देवी भागवत उत्तरार्द्ध — पृष्ठ 711–720
देवी भागवत उत्तरार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 711–720
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७०२ आर्द्रस्नानाद्वरं भस्मस्नानमार्द्रवधो ध्रुवः आर्द्रं तु प्रकृतिं विद्यात्प्रकृतिं बन्धनं विदुः प्रकृतेस्तु प्रहाणाय भस्मना स्नानमिष्यते भस्मना सदृशं ब्रह्मन्नास्ति लोकत्रयेष्वपि रक्षार्थं मङ्गलार्थं च पवित्रार्थं पुरा सुरैः भस्म दृष्ट्वा मुने पूर्वं दत्तं देव्यै प्रियेण तु तस्मादेतच्छिरःस्नानमाग्नेयं यः समाचरेत् भवपाशैर्विनिर्मुक्तः शिवलोके महीयते ज्वररक्षः पिशाचाश्च पूतनाकुष्ठगुल्मकाः भगन्दराणि सर्वाणि चाशीतिर्वातरोगकाः चतुःषष्टिः पित्तरोगाः श्लेष्माः सप्तत्रिपञ्चकाः व्याघ्रचौरभयं चैवाप्यन्ये दुष्टग्रहा अपि भस्मस्नानेन नश्यन्ति सिंहेनैव यथा गजाः शुद्धशीतजलेनैव भस्मना च त्रिपुण्ड्रकम् ॥ यो धारयेत्परं ब्रह्म स प्राप्नोति न संशयः ।
( भस्मना च त्रिपुण्ड्रं च यः कोऽपि धारयेत्परम् ।
स ब्रह्मलोकमाप्नोति मुक्तपापो न संशयः ॥
यथाविधि ललाटे वै वह्निवीर्यप्रधारणात् ॥
नाशयेल्लिखितां यामीं ललाटस्थां लिपिं ध्रुवम् ।
कण्ठोपरिकृतं पापं नाशयेत्तत्प्रधारणात् ॥
कण्ठे च धारणात्कण्ठभोगादिकृतपातकम् ।
बाह्वोर्बाहुकृतं पापं वक्षसा मनसा कृतम् ॥
श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १४ । जलस्नानकी अपेक्षा भस्मस्नान श्रेष्ठ होता है; ॥ १६ इसीसे आर्द्र ( प्रकृति - बन्धन ) - का नष्ट होना सम्भव है । आर्द्रको ' प्रकृति ' समझना चाहिये और इस । प्रकृतिको ही ' बन्धन ' कहा गया है । अतएव इस प्रकृतिरूप बन्धनको काटनेके लिये भस्मसे स्नान ॥ १७ करना चाहिये । हे ब्रह्मन्! तीनों लोकोंमें भस्मके समान कुछ भी नहीं है ॥ १६-१७ ॥ । पूर्व कालमें देवताओंने अपनी रक्षाके लिये; अपने कल्याणके लिये और पवित्रताके लिये भस्मको ॥ १८ स्वीकार किया था । हे मुने! सबसे पहले शिवजीने भस्म प्राप्त करके इसे देवी पार्वतीको दिया था ॥ १८ ॥
। अतएव जो मनुष्य इस आग्नेय शिरः स्नानको ॥ १ ९ करता है, वह सांसारिक बन्धनोंसे विमुक्त होकर शिवलोकमें प्रतिष्ठित होता है ॥ १ ९ ॥ । ज्वर, राक्षस, पिशाच, पूतनारोग, कुष्ठ, गुल्मरोग, ॥ २० सभी प्रकारका भगंदर रोग, अस्सी प्रकारके वातरोग, चौंसठ प्रकारके पित्तरोग, एक सौ पाँच प्रकारके कफरोग, बाघ आदि जन्तुओंका भय, चोरोंका भय । और अन्य प्रकारके दुष्टग्रह - ये सब भस्मस्नानसे ॥ २१ उसी प्रकार नष्ट हो जाते हैं, जैसे सिंहके द्वारा हाथी विनष्ट कर दिये जाते हैं ॥ २०-२१३ ॥ । जो मनुष्य शुद्ध तथा शीतल जल मिलाकर भस्मसे त्रिपुण्ड्र धारण करता है, वह परब्रह्मको प्राप्त २२ करता है; इसमें सन्देह नहीं है । ( जो कोई भी मनुष्य भस्मसे त्रिपुण्ड्र धारण करता है, वह पापोंसे मुक्त होकर ब्रह्मलोकको जाता है; इसमें संशय नहीं है ) । ललाटपर विधिपूर्वक इस अग्निवीर्यरूपी भस्मको ) धारण करनेसे यह मनुष्यके भालपर अंकित यमकी लिपिको भी निश्चितरूपसे मिटा देता है । कण्ठके २३ ऊपरी भागसे किया गया पाप भी उसके धारणसे नष्ट हो जाता है ॥ २२–२४ ॥ कण्ठद्वारा अभक्ष्य पदार्थोंके भोगजनित पाप २४ कण्ठपर भस्म धारण करनेसे, बाहुद्वारा किया गया पाप दोनों बाहुओंपर भस्म लगानेसे तथा मनद्वारा किये गये पाप वक्ष: स्थलपर भस्म धारण करनेसे नष्ट हो जाते हैं । नाभिपर भस्म लगानेसे लिंगजनित पाप तथा २५ | गुदापर भस्म लगानेसे गुदेन्द्रियजनित पाप मिट जाता
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अ ० १४ ] एकादश
नाभ्यां शिश्नकृतं पापं गुदे गुदकृतं हरेत् ।
पार्श्वयोर्धारणाद् ब्रह्मन् परस्त्र्यालिङ्गनादिकम् ॥ २६
तद्भस्मधारणं शस्तं सर्वत्रैव त्रिलिङ्गकम् ।
ब्रह्मविष्णुमहेशानां त्रय्यग्नीनां च धारणम् ॥ २७
गुणलोकत्रयाणां च धारणं तेन वै कृतम् ।
भस्मच्छन्नो द्विजो विद्वान्महापातकसम्भवैः ॥ २८
दोषैर्वियुज्यते स मुच्यते च न संशयः ।
भस्मनिष्ठस्य दह्यन्ते दोषा भस्माग्निसङ्गमात् ॥ २ ९
भस्मस्नानविशुद्धात्मा आत्मनिष्ठ इति स्मृतः ।
भस्मना दिग्धसर्वाङ्गो भस्मदीप्तत्रिपुण्ड्रकः ॥ ३०
