देवी भागवत उत्तरार्द्ध — पृष्ठ 691–700
देवी भागवत उत्तरार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 691–700
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६८२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ८
एवं भूतानि सञ्चिन्त्य प्रत्येकं संविलापयेत् ।
भुवं जले जलं वह्नौ वह्निं वायौ नभस्यमुम् ॥ ८
विलाप्य खमहङ्कारे महत्तत्त्वेऽप्यहङ्कृतिम् ।
महान्तं प्रकृतौ मायामात्मनि प्रविलापयेत् ॥ ९
शुद्धसंविन्मयो भूत्वा चिन्तयेत्पापपूरुषम् ।
वामकुक्षिस्थितं कृष्णमङ्गुष्ठपरिमाणकम् ॥ १०
ब्रह्महत्याशिरोयुक्तं कनकस्तेयबाहुकम् ।
मदिरापानहृदयं गुरुतल्पकटीयुतम् ॥ ११
तत्संसर्गिपदद्वन्द्वमुपपातकमस्तकम् खड्गचर्मधरं कृष्णमधोवक्त्रं सुदुःसहम् ॥ १२
वायुबीजं स्मरन्वायुं सम्पूर्यैनं विशोषयेत् ।
स्वशरीरयुतं मन्त्रो वह्निबीजेन निर्दहेत् ॥ १३
कुम्भके परिजप्तेन ततः पापनरोद्भवम् ।
बहिर्भस्म समुत्सार्य वायुबीजेन रेचयेत् ॥ १४
सुधाबीजेन देहोत्थं भस्म संप्लावयेत्सुधीः ।
भूबीजेन घनीकृत्य भस्म तत्कनकाण्डवत् ॥ १५
विशुद्धमुकुराकारं जपन्बीजं विहायसः ।
मूर्धादिपादपर्यन्तान्यङ्गानि रचयेत्सुधीः ॥ १६ ।
इस प्रकारसे पंचभूतोंकी भावना करके प्रत्येकका अपने कारणरूप दूसरे भूतमें लय करे । पृथ्वीको जलमें, जलको अग्निमें अग्निको वायुमें, वायुको आकाशमें विलीन करनेका ध्यान करके पुनः आकाशको अहंकारमें, अहंकारको महत्तत्त्वमें, महत्तत्त्वको प्रकृतिमें और मायारूपी प्रकृतिको आत्मामें विलीन करना चाहिये ॥ ८ - ९ ॥ इस प्रकार निर्मल ज्ञानसे सम्पन्न होकर अपने शरीरमें पापपुरुषकी कल्पना करनी चाहिये कि यह मेरी बायीं कुक्षिमें स्थित है, यह काले रंगका है तथा अँगूठेके परिमाणवाला है, ब्रह्महत्या ही इसका सिर है, स्वर्णकी चोरी ही इसके बाहु हैं, सुरापान ही इसका हृदय है, गुरुतल्प ( गुरुपत्नीगमन ) ही इसका कटिप्रदेश है, इन महापातकोंसे संसर्ग ही इसके दोनों चरण हैं, उपपातक इसका मस्तक है, यह ढाल-तलवार लिये रहता है, यह कृष्णवर्णवाला है, सदा नीचेकी ओर मुख किये रहता है और अत्यन्त दुःसह है॥१०–१२ ॥ तत्पश्चात् वायुबीज ‘ यं का स्मरण करते हुए पूरक प्राणायामसे वायुको भरकर उसके द्वारा इस पापपुरुषको सुखा देना चाहिये । पुनः ‘ २ ' अग्निबीजमन्त्रके द्वारा अपने शरीरसे लगे हुए उस पापपुरुषको भस्म कर देना चाहिये ॥ १३ ॥
कुम्भकके जपसे दग्ध किये गये पापपुरुषकी भस्मको वायुबीज ' यं ' के जपसे रेचक प्राणायामद्वारा बाहर निकाल देना चाहिये ॥ १४ ॥
तदनन्तर विद्वान् पुरुष अपने शरीरसे उत्पन्न हुए भस्मको सुधाबीज ' वं ' के उच्चारणसे उत्पन्न अमृतसे आप्लावित करे । पुनः भू- बीजमन्त्र ' लं ' से उस द्रवीभूत भस्मको घनीभूत करके उसके सोनेके अण्ड-जैसा बन जानेकी कल्पना करे ॥ १५ ॥
इसके बाद आकाशबीज ' हं ' का जप करते हुए उस सुवर्ण - अण्डकी एक स्वच्छ दर्पणकी तरह कल्पना करके बुद्धिमान् साधकको उसमें मस्तकसे लेकर चरणपर्यन्त सभी अंगोंकी मानसिक रचना करनी चाहिये ॥१६ ॥
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अ ० ९ ] आकाशादीनि भूतानि पुनरुत्पादयेच्चितः सोऽहं मन्त्रेण चात्मानमानयेद्धृदयाम्बुजे कुण्डलीजीवमादाय परसङ्गात्सुधामयम् संस्थाप्य हृदयाम्भोजे मूलाधारगतां स्मरेत् रक्ताम्भोधिस्थपोतोल्लसदरुण-सरोजाधिरूढा कराब्जैः शूलं कोदण्डमिक्षूद्भवमणिगुण-मप्यङ्कशं पञ्चबाणान् बिभ्राणासृक्कपालं त्रिनयन-सिता पीनवक्षोरुहाढ्या देवी बालार्कवर्णा भवतु सुखकरी प्राणशक्तिः परा नः एवं ध्यात्वा प्राणशक्तिं परमात्मस्वरूपिणीम् विभूतिधारणं कार्यं सर्वाधिकृतिसिद्धये विभूतेर्विस्तरं वक्ष्ये धारणे च महाफलम् श्रुतिस्मृतिप्रमाणोक्तं भस्मधारणमुत्तमम् एकादश स्कन्ध ६८३ । पुनः चित्तमें आकाश आदि पाँचों भूतोंकी ॥ १७ कल्पना करे और ' सोऽहम् ' मन्त्रके द्वारा आत्माको अपने हृदयकमलपर विराजित करे ॥ १७ ॥
