देवी भागवत उत्तरार्द्ध — पृष्ठ 621–630

देवी भागवत उत्तरार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 621–630

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६१२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ३

गते मुनिवरे विन्ध्यश्चिन्तां लेभे ऽनपायिनीम् ।

नैव शान्तिं स लेभे च सदान्तः कृतशोचनः ॥

कथं किं त्वत्र मे कार्यं कथं मेरुं जयाम्यहम् ।

नैव शान्तिं लभे नापि स्वास्थ्यं मे मानसे भवेत् ॥

( धिगुत्साहं च मानं च धिङ् मे कीर्तिं च धिक्कुलम् )

धिग्बलं मे पौरुषं धिक् स्मृतं पूर्वैर्महात्मभिः ।

एवं चिन्तयमानस्य विन्ध्यस्य मनसि स्फुटम् ॥

प्रादुर्भूता मतिः कार्ये कर्तव्ये दोषकारिणी ।

मेरुप्रदक्षिणां कुर्वन्नित्यमेव दिवाकरः ॥

सग्रहर्क्षगणोपेतः सदा दृप्यत्ययं नगः ।

तस्य मार्गस्य संरोधं करिष्यामि निजैः करैः ॥

तदा निरुद्धो मणिः परिक्रामेत्कथं नगम् ।

एवं मार्गे निरुद्धे तु मया दिनकरस्य च ॥

भग्नदर्पो दिव्यनगो भविष्यति विनिश्चयम् ।

एवं निश्चित्य विन्ध्याद्रिः खं स्पृशन् ववृधे भुजैः ॥

महोन्नतैः शृङ्गवरैः सर्वं व्याप्य व्यवस्थितः ।

कदोदेष्यति भास्वांस्तं रोधयिष्याम्यहं कदा ॥

एवं सञ्चिन्तयानस्य सा व्यतीयाय शर्वरी ।

प्रभातं विमलं जज्ञे दिशो वितिमिराः करैः ॥

कुर्वन्स निर्गतो भानुरुदयायोदये गिरौ ।

प्रकाशते स्म विमलं नभो भानुकरैः शुभैः ॥

विकासं नलिनी भेजे मीलनं च कुमुद्वती ।

स्वानि कार्याणि सर्वे च लोकाः समुपतस्थिरे ॥

हव्यं कव्यं भूतबलिं देवानां च प्रवर्धयन् ।

प्राह्णापराह्णमध्याह्नविभागेन त्विषां पतिः ॥

1898 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ द्वितीय खण्ड ] -20 D मुनिवर नारदके चले जानेपर विन्ध्य निरन्तर २ चिन्तित रहने लगा । उसे शान्ति नहीं मिल पाती थी । वह अपने अन्तर्मनमें सदा यही सोचता कि अब मैं कौन - सा कार्य करूँ तथा किस प्रकारसे सुमेरुगिरिको ३ जीत लूँ? इस समय मुझे न तो शान्ति मिल पा रही है और न तो मेरा मन ही सुस्थिर हो पा रहा है । ( मेरे उत्साह, सम्मान, यश तथा कुलको धिक्कार है ) मेरे बल तथा पुरुषार्थको धिक्कार है । पूर्वकालीन महात्माओंने भी ऐसा ही कहा है ॥ २-३३ ॥ ४ इस प्रकार चिन्तन करते हुए विन्ध्यगिरिके मनमें कर्तव्यके निर्णयमें दोष उत्पन्न कर देनेवाली बुद्धिका उदय हो गया ॥४३ ॥

५ सूर्य सभी ग्रह नक्षत्रसमूहोंसे युक्त होकर सुमेरु-पर्वतकी सदा परिक्रमा करते रहते हैं, जिससे यह सुमेरु - गिरि अभिमानमें चूर रहता है । मैं अपने ६ शिखरोंसे उस सूर्यका मार्ग रोक दूँगा । तब इस प्रकार अवरुद्ध हुए ये सूर्य सुमेरुगिरिका परिक्रमण कैसे कर सकेंगे? ॥ ५-६३ ॥ ७ इस प्रकार मेरे द्वारा सूर्यका मार्गावरोध कर दिये जानेसे उस दिव्य सुमेरुगिरिका अभिमान निश्चितरूपसे खण्डित हो जायगा ॥७३ ॥

८ ऐसा निश्चय करके विन्ध्यगिरि अपने शिखरोंसे आकाशको छूता हुआ बढ़ने लगा और अत्युच्च श्रेष्ठ शिखरोंसे सम्पूर्ण आकाशको व्याप्त करके व्यवस्थित हो गया । वह प्रतीक्षा करने लगा कि कब सूर्य उदित हों और कब मैं उनका मार्ग अवरुद्ध करूँ ॥ ८ - ९ ॥ १० इस प्रकार उसके सोचते - सोचते वह रात्रि व्यतीत हो गयी और विमल प्रभातका आगमन हो गया । अपनी किरणोंसे दिशाओंको अन्धकाररहित ११ करते हुए भगवान् सूर्य उदयाचलपर उदित होनेके लिये प्रकट होने लगे । सूर्यकी शुभ किरणोंसे आकाश स्वच्छ प्रकाशित होने लगा, कमलिनी खिलने लगी १२ और कुमुदिनी संकुचित होने लगी, सभी प्राणी अपने-अपने कार्योंमें लग गये ॥ १०- - -१२ ॥ इस प्रकार पूर्वाह्न, अपराह्न तथा मध्याह्नके १३ | विभागसे देवताओंके लिये हव्य, कव्य तथा भूतबलिका

