देवी भागवत उत्तरार्द्ध — पृष्ठ 611–620

देवी भागवत उत्तरार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 611–620

पृष्ठ 611

देवी भागवत उत्तरार्द्ध, पृष्ठ 611 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

६०२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ५०

य एवं पूजयेद्देवीं राधां रासेश्वरीं पराम् ।

स भवेद्विष्णुतुल्यस्तु गोलोकं याति सन्ततम् ॥ ४१

यः कार्तिक्यां पौर्णमास्यां राधाजन्मोत्सवं बुधः ।

कुरुते तस्य सान्निध्यं दद्याद्रासेश्वरी परा ॥ ४२ ।

केनचित्कारणेनैव राधा वृन्दावने वने ।

वृषभानुसुता जाता गोलोकस्थायिनी सदा ॥ ४३

अत्रोक्तानां तु मन्त्राणां वर्णसंख्याविधानतः ।

पुरश्चरणकर्मोक्तं दशांशं होममाचरेत् ॥ ४४

तिलैस्त्रिस्वादुसंयुक्तैर्जुहुयाद्भक्तिभावतः I नारद उवाच स्तोत्रं वद मुने सम्यग्येन देवी प्रसीदति ॥। ४५ श्रीनारायण उवाच

नमस्ते परमेशानि रासमण्डलवासिनि ।

रासेश्वरि नमस्तेऽस्तु कृष्णप्राणाधिकप्रिये ॥ ४६ ।

नमस्त्रैलोक्यजननि प्रसीद करुणार्णवे ।

ब्रह्मविष्ण्वादिभिर्देवैर्वन्द्यमानपदाम्बुजे ॥ ४७

नमः सरस्वतीरूपे नमः सावित्रि शङ्करि ।

गङ्गापद्मावतीरूपे षष्ठि मङ्गलचण्डिके ॥ ४८

नमस्ते तुलसीरूपे नमो लक्ष्मीस्वरूपिणि ।

नमो दुर्गे भगवति नमस्ते सर्वरूपिणि ॥ ४ ९

मूलप्रकृतिरूपां त्वां भजामः करुणार्णवाम् । संसारसागरादस्मानुद्धराम्ब दयां दयां कुरु ॥५०

इदं स्तोत्रं त्रिसन्ध्यं यः पठेद्राधां स्मरन्नरः ।

न तस्य दुर्लभं किञ्चित्कदाचिच्च भविष्यति ॥ ५१

देहान्ते च वसेन्नित्यं गोलोके रासमण्डले ।

इदं रहस्यं परमं न चाख्येयं तु कस्यचित् ॥ ५२ ।

जो मनुष्य इस विधि रासेश्वरी परात्परा राधिकाकी पूजा करता है, वह विष्णुतुल्य हो जाता है और गोलोकमें जाकर सदा वास करता है ॥ ४१ ॥

जो बुद्धिमान् पुरुष कार्तिकपूर्णिमा तिथिको भगवती श्रीराधाका जन्मोत्सव मनाता है, उसे रासेश्वरी परमा श्रीराधिका अपना सान्निध्य प्रदान कर देती हैं ॥ ४२ ॥

गोलोक सदा निवास करनेवाली भगवती श्रीराधा किसी कारण से ही वृन्दावनमें वृषभानुकी पुत्रीके रूपमें आविर्भूत हुईं ॥ ४३ ॥

यहाँ कहे गये मन्त्रोंकी वर्णसंख्याके अनुसार पुरश्चरण - क्रिया बतायी गयी है । इसमें जपे गये मन्त्रके दशांशसे हवन करना चाहिये, भक्ति - भावपूर्वक दुग्ध, मधु और घृत – इन तीन मधुर पदार्थोंसे मिश्रित तिलोंसे आहुति प्रदान करनी चाहिये ॥ ४४३ ॥

नारदजी बोले - हे मुने! अब आप वह स्तोत्र बताइये, जिससे भगवती श्रीराधिका भलीभाँति प्रसन्न हो जाती हैं ॥ ४५ ॥

श्रीनारायण बोले – - [ स्तोत्र इस प्रकार है - ] रासमण्डलमें निवास करनेवाली हे परमेश्वरि! आपको नमस्कार है । कृष्णको प्राणोंसे भी अधिक प्रिय हे रासेश्वरि! आपको नमस्कार है ॥ ४६ ॥ ब्रह्मा, विष्णु

आदि देवताओंके द्वारा वन्दित चरणकमलवाली हे त्रैलोक्यजननि! आपको नमस्कार है । हे करुणार्णवे! आप मुझपर प्रसन्न होइये ॥ ४७ ॥ हे सरस्वतीरूपे! आपको

नमस्कार है । हे सावित्रि! हे शंकरि! हे गंगा - पद्मावतीरूपे! हे षष्ठि! हे मंगलचण्डिके! आपको नमस्कार है ॥ ४८ ॥

हे तुलसीरूपे! आपको नमस्कार है । हे लक्ष्मीस्वरूपिणि! आपको नमस्कार है । हे दुर्गे! हे भगवति! आपको नमस्कार है । हे सर्वरूपिणि! आपको नमस्कार है ॥ ४ ९ ॥ अम्ब! मूलप्रकृतिस्वरूपिणी तथा करुणासिन्धु आप भगवतीकी हम उपासना करते हैं, संसारसागरसे हमारा उद्धार कीजिये, दया कीजिये ॥ ५० ॥

जो मनुष्य तीनों कालों ( प्रातः, मध्याह्न, सायं ) -में श्रीराधिकाका स्मरण करते हुए इस स्तोत्रका पाठ करता है, उसके लिये कोई भी वस्तु कभी भी दुर्लभ नहीं रहती । वह देह त्यागके अनन्तर गोलोकमें रासमण्डलमें निरन्तर निवास करता है । [ हे मुने! ]

पृष्ठ 612

देवी भागवत उत्तरार्द्ध, पृष्ठ 612 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अ ० ५० ]

अधुना शृणु विप्रेन्द्र दुर्गादेव्या विधानकम् ।

यस्याः स्मरणमात्रेण पलायन्ते महापदः ॥

एनां न भजते यो हि तादृङ्नास्त्येव कुत्रचित् ।

सर्वोपास्या सर्वमाता शैवी शक्तिर्महाद्भुता ॥

सर्वबुद्ध्यधिदेवीयमन्तर्यामिस्वरूपिणी दुर्गसङ्कटहन्त्रीति दुर्गेति प्रथिता भुवि ॥

