देवी भागवत उत्तरार्द्ध — पृष्ठ 681–690
देवी भागवत उत्तरार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 681–690
पृष्ठ 681
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
६७२
पठ्यते मुनिभिः सर्वैर्मया पुत्र तथैव च ।
रुद्राक्षस्य फलं चैव त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् ॥
फलस्य दर्शने पुण्यं स्पर्शात्कोटिगुणं भवेत् ।
शतकोटिगुणं पुण्यं धारणाल्लभते नरः ॥
लक्षकोटिसहस्राणि लक्षकोटिशतानि च ।
जपाच्च लभते नित्यं नात्र कार्या विचारणा ॥
हस्ते चोरसि कण्ठे च कर्णयोर्मस्तके तथा ।
रुद्राक्षं धारयेद्यस्तु स रुद्रो नात्र संशयः ॥
अवध्यः सर्वभूतानां रुद्रवद्धि चरेद्भुवि ।
सुराणामसुराणां च वन्दनीयो यथा शिवः ॥
रुद्राक्षधारी सततं वन्दनीयस्तथा नरैः ।
उच्छिष्टो वा विकर्मस्थो युक्तो वा सर्वपातकैः ॥
मुच्यते सर्वपापेभ्यो रुद्राक्षस्य तु धारणात् ।
कण्ठे रुद्राक्षमाबध्य श्वापि वा म्रियते यदि ॥
सोऽपि मुक्तिमवाप्नोति किं पुनर्मानुषोऽपि सः ।
जपध्यानविहीनोऽपि रुद्राक्षं यदि धारयेत् ॥
सर्वपापविनिर्मुक्तः स याति परमां गतिम् ।
एकं वापि हि रुद्राक्षं कृत्वा यत्नेन धारयेत् ॥
एकविंशतिमुद्धृत्य रुद्रलोके महीयते ।
अतः परं प्रवक्ष्यामि रुद्राक्षस्य पुनर्विधिम् ॥
श्रीमद्देवीभागवत [ अ ०५ पाठ करते हैं और मैंने भी रुद्राक्ष - माहात्म्यके विषय में २७ पढ़ा है । हे पुत्र! रुद्राक्ष धारणका फल तीनों लोकोंमें विख्यात है | २५-२७ ॥ रुद्राक्ष - फलके दर्शनसे महान् पुण्य मिलता है, इसके स्पर्शसे करोड़ गुना अधिक पुण्य होता है २८ तथा इसे धारण कर लेनेपर मनुष्य सौ करोड़ गुना पुण्य प्राप्त करता है । रुद्राक्ष मालासे नित्य जप करनेसे वह सैकड़ों लाख करोड़ गुना तथा हजारों २ ९ लाख - करोड़ गुना पुण्य प्राप्त करता है, इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये ॥ २८-२९ ॥ जो अपने हाथमें, वक्षःस्थलपर, कण्ठमें, दोनों ३० कानोंमें तथा मस्तकपर रुद्राक्ष धारण करता है, वह साक्षात् रुद्र है; इसमें सन्देह नहीं है । वह सभी प्राणियोंसे अवध्य रहते हुए इस पृथ्वीपर रुद्रकी भाँति ३१ निर्भय होकर विचरण करता है और शिवजीकी तरह समस्त देवता तथा दानवोंके लिये वन्दनीय हो जाता है ॥ ३०-३१ ॥ सभी मनुष्य भी रुद्राक्ष धारण करनेवालेकी ३२ निरन्तर वन्दना करते हैं । उच्छिष्टकी भाँति त्याज्य, निषिद्ध कर्मोंमें रत तथा सभी प्रकारके पापोंसे युक्त मनुष्य भी रुद्राक्ष धारण करनेपर सभी पापोंसे मुक्त हो ३३ जाता है । गलेमें रुद्राक्ष बँधा हुआ कुत्ता भी यदि मर जाय तो वह भी मुक्ति प्राप्त कर लेता है, फिर मनुष्यकी बात ही क्या? ॥ ३२-३३३ ॥ ३४ जप तथा ध्यानसे विहीन रहता हुआ भी यदि कोई मनुष्य रुद्राक्ष धारण कर ले तो वह समस्त पापोंसे मुक्त होकर परम गतिको प्राप्त होता है । यदि कोई एक भी रुद्राक्ष प्रयत्नपूर्वक धारण ३५ करता है तो वह अपनी इक्कीस पीढ़ियोंका उद्धार करके अन्तमें रुद्रलोकमें प्रतिष्ठित होता है । इसके बाद अब मैं रुद्राक्षकी और भी विधिका वर्णन ३६ | करूँगा || ३४-३६ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायामेकादशस्कन्धे रुद्राक्षजपमालाविधानवर्णनं नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥
पृष्ठ 682
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० ६ ] एकादश स्कन्ध ६७३ अथ षष्ठोऽध्यायः रुद्राक्षधारणकी महिमाके सन्दर्भमें गुणनिधिका उपाख्यान ईश्वर उवाच महासेन कुशग्रन्थिपुत्राजीवादयः परे रुद्राक्षस्य तु नैकोऽपि कलामर्हति षोडशीम् ॥ पुरुषाणां यथा विष्णुर्ग्रहाणां च यथा रविः नदीनां तु यथा गङ्गा मुनीनां कश्यपो यथा उच्चैःश्रवा यथाश्वानां देवानामीश्वरो यथा देवीनां तु यथा गौरी तद्वच्छ्रेष्ठमिदं भवेत् ॥ नातः परतरं स्तोत्रं नातः परतरं व्रतम् । अक्षय्येषु च दानेषु रुद्राक्षस्तु विशिष्यते शिवभक्ताय शान्ताय दद्याद्रुद्राक्षमुत्तमम् । तस्य पुण्यफलस्यान्तं न चाहं वक्तुमुत्सहे
धृतरुद्राक्षकण्ठाय यस्त्वन्नं सम्प्रयच्छति ।
त्रिः सप्तकुलमुद्धृत्य रुद्रलोकं स गच्छति ॥
यस्य भाले विभूतिर्न नाङ्गे रुद्राक्षधारणम् ।
न शम्भोर्भवने पूजा स विप्रः श्वपचाधमः ॥
