देवी भागवत उत्तरार्द्ध — पृष्ठ 701–710
देवी भागवत उत्तरार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 701–710
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६ ९ २ जलस्नाने त्वशक्तश्च भस्मस्नानं समाचरेत् । प्रक्षाल्य पादौ हस्तौ च शिरश्चेशानमन्त्रतः
समुद्धूल्य ततः पश्चादाननं तत्पुरुषेण तु ।
अघोरेण तु हृदयं नाभिं वामेन तत्परम् ॥
सद्योमन्त्रेण सर्वाङ्गं समूद्धूल्य विचक्षणः ।
पूर्ववस्त्रं परित्यज्य शुद्धवस्त्रं परिग्रहेत् ॥
प्रक्षाल्य पादौ हस्तौ च पश्चादाचमनं चरेत् ।
भस्मनोद्धूलनाभावे त्रिपुण्ड्रं तु विधीयते ॥
मध्याह्लात्प्राग्जलैर्युक्तं परतो जलवर्जितम् ।
तर्जन्यनामिकामध्यैस्त्रिपुण्ड्रं च समाचरेत् ॥
मूर्ध्नि चैव ललाटे च कर्णे कण्ठे तथैव च ।
हृदये चैव बाह्वोश्च न्यासस्थानं हि चोच्यते ॥
पञ्चाङ्गुलैर्न्यसेन्मूर्ध्नि प्रासादेन तु मन्त्रतः ।
त्र्यङ्गुलैर्विन्यसेद्धाले शिरोमन्त्रेण देशिकः ॥
सद्येन दक्षिणे कर्णे वामदेवेन वामतः ।
अघोरेण तु कण्ठे च मध्याङ्गुल्या स्पृशेद् बुधः ॥
हृदयं हृदयेनैव त्रिभिरङ्गुलिभिः स्पृशेत् ।
विन्यसेद्दक्षिणे बाहौ शिखामन्त्रेण देशिकः ॥
वामबाहौ न्यसेद्धीमान्कवचेन त्रियङ्गलैः ।
मध्येन संस्पृशेन्नाभ्यामीशान इति मन्त्रतः ॥
ब्रह्मविष्णुमहेशानास्तिस्त्रो रेखा इति स्मृताः ।
आद्यो ब्रह्मा ततो विष्णुस्तदूर्ध्वं तु महेश्वरः ॥
श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ११ यदि जलस्नान करनेमें किसी प्रकारकी असमर्थता ॥ १५ हो तो केवल भस्मस्नान ही करे । हाथ - पैर धोकर ' ईशान ' मन्त्रसे सिरपर भस्म लगा करके ' तत्पुरुष ' मन्त्रसे मुखपर, ' अघोर ' मन्त्रसे हृदयपर, ' वामदेव ' मन्त्रसे नाभिपर भस्म लगाये । तदनन्तर ' सद्योजात ' १६ मन्त्रसे शरीरके सभी अंगोंपर भस्म लगाकर बुद्धिमान् व्यक्तिको चाहिये कि पहलेका धारण किया हुआ वस्त्र छोड़कर शुद्ध वस्त्र पहन ले ॥ १५ - १७ ॥ १७ तत्पश्चात् हाथ- थ - पैर धोकर आचमन करना चाहिये । और यदि पूरे शरीरपर भस्म न लगा सके तो केवल त्रिपुण्ड्र ही धारण कर लेनेका भी विधान है ॥ १८ ॥
१८ मध्याह्नके पूर्व भस्मको जलमें मिलाकर तथा इसके बाद लगाना हो तो जलरहित ( सूखा ) भस्मका त्रिपुण्ड्र तर्जनी, अनामिका तथा मध्यमा - इन तीनों १ ९ अँगुलियोंसे धारण करना चाहिये ॥१ ९ ॥ सिर, ललाट, कान, कण्ठ, हृदय और दोनों बाहु - ये त्रिपुण्ड्र धारण करनेके स्थान बताये गये हैं । प्रासाद मन्त्रका उच्चारण करते हुए पाँचों अँगुलियोंसे २० सिरपर त्रिपुण्ड्र धारण करना चाहिये । साधकको चाहिये कि तीन अँगुलियों ( तर्जनी, मध्यमा तथा अनामिका ) - से शिरोमन्त्र ( स्वाहा ) - द्वारा ललाटपर २१ त्रिपुण्ड्र लगाये । साधकको सद्योजात मन्त्रसे दाहिने कानपर, वामदेव मन्त्रसे बायें कानपर तथा अघोर मन्त्रसे कण्ठपर मध्यमा अँगुलीद्वारा भस्म लगाना चाहिये ॥ २०–२२ ॥ २२ इसी प्रकार साधकको चाहिये कि हृदयमन्त्रसे तीनों अँगुलियोंद्वारा हृदयमें और शिखामन्त्रसे दाहिनी भुजापर त्रिपुण्ड्र धारण करे । बुद्धिमान् व्यक्तिको २३ उन्हीं तीनों अँगुलियोंद्वारा कवचमन्त्रसे बायीं भुजापर त्रिपुण्ड्र लगाना चाहिये और मध्यमाद्वारा ' ईशानः सर्वविद्यानाम् ० ' – इस मन्त्रसे नाभिपर भस्म धारण करना चाहिये ॥ २३-२४ ॥ २४ ये तीनों रेखाएँ ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश्वरका स्वरूप मानी गयी हैं । त्रिपुण्ड्रकी पहली रेखा ब्रह्मा, उसके बादवाली रेखा विष्णु तथा उसके ऊपरकी रेखा २५ । महेश्वरका स्वरूप है ॥ २५ ॥
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अ ० १२ ] एकादश स्कन्ध ६ ९ ३
एकाङ्गुलेन न्यस्तं यदीश्वरस्तत्र देवता ।
शिरोमध्ये त्वयं ब्रह्मा ईश्वरस्तु ललाटके ॥ २६
कर्णयोरश्विनौ देवौ गणेशस्तु गले तथा ।
क्षत्रियश्च तथा वैश्यः शूद्रश्चोद्धूलनं त्यजेत् ॥ २७
सर्वेषामन्त्यजातीनां मन्त्रेण रहितं भवेत् ।
( अदीक्षितं मनुष्याणामपि मन्त्रं विना भवेत् ) ॥ २८