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अ ० ३ ] एवं प्राचीं तथाग्नेयीं समाश्वास्य वियोगिनीम् ज्वलन्तीं चिरकालीनविरहादिव कामिनीम् भास्करोऽथ कृशानोश्च दिशं नूनं विहाय च याम्यां गन्तुं ततस्तूर्णं प्रतस्थे कमलाकरः न शशाकाग्रतो गन्तुं ततोऽनूरुर्व्यजिज्ञपत् अनूरुरुवाच भानो मानोन्नतो विन्ध्यो निरुध्य गगनं स्थितः स्पर्धते मेरुणा प्रेप्सुस्त्वद्दत्तां च प्रदक्षिणाम् । सूत उवाच अनूरुवाक्यमाकर्ण्य सविता ह्यास चिन्तयन् ॥ अहो गगन मार्गोऽपि रुध्यते चातिविस्मयः । प्रायः शूरो न किं कुर्यादुत्पथे वर्त्मनि स्थितः निरुद्धो नो वाजिमार्गों दैवं हि बलवत्तरम् राहु बाहुग्रहव्यग्रो यः क्षणं नावतिष्ठते सचिरं रुद्धमार्गोऽपि किं करोति विधिर्बली । एवं च मार्गे संरुद्धे लोकाः सर्वे च सेश्वराः नान्वविन्दन्त शरणं कर्तव्यं नान्वपद्यत । चित्रगुप्तादयः सर्वे कालं जानन्ति सूर्यतः संरुद्धो विन्ध्यगिरिणा अहो दैवविपर्ययः । यदा निरुद्धः सविता गिरिणा स्पर्धया तदा नष्टः स्वाहास्वधाकारो नष्टप्रायमभूज्जगत् । एवं च पाश्चिमा लोका दाक्षिणात्यास्तथैव च दशम स्कन्ध ६१३ । संवर्धन करते हुए प्रभाके स्वामी सूर्य चिरकालीन ॥ १४ विरहाग्निसे सन्तप्त तथा वियोगिनी कामिनीसदृश प्राची तथा आग्नेयी दिशाओंको आश्वासन देकर एवं पुनः अग्नि - दिशाको छोड़कर बड़ी तेजीसे । दक्षिण दिशाकी ओर प्रस्थान करनेका प्रयास ॥ १५ करने लगे । किंतु जब वे सूर्य आगे नहीं बढ़ सके, तब उनका सारथि अनूरु ( अरुण ) कहने । लगा - ॥ १३ – १५३ ॥ अनूरु बोला- हे सूर्य! अत्यधिक अभिमानी विन्ध्यगिरि आपका मार्ग रोककर आकाशमें स्थित हो ॥ १६ गया है । वह सुमेरुगिरिसे स्पर्धा करता है और आपके द्वारा सुमेरुकी की जानेवाली परिक्रमा प्राप्त करनेकी अभिलाषा रखता है ॥ १६३ ॥

सूतजी बोले- अरुणका यह वचन सुनकर सूर्य सोचने लगे - अहो! आकाशका भी मार्ग १७ अवरुद्ध हो गया, यह तो महान् आश्चर्य है । प्रायः कुमार्गपर चलनेवाला पराक्रमी व्यक्ति क्या नहीं कर सकता ॥ १७-१८ ॥ ॥ १८ दैव बड़ा बलवान् होता है । आज मेरे घोड़ोंका मार्ग रोक दिया गया है । राहुकी भुजाओंमें जकड़े जानेपर जो क्षणभरके लिये भी नहीं रुकता था, वही । मैं चिरकालसे अवरुद्ध मार्गवाला हो गया हूँ । बलवान् ॥ १ ९ विधाता अब न जाने क्या करेगा? ॥१ ९ ३ ॥ इस प्रकार सूर्यका मार्ग अवरुद्ध हो जानेसे समस्त लोक तथा लोकेश्वर कहीं भी शरण नहीं प्राप्त ॥ २० कर सके और वे अपने - अपने कार्य सम्पादित करनेमें अक्षम हो गये ॥ २०३ ॥

चित्रगुप्त आदि सभी लोग जिन सूर्यसे समयका ज्ञान करते थे, वे ही सूर्य आज विन्ध्यगिरिके द्वारा ॥ २१ अवरुद्ध कर दिये गये । अहो! दैव भी कितना विपरीत हो जाता है ॥ २१३ ॥

जब स्पर्धा कारण विन्ध्यने सूर्यको रोक दिया, ॥ २२ तब स्वाहा - स्वधाकार नष्ट हो गये और सम्पूर्ण जगत् भी नष्टप्राय हो गया ॥ २२३ ॥

पश्चिम तथा दक्षिणके प्राणी रात्रिके प्रभावमें थे और निद्रासे नेत्र बन्द किये हुए थे, साथ ही पूर्व तथा ॥ २३ । उत्तरके प्राणी सूर्यकी प्रचण्ड गर्मीसे दग्ध हो रहे थे

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६१४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ४ निद्रामीलितचक्षुष्का निशामेव प्रपेदिरे । प्रजाओं का विनाश होने लगा । बहुत से प्राणी मर प्राञ्चस्तथोत्तराहाश्च तीक्ष्णतापप्रतापिताः ॥ २४ गये, कितने ही नष्ट हो गये, कितने भग्न हो गये, मृता नष्टाश्च भग्नाश्च विनाशमभजन् प्रजाः । सम्पूर्ण जगत् में हाहाकार मच गया और श्राद्ध-तर्पणसे जगत् रहित हो गया । इन्द्रसहित सभी देवता हाहाभूतं जगत्सर्वं स्वधाकव्यविवर्जितम् । व्याकुल होकर आपसमें कहने लगे कि अब हमलोग

देवाः सेन्द्राः समुद्विग्नाः किं कुर्म इतिवादिनः ॥ २५ । क्या करें? ॥ २३ - २५ ॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां दशमस्कन्धे देवीमाहात्म्ये विन्ध्योपाख्यानवर्णनं नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥

अथ चतुर्थोऽध्यायः देवताओंका भगवान् शंकरसे विन्ध्यपर्वतकी वृद्धि रोकनेकी प्रार्थना करना और शिवजीका उन्हें सूत उवाच