खादन्मांसं पिबन्मद्यं सङ्गच्छन्नन्त्यजानपि ।
पातकेभ्यो विमुच्येत रुद्राक्षे शिरसि स्थिते ॥
सर्वयज्ञतपोदानवेदाभ्यासैश्च यत्फलम् ।
तत्फलं लभते सद्यो रुद्राक्षस्य तु धारणात् ॥
वेदैश्चतुर्भिर्यत्पुण्यं पुराणपठनेन च ।
यत्तीर्थसेवनेनैव सर्वविद्यादिभिस्तथा ॥
तत्पुण्यं लभते सद्यो रुद्राक्षस्य तु धारणात् ।
प्रयाणकाले रुद्राक्षं बन्धयित्वा म्रियेद्यदि ॥
स रुद्रत्वमवाप्नोति पुनर्जन्म न विद्यते । 1898 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ द्वितीय खण्ड ] –22 A ईश्वर बोले - हे महासेन! कुश - ग्रन्थि, पुत्रजीव । ( जियापोती ) आदिसे निर्मित तथा अन्य वस्तुसे बनी १ हुई मालाओंमेंसे कोई एक भी रुद्राक्ष - मालाकी सोलहवीं कलाके बराबर भी नहीं हो सकती ॥ १ ॥
। जैसे पुरुषोंमें विष्णु, ग्रहोंमें सूर्य, नदियोंमें ॥ २ गंगा, मुनियोंमें कश्यप, घोड़ोंमें उच्चैःश्रवा, देवताओंमें महेश्वर, देवियोंमें गौरी श्रेष्ठ हैं; उसी प्रकार यह । रुद्राक्ष श्रेष्ठ है ॥२-३ ॥ ३ रुद्राक्षसे बढ़कर न कोई स्तोत्र है और न कोई व्रत है । सभी प्रकारके अक्षय दानोंकी तुलना में रुद्राक्ष - दान विशेष महिमावाला है ॥ ४ ॥
॥ ४ जो मनुष्य किसी शान्त स्वभाववाले शिवभक्तको उत्तम रुद्राक्षका दान करता है, उसके पुण्यफलकी सीमाका वर्णन करनेमें मैं समर्थ नहीं हूँ ॥ ५ ॥
॥ ५ जो मनुष्य कण्ठमें रुद्राक्ष धारण किये हुए किसी व्यक्तिको अन्न प्रदान करता है, वह अपने इक्कीस कुलोंका उद्धार करके रुद्रलोकको जाता है ॥ ६ ॥
६ जो ब्राह्मण अपने मस्तकपर भस्म नहीं लगाता, शरीरपर रुद्राक्ष नहीं धारण करता और शिवमन्दिर में पूजा नहीं करता, वह चाण्डालोंमें भी अधम है ॥ ७ ॥
७ मांस खानेवाला, सुरापान करनेवाला तथा अन्त्यजोंके सान्निध्यमें रहनेवाला भी सिरपर रुद्राक्ष धारण करनेपर तज्जन्य पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥ ८ ॥
८ सभी प्रकारके यज्ञ, तप, दान तथा वेदाध्ययन करनेसे जो फल प्राप्त होता है, वह फल मात्र रुद्राक्ष-धारणसे शीघ्र ही प्राप्त हो जाता है ॥ ९ ॥
९ चारों वेदोंका स्वाध्याय करने, पुराणोंको पढ़ने, तीर्थों का सेवन करने तथा सभी विद्याओंका अध्ययन करनेके फलस्वरूप जो पुण्य होता है, वह पुण्य १० मनुष्य केवल रुद्राक्षधारणसे तत्काल प्राप्त कर लेता है ॥१०३ ॥
प्रयाणकालमें रुद्राक्ष धारण करके यदि कोई ११ मृत्युको प्राप्त होता है, तो वह रुद्रत्वको प्राप्त हो जाता है और उसका पुनर्जन्म नहीं होता ॥ ११३ ॥
पृष्ठ 683
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
६७४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ६ रुद्राक्षं धारयेत्कण्ठे बाह्वोर्वा म्रियते यदि ॥
कुलैकविंशमुत्तार्य रुद्रलोके वसेन्नरः ।
ब्राह्मणो वापि चाण्डालो निर्गुणः सगुणोऽपि च ॥
भस्मरुद्राक्षधारी यः स देवत्वं शिवं व्रजेत् ।
शुचिर्वाप्यशुचिर्वापि तथाभक्ष्यस्य भक्षकः ॥
म्लेच्छो वाप्यथ चाण्डालो युतो वा सर्वपातकैः ।
रुद्राक्षधारणादेव स रुद्रो नात्र संशयः ॥
शिरसा धारिते कोटिः कर्णयोर्दशकोटयः ।
शतकोटिर्गले बद्धो मूर्ध्नि कोटिसहस्रकम् ॥
अयुतं चोपवीते तु लक्षकोटिर्भुजे स्थिते ।
मणिबन्धे तु रुद्राक्षो मोक्षसाधनकः परः ॥
रुद्राक्षधारको भूत्वा यत्किञ्चित्कर्म वैदिकम् ।
कुर्वन्विप्रः सदा भक्त्या महदाप्नोति तत्फलम् ॥
रुद्राक्षमालिकां कण्ठे धारयेद्भक्तिवर्जितः ।
पापकर्मा तु यो नित्यं स मुक्तः सर्वबन्धनात् ॥
रुद्राक्षार्पितचेता यो रुद्राक्षस्तु न वै धृतः ।
असौ माहेश्वरो लोके नमस्यः स तु लिङ्गवत् ॥
अविद्यो वा सविद्यो वा रुद्राक्षस्य तु धारणात् ।
शिवलोकं प्रपद्येत कीकटे गर्दभो यथा ॥
स्कन्द उवाच
रुद्राक्षान्सन्दधे देव गर्दभः केन हेतुना ।
कीकटे केन वा दत्तस्तद् ब्रूहि परमेश्वर ॥
१२ यदि मनुष्य कण्ठमें या दोनों भुजाओंपर रुद्राक्ष धारण किये हुए मर जाता है तो वह अपनी इक्कीस पीढ़ियोंको तारकर अन्तमें रुद्रलोकमें निवास १३ | करता है ॥ १२३ ॥