एक अँगुली ( मध्यमा ) - से जो भस्म लगायी जाती है, उस रेखाके देवता ईश्वर हैं । सिरमें साक्षात् ब्रह्मा, ललाटपर ईश्वर, कानोंमें दोनों अश्विनीकुमार और गलेमें गणेश विद्यमान हैं । क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्रको सर्वांग भस्म नहीं लगाना चाहिये और समस्त अन्त्य जातियोंको मन्त्रोंका उच्चारण किये बिना ही भस्म धारण करना चाहिये । ( इसी प्रकार दीक्षारहित मनुष्यों को भी मन्त्रके बिना ही भस्म । लगाना चाहिये ) ॥ २६–२८ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायामेकादशस्कन्थे त्रिविधभस्ममाहात्म्यवर्णनं नामैकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥
अथ द्वादशोऽध्यायः भस्म न श्रीनारायण उवाच
देवर्षे शृणु तत्सर्वं भस्मोद्धूलनजं फलम् ।
सरहस्यविधानं च सर्वकामफलप्रदम् ॥
कपिलायाः शकृत्स्वच्छं गृहीत्वा गगनेऽपतत् ।
न क्लिन्नं नापि कठिनं न दुर्गन्धं न चोषितम् ॥
उपर्यधः परित्यज्य गृह्णीयात्पतितं यदि ।
पिण्डीकृत्य शिवाग्न्यादौ तत्क्षिपेन्मूलमन्त्रितम् ॥
आदाय वाससाच्छाद्य भस्माधाने विनिक्षिपेत् ।
सुकृते सुदृढे शुद्धे क्षालिते प्रोक्षिते शुभे ॥
विन्यस्य मन्त्री मन्त्रेण पात्रे भस्म विनिक्षिपेत् ।
तैजसं दारवं चाथ मृण्मयं चैलमेव च ॥
अन्यद्वा शोभनं शुद्धं भस्माधारं प्रकल्पयेत् ।
क्षौमे चैवातिशुद्धे वा धनवद्भस्म निक्षिपेत् ॥
धारण करनेपर दोष श्रीनारायण बोले- हे देवर्षे! अब रहस्य तथा विधानके साथ भस्म लगानेसे प्राप्त होनेवाले १ समस्त फलके विषयमें सुनिये । यह भस्मोद्धूलन सभी कामनाओंको सफल करनेवाला है ॥ १ ॥
कपिला गायका स्वच्छ गोमय भूमिपर गिरनेके पूर्व ही हाथोंसे ग्रहण कर ले । वह न २ गीला हो, न कठोर हो, न दुर्गन्धयुक्त हो और न बासी हो । यदि गोबर पृथ्वीपर गिर पड़ा हो तो ऊपर तथा नीचेका भाग छोड़कर बीचका अंश लेना चाहिये । तत्पश्चात् उसे पिण्डके आकारका ३ बनाकर मूलमन्त्रसे अभिमन्त्रित करके शिवाग्निमें डाल देना चाहिये ॥ २-३ ॥ जल जानेपर भस्मको निकालकर तथा उसे किसी शुद्ध वस्त्रसे छानकर एक सुन्दर, पवित्र, सुदृढ़, ४ स्वच्छ, सम्यक् प्रक्षालित किये गये तथा प्रोक्षित भस्मपात्रमें रख ले । मन्त्रवेत्ताको चाहिये कि मूलमन्त्रका उच्चारण करके ही भस्मको पात्रमें रखे । भस्म ५ रखनेके लिये किसी धातु ( सोना, ताँबा आदि ), काष्ठ, मिट्टी, वस्त्र अथवा किसी अन्य सुन्दर तथा शुद्ध पदार्थका भस्मपात्र बनाना चाहिये । अथवा किसी अति शुद्ध रेशमी वस्त्रसे बने पात्रमें धनकी ६ तरह भस्मको सुरक्षित रखना चाहिये ॥ ४–६ ॥
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६ ९ ४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १२
प्रस्थितो भस्म गृह्णीयात्स्वयं चानुचरोऽपि वा ।
न चायुक्तकरे दद्यान्न चाशुचितले क्षिपेत् ॥ ७
न संस्पृशेत्तु नीचाङ्गैर्न क्षिपेन्न च लङ्घयेत् ।
तस्माद्भसितमादाय विनियुञ्जीत मन्त्रितम् ॥ ८
विभूतिधारणविधिः स्मृतिप्रोक्तो मयेरितः ।
यदीयाचरणेनैव शिवतुल्यो न संशयः ॥ ९
शैवैः सम्पादितं भस्म वैदिकैः शिवसन्निधौ ।
भक्त्या परमया ग्राह्यं प्रार्थयित्वा तु पूजयेत् ॥ १०
तन्त्रोक्तवर्त्मना सिद्धं भस्म तान्त्रिकपूजकैः ।
यत्रकुत्रापि दत्तं चेत्तद् ग्राह्यं नैव वैदिकैः ॥ ११
शूद्रैः कापालिकैर्वाथ पाखण्डैरपरैस्तु तत् ।
त्रिपुण्ड्रं धारयेद्भक्त्या मनसापि न लङ्घयेत् ॥ १२
श्रुत्या विधीयते यस्मात्तत्त्यागी पतितो भवेत् ।
त्रिपुण्ड्रधारणं भक्त्या तथा देहावगुण्ठनम् ॥ १३
द्विजः कुर्याद्धि मन्त्रेण तत्त्यागी पतितो भवेत् ।
उद्धूलनं त्रिपुण्ड्रं च भक्त्या नैवाचरन्ति ये ॥१४
तेषां नास्ति विनिर्मोक्ष: संसाराज्जन्मकोटिभिः ।
येन भस्मोक्तमार्गेण धृतं न मुनिपुङ्गव ॥ १५
तस्य विद्धि मुने जन्म निष्फलं सौकरं यथा ।
येषां वपुर्मनुष्याणां त्रिपुण्ड्रेण विना स्थितम् ॥ १६
श्मशानसदृशं तत्स्यान्न प्रेक्ष्यं पुण्यकृज्जनैः । कहीं प्रस्थान करते समय भस्मपात्र या तो स्वयं लिये रहे अथवा साथ चलनेवाला अनुचर ( सेवक ) इसे लिये रहे । इसे न किसी अयोग्य व्यक्तिके हाथमें दे और न तो किसी अपवित्र स्थानपर ही रखे ॥ ७ ॥