तत्पश्चात् जीवको ब्रह्ममें संयोजित करनेवाली । कुण्डलिनीको तथा परमात्माके संसर्गसे सुधामय ॥ १८ जीवको हृदयरूपी कमलपर स्थापित करके मूलाधारमें विराजनेवाली देवी कुण्डलिनीका [ इस प्रकार ] ध्यान करना चाहिये ॥ १८ ॥
रक्तवर्णवाले जलका एक समुद्र है । उसमें एक पोत है, जिसपर एक अरुणवर्णका कमल खिला हुआ है । उस कमलपर विराजमान, अपने छः । करकमलोंमें त्रिशूल, इक्षुधनुष, रत्नमय पाश, अंकुश, पाँच बाण तथा रक्तपूरित खप्पर धारण करनेवाली, तीन नेत्रोंसे सुशोभित होनेवाली, स्थूल वक्षःस्थलवाली तथा बालसूर्यके समान वर्णवाली प्राणशक्तिस्वरूपा पराभगवती कुण्डलिनी हमें सुख ॥ १ ९ प्रदान करनेवाली हों ॥ १ ९ ॥ इस प्रकार परमात्मस्वरूपिणी प्राणशक्ति देवी । कुण्डलिनीका ध्यान करके समस्त कार्योंमें अधिकार प्राप्त करनेके लिये विभूति धारण करना चाहिये ॥ २० ॥
॥ २० विभूति धारण करनेसे महान् फल प्राप्त होता है; श्रुति तथा स्मृतिके प्रमाणके अनुसार भस्मधारण । अतीव उत्तम है । अब मैं विभूतिके विषयमें विस्तारपूर्वक ॥ २१ । वर्णन करूँगा ॥ २१ ॥
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायामेकादशस्कन्धे भूतशुद्धिवर्णनं नामाष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥
अथ नवमोऽध्यायः भस्म - धारण श्रीनारायण उवाच
इदं शिरोव्रतं चीर्णं विधिवद्यैर्द्विजातिभिः ।
तेषामेव परां विद्यां वदेदज्ञानबाधिकाम् ॥ १
विधिवच्छ्रद्धया सार्धं न चीर्णं यैः शिरोव्रतम् ।
श्रौतस्मार्तसमाचारस्तेषामनुपकारकः ॥ २ ।
( शिरोव्रत ) श्रीनारायण बोले- जो द्विजातिगण शिरोव्रत ( मस्तकपर भस्म धारण करनेके नियम ) - का पालन करते हैं, उन्हींको अज्ञानको नष्ट करनेवाली पराविद्याके विषयमें बताना चाहिये ॥ १ ॥
जो लोग भलीभाँति श्रद्धापूर्वक शिरोव्रतका पालन नहीं करते, उनके लिये श्रुतियों तथा स्मृतियोंमें प्रतिपादित सदाचार व्यर्थ सिद्ध होता है ॥ २ ॥
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६८४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ९ शिरोव्रतसमाचारादेव ब्रह्मादिदेवताः देवता अभवन्विद्वन् खलु नान्येन हेतुना शिरोव्रतस्य माहात्म्यं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम् । ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च देवताः सकला अपि सर्वपातकयुक्तोऽपि मुच्यते सर्वपातकैः । शिरोव्रतमिदं येन चरितं विधिवद् बुधैः शिरोव्रतमिदं नाम शिरस्याथर्वणश्रुतेः यदुक्तं तद्धि नैवान्यत्तत्तु पुण्येन लभ्यते
शाखाभेदेषु नामानि व्रतस्यास्य विभेदतः ।
पठ्यन्ते मुनिशार्दूल शाखास्वेकव्रतं हि तत् ॥
सर्वशाखासु वस्त्वेकं शिवाख्यं सत्यचिद्घनम् ।
तथा तद्विषयं ज्ञानं तथैव च शिरोव्रतम् ॥
शिरोव्रतविहीनस्तु सर्वधर्मविवर्जितः ।
अपि सर्वासु विद्यासु सोऽधिकारी न संशयः ॥
शिरोव्रतमिदं कार्यं पापकान्तारदाहकम् ।
साधनं सर्वविद्यानां यतस्तत्सम्यगाचरेत् ॥
श्रुतिराथर्वणी सूक्ष्मा सूक्ष्मार्थस्य प्रकाशिनी ।
यदुवाच व्रतं प्रीत्या तन्नित्यं सम्यगाचरेत् ॥
अग्निरित्यादिभिर्मन्त्रैः षड्भिः शुद्धेन भस्मना ।
सर्वाङ्गोद्धूलनं कुर्याच्छिरोव्रतसमाह्वयम् ॥
एतच्छिरोव्रतं कुर्यात्सन्ध्याकालेषु सादरम् ।
यावद्विद्योदयस्तावत्तस्य विद्या खलूत्तमा ॥
। हे विद्वन्! ब्रह्मा आदि देवता शिरोव्रतके सदाचारसे ही देवत्वको प्राप्त हुए हैं; इसमें कोई ॥ ३ अन्य हेतु नहीं था ॥ ३ ॥
प्राचीन कालके महर्षियोंने शिरोव्रतका माहात्म्य प्रतिपादित किया है । ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र तथा समस्त ॥ ४ देवता भी भस्म धारण करते थे ॥ ४ ॥
जो मनुष्य विधिपूर्वक इस शिरोव्रतका अनुष्ठान करता है, वह सभी प्रकारके पातकोंसे युक्त होनेपर ॥ ५ भी उन सभी पातकोंसे मुक्त हो जाता है - विद्वानोंने ऐसा कहा है ॥ ५ ॥
। अथर्ववेदके शिरोभागमें इस व्रतका उल्लेख होनेसे यह शिरोव्रत नामवाला है । इसके विषयमें जो ॥ ६ वर्णन वहाँ मिलता है, वैसा अन्यत्र कहीं नहीं मिलता । यह पुण्यसे ही प्राप्त होता है ॥ ६ ॥
हे मुनिश्रेष्ठ! विभिन्न शाखाओंमें इस व्रतके ७ भिन्न - भिन्न नाम कहे गये हैं, किंतु नामभेद होनेपर भी यही एक व्रत सभी शाखाओंमें वर्णित है ॥७ ॥