जो भस्म तथा रुद्राक्ष धारण करता है; वह महादेव शिवके लोकमें पहुँच जाता है, चाहे वह ब्राह्मण हो या चाण्डाल और गुणवान् हो अथवा गुणसे रहित । पवित्र १४ हो अथवा अपवित्र तथा चाहे वह अभक्ष्य पदार्थोंका भक्षण करनेवाला ही क्यों न हो । म्लेच्छ हो अथवा चाण्डाल हो या सभी पातकोंसे युक्त ही क्यों न हो, वह १५ केवल रुद्राक्षधारणसे ही रुद्रस्वरूप हो जाता है, इसमें संशय नहीं है | १३ –१५ ॥ सिरपर रुद्राक्ष धारण करनेसे करोड़ गुना, दोनों कानोंमें पहननेसे दस करोड़ गुना, गलेमें धारण १६ करनेसे सौ करोड़ गुना, मस्तकपर धारण करनेसे हजार करोड़ गुना, यज्ञोपवीतमें धारण करनेसे इससे भी दस हजार गुना तथा दोनों भुजाओंपर धारण करनेसे लाख करोड़ गुना फल मिलता है और १७ मणिबन्धमें धारण करनेपर यह रुद्राक्ष मोक्षका परम साधन बन जाता है ॥ १६-१७ ॥ कोई ब्राह्मण रुद्राक्ष धारण करके भक्तिपूर्वक जो १८ कुछ भी वैदिक कर्म करता है, उसे उसका महान् फल प्राप्त होता है ॥ १८ ॥
श्रद्धारहित होकर भी यदि कोई गलेमें रुद्राक्ष धारण कर ले तो नित्य पापकर्ममें रत रहनेपर भी वह १ ९ सभी बन्धनोंसे छूट जाता है ॥१ ९ ॥ जो अपने मनमें रुद्राक्ष धारण करनेकी भावना रखता है, किंतु उसे धारण नहीं कर पाता, तो भी वह २० महेश्वर - स्वरूप है और इस लोकमें शिवलिंगकी भाँति नमस्कारके योग्य है ॥ २० ॥
कोई व्यक्ति चाहे विद्यासम्पन्न हो अथवा विद्यारहित, वह रुद्राक्ष धारण कर लेनेमात्रसे ही २१ शिवलोकको प्राप्त हो जाता है, जैसे कीकट नामक स्थानविशेषमें एक गर्दभ शिवलोक चला गया था ॥ २१ ॥
स्कन्द बोले - हे देव! उस गर्दभने कीकटदेशमें किस कारणसे रुद्राक्षोंको धारण किया था और किसने उसे रुद्राक्ष दिया था? हे परमेश्वर! वह सारा वृत्तान्त २२ । आप मुझे बताइये ॥ २२ ॥
1898 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ द्वितीय खण्ड ] —22 B
पृष्ठ 684
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० ६ ] एकादश श्रीभगवानुवाच
शृणु पुत्र पुरावृत्तं गर्दभो विन्ध्यपर्वते ।
धत्ते रुद्राक्षभारं तु वाहितः पथिकेन तु ॥ २३
श्रान्तोऽसमर्थस्तद्भारं वोढुं पतितवान्भुवि ।
प्राणैस्त्यक्तस्त्रिनेत्रस्तु शूलपाणिर्महेश्वरः ॥ २४
मत्प्रसादान्महासेन मदन्तिकमुपागतः ।
यावद्वक्त्रस्य संख्यानं रुद्राक्षाणां सुदुर्लभम् ॥ २५
तावद्युगसहस्त्राणि शिवलोके महीयते ।
स्वशिष्येभ्यस्तु वक्तव्यं नाशिष्येभ्यः कदाचन ॥ २६
अभक्तेभ्योऽपि मूर्खेभ्यः कदाचिन्न प्रकाशयेत् ।
अभक्तो वास्तु भक्तो वा नीचो नीचतरोऽपि वा ॥ २७
रुद्राक्षान्धारयेद्यस्तु मुच्यते सर्वपातकैः ।
रुद्राक्षधारणं पुण्यं केन वा सदृशं भवेत् ॥ २८
महाव्रतमिदं प्राहुर्मुनयस्तत्त्वदर्शिनः ।
सहस्त्रं धारयेद्यस्तु रुद्राक्षाणां धृतव्रतः ॥ २ ९
तं नमन्ति सुराः सर्वे यथा रुद्रस्तथैव सः ।
अभावे तु सहस्रस्य बाह्वोः षोडश षोडश ॥ ३०
एकं शिखायां करयोर्द्वादश द्वादशैव तु ।
द्वात्रिंशत्कण्ठदेशे तु चत्वारिंशच्च मस्तके ॥ ३१
एकैकं कर्णयोः षट् षट् वक्षस्यष्टोत्तरं शतम् ।
यो धारयति रुद्राक्षान् रुद्रवत्स तु पूज्यते ॥ ३२
मुक्ताप्रवालस्फटिकरौप्यवैदूर्यकाञ्चनैः ।
समेतान्धारयेद्यस्तु रुद्राक्षान्स शिवो भवेत् ॥ ३३
केवलानपि रुद्राक्षान्यद्यालस्याद् बिभर्ति यः ।
तं न स्पृशन्ति पापानि तमांसीव विभावसुम् ॥ ३४ ।
1898 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ द्वितीय खण्ड ] —22 C स्कन्ध ६७५ श्रीभगवान् बोले - हे पुत्र! अब तुम एक प्राचीन वृत्तान्त सुनो । एक गर्दभ विन्ध्यपर्वतपर रुद्राक्षका बोझा ढोया करता था । एक समय पथिक अधिक बोझा लादकर उसे हाँकने लगा, जिससे अत्यधिक थका हुआ वह गर्दभ उस बोझको ढोनेमें असमर्थ होकर भूमिपर गिर पड़ा और उसने प्राण त्याग दिये । हे महासेन! इसके बाद मेरे अनुग्रहसे वह हाथमें त्रिशूल धारण किये हुए तथा त्रिनेत्रधारी होकर महेश्वररूपमें मेरे पास आ गया ॥ २३-२४३ ॥ रुद्राक्षके मुखोंकी जितनी दुर्लभ संख्या होती है, उतने हजार युगोंतक रुद्राक्ष धारण करनेवाला शिवलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है ॥ २५३ ॥
अपने शिष्यको ही रुद्राक्ष - माहात्म्य बताना चाहिये, जो शिष्य न हो उसे कभी नहीं बताना चाहिये, साथ ही अभक्तों तथा मूर्खोके समक्ष इसे प्रकट नहीं करना चाहिये ॥ २६३ ॥
चाहे कोई भक्तिपरायण हो अथवा भक्तिरहित हो, नीच हो अथवा नीचसे भी बढ़कर हो, यदि वह रुद्राक्ष धारण कर ले तो सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥ २७३ ॥