शरीरके नीचेके अंग ( पैर आदि ) - से भस्मको न तो स्पर्श करे, न तो उसे फेंके और न तो लाँघे । उस पात्रसे भस्म निकालकर अभिमन्त्रित करनेके बाद ही उसे धारण करना चाहिये ॥ ८ ॥
विभूतिधारणकी जो विधि स्मृतिग्रन्थोंमें बतायी गयी है, मैंने उसीका वर्णन किया है । जिसके अनुसार आचरण करनेसे मनुष्य शिवतुल्य हो जाता है, इसमें सन्देह नहीं है ॥ ९ ॥
भगवान् शिवकी सन्निधिमें वैदिक शिवभक्तोंद्वारा बनाये गये भस्मको ही परम श्रद्धाके साथ ग्रहण करना चाहिये और उसे माँगकर उसकी पूजा करनी चाहिये । तन्त्रशास्त्रमें कही गयी विधिसे तान्त्रिक पूजकोंद्वारा निर्मित किया गया भस्म तान्त्रिकोंके लिये ग्राह्य है, वैदिकोंके लिये नहीं । वैदिकोंको चाहिये कि वे शूद्रों, कापालिकों तथा पाखण्डियोंद्वारा ग्राह्य तथा जिस किसीको भी दिये जानेवाले भस्मको ग्रहण न करें । सभीको अत्यन्त श्रद्धापूर्वक त्रिपुण्ड्र धारण करना चाहिये और मनसे भी भस्मका तिरस्कार नहीं करना चाहिये । श्रुति द्वारा इसका विधान किया गया है, अतः भस्मका त्याग करनेवाला पतित हो जाता है । द्विजको भक्तिपूर्वक मन्त्रोच्चारणके साथ त्रिपुण्ड्र धारण करना चाहिये तथा शरीरपर भस्मका अनुलेपन करना चाहिये । इसका परित्याग
करनेवालेका पतन हो जाता है । १० - १३३ ॥
जो लोग भक्तिपूर्वक सभी अंगोंमें भस्म नहीं लगाते तथा त्रिपुण्ड्र धारण नहीं करते, करोड़ों जन्मोंमें भी इस संसारसे उनकी मुक्ति नहीं हो सकती ॥ १४३ ॥
हे मुनिवर! जिस मनुष्यने विहित मार्गसे भस्म धारण नहीं किया; हे मुने! आप उसके जन्मको सूअरके जन्मकी भाँति निरर्थक समझिये ॥ १५३ ॥
जिन मनुष्योंका शरीर बिना त्रिपुण्ड्रके रहता है, उनका शरीर श्मशानके तुल्य होता है, पुण्यात्मा व्यक्तियोंको ऐसे शरीरपर दृष्टितक नहीं डालनी चाहिये ॥ १६३ ॥
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अ ० १२ ] एकादश स्कन्ध ६ ९ ५ धिग्भस्मरहितं भालं धिग्ग्राममशिवालयम् ॥ १७
धिगनीशार्चनं जन्म धिग्विद्यामशिवाश्रयाम् ।
त्रिपुण्ड्रं ये विनिन्दन्ति निन्दन्ति शिवमेव ते ॥ १८
धारयन्ति च ये भक्त्या धारयन्ति तमेव ते यथा कृशानुरहितो भूधरो न विराजते ॥ १ ९
अशेषसाधनेऽप्येवं भस्महीनं शिवार्चनम् ।
उद्धूलनं त्रिपुण्ड्रं च श्रद्धया नाचरन्ति ये ॥२०
तैः पूर्वाचरितं सर्वं विपरीतं भवेदपि ।
भस्मना वेदमन्त्रेण त्रिपुण्ड्रस्य च धारणम् ॥ २१
विना वेदोचिताचारं स्मार्तस्यानर्थकारणम् ।
कृतं स्यादकृतं तेन श्रुतमप्यश्रुतं भवेत् ॥ २२
अधीतमनधीतं च त्रिपुण्ड्रं यो न धारयेत् ।
वृथा वेदा वृथा यज्ञा वृथा दानं वृथा तपः ॥ २३
वृथा व्रतोपवासेन त्रिपुण्ड्रं यो न धारयेत् ।
भस्मधारणकं त्यक्त्वा मुक्तिमिच्छति यः पुमान् ॥ २४
विषपानेन नित्यत्वं कुरुते ह्यात्मनो हि सः ।
स्रष्टा सृष्टिच्छलेनाह त्रिपुण्ड्रस्य च धारणम् ॥ २५
ससर्ज स ललाटं हि तिर्यगूर्ध्वं न वर्तुलम् ।
तिर्यग्रेखाः प्रदृश्यन्ते ललाटे सर्वदेहिनाम् ॥ २६
तथापि मानवा मूर्खा न कुर्वन्ति त्रिपुण्ड्रकम् । भस्मरहित मस्तकको धिक्कार है, शिवालयविहीन ग्रामको धिक्कार है, शिव - अर्चनसे विमुख व्यक्तिके जन्मको धिक्कार है तथा शिवका आश्रय प्रदान न करानेवाली विद्याको धिक्कार है ॥ १७३ ॥
जो लोग त्रिपुण्ड्रकी निन्दा करते हैं, वे वस्तुतः शिवकी ही निन्दा करते हैं और जो लोग भक्तिपूर्वक त्रिपुण्ड्र धारण करते हैं, वे मानो साक्षात् शिवजीको ही धारण करते हैं ॥ १८३ ॥
जिस तरह अग्निहोत्र किये बिना ब्राह्मण सुशोभित नहीं होता, उसी प्रकार भस्मरहित होकर किया गया शिवार्चन शोभा नहीं देता, चाहे वह सभी पूजनोपचारोंके साथ ही क्यों न किया गया हो ॥१ ९ १ ॥ जो लोग श्रद्धापूर्वक अपने सर्वांग भस्म नहीं लगाते तथा त्रिपुण्ड्र धारण नहीं करते, उनके द्वारा पूर्वमें किया गया समस्त सत्कर्म भी विपरीत हो जाता है ॥२०३ ॥
वेदमन्त्रके साथ ही भस्मसे त्रिपुण्ड्र धारण करना चाहिये । वेदोचित आचारके बिना त्रिपुण्ड्र धारण करना स्मार्तोंके लिये अनर्थकारी होता है ॥ २१३ ॥