वैष्णवानां च शैवानामुपास्येयं च नित्यशः ।

मूलप्रकृतिरूपा सा सृष्टिस्थित्यन्तकारिणी ॥

तस्या नवाक्षरं मन्त्रं वक्ष्ये मन्त्रोत्तमोत्तमम् ।

वाग्भवं शम्भुवनिता कामबीजं ततः परम् ॥

चामुण्डायै पदं पश्चाद्विच्चे इत्यक्षरद्वयम् ।

नवाक्षरो मनुः प्रोक्तो भजतां कल्पपादपः ॥

ब्रह्मविष्णुमहेशाना ऋषयोऽस्य प्रकीर्तिताः । छन्दांस्युक्तानि सततं गायत्र्युष्णिगनुष्टुभः महाकाली महालक्ष्मीः सरस्वत्यपि देवताः । स्याद्रक्तदन्तिकाबीजं दुर्गा च भ्रामरी तथा नन्दाशाकम्भरीदेव्यौ भीमा च शक्तयः स्मृताः । धर्मार्थकाममोक्षेषु विनियोग उदाहृतः ऋषिच्छन्दो दैवतानि मौलौ वक्त्रे हृदि न्यसेत् । स्तनयोः शक्तिबीजानि न्यसेत्सर्वार्थसिद्धये नवम स्कन्ध ६०३ इस परम रहस्यको किसीके समक्ष प्रकाशित नहीं ५३ करना चाहिये ॥ ५१-५२ ॥ हे विप्रवर! अब आप उन भगवती दुर्गाका पूजा - -1 विधान सुनिये, जिनके स्मरणमात्रसे घोर विपत्तियाँ भाग जाती हैं ॥ ५३ ॥

५४ जो इन भगवती दुर्गाकी उपासना नहीं करता हो, वैसा कोई मनुष्य कहीं नहीं है । ये भगवती सबकी उपास्या, सभी प्राणियोंकी जननी तथा अत्यन्त अद्भुत शैवी शक्ति हैं । ये समस्त प्राणियोंकी बुद्धिकी ५५ अधिष्ठात्री देवी तथा अन्तर्यामीस्वरूपिणी हैं । ये घोर संकटसे रक्षा करती हैं, अतः जगत्में ' दुर्गा ' नामसे

विख्यात हैं । ५४-५५ ॥

सभी वैष्णवों तथा शैवोंकी ये सदा उपास्य हैं । ५६ मूल प्रकृतिरूपिणी हैं और जगत्का सृजन, पालन तथा संहार करनेवाली हैं ॥ ५६ ॥

[ हे नारद! ] अब मैं उन भगवती दुर्गाके उत्तमोत्तम ५७ नवाक्षर मन्त्रका वर्णन करूँगा । सरस्वतीबीज ( ऐं ), भुवनेश्वरीबीज ( ह्रीं ) और कामबीज ( क्लीं ) -इन तीनोंका आदिमें क्रमशः प्रयोग करनेके बाद ' चामुण्डायै ' – इस पदको लगानेके अनन्तर ' विच्चे ' ५८ इन दो अक्षरोंको जोड़ देनेपर बना हुआ ' ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ' - – यह नवाक्षर मन्त्र कहा गया है, जो जप करनेवाले मनुष्यके लिये कल्पवृक्षके समान है ॥ ५७-५८ ॥ ॥ ५ ९ ब्रह्मा, विष्णु और शिव इस मन्त्रके ऋषि कहे गये हैं । गायत्री, उष्णिक् और अनुष्टुप् – ये तीनों इस मन्त्रके छन्द कहे गये हैं । महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती इस मन्त्रकी देवता हैं । रक्तदन्तिका, दुर्गा ॥ ६० तथा भ्रामरी - इस मन्त्रके बीज हैं । नन्दा, शाकम्भरी और भीमा -ये देवियाँ इस मन्त्रकी शक्तियाँ कही गयी हैं ॥५ ९ -६० ॥ ॥ ६१ धर्म, अर्थ, काम और मोक्षकी प्राप्तिके लिये इस मन्त्रका विनियोग किया जाता है । ऋषि, छन्द और देवताका क्रमशः मस्तकपर, मुखमें और हृदयमें न्यास करना चाहिये । सर्वार्थसिद्धिके लिये दोनों स्तनोंमें ॥ ६२ शक्तिबीजोंका न्यास करना चाहिये ॥ ६१-६२ ॥

पृष्ठ 613

देवी भागवत उत्तरार्द्ध, पृष्ठ 613 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

६०४ बीजत्रयैश्चतुर्भिश्च द्वाभ्यां सर्वेण चैव हि । षडङ्गानि मनोः कुर्याज्जातियुक्तानि देशिकः