रुद्राक्ष धारण करनेसे होनेवाले पुण्यकी तुलना भला किसके साथ की जा सकती है? तत्त्वदर्शी मुनिगण इस रुद्राक्षधारणको महाव्रतकी संज्ञा देते हैं ॥ २८३ ॥
जिस व्यक्तिने एक हजार रुद्राक्षके धारण करनेका नियम बना रखा है, सभी देवता उसे नमस्कार करते हैं, जैसे रुद्र हैं वैसे ही वह भी है ॥ २ ९ ॥ जो मनुष्य एक हजार रुद्राक्षके अभावकी स्थितिमें दोनों भुजाओंपर सोलह - सोलह, शिखा में एक, दोनों हाथोंमें बारह - बारह, गलेमें बत्तीस, मस्तकपर चालीस, प्रत्येक कानमें छः - छः तथा वक्षःस्थलपर एक सौ आठ रुद्राक्ष धारण करता है; वह रुद्रके समान पूजित होता है ॥ ३०–३२ ॥ जो व्यक्ति मोती, मूँगा, स्फटिक, रौप्य, वैदूर्य तथा सुवर्ण आदिसे जटित रुद्राक्ष धारण करता है; वह साक्षात् शिवस्वरूप हो जाता है ॥३३ ॥
जो आलस्यवश केवल रुद्राक्षोंको ही धारण करता है, उस व्यक्तिको पाप उसी तरह स्पर्श नहीं कर सकते, जैसे अन्धकार सूर्यको स्पर्श नहीं कर पाता ॥ ३४ ॥
पृष्ठ 685
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
६७६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ६
रुद्राक्षमालया मन्त्रो जप्तोऽनन्तफलप्रदः ।
यस्याङ्गे नास्ति रुद्राक्ष एकोऽपि बहुपुण्यदः ॥ ३५
तस्य जन्म निरर्थं स्यात्रिपुण्ड्ररहितं यथा ।
रुद्राक्षं मस्तके धृत्वा शिरः स्नानं करोति यः ॥ ३६
गङ्गास्नानफलं तस्य जायते नात्र संशयः ।
एकवक्त्रः पञ्चवक्त्र एकादशमुखाः परे ॥ ३७
चतुर्दशमुखाः केचिद्रुद्राक्षा लोकपूजिताः ।
भक्त्या सम्पूज्यते नित्यं रुद्राक्षः शङ्करात्मकः ॥ ३८
दरिद्रं वापि पुरुषं राजानं कुरुते भुवि ।
अत्र ते कथयिष्यामि पुराणं मतमुत्तमम् ॥ ३ ९
कोसलेषु द्विजः कश्चिद् गिरिनाथ इति श्रुतः ।
महाधनी च धर्मात्मा वेदवेदाङ्गपारगः ॥ ४०
यज्ञकृद्दीक्षितस्तस्य तनयः सुन्दराकृतिः ।
नाम्नागुणनिधिः ख्यातस्तरुणः कामसुन्दरः ॥ ४१
गुरोः सुधिषणस्याथ पत्नीं मुक्तावलीमथ ।
मोहयामास रूपेण यौवनेन मदेन च ॥४२
सङ्गतस्तु तया सार्धं कञ्चित्कालं ततो भिया ।
विषं ददौ च गुरवे येभे पश्चात्तु निर्भयः ॥ ४३ ।
यदा माता पिता कर्म किञ्चिज्जानाति यत्क्षणे ।
मातरं पितरं चापि मारयामास तद्विषात् ॥ ४४
नानाविलास भोगैश्च जाते द्रव्यव्यये ततः ।
ब्राह्मणानां गृहे चौर्यं चकार स तदा खलः ॥ ४५
सुरापानमदोन्मत्तस्तदा ज्ञातिबहिष्कृतः ।
ग्रामान्निष्कासितः सर्वैस्तदा सोऽभूद्वनेचरः ॥ ४६
1898 श्रीमद्देवी ..... महापुराण [ द्वितीय खण्ड ] –22 D रुद्राक्षकी माला से जपा गया मन्त्र अनन्त फल प्रदान करता है । जिसके शरीरपर अत्यन्त पुण्यदायक एक भी रुद्राक्ष नहीं रहता, उसका जन्म उसी भाँति निरर्थक है, जैसे त्रिपुण्ड्र धारण न करनेवालेका जीवन अर्थहीन होता है ॥ ३५३ ॥
जो अपने मस्तकपर रुद्राक्ष धारण करके शिरः स्नान करता है, उसे गंगास्नान करनेका फल प्राप्त होता है; इसमें संशय नहीं है ॥ ३६३ ॥
एकमुखी, पंचमुखी, ग्यारहमुखी, चौदहमुखी तथा और भी कुछ रुद्राक्षोंकी लोकमें पूजा की जाती है ॥ ३७३ ॥
साक्षात् शंकरके आत्मस्वरूप इस रुद्राक्षकी यदि नित्य भक्तिपूर्वक पूजा की जाय तो यह दरिद्र व्यक्तिको भी पृथ्वीपर राजा बना देता है ॥ ३८३ ॥
अब इस सम्बन्धमें मैं तुमसे एक प्राचीन उत्तम आख्यानका वर्णन करूँगा । ऐसा सुना जाता है कि कोसल- देशमें गिरिनाथ नामक एक ब्राह्मण रहता था । वह महाधनी, धर्मात्मा, वेद - वेदांगमें पारंगत, यज्ञपरायण तथा दीक्षायुक्त था । उसका गुणनिधि नामसे विख्यात एक पुत्र था, जो युवा, मनोहर आकृतिवाला तथा कामदेव समान सुन्दर था ॥ ३ ९ —४१ ॥ उसने अपने रूप तथा मदयुक्त यौवनसे सुधिषण नामक अपने गुरुकी मुक्तावली नामवाली भार्याको मोहित कर लिया ॥ ४२ ॥
कुछ दिनोंतक मुक्तावलीके साथ उसका सम्पर्क रहा, किंतु बादमें गुरुसे भयके कारण उसने उन्हें विष दे दिया और वह निर्भय होकर सहवासपरायण हो गया ॥४३ ॥
जब उसके माता -ि - पिताको इस कर्मके विषयमें कुछ ज्ञात हुआ, तब उसने माता - पिताको भी उसी क्षण विष देकर मार डाला ॥ ४४ ॥
तत्पश्चात् अनेक प्रकारके भोग - विलासोंमें सम्पूर्ण धनके व्यय हो जानेपर उस दुष्टने ब्राह्मणोंके घर में चोरी करना आरम्भ कर दिया ॥ ४५ ॥