सभी शाखाओंमें मात्र एक शिव नामक सत्-चित् - घनरूपवाला पदार्थ है और इस पदार्थ ( तत्त्व ) --८ का ज्ञान तथा शिरोव्रत भी वैसा ही है ॥ ८ ॥
सभी प्रकारकी विद्याओंमें पारंगत होनेपर भी यदि कोई मनुष्य शिरोव्रतसे विहीन है, तो वह सभी ९ धर्मोंसे विहीन है; इसमें कोई सन्देह नहीं है॥९॥
यह शिरोव्रत पापरूपी वनको दग्ध करनेवाला तथा समस्त विद्याओंका साधन है, अतः इसका सम्यक् पालन करना चाहिये ॥ १० ॥
१० आथर्वण श्रुति अत्यन्त सूक्ष्म है तथा सूक्ष्म अर्थका प्रकाशन करनेवाली है । उसमें इस शिरोव्रतके विषयमें जो कहा गया है, उसका भलीभाँति प्रेमपूर्वक ११ नित्य आचरण करना चाहिये ॥११ ॥
' अग्निरिति भस्म ' आदि इन छः आथर्वण मन्त्रोंका उच्चारण करते हुए शरीरके सभी अंगोंमें १२ शुद्ध भस्म लगाना चाहिये, यह शिरोव्रत कहा गया है ॥१२ ॥
सभी सन्ध्याकालोंमें इस शिरोव्रतको तबतक
करना चाहिये, जबतक ब्रह्मविद्याका उदय न हो ।
१३ । उसकी विद्या उत्तम है ॥१३ ॥
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अ ० ९ ] एकादश स्कन्ध ६८५
द्वादशाब्दमथाब्दं वा तदर्धं च तदर्धकम् ।
प्रकुर्याद् द्वादशाहं वा सङ्कल्पेन शिरोव्रतम् ॥
शिरोव्रतेन यः स्नातस्तं तु नोपदिशेत्तु यः ।
तस्य विद्या विनष्टा स्यान्निर्घृणः स गुरुः खलु ॥
ब्रह्मविद्यागुरुः साक्षान्मुनिः कारुणिकः खलु ।
यथा सर्वेश्वरः श्रीमान्मृदुः कारुणिकः खलु ॥
जन्मान्तरसहस्त्रेषु नरा ये धर्मचारिणः ।
तेषामेव खलु श्रद्धा जायते न कदाचन ॥
प्रत्युताज्ञानबाहुल्याद् द्वेष एव विजायते ।
अतः प्रद्वेषयुक्तस्य न भवेदात्मवेदनम् ॥
ब्रह्मविद्योपदेशस्य साक्षादेवाधिकारिणः ।
त एव नेतरे विद्वन् ये तु स्नाताः शिरोव्रतैः ॥
व्रतं पाशुपतं चीर्णं यैर्द्विजैरादरेण तु ।
तेषामेवोपदेष्टव्यमिति वेदानुशासनम् ॥
यः पशुस्तत्पशुत्वं च व्रतेनानेन सन्त्यजेत् ।
तान्हत्वा न स पापीयान्भवेद्वेदान्तनिश्चयः ॥
त्रिपुण्ड्रधारणं प्रोक्तं जाबालैरादरेण तु ।
त्रियम्बकेन मन्त्रेण सतारेण शिवेन च ॥
त्रिपुण्ड्रं धारयेन्नित्यं गृहस्थाश्रममाश्रितः ।
ओङ्कारेण त्रिरुक्तेन सहंसेन त्रिपुण्ड्रकम् ॥
धारयेद्भिक्षुको नित्यमिति जाबालिकी श्रुतिः ।
त्रियम्बकेन मन्त्रेण प्रणवेन शिवेन च ॥
बारह वर्षतक या एक वर्षतक या छः १४ मासतक या तीन मासतक अथवा कम- -से- -कम बारह दिनोंतक संकल्पके साथ इस शिरोव्रतका पालन करना चाहिये ॥ १४ ॥
शिरोव्रतके स्नातकको जो गुरु ब्रह्मविद्याका १५ उपदेश नहीं देता, वह अत्यन्त निर्दयी होता है और उसकी विद्याका नाश हो जाता है ॥ १५ ॥
जिस प्रकार भगवान् सर्वेश्वर कोमलचित्त तथा १६ परम कारुणिक होते हैं, उसी प्रकार ब्रह्मविद्याका उपदेश करनेवाला गुरु भी साक्षात् मुनि तथा दयावान् होता है ॥१६ ॥
जो मनुष्य हजारों जन्म - जन्मान्तरोंमें निरन्तर १७ धर्माचरण करते रहते हैं, उन्हींके हृदयमें शिरोव्रतके प्रति श्रद्धा उत्पन्न होती है, दूसरोंके हृदयमें कभी भी नहीं; अपितु उनके हृदयमें अज्ञानकी अधिकताके १८ कारण विद्वेष उत्पन्न होता है । अतएव विद्वेषभावनासे युक्त मनुष्यको आत्मबोध नहीं हो पाता ॥ १७-१८ ॥ हे विद्वन्! ब्रह्मविद्याके उपदेशके सच्चे अधिकारी वे ही हैं जो शिरोव्रतमें स्नातक हो १ ९ चुके हैं, अन्य लोग नहीं ॥१ ९ ॥ जिन द्विजोंने आदरपूर्वक इस पाशुपत शिरोव्रतका अनुष्ठान किया है, उन्हींको ब्रह्मविद्याका उपदेश २० करना चाहिये - ऐसा वेदोंका आदेश है ॥ २० ॥
देहाभिमानी पशुतुल्य प्राणियों को इस शिरोव्रतके पालनसे अपने पशुत्वका नाश करना चाहिये । वेदान्तशास्त्रका ऐसा निश्चय है कि २१ इस व्रतके द्वारा पशुत्वनाशसे कोई हिंसाजन्य पाप भी नहीं होता ॥ २१ ॥
जाबालश्रुतिके अवलम्बियोंद्वारा आदरपूर्वक २२ त्रिपुण्ड्र - धारणका विधान बताया गया है । गृहस्थाश्रमका आचरण करनेवालेको त्रियम्बक मन्त्र अथवा तारकमन्त्र ( ॐ ) - के साथ ' नमः शिवाय ' मन्त्रका उच्चारण करके प्रतिदिन आदरपूर्वक त्रिपुण्ड्र धारण करना २३ चाहिये । संन्यासीको ॐकारके साथ हंसमन्त्रका तीन बार उच्चारण करके प्रतिदिन त्रिपुण्ड्र धारण करना चाहिये - ऐसा जाबालोपनिषद्का कथन है । २४ | गृहस्थ तथा वानप्रस्थको त्रियम्बक - मन्त्र से अथवा