शिखायां लोचनद्वन्द्वे श्रुतिनासाननेषु च ।

गुदे न्यसेन्मन्त्रवर्णान्सर्वेण व्यापकं चरेत् ॥

खड्गचक्रगदाबाणचापानि परिघं तथा ।

शूलं भुशुण्डीं च शिरः शङ्खं सन्दधतीं करैः ॥

महाकालीं त्रिनयनां नानाभूषणभूषिताम् ।

नीलाञ्जनसमप्रख्यां दशपादाननां भजे ॥

मधुकैटभनाशार्थं यां तुष्टावाम्बुजासनः ।

एवं ध्यायेन्महाकालीं कामबीजस्वरूपिणीम् ॥

अक्षमालां च परशुं गदेषुकुलिशानि च ।

पद्मं धनुष्कुण्डिकां च दण्डं शक्तिमसिं तथा ॥

चर्माम्बुजं तथा घण्टां सुरापात्रं च शूलकम् ।

पाशं सुदर्शनं चैव दधतीमरुणप्रभाम् ॥

रक्ताम्बुजासनगतां मायाबीजस्वरूपिणीम् ।

महालक्ष्मीं भजेदेवं महिषासुरमर्दिनीम् ॥

घण्टाशूले हलं शङ्खं मुसलं च सुदर्शनम् ।

धनुर्बाणान् हस्तपद्यैर्दधानां कुन्दसन्निभाम् ॥

शुम्भादिदैत्यसंहर्त्री वाणीबीजस्वरूपिणीम् ।

महासरस्वतीं ध्यायेत्सच्चिदानन्दविग्रहाम् ॥

यन्त्रमस्याः शृणु प्राज्ञ त्र्यस्त्रं षट्कोणसंयुतम् ।

ततोऽष्टदलपद्मं च चतुर्विंशतिपत्रकम् ॥

भूगृहेण समायुक्तं यन्त्रमेवं विचिन्तयेत् ।

शालग्रामे घटे वापि यन्त्रे वा प्रतिमासु वा ॥

श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ५० ऐं, ह्रीं क्लीं - तीन बीजमन्त्रों, चार वर्णोंवाले ॥ ६३ चामुण्डायै, दो वर्णोंवाले विच्चेके साथ तथा पूरे मन्त्रके साथ क्रमशः नमः स्वाहा, वषट्, हुम्, वौषट् और फट् – इन छः जातिसंज्ञक वर्णोंको लगा साधकको शिखा, दोनों नेत्र, दोनों कान, नासिका, ६४ मुख और गुदा आदि छ: स्थानोंमें न्यास करना चाहिये; साथ ही सम्पूर्ण मन्त्रसे [ सिरसे लेकर पैरतक ] व्यापक न्यास करना चाहिये ॥ ६३-६४ ॥ ६५ [ महाकालीका ध्यान – ] ' हाथोंमें खड्ग, चक्र, गदा, बाण, धनुष, परिघ, शूल, भुशुण्डि, कपाल तथा शंख धारण करनेवाली; नानाविध आभूषणोंसे अलंकृत; ६६ नीलांजनके समान कान्तिवाली; दस चरणों तथा दस मुखवाली एवं तीन नेत्रोंवाली भगवती महाकालीकी मैं आराधना करता हूँ, जिनका स्तवन कमलासन ब्रह्माजीने मधु और कैटभका वध करनेके लिये किया ६७ था ' – इस प्रकार कामबीजस्वरूपिणी भगवती महाकालीका ध्यान करना चाहिये ॥ ६५–६७ ॥ [ महालक्ष्मीका ध्यान— - ] ' जो अपने हाथों में ६८ अक्षमाला, परशु, गदा, बाण, वज्र, पद्म, धनुष, कुण्डिका, दण्ड, शक्ति, खड्ग, ढाल, कमल, घण्टा, मधुपात्र, शूल, पाश और सुदर्शनचक्र धारण करती हैं; जो अरुण ६ ९ प्रभावाली हैं; रक्त कमलके आसनपर विराजमान हैं तथा मायाबीजस्वरूपिणी हैं ' - इस तरहसे महिषासुरमर्दिनी उन महालक्ष्मीका ध्यान करना चाहिये ॥ ६८–७० ॥ [ महासरस्वतीका ध्यान - ] ' जो अपने कर-७० कमलोंमें घण्टा, शूल, हल, शंख, मुसल, सुदर्शनचक्र, धनुष तथा बाण धारण करती हैं; कुन्दके समान मनोहर कान्तिवाली हैं; शुम्भ आदि दैत्योंका संहार ७१ करनेवाली हैं; सच्चिदानन्द - विग्रहसे सम्पन्न हैं तथा वाणीबीजस्वरूपिणी हैं'– उन भगवती महासरस्वतीका ध्यान करना चाहिये ॥ ७१-७२ ॥ ७२ हे प्राज्ञ! अब इन भगवतीके यन्त्रके विषयमें सुनिये । तीन अस्त्रोंवाला तथा छः कोणोंसे युक्त यन्त्र होना चाहिये, उसके चारों ओर अष्टदलकमल हो और कमलमें चौबीस पंखुड़ियाँ विद्यमान हों, वह ७३ यन्त्र भूगृहसे सम्पन्न हो — इस प्रकारके यन्त्रके विषयमें चिन्तन करना चाहिये ॥ ७३३ ॥

एकाग्रचित्त होकर शालग्राम, कलश, यन्त्र, प्रतिमा, ७४ | बाणलिंग अथवा सूर्यमें भगवतीकी भावना करके उनका

पृष्ठ 614

देवी भागवत उत्तरार्द्ध, पृष्ठ 614 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अ ० ५० ] नवमं

बाणलिङ्गेऽथवा सूर्ये यजेद्देवीमनन्यधीः ।

जयादिशक्तिसंयुक्ते पीठे देवीं प्रपूजयेत् ॥ ७५

पूर्वकोणे सरस्वत्या सहितं पद्मजं यजेत् ।

श्रिया सह हरिं तत्र नैर्ऋते कोणके यजेत् ॥ ७६

पार्वत्या सहितं शम्भुं वायुकोणे समर्चयेत् ।

देव्या उत्तरतः पूज्यः सिंहो वामे महासुरम् ॥ ७७

महिषं पूजयेदन्ते षट्कोणेषु यजेत्क्रमात् ।

नन्दजां रक्तदन्तां च तथा शाकम्भरीं शिवाम् ॥ ७८

दुर्गां भीमां भ्रामरीं च ततो वसुदलेषु च ।

ब्राह्मीं माहेश्वरीं चैव कौमारीं वैष्णवीं तथा ॥ ७ ९

वाराहीं नारसिंहीं च ऐन्द्रीं चामुण्डकां तथा ।

पूजयेच्च ततः पश्चात्तत्त्वपत्रेषु पूर्वतः ॥ ८०

विष्णुमायां चेतनां च बुद्धिं निद्रां क्षुधां तथा ।

छायां शक्तिं परां तृष्णां शान्तिं जातिं च लज्जया ॥ ८१

क्षान्तिं श्रद्धां कीर्तिलक्ष्म्यौ धृतिं वृत्तिं श्रुतिं स्मृतिम् ।

दयां तुष्टिं ततः पुष्टिं मातृभ्रान्ती इति क्रमात् ॥ ८२

ततो भूपुरकोणेषु गणेशं क्षेत्रपालकम् ।

वटुकं योगिनीश्चापि पूजयेन्मतिमान्नरः ॥ ८३

इन्द्राद्यानपि तद्बाह्ये वज्राद्यायुधसंयुतान् ।

पूजयेदनया रीत्या देवीं सावरणां ततः ॥ ८४

राजोपचारान्विविधान्दद्यादम्बाप्रतुष्टये ततो जपेन्नवार्णं च मन्त्रं मन्त्रार्थपूर्वकम् ॥ ८५