भस्मशायी च पुरुषो भस्मनिष्ठ इति स्मृतः ।
भूतप्रेतपिशाचाद्या रोगाश्चातीव दुःसहाः ॥ ३१
भस्मनिष्ठस्य सान्निध्याद्विद्रवन्ति न संशयः ।
भासनाद्भसितं प्रोक्तं भस्म कल्मषभक्षणात् ॥ ३२
भूतिर्भूतिकरी पुंसां रक्षा रक्षाकरी पुरा ।
त्रिपुण्ड्रधारिणं दृष्ट्वा भूतप्रेतपुरःसराः ॥ ३३ ।
भीताः प्रकम्पिताः शीघ्रं नश्यन्त्येव न संशयः ।
स्मरणादेव रुद्रस्य यथा पापं प्रणश्यति ॥ ३४
अप्यकार्यसहस्राणि कृत्वा यः स्नाति भस्मना ।
तत्सर्वं दहते भस्म यथाग्निस्तेजसा वनम् ॥ ३५
कृत्वापि चातुलं पापं मृत्युकाले ऽपि यो द्विजः ।
भस्मस्नायी भवेत्कश्चित्क्षिप्रं पापैः प्रमुच्यते ॥ ३६ ।
स्कन्ध ७०३ है । हे ब्रह्मन्! दोनों पार्श्वमें भस्म धारण करनेसे परनारीका आलिंगन आदि करनेसे लगा हुआ पाप विनष्ट हो जाता है ॥ २५-२६ ॥ सर्वत्र तीन तिर्यक् रेखावाला ( त्रिपुण्ड्र ) भस्म प्रशस्त माना गया है । जिसने त्रिपुण्ड्र धारण कर लिया, उसने मानो ब्रह्मा, विष्णु, महेश; तीनों अग्नि ( गार्हपत्य, आहवनीय तथा दक्षिणाग्नि ); तीनों गुणों ( सत्त्व, रज, तम ) और तीनों लोकोंको धारण कर लिया ॥ २७३ ॥
भस्म धारण करनेवाला विद्वान् द्विज महापातक-जन्य दोषोंसे शीघ्र ही मुक्त हो जाता है; इसमें संशय नहीं है ॥ २८३ ॥
भस्म धारण करनेवाले मनुष्यके दोष भस्मकी अग्निके सम्पर्कसे नष्ट हो जाते हैं । भस्म - स्नानसे विशुद्ध आत्मावाला व्यक्ति आत्मनिष्ठ कहा गया है ॥ २ ९ ३ ॥ अपने सर्वांग भस्म लगानेवाला, भस्मसे प्रदीप्त त्रिपुण्ड्र धारण करनेवाला तथा भस्मपर ही शयन करनेवाला पुरुष ' भस्मनिष्ठ ' कहा गया है ॥ ३०३ ॥
भूत, प्रेत, पिशाच आदि बाधाएँ तथा अति दुःसह रोग भस्म धारण करनेवालेके पाससे भाग जाते हैं; इसमें सन्देह नहीं है ॥ ३१३ ॥
इस भस्मको ब्रह्मका भास करानेसे ' भसित ', पापका भक्षण करनेके कारण ' भस्म ', मनुष्योंको भूति ( ऐश्वर्य तथा सिद्धियाँ आदि ) प्रदान करनेसे ' भूति ' तथा रक्षा करनेके कारण ' रक्षा ' कहा गया है ॥ ३२३ ॥
त्रिपुण्ड्र धारण किये हुए मनुष्यको अपने सम्मुख देखकर भूत - प्रेत आदि भयभीत होकर काँपने लगते हैं और वे शीघ्र ही उसी प्रकार विनष्ट हो जाते हैं, जैसे भगवान् रुद्रके स्मरणमात्रसे पाप दग्ध हो जाते हैं ॥ ३३-३४ ॥ हजारों प्रकारके दुष्कृत्योंको करके भी जो मनुष्य भस्मसे स्नान करता है, उसके उन सभी कुकर्मोंको भस्म उसी प्रकार जला डालता है; जैसे अग्नि अपने तेजसे वनको भस्म कर देती है ॥ ३५ ॥
जो द्विज घोर पाप करके भी यदि मृत्युके समय भस्मस्नान कर लेता है, वह तत्काल समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥३६ ॥
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७०४ भस्मस्नानाद्धि शुद्धात्मा जितक्रोधो जितेन्द्रियः मत्समीपं समागम्य न स भूयोऽभिवर्तते वनस्पतिगते सोमे भस्मोद्धूलितविग्रहः अर्चितं शङ्करं दृष्ट्वा सर्वपापैः प्रमुच्यते आयुष्कामोऽथवा विद्वान्भूतिकामोऽथवा नरः नित्यं वै धारयेद्भस्म मोक्षकामी च वै द्विजः त्रिपुण्ड्रं परमं पुण्यं ब्रह्मविष्णुशिवात्मकम् । ये घोरा राक्षसाः प्रेता ये चान्ये क्षुद्रजन्तवः त्रिपुण्ड्रधारणं दृष्ट्वा पलायन्ते न संशयः । कृत्वा शौचादिकं कर्म स्नात्वा तु विमले जले
भस्मनोद्धूलनं कार्यमापादतलमस्तकम् ।
केवलं वारुणं स्नानं देहे बाह्यमलापहम् ॥
विभूतिस्नानमनघं बाह्यान्तरमलापहम् । त्यक्त्वापि वारुणं स्नानं तत्परः स्यान्न संशयः
कृतमप्यकृतं सत्यं भस्मस्नानं विना मुने ।
भस्मस्नानं श्रुतिप्रोक्तमाग्नेयं स्नानमुच्यते ॥
अन्तर्बहिश्च संशुद्धं शिवपूजाफलं लभेत् ।
यद् बाह्यमलमात्रस्य नाशकं स्नानमस्ति तत् ॥
तन्नाशयति तीव्रेण प्राणिबाह्यान्तरं मलम् ।
कृत्वापि कोटिशो नित्यं वारुणं स्नानमादरात् ॥
न भवत्येव पूतात्मा भस्मस्नानं विना मुने ।
यद्भस्मस्नानमाहात्म्यं तद्वेदो वेद तत्त्वतः ॥
यद्वा वेद महादेवः सर्वदेवशिखामणिः । श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १४ । भस्मस्नान करके शुद्ध आत्मावाला, क्रोधको ॥ ३७ जीत लेनेवाला तथा इन्द्रियोंपर नियन्त्रण कर लेनेवाला मनुष्य मेरे सांनिध्यमें आकर पुनः जन्म - मरणके । बन्धनमें नहीं पड़ता ॥ ३७ ॥