ततः सर्वे सुरगणा महेन्द्रप्रमुखास्तदा ।

पद्मयोनिं पुरस्कृत्य रुद्रं शरणमन्वयुः ॥

उपतस्थुः प्रणतिभिः स्तोत्रैश्चारुविभूतिभिः ।

देवदेवं गिरिशयं शशिलोलितशेखरम् ॥

देवा ऊचुः

जय देव गणाध्यक्ष उमालालितपङ्कज ।

अष्टसिद्धिविभूतीनां दात्रे भक्तजनाय ते ॥

महामायाविलसितस्थानाय परमात्मने ।

वृषाङ्कायामरेशाय कैलासस्थितिशालिने ॥

अहिर्बुध्न्याय मान्याय मनवे मानदायिने ।

अजाय बहुरूपाय स्वात्मारामाय शम्भवे ॥

गणनाथाय देवाय गिरिशाय नमोऽस्तु ते ।

महाविभूतिदात्रे ते महाविष्णुस्तुताय च ॥

विष्णुहृत्कञ्जवासाय महायोगरताय च ।

योगगम्याय योगाय योगिनां पतये नमः ॥

योगीशाय नमस्तुभ्यं योगानां फलदायिने ।

दीनदानपरायापि दयासागरमूर्तये ॥

भगवान् विष्णुके पास भेजना सूतजी बोले - [ हे मुनियो! ] तत्पश्चात् इन्द्र आदि सभी प्रधान देवगण ब्रह्माजीको आगे करके १ भगवान् शिवकी शरणमें गये ॥१ ॥

गिरिपर शयन करनेवाले तथा चन्द्रमासे सुशोभित मस्तकवाले देवदेव शिवको प्रणाम करके वे देवता २ उनके सम्मुख खड़े हो गये और सुन्दर महिमासे युक्त स्तोत्रोंसे उनका स्तवन करने लगे ॥२ ॥

देवता बोले- हे देव! हे गणाध्यक्ष! हे पार्वतीद्वारा पूजित चरणकमलवाले! हे भक्तजनको ३ आठों सिद्धियोंकी विभूतियाँ प्रदान करनेवाले आपकी जय हो ॥ ३ ॥

महामायारूपी स्थलीमें विलास करनेवाले, ४ परमात्मा, वृषांक, अमरेश, कैलासवासी, अहिर्बुध्न्य, मान्य, मनु, मान प्रदान करनेवाले, अज, अनेक रूपोंवाले, अपनी आत्मामें रमण करनेवाले, शम्भु, ५ गणोंके नाथ, गिरिपर शयन करनेवाले, महान् ऐश्वर्य प्रदान करनेवाले तथा महाविष्णुके द्वारा स्तुत किये ६ जानेवाले आप महादेवको नमस्कार है ॥ ४–६ ॥ विष्णुके हृदयकमलमें निवास करनेवाले, महायोगमें रत रहनेवाले, योगसे प्राप्त होनेवाले, योगस्वरूप तथा ७ योगियोंके अधीश्वरको नमस्कार है ॥ ७ ॥

योगीश, योगोंके फलदाता, दीनोंको दान देनेमें तत्पर तथा दयासागरकी साक्षात् मूर्ति आपको ८ नमस्कार है ॥ ८ ॥

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अ ० ४ ] आर्तिप्रशमनायोग्रवीर्याय गुणमूर्तये वृषध्वजाय कालाय कालकालाय ते नमः सूत उवाच एवं स्तुतः स देवेशो यज्ञभुग्भिर्वृषध्वजः प्राह गम्भीरया वाचा प्रहसन्विबुधर्षभान् श्रीभगवानुवाच प्रसन्नोऽहं दिविषदः स्तोत्रेणोत्तमपूरुषाः मनोरथं पूरयामि सर्वेषां देवतर्षभाः देवा ऊचुः सर्वदेवेश गिरिश शशिमौलिविराजित आर्तानां शङ्करस्त्वं च शं विधेहि महाबल पर्वतो विन्ध्यनामास्ति मेरुद्वेष्टा महोन्नतः भानुमार्गनिरोद्धा हि सर्वेषां दुःखदोऽनघ तद्वृद्धिं स्तम्भयेशान सर्वकल्याणकृद्भव भानुसञ्चाररोधेन कालज्ञानं कथं भवेत् नष्टे स्वाहास्वधाकारे लोके कः शरणं भवेत् अस्माकं च भयार्तानां भवानेव हि दृश्यते दुःखनाशकरो देव प्रसीद गिरिजापते श्रीशिव उवाच नास्माकं शक्तिरस्तीह तद्वृद्धिस्तम्भने सुराः इममेवं वदिष्यामो भगवन्तं रमाधवम् । सोऽस्माकं प्रभुरात्मा च पूज्यः कारणरूपधृक् गोविन्दो भगवान्विष्णुः सर्वकारणकारणः तं गत्वा कथयिष्यामः स दुःखान्तो भविष्यति दशम स्कन्ध ६१५ । आर्त प्राणियोंका कष्ट निवारण करनेवाले, उग्र ॥ पराक्रमवाले, गुणमूर्ति, वृषध्वज, कालस्वरूप तथा कालोंके भी काल आपको नमस्कार है ॥ ९ ॥

सूतजी बोले- यज्ञभोक्ता देवताओंके द्वारा इस प्रकार स्तुत किये गये वृषध्वज देवेश शिव उन । श्रेष्ठ देवताओंसे हँसते हुए गम्भीर वाणीमें कहने ॥ १० | लगे — ॥१० ॥

श्रीभगवान् बोले — हे स्वर्गमें निवास करनेवाले! हे उत्तम पुरुषो! मैं [ आपलोगोंकी ] स्तुतिसे प्रसन्न । हूँ । हे श्रेष्ठ देवताओ! मैं आप सभीका मनोरथ पूर्ण करूँगा ॥ ११ ॥

॥ ११ देवता बोले- हे सर्वदेवेश! हे गिरिश! हे शशिशेखर! हे महाबल! आप दुःखी प्राणियों का कल्याण करनेवाले हैं, अतएव हमारा भी कल्याण । कीजिये ॥ १२ ॥

॥ १२ हे पुण्यात्मन्! विन्ध्य नामक एक पर्वत है, जिसने सुमेरुगिरिसे द्वेष करके आकाशमें अत्यधिक । ऊपर उठकर सूर्यका मार्ग रोक दिया है और वह ॥ १३ सबके लिये दुःखदायी बन गया है ॥१३ ॥

