्मण किसी शूद्र स्वीकृति प्राप्तकर उसका ५२ अन्न खाता है, वह तप्तसुराकुण्ड नामक नरक में सौ वर्षोंतक वास करता है । तत्पश्चात् वह सात जन्मोंतक शूद्रयाजी ( शूद्रोंका यज्ञ करानेवाला ) ब्राह्मण होता है और शूद्रोंका श्राद्धान्न ग्रहण करता है, तदनन्तर वह ५३ अवश्य ही शुद्ध हो जाता है ॥ ५२-५३३ ॥ जो कटुभाषी मनुष्य कठोर वचनके द्वारा अपने स्वामीको सदा पीडित करता रहता है, वह ५४ तीक्ष्णकण्टककुण्ड नामक नरकमें वास करता है और उसे वहाँपर कण्टक ही खानेको मिलते हैं । यमदूतके द्वारा डंडेसे वह चार गुना ताडित किया जाता है । उसके बाद वह सात जन्मतक ५५ अश्वकी योनि प्राप्त करता है, फिर वह शुद्ध हो जाता है॥५४-५५३ ॥ जो दयाहीन मनुष्य विषके द्वारा किसी प्राणीकी ५६ हत्या करता है, वह हजार वर्षोंतक विषकुण्ड नामक नरक में रहता है और वहाँपर उसे उसी विषका भोजन करना पड़ता है । उसके बाद वह नरघाती सात जन्मोंतक बड़े - बड़े घावोंसे युक्त तथा सात जन्मोंतक ५७ कोढ़से ग्रस्त रहता है, तत्पश्चात् वह अवश्य ही शुद्ध हो जाता है ॥ ५६-५७३ ॥ पुण्यक्षेत्र भारतवर्षमें जो वृषवाहक गायको और ५८ बैलको डण्डेसे स्वयं मारता है अथवा सेवकके द्वारा मरवाता है, उसे चार युगोंतक तपते हुए तैलकुण्ड नामक नरकमें वास करना पड़ता है और तत्पश्चात् उस गायके शरीरमें जितने रोएँ होते हैं, उतने वर्षोंतक ५ ९ उसे बैल होना पड़ता है॥५८-५९ ३ ॥ हे साध्वि! जो मनुष्य भालेसे अथवा अग्निमें तपाये गये लोहेसे किसी प्राणीकी उपेक्षापूर्वक हत्या ६० | कर देता है, वह दस हजार वर्षोंतक कुन्तकुण्ड