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६८६ गृहस्थश्च वानप्रस्थो धारयेच्च त्रिपुण्ड्रकम् । मेधावीत्यादिना वापि ब्रह्मचारी दिने दिने भस्मना सजलेनापि धारयेच्च त्रिपुण्ड्रकम् । ब्राह्मणो विधिनोत्पन्नस्त्रिपुण्ड्रभस्मनैव तु ललाटे धारयेन्नित्यं तिर्यग्भस्मावगुण्ठनम् । श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ९ प्रणवसहित पंचाक्षरमन्त्रसे त्रिपुण्ड्र लगाना चाहिये । ॥ २५ इसी प्रकार ब्रह्मचर्यका पालन करनेवालेको ' मेधावी ० ' इत्यादि मन्त्रसे प्रतिदिन त्रिपुण्ड्र धारण करना चाहिये ॥ २२–२५ ॥ भस्ममें जल मिलाकर त्रिपुण्ड्र धारण करना ॥२६ चाहिये । विधिपूर्वक त्रिपुण्ड्र भस्म लगानेसे ही ब्राह्मणका ब्राह्मणत्व प्रकट होता है । अतः उसे प्रतिदिन तिरछी रेखाओंवाला त्रिपुण्ड्र अपने ललाटपर धारण करना ( महादेवस्य सम्बन्धात्तद्धर्मेऽप्यस्ति सङ्गतिः । ) चाहिये । ( शिवजीद्वारा अपने शरीरमें भस्म धारण सम्यक् त्रिपुण्ड्रधर्मं च ब्राह्मणो नित्यमाचरेत् ॥
आदिब्राह्मणभूतेन त्रिपुण्ड्रं भस्मना धृतम् ।
यतोऽत एव विप्रस्तु त्रिपुण्ड्रं धारयेत्सदा ॥
भस्मना वेदसिद्धेन त्रिपुण्ड्रं देहगुण्ठनम् ।
रुद्रलिङ्गार्चनं वापि मोहतोऽपि च न त्यजेत् ॥
त्रियम्बकेन मन्त्रेण सतारेण तथैव च ।
पञ्चाक्षरेण मन्त्रेण प्रणवेन तथैव च ॥
ललाटे हृदये चैव दोर्द्वन्द्वे च महामुने ।
त्रिपुण्ड्रं धारयेन्नित्यं संन्यासाश्रममाश्रितः ॥
त्रियायुषेण मन्त्रेण मेधावीत्यादिनाथवा ।
गौणेन भस्मना धार्यं त्रिपुण्ड्रं ब्रह्मचारिणा ॥
नमोऽन्तेन शिवेनैव शूद्रः शुश्रूषणे रतः ।
उद्धूलनं त्रिपुण्ड्रं च नित्यं भक्त्या समाचरेत् ॥
अन्येषामपि सर्वेषां विना मन्त्रेण सुव्रत ।
उद्धूलनं त्रिपुण्ड्रं च कर्तव्यं भक्तितो मुने ॥
भूत्यैवोद्धूलनं तिर्यक् त्रिपुण्ड्रस्य च धारणम् ।
वरेण्यं सर्वधर्मेभ्यस्तस्मान्नित्यं समाचरेत् ॥
२७ करनेके कारण उनके अनुयायियोंको भी भस्म धारण करना युक्तियुक्त है ) । ब्राह्मणको प्रतिदिन त्रिपुण्ड्रधारणव्रतका विधिपूर्वक पालन करना चाहिये । २८ आदिब्राह्मणस्वरूप ब्रह्माजीने भी भस्मसे त्रिपुण्ड्र धारण किया था, अतः ब्राह्मणको सदा त्रिपुण्ड्र धारण करना चाहिये ॥ २६–२८ ॥ वेदप्रतिपादित भस्मसे शरीरमें अनुलेपन करना २ ९ चाहिये तथा त्रिपुण्ड्र धारण करना चाहिये और नित्य शिवलिंगकी पूजा करनी चाहिये, भूलकर भी इनका परित्याग नहीं करना चाहिये ॥ २ ९ ॥ ३० हे महामुने! संन्यास - आश्रममें स्थित व्यक्तिको तारक मन्त्रके साथ त्रियम्बकमन्त्र और प्रणव ( ॐ ) -के साथ पंचाक्षरमन्त्रका उच्चारण करते हुए अपने ३१ ललाट, हृदयदेश तथा दोनों भुजदण्डों पर नित्य त्रिपुण्ड्र धारण करना चाहिये ॥ ३०-३१ ॥ ब्रह्मचारीको त्र्यायुषमन्त्रसे अथवा मेधावी ० ३२ इत्यादि मन्त्रसे गौण भस्मसे त्रिपुण्ड्र धारण करना चाहिये । निरन्तर सेवाकार्यमें तत्पर शूद्रको ' शिवाय नमः ' मन्त्रसे श्रद्धापूर्वक अपने पूरे शरीरमें भस्म ३३ लगाना चाहिये तथा त्रिपुण्ड्र धारण करना चाहिये । मुने! हे सुव्रत! इसी प्रकार अन्य सभी लोगोंको भी बिना मन्त्रका उच्चारण किये ही अपने शरीरमें भक्तिपूर्वक भस्म लगाना चाहिये तथा त्रिपुण्ड्र धारण ३४ करना चाहिये॥३२-३४ ॥ सम्पूर्ण शरीरमें भस्म लगाना तथा मस्तकपर
तिरछा त्रिपुण्ड्र धारण करना सभी धर्मोंमें श्रेष्ठ है ।
३५ । अतः उसका प्रतिदिन पालन करना चाहिये ॥ ३५ ॥
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अ ० १० ] एकादश स्कन्ध ६८७
भस्माग्निहोत्रजं वाथ विरजाग्निसमुद्भवम् ।
आदरेण समादाय शुद्धे पात्रे निधाय तत् ॥
प्रक्षाल्य पादौ हस्तौ च द्विराचम्य समाहितः ।
गृहीत्वा भस्म तत्पञ्चब्रह्ममन्त्रैः शनैः शनैः ॥
प्राणायामत्रयं कृत्वा अग्निरित्यादिमन्त्रितम् ।
तैरेव सप्तभिर्मन्त्रैस्त्रिवारमभिमन्त्रयेत् ॥