सुरापानसे निरन्तर मदोन्मत्त रहनेके कारण वह जाति बहिष्कृत कर दिया गया तथा सभी लोगोंने उसे गाँवसे बाहर निकाल दिया । तब वह वनमें । विचरण करने लगा ॥ ४६ ॥
पृष्ठ 686
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० ७ ] एकादश स्कन्ध ६७७
मुक्तावल्या तया सार्धं जगाम गहनं वनम् ।
मार्गे स्थितो द्रव्यलोभाज्जघान ब्राह्मणान्बहून् ॥
एवं बहुगते काले ममार स तदाधमः ।
नेतुं तं यमदूताश्च समाजग्मुः सहस्रशः ॥
शिवलोकाच्छिवगणास्तथैव च समागताः ।
तयोः परस्परं वादो बभूव गिरिजासुत ॥
यमदूतास्तदा प्रोचुः पुण्यमस्य किमस्ति हि ।
ब्रुवन्तु सेवकाः शम्भोर्यद्येनं नेतुमिच्छथ ॥
शिवदूतास्तदा प्रोचुरयं यस्मिन्स्थले मृतः ।
दशहस्तादधो भूमे रुद्राक्षस्तत्र चास्ति हि ॥
तत्प्रभावेण हे दूता नेष्यामः शिवसन्निधिम् ।
ततो विमानमारुह्य दिव्यरूपधरो द्विजः ॥
गतो गुणनिधिर्दूतैः सहितः शङ्करालयम् ।
इति रुद्राक्षमाहात्म्यं कथितं तव सुव्रत ॥
एवं रुद्राक्षमहिमा समासात्कथितो मया ।
सर्वपापक्षयकरो महापुण्यफलप्रदः ॥
उस मुक्तावलीको साथमें लेकर वह घने जंगलमें ४७ चला गया । वहाँ मार्गमें स्थित होकर उसने [ आने-जानेवाले ] अनेक ब्राह्मणोंको धनके लोभसे मार डाला ॥ ४७ ॥
४८ इस प्रकार बहुत समय बीत जानेके बाद वह नीच प्राणी मृत्युको प्राप्त हुआ और उसे लेनेके लिये हजारों यमदूत आये ॥ ४८ ॥
उसी समय शिवके गण शिवलोकसे वहाँ आ ४ ९ पहुँचे और फिर हे गिरिजानन्दन! उन दोनों ( यमदूतों तथा शिवदूतों ) - में परस्पर विवाद होने लगा ॥ ४ ९ ॥ तब यमदूतोंने कहा — हे शम्भुके सेवको! आपलोग ५० बतायें कि इसका कौन - सा पुण्य है, जो आपलोग इसे शिवलोक ले जाना चाहते हैं? ॥ ५० ॥
इसपर शिवदूत कहने लगे कि यह जिस ५१ स्थानपर मृत्युको प्राप्त हुआ है, उस भूमिके दस हाथ नीचे रुद्राक्ष विद्यमान है । हे यमदूतो! उसी रुद्राक्षके प्रभावसे इसे हमलोग शिवके पास ले जायँगे ॥ ५१३ ॥
५२ तत्पश्चात् वह गुणनिधि नामक ब्राह्मण दिव्य रूप धारण करके विमानपर आरूढ़ होकर शिवदूतोंके साथ शिवलोक चला गया । हे सुव्रत! मैंने तुमसे ५३ रुद्राक्षका यह माहात्म्य कह दिया । इस प्रकार मेरे द्वारा संक्षेपमें वर्णित यह रुद्राक्षमाहात्म्य सभी पापों का नाश करनेवाला तथा महान् पुण्यफल प्रदान करनेवाला ५४ | है ॥ ५२-५४ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायामेकादशस्कन्धे रुद्राक्षमाहात्म्ये गुणनिधिमोक्षवर्णनं नाम षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥
अथ विभिन्न प्रकारके श्रीनारायण उवाच एवं नारद षड्वक्त्रो गिरिशेन विबोधितः रुद्राक्षमहिमानं च ज्ञात्वासीत्स कृतार्थकः इत्थं भूतानुभावोऽयं रुद्राक्षो वर्णितो मया सदाचारप्रसङ्गेन शृणु चान्यत्समाहितः सप्तमोऽध्यायः रुद्राक्ष और उनके अधिदेवता श्रीनारायण बोले- हे नारद! इस प्रकार । गिरिशायी भगवान् शिवने षडाननको रुद्राक्षके ॥ १ विषयमें बताया और इस रुद्राक्षमहिमाको जानकर वे भी कृतार्थ हो गये । इस प्रकारके माहात्म्यवाले रुद्राक्षके विषयमें मैंने आपसे वर्णन कर दिया ॥ अब सदाचारके प्रसंगमें रुद्राक्षसम्बन्धी अन्य बातें ॥ २ एकाग्रचित्त होकर सुनिये ॥१-२ ॥
पृष्ठ 687
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
६७८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ७
यथा रुद्राक्षमहिमा वर्णितोऽनन्तपुण्यदः ।
लक्षणं मन्त्रविन्यासं तथाहं वर्णयामि ते ॥
लक्षं तु दर्शनात्पुण्यं कोटिस्तत्स्पर्शनाद्भवेत् ।
तस्य कोटिगुणं पुण्यं लभते धारणान्नरः ॥
लक्षकोटिसहस्राणि लक्षकोटिशतानि च ।
तज्जपाल्लभते पुण्यं नरो रुद्राक्षधारणात् ॥
रुद्राक्षाणां तु भद्राक्षधारणात्स्यान्महाफलम् ।
धात्रीफलप्रमाणं यच्छ्रेष्ठमेतदुदाहृतम् ॥
बदरीफलमात्रं तु प्रोच्यते मध्यमं बुधैः ।
अधमं चणमात्रं स्यात्प्रतिज्ञैषा मयोदिता ॥
ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्चेति शिवाज्ञया ।
वृक्षा जाताः पृथिव्यां तु तज्जातीयाः शुभाक्षकाः ॥
श्वेतास्तु ब्राह्मणा ज्ञेयाः क्षत्रिया रक्तवर्णकाः ।
पीता वैश्यास्तु विज्ञेयाः कृष्णाः शूद्राः प्रकीर्तिताः ॥
ब्राह्मणो बिभृयाच्छ्वेतान् रक्तान् राजा तु धारयेत् ।
पीतान्वैश्यस्तु बिभृयात्कृष्णान् शूद्रस्तु धारयेत् ॥