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अ ० ३३ ] नवम स्कन्ध ४८ ९ कुन्तकुण्डे वसेत्सोऽपि वर्षाणामयुतं सति ततः सुयोनिं सम्प्राप्य चोदरे व्याधिसंयुतः जन्मनैकेन क्लेशेन ततः शुद्धो भवेन्नरः यो भुङ्क्ते च वृथा मांसं मांसलोभी द्विजाधमः हरेरनैवेद्यभोजी कृमिकुण्डं प्रयाति सः । स्वलोममानवर्षं च तद्भोजी तत्र तिष्ठति ततो भवेन्म्लेच्छजातिस्त्रिजन्मनि ततो द्विजः ब्राह्मणः शूद्रयाजी च शूद्र श्राद्धान्नभोजकः शूद्राणां शवदाही च पूयकुण्डे वसेद् ध्रुवम् । यावल्लोमप्रमाणाब्दं यमदण्डेन सुव्रते ताडितो यमदूतेन तद्भोजी तत्र तिष्ठति ततो भारतमागत्य स शूद्रः सप्तजन्मसु महारोगी दरिद्रश्च बधिरो मूक एव च कृष्णं पद्मं च के यस्य तं सर्पं हन्ति यो नरः स्वलोममानवर्षं च सर्पकुण्डं प्रयाति सः सर्पेण भक्षितः सोऽथ यमदूतेन ताडितः वसेच्च सर्पविड्भोजी ततः सर्पो भवेद् ध्रुवम् ततो भवेन्मानवश्च स्वल्पायुर्दद्रुसंयुतः महाक्लेशेन तन्मृत्युः सर्पेण भक्षिताद् ध्रुवम् विधिप्रदत्तजीव्यांश्च क्षुद्रजन्तूंश्च हन्ति यः । नामक नरकमें वास करता है । तत्पश्चात् उत्तम ॥ ६१ मानवयोनिमें जन्म प्राप्त करके वह उदररोगसे पीडित होता है I । इस प्रकार एक ही जन्ममें कष्ट भोगनेके पश्चात् वह मनुष्य शुद्ध हो जाता । है ॥ ६०-६१३ ॥ ॥ ६२ जो अधम द्विज भगवत्प्रसादका त्याग करके मांसस्वादके लोभसे व्यर्थ ही मांस भक्षण करता है, वह कृमिकुण्डमें जाता है । वहाँ अपने शरीरके रोमोंकी संख्याके समान वर्षोंतक रोमका ही ॥ ६३ । भक्षण करता हुआ वह पड़ा रहता है । फिर तीन जन्मोंतक म्लेच्छ जातिमें जन्म लेकर पुनः द्विज होता है॥६२-६३३ ॥ । जो ब्राह्मण शूद्रोंका यज्ञ कराता है, शूद्रोंका ॥ ६४ श्राद्धान्न खाता है तथा शूद्रोंका शव जलाता है, वह अपने शरीरमें जितने रोएँ हैं; उतने वर्षोंतक पूर्यकुण्ड नामक नरकमें अवश्य वास करता है । हे सुव्रते! वह उस नरकमें यमदूतके द्वारा यमदण्डसे पीटा जाता है ॥ ६५ तथा पीवका भोजन करते हुए पड़ा रहता है । तत्पश्चात् वह भारतवर्षमें जन्म लेकर सात जन्मोंतक । शूद्र रहता है । उस समय वह अत्यन्त रोगी, दरिद्र, बहरा तथा गूँगा रहता है ॥ ६४-६६३ ॥ ॥ ६६ कृष्णवर्णवाले तथा जिसके मस्तकपर कमल-चिह्न विद्यमान हो, उस सर्पको जो मनुष्य मारता । है, वह अपने शरीरके रोमोंकी संख्याके बराबर वर्षों तक के लिये सर्पकुण्ड नामक नरकमें जाता है । ॥ ६७ उसे वहाँपर सर्प काटते हैं तथा यमदूत उसे पीटते हैं । सर्पकी विष्ठा खाते हुए वह उस नरकमें वास करता । है । तत्पश्चात् उसे निश्चय ही सर्पयोनि प्राप्त होती ॥ ६८ है । तदनन्तर वह मानवयोनि प्राप्त करता है, उस समय वह दाद आदि रोगोंसे युक्त तथा अल्प आयुवाला होता है । उसके बाद सर्पके काटनेसे । अत्यन्त कष्टपूर्वक उसकी मृत्यु होती है, यह निश्चित ॥ ६ ९ | है ॥ ६७–६९ ३ ॥ ब्रह्माके विधानके अनुसार रक्तपान आदिपर जीवित रहनेवाले [ मच्छर आदि ] क्षुद्र जन्तुओंको जो । व्यक्ति मारता है, वह उन जन्तुओंकी संख्याके बराबर ॥ ७० । वर्षोंतक दंशकुण्ड और मशककुण्ड नामक नरकमें