जो त्रिपुण्ड्र धारण नहीं करता, उसके द्वारा किया गया कृत्य न किये हुएके समान, सुना गया वेदवचन न सुने हुएके समान तथा अधीत शास्त्र अध्ययन न किये हुएके समान हो जाता है ॥ २२३ ॥
जो त्रिपुण्ड्र धारण नहीं करता उसके यज्ञ, दान, वेदाध्ययन, तपश्चरण, व्रत तथा उपवास - ये सभी व्यर्थ हो जाते हैं ॥ २३३ ॥
जो मनुष्य भस्मधारणका त्याग करके मुक्तिकी अभिलाषा रखता है, वह मानो विषपान करके अपनेको अमर करना चाहता है ॥ २४३ ॥
सृष्टिकर्ताने मस्तककी सृष्टिके बहाने ही त्रिपुण्ड्र धारण करना बतला दिया है; इसीलिये उन्होंने मस्तकको तिरछा तथा ऊँचा बनाया है, गोल नहीं ॥ २५३ ॥
सभी देहधारियोंके ललाटपर तिरछी रेखाएँ स्पष्ट - रूपसे दिखायी पड़ती हैं, फिर भी मूर्ख मनुष्य त्रिपुण्ड्र धारण नहीं करते ॥ २६३ ॥
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६ ९ ६ न तद्ध्यानं न तन्मोक्षं न तज्ज्ञानं न तत्तपः
विना तिर्यक्त्रिपुण्ड्रं च विप्रेण यदनुष्ठितम् ।
वेदस्याध्ययने शूद्रो नाधिकारी यथा भवेत् ॥
त्रिपुण्ड्रेण विना विप्रो नाधिकारी शिवार्चने ।
प्राङ्मुखश्चरणौ हस्तौ प्रक्षाल्याचम्य पूर्ववत् ॥
प्राणानायम्य सङ्कल्प्य भस्मस्नानं समाचरेत् ।
आदाय भसितं शुद्धमग्निहोत्रसमुद्भवम् ॥
ईशानेन तु मन्त्रेण स्वमूर्धनि विनिक्षिपेत् ।
तत आदाय तद्भस्म मुखे च पुरुषेण तु ॥
अघोराख्येण हृदये गुह्ये वामाह्वयेन च ।
सद्योजाताभिधानेन भस्म पादद्वये क्षिपेत् ॥
सर्वाङ्गं प्रणवेनैव मन्त्रेणोद्धूलनं ततः ।
एतदाग्नेयकं स्नानमुदितं परमर्षिभिः ॥
सर्वकर्मसमृद्ध्यर्थं कुर्यादादाविदं बुधः ।
ततः प्रक्षाल्य हस्तादीनुपस्पृश्य यथाविधि ॥
तिर्यक्त्रपुण्ड्रं विधिना ललाटे हृदये गले ।
पञ्चभिर्ब्रह्मभिर्वापि कृतेन भसितेन च ॥
धृतमेतत्त्रिपुण्ड्रं स्यात्सर्वकर्मसु पावनम् ।
शूद्रैरन्त्यजहस्तस्थं न धार्यं भस्म च क्वचित् ॥
भस्मना साग्निहोत्रेण लिप्तः कर्म समाचरेत् ।
अन्यथा सर्वकर्माणि न फलन्ति कदाचन ॥
सत्यं शौचं जपो होमस्तीर्थं देवादिपूजनम् ।
तस्य व्यर्थमिदं सर्वं यस्त्रिपुण्ड्रं न धारयेत् ॥
त्रिपुण्ड्रधृग्विप्रवरो यो रुद्राक्षधरः शुचिः ।
स हन्ति रोगदुरितव्याधिदुर्भिक्षतस्करान् ॥
समाप्नोति परं ब्रह्म यतो नावर्तते पुनः ।
स पङ्क्तिपावनः श्राद्धे पूज्यो विप्रैः सुरैरपि ॥
श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १२ ॥ २७ ब्राह्मण बिना तिरछा त्रिपुण्ड्र धारण किये जो कुछ भी अनुष्ठान करता है, वह न तो ध्यान है, न तो मोक्ष है, न तो ज्ञान है और न तप ही है ॥ २७३ ॥
२८ जिस तरह शूद्र वेदके अध्ययनका अधिकारी नहीं है, उसी प्रकार बिना त्रिपुण्ड्र धारण किये ब्राह्मण शिवकी पूजाका अधिकारी नहीं है ॥ २८३ ॥
२ ९ पूर्व दिशाकी ओर मुख करके पूर्ववत् हाथ - पैर धोकर आचमन करके प्राणायाम करनेके अनन्तर संकल्प करके भस्म स्नान करना चाहिये ॥ २ ९ ३ ॥ ३० अग्निहोत्रजन्य शुद्ध भस्म लेकर ईशान मन्त्रसे अपने मस्तकपर भस्म धारण करना चाहिये । इसके बाद उस भस्मको लेकर तत्पुरुष मन्त्रसे मुखपर, ३१ अघोर मन्त्रसे हृदयपर, वामदेव मन्त्रसे गुह्यस्थलपर तथा सद्योजात मन्त्रसे दोनों पैरोंपर भस्म लगाना ३२ चाहिये । तत्पश्चात् प्रणव मन्त्रसे शरीरके सभी अंगोंमें भस्म लगाना चाहिये । महर्षियोंके द्वारा इसे आग्नेय स्नान कहा गया है । बुद्धिमान् व्यक्तिको अपने सभी ३३ कर्मोंकी समृद्धिके लिये यह आग्नेयस्नान सबसे पहले करना चाहिये ॥ ३०–३३३ ॥ तदनन्तर हाथ - पैर धोकर यथाविधि आचमन ३४ करके विधिपूर्वक ' सद्योजात ' आदि पंच ब्रह्ममन्त्रोंका उच्चारण करके निर्मित भस्मसे ललाट, हृदयदेश तथा गलेमें तिरछा त्रिपुण्ड्र धारण करे । इस प्रकार धारण ३५ किया गया यह त्रिपुण्ड्र सभी कर्मोंमें पवित्रता प्रदान करनेवाला होता है । शूद्रोंको अन्त्यजोंके हाथका भस्म कभी नहीं लगाना चाहिये । अग्निहोत्र - जन्य भस्म लगाकर ३६ ही कोई शुभ कर्म करना चाहिये; अन्यथा किये गये सभी कर्म कभी भी फलीभूत नहीं होते ॥ ३४-३७ ॥ ३७ जो व्यक्ति त्रिपुण्ड्र धारण नहीं करता; उसका सत्य, शौच, जप, होम, तीर्थ तथा देवपूजन आदि-यह सब व्यर्थ हो जाता है ॥ ३८ ॥