हे ईशान! उसकी वृद्धिको रोक दीजिये और । सबके लिये कल्याणकारी बन जाइये । सूर्यकी गति अवरुद्ध हो जानेपर लोगोंको कालज्ञान कैसे ॥ १४ होगा? लोकमें स्वाहा तथा स्वधाकारके विलुप्त हो जानेपर हमें कौन शरण देगा? भयसे पीड़ित हम । देवताओंके लिये एकमात्र शरणदाता तो केवल आप ॥ १५ ही परिलक्षित हो रहे हैं । हे पार्वतीपते! हे देव! आप हमपर प्रसन्न होइये और हमारे कष्टका निवारण । कीजिये ॥१४- १५३ ॥ श्रीशिव बोले- हे देवताओ! उस विन्ध्यगिरिकी ॥ १६ वृद्धिको रोकनेकी शक्ति इस समय मुझमें नहीं है । अब हमलोग भगवान् लक्ष्मीकान्तसे यह समाचार कहेंगे ॥ १६३ ॥

वे कारणरूपधारी, समस्त कारणोंके कारण, ॥ १७ आत्मारूप, गोविन्द भगवान् श्रीविष्णु हमलोगोंके पूज्य स्वामी हैं । अतएव उन्हींके पास जाकर । हम कहेंगे और वे हमारा दुःख दूर करनेवाले ॥ १८ | होंगे ॥ १७-१८ ॥

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६१६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ०५ इत्येवमाकर्ण्य गिरीशभाषितं इस प्रकार भगवान् शिवका कथन सुनकर इन्द्र देवाश्च सेन्द्राः सपयोजसम्भवाः । तथा ब्रह्मासहित समस्त देवता शंकरजीको आगे रुद्रं पुरस्कृत्य च वेपमाना करके थर - थर काँपते हुए शीघ्रतापूर्वक वैकुण्ठलोकके

वैकुण्ठलोकं प्रतिजग्मुरञ्जसा ॥ १ ९ । लिये प्रस्थित हुए ॥१ ९ ॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां दशमस्कन्धे रुद्रप्रार्थनं नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥

अथ पञ्चमोऽध्यायः देवताओंका वैकुण्ठलोकमें सूत उवाच

ते गत्वा देवदेवेशं रमानाथं जगद्गुरुम् ।

विष्णुं कमलपत्राक्षं ददृशुः प्रभयान्वितम् ॥

स्तोत्रेण तुष्टुवुर्भक्त्या गद्गदस्वरसत्कृताः । देवा ऊचुः जय विष्णो रमेशाद्य महापुरुष पूर्वज ॥

दैत्या कामजनक सर्वकामफलप्रद ।

महावराह गोविन्द महायज्ञस्वरूपक ॥

महाविष्णो ध्रुवेशाद्य जगदुत्पत्तिकारण ।

मत्स्यावतारे वेदानामुद्धाराधाररूपक ॥

सत्यव्रत धराधीश मत्स्यरूपाय ते नमः ।

जयाकूपार सुरकार्यसमर्पक ॥

अमृताप्तिकरेशान कूर्मरूपाय ते नमः ।

जयादिदैत्यनाशार्थमादिसूकररूपधृक् ॥

मह्युद्धारकृतोद्योगकोलरूपाय ते नमः ।

नारसिहं वपुः कृत्वा महादैत्यं ददार यः ॥

करजैर्वरदृप्ताङ्गं तस्मै नृहरये नमः ।

वामनं रूपमास्थाय त्रैलोक्यैश्वर्यमोहितम् ॥

बलिं सञ्छलयामास तस्मै वामनरूपिणे । जाकर भगवान् विष्णुकी स्तुति करना सूतजी बोले- वैकुण्ठमें जाकर उन देवताओंने कमलपत्रके समान नेत्रोंवाले, देवदेवेश्वर, रमाकान्त, जगद्गुरु भगवान् विष्णुको लक्ष्मीजीके साथ विराजमान १ देखा । वे गद्गद वाणीसे सत्कार करते हुए भक्तिपूर्वक स्तोत्रसे उनकी स्तुति करने लगे ॥ १३ ॥

देवता बोले- हे विष्णो! हे रमेश! हे आद्य! हे महापुरुष! हे पूर्वज! हे दैत्यशत्रु! हे कामजनक! २ हे सम्पूर्ण कामनाओंके फल प्रदान करनेवाले! हे महावराह! हे गोविन्द! हे महायज्ञस्वरूप! आपकी जय हो ॥ २-३ ॥ ३ हे महाविष्णो! हे ध्रुवेश! हे आद्य! हे जगत्की उत्पत्तिके कारण! हे मत्स्यावतारमें वेदोंका उद्धार करनेके लिये आधारस्वरूप! हे सत्यव्रत! हे धराधीश! ४ आप मत्स्यरूपधारीको नमस्कार है ॥ ४३ ॥

हे कच्छपावतार! हे दैत्यशत्रु! हे देवकार्यसमर्पक! आपकी जय हो । अमृतकी प्राप्ति करानेवाले हे ५ ईश्वर! आप कूर्मरूपधारीको नमस्कार है ॥ ५३ ॥

आदिदैत्य हिरण्याक्षका संहार करनेके लिये सूकररूप- धारी हे ईश्वर! आपकी जय हो । पृथ्वीका उद्धार करने हेतु उद्योगपरायण आप वराहरूपधारीको ६ नमस्कार है ॥६३ ॥

नृसिंहका रूप धारणकर जिन्होंने वरदानसे उन्मत्त अंगोंवाले महान् दैत्य हिरण्यकशिपुको अपने ७ नखोंसे विदीर्ण कर डाला, उन नृसिंह भगवान्‌को नमस्कार है ॥ ७३ ॥

वामनरूप धारणकर जिन्होंने त्रिलोकीके ऐश्वर्यसे ८ मोहित राजा बलिको छला था, उन वामनरूपधारीको नमस्कार है ॥ ८३ ॥

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अ ० ५ ] दशम दुष्टक्षत्रविनाशाय सहस्त्रकरशत्रवे ॥ ९