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४ ९ ०

स दंशमशयोः कुण्डे जन्तुमानाब्दमेव च ।

दिवानिशं भक्षितस्तैरनाहारश्च शब्दवान् ॥

हस्तपादादिबद्धश्च यमदूतेन ताडितः ।

ततो भवेत्क्षुद्रजन्तुर्जातिश्च यावनी भवेत् ॥

ततो भवेन्मानवश्च सोऽङ्गहीनस्ततः शुचिः । यो मूढो मधुमश्नाति हत्वा च मधुमक्षिकाः

स एव गारले कुण्डे जीवमानाब्दकं वसेत् ।

भक्षितो गरलैर्दग्धो यमदूतेन ताडितः ॥

ततो हि मक्षिकाजातिस्ततः शुद्धो भवेन्नरः ।

दण्डं करोत्यदण्ड्ये च विप्रे दण्डं करोति च ॥

स कुण्डं वज्रदंष्ट्राणां कीटानां याति सत्वरम् ।

स तल्लोमप्रमाणाब्दं तत्र तिष्ठत्यहर्निशम् ॥

शब्दकृद्भक्षितस्तैस्तु यमदूतेन ताडितः ।

करोति रोदनं भद्रे हाहाकारं क्षणे क्षणे ॥

पुनः सूकरयोनौ च जायते सप्तजन्मसु ।

त्रिजन्मनि काकयोनौ ततः शुद्धो भवेन्नरः ॥

अर्थलोभेन यो मूढः प्रजादण्डं करोति सः ।

वृश्चिकानां च कुण्डं च तल्लोमाब्दं वसेद् ध्रुवम् ॥

ततो वृश्चिकजातिश्च सप्तजन्मसु भारते ।

ततो नरश्चाङ्गहीनो व्याधिशुद्धो भवेद् ध्रुवम् ॥

श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ३३ निवास करता है । वे जन्तु उसे दिन - रात काटते ७१ रहते हैं, उसे वहाँ खानेको कुछ भी नहीं मिलता और वह जोर - जोरसे रोता - चिल्लाता रहता है । यमदूत उसके हाथ - पैर बाँधकर उसे पीटते हैं । तत्पश्चात् वह उन्हीं क्षुद्र जन्तुओंकी योनिमें जाता है और पुनः ७२ यवनजातिमें जन्म लेता है । तदनन्तर वह अंगहीन मानव होकर जन्म लेता है, तब उसकी शुद्धि हो जाती है ॥ ७०- –७२३ ॥ जो मूर्ख मनुष्य मधुमक्खियोंको मारकर मधुका ॥ ७३ भक्षण करता है, वह उन मारी गयी मक्खियों की संख्याके बराबर वर्षोंतक गरलकुण्डमें वास करता है वहाँपर उसे मधुमक्खियाँ काटती रहती हैं, वह सदा ७४ विषसे जलता रहता है और यमदूत उसे पीटते रहते हैं । उसके बाद वह मक्खियोंकी योनिमें जन्म लेता है, तदनन्तर उसकी शुद्धि होती है । ७३-७४३ ॥ जो मनुष्य किसी विप्रको अथवा दण्ड न ७५ देनेयोग्य किसी व्यक्तिको दण्डित करता है, वह वज्रके समान दाँतोंवाले भयानक जन्तुओंसे भरे वज्रदंष्ट्रकुण्ड नामक नरकमें शीघ्र ही जाता है । उस दण्डित व्यक्ति शरीरमें जितने रोम होते हैं; उतने ७६ वर्षोंतक वह उस नरकमें निवास करता है । उसे नरकके वे कीड़े दिन - रात काटते रहते हैं और वह चीखता - चिल्लाता है । हे भद्रे! यमदूत उसे सदा पीटते रहते हैं, जिससे वह रोता है और प्रतिक्षण ७७ हाहाकार करता रहता है । तदनन्तर वह सात जन्मों क सूअरकी योनिमें और तीन जन्मोंतक कौवेकी योनिमें उत्पन्न होता है, उसके बाद वह मनुष्य शुद्ध हो जाता है ॥ ७५–७८ ॥ ७८ जो मूर्ख धनके लोभसे प्रजाको दण्ड देता है, वह वृश्चिककुण्ड नामक नरकमें जाता है और उस प्रजाके शरीर में जितने रोएँ होते हैं, उतने वर्षोंतक उस ७ ९ नरकमें वास करता है । तत्पश्चात् सात जन्मोंतक वह भारतवर्षमें बिच्छुओंकी योनिमें जन्म लेता है । इसके पश्चात् मनुष्ययोनिमें जन्म प्राप्त करता है तथा अंगहीन और रोगी होकर वह शुद्ध हो जाता है— ८० | यह सत्य है ॥७ ९ -८० ॥