सोमवती अमावास्याके दिन भस्मसे अनुलिप्त ॥ ३८ देहवाला व्यक्ति पूजित हुए भगवान् शिवका दर्शन करके सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥ ३८ ॥
। दीर्घ आयुकी इच्छा रखनेवाले, विपुल ॥ ३ ९ ऐश्वर्यकी अभिलाषा रखनेवाले अथवा मोक्षकी कामना करनेवाले विद्वान् द्विजको भस्म और ब्रह्मा, विष्णु, शिवके स्वरूपवाले परम पवित्र त्रिपुण्ड्रको नित्य ॥ ४० धारण करना चाहिये ॥ ३ ९ ३ ॥ हैं, वे भाग ॥। ४१ स्नान भस्म ४२ किंतु भयंकर राक्षस, प्रेत तथा जो भी अन्य क्षुद्र जन्तु सभी त्रिपुण्ड्र धारण किये हुए मनुष्यको देखकर जाते हैं, इसमें सन्देह नहीं है ॥ ४० ॥
शौच आदि कार्योंसे निवृत्त होकर स्वच्छ जलमें करनेके पश्चात् मस्तकसे लेकर पैर के तलवेतक धारण करना चाहिये ॥ ४१ ॥
जलका स्नान केवल बाह्य मलको धोनेवाला है, पवित्र भस्मस्नान बाह्य तथा आभ्यन्तर दोनों प्रकारके मलोंको नष्ट करनेवाला है । अतः जलस्नानका ॥ ४३ परित्याग करके भी भस्मस्नानके लिये तत्पर होना चाहिये; इसमें संशय नहीं है ॥ ४२-४३ ॥ हे मुने! भस्मस्नान बिना किया गया कृत्य न किये हुएके बराबर हो जाता है, यह सत्य है । यह ४४ वेदोक्त भस्मस्नान ही ' आग्नेयस्नान ' कहा जाता है ॥ ४४ ॥
भीतर तथा बाहरसे शुद्ध होनेपर ही मनुष्य शिवपूजाका फल प्राप्त कर सकता है । जो जलस्नान ४५ है वह तो केवल बाह्य मलका नाश करता है, किंतु वह भस्मस्नान प्राणी बाहरी तथा भीतरी दोनों प्रकारके मलोंको बड़ी तीव्रतापूर्वक विनष्ट कर देता है ॥ ४५३ ॥
४६ मुने! नित्य करोड़ों बार श्रद्धापूर्वक जलस्नान करके भी कोई मनुष्य बिना भस्मस्नान किये पवित्र आत्मावाला नहीं हो सकता ॥ ४६३ ॥
भस्मस्नानका जो माहात्म्य है, उसे तात्त्विकरूपसे ४७ या तो वेद जानते हैं और या समस्त देवताओंके शिखामणिस्वरूप भगवान् महादेव जानते हैं ॥ ४७ ॥
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अ ० १४ ] भस्मस्नानमकृत्वैव यः कुर्यात्कर्म वैदिकम् स तत्कर्मकलार्धार्धमपि नाप्नोति वस्तुत: यः करिष्यति यत्नेन भस्मस्नानं यथाविधि स एवैकः सर्वकर्मस्वधिकारी श्रुतिश्रुतः पावनं पावनानां च भस्मस्नानं श्रुतिश्रुतम् न करिष्यति यो मोहात्स महापातकी भवेत् अनन्तैर्वारुणैः स्नानैर्यत्पुण्यं प्राप्यते द्विजैः ततोऽनन्तगुणं पुण्यं भस्मस्नानादवाप्यते कालत्रयेऽपि कर्तव्यं भस्मस्नानं प्रयत्नतः भस्मस्नानं स्मृतं श्रौतं तत्त्यागी पतितो भवेत् मूत्राद्युत्सर्जनान्ते तु भस्मस्नानं प्रयत्नतः कर्तव्यमन्यथा पूता न भविष्यन्ति मानवाः विधिवत्कृतशौचोऽपि भस्मस्नानं विना द्विजः न भविष्यति पूतात्मा नाधिकार्यपि कर्मणि अपानवायुनिर्याते जृम्भणे स्कन्दने क्षुते श्लेष्मोद्गारेऽपि कर्तव्यं भस्मस्नानं प्रयत्नतः श्रीभस्मस्नानमाहात्म्यस्यैकदेशोऽत्र वर्णितः पुनश्च सम्प्रवक्ष्यामि भस्मस्नानोत्थितं फलम् सावधानेन मनसा श्रोतव्यं मुनिपुङ्गव एकादश स्कन्ध ७०५ ॥ ४८ जो मनुष्य भस्मस्नान किये बिना ही वैदिक कर्म करता है, वह वस्तुतः उस कर्मकी चौथाई कलाके । बराबर भी फल नहीं प्राप्त करता ॥ ४८३ ॥
॥ ४ ९ जो मनुष्य प्रयत्नपूर्वक विधि - विधान से भस्मस्नान करता है, एकमात्र वही समस्त कर्मोंका अधिकारी है; । वेदोंमें ऐसा प्रतिपादित किया गया है ॥ ४ ९ ॥ यह वेदप्रतिपादित भस्मस्नान पवित्रोंको भी ॥ ५० पवित्र करनेवाला है । जो अज्ञानवश भस्मस्नान नहीं । करता, वह महापातकी होता है ॥ ५० ॥
द्विजगण असंख्य बार जलस्नान करके जो पुण्य ॥ ५१ प्राप्त करते हैं, उसका अनन्तगुना पुण्य केवल भस्मस्नानसे ही उन्हें मिल जाता है ॥ ५ ९ ३ ॥ । तीनों कालों ( प्रातः, मध्याह्न, सायं ) - में प्रयत्न-॥ ५२ पूर्वक भस्मस्नान करना चाहिये । भस्मस्नान श्रौतकर्म कहा गया है, अतः इसका परित्याग करनेवाला पतित । हो जाता है ॥ ५२ ॥
॥५३ मल - मूत्र आदिका त्याग करनेके पश्चात् प्रयत्नके साथ भस्मस्नान करना चाहिये, अन्यथा इसे न । करनेवाले मनुष्य पवित्र नहीं होंगे ॥ ५३३ ॥
॥ ५४ विधिपूर्वक शौच आदि कृत्य करनेके बाद भी बिना भस्मस्नान के कोई द्विज पवित्र अन्तःकरणवाला । नहीं हो सकता और वह किसी कृत्यको सम्पादित करनेका अधिकारी भी नहीं हो सकता है ॥ ५४३ ॥