रेणुकागर्भजाताय जामदग्न्याय ते नमः ।

दुष्टराक्षसपौलस्त्यशिरश्छेदपटीयसे ॥१०

श्रीमद्दाशरथे तुभ्यं नमोऽनन्तक्रमाय च ।

कंसदुर्योधनाद्यैश्च दैत्यैः पृथ्वीशलाञ्छनैः ॥ ११

भाराक्रान्तां महीं योऽसावुज्जहार महाविभुः ।

धर्मं संस्थापयामास पापं कृत्वा सुदूरतः ॥ १२

तस्मै कृष्णाय देवाय नमोऽस्तु बहुधा विभो ।

दुष्टयज्ञविघाताय पशुहिंसानिवृत्तये ॥ १३

बौद्धरूपं दधौ योऽसौ तस्मै देवाय ते नमः ।

म्लेच्छप्रायेऽखिले लोके दुष्टराजन्यपीडिते ॥ १४

कल्किरूपं समादध्यौ देवदेवाय ते नमः ।

दशावतारास्ते देव भक्तानां रक्षणाय वै ॥ १५

दुष्ट दैत्यविघाताय तस्मात्त्वं सर्वदुःखहृत् ।

जय भक्तार्तिनाशाय धृतं नारीजलात्मसु ॥ १६

रूपं येन त्वया देव कोऽन्यस्त्वत्तो दयानिधिः ।

इत्येवं देवदेवेशं स्तुत्वा श्रीपीतवाससम् ॥ १७

प्रणेमुर्भक्तिसहिताः साष्टाङ्गं विबुधर्षभाः ।

तेषां स्तवं समाकर्ण्य देवः श्रीपुरुषोत्तमः ॥ १८

उवाच विबुधान्सर्वान् हर्षयञ्छ्रीगदाधरः । श्रीभगवानुवाच प्रसन्नोऽस्मि स्तवेनाहं देवास्तापं विमुञ्चथ ॥ १ ९ भवतां नाशयिष्यामि दुःखं परमदुःसहम् । स्कन्ध ६१७ दुष्ट क्षत्रियोंका संहार करनेवाले, कार्तवीर्य सहस्रार्जुनके शत्रु तथा रेणुकाके गर्भ से उत्पन्न आप जमदग्निपुत्र परशुरामको नमस्कार है ॥ ९ ३ ॥ पुलस्त्यनन्दन दुराचारी राक्षस रावणके सिर काटनेमें परम पटु, अनन्त पराक्रमवाले आप दशरथपुत्र श्रीमान् रामको नमस्कार है ॥ १०३ ॥

राजाओंके लिये कलंकस्वरूप कंस, दुर्योधन आदि दैत्योंके द्वारा भाराक्रान्त पृथ्वीका जिन महाप्रभुने उद्धार किया तथा पापोंका अन्त करके जिन्होंने धर्मकी स्थापना की, हे विभो! उन आप श्रीकृष्णभगवान्‌को बार - बार नमस्कार है ॥ ११-१२३ ॥ दुष्ट यज्ञोंको विनष्ट करने तथा पशुहिंसा रोकनेके लिये जिन्होंने बौद्धरूप धारण किया; उन आप बुद्धदेवको नमस्कार है ॥ १३३ ॥

सम्पूर्ण जगत् में म्लेच्छोंका बाहुल्य हो जानेपर तथा दुष्ट राजाओंद्वारा प्रजाओंको पीड़ित किये जानेपर | आपने कल्किरूप धारण किया था; उन आप देवाधिदेवको नमस्कार है ॥ १४३ ॥

हे देव! आपके ये दसों अवतार भक्तोंकी रक्षाके लिये तथा दुष्ट राक्षसोंके विनाशके लिये ही हुए हैं, अतएव आप सभी प्राणियोंका दुःख हरनेवाले हैं ॥ १५३ ॥

भक्तोंका दुःख दूर करनेके लिये आपने मोहिनी स्त्री तथा जल - जन्तुओंका रूप धारण किया, अतएव हे देव! आपके अतिरिक्त दूसरा कौन दयासागर हो सकता है? आपकी जय हो ॥ १६३ ॥

इस प्रकार पीताम्बरधारी देवदेवेश श्रीहरिका स्तवन करके उन श्रेष्ठ देवताओंने भक्तिपूर्वक उन्हें साष्टांग प्रणाम किया ॥ १७३ ॥

उनकी स्तुति सुनकर गदाधर पुरुषोत्तम भगवान् विष्णु सभी देवताओंको हर्षित करते हुए बोले— ॥ १८३ ॥

श्रीभगवान् बोले – - हे देवताओ! मैं आपलोगोंकी स्तुति से प्रसन्न हूँ, आपलोग शोकका त्याग कर दें । मैं आपलोगोंके इस परम दुःसह कष्टको दूर करूँगा ॥ १ ९ ३ ॥

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६१८ वृणुध्वं च वरं मत्तो देवाः परमदुर्लभम् ॥ ददामि परमप्रीतः स्तवस्यास्य प्रसादतः य एतत्पठते स्तोत्रं कल्य उत्थाय मानवः ॥

मयि भक्तिं परां कृत्वा न तं शोकः स्पृशेत्कदा ।

अलक्ष्मीः कालकर्णी च नाक्रामेत्तद्गृहं सुराः ॥

नोपसर्गा न वेताला न ग्रहा ब्रह्मराक्षसाः ।

न रोगा वातिकाः पैत्ताः श्लेष्मसम्भविनस्तथा ॥

नाकालमरणं तस्य कदापि च भविष्यति ।

सन्ततिश्चिरकालस्था भोगाः सर्वे सुखादयः ॥

सम्भविष्यन्ति तन्मर्त्यगृहे यः स्तोत्रपाठकः ।

किं पुनर्बहुनोक्तेन स्तोत्रं सर्वार्थसाधकम् ॥

एतस्य पठनान्नृणां भुक्तिमुक्ती न दूरतः ।

देवा भवत्सु यद्दुःखं कथ्यतां तदसंशयम् ॥

नाशयामि न सन्देहश्चात्र कार्योऽणुरेव च ।

एवं श्रीभगवद्वाक्यं श्रुत्वा सर्वे दिवौकसः ।

प्रसन्नमनसः सर्वे पुनरूचुर्वृषाकपिम् ॥

श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ६ २० हे देवताओ! आपलोग मुझसे परम दुर्लभ वर माँग लीजिये; [ आपलोगोंकी ] इस स्तुतिके प्रभावसे । अति प्रसन्न होकर मैं वर प्रदान करूँगा ॥ २०३ ॥