३८ जो विप्रश्रेष्ठ शुद्ध मनसे त्रिपुण्ड्र धारण करता है तथा रुद्राक्ष पहनता है; वह रोग, पाप, व्याधि, दुर्भिक्ष तथा चोर आदिको विनष्ट कर देता है । वह ३ ९ परब्रह्मका सांनिध्य प्राप्त कर लेता है, जहाँसे पुन: लौटकर नहीं आता । वह श्राद्धमें पंक्तिपावन ब्राह्मण माना जाता है तथा ब्राह्मणों और देवताओं द्वारा भी ४० पूजित होता है ॥ ३ ९ -४० ॥
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अ ० १३ ] एकादश स्कन्ध ६ ९ ७ श्राद्धे यज्ञे जपे होमे वैश्वदेवे सुरार्चने । श्राद्ध, यज्ञ, जप, होम, वैश्वदेव तथा देवताओंके पूजन आदिमें जो त्रिपुण्ड्र धारण किये रहता है, वह धृतत्रिपुण्ड्रः पूतात्मा मृत्युं जयति मानवः । पवित्र आत्मावाला मनुष्य मृत्युको भी जीत लेता है । अब मैं भस्म धारण करनेका और भी माहात्म्य आपसे भस्मधारणमाहात्म्यं भूयोऽपि कथयामि ते ॥ ४१ कह रहा हूँ ॥४१ ॥
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायामेकादशस्कन्धे भस्मधारणमाहात्म्यवर्णनं नाम द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥
अथ त्रयोदशोऽध्यायः भस्म तथा त्रिपुण्ड्र श्रीनारायण उवाच
महापातकसङ्घाश्च पातकान्यपराण्यपि ।
नश्यन्ति मुनिशार्दूल सत्यं सत्यं न चान्यथा ॥ १
एकं भस्म धृतं येन तस्य पुण्यफलं शृणु ।
यतीनां ज्ञानदं प्रोक्तं वानस्थानां विरक्तिदम् ॥ २
गृहस्थानां मुने तद्वद्धर्मवृद्धिकरं तथा ।
ब्रह्मचर्याश्रमस्थानां स्वाध्यायप्रदमेव च ॥ ३
शूद्राणां पुण्यदं नित्यमन्येषां पापनाशनम् ।
भस्मनोद्धूलनं चैव तथा तिर्यक् त्रिपुण्ड्रकम् ॥ ४
रक्षार्थं सर्वभूतानां विधत्ते वैदिकी श्रुतिः ।
भस्मनोद्धूलनं चैव तथा तिर्यक् त्रिपुण्ड्रकम् ॥
यज्ञत्वेनैव सर्वेषां विधत्ते वैदिकी श्रुतिः ।
भस्मनोद्धूलनं चैव तथा तिर्यक् त्रिपुण्ड्रकम् ॥ ६
सर्वधर्मतया तेषां विधत्ते वैदिकी श्रुतिः ।
भस्मनोद्धूलनं चैव तथा तिर्यक् त्रिपुण्ड्रकम् ॥ ७
माहेश्वराणां लिङ्गार्थं विधत्ते वैदिकी श्रुतिः । - धारणका माहात्म्य श्रीनारायण बोले- हे मुनिश्रेष्ठ! भस्म धारण करनेसे महापातकोंके समूह तथा अन्य पातक भी नष्ट हो जाते हैं, यह मैं सच - सच कह रहा हूँ; इसमें सन्देह नहीं है ॥१ ॥
जिसने एकमात्र भस्म ही धारण किया हो, उसके पुण्यफलके विषयमें सुनिये । हे मुने! यह भस्मधारण संन्यासियोंको ब्रह्मज्ञान देनेवाला, वानप्रस्थलोगोंको विरक्ति प्रदान करनेवाला कहा गया है । उसी प्रकार यह गृहस्थोंके धर्मकी वृद्धि करनेवाला, ब्रह्मचर्य - आश्रममें स्थित लोगोंके लिये स्वाध्यायके प्रति प्रेरणा देनेवाला, शूद्रोंको नित्य पुण्य प्रदान करनेवाला तथा अन्य लोगोंके पापोंका नाश करनेवाला है ॥२-३३ ॥ भस्म लगाना तथा तिरछा त्रिपुण्ड्र धारण करना सभी जीवोंकी रक्षाके लिये है- वैदिकी श्रुति ऐसा विधान करती है ॥ ४१ ॥
भस्म लगाना तथा तिरछा त्रिपुण्ड्र धारण करना सभी लोगोंके लिये यज्ञतुल्य है - वैदिकी श्रुति ऐसा विधान करती है ॥ ५३ ॥
भस्म लगाना तथा तिरछा त्रिपुण्ड्र धारण करना सभी ( पाशुपत, शैव आदि ) धर्मोंमें सामान्य नियम है - वैदिकी श्रुति ऐसा विधान करती है ॥ ६३ ॥
भस्म लगाना तथा तिरछा त्रिपुण्ड्र धारण करना माहेश्वर लोगोंका चिह्न है - वैदिकी श्रुति ऐसा विधान करती है ॥७३ ॥
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६ ९ ८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १३ भस्मनोद्धूलनं चैव तथा तिर्यक् त्रिपुण्ड्रकम् ॥ ८
विज्ञानार्थं च सर्वेषां विधत्ते वैदिकी श्रुतिः ।
शिवेन विष्णुना चैव ब्रह्मणा वज्रिणा तथा ॥
हिरण्यगर्भेण तदवतारैर्वरुणादिभिः ।
देवताभिर्धृतं भस्म त्रिपुण्ड्रोद्धूलनात्मकम् ॥ १० ।
उमादेव्या च लक्ष्म्या च वाचा चान्याभिरास्तिकैः ।
सर्वस्त्रीभिर्धृतं भस्म त्रिपुण्ड्रोद्धूलनात्मना ॥ ११
यक्षराक्षसगन्धर्वसिद्धविद्याधरादिभिः 1 मुनिभिश्च धृतं भस्म त्रिपुण्ड्रोद्धूलनात्मना ॥ १२
ब्राह्मणैः क्षत्रियैर्वैश्यैः शूद्रैरपि च सङ्करैः ।