समाः स्निग्धा दृढास्तद्वत्कण्टकैः संयुताः शुभाः ।
कृमिदष्टाञ्छिन्नभिन्नान्कण्टकैरहितांस्तथा ॥
व्रणयुक्तानावृतांश्च षद्राक्षांस्तु वर्जयेत् ।
स्वयमेव कृतद्वारो रुद्राक्षः स्यादिहोत्तमः ॥
यत्तु पौरुषयत्नेन कृतं तन्मध्यमं भवेत् ।
समान्स्निग्धान्दृढान्वृत्तान्क्षौमसूत्रेण धारयेत् ॥
जिस प्रकार मैंने अनन्त पुण्य प्रदान करनेवाली ३ रुद्राक्ष - महिमाका वर्णन किया है, उसी प्रकार मैं रुद्राक्षके लक्षण तथा मन्त्र - विन्यासका वर्णन आपसे करूँगा ॥३ ॥
रुद्राक्षके दर्शनसे एक लाख गुना तथा स्पर्शसे ४ करोड़ गुना पुण्य होता है । रुद्राक्ष धारण कर लेनेपर मनुष्य उसका करोड़ गुना पुण्य प्राप्त करता है ॥४ ॥
रुद्राक्ष धारण करनेकी अपेक्षा उसके द्वारा जपसे ५ मनुष्य एक सौ लाख करोड़ गुना और हजार लाख करोड़ गुना पुण्य प्राप्त करता है ॥५ ॥
भद्राक्ष धारण करनेकी अपेक्षा रुद्राक्ष धारण करनेका महान् फल होता है । जो रुद्राक्ष आँवलेके फलके ६ परिमाणका होता है, वह श्रेष्ठ माना गया है ॥ ६ ॥
विद्वानोंने बेरके फलके परिमाणवाले रुद्राक्षको मध्यम तथा चनेके परिमाण - तुल्य रुद्राक्षको अधम ७ कहा है; यह एक सिद्धान्त है, जिसका वर्णन मैंने आपसे किया है ॥ ७ ॥
शिवजीकी आज्ञासे पृथ्वीतलपर ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र - भेदानुसार उन - उन जातियोंवाले रुद्राक्षके ८ श्रेष्ठ वृक्ष उत्पन्न हुए । श्वेत रुद्राक्षोंको ब्राह्मण, रक्त वर्णके रुद्राक्षोंको क्षत्रिय तथा पीले वर्णके रुद्राक्षोंको वैश्य जानना चाहिये । इसी प्रकार काले रंगके रुद्राक्ष ९ शूद्र कहे जाते हैं ॥ ८ - ९ ॥ ब्राह्मणको श्वेत वर्ण तथा राजा ( क्षत्रिय ) - को लाल वर्णके रुद्राक्ष धारण करने चाहिये । इसी तरह वैश्यको पीले वर्ण तथा शूद्रको काले वर्णके रुद्राक्ष १० धारण करने चाहिये ॥ १० ॥
समरूप, चिकने, दृढ़ तथा स्पष्टरूपसे कंटक ( काँटों ) - की रेखाओंसे युक्त रुद्राक्ष श्रेष्ठ होते हैं; किंतु ११ कीड़ोंद्वारा खाये गये, टूटे हुए, फूटे हुए काँटोंकी रेखाओंसे रहित, व्रणयुक्त तथा परतसे आवृत - इन छ: तरहके रुद्राक्षोंको नहीं धारण करना चाहिये ॥ ११३ ॥
जिस रुद्राक्षमें स्वयं ही छिद्र बना हो, वह उत्तम १२ रुद्राक्ष होता है और जिसमें मनुष्यके प्रयत्नसे छिद्र किया गया हो, वह मध्यम रुद्राक्ष होता है । सब ओरसे समान, चिकने, मजबूत और गोल रुद्राक्षोंको १३ । रेशमके डोरेमें पिरोकर धारण करना चाहिये । शरीरके
पृष्ठ 688
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० ७ ] एकादश स्कन्ध ६७ ९
सर्वगात्रेषु साम्येन समानातिविलक्षणा ।
निर्धर्षे हेमलेखाभा यत्र लेखा प्रदृश्यते ॥
तदक्षमुत्तमं विद्यात्स धार्यः शिवपूजकैः ।
शिखायामेकरुद्राक्षं त्रिंशद्वै शिरसा वहेत् ॥
षट्त्रिंशच्च गले धार्या बाह्वोः षोडश षोडश ।
मणिबन्धे द्वादशाक्षान्स्कन्धे पञ्चाशतं भवेत् ॥
अष्टोत्तरशतैर्मालोपवीतं च प्रकल्पयेत् ।
द्विसरं त्रिसरं वापि बिभृयात्कण्ठदेशतः ॥
कुण्डले मुकुटे चैव कर्णिकाहारकेषु च ।
केयूरे कटके चैव कुक्षिवंशे तथैव च ॥
सुप्ते पीते सर्वकालं रुद्राक्षं धारयेन्नरः ।
त्रिशतं त्वधमं पञ्चशतं मध्यममुच्यते ॥
सहस्रमुत्तमं प्रोक्तं चैवं भेदेन धारयेत् ।
शिरसीशानमन्त्रेण कर्णे तत्पुरुषेण च ॥
अघोरेण ललाटे तु तेनैव हृदयेऽपि च ।
अघोरबीजमन्त्रेण करयोर्धारयेत्पुनः ॥
पञ्चाशदक्षग्रथितां वामदेवेन चोदरे ।
पञ्चब्रह्मभिरङ्गैश्चाप्येवं रुद्राक्षधारणम् ॥
ग्रथितान्मूलमन्त्रेण सर्वानक्षांस्तु धारयेत् ।
एकवक्त्रस्तु रुद्राक्षः परतत्त्वप्रकाशकः ॥
परतत्त्वधारणाच्च जायते तत्प्रकाशनम् ।
द्विवक्त्रस्तु मुनिश्रेष्ठ अर्धनारीश्वरो भवेत् ॥
धारणादर्धनारीशः प्रीयते तस्य नित्यशः ।
त्रिवक्त्रस्त्वनलः साक्षात्स्त्रीहत्यां दहति क्षणात् ॥
त्रिमुखश्चैव रुद्राक्षोऽप्यग्नित्रयस्वरूपकः ।
तद्धारणाच्च हुतभुक् तस्य तुष्यति नित्यशः ॥