ततः सप्तशतीस्तोत्रं देव्या अग्रे तु सम्पठेत् ।

नानेन सदृशं स्तोत्रं विद्यते भुवनत्रये ॥ ८६

ततश्चानेन देवेशीं तोषयेत् प्रत्यहं नरः ।

धर्मार्थकाममोक्षाणामालयं जायते नरः ॥ ८७

इति ते कथितं विप्र श्रीदुर्गाया विधानकम् ।

कृतार्थता येन भवेत्तदेतत्कथितं तव ॥ ८८

सर्वे देवा हरिब्रह्मप्रमुखा मनवस्तथा ।

मुनयो ज्ञाननिष्ठाश्च योगिनश्चाश्रमास्तथा ॥ ८ ९

स्कन्ध ६०५ यजन करना चाहिये । जया आदि शक्तियोंसे सम्पन्न पीठपर देवीकी विधिवत् पूजा करे ॥ ७४-७५ ॥ यन्त्रके पूर्वकोणमें सरस्वतीसहित ब्रह्माकी पूजा करे, नैर्ऋत्यकोणमें लक्ष्मीसहित विष्णुकी पूजा करे तथा वायव्यकोणमें पार्वतीसहित भगवान् शिवकी पूजा करे । देवीके उत्तर में सिंहकी तथा बायीं ओर महिषासुर की पूजा करनी चाहिये । इसके बाद छः कोणोंमें क्रमशः भगवती नन्दजा, रक्तदन्ता, शाकम्भरी, कल्याणकारिणी दुर्गा, भीमा तथा भ्रामरीका पूजन करना चाहिये । तदनन्तर आठ दलोंमें ब्राह्मी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, नारसिंही, ऐन्द्री और चामुण्डाकी पूजा करनी चाहिये । तत्पश्चात् चौबीस पंखुड़ियोंमें पूर्वके क्रमसे विष्णुमाया, चेतना, बुद्धि, निद्रा, क्षुधा, छाया, पराशक्ति, तृष्णा, शान्ति, जाति, लज्जा, क्षान्ति, श्रद्धा, कीर्ति, लक्ष्मी, धृति, वृत्ति, श्रुति, स्मृति, दया, तुष्टि, पुष्टि, माता और भ्रान्ति - इन देवियोंकी पूजा करनी चाहिये ॥ ७६–८२ ॥ तदनन्तर बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि भूपुर-कोणोंमें गणेश, क्षेत्रपाल, बटुक और योगिनियोंकी पूजा करे ॥ दलके बाहर वज्र आदि आयुधोंसे युक्त इन्द्र आदि देवताओंकी भी पूजा करे । इसी रीतिसे आवरणसहित भगवती दुर्गाकी पूजा करे । भगवतीकी प्रसन्नताके लिये विविध प्रकारके राजसी पूजनोपचार उन्हें अर्पण करने चाहिये । तत्पश्चात् मन्त्रार्थपर ध्यान रखते हुए नवार्ण मन्त्रका जप करना चाहिये ॥ ८३-८५ ॥ तदनन्तर भगवती दुर्गाके सामने सप्तशतीस्तोत्रका पाठ करना चाहिये । तीनों लोकोंमें इस स्तोत्रके सदृश दूसरा कोई भी स्तोत्र नहीं है, इसलिये मनुष्यको इस स्तोत्रके द्वारा प्रतिदिन देवेश्वरी दुर्गाको प्रसन्न करना चाहिये । ऐसा करनेवाला मनुष्य धर्म, अर्थ, काम और

मोक्षका आलय बन जाता है । ८६-८७ ॥

हे विप्र! इस प्रकार मैंने आपको भगवती दुर्गाके पूजनका विधान बता दिया । इसके द्वारा सबकी कृतार्थता सम्पन्न हो सके, इसीलिये मैंने आपसे इसका वर्णन किया है ॥ ८८ ॥

ब्रह्मा, विष्णु आदि सभी प्रमुख देवतागण, सभी मनुगण, ज्ञाननिष्ठ मुनि, योगिजन, आश्रमवासी तथा | लक्ष्मी आदि देवियाँ - ये सब उन भगवती शिवाका

पृष्ठ 615

देवी भागवत उत्तरार्द्ध, पृष्ठ 615 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

६०६

लक्ष्म्यादयस्तथा देव्यः सर्वे ध्यायन्ति तां शिवाम् ।

तदैव जन्मसाफल्यं दुर्गास्मरणमस्ति चेत् ॥

चतुर्दशापि मनवो ध्यात्वा चरणपङ्कजम् ।

मनुत्वं प्राप्तवन्तश्च देवाः स्वं स्वं पदं तथा ॥

तदेतत्सर्वमाख्यातं रहस्यातिरहस्यकम् ।

प्रकृतीनां पञ्चकस्य तदंशानां च वर्णनम् ॥

श्रुत्वैतन्मनुजो नित्यं पुरुषार्थचतुष्टयम् ।

लभते नात्र सन्देहः सत्यं सत्यं मयोदितम् ॥

अपुत्रो लभते पुत्रं विद्यार्थी प्राप्नुयाच्च ताम् ।

यं यं कामं स्मरेद्वापि तं तं श्रुत्वा समाप्नुयात् ॥

नवरात्रे पठेदेतद्देव्यग्रे तु समाहितः ।

परितुष्टा जगद्धात्री भवत्येव हि निश्चितम् ॥

नित्यमेकैकमध्यायं पठेद्यः प्रत्यहं नरः । तस्य वश्या भवेद्देवी देवीप्रियकरो हि सः ।