॥ ५५ अपान वायु निकलनेपर, जम्हाई आनेपर दस्त हो जानेपर तथा श्लेष्मा ( कफ ) निकलनेपर प्रयत्नपूर्वक
।
भस्मस्नान करना चाहिये ॥ ५५३ ॥
॥ ५६ हे मुनिश्रेष्ठ! यह मैंने श्रीभस्मस्नानके मात्र एक अंशका वर्णन आपसे किया है । अब मैं भस्मस्नान से । प्राप्त होनेवाले फलके विषयमें पुनः बताऊँगा, सावधान ॥ ५७ | मनसे सुनिये ॥ ५६-५७ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायामेकादशस्कन्धे विभूतिधारणमाहात्म्यवर्णनं नाम चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥
1898 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ द्वितीय खण्ड ] —23 A
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७०६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १५ अथ पञ्चदशोऽध्यायः भस्म - माहात्म्यके सम्बन्धमें दुर्वासामुनि और कुम्भीपाकस्थ जीवोंका आख्यान, श्रीनारायण उवाच
अग्निरित्यादिभिर्मन्त्रैर्भस्म संशोध्य सादरम् ।
धारणीयं ललाटादौ त्रिपुण्ड्रं केवलं द्विजैः ॥ १
ब्रह्मक्षत्रियवैश्याश्च एते सर्वे द्विजाः स्मृताः ।
तस्माद् द्विजैः प्रयत्नेन त्रिपुण्ड्रं धार्यमन्वहम् ॥ २
यस्योपनयनं ब्रह्मन् स एव द्विज उच्यते ।
तस्माच्छ्रौतं द्विजैः कार्यं त्रिपुण्ड्रस्य च धारणम् ॥ ३
विभूतिधारणं त्यक्त्वा यः सत्कर्म समाचरेत् ।
तत्कृतं चाकृतप्रायं भवत्येव न संशयः ॥ ४
न गायत्र्युपदेशोऽपि भस्मनो धारणं विना ।
ततो धृत्वैव भस्माङ्गे गायत्रीजपमाचरेत् ॥ ५
गायत्रीं मूलमेवाहुर्ब्राह्मण्ये मुनिपुङ्गव ।
सा भस्मधारणाभावे न केनाप्युपदिश्यते ॥ ६
न तावदधिकारोऽस्ति गायत्रीग्रहणे मुने ।
यावन्न भस्म भालादौ धृतमग्निसमुद्भवम् ॥ ७
भस्महीनललाटत्वं न ब्राह्मण्यानुमापकम् ।
एवमेव मया ब्रह्मन् हेतुरुक्तः सुपुण्यदः ॥ ८
मन्त्रपूतं सितं भस्म ललाटे परिवर्तते ।
स एव ब्राह्मणो विद्वान्सत्यं सत्यं मयोच्यते ॥ ९
यस्यास्ति सहजा प्रीतिर्मणिवद्भस्मसंग्रहे ।
स एव ब्राह्मणो ब्रह्मन् सत्यं सत्यं मयोच्यते ॥ १०
ऊर्ध्वपुण्ड्रका माहात्म्य श्रीनारायण बोले- द्विजोंको ' अग्निरिति भस्म ' आदि मन्त्रोंसे भस्मको श्रद्धापूर्वक शुद्ध करके अपने ललाट आदिपर त्रिपुण्ड्ररूपमें धारण करना चाहिये ॥ १ ॥
ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य - ये सब द्विज कहे गये हैं । अतः द्विजोंको प्रतिदिन प्रयत्नपूर्वक त्रिपुण्ड्र धारण करना चाहिये ॥ २ ॥
हे ब्रह्मन्! जिसका उपनयन हो गया है, उसीको द्विज कहा जाता है । अतः द्विजोंको श्रुतिविहित त्रिपुण्ड्र धारण करना चाहिये ॥ ३ ॥
जो मनुष्य भस्म - धारणका त्याग करके कुछ भी सत्कृत्य करता है, उसका सब किया हुआ न कियेके बराबर हो जाता है; इसमें सन्देह नहीं है ॥ ४ ॥
बिना भस्म धारण किये गायत्रीमन्त्रका उपदेश सार्थक नहीं होता है, अतः अपने शरीरमें भस्म लगाकर ही गायत्रीजप करना चाहिये ॥५ ॥
हे मुनिश्रेष्ठ! गायत्रीको ही ब्राह्मणत्वका मूल कहा गया है । भस्म धारण न करनेपर कोई भी उस गायत्रीका उपदेश देनेका अधिकारी नहीं हो सकता है ॥ ६ ॥
हे मुने! उसी प्रकार जबतक अग्निहोत्रजनित भस्म ललाट आदि अंगोंमें धारण नहीं किया जाता, तबतक किसीको भी गायत्रीमन्त्र लेनेका अधिकार नहीं होता ॥ ७ ॥
किसीके भस्मरहित ललाटसे उसके ब्राह्मणत्वका अनुमान नहीं किया जा सकता है; इसीलिये हे ब्रह्मन्! मैंने भस्मको अत्यन्त पुण्यदायक हेतु बतलाया है ॥ ८ ॥
जिसके ललाटपर मन्त्रसे पवित्र किया गया श्वेत भस्म विद्यमान रहता है, वस्तुतः वही विद्वान् ब्राह्मण है; ऐसा मैं सत्य कह रहा हूँ॥९॥
हे ब्रह्मन्! मणिसंग्रह करनेकी भाँति भस्मसंग्रह करनेमें जिसकी स्वाभाविक प्रीति रहती है, वस्तुतः | वही ब्राह्मण है; ऐसा मैं सत्य कह रहा हूँ, किंतु 1898 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ द्वितीय खण्ड ] -23 B
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अ ० १५ ] एकादश स्कन्ध ७०७
न यस्य सहजा प्रीतिर्मणिवद्भस्मसंग्रहे ।
स चाण्डाल इति ज्ञेयो जन्मजन्मान्तरे ध्रुवम् ॥
न यस्य सहजा प्रीतिस्त्रिपुण्ड्रोद्धूलनादिषु ।
स चाण्डाल इति ज्ञेयः सत्यं सत्यं मयोच्यते ॥