ओमापोज्योतिरित्युक्त्वा ध्यात्वा मन्त्रानुदीरयेत् ।
सितेन भस्मना पूर्वं समुद्धूल्य शरीरकम् ॥
विपापो विरजो मर्त्यो जायते नात्र संशयः ।
ततो ध्यात्वा महाविष्णुं जगन्नाथं जलाधिपम् ॥
संयोज्य भस्मना तोयमग्निरित्यादिभिः पुनः ।
विमृज्य साम्बं ध्यात्वा च समुद्बल्योर्ध्वमस्तकम् ॥
तेन भावनया ब्राह्मभूतेन सितभस्मना ।
ललाटवक्षः स्कन्धेषु स्वाश्रमोचितमन्त्रतः ॥
मध्यमानामिकाङ्गुष्ठैरनुलोमविलोमतः त्रिपुण्ड्रं धारयेन्नित्यं त्रिकालेष्वपि भक्तितः ॥ अग्निहोत्रजन्य भस्म तथा विरजाग्निजन्य भस्मको ३६ अत्यन्त आदरपूर्वक लेकर उसे किसी शुद्ध पात्रमें रखकर पुनः दोनों हाथ तथा पैर धोकर दो बार आचमन करके हाथमें भस्म लेकर एकाग्रचित्त हो धीरे - धीरे पाँच ब्रह्ममन्त्रों ( सद्योजातं प्रपद्यामि आदि ) -३७ का उच्चारण करना चाहिये । तत्पश्चात् तीन बार प्राणायाम करके ' अग्निरिति भस्म ' आदि [ छः आथर्वण मन्त्रों तथा बृहज्जाबालोपनिषद्के तेजो भस्मेति ] ३८ कुल सात मन्त्रोंसे उसे तीन बार अभिमन्त्रित करना चाहिये । तदनन्तर — ॐ आपो ज्योती रसोऽमृतम् ' ऐसा उच्चारण करके शिवजीका ध्यानकर उन सात मन्त्रोंका उच्चारण करना चाहिये । इस श्वेत भस्मको पूरे ३ ९ शरीरमें लगाकर मनुष्य पापसे रहित तथा विशुद्ध हो जाता है; इसमें सन्देह नहीं है ॥ ३६- ३ ९ ३ ॥ तत्पश्चात् जगत्के स्वामी जलाधिपति ४० महाविष्णुका ध्यान करके भस्ममें जल मिलाकर पुनः ' अग्निरिति ' आदि मन्त्रोंके द्वारा उसका संस्कार करके साम्ब सदाशिवका ध्यानकर उस भस्मको ४१ ऊर्ध्व मस्तकपर लगा लेना चाहिये । उस भस्ममें शिवजीकी भावना करके सभी आश्रमोंके लोगोंको अपने - अपने आश्रमके लिये विहित मन्त्रोंका उच्चारणकर ललाटपर, वक्षःस्थलपर तथा कन्धेपर ४२ उस ब्रह्मस्वरूप श्वेत भस्मसे मध्यमा - अनामिका तथा अँगूठेसे अनुलोम - विलोमक्रमसे प्रतिदिन तीनों कालों ( प्रातः, मध्याह्न, सायं ) - में भक्तिपूर्वक त्रिपुण्ड्र ४३ धारण करना चाहिये ॥ ४० - ४३ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायामेकादशस्कन्धे सशिरोव्रतं त्रिपुण्ड्रधारणवर्णनं नाम नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥
अथ दशमोऽध्यायः भस्म - धारणकी विधि श्रीनारायण उवाच श्रीनारायण बोले- हे ब्रह्मन्! हे ब्रह्मवेत्ताओंमें आग्नेयं गौणमज्ञानध्वंसकं श्रेष्ठ! अग्निसे तैयार किया गया ' गौण ' भस्म ज्ञानसाधकम् । भी अज्ञानका नाश करनेवाला तथा ज्ञानका साधन है । इस गौण भस्मको भी आप अनेक प्रकारवाला गौणं नानाविधं विद्धि ब्रह्मन्ब्रह्मविदांवर ॥ १ । जानिये ॥१ ॥
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६८८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १० अग्निहोत्राग्निजं तद्वद्विरजानलजं मुने । हे मुने! अग्निहोत्राग्निजनित भस्म, उसी तरह औपासनसमुत्पन्नं समिदग्निसमुद्भवम् ॥ २ विरजाग्निजनित भस्म, औपासनाग्निसे उत्पन्न भस्म, पचनाग्निसमुत्पन्नं दावानलसमुद्भवम् त्रैवर्णिकानां सर्वेषामग्निहोत्रसमुद्भवम् विरजानलजं चैव धार्यं भस्म महामुने औपासनसमुत्पन्नं गृहस्थानां विशेषतः समिदग्निसमुत्पन्नं धार्यं वै ब्रह्मचारिणा । शूद्राणां श्रोत्रियागारपचनाग्निसमुद्भवम् अन्येषामपि सर्वेषां धार्यं दावानलोद्भवम् । कालश्चित्रा पौर्णमासी देशः स्वीयः परिग्रहः क्षेत्रारामाद्यरण्यं वा प्रशस्त: शुभलक्षणः । तत्र पूर्वत्रयोदश्यां सुस्नातः सुकृताह्निकः
अनुज्ञाप्य स्वमाचार्यं सम्पूज्य प्रणिपत्य च ।
पूजां वैशेषिकीं कृत्वा शुक्लाम्बरधरः स्वयम् ॥
शुद्धयज्ञोपवीती च शुक्लमाल्यानुलेपनः ।
दर्भासने समासीनो दर्भमुष्टिं प्रगृह्य च ॥
प्राणायामत्रयं कृत्वा प्राङ्मुखो वाप्युदङ्मुखः ।
ध्यात्वा देवं च देवीं च तद्विज्ञापनवर्त्मना ॥
व्रतमेतत्करोमीति भवेत्सङ्कल्पदीक्षितः ।
यावच्छरीरपातं वा द्वादशाब्दमथापि वा ॥
तदर्थं वा तदर्थं वा मासद्वादशकं तु वा ।
तदर्थं वा तदर्थं वा मासमेकमथापि वा ॥
दिनद्वादशकं वापि दिनषट्कमथापि वा ।
तदर्थं दिनमेकं वा व्रतसङ्कल्पनावधि ॥