अपभ्रंशैर्धृतं भस्म त्रिपुण्ड्रोद्धूलनात्मना ॥ ॥ १३
उद्धूलनं त्रिपुण्ड्रं च यैः समाचरितं मुदा ।
त एव शिष्टा विद्वांसो नेतरे मुनिपुङ्गव ॥१४
शिवलिङ्गं मणिः सख्यं मन्त्रः पञ्चाक्षरस्तथा ।
विभूतिरौषधं पुंसां मुक्तिस्त्रीवश्यकर्मणि ॥ १५
भुनक्ति यत्र भस्माङ्गो मूर्खो वा पण्डितोऽपि वा ।
तत्र भुङ्क्ते महादेवः सपत्नीको वृषध्वजः ॥ १६
भस्मसञ्छन्नसर्वाङ्गमनुगच्छति यः पुमान् ।
सर्वपातकयुक्तोऽपि पूजितो मानवोऽचिरात् ॥ १७
भस्मसञ्छन्नसर्वाङ्गं यः स्तौति श्रद्धया सह ।
सर्वपातकयुक्तोऽपि पूज्यते मानवोऽचिरात् ॥ १८
त्रिपुण्ड्रधारिणे भिक्षाप्रदानेन हि केवलम् ।
तेनाधीतं श्रुतं तेन तेन सर्वमनुष्ठितम् ॥ १ ९ ।
भस्म लगाना तथा तिरछा त्रिपुण्ड्र धारण करना सभी लोगोंके लिये ज्ञान - प्राप्तिका साधन है – वैदिकी श्रुति ऐसा विधान करती है ॥ ८३ ॥
शंकर, विष्णु, ब्रह्मा, इन्द्र, हिरण्यगर्भ तथा उनके अवतारोंने और वरुण आदि देवताओंने भी त्रिपुण्ड्र तथा उद्भूलनके रूपमें भस्म धारण किया था ॥ ९ -१० ॥ देवी पार्वती, लक्ष्मी, सरस्वती, अन्य सभी देवांगनाओं तथा अन्य आस्तिकजनोंने त्रिपुण्ड्र तथा उद्धलनके रूपमें भस्म धारण किया था ॥११ ॥
यक्ष, राक्षस, गन्धर्व, सिद्ध, विद्याधर तथा मुनि आदिने भी अपने शरीरपर भस्म तथा त्रिपुण्ड्र धारण
किया था । १२ ॥
ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, वर्णसंकर तथा वर्णधर्मसे च्युत लोगोंने भी अपने शरीरपर भस्म तथा त्रिपुण्ड्र धारण किया था ॥१३ ॥
हे मुनिश्रेष्ठ! जो लोग प्रसन्नतापूर्वक भस्मका अनुलेपन करते हैं तथा त्रिपुण्ड्र धारण करते हैं, वे ही शिष्ट तथा विद्वान् हैं, अन्य लोग नहीं ॥ १४ ॥
मोक्षरूपिणी नारीको वशीभूत करनेके निमित्त मनुष्योंके लिये शिवलिंग एक मणिरूप आभूषण है, पंचाक्षरमन्त्र ( नमः शिवाय ) मित्र है और भस्म औषधि है ॥१५ ॥
जहाँ मूर्ख या पण्डित कोई भी अपने शरीरमें भस्म धारण करके भोजन करता है, वहाँ मानो वृषध्वज महादेव अपनी भार्या पार्वतीके साथ भोजन करते हैं ॥१६ ॥
जो मनुष्य सर्वांग भस्म धारण करनेवालेका अनुगमन करता है, वह सब पापोंसे युक्त होनेपर भी शीघ्र ही सबका पूजनीय हो जाता है ॥ १७ ॥
जो मनुष्य सर्वांगमें भस्म धारण करनेवालेकी श्रद्धापूर्वक स्तुति करता है, वह सभी पापोंसे युक्त होनेपर भी शीघ्र ही सबके द्वारा पूजित होता है ॥ १८ ॥
जिसने त्रिपुण्ड्र धारण करनेवालेको केवल भिक्षाभर दे दी, उसने मानो वेदोंका अध्ययन कर लिया, सम्पूर्ण श्रुतियोंको सुन लिया तथा सभी धार्मिक कार्योंको कर लिया ॥१ ९ ॥
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अ ० १३ ] एकादश
येन विप्रेण शिरसि त्रिपुण्ड्रं भस्मना कृतम् ।
कीकटेष्वपि देशेषु यत्र भूतिविभूषणः ॥२०
मानवस्तु वसेन्नित्यं काशीक्षेत्रसमं हि तत् ।
दुःशीलः शीलयुक्तो वा योगयुक्तोऽप्यलक्षणः ॥ २१
भूतिशासनयुक्तो वा स पूज्यो मम पुत्रवत् ।
छद्मनापि चरेद्यो हि भूतिशासनमैश्वरम् ॥ २२
सो s पियां गतिमाप्नोति न तां यज्ञशतैरपि ।
सम्पर्काल्लीलया वापि भयाद्वा धारयेत्तु यः ॥ २३
विधियुक्तो विभूतिं तु स च पूज्यो यथा ह्यहम् ।
शिवस्य विष्णोर्देवानां ब्रह्मणस्तृप्तिकारणम् ॥ २४
पार्वत्याश्च महालक्ष्म्या भारत्यास्तृप्तिकारणम् ।
न दानेन न यज्ञेन न तपोभिः सुदुर्लभैः ॥ २५
न तीर्थयात्रा पुण्यं त्रिपुण्ड्रेण च लभ्यते ।
दानं यज्ञाश्च धर्माश्च तीर्थयात्राश्च नारद ॥ २६
ध्यानं तपस्त्रिपुण्ड्रस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम् ।
यथा राजा स्वचिह्नाङ्कं स्वजनं मन्यते सदा ॥ २७
तथा शिवस्त्रिपुण्ड्राङ्कं स्वकीयमिव मन्यते ।
द्विजातिर्वान्यजातिर्वा शुद्धचित्तेन भस्मना ॥ २८
धारयेद्यस्त्रिपुण्ड्राङ्कं रुद्रस्तेन वशीकृतः ।
त्यक्तसर्वाश्रमाचारो लुप्तसर्वक्रियोऽपि सः ॥ २ ९
सकृत्तिर्यक्त्रिपुण्ड्राङ्कं धारयेत्सोऽपि मुच्यते । स्कन्ध ६ ९९ यदि कोई ब्राह्मण अपने मस्तकपर भस्मसे त्रिपुण्ड्र धारण करके कीकट आदि देशोंमें भी नित्य निवास करता हो; तो विभूतिसे विभूषित उस मनुष्यके लिये वह स्थान काशीक्षेत्रके समान हो जाता है ॥ २०३ ॥