ये भस्मधारणं त्यक्त्वा भुञ्जन्ते च फलादिकम् ।
ते सर्वे नरकं घोरं प्राप्नुवन्ति न संशयः ॥
( विभूतिधारणं त्यक्त्वा यः शिवं पूजयिष्यति । स दुर्भगः शिवद्वेष्टा स द्वेषो नरकप्रदः । सर्वकर्मबहिर्भूतो भस्मधारणवर्जितः ॥ )
विभूतिधारणं त्यक्त्वा कुर्वन् हेमतुलामपि ।
न तत्फलमवाप्नोति पतितो हि भवेद्धि सः ॥
यथोपवीतरहितैः सन्ध्या न क्रियते द्विजैः ।
तथा सन्ध्या न कर्तव्या विभूतिरहितैरपि ॥
गतोपवीतैः सन्ध्यायां कार्यः प्रतिनिधिः क्वचित् ।
जपादिकं तु सावित्र्यास्तथैवोपोषणादिकम् ॥
विभूतिधारणे त्वन्यो नास्ति प्रतिनिधिः क्वचित् ।
विभूतिधारणं त्यक्त्वा यदि सन्ध्यां करोति यः ॥
प्रत्यवैत्येव येनासौ नाधिकारी तदा द्विजः ।
यथा श्रुत्वान्त्यजो वेदान्प्रत्यवैति तथा द्विजः ॥
प्रत्यवैति न सन्देहः सन्ध्याकृद्भस्मवर्जितः ।
सम्पादनीयं यत्नेन श्रौतं भस्म सदा द्विजैः ॥
स्मार्तं वा तदभावे तु लौकिकं वा समाहितैः ।
यादृशं तादृशं वास्तु पवित्रं भस्म सन्ततम् ॥
मणिसंग्रह करनेकी भाँति भस्मसंग्रह करनेमें जिसकी ११ स्वाभाविक प्रीति न हो तो ऐसा जान लेना चाहिये कि वह जन्म - जन्मान्तरमें निश्चित ही चाण्डाल रहा होगा ॥ १०-११ ॥ त्रिपुण्ड्रधारण तथा भस्मोद्धूलन आदिमें जिसकी १२ सहज निष्ठा नहीं होती, उसे चाण्डाल समझना चाहिये, ऐसा मैं सत्य कह रहा हूँ ॥ १२ ॥
जो लोग भस्म - धारणका त्याग करके फल १३ आदिका भक्षण करते हैं, वे सब घोर नरकको प्राप्त होते हैं, इसमें सन्देह नहीं है; ( विभूति-धारणका त्याग करके जो शिवकी पूजा करता है, वह भाग्यहीन शिवसे द्वेष करनेवाला होता है और वह द्वेष उसके लिये नरकप्रदायक होता है । भस्म न धारण करनेवाला मनुष्य सभी प्रकारके कर्मोंका अनधिकारी होता है । ) विभूतिधारणका त्याग करके स्वर्णका तुलादान करनेवाला भी उस दानका १४ फल प्राप्त नहीं कर पाता और वह अपने धर्मसे भ्रष्ट हो जाता है ॥ १३-१४ ॥ जिस प्रकार यज्ञोपवीतसे विहीन द्विज सन्ध्या १५ नहीं करते, उसी प्रकार भस्मविहीन रहनेपर भी द्विजोंको सन्ध्या नहीं करनी चाहिये ॥ १५ ॥
यज्ञोपवीतके च्युत हो जानेपर सन्ध्यामें गायत्री-जप आदि करनेके लिये तथा उसी प्रकार व्रत - उपवास १६ आदिमें किसीको प्रतिनिधिके रूपमें नियुक्त किया जा सकता है, किंतु विभूतिधारणमें कोई दूसरा व्यक्ति प्रतिनिधिके रूपमें नहीं हो सकता । यदि विभूतिधारणका १७ परित्याग करके कोई द्विज सन्ध्या करता है तो वह पापका भागी होता है; क्योंकि वह उस समय सन्ध्या करनेका अधिकारी ही नहीं है । जैसे अन्त्यजको १८ वेदोंका श्रवण करनेसे पाप लगता है, उसी प्रकार भस्म न लगाकर सन्ध्या करनेवाले द्विजको भी पाप लगता है; इसमें सन्देह नहीं है ॥ १६ - १८३ ॥ द्विजोंको सदैव यत्नपूर्वक श्रौताग्निजन्य या १ ९ स्मार्ताग्निजन्य भस्म अथवा उनके अभावमें लौकिकाग्निजन्य भस्म ही अत्यन्त समाहितचित्त होकर धारण करना चाहिये । भस्म चाहे जैसा हो, २० वह सदा पवित्र होता है । अतः द्विजोंको चाहिये कि 1898 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ द्वितीय खण्ड ] -23 C
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७०८ धारणीयं प्रयत्नेन द्विजैः सन्ध्यादिकर्मसु । न संविशन्ति पापानि भस्मनिष्ठे ततः सदा कर्तव्यमपि यत्नेन ब्राह्मणैर्भस्मधारणम् । मध्याङ्गुलित्रयेणैव स्वदक्षिणकरस्य तु
षडङ्गुलायतं मानमपि चाधिकमानकम् ।
नेत्रयुग्मप्रमाणेन भाले दीप्तं त्रिपुण्ड्रकम् ॥
कदाचिद्भस्मना कुर्यात्स रुद्रो नात्र संशयः । अकारोऽनामिका प्रोक्त उकारो मध्यमाङ्गुलिः मकारस्तर्जनी तस्मात् त्रिपुण्ड्रं त्रिगुणात्मकम् । त्रिपुण्ड्रं मध्यमातर्जन्यनामाभिरनुलोमतः
अत्र ते कथयाम्येनमितिहासं पुरातनम् ।
कदाचिदथ दुर्वासाः पितृलोकं गतोऽभवत् ॥
भस्मसन्दिग्धसर्वाङ्गो रुद्राक्षाभरणान्वितः ।
शिव शङ्कर सर्वात्मञ्छ्रीमातर्जगदम्बिके ॥
नामानीति गृणन्नुच्चैस्तापसानां शिखामणिः । कव्यवाडादयस्ते तु प्रत्युत्थानाभिवादनैः आसनाद्युपचारैश्च सम्मानं बहु चक्रिरे । नानाकथाभिरन्योन्यं सम्भाषाञ्चक्रिरे तदा
तस्मिंस्तु समये कुम्भीपाकस्थानां तु पापिनाम् ।