२१ जो मनुष्य प्रातः काल उठकर मुझमें दृढ़ भक्ति रखकर इस स्तोत्रका पाठ करेगा, उसे कभी शोक स्पर्श नहीं कर सकेगा । हे देवताओ! दरिद्रता तथा २२ । दुर्भाग्य उसके घरपर आक्रमण नहीं कर सकेंगे । विघ्न - बाधाएँ, वेताल, ग्रह तथा ब्रह्मराक्षस उसे पीड़ित नहीं कर सकते । वात - पित्त - कफसम्बन्धी रोग २३ भी उसे नहीं होंगे । उसकी अकाल - मृत्यु कभी नहीं होगी और उसकी सन्तानें दीर्घ कालतक जीवित रहेंगी । जो इस स्तोत्रका पाठ करेगा, उस मनुष्यके २४ घरमें सुख आदि सभी भोग - साधन विद्यमान रहेंगे । अधिक कहनेसे क्या प्रयोजन, यह स्तोत्र सभी अर्थोंका परम साधन करनेवाला है ॥ २१–२५ ॥ २५ इस स्तोत्रका पाठ करनेसे मनुष्योंके लिये भोग तथा मोक्ष उनसे दूर नहीं रहेंगे । हे देवताओ! आपलोगोंको जो कष्ट हो, उसे आप नि: संकोच २६ बताइये, मैं उसे दूर करूँगा; इसमें आपलोगोंको अणुमात्र भी सन्देह नहीं करना चाहिये ॥ २६३ ॥

इस प्रकार श्रीभगवान्‌का वचन सुनकर सभी देवताओंका मन प्रसन्नतासे भर गया और वे पुनः २७ । वृषाकपि भगवान् विष्णुसे कहने लगे ॥२७ ॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां दशमस्कन्धे श्रीविष्णुना देवेभ्यो वरप्रदानं नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥

अथ षष्ठोऽध्यायः भगवान् विष्णुका देवताओंको काशीमें अगस्त्यजीके भेजना, देवताओंकी अगस्त्यजीसे प्रार्थना सूत उवाच सूतजी बोले – - [ हे श्रीशस्य वचनाद्देवाः सन्तुष्टाः सर्व एव हि । श्रीविष्णुके वचनसे सभी प्रसन्नमनसो भूत्वा पुनरेनं समूचिरे ॥ १ उन्होंने प्रसन्नचित्त होकर प्रकार कहा- ॥१ ॥

पास ऋषियो! ] लक्ष्मीकान्त देवता सन्तुष्ट हो गये । उन भगवान्से पुनः इस देवा ऊचुः देवता बोले- हे देवदेव! हे महाविष्णो! देवदेव महाविष्णो सृष्टिस्थित्यन्तकारण । हे सृजन - पालन - संहारके कारण! हे विष्णो! विष्णो विन्ध्यनगोऽर्कस्य मार्गरोधं करोति हि ॥ विन्ध्यपर्वतने सूर्यका मार्ग रोक दिया है । सूर्यका

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अ ० ६ ] दशम

तेन भानुविरोधेन सर्व एव महाविभो ।

अलब्धभोगभागा हि किं कुर्मः कुत्र याम हि ॥ ३

श्रीभगवानुवाच

या कर्त्री सर्वजगतामाद्या च कुलवर्धनी ।

देवी भगवती तस्याः पूजकः परमद्युतिः ॥ ४

अगस्त्य मुनिवर्योऽसौ वाराणस्यां समासते ।

तत्तेजोवञ्चकोऽगस्त्यो भविष्यति सुरोत्तमाः ॥ ५

तं प्रसाद्य द्विजवरमगस्त्यं परमौजसम् ।

याचध्वं विबुधाः काशीं गत्वा निःश्रेयसः पदीम् ॥ ६

सूत उवाच

एवं समुपदिष्टास्ते विष्णुना विबुधोत्तमाः ।

प्रतीताः प्रणताः सर्वे जग्मुर्वाराणसीं पुरीम् ॥

क्षणेन विबुधश्रेष्ठा गत्वा काशीपुरीं शुभाम् ।

मणिकर्णी समाप्लुत्य सचैलं भक्तिसंयुताः ॥ ८

सन्तर्प्य देवांश्च पितॄन्दत्त्वा दानं विधानतः ।

आगत्य मुनिवर्यस्य चाश्रमं परमं महत् ॥ ९

प्रशान्तश्वापदाकीर्णं नानापादपसङ्कुलम् ।

मयूरैः सारसैर्हंसैश्चक्रवाकैरुपाश्रितम् ॥ १०

महावराहैः कोलैश्च व्याघ्रैः शार्दूलकैरपि ।

मृगै रुरुभिरत्यर्थं खड्गैः शरभकैरपि ॥ ११

समाश्रितं परमया लक्ष्म्या मुनिवरं तदा ।

दण्डवत्पतिताः सर्वे प्रणेमुश्च पुनः पुनः ॥ १२

देवा ऊचुः

जय द्विजगणाधीश मान्य पूज्य धरासुर ।

वातापीबलनाशाय नमस्ते कुम्भयोनये ॥ १३

लोपामुद्रापते श्रीमन्मित्रावरुणसम्भव ।

सर्वविद्यानिधेऽगस्त्य शास्त्रयोने नमोऽस्तु ते ॥ १४

यस्योदये प्रसन्नानि भवन्त्युज्ज्वलभांज्यपि ।

तोयानि तोयराशीनां तस्मै तुभ्यं नमोऽस्तु ते ॥ १५

स्कन्ध ६१ ९ मार्ग अवरुद्ध हो जानेके कारण हमलोगोंको यज्ञभाग नहीं मिल पा रहा है । अतएव हे महाविभो! अब हमलोग क्या करें तथा कहाँ जायँ? ॥ २ - ३ ॥ श्रीभगवान् बोले — हे उत्तम देवगण! सम्पूर्ण जगत्की रचना करनेवाली, आदिस्वरूपिणी तथा कुलकी अभिवृद्धि करनेवाली जो भगवती अम्बा हैं, उन्हींके उपासक परम तेजस्वी मुनिश्रेष्ठ अगस्त्यजी हैं । वे इस समय वाराणसीमें विद्यमान हैं । वे अगस्त्यमुनि ही उस विन्ध्यगिरिके तेजको निरस्त करनेमें समर्थ होंगे । हे देवताओ! मोक्षपद प्रदान करनेवाली उस काशीपुरीमें जाकर परम ओजस्वी द्विजश्रेष्ठ अगस्त्यजीको प्रसन्न करके याचना कीजिये ॥ ४–६ ॥ सूतजी बोले – [ हे मुनियो! ] इस प्रकार भगवान् विष्णुसे आदेश प्राप्त करके वे सभी श्रेष्ठ देवता आश्वस्त होकर नम्रतापूर्वक काशीपुरीके लिये प्रस्थित हुए ॥ ७ ॥