कोई मनुष्य आचारवान् हो या आचारहीन, योगसम्पन्न हो या योग - लक्षणोंसे रहित, यदि उसने केवल भस्ममात्र धारण किया है तो वह मेरे पुत्र ब्रह्माके समान पूजनीय है ॥ २१३ ॥
छद्मसे भी यदि कोई व्यक्ति ऐश्वर्यमय भस्म धारण करता है, तो वह भी उस गतिको प्राप्त करता है, जो सैकड़ों यज्ञ करनेसे भी प्राप्त नहीं की जा सकती ॥२२३ ॥
जो भस्म धारण करनेवालेके सम्पर्कसे, विनोदमें अथवा भयसे ही विधिपूर्वक भस्म धारण करता है, वह मेरी तरह पूजनीय हो जाता है ॥ २३३ ॥
यह भस्म ब्रह्मा, विष्णु, महेश, अन्य देवगण, पार्वती, महालक्ष्मी तथा सरस्वतीकी तृप्तिका कारण है ॥२४३ ॥
जो पुण्य त्रिपुण्ड्र धारण करनेसे प्राप्त होता है; वह पुण्य न दानसे, न यज्ञसे, न दुःसाध्य तपस्याओंसे और न तो तीर्थयात्रासे ही प्राप्त होता है ॥ २५३ ॥
हे नारद! दान, सभी यज्ञ, सभी धर्म, तीर्थयात्रा, ध्यान तथा तपस्या आदि त्रिपुण्ड्रकी सोलहवीं कलाकी भी समता नहीं कर सकते ॥ २६३ ॥
जिस प्रकार राजा अपने चिह्नसे अंकित व्यक्तिको स्वजन समझता है, उसी प्रकार भगवान् शिव त्रिपुण्ड्र - चिह्न धारण करनेवालेको सदा अपना मानते हैं ॥ २७३ ॥
द्विजाति ( ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य ) अथवा अन्य किसी जातिका मनुष्य यदि शुद्ध मनसे भस्मद्वारा त्रिपुण्ड्रका चिह्न धारण करे तो भगवान् शिव उसके वशीभूत हो जाते हैं ॥ २८३ ॥
जिसने समस्त आश्रमोंके आचारोंका त्याग कर दिया है तथा समस्त नित्य नैमित्तिक क्रियाओंको छोड़ दिया है, वह भी यदि एक बार त्रिपुण्ड्र - चिह्न धारण कर ले तो मुक्त हो जाता है ॥ २ ९ ३ ॥
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७०० श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १४ नास्य ज्ञानं परीक्षेत न कुलं न व्रतं तथा ॥ ३०
त्रिपुण्ड्राङ्कितभालेन पूज्य एव हि नारद ।
शिवमन्त्रात्परो मन्त्रो नास्ति तुल्यं शिवात्परम् ॥ ३१
शिवार्चनात्परं पुण्यं न हि तीर्थं च भस्मना ।
रुद्राग्नेर्यत्परं तीर्थं तद्भस्म परिकीर्तितम् ॥ ३२
ध्वंसनं सर्वदुःखानां सर्वपापविशोधनम् ।
अन्त्यजो वाधमो वापि मूर्खो वा पण्डितोऽपि वा ॥ ३३
यस्मिन्देशे वसेन्नित्यं भूतिशासनसंयुतः ।
तस्मिन्सदाशिवः सोमः सर्वभूतगणैर्वृतः ।
सर्वतीर्थैश्च संयुक्तः सान्निध्यं कुरुते सदा ॥ ३४
एतानि पञ्चशिवमन्त्रपवित्रितानि भस्मानि कामदहनाङ्गविभूषितानि । त्रैपुण्ड्रकाणि रचितानि ललाटपट्टे लुम्पन्ति दैवलिखितानि दुरक्षराणि ॥ ३५ हे नारद! इस त्रिपुण्ड्रधारीके न तो ज्ञानकी, न उसके कुलकी और न तो उसके व्रतकी ही परीक्षा करे; क्योंकि वह तो अपने त्रिपुण्ड्रांकित मस्तक कारण ही पूज्य है ॥ ३०३ ॥
शिवमन्त्रसे बढ़कर दूसरा कोई मन्त्र नहीं है, शिवके समान कोई दूसरा देवता नहीं है, शिवके पूजनसे बढ़कर कोई पुण्य नहीं है और भस्मसे बढ़कर कोई तीर्थ नहीं है ॥३१३ ॥
रुद्राग्निका जो परम तीर्थ है, उसे ही भस्म कहा गया है, वह सभी प्रकारके कष्टोंका नाश करनेवाला तथा सभी पापोंका शोधन करनेवाला है ॥ ३२३ ॥
अन्त्यज, निर्धन, मूर्ख अथवा पण्डित कोई भी हो, वह नित्य भस्म धारण करके जिस देशमें निवास करता है, सदाशिव महादेव सभी भूतगणोंको साथमें लेकर सभी तीर्थोंसहित पार्वतीके साथ उस स्थानपर सदा विराजमान रहते हैं ॥ ३३-३४ ॥ कामदेवको भस्म करनेवाले भगवान् शिवके अंगके भूषणस्वरूप तथा पंच - शिवमन्त्रोंसे पवित्र की गयी यह भस्मराशि त्रिपुण्ड्ररूपमें [ ललाटपर ] धारण करनेसे ललाटपट्टपर विधाताके द्वारा लिखे गये । अभाग्यसूचक अक्षरोंको भी मिटा देती है ॥ ३५ ॥
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायामेकादशस्कन्धे त्रिपुण्ड्रधारणमाहात्म्यवर्णनं नाम त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥
अथ चतुर्दशोऽध्यायः भस्मस्नानका महत्त्व श्रीनारायण उवाच
भस्मदिग्धशरीराय यो ददाति धनं मुदा ।
तस्य सर्वाणि पापानि विनश्यन्ति न संशयः ॥
श्रुतयः स्मृतयः सर्वाः पुराणान्यखिलान्यपि ।