घोरः समभवच्छब्दो हा हताः स्मेतिवादिनाम् ॥
मृताः स्मेति वदन्त्येके दग्धाः स्मेति परे जगुः । छिन्नाः स्मेति विभिन्नाः स्मेत्येवं रोदनकारिणः
श्रुत्वा तं करुणं शब्दं दुःखितो मुनिराड् हृदि ।
पप्रच्छ पितृनाथांस्तान्केषां शब्दोऽयमित्यपि ॥
श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १५ वे सन्ध्या आदि कर्मोंमें उसे प्रयत्नके साथ धारण ॥ २१ करें । भस्मनिष्ठ मनुष्यमें पाप प्रविष्ट नहीं हो सकते, अतः ब्राह्मणोंको यत्नपूर्वक सदा भस्म धारण किये रहना चाहिये ॥ १ ९ –२१३ ॥ यदि कोई अपने दाहिने हाथकी तीनों मध्यकी ॥ २२ अँगुलियों ( तर्जनी, मध्यमा तथा अनामिका ) - से छः अंगुलतक अथवा इससे भी अधिक लम्बे परिमाणका अथवा एक नेत्रसे लेकर दूसरे नेत्रतक लम्बा देदीप्यमान २३ त्रिपुण्ड्र भस्मसे अपने ललाटपर लगाये तो वह साक्षात् रुद्ररूप हो जाता है; इसमें सन्देह नहीं है । अनामिका अँगुलीको अकार, मध्यमाको उकार तथा तर्जनीको ॥ २४ मकार कहा गया है । अतएव त्रिपुण्ड्र त्रिगुणात्मक है । तर्जनी, मध्यमा तथा अनामिका अँगुलियोंसे अनुलोमक्रमसे त्रिपुण्ड्र धारण करना चाहिये ॥ २२–२५ ॥ ॥ २५ इस सम्बन्धमें आपसे एक प्राचीन इतिहासका वर्णन कर रहा हूँ । किसी समय तपस्वियोंके शिरोमणि ऋषि दुर्वासा अपने सर्वांगमें भस्म धारण किये हुए २६ तथा रुद्राक्षके आभूषण पहने हुए ' हे शिव! हे शंकर! हे सर्वात्मन्! हे श्रीमातः! हे जगदम्बिके! ' इन नामोंका उच्च स्वरसे उच्चारण करते हुए पितृलोक २७ गये हुए थे ॥ २६-२७३ ॥ उन्हें देखकर कव्यवाट् ( अनल, सोम, यम, अर्यमा, अग्निष्वात्ता, बर्हिषद्, सोमपा ) आदि पितरोंने ॥ २८ उठकर अभिवादनके द्वारा तथा आसन आदि उपचारोंसे उनका अत्यधिक सम्मान किया । तब वे अनेक प्रकारकी कथाओंके माध्यम से परस्पर वार्तालाप करने लगे ॥ २८-२९ ॥ ॥ २ ९ उसी समय कुम्भीपाकनरकमें पड़े हुए पापियोंका भयंकर चीत्कार हुआ । ' हाय! हमलोग मारे जा रहे हैं ' - वे ऐसा बोल रहे थे । उनमें कुछ चिल्ला रहे थे ३० ' हम मर गये ', दूसरे कह रहे थे ‘ हम जल गये ’, कुछ चीत्कार कर रहे थे ' हम कट गये ' तथा कुछ चिल्ला रहे थे ' हम छेदे जा रहे हैं ' - इस प्रकार कहकर वे ॥ ३१ रुदन कर रहे थे ॥ ३०-३१ ॥ वह करुण - क्रन्दन सुनकर मुनिराज दुर्वासाके मनमें बड़ी व्यथा हुई और उन्होंने उन पितृदेवोंसे पूछा ३२ कि यह किन लोगोंकी ध्वनि है? ॥ ३२ ॥
1898 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ द्वितीय खण्ड ] —23 D
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अ ० १५ ] एकादश
ते समूचुर्मुनेऽत्रैव पुरी संयमनी परा ।
वर्तते यमरा s त्र पापिनां भोगदायकः ॥ ३३
नानादूतैः कालरूपैः कृष्णवर्णैर्भयङ्करैः ।
सहितोऽत्रैव तत्पुर्यां नायको विद्यतेऽनघ ॥ ३४
तत्र कुण्डान्यनेकानि पापिनां भोगदानि च ।
षडशीतिर्घोररूपैर्दूतैः परिवृतानि च ॥ ३५
तत्र मुख्यतमं कुण्डं कुम्भीपाकाभिधं महत् ।
वर्तते तद्गतानां च यातनानां तु वर्णनम् ॥ ३६
कर्तुं न शक्यते कैश्चिदपि वर्षशतैरपि ।
ये शिवद्रोहिणः सन्ति तथा देवीविनिन्दकाः ॥ ३७
ये विष्णुद्रोहिणः सन्ति पतन्त्यत्रैव ते मुने ।
ये वेदनिन्दकाः सन्ति सूर्यस्य च गणेशितुः ॥ ३८
ब्राह्मणानां द्रोहिणो ये पतन्त्यत्रैव ते मुने ।
कामाचाराश्च ये सन्ति तप्तमुद्राङ्किताश्च ये ॥ ३ ९
त्रिशूलधारिणो ये च पतन्त्यत्रैव ते मुने ।
मातृपितृगुरुज्येष्ठपुराणस्मृतिनिन्दकाः ॥ ४०
ये धर्मदूषकाः सन्ति पतन्त्यत्रैव ते मुने ।
तेषामयं महाघोरः शब्दः श्रवणदारुणः ॥ ४१
श्रूयतेऽस्माभिरनिशं वैराग्यं यच्छ्रुतेर्भवेत् ।
इति तेषां वचः श्रुत्वा मुनिराट् तद्दिदृक्षया ॥ ४२
उत्थाय चलितस्तूर्णं ययौ कुण्डसमीपतः ।
अवाङ्मुखो ददर्शाधस्तस्मिन्नेव क्षणे मुने ॥ ४३
तत्रत्यानां पापिनां तु स्वर्गाधिकमभूत्सुखम् । स्कन्ध ७० ९ तब उन पितृदेवोंने कहा – हे मुने! यहींपर संयमनी नामक एक विशाल पुरी है । यहाँ पापियोंको उनके कर्मोंका भोग प्रदान करनेवाले यमराज रहते हैं ॥ ३३ ॥
हे अनघ! साक्षात् कालरूप तथा कृष्णवर्णवाले अनेक भयानक दूतोंके साथ यमराज उस पुरीमें स्वामीके रूपमें निवास करते हैं ॥ ३४ ॥