क्षणभरमें पावन काशीपुरीमें पहुँचकर वे श्रेष्ठ देवगण मणिकर्णिकातीर्थमें भक्तिपूर्वक सचैल ( वस्त्रसहित ) स्नान करके पुनः देवतर्पण तथा पितृतर्पण करनेके बाद विधिपूर्वक दान देकर मुनिवर अगस्त्यके परम पवित्र आश्रमपर आये, जो शान्तस्वभाववाले हिंसक पशुओंसे व्याप्त था; वहाँ नानाविध वृक्ष उगे हुए थे । वह आश्रम मयूर, सारस, हंस, चक्रवाक, महावराह, शूकर, व्याघ्र, सिंह, मृग, काले हिरन, गैंडा तथा शरभ आदि जन्तुओंसे परिपूर्ण था । सभी देवता परम कान्तिसे सम्पन्न मुनिवर अगस्त्यके चरणोंमें दण्डकी भाँति गिर पड़े और बार - बार उन्हें प्रणाम करने लगे ॥ ८ - १२ ॥ देवता बोले- हे द्विजगणोंके स्वामी! हे मान्य! हे पूज्य! हे भूसुर! हे वातापीका बल नष्ट करनेवाले तथा घटसे प्रकट होनेवाले आपको नमस्कार है, आपकी जय हो ॥ १३ ॥ हे लोपामुद्रापते! हे श्रीमन्! हे मित्रावरुणसे

आविर्भूत! हे सम्पूर्ण विद्याओंके भण्डार! हे शास्त्रयोनि अगस्त्यमुने! आपको नमस्कार है ॥ १४ ॥ जिनके

उदय होनेपर समुद्रोंका जल प्रसन्न तथा विमल हो जाता है, उन आपको नमस्कार स्वीकार हो ॥ १५ ॥

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६२० काशपुष्पविकासाय लङ्कावासप्रियाय च जटामण्डलयुक्ताय सशिष्याय नमोऽस्तु ते जय सर्वामरस्तव्य गुणराशे महामुने वरिष्ठाय च पूज्याय सस्त्रीकाय नमोऽस्तु ते प्रसादः क्रियतां स्वामिन् वयं त्वां शरणं गताः । दुस्तराच्छैलजाद्दुःखात्पीडिताः परमद्युते

इत्येवं संस्तुतोऽगस्त्यो मुनिः परमधार्मिकः ।

प्राह प्रसन्नया वाचा विहसन् द्विजसत्तमः ॥

मुनिरुवाच

भवन्तः परमश्रेष्ठा देवास्त्रिभुवनेश्वराः ।

लोकपाला महात्मानो निग्रहानुग्रहक्षमाः ॥

योऽमरावत्यधीशानः कुलिशं यस्य चायुधम् ।

सिद्व्यष्टकं च यद्द्द्वारि स शक्रो मरुतां पतिः ॥

वैश्वानरः कृशानुर्हि हव्यकव्यवहो ऽनिशम् ।

मुखं सर्वामराणां हि सोऽग्निः किं तस्य दुष्करम् ॥

रक्षोगणाधिपो भीमः सर्वेषां कर्मसाक्षिकः ।

दण्डव्यग्रकरो देवः किं तस्यासुकरं सुराः ॥

तथापि यदि देवेशाः कार्यं मच्छक्तिसिद्धिभृत् ।

अस्ति चेदुच्यतां देवाः करिष्यामि न संशयः ॥

एवं मुनिवरेणोक्तं निशम्य विबुधर्षभाः ।

प्रतीताः प्रणयोद्विग्नाः कार्यं निजगदुर्निजम् ॥

महर्षे विन्ध्यगिरिणा निरुद्धोऽर्कविनिर्गमः ।

त्रैलोक्यं तेन संविष्टं हाहाभूतमचेतनम् ॥

श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ६ । काशपुष्पको विकसित करनेवाले, लंकावास ॥ १६ ( श्रीराम ) - के परम प्रिय, जटासमूहसे सम्पन्न तथा शिष्योंसे निरन्तर आवृत आपको नमस्कार है ॥ १६ ॥

। समस्त देवताओंसे स्तुत होनेवाले हे महामुने! हे गुणनिधे! वरिष्ठ, पूज्य तथा भार्यासहित आपको ॥ १७ नमस्कार है, आपकी जय हो ॥१७ हे स्वामिन्! आप हमपर हम आपकी शरणको प्राप्त हुए हैं ॥ १८ । विन्ध्यगिरिद्वारा उत्पन्न किये गये हमलोग बहुत पीड़ित हैं ॥ १८ ॥

देवताओंके इस प्रकार स्तुति धर्मनिष्ठ द्विजश्रेष्ठ अगस्त्यमुनि हँसते १ ९ युक्त वाणीमें कहने लगे – ॥१ ९ ॥ ॥ अनुग्रह करें; । हे परमद्युते! दु: सह कष्टसे करनेपर परम हुए प्रसन्नतासे मुनि बोले - हे देवताओ! आपलोग परम श्रेष्ठ, त्रिलोकीके स्वामी, लोकपाल, महान् आत्मावाले तथा निग्रह - अनुग्रह करनेमें सक्षम हैं ॥ २० ॥