समिधाग्निजन्य भस्म, पचनाग्नि ( भोजननिर्माण ) -। जन्य भस्म तथा दावाग्निसे उत्पन्न भस्म गौण भस्म ॥ ३ हैं । हे महामुने! समस्त त्रैवर्णिकों ( ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य ) - को अग्निहोत्रजन्य तथा विरजाग्निजन्य । भस्म धारण करना चाहिये । गृहस्थोंको विशेषकर औपासन- अग्निजनित भस्म तथा ब्रह्मचारीको ॥ ४ समिधाग्निसे उत्पन्न भस्म लगाना चाहिये । शूद्रों को वैदिक ब्राह्मणकी पाकशालामें भोजननिर्माणसे उत्पन्न भस्म तथा अन्य सभी जनोंको दावानलजनित भस्म ॥ ५ लगाना चाहिये ॥ २–५३ ॥ [ हे ब्रह्मन्! अब मैं विरजाग्निजन्य भस्मकी उत्पत्तिके विषयमें बता रहा हूँ ] चित्रा नक्षत्रयुक्त ॥ ६ पूर्णिमाकी तिथि तथा अपना निवासस्थान ही इसके निर्माणके लिये समीचीन है । इसके अतिरिक्त खेत, बाग तथा वन भी इस विरजाहोमके लिये शुभ ॥ ७ लक्षणोंवाले तथा प्रशस्त हैं । पूर्णिमा तिथिके पूर्व त्रयोदशीको विधिवत् स्नान करके सन्ध्या आदि नित्य कर्म सम्पादितकर अपने आचार्यसे आज्ञा लेकर ८ उनकी पूजा करे तथा उन्हें प्रणाम करे । तदनन्तर उनकी विशिष्ट पूजा करके स्वयं श्वेत वस्त्र धारणकर शुद्ध यज्ञोपवीत पहनकर श्वेत माला धारण करे तथा ९ चन्दनादि लगाये ॥ ६–८३ ॥ तत्पश्चात् कुशके आसनपर बैठकर हाथकी मुट्ठीमें कुश लेकर पूर्व अथवा उत्तर दिशाकी ओर १० मुख करके तीन बार प्राणायाम करना चाहिये । पुनः महादेव तथा महादेवीका ध्यान करके उनके द्वारा निर्दिष्ट रीतिके अनुसार इस प्रकार निवेदन करके संकल्पमें दीक्षित होना चाहिये - ' मैं इस शिरोव्रतको ११ इस शरीरकी समाप्तितक अथवा बारह वर्षतक अथवा छः वर्षतक अथवा तीन वर्षतक अथवा बारह मासतक अथवा छः मासतक अथवा तीन मासतक १२ अथवा एक मासतक अथवा बारह दिनतक अथवा छः दिनतक अथवा तीन दिनतक अथवा एक दिनकी अवधितक अनुष्ठित करनेके लिये यह व्रत - संकल्प १३ | ग्रहण करता हूँ ' ॥९ –१३ ॥
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अ ० १० ] एकादश स्कन्ध ६८ ९
अग्निमाधाय विधिवद्विरजाहोमकारणात् ।
हुत्वाज्येन समिद्भिश्च चरुणा च यथाविधि ॥
पूताहात्पुरतो भूयस्तत्त्वानां शुद्धिमुद्दिशन् ।
जुहुयान्मूलमन्त्रेण तैरेव समिदादिभिः ॥
तत्त्वान्येतानि मे देहे शुध्यन्तामित्यनुस्मरन् ।
पश्चाद्भूतादितन्मात्राः पञ्चकर्मेन्द्रियाणि च ॥
ज्ञानकर्मविभेदेन पञ्च पञ्च विभागशः ।
त्वगादिधातवः सप्त पञ्च प्राणादिवायवः ॥
मनो बुद्धिरहङ्कारो गुणाः प्रकृतिपूरुषौ ।
रागो विद्या कला चैव नियतिः काल एव च ॥
माया च शुद्धविद्या च महेश्वरसदाशिवौ ।
शक्तिश्च शिवतत्त्वं च तत्त्वानि क्रमशो विदुः ॥
मन्त्रैस्तु विरजैर्हुत्वा होतासौ विरजो भवेत् ।
अथ गोमयमादाय पिण्डीकृत्याभिमन्त्र्य च ॥
न्यस्याग्नौ तं च संरक्ष्य दिने तस्मिन् हविष्यभुक् ।
प्रभाते च चतुर्दश्यां कृत्वा सर्वं पुरोदितम् ॥
तस्मिन्दिने निराहारः कालशेषं समापयेत् ।
प्रातः पर्वणि चाप्येवं कृत्वा होमावसानतः ॥
उपसंहृत्य रुद्राग्निं गृहीत्वा भस्म यत्नतः ।
ततश्च जटिलो मुण्डः शिखैकजट एव च ॥
भूत्वा स्नात्वा पुनर्वीतलज्जश्चेत्स्याद्दिगम्बरः ।
अन्यः काषायवसनश्चर्मचीराम्बरोऽथवा ॥
एकाम्बरो वल्कलवान्भवेद्दण्डी च मेखली ।
प्रक्षाल्य चरणौ पश्चाद् द्विराचम्यात्मनस्तनुम् ॥
इसके बाद विरजाहोमके लिये विधिपूर्वक ( अपनी १४ शाखा गृह्यसूत्रकी विधिसे ) अग्न्याधान करके घृत, समिधा तथा चरुसे विधिवत् हवन करना चाहिये । पुनः इस पवित्र दिनके बाद चतुर्दशीको अपने १५ तत्त्वों की शुद्धिके उद्देश्यसे मूलमन्त्रका उच्चारण करते हुए उन्हीं समिधा आदि द्रव्योंसे आहुति प्रदान करनी चाहिये । मेरे शरीरमें ये तत्त्व शुद्धताको प्राप्त हो जायँ - ऐसी भावना करते हुए आहुति डालनी चाहिये । १६ पंचमहाभूत ( पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश ), पंचतन्मात्राएँ ( गन्ध, रस, रूप, स्पर्श, शब्द ), पाँच कर्मेन्द्रियाँ ( हाथ, पैर, वाक्, पायु, उपस्थ ), पाँच १७ ज्ञानेन्द्रियाँ ( नेत्र, कान, नासिका, जीभ, त्वचा ), सात धातुएँ ( रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा, वीर्य ) प्राण आदि पाँच वायु ( प्राण, अपान, व्यान, उदान, १८ समान ), मन, बुद्धि, अहंकार, तीनों गुण ( सत्त्व, रज, तम ), प्रकृति, पुरुष, राग, विद्या, कला, नियति, काल, माया, शुद्ध विद्या, महेश्वर, सदाशिव, शक्ति तथा १ ९ शिवतत्त्व - ये क्रमशः तत्त्व कहे गये हैं ॥ १४–१९ ॥ विरजामन्त्रोंसे आहुति प्रदान करके वह होता निष्पाप हो जाता है । इसके बाद गायका गोबर लेकर २० उसका पिण्ड बनाकर उसे [ पंचाक्षरमन्त्रसे ] अभिमन्त्रित करके पुनः उसे अग्निमें रखकर उसका संरक्षण करता रहे । उस दिन केवल हविष्यान्न ग्रहण करे । चतुर्दशीको २१ प्रातः काल पूर्वोक्त विधिसे [ नित्यकर्म तथा हवन आदि ] समस्त कार्य सम्पन्न करके उस दिन निराहार रहकर सम्पूर्ण समय व्यतीत करे ॥ २० - २१३ ॥ तत्पश्चात् पूर्णिमाके दिन प्रातः काल नित्यकर्म २२ करके हवन करे और होमके अनन्तर रुद्राग्निका विसर्जन करके सावधानीके साथ भस्म ग्रहण कर ले । तदनन्तर जटाधारी, मुण्डी अथवा शिखारूपी एक २३ जटावाला होकर पुनः स्नान कर लेनेके अनन्तर यदि लज्जाशून्य हो गया हो तो दिगम्बर ( नग्न ) हो जाय, यदि नहीं तो गेरुआ वस्त्र अथवा मृगचर्म अथवा २४ वस्त्रका एक टुकड़ा या एक वस्त्र या पेड़की छाल पहनकर हाथमें दण्ड तथा कटिप्रदेशमें मेखला धारण करे । तत्पश्चात् अपने दोनों पैर प्रक्षालित - कर दो २५ | बार आचमन करके विरजाग्निजन्य उस भस्मको
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६ ९ ० सङ्कलीकृत्य तद्भस्म विरजानलसम्भवम् । अग्निरित्यादिभिर्मन्त्रैः षड्भिराथर्वणैः क्रमात्
विमृज्याङ्गानि मूर्धादिचरणान्तं च तैः स्पृशेत् ।
ततस्तेन क्रमेणैव समुद्धूल्य च भस्मना ॥
सर्वाङ्गोद्भूलनं कुर्यात्प्रणवेन शिवेन वा ।
ततश्च पुण्ड्रं रचयेत्त्रियायुषसमाह्वयम् ॥
शिवभावं समागम्य शिवभावमथाचरेत् ।
कुर्यात्त्रिसन्ध्यमप्येवमेतत्पाशुपतं व्रतम् ॥
भुक्तिमुक्तिप्रदं चैव पशुत्वं विनिवर्तयेत् ।
तत्पशुत्वं परित्यज्य कृत्वा पाशुपतं व्रतम् ॥
पूजनीयो महादेवो लिङ्गमूर्तिः सदाशिवः ।
भस्मस्नानं महापुण्यं सर्वसौख्यकरं परम् ॥
आयुष्यं बलमारोग्यं श्रीपुष्टिवर्धनं यतः ।
रक्षार्थं मङ्गलार्थं च सर्वसम्पत्समृद्धये ॥
भस्मस्निग्धमनुष्याणां महामारीभयं न च ।
शान्तिकं पौष्टिकं भस्म कामदं च त्रिधा भवेत् ॥
श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ११ एकत्र करके ' अग्निरिति भस्म ' आदि छः आथर्वण ॥ २६ मन्त्रोंसे अंगोंका शोधन करके पुनः उन्हीं मन्त्रोंसे क्रमसे मस्तकसे लेकर चरणतक भस्म लगाना चाहिये । इस क्रमसे उस भस्मद्वारा उद्धूलन करके प्रणव ( ॐ ) मन्त्रसे या शिवमन्त्र से सम्पूर्ण शरीरमें २७ भस्मका अनुलेपन करना चाहिये । इसके बाद ' त्र्यायुष ' संज्ञावाले मन्त्रसे त्रिपुण्ड्र धारण करे । ऐसा कर लेनेपर शिवभावको प्राप्त होकर शिवभावका ही आचरण २८ करे॥२२–२८३ ॥ इस प्रकार इस पाशुपतव्रतको प्रात: कालीन, मध्याह्नकालीन तथा सायंकालीन तीनों सन्ध्याओंके २ ९ समय करना चाहिये । यह पाशुपतव्रत भोग तथा मोक्षको देनेवाला है और यह पशुत्वभावको दूर कर देता है । अतएव पशुत्व - विचारका त्याग करके ३० पाशुपतव्रतका अनुष्ठान करनेके अनन्तर लिंगमूर्ति महादेव सदाशिवकी पूजा करनी चाहिये ॥ २ ९ -३०३ ॥ भस्मस्नान महान् पुण्यदायक; सभी सुखोंकी प्राप्ति करानेवाला; अतिश्रेष्ठ; आयु, बल, आरोग्य, ३१ लक्ष्मी तथा पुष्टिकी वृद्धि करनेवाला है । अतः अपनी रक्षा, कल्याण तथा सर्वविधसम्पदाकी समृद्धिके लिये मनुष्यों को भस्म धारण करना चाहिये । भस्म-३२ स्नान करनेवाले मनुष्योंको महामारीका भय नहीं रहता है । यह भस्म शान्तिक ( शान्तिकारक ), पौष्टिक ( पुष्टिकारक ) तथा कामद ( सिद्धिप्रदायक ) -इन ३३ । तीन प्रकारका होता है ॥ ३१ - ३३ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायामेकादशस्कन्धे भस्ममाहात्म्ये पाशुपतव्रतवर्णनं नाम दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥
अथैकादशोऽध्यायः भस्मके नारद उवाच
त्रिविधत्वं कथं चास्य भस्मनः परिकीर्तितम् ।
एतत्कथय मे देव महत्कौतूहलं मम ॥ १
श्रीनारायण उवाच
त्रिविधत्वं प्रवक्ष्यामि देवर्षे भस्मनः शृणु ।
महापापक्षयकरं महाकीर्तिकरं परम् ॥ २ ।
प्रकार नारदजी बोले - हे देव! यह भस्म तीन प्रकारका कैसे कहा गया है? यह मुझे आप बताइये; क्योंकि इस विषयमें मुझे बहुत कौतूहल हो रहा है ॥ १ ॥
नारायण बोले- हे देवर्षे! मैं भस्मके तीन प्रकारोंका वर्णन करूँगा, आप सुनिये । यह महान् पापोंको नष्ट करनेवाला तथा विपुल कीर्ति प्रदान करनेवाला है ॥ २ ॥
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अ ० ११ ] एकादश
गोमयं योनिसम्बद्धं तद्धस्तेनैव गृह्यते ।
ब्राह्मैर्मन्त्रैस्तु सन्दग्धं तच्छान्तिकृदिहोच्यते ॥ ३
सावधानस्तु गृह्णीयान्नरो वै गोमयं तु यत् ।
अन्तरिक्षे गृहीत्वा तत्षडङ्गेन दहेदतः ॥ ४
पौष्टिकं तत्समाख्यातं कामदं च ततः शृणु ।
प्रासादेन दहेदेतत्कामदं भस्म कीर्तितम् ॥ ५
प्रातरुत्थाय देवर्षे भस्मव्रतपरः शुचिः ।
गवां गोष्ठेषु गत्वा तु नमस्कृत्य तु गोकुलम् ॥ ६
गवां वर्णानुरूपाणां गृह्णीयाद् गोमयं शुभम् ।
ब्राह्मणस्य च गौ: श्वेता रक्ता गौः क्षत्रियस्य च ॥ ७
पीतवर्णा तु वैश्यस्य कृष्णा शूद्रस्य कथ्यते ।
पौर्णमास्याममावास्यामष्टम्यां वा विशुद्धधीः ॥ ८
प्रासादेन तु मन्त्रेण गृहीत्वा गोमयं शुभम् ।
हृदयेन तु मन्त्रेण पिण्डीकृत्य तु गोमयम् ॥ ९
रविरश्मिसुसन्तप्तं शुचौ देशे मनोहरे ।
तुषेण वा बुसैर्वापि प्रासादेन तु निक्षिपेत् ॥ १०
अरण्युद्भवमग्नि वा श्रोत्रियागारजं तु वा ।
तदग्नौ विन्यसेत्तं च शिवबीजेन मन्त्रतः ॥ ११
गृह्णीयादथ तत्राग्निकुण्डाद्भस्म विचक्षणः ।
नवपात्रं समादाय प्रासादेन तु निक्षिपेत् ॥ १२
केतकी पाटली तद्वदुशीरं चन्दनं तथा ।
नानासुगन्धिद्रव्याणि काश्मीरप्रभृतीनि च ॥ १३
निक्षिपेत्तत्र पात्रे तु सद्योमन्त्रेण शुद्धधीः ।
जलस्नानं पुरा कृत्वा भस्मस्नानमतः परम् ॥ १४ ।
स्कन्ध ६ ९ १ जो गोमय ( गोबर ) योनिसे सम्बद्ध अर्थात् योनिसे अलग होनेके पूर्व हाथपर ग्रहण कर लिया गया हो, उस गोमयको [ सद्योजात ० आदि ] ब्राह्ममन्त्रोंसे दग्ध करनेपर जो भस्म बनती है, उसे शान्तिक भस्म कहा जाता है ॥ ३ ॥
जिस गोमयको [ जमीनपर गिरनेसे पूर्व ] अन्तरिक्षमें ही सावधानीपूर्वक हाथपर ले लिया गया हो, उस गोमयको षडंगमन्त्रसे दग्ध करनेपर जो भस्म बनती है, उसे पौष्टिक भस्म कहा गया है । [ हे देवर्षे! ] अब इसके बाद कामद भस्मके विषयमें सुनिये । प्रासादमन्त्र ( हौम् ) -से दग्ध करनेपर जो भस्म बनती है, उसे कामद भस्म कहा गया है॥४-५ ॥ हे देवर्षे! भस्मव्रतपरायण मनुष्यको प्रातः काल उठकर [ नित्यकर्मसे ] पवित्र होनेके पश्चात् गोशाला में जाकर गोवृन्दको नमस्कार करके वर्णानुरूप गायोंका शुद्ध गोमय लेना चाहिये । ब्राह्मणके लिये श्वेत, क्षत्रियके लिये लाल, वैश्यके लिये पीले तथा शूद्रके लिये काले रंगकी गाय [ श्रेयस्कर ] कही जाती है । विशुद्ध बुद्धिवाले व्यक्तिको पूर्णिमा, अमावास्या अथवा अष्टमीको प्रासाद ( हौम् ) मन्त्रसे शुद्ध गोमय उठाकर हृदयमन्त्र ( नमः ) - से उस गोमयको पिण्डके आकारका बना लेनेके अनन्तर पुनः उस पिण्डको सूर्यकी किरणोंमें भलीभाँति सुखाकर उसे धानकी भूसी या [ गेहूँ आदिके ] भूसेसे वेष्टित करके प्रासादमन्त्रका उच्चारण करते हुए किसी सुन्दर तथा पवित्र स्थानपर रख देना चाहिये ॥ ६–१० ॥ तत्पश्चात् अरणिसे उत्पन्न अग्नि अथवा वैदिक ब्राह्मणके घरसे अग्नि लाकर शिवबीजमन्त्रसे उस पिण्डको अग्निमें डाल देना चाहिये ॥ ११ ॥
पुनः बुद्धिमान् मनुष्यको चाहिये कि उस अग्निकुण्डसे भस्म निकाले और एक नया पात्र लेकर उसमें भस्मको प्रासाद - मन्त्रसे रख दे । तत्पश्चात् विशुद्ध बुद्धिवाले व्यक्तिको केवड़ा, गुलाब, खस, चन्दन और केसर आदि विविध प्रकारके सुगन्धित द्रव्योंको सद्योजात मन्त्रसे उस पात्रमें स्थित भस्म में मिला लेना चाहिये । पहले जल - स्नान करके उसके बाद ही भस्म - स्नान करना चाहिये॥१२–१४ ॥