शकुनांश्च परीक्षेत नित्यमस्मिन्यथाविधि ।

कुमारीदिव्यहस्तेन यद्वा बटुकराम्बुजात् ॥

मनोरथं तु सङ्कल्प्य पुस्तकं पूजयेत्ततः ।

देवीं च जगदीशानीं प्रणमेच्च पुनः पुनः ॥

सुस्नातां कन्यकां तत्रानीयाभ्यर्च्य यथाविधि ।

शलाकां रोपयेन्मध्ये तथा स्वर्णेन निर्मिताम् ॥

शुभं वाप्यशुभं तत्र यदायाति च तद्भवेत् ।

उदासीनेऽप्युदासीनं कार्यं भवति निश्चितम् ॥

श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ५० ध्यान करते हैं । जन्मकी सफलता तभी समझी जाती ९ ० है, जब श्रीदुर्गाका स्मरण हो जाय ॥८ ९ - ९ ० ॥ भगवती दुर्गाके चरणकमलका ध्यान करके ही चौदहों मनुओंने मनुपद तथा देवतागणोंने अपना-९ १ अपना स्थान प्राप्त किया है ॥ ९ १ ॥ इस प्रकार मैंने रहस्योंका भी अति रहस्यस्वरूप यह सारा आख्यान कह दिया । इसमें भगवती प्रकृति पाँच मुख्य स्वरूपों तथा उनके अंशोंका वर्णन है ॥ ९ २ ॥ ९ २ इसका नित्य श्रवण करनेसे मनुष्य चारों पुरुषार्थ ( धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष ) प्राप्त कर लेता है, इसमें सन्देह नहीं है । यह सब मैंने सच - सच कहा है ॥ ९ ३ ॥ ९ ३ इस रहस्यके प्रभावसे पुत्रहीन व्यक्ति पुत्र तथा विद्याभिलाषी मनुष्य विद्या प्राप्त कर लेता है । इसका श्रवण करके मनुष्य जिस - जिस मनोरथकी पूर्णताकी ९ ४ कामना करता है, उस - उसको प्राप्त कर लेता है ॥ ९ ४ ॥ नवरात्रमें एकाग्रचित्त होकर भगवती दुर्गाके सम्मुख इसका पाठ करना चाहिये । जगद्धात्री भगवती ९ ५ दुर्गा इससे निश्चय ही प्रसन्न हो जाती हैं ॥ ९ ५ ॥ जो मनुष्य प्रतिदिन इस नवम स्कन्धके एक अध्यायका पाठ करता है, भगवती दुर्गा उसके ९ ६ | अधीन हो जाती हैं और वह मनुष्य देवीका प्रियकर हो जाता है ॥ ९ ६ ॥ इस विषयमें किसी कुमारीके दिव्य हाथ अथवा बालकके करकमलसे यथाविधि शकुनकी परीक्षा ९ ७ करनी चाहिये । अपने मनोरथका संकल्प करके पुस्तककी पूजा करे, तत्पश्चात् जगदीश्वरी भगवती दुर्गाको बार - बार प्रणाम करे । भलीभाँति स्नान की ९ ८ हुई कन्याको वहाँ विराजमान करके [ देवीके रूपमें ] उसकी विधिपूर्वक पूजा करनेके अनन्तर स्वर्णनिर्मित शलाका उस कन्यासे स्कन्धके मध्यमें रखवाना ९९ चाहिये । शलाका रखनेपर शुभ अथवा अशुभ जो भी प्रसंग आता है, वैसा ही फल होता है; अथवा उदासीन प्रसंग आनेपर कार्य भी उदासीन ही होता १०० | है - यह निश्चित है ॥९७–१०० ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां नवमस्कन्धे देव्या आवरणपूजाविधिवर्णनं नाम पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५० ॥

ONN ॥ नवमः स्कन्धः समाप्तः ॥

पृष्ठ 616

देवी भागवत उत्तरार्द्ध, पृष्ठ 616 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥ ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ श्रीमद्देवीभागवतमहापुराण दशमः स्कन्धः अथ प्रथमोऽध्यायः स्वायम्भुव मनुकी उत्पत्ति, नारद उवाच

नारायण धराधार सर्वपालनकारण ।

भवतोदीरितं देवीचरितं पापनाशनम् ॥

मन्वन्तरेषु सर्वेषु सा देवी यत्स्वरूपिणी ।

यदाकारेण कुरुते प्रादुर्भावं महेश्वरी ॥

तान्नः सर्वान्समाख्याहि देवीमाहात्म्यमिश्रितान् ।

यथा च येन येनेह पूजिता संस्तुतापि हि ॥

मनोरथान्पूरयति भक्तानां भक्तवत्सला ।

तन्नः शुश्रूषमाणानां देवीचरितमुत्तमम् ॥

वर्णयस्व कृपासिन्धो येनाप्नोति सुखं महत् । श्रीनारायण उवाच आकर्णय महर्षे त्वं चरितं पापनाशनम् ॥

भक्तानां भक्तिजननं महासम्पत्तिकारकम् ।

जगद्योनिर्महातेजा ब्रह्मा लोकपितामहः ॥

आविरासीन्नाभिपद्माद्देवदेवस्य चक्रिणः ।

स चतुर्मुख आसाद्य प्रादुर्भावं महामते ॥

मनुं स्वायम्भुवं नाम जनयामास मानसात् ।

स मानसो मनुः पुत्रो ब्रह्मणः परमेष्ठिनः ॥

उनके द्वारा भगवतीकी आराधना नारदजी बोले - हे नारायण! हे धराके आधार! हे सर्वपालनकारण! आपने पापोंका नाश करनेवाले १ देवीचरित्रका वर्णन कर दिया ॥ १ ॥

सभी मन्वन्तरोंमें वे देवी जो - जो स्वरूप धारण करती हैं तथा जिस - जिस स्वरूपसे उन माहेश्वरीका २ प्रादुर्भाव हुआ है - भगवतीकी महिमासे युक्त उन समस्त प्रसंगों का अब आप हमसे सम्यक् वर्णन करें ॥ २३ ॥

जिस प्रकारसे तथा जिस - जिस मन्त्र अथवा ३ | स्तोत्रसे भगवतीका पूजन तथा स्तवन किया गया है और वे भक्तवत्सला देवी भक्तोंका जिस प्रकार मनोरथ पूर्ण करती हैं, सुननेकी अभिलाषावाले हमलोगोंसे ४ आप देवीके उस उत्तम चरित्रका जिससे महान् सुख प्राप्त होता है ॥ श्रीनारायण बोले – हे महर्षे! भक्ति उत्पन्न करनेवाले, महान् सम्पदा तथा पापोंका शमन करनेवाले देवी ५ आप श्रवण कीजिये ॥ ५३ ॥

सर्वप्रथम जगत्के मूल कारण वर्णन कीजिये, ३-४३ ॥ भक्तोंके हृदयमें प्रदान करनेवाले - चरित्रका अब महान् तेजस्वी ६ लोकपितामह ब्रह्मा चक्रधारी देवदेव भगवान् विष्णुके नाभिकमलसे प्रादुर्भूत हुए ॥ ६३ ॥

हे महामते! विष्णुके नाभिकमलसे प्रकट होकर ७ उन चतुर्मुख ब्रह्माने स्वायम्भुव नामक मनुको अपने मनसे उत्पन्न किया । इस प्रकार वे मनु परमेष्ठी ब्रह्माके मानस पुत्र कहलाये । पुनः ब्रह्माजीने धर्मस्वरूपिणी ८ शतरूपाको उत्पन्न किया और उन्हें मनुकी पत्नीके

पृष्ठ 617

देवी भागवत उत्तरार्द्ध, पृष्ठ 617 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

६०८ शतरूपां च तत्पत्नीं जज्ञे धर्मस्वरूपिणीम् स मनुः क्षीरसिन्धोश्च तीरे परमपावने देवीमाराधयामास महाभाग्यफलप्रदाम् मूर्तिं च मृण्मयीं तस्या विधाय पृथिवीपतिः उपासते स्म तां देवीं वाग्भवं स जपन् रहः निराहारो जितश्वासो नियमव्रतकर्शितः

एकपादेन सन्तिष्ठन् धरायामनिशं स्थिरः ।

शतवर्षं जितः कामः क्रोधस्तेन महात्मना ॥

भेजे स्थावरतां देव्याश्चरणौ चिन्तयन् हृदि ।

तस्य तत्तपसा देवी प्रादुर्भूता जगन्मयी ॥

उवाच वचनं दिव्यं वरं वरय भूमिप ।

तत आनन्दजनकं श्रुत्वा वाक्यं महीपतिः ॥

वरयामास तान् हृत्स्थान् वरानमरदुर्लभान् । मनुरुवाच जय देवि विशालाक्षि जय सर्वान्तरस्थिते ॥