२० जो अमरावतीपुरी स्वामी हैं, वज्र ही जिनका शस्त्र है, आठों सिद्धियाँ जिनके द्वारपर विराजमान रहती हैं तथा जो मरुद्गणोंके नायक हैं - वे ही ये इन्द्रदेव हैं ॥२१ ॥

२१ सर्वदा हव्य - कव्यका वहन करनेवाले, वैश्वानर तथा कृशानु नामसे प्रसिद्ध और सभी देवताओंके मुखस्वरूप जो ये अग्निदेव हैं, उनके लिये कौन - सा २२ कार्य दुष्कर है? ॥ २२ ॥

हे देवताओ! हाथमें दण्ड लेकर सदा व्यस्त रहनेवाले, सभी प्राणियोंके कर्मोंके साक्षीस्वरूप तथा राक्षसगणोंके अधिपति भयंकर यमदेवके लिये कौन-२३ सा कार्य सुकर नहीं है? तथापि हे देवताओ! मेरे सामर्थ्यसे यदि आपका कोई कार्य सिद्ध होनेवाला हो तो आप उसे बताइये । हे देवगण! मैं उसे अवश्य २४ करूँगा; इसमें सन्देह नहीं है ॥ २३-२४ ॥ मुनिवर अगस्त्यका वचन सुनकर वे श्रेष्ठ देवता आश्वस्त हो गये और अधीर होकर विनम्रतापूर्वक अपने कार्यके विषयमें बताने लगे - हे महर्षे! विन्ध्यपर्वतने २५ सूर्यका मार्ग निरुद्ध कर दिया है और तीनों लोकोंको आच्छादित कर रखा है, जिससे सर्वत्र हाहाकार मच गया है तथा सभी प्राणियोंमें अचेतनता उत्पन्न हो २६ | गयी है | २५-२६ ॥

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अ ० ७ ] दशम स्कन्ध ६२१ तद्वृद्धिं स्तम्भय मुने निजया तपसः श्रिया । हे मुने! आप अपने तपोबल तथा प्रतापसे उस भवतस्तेजसागस्त्य नूनं नम्रो भविष्यति । विन्ध्यगिरिकी वृद्धिको रोक दीजिये । हे अगस्त्य! आपके तेजसे वह अवश्य ही नम्र हो जायगा, इस समय एतदेवास्मदीयं च कार्यं कर्तव्यमस्ति हि ॥ २७ | आपको हमारा इतना ही कार्य सम्पन्न करना है ॥ २७ ॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां दशमस्कन्धे-अगस्त्याश्वासनवर्णनं नाम षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥

अथ सप्तमोऽध्यायः अगस्त्यजीकी कृपासे सूत उवाच

इति वाक्यं समाकर्ण्य विबुधानां द्विजोत्तमः ।

करिष्ये कार्यमेतद्वः प्रत्युवाच ततो मुनिः ॥ १

अङ्गीकृते तदा कार्ये मुनिना कुम्भजन्मना ।

देवाः प्रमुदिताः सर्वे बभूवुर्द्विजसत्तमाः ॥ २

ते देवा: स्वानि धिष्ण्यानि भेजिरे मुनिवाक्यतः ।

पत्नीं मुनिवरः श्रीमानुवाच नृपकन्यकाम् ॥ ३ ।

अये नृपसुते प्राप्तो विघ्नोऽनर्थस्य कारकः ।

भानुमार्गनिरोधेन कृतो विन्ध्यमहीभृता ॥ ४

आज्ञातं कारणं तच्च स्मृतं वाक्यं पुरातनम् ।

काशीमुद्दिश्य यद् गीतं मुनिभिस्तत्त्वदर्शिभिः ॥ ५

अविमुक्तं न मोक्तव्यं सर्वथैव मुमुक्षुभिः ।

किन्तु विघ्ना भविष्यन्ति काश्यां निवसतां सताम् ॥ ६

सोऽन्तरायो मया प्राप्तः काश्यां निवसता प्रिये ।

इत्येवमुक्त्वा भार्यां तां मुनिः परमतापनः ॥ ७

मणिकर्ण्य समाप्लुत्य दृष्ट्वा विश्वेश्वरं विभुम् ।

दण्डपाणिं समभ्यर्च्य कालराजं समागतः ॥ ८ ।

सूर्यका मार्ग खुलना सूतजी बोले - [ हे मुनियो! ] देवताओंका यह वचन सुनकर द्विजश्रेष्ठ अगस्त्यमुनिने उनसे कहा- — मैं आपलोगोंका यह कार्य करूँगा ॥ १ ॥

हे द्विजवरो! कुम्भसे आविर्भूत अगस्त्यमुनिके द्वारा देवकार्य करना स्वीकार कर लिये जानेपर समस्त देवता अत्यन्त हर्षित हो उठे ॥ २ ॥

मुनिके वचनसे आश्वस्त होकर जब वे देवता अपने - अपने स्थानोंको चले गये तब श्रीमान् मुनिवर अगस्त्यने अपनी पत्नी राजकन्या लोपामुद्रासे कहा— || 33 || हे राजपुत्रि! विन्ध्यगिरिने सूर्यके मार्गका अवरोध करके महान् अनर्थकारी विघ्न उपस्थित कर दिया है ॥४ ॥

मुझे इसका कारण ज्ञात हो गया । काशीको उद्देश्य करके तत्त्वदर्शी मुनियोंने जो कहा है, वह पुरातन वाक्य मुझे स्मरण हो आया कि मोक्षकी अभिलाषा रखनेवाले प्राणियोंको अविमुक्त काशीक्षेत्रका त्याग कभी नहीं करना चाहिये, किंतु काशीवास करनेवाले सत्पुरुषोंके समक्ष भी विघ्न आते हैं । हे प्रिये! काशीमें निवास कर रहे मेरे समक्ष भी वही बाधा उपस्थित हुई ॥५-६३ ॥ अपनी उन भार्यासे ऐसा कहकर परम तपस्वी मुनि अगस्त्य मणिकर्णिकाकुण्डमें स्नान करके तथा भगवान् विश्वनाथ और दण्डपाणिका सम्यक् पूजन करके कालभैरवका दर्शन करने वहाँ आये ॥ ७-८ ॥