उस पुरीमें पापियोंको उनके कुकर्मका भोग प्रदान करनेवाले छियासी कुण्ड हैं, जो भयंकर रूपवाले दूतोंसे सदा घिरे रहते हैं ॥ ३५ ॥
उनमें सबसे मुख्य कुम्भीपाक नामक एक विशाल कुण्ड है । उस नरककुण्डमें मिलनेवाली यातनाओंका वर्णन कोई भी सैकड़ों वर्षोंमें भी नहीं कर सकता ॥ ३६३ ॥
हे मुने! जो शिव तथा विष्णुके द्रोही हैं और देवीके निन्दक हैं, वे लोग इसी कुण्डमें गिरते हैं ॥ ३७३ ॥
जो वेदके निन्दक हैं एवं सूर्य, गणेश तथा ब्राह्मणोंके द्रोही हैं, हे मुने! वे लोग इसी कुण्डमें गिरते हैं ॥ ३८३ ॥
जो लोग स्वेच्छाचारी हैं तथा जो तप्तमुद्रासे अंकित हैं तथा जो त्रिशूल धारण करते हैं, हे मुने! वे इसी ' कुम्भीपाक ' नरककुण्डमें गिरते हैं ॥ ३ ९ ३ ॥ जो लोग माता, पिता, गुरु, श्रेष्ठजनों, पुराणों तथा स्मृतियोंके निन्दक हैं और धर्मको दूषित करनेवाले हैं, हे मुने! वे लोग इसी कुण्डमें पड़ते हैं ॥ ४०३ ॥
[ हे मुने! ] सुननेमें अत्यन्त दारुण तथा महाभयानक यह ध्वनि उन्हीं लोगोंकी है । हमलोग यह ध्वनि नित्य सुनते रहते हैं, जिसके सुननेसे वैराग्य उत्पन्न हो जाता है ॥ ४१३ ॥
उन पितृगणोंकी यह बात सुनकर मुनिश्रेष्ठ दुर्वासा उन पापियोंको देखनेकी इच्छासे वहाँसे उठकर चल दिये और शीघ्र ही कुम्भीपाक नरककुण्डके पास पहुँच गये ॥ ४२३ ॥
[ श्रीनारायण कहते हैं- ] हे मुने! मुख झुकाकर जब दुर्वासामुनि नीचेकी ओर देखने लगे, उसी समय उस कुण्डमें स्थित पापियोंको स्वर्गसे भी अधिक सुखका अनुभव होने लगा ॥ ४३३ ॥
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७१० हसन्ति केचिद् गायन्ति नृत्यन्ति च तथापरे परस्परं रमन्ते तेऽप्युन्मत्ताः सुखवर्धनात् मृदङ्गमुरजावीणाढक्कादुन्दुभिनिस्वनाः समुद्भूतास्तु मधुराः पञ्चमस्वरभूषिताः वसन्तवल्लीपुष्पाणां सुगन्धमरुतो ववुः मुनिस्तु चकितो दृष्ट्वा यमदूताश्च विस्मिताः । शीघ्रं ते कथयामासुर्धर्मराजाय वेदिने
महाराज महाश्चर्यमधुनैवाभवद्विभो ।
स्वर्गादप्यधिकं सौख्यं कुम्भीपाकस्थपापिनाम् ॥
निमित्तं नैव जानीमः कस्मादिदमभूद्विभो ।
चकिताः स्म वयं सर्वे प्राप्ता देव त्वदन्तिकम् ॥
निशम्य दूतवाणीं तां धर्मराट् शीघ्रमुत्थितः ।
महामहिषमारूढो ययौ ते यत्र पापिनः ॥
तां वार्तां प्रेषयामास दूतद्वारामरावतीम् ।
श्रुत्वा तां देवराजोऽपि प्राप्तो देवगणैः सह ॥
ब्रह्मलोकात्पद्मजोऽपि वैकुण्ठाद्विष्टरश्रवाः ।
तत्तल्लोकाच्च दिक्पालाः समाजग्मुर्गणैः सह ॥
परिवार्य स्थिताः सर्वे कुम्भीपाकमितस्ततः । श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १५ ॥ ४४ उनमें से कुछ हँसने लगे, कुछ गाने लगे तथा कुछ नाचने लगे । सुख - वृद्धिके कारण उन्मत्त होकर । वे परस्पर क्रीडा करने लगे ॥ ४४३ ॥
॥ ४५ मृदंग, मुरज, वीणा, ढक्का तथा दुन्दुभिकी कोयलसदृश पंचम स्वरसे युक्त मधुर ध्वनियाँ उत्पन्न । होने लगीं और वासन्ती लताके पुष्पोंके सम्पर्क से ॥ ४६ सुगन्धित हवाएँ बहने लगीं ॥४५-४६ ॥ यह देखकर मुनि दुर्वासा आश्चर्यचकित हो गये और यमदूत भी अत्यन्त विस्मयमें पड़ गये । वे यमदूत ॥ ४७ सर्वज्ञ धर्मराजके पास शीघ्र पहुँचकर उनसे कहने लगे - हे महाराज! हे विभो! अभी - अभी एक अत्यन्त आश्चर्यजनक घटना घटी है । कुम्भीपाकमें स्थित ४८ पापियोंको स्वर्गसे भी अधिक सुख प्राप्त हो रहा है । हे विभो! यह कैसे हो गया, इसका कारण हम नहीं जानते । हे देव! इस घटनासे हम सभी लोग चकित ४ ९ हैं और आपके पास आये हुए हैं ॥ ४७–४९ ॥ दूतोंकी वह बात सुनकर धर्मराज शीघ्र ही उठ खड़े हुए और एक विशाल महिषपर आरूढ होकर ५० उस कुम्भीपाक नरककुण्डके लिये प्रस्थित हुए, जहाँ वे पापी पड़े हुए थे ॥ ५० ॥
उन्होंने अपने दूतोंद्वारा वह सन्देश अमरावती ५१ ( इन्द्रपुरी ) - में भेज दिया । उस सन्देशको सुनकर देवराज इन्द्र भी देवताओंके साथ वहाँ आ गये । इसी प्रकार ब्रह्मलोकसे ब्रह्मा, वैकुण्ठलोकसे विष्णु तथा ५२ अपने - अपने लोकोंसे समस्त दिक्पाल अपने गणोंसहित वहाँ आ गये ॥ ५१-५२ ॥ वे सभी कुम्भीपाकको इधर - उधरसे घेरकर अपश्यंस्तद्गताञ्जीवान्स्वर्गाधिकसुखान्वितान् ॥५३ खड़े हो गये । उन्होंने वहाँपर स्थित जीवोंको स्वर्गसे
चकिता एव ते सर्वे न विदुस्तस्य कारणम् ।