मान्ये पूज्ये जगद्धात्रि सर्वमङ्गलमङ्गले ।

त्वत्कटाक्षावलोकेन पद्मभूः सृजते जगत् ॥

वैकुण्ठः पालयत्येव हरः संहरते क्षणात् ।

शचीपतिस्त्रिलोक्याश्च शासको भवदाज्ञया ॥

प्राणिनः शिक्षयत्येव दण्डेन च परेतराट् ।

यादसामधिपः पाशी पालनं मादृशामपि ॥

कुरुते स कुबेरोऽपि निधीनां पतिरव्ययः ।

हुतभुङ् नैर्ऋतो वायुरीशानः शेष एव च ॥

त्वदंशसम्भवा एव त्वच्छक्तिपरिबृंहिताः ।

अथापि यदि मे देवि वरो देयोऽस्ति साम्प्रतम् ॥

श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १ । रूपमें प्रतिष्ठित किया । तत्पश्चात् वे मनु क्षीरसागरके ॥ ९ परम पवित्र तटपर महान् सौभाग्य प्रदान करनेवाली जगदम्बाकी आराधना करने लगे ॥ ७ – ९ ३ ॥ । वहाँपर देवीकी मृण्मयी मूर्ति बनाकर पृथ्वीपति ॥ १० मनु एकान्तमें उन भगवतीके वाग्भव - मन्त्रका जप करते हुए उनकी उपासनामें तत्पर हो गये ॥ १०३ ॥

। नियमों तथा व्रतोंका पालन करते हुए निराहार ॥ ११ रहकर श्वासको नियन्त्रित करके वे सौ वर्षोंतक निरन्तर पृथ्वीपर एक पैरसे खड़े रहे । महात्मा मनुने काम तथा क्रोधपर विजय प्राप्त कर ली । अपने १२ हृदयमें भगवतीके चरणोंका चिन्तन करते हुए वे

किसी स्थावरकी भाँति हो गये । ११ - १२३ ॥

उनकी उस तपस्यासे जगन्मयी भगवती प्रकट १३ हो गयीं और उन्होंने यह दिव्य वचन कहा — ‘ हे भूपाल! तुम वर माँगो ' ॥ १३३ ॥

तब देवीका आनन्ददायक वचन सुनकर महाराज १४ मनुने देवताओंके लिये भी परम दुर्लभ अपने मनोभिलषित उन श्रेष्ठ वरोंकी याचना की ॥ १४३ ॥

मनु बोले – हे देवि! हे विशालनयने! हे समस्त प्राणियोंके भीतर निवास करनेवाली! आपकी १५ जय हो । हे मान्ये! हे पूज्ये! हे जगद्धात्रि! हे सर्वमंगलमंगले! आपके कटाक्षपातमात्रसे पद्मयोनि ब्रह्मा जगत् की सृष्टि करते हैं, भगवान् विष्णु पालन १६ करते हैं तथा रुद्र क्षणभरमें संहार करते हैं, शचीपति इन्द्र आपकी ही आज्ञासे तीनों लोकोंपर शासन करते हैं ॥ १५–१७ ॥ १७ आपके ही आदेशपर यमराज दण्डके द्वारा प्राणियोंको नियन्त्रित करते हैं तथा जलचर जीवोंके स्वामी वरुणदेव हम जैसे प्राणियोंका पालन करते हैं । १८ आपकी ही कृपासे कुबेर निधियोंके अविनाशी अधिपतिके रूपमें प्रतिष्ठित हैं । अग्नि, नैर्ऋत, वायु, ईशान और शेषनाग आपके ही अंशसे उत्पन्न हुए हैं और १ ९ आपकी ही शक्तिसे परिवर्धित हैं ॥ १८-१९ ३ ॥ फिर भी हे देवि! यदि इस समय आप मुझे वर देना चाहती हैं तो हे शिवे! सृष्टिकार्यमें आनेवाले २० मेरे सभी विघ्न क्षीण होकर नष्ट हो जायँ । जो भी

पृष्ठ 618

देवी भागवत उत्तरार्द्ध, पृष्ठ 618 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अ ० २ ]

तदा प्रह्वाः सर्गकार्ये विघ्ना नश्यन्तु मे शिवे ।

वाग्भवस्यापि मन्त्रस्य ये केचिदुपसेविनः ॥

तेषां सिद्धिः सत्वरापि कार्याणां जायतामपि ।

ये संवादमिमं देवि पठन्ति श्रावयन्ति च ॥

तेषां लोके भुक्तिमुक्ती सुलभे भवतां शिवे ।

जातिस्मरत्वं भवतु वक्तृत्वं सौष्ठवं तथा ॥

ज्ञानसिद्धिः कर्ममार्गसंसिद्धिरपि चास्तु हि ।

पुत्रपौत्रसमृद्धिश्च जायेदित्येव मे वचः ॥

दशम स्कन्ध ६० ९ लोग वाग्भव बीजमन्त्रके उपासक हों, उनके कार्यों की २१ सिद्धि शीघ्र ही हो जाय । हे देवि! जो लोग इस संवादको पढ़ें और दूसरोंको सुनायें, उनके लिये इस २२ लोकमें भोग तथा मोक्ष सुलभ हो जायँ शिवे! उन्हें पूर्वजन्मोंकी स्मृति बनी रहे और वे वक्तृता तथा वाणी - सौष्ठवसे सम्पन्न रहें । उन्हें ज्ञानकी सिद्धि हो २३ तथा कर्मयोगकी भी सिद्धि प्राप्त हो, साथ ही उनके यहाँ पुत्र - पौत्रकी समृद्धि निरन्तर होती रहे - यही मेरा २४ | आपसे निवेदन है | २० –२४ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां दशमस्कन्धे मनुकृतं देवीस्तवनं नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥

अथ द्वितीयोऽध्यायः देवीद्वारा मनुको वरदान, नारदजीका विन्ध्यपर्वतसे सुमेरुपर्वतकी श्रेष्ठता कहना श्रीदेव्युवाच