सभी ( पूर्वोक्त ) अंगोंपर उन्हें समानरूपसे धारण १४ करना चाहिये । जिस रुद्राक्षको घिसनेसे समान तथा अति विलक्षण स्वर्ण रेखाकी आभाके समान रेखा दिखायी दे, वह उत्तम रुद्राक्ष होता है । उसे शिवभक्तोंको १५ अवश्य धारण करना चाहिये ॥ १२–१४३ ॥ एक रुद्राक्ष शिखामें, तीस रुद्राक्ष सिरपर, छत्तीस रुद्राक्ष गलेमें, दोनों भुजाओंपर सोलह - सोलह, मणि-१६ बन्धमें बारह तथा कन्धेपर पचास रुद्राक्ष धारण करना चाहिये ॥ १५-१६ ॥ एक सौ आठ रुद्राक्षोंकी मालाका यज्ञोपवीत १७ धारण करना चाहिये और दो लड़ी या तीन लड़ीवाली रुद्राक्षकी माला गलेमें पहननी चाहिये ॥ १७ ॥
मनुष्यको कुण्डलमें, मुकुटमें, कर्णिकामें, हारमें, १८ केयूरमें, कटकमें तथा करधनीमें, शयन तथा भोजनपानादि सभी कालोंमें रुद्राक्ष धारण करना चाहिये ॥ १८३ ॥
तीन सौ रुद्राक्षोंका धारण करना अधम तथा १ ९ पाँच सौ रुद्राक्षोंका धारण करना मध्यम कहा जाता है और एक हजार रुद्राक्षोंका धारण करना उत्तम कहा गया है । इस प्रकार उत्तम, मध्यम तथा अधम-२० भेदसे रुद्राक्ष धारण करना चाहिये ॥१ ९ ३ ॥ पचास रुद्राक्षोंकी माला बनाकर ईशानमन्त्रसे सिरपर, तत्पुरुषमन्त्रसे कानमें, अघोरमन्त्रसे ललाट तथा हृदयपर २१ | और अघोरबीजमन्त्रसे दोनों हाथोंपर और वामदेवमन्त्रसे उदरपर धारण करना चाहिये । इस प्रकार ईशान आदि पाँच ब्रह्ममन्त्र तथा छ: षडंग मन्त्रसे रुद्राक्ष धारण करना २२ चाहिये । मूलमन्त्रका उच्चारण करके गूँथे गये सभी रुद्राक्षोंको धारण करना चाहिये ॥ २० - २२३ ॥ एकमुखी रुद्राक्ष परमतत्त्वका प्रकाशक है । २३ | अतः इस परमतत्त्वमय एकमुखी रुद्राक्षके धारणसे उस ब्रह्मका साक्षात्कार हो जाता है ॥ २३३ ॥
हे मुनिश्रेष्ठ! दो मुखवाला रुद्राक्ष अर्धनारीश्वर २४ होता है | इसे धारण करनेसे उस व्यक्तिपर भगवान् अर्धनारीश्वर सदा प्रसन्न रहते हैं ॥ २४३ ॥
तीनमुखी रुद्राक्ष साक्षात् अग्निस्वरूप होता है । यह २५ स्त्री - हत्याके पापको क्षणभरमें भस्म कर देता है । यह तीनमुखी रुद्राक्ष अग्नित्रय ( गार्हपत्य, आहवनीय, दक्षिणाग्नि ) - के भी स्वरूपवाला है । उसे धारण करनेसे उस २६ । व्यक्तिपर अग्निदेवता सदा प्रसन्न रहते हैं ॥ २५-२६ ॥
पृष्ठ 689
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
६८० श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ७ चतुर्मुखस्तु रुद्राक्षः पितामहस्वरूपकः तद्धारणान्महाश्रीमान्महदारोग्यमुत्तमम् महती ज्ञानसम्पत्तिः शुद्धये धारयेन्नरः पञ्चमुखस्तु रुद्राक्षः पञ्चब्रह्मस्वरूपकः तस्य धारणमात्रेण सन्तुष्यति महेश्वरः षड्वक्ाश्चैव रुद्राक्षः कार्तिकेयाधिदैवतः विनायकं चापि देवं प्रवदन्ति मनीषिणः सप्तवक्त्रस्तु रुद्राक्षः सप्तमात्राधिदैवतः सप्ताश्वदैवतश्चैव मुनिसप्तकदैवतः तद्धारणान्महाश्रीः स्यान्महदारोग्यमुत्तमम् महती ज्ञानसम्पत्तिः शुचिर्वै धारयेन्नरः अष्टवक्त्रस्तु रुद्राक्षोऽप्यष्टमात्राधिदैवतः वस्वष्टकप्रीतिकरो गङ्गाप्रीतिकरः शुभः तद्धारणादिमे प्रीता भवेयुः सत्यवादिनः नववक्त्रस्तु रुद्राक्षो यमदेव उदाहृतः तद्धारणाद्यमभयं न भवत्येव सर्वथा दशवक्त्रस्तु रुद्राक्षो दशाशादैवतः स्मृतः दशाशाप्रीतिजनको धारणे नात्र संशयः एकादशमुखस्त्वक्षो रुद्रैकादशदैवतः तमिन्द्रदैवतं चाहुः सदा सौख्यविवर्धनम् ॥ रुद्राक्षो द्वादशमुखो महाविष्णुस्वरूपकः द्वादशादित्यदैवश्च बिभर्त्येव हि तत्परः त्रयोदशमुखश्चाक्षः कामदः सिद्धिदः शुभः तस्य धारणमात्रेण कामदेवः प्रसीदति चतुर्दशमुखश्चाक्षो रुद्रनेत्रसमुद्भवः सर्वव्याधिहरश्चैव सर्वारोग्यप्रदायकः । चतुर्मुखी रुद्राक्ष ब्रह्मास्वरूप है । उसे धारण ॥। २७ करनेसे महान् वैभव, अत्यन्त उत्तम आरोग्य तथा विशद ज्ञान - सम्पदाकी प्राप्ति होती है । मनुष्यको । आत्मशुद्धिके लिये इसे धारण करना चाहिये ॥ २७३ ॥
॥ २८ पंचमुखी रुद्राक्ष साक्षात् पंचब्रह्म स्वरूप है I । उसके धारणमात्रसे ही महेश्वर शिव उस व्यक्तिपर । प्रसन्न हो जाते हैं ॥ २८३ ॥
॥ २ ९ छः मुखी रुद्राक्षके अधिदेवता कार्तिकेय हैं और कुछ मनीषिगण विनायक गणेशको भी इस रुद्राक्षके । देवतारूपमें बताते हैं ॥ २ ९ ३ ॥ ॥ ३० सातमुखी रुद्राक्षकी अधिदेवी सात मातृकाएँ हैं । इसके अधिदेवता सूर्य तथा सप्तर्षि भी हैं । इसे धारण । करनेसे विपुल सम्पदा, उत्तम आरोग्य तथा महान् ॥ ३१ ज्ञान - राशिकी प्राप्ति होती है । पवित्र होकर ही मनुष्यको इसे धारण करना चाहिये ॥ ३० - ३१३ ॥ । आठमुखी रुद्राक्षके अधिदेवता अष्टमातृकाएँ ॥ ३२ हैं । यह शुभ रुद्राक्ष आठों वसुओं तथा गंगाके लिये प्रीतिकर है । उसे धारण करनेसे ये सत्यवादी देवता