अहो पापस्य भोगार्थं कुण्डमेतद्विनिर्मितम् ॥
तत्र सौख्यं यदा जातं तदा पापात्तु किं भयम् ।
उच्छिन्ना वेदमर्यादा परमेशकृता कथम् ॥
भगवान् स्वस्य संकल्पं वितथं कृतवान्कथम् ।
आश्चर्यमेतदाश्चर्यमेतदित्येव भाषिणः ॥
तटस्था अभवन्सर्वे न विदुस्तत्र कारणम् । भी अधिक सुखी देखा । विस्मयमें पड़े हुए वे सभी देवता उसका कारण नहीं जान पाये । वे कहने लगे ---५४ ' अहो! यह कुण्ड तो पाप भोगनेके निमित्त है । जब यहाँपर ऐसा सुख प्राप्त हो रहा है तो फिर लोगोंको पापसे क्या भय रहेगा? परमेश्वरके द्वारा बनायी गयी ५५ वेदमर्यादा कैसे विनष्ट हो गयी? भगवान् ने अपने ही संकल्पको मिथ्या कैसे कर दिया? यह तो आश्चर्य है, यह तो आश्चर्य है ' - ऐसा कहते हुए वे सभी ५६ देवता उदास हो गये; वे उस घटनाका कारण नहीं जान सके ॥५३–५६३ ॥
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अ ० १५ ] एकादश स्कन्ध ७११ एतस्मिन्नन्तरे शौरिः सम्मन्त्र्य विबुधादिभिः ॥
ययौ कैश्चित्सुरगणैः सहितः शङ्करालयम् ।
पार्वत्या सहितं देवं कोटिकन्दर्पसुन्दरम् ॥
रमणीयतमाङ्गं तं लावण्यखनिमद्भुतम् ।
सदा षोडशवर्षीयं नानालङ्कारभूषितम् ॥
नानागणैः परिवृतं लालयन्तं परां शिवाम् ।
ददर्श चन्द्रमौलिं स चतुर्वेदं ननाम ह ॥
वृत्तान्तं कथयामास चमत्कृतमतिस्फुटम् ।
एतस्य कारणं देव न जानीमः कथञ्चन ॥
वद तत्कारणं देव सर्वज्ञोऽसि यतः प्रभो ।
विष्णुवाक्यं तदा श्रुत्वा प्रसन्नमुखपङ्कजः ॥
उवाच मधुरं वाक्यं मेघगम्भीरया गिरा ।
शृणु विष्णो तन्निमित्तं नाश्चर्यं त्वत्र विद्यते ॥
भस्मनो महिमैवायं भस्मना किं भवेन्न हि ।
कुम्भीपाकं गतो द्रष्टुं दुर्वासाः शैवसम्मतः ॥
अवाङ्मुखो ददर्शाधस्तदा वायुवशाद्धरे ।
भालभस्मकणास्तत्र पतिता दैवयोगतः ॥
तेन जातमिदं सर्वं भस्मनो महिमा त्वयम् ।
इतः परं तु तत्तीर्थं पितृलोकनिवासिनाम् ॥
भविष्यति न सन्देहो यत्र स्नात्वा सुखी भवेत् ।
पितृतीर्थं तु तन्नाम्नाप्यत ऊर्ध्वं भविष्यति ॥
मल्लिङ्गस्थापनं तत्र कार्यं देव्याश्च सत्तम ।
पूजयिष्यन्ति ते तत्र पितृलोकनिवासिनः ॥
त्रैलोक्ये यानि तीर्थानि तत्र श्रेष्ठमिदं भवेत् ।
पित्रीश्वरीपूजया तु त्रैलोक्यं पूजितं भवेत् ॥
५७ इसी बीच भगवान् विष्णु देवताओं आदिसे मन्त्रणा करके कुछ देवगणोंके साथ शंकरजी के निवास - स्थानपर गये । वहाँपर उन्होंने पार्वतीके साथ ५८ विराजमान, करोड़ों कामदेवके समान सुन्दर, परम रमणीय अंगोंवाले, लावण्यकी खान, अद्भुत, सदा सोलह वर्षकी अवस्थावाले, अनेकविध अलंकारोंसे ५ ९ सुशोभित, विविध गणोंसे घिरे हुए तथा परा शिवाको प्रमुदित करते हुए चतुर्वेदस्वरूप चन्द्रशेखर भगवान् शिवको देखा और उन्हें प्रणाम किया । तत्पश्चात् ६० उन्होंने अत्यन्त स्पष्ट वाणीमें उस आश्चर्यजनक घटनाको बताया – ' हे देव! हम इस घटनाका कुछ ६१ भी कारण नहीं समझ पा रहे हैं । हे देव! इसका जो कारण हो, उसे आप बताइये; क्योंकि हे प्रभो! आप सर्वज्ञ हैं ' ॥ ५७-६१३ ॥ ६२ तब विष्णुका कथन सुनकर प्रसन्न मुखारविन्दवाले भगवान् शिवने मेघके समान गम्भीर वाणीमें यह मधुर वचन कहा- ' - ' हे विष्णो! उसका कारण सुनिये । ' इस ६३ विषयमें कोई आश्चर्य नहीं है । यह भस्मकी महिमा है । भस्मसे क्या नहीं हो सकता है? ॥ ६२-६३३ ॥ शैवसम्मत होकर अर्थात् भस्म तथा त्रिपुण्ड्र ६४ आदि धारण करके दुर्वासामुनि कुम्भीपाक देखने गये थे । हे हरे! वे मुख झुकाकर नीचेकी ओर देखने लगे, तभी उनके ललाटपर स्थित भस्मके कुछ ६५ कण दैवयोगसे वायुके प्रभावसे उस कुण्डमें गिर पड़े । उसीसे यह सारी घटना हुई है; यह तो भस्मकी ही महिमा है ॥ ६४-६५३ ॥ ६६ अबसे यह कुम्भीपाक पितृलोकमें निवास करनेवालोंके लिये तीर्थ बन जायगा, जिसमें स्नान करके ६७ सुख प्राप्त होगा; इसमें सन्देह नहीं है । आजसे उन्हींके नामसे यह ' पितृतीर्थ ' नामवाला होगा । हे श्रेष्ठ! आप वहाँपर मेरे लिंग तथा देवीकी मूर्तिकी स्थापना करें, ६८ जिससे पितृलोकमें रहनेवाले हमारी पूजा कर सकें । तीनों लोकोंमें जितने तीर्थ हैं, उनमें यह श्रेष्ठ तीर्थ होगा । वहाँपर स्थापित पित्रीश्वरीकी पूजामात्रसे तीनों ६ ९ लोकोंकी पूजा हो जायगी ॥ ६६-६९ ॥