भूमिपाल महाबाहो सर्वमेतद्भविष्यति ।

यत्त्वया प्रार्थितं तत्ते ददामि मनुजाधिप ॥

अहं प्रसन्ना दैत्येन्द्रनाशनामोघविक्रमा ।

वाग्भवस्य जपेनैव तपसा ते सुनिश्चितम् ॥

राज्यं निष्कण्टकं तेऽस्तु पुत्रा वंशकरा अपि ।

मयि भक्तिर्दृढा वत्स मोक्षान्ते सत्पदे भवेत् ॥

एवं वरान्महादेवी तस्मै दत्त्वा महात्मने ।

पश्यतस्तु मनोरेव जगाम विन्ध्यपर्वतम् ॥

योऽसौ विन्ध्याचलो रुद्धः कुम्भोद्भवमहर्षिणा ।

भानुमार्गावरोधार्थं प्रवृत्तो गगनं स्पृशन् ॥

सा विन्ध्यवासिनी विष्णोरनुजा वरदेश्वरी ।

बभूव पूज्या लोकानां सर्वेषां मुनिसत्तम ॥

ऋषय ऊचुः

कोऽसौ विन्ध्याचलः सूत किमर्थं गगनं स्पृशन् ।

भानुमार्गावरोधं च किमर्थं कृतवानसौ ॥

1898 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ द्वितीय खण्ड ] –20 A श्रीदेवी बोलीं- हे भूमिपाल! हे महाबाहो! हे मनुजाधिप! यह सब पूर्ण होगा । तुमने जो - जो १ माँगा है, वह मैं तुम्हें दे रही हूँ ॥१ ॥

बड़े - बड़े दैत्योंका संहार करनेवाली तथा अमोघ पराक्रमवाली मैं तुम्हारे द्वारा किये गये वाग्भव- मन्त्रके २ जप तथा तपसे निश्चितरूपसे प्रसन्न हूँ । हे वत्स! तुम्हारा राज्य निष्कण्टक होगा और तुम्हारे पुत्र वंशकी वृद्धि करनेवाले होंगे; तुम मेरे प्रति दृढ़ भक्तिवाले ३ रहोगे और अन्तमें परमपद प्राप्त करोगे ॥ २-३ ॥ इस प्रकार उन महात्मा मनुको वर देकर महादेवी जगदम्बा उनके देखते - देखते विन्ध्यपर्वत पर ४ चली गयीं ॥ ४ ॥

यह वही विन्ध्याचल है, जो सूर्यके मार्गका अवरोध करनेके लिये आकाशको छूता हुआ ऊपरकी ओर बढ़नेके लिये प्रवृत्त था और महर्षि अगस्त्यने उसे रोक दिया था ॥५ ॥

हे मुनिश्रेष्ठ! वरदायिनी तथा परमेश्वरी वे विष्णुभगिनी विन्ध्यवासिनी सभी लोगोंके लिये पूज्य हो गयीं ॥ ६ ॥

ऋषि बोले - हे सूतजी! वह विन्ध्याचल कौन है, आकाशको छूता हुआ वह क्यों बढ़ा, उसने सूर्यके ७ मार्गका अवरोध क्यों किया और मैत्रावरुणि अगस्त्यजीने

पृष्ठ 619

देवी भागवत उत्तरार्द्ध, पृष्ठ 619 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

६१० श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २ कथं च मैत्रावरुणिः पर्वतं तं महोन्नतम् । उस महान् ऊँचे पर्वतको बढ़नेसे क्यों रोक दिया? यह

प्रकृतिस्थं चकारेति सर्वं विस्तरतो वद ॥ ८ । सब आप विस्तारसे मुझे बताइये ॥ ७-८ ॥

न हि तृप्यामहे साधो त्वदास्यगलितामृतम् । हे साधो! आपके मुखसे निःसृत देवीचरित्ररूपी देव्याश्चरित्ररूपाख्यं पीत्वा तृष्णा प्रवर्धते सूत उवाच आसीद्विन्ध्याचलो नाम मान्यः सर्वधराभृताम् महावनसमूहाढ्यो महापादपसंवृतः सुपुष्पितैरनेकैश्च लतागुल्मैस्तु संवृतः मृगा वराहा महिषा व्याघ्राः शार्दूलका अपि वानराः शशका ऋक्षाः शृगालाश्च समन्ततः । विचरन्ति सदा हृष्टा पुष्टा एव महोद्यमाः

नदीनदजलाक्रान्तो देवगन्धर्वकिन्नरैः ।

अप्सरोभिः किम्पुरुषैः सर्वकामफलद्रुमैः ॥

एतादृशे विन्ध्यनगे कदाचित्पर्यटन् महीम् ।

देवर्षिः परमप्रीतो जगाम स्वेच्छया मुनिः ॥

तं दृष्ट्वा स नगो मङ्क्षु तूर्णमुत्थाय सम्भ्रमात् ।

पाद्यमर्घ्यं तथा दत्त्वा वरासनमथार्पयत् ॥

सुखोपविष्टं देवर्षिं प्रसन्नं नग ऊचिवान् । विन्ध्य उवाच देवर्षे कथ्यतां जात आगमः कुत उत्तमः ॥

तवागमनतो जातमनर्घ्यं मम मन्दिरम् ।

तव चङ्क्रमणं देवाभयार्थं हि यथा रवेः ॥

अपूर्वं यन्मनोवृत्तं तद् ब्रूहि मम नारद । नारद उवाच ममागमनमिन्द्रारे जातं स्वर्णगिरेरथ ॥

तत्र दृष्टा मया लोकाः शक्राग्नियमपाशिनाम् ।

सर्वेषां लोकपालानां भवनानि समन्ततः ॥

मया दृष्टानि विन्ध्याग नानाभोगप्रदानि च । 1898 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ द्वितीय खण्ड ] –20 B अमृतका पान करते हुए हम सब तृप्त नहीं हो रहे ॥ ९ हैं, अपितु तृष्णा बढ़ती ही जा रही है ॥ ९ ॥

सूतजी बोले – सम्पूर्ण पर्वतोंमें श्रेष्ठ विन्ध्याचल । नामक एक पर्वत था । वह बड़े - बड़े वनोंसे सम्पन्न तथा अति विशाल वृक्षोंसे घिरा था । वह अनेक ॥ १० प्रकारके पुष्पोंसे लदी हुई लताओं तथा वल्लरियोंसे । आच्छादित था । मृग, वराह, महिष, बाघ, सिंह, ॥ ११ वानर, खरगोश, भालू, सियार आदि हृष्ट - पुष्ट तथा अति शक्ति - शाली वन्य जन्तु उसमें चारों ओर सदा विचरण करते रहते थे । वह नदियों तथा नदोंके जलसे ॥ १२ व्याप्त था एवं देवताओं, गन्धर्वों, किन्नरों, अप्सराओं, किम्पुरुषों तथा सभी प्रकारके मनोवांछित फल देनेवाले वृक्षोंसे शोभायमान था॥१०–१३ ॥ १३ किसी समय देवर्षि नारद परम प्रसन्न होकर इच्छापूर्वक पृथ्वीलोकमें विचरण करते हुए इस १४ प्रकारके विन्ध्यपर्वतपर पहुँच गये ॥१४ ॥