वदन्ति भूतिमाहात्म्यं तत्तस्माद्धारयेद् द्विजः ॥
सितेन भस्मना कुर्यात् त्रिसन्ध्यं यस्त्रिपुण्ड्रकम् ।
सर्वपापविनिर्मुक्तः शिवलोके महीयते ॥
श्रीनारायण बोले- जो मनुष्य शरीरमें भस्म धारण करनेवालेको प्रसन्नतापूर्वक धन देता है, उसके समस्त १ पाप नष्ट हो जाते हैं, इसमें सन्देह नहीं है ॥ १ ॥
सभी श्रुतियाँ, स्मृतियाँ एवं समस्त पुराण भी विभूतिके माहात्म्यका वर्णन करते हैं, अतएव द्विजको विभूति धारण करना चाहिये ॥ २ ॥
२ जो तीनों सन्ध्याओं ( प्रातः, मध्याह्न एवं सायं ) - के समय श्वेत भस्मसे त्रिपुण्ड्र धारण करता है, वह समस्त पापोंसे मुक्त होकर शिवलोकमें ३ । प्रतिष्ठित होता है ॥ ३ ॥
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अ ० १४ ] एकादश
योगी सर्वाङ्गकं स्नानमापादतलमस्तकम् ।
त्रिसन्ध्यमाचरेन्नित्यमाशु योगमवाप्नुयात् ॥ ४
भस्मस्नानेन पुरुषः कुलस्योद्धारको भवेत् ।
भस्मस्नानं जलस्नानादसंख्येयगुणान्वितम् ॥ ५
सर्वतीर्थेषु यत्पुण्यं सर्वतीर्थेषु यत्फलम् ।
तत्फलं लभते सर्वं भस्मस्नानान्न संशयः ॥ ६
महापातकयुक्तो वा युक्तो वाप्युपपातकैः ।
भस्मस्नानेन तत्सर्वं दहत्यग्निरिवेन्धनम् ॥ ७
भस्मस्नानात्परं स्नानं पवित्रं नैव विद्यते ।
एवमुक्तं शिवेनादौ तदा स्नातः स्वयं शिवः ॥ ८
तदाप्रभृति ब्रह्माद्या मुनयश्च शिवार्थिनः ।
सर्वकर्मसु यत्नेन भस्मस्नानं प्रचक्रिरे ॥ ९
तस्मादेतच्छिरः स्नानमाग्नेयं यः समाचरेत् ।
अनेनैव शरीरेण स हि रुद्रो न संशयः ॥ १०
ये भस्मधारिणं दृष्ट्वा परितृप्ता भवन्ति ते ।
देवासुरमुनीन्द्रैश्च पूज्या नित्यं न संशयः ॥ ११
भस्मसञ्छन्नसर्वाङ्गं दृष्ट्वोत्तिष्ठति यः पुमान् ।
तं दृष्ट्वा देवराजोऽपि दण्डवत्प्रणमिष्यति ॥ १२
अभक्ष्यभक्षणं येषां भस्मधारणपूर्वकम् ।
तेषां तद्भक्ष्यमेव स्यान्मुने नात्र विचारणा ॥ १३
यः स्नाति भस्मना नित्यं जले स्नात्वा ततः परम् ।
ब्रह्मचारी गृहस्थो वा वानप्रस्थोऽथवादरात् ॥ १४
सर्वपापविनिर्मुक्तः स याति परमां गतिम् ।
आग्नेयं भस्मना स्नानं यतीनां च विशिष्यते ॥ १५
स्कन्ध ७०१ जो योगी तीनों सन्ध्याओंको करते समय पैरोंके तलवेसे लेकर मस्तकपर्यन्त सभी अंगोंमें नित्य भस्म लगाता है ( भस्मस्नान करता है ), वह शीघ्र ही योगस्थिति प्राप्त कर लेता है ॥ ४ ॥
भस्मस्नानसे मनुष्य अपने कुलका उद्धार करनेवाला हो जाता है । भस्मस्नान जलस्नानकी अपेक्षा असंख्य गुना फलदायी होता है ॥५ ॥
सभी तीर्थोंका सेवन करनेसे जो पुण्य होता है तथा जो फल मिलता है, वह फल केवल भस्मस्नानसे ही प्राप्त हो जाता है, इसमें संशय नहीं है ॥ ६ ॥
मनुष्य चाहे जितने भी महापातकों अथवा उप-पातकोंसे युक्त हो; केवल भस्मस्नान उसके सभी पापोंको उसी प्रकार दग्ध कर देता है, जैसे अग्नि ईंधनको ॥ ७ ॥
4 ' भस्मस्नानसे बढ़कर पवित्र कोई दूसरा स्नान नहीं है ' - ऐसा शिवजीने कहा है और शिवजीने ही सर्वप्रथम स्वयं भस्मस्नान किया था ॥ ८ ॥
उसी समय से कल्याणकी इच्छावाले ब्रह्मा आदि देवता तथा मुनिगण सभी कर्मोंमें तत्परतापूर्वक भस्मस्नान करने लगे ॥ ९ ॥
अतएव जो मनुष्य यह आग्नेय नामक शिरः स्नान करता है, वह इसी शरीरसे साक्षात् रुद्रस्वरूप हो जाता है, इसमें संशय नहीं है ॥ १० ॥
जो लोग भस्म धारण किये हुए व्यक्तिको देखकर आनन्दित होते हैं; वे देवताओं, दैत्यों तथा महर्षियोंसे नित्य पूजित होते हैं, इसमें सन्देह नहीं है ॥ ११ ॥
अपने शरीरके सभी अंगोंमें भस्म धारण किये हुए व्यक्तिको देखकर जो मनुष्य [ श्रद्धाके साथ ] उठ जाता है, उसे देखकर देवराज इन्द्र भी दण्डवत् प्रणाम करते हैं ॥ १२ ॥
हे मुने! जो लोग भस्म धारण करके अभक्ष्य पदार्थोंका भक्षण करते हैं, उनके लिये वह भी भक्ष्य हो जाता है; इस विषयमें सन्देह नहीं करना चाहिये ॥ १३ ॥
जो जलमें स्नान करनेके अनन्तर श्रद्धापूर्वक नित्य भस्मस्नान करता है, वह ब्रह्मचारी हो अथवा गृहस्थ हो अथवा वानप्रस्थी हो, सभी पापोंसे मुक्त होकर परमगतिको प्राप्त होता है । यतियोंके लिये भस्मके द्वारा अग्निस्नानको विशिष्ट कहा गया है ॥ १४-१५ ॥