।
प्रसन्न हो जाते हैं ॥ ३२-३३ ॥
॥ ३३
नौमुखी रुद्राक्ष साक्षात् यमदेवके तुल्य माना गया । है । उसे धारण करनेसे यमका कोई भय नहीं रहता ॥ ३४ ॥
॥ ३४ दसमुखी रुद्राक्षके देवता दसों दिशाएँ कही गयी हैं । उसे धारण करनेसे मनुष्य दसों दिशाओंके लिये । प्रीतिजनक होता है, इसमें सन्देह नहीं है ॥ ३५ ॥
॥ ३५ ग्यारहमुखी रुद्राक्षके अधिदेवता एकादश रुद्र हैं । कुछ लोग इन्द्रको भी निरन्तर सौख्यकी वृद्धि । करनेवाले इस रुद्राक्षका देवता कहते हैं ॥ ३६ ॥
३६ बारहमुखी रुद्राक्ष महाविष्णुका स्वरूप है । इसके अधिदेवता बारह सूर्य हैं । ये देवगण उसे धारण । करनेवालेका सदा भरण - पोषण करते हैं ॥ ३७ ॥
॥ ३७ तेरह मुखवाला रुद्राक्ष समस्त मनोरथोंको पूर्ण करनेवाला, सिद्धियाँ प्रदान करनेवाला तथा कल्याण । करनेवाला है । उसे धारण करनेमात्रसे कामदेव प्रसन्न ॥ ३८ हो जाते हैं ॥ ३८ ॥
चौदह मुखवाला रुद्राक्ष भगवान् शंकरके नेत्रसे । उत्पन्न हुआ है । यह सभी प्रकारकी व्याधियोंको नष्ट करने-॥ ३ ९ | वाला तथा सर्वविध आरोग्य प्रदान करनेवाला है ॥ ३ ९ ॥
पृष्ठ 690
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ०८ ] मद्यं मांसं च लशुनं पलाण्डुं शिग्रुमेव च श्लेष्मातकं विड्वराहं भक्षणे वर्जयेत्ततः ग्रहणे विषुवे चैव सङ्क्रमे त्वयने तथा दर्शे च पौर्णमासे च पुण्येषु दिवसेष्वपि रुद्राक्षधारणात्सद्यः सर्वपापैः प्रमुच्यते एकादश स्कन्ध ६८१ । रुद्राक्ष धारण करनेवालेको मद्य, मांस, लहसुन, ॥ ४० प्याज, सहिजन, लिसोडा तथा विड्वराहका आहारमें त्याग कर देना चाहिये । ग्रहणके समय, सूर्यके विषुवत् । रेखापर, संक्रमणकालमें, उत्तरायण तथा दक्षिणायनके संक्रान्तिकालमें, अमावास्या तथा पूर्णिमाके समय तथा । अन्यान्य पुण्य दिवसोंमें रुद्राक्ष धारण करनेसे मनुष्य ॥ ४१ । शीघ्र समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥ ४०-४१ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायामेकादशस्कन्धे रुद्राक्षमाहात्म्यवर्णनं नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥
अथाष्टमोऽध्यायः श्रीनारायण उवाच
भूतशुद्धिप्रकारं च कथयामि महामुने ।
मूलाधारात्समुत्थाय कुण्डलीं परदेवताम् ॥
सुषुम्णामार्गमाश्रित्य ब्रह्मरन्ध्रगतां स्मरेत् ।
जीवं ब्रह्मणि संयोज्य हंसमन्त्रेण साधकः ॥
पादादिजानुपर्यन्तं चतुष्कोणं सवज्रकम् ।
लं बीजाढ्यं स्वर्णवर्णं स्मरेदवनिमण्डलम् ॥
जान्वाद्यानाभिचन्द्रार्धनिभं पद्मद्वयाङ्कितम् ।
वं बीजयुक्तं श्वेताभमम्भसो मण्डलं स्मरेत् ॥
नाभेर्हृदयपर्यन्तं त्रिकोणं स्वस्तिकान्वितम् ।
रं बीजेन युतं रक्तं स्मरेत्पावकमण्डलम् ॥
हृदो भ्रूमध्यपर्यन्तं वृत्तं षड्बिन्दुलाञ्छितम् ।
यं बीजयुक्तं धूम्राभं नभस्वन्मण्डलं स्मरेत् ॥
आब्रह्मरन्ध्रं भ्रूमध्याद् वृत्तं स्वच्छं मनोहरम् ।
हं बीजयुक्तमाकाशमण्डलं च विचिन्तयेत् ॥
भूतशुद्धि श्रीनारायण बोले — हे महामुने! अब मैं भूत-शुद्धिका प्रकार बता रहा हूँ । सर्वप्रथम मूलाधारसे १ उठकर सुषुम्नामार्गपर होती हुई ब्रह्मरन्ध्रतक देवी परदेवता कुण्डलिनीके पहुँचनेकी भावना करे । तत्पश्चात् साधक हंसमन्त्रसे जीवका ब्रह्ममें संयोजन करके अपने शरीरमें पैरोंसे लेकर घुटनोंतकके भागमें २ चतुष्कोण ( चौकोर ), वज्रचिह्नसे युक्त, पीतवर्णवाले तथा ' लं ' बीजसे अंकित पृथ्वीमण्डलकी कल्पना करे ॥ १-३ ॥ ३ घुटनोंसे लेकर नाभितकके भागमें अर्धचन्द्रतुल्य आकृतिवाले, दो कमलोंसे युक्त, शुक्लवर्ण तथा ' वं ' बीजमन्त्र से अंकित जलमण्डलका स्मरण करना ४ चाहिये ॥ ४ ॥
इसके बाद नाभिसे लेकर हृदयतकके भागमें त्रिकोणाकार, स्वस्तिक चिह्नसे अंकित, रक्तवर्णवाले तथा ‘ रं ' बीजमन्त्रसे युक्त अग्निमण्डलका स्मरण ५ करना चाहिये ॥ ५ ॥
पुनः हृदयसे ऊपर भ्रूमध्यतकके भागमें गोल, छ: बिन्दुओंसे अंकित, धूम्रवर्णवाले तथा ' यं ' बीजसे ६ युक्त वायुमण्डलका स्मरण करना चाहिये ॥ ६ ॥
इसके बाद भ्रूमध्यसे लेकर ब्रह्मरन्ध्रतकके भागमें वृत्ताकार, स्वच्छ, परम मनोहर तथा ' हं ' बीजसे ७ अंकित आकाशमण्डलका ध्यान करना चाहिये ॥ ७ ॥