उन्हें देखकर विन्ध्याचलने शीघ्र ही वेगपूर्वक उठ करके आदरपूर्वक उन्हें पाद्य- अर्घ्य प्रदानकर १५ उत्तम आसन अर्पित किया । तदनन्तर सुखपूर्वक आसनपर विराजमान उन प्रसन्न देवर्षि नारदसे विन्ध्यपर्वत कहने लगा ॥ १५३ ॥

विन्ध्य बोला - हे देवर्षे! कहिये, आपका यह १६ शुभागमन कहाँसे हुआ है? ॥ १६ ॥

आपके आगमनसे मेरा घर परम पावन हो १७ गया । जैसे सूर्य संसारके कल्याणार्थ भ्रमण करते हैं, उसी प्रकार आप भी देवताओंको अभय प्रदान करने हेतु भ्रमण करते रहते हैं । हे नारदजी! आपके मनमें जो भी विशेष बात हो, उसे मुझे १८ बताइये ॥ १७३ ॥

नारदजी बोले - हे इन्द्रशत्रु! मेरा आगमन सुमेरुगिरिसे हुआ है । वहाँ मैंने इन्द्र, अग्नि, यम तथा १ ९ वरुणके लोकोंको देखा है । हे विन्ध्यपर्वत! वहाँपर मुझे समस्त लोकपालोंके नानाविध भोग प्रदान करनेवाले भवन चारों ओर दिखायी पड़े ॥ १८-१९ ३ ॥

पृष्ठ 620

देवी भागवत उत्तरार्द्ध, पृष्ठ 620 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अ ० ३ ] इति चोक्त्वा ब्रह्मयोनिः पुनरुच्छ्वासमाविशत् ॥

उच्छ्वसन्तं मुनिं दृष्ट्वा पुनः पप्रच्छ शैलराट् ।

उच्छ्वासकारणं किं तद् ब्रूहि देवऋषे मम ॥

इत्याकर्ण्य नगस्योक्तं देवर्षिरमितद्युतिः ।

अब्रवीच्छ्रयतां वत्स ममोच्छ्वासस्य कारणम् ॥

गौरीगुरुस्तु हिमवाञ्छिवस्य श्वशुरः किल ।

सम्बन्धित्वात्पशुपतेः पूज्य आसीत्क्षमाभृताम् ॥

एवमेव च कैलासः शिवस्यावसथः प्रभुः ।

पूज्यः पृथ्वीभृतां जातो लोके पापौघदारणः ॥

निषधः पर्वतो नीलो गन्धमादन एव च ।

पूज्याः स्वस्थानमासाद्य सर्व एव क्षमाभृतः ॥

यं पर्येति च विश्वात्मा सहस्त्रकिरणः स्वराट् ।

सग्रहर्क्षगणोपेतः सोऽयं कनकपर्वतः ॥

आत्मानं मनुते श्रेष्ठं वरिष्ठं च धराभृताम् ।

सर्वेषामहमेवाग्र्यो नास्ति लोकेषु मत्समः ॥

एवं मानाभिमानं तं स्मृत्वोच्छ्वासो मयोज्झितः ।

अस्तु नैतावता कृत्यं तपोबलवतां नग ।

प्रसङ्गतो मयोक्तं ते गमिष्यामि निजं गृहम् ॥

दशम स्कन्ध ६११ २० ऐसा कहकर ब्रह्माजीके पुत्र नारदने दीर्घ श्वास ली । नारदमुनिको इस प्रकार श्वास लेते हुए देखकर पर्वतराज विन्ध्यने उनसे पुन: पूछा – हे देवर्षे! इस उच्छ्वासका २१ क्या कारण है, उसे मुझे बताइये ॥ २०-२१ ॥ विन्ध्यपर्वतका यह कथन सुनकर अपरिमित तेजवाले देवर्षि नारद बोले - हे वत्स! मेरे उच्छ्वासका २२ कारण सुनो ॥ २२ ॥

पार्वतीके पिता हिमालय शिवजीके श्वसुर हैं । इस प्रकार शंकरजीसे सम्बन्ध होनेके कारण वे सभी पर्वतोंके पूज्य हो गये ॥ २३ ॥

२३ इसी प्रकार शिवजीका निवास - स्थल कैलास भी सभी पर्वतोंका पूज्य स्वामी बन गया और लोकमें पापसमूहका विनाशक हो गया ॥ २४ ॥

२४ इसी तरह निषध, नील तथा गन्धमादन आदि सभी पर्वत भी अपने - अपने स्थानपर स्थित होकर पूज्य पर्वतके रूपमें प्रतिष्ठित हैं ॥ २५ ॥

२५ यह वही सुमेरुगिरि है, जिसकी परिक्रमा समस्त विश्वकी आत्मा, स्वर्गके राजा तथा हजारों किरणें धारण करनेवाले सूर्य समस्त ग्रह- -नक्षत्रों के २६ समूहसहित करते हैं ॥ २६ ॥

वह अपनेको पर्वतोंमें श्रेष्ठ तथा महान् मानता है । वह समझता है कि मैं ही सभी पर्वतोंमें अग्रणी २७ हूँ तथा मेरे समान लोकोंमें कोई नहीं है ॥ २७ ॥

इस प्रकारके मान - अभिमानवाले उस पर्वतका स्मरण करके मैंने यह उच्छ्वास लिया है । हे पर्वत! जो भी हो, तपरूपी बलवाले हम सबको इससे कोई प्रयोजन नहीं है । मैंने तो प्रसंगवश आपसे ऐसा कह २८ दिया; अब मैं अपने घरके लिये प्रस्थान कर रहा हूँ ॥ २८ ॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां दशमस्कन्धे विन्ध्योपाख्यानवर्णनं नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥

अथ तृतीयोऽध्यायः विन्ध्यपर्वतका आकाशतक बढ़कर सूर्यके मार्गको अवरुद्ध कर लेना सूत उवाच सूतजी बोले- हे ऋषियो! इस प्रकार एवं समुपदिश्यायं देवर्षिः परमः स्वराट् । विन्ध्यगिरिसे वार्तालाप करके परम स्वतन्त्र तथा स्वेच्छापूर्वक विचरण करनेवाले महामुनि देवर्षि जगाम ब्रह्मणो लोकं स्वैरचारी महामुनिः ॥ १ नारद ब्रह्मलोक चले गये ॥१ ॥

1898 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ द्वितीय खण्ड ] -20 C