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अ ० ३३ ] नवम

ब्राह्मणः शस्त्रधारी यो ह्यन्येषां धावको भवेत् ।

सन्ध्याहीनश्च यो विप्रो हरिभक्तिविहीनकः ॥ ८१

स तिष्ठति स्वलोमाब्दं कुण्डेषु च शरादिषु ।

विद्धः शरादिभिः शश्वत्ततः शुद्धो भवेन्नरः ॥ ८२

कारागारे सान्धकारे प्रणिहन्ति प्रजाश्च यः ।

प्रमत्तः स्वस्य दोषेण गोलकुण्डं प्रयाति सः ॥ ८३

स पङ्कतप्ततोयाक्तं सान्धकारं भयङ्करम् ।

तीक्ष्णदंष्ट्रैश्च कीटैश्च संयुक्तं गोलकुण्डकम् ॥ ८४

कीटैर्विद्धो वसेत्तत्र प्रजालोमाब्दमेव च ।

ततो भवेत्प्रजाभृत्यस्ततः शुद्धो भवेत्क्रमात् ॥ ८५

सरोवरादुत्थितश्च नक्रादीन्हन्ति यो नरः ।

नक्रकण्टकमानाब्दं नक्रकुण्डं प्रयाति सः ॥ ८६

ततो नक्रादिजातीयो भवेन्नक्रादिषु ध्रुवम् ।

ततः सद्यो विशुद्धो हि दण्डेनैव पुनः पुनः ॥ ८७

वक्षः श्रोणीस्तनास्यञ्च यः पश्यति परस्त्रियाः ।

कामेन कामुको यो हि पुण्यक्षेत्रे च भारते ॥ ८८

स वसेत्काककुण्डे च काकैः संचूर्णलोचनः ।

ततः स्वलोममानाब्दं भवेद्दग्धस्त्रिजन्मनि ॥ ८ ९

स्वर्णस्तेयी च यो मूढो भारते सुरविप्रयोः ।

स च मन्थानकुण्डे वै स्वलोमाब्दं वसेद् ध्रुवम् ॥ ९ ०

स्कन्ध ४ ९ १ जो ब्राह्मण शस्त्र लेकर दूसरे लोगोंके लिये दूतका काम करता है, जो विप्र सन्ध्या - वन्दन नहीं करता तथा जो भगवान् श्रीहरिकी भक्तिसे विमुख है, वह शर आदिके कुण्डोंमें ( शरकुण्ड, शूलकुण्ड, खड्गकुण्ड आदिमें ) अपने शरीरके रोमोंकी संख्याके बराबर वर्षोंतक निवास करता है । वह वहाँपर निरन्तर शर आदि बेधा जाता है, इसके पश्चात् वह मनुष्य शुद्ध हो जाता है ॥ ८१-८२ ॥ अभिमानमें चूर रहनेवाला जो व्यक्ति अन्धकारपूर्ण कारागारमें प्रजाओंको मारता पीटता है, वह अपने इस दोषके प्रभावसे गोलकुण्ड नामक नरकमें जाता है । वह गोलकुण्ड प्रतप्त कीचड़ तथा जलसे युक्त, अन्धकारपूर्ण, अत्यन्त भयंकर तथा तीखे दाँतोंवाले कीटोंसे परिपूर्ण है । उन कीड़ोंसे सदा काटा जाता हुआ वह व्यक्ति प्रजाओंके शरीरमें विद्यमान रोमोंकी संख्याके बराबर वर्षोंतक उस नरकमें निवास करता है । तत्पश्चात् मनुष्यका जन्म पाकर वह उन प्रजाओंका सेवक बनता है, इस प्रकार क्रमसे वह शुद्ध हो जाता है । ८३–८५ ॥ जो मनुष्य सरोवरसे निकले हुए नक्र आदि जल - जन्तुओंकी हत्या करता है, वह नक्रकुण्ड नामक नरकमें जाता है और वहाँ उस नक्रके शरीरमें विद्यमान काँटोंकी संख्याके बराबर वर्षोंतक निवास करता है । तत्पश्चात् वह निश्चितरूपसे नक्र आदि योनियोंमें जन्म लेता है और बार - बार दण्ड पानेपर शीघ्र ही उसकी शुद्धि हो जाती है ॥ ८६-८७ ॥ जो मनुष्य पुण्यक्षेत्र भारतवर्षमें जन्म लेकर कामवासनाके वशीभूत हो परायी स्त्रीका वक्ष, नितम्ब, स्तन तथा मुख देखता है; वह अपने शरीरके रोमोंकी संख्याके बराबर वर्षोंतक काककुण्ड नामक नरकमें वास करता है । वहाँ कौवे उसकी आँखें नोचते रहते हैं । तत्पश्चात् वह तीन जन्मोंतक संतप्त होता रहता है ॥ ८८-८९ ॥ जो मूढ भारतवर्षमें जन्म पाकर देवता तथा ब्राह्मणका स्वर्ण चुराता है, वह अपने शरीरके रोमोंकी संख्याके बराबर वर्षोंतक मन्थानकुण्ड नामक नरकमें अवश्य वास करता है । यमदूत उसकी आँखोंपर पट्टी