देवी भागवत उत्तरार्द्ध — पृष्ठ 71–80

देवी भागवत उत्तरार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 71–80

पृष्ठ 71

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भगवान गीताप्रेस गोरखपुर श्रीकृष्णसे पंचमुख महादेवका प्राकट्य

पृष्ठ 72

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भगवान गीताप्रेस, गोरखपुर भगवती भ्रामरीदेवी

पृष्ठ 73

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, गोरखपुर गीताप्रेस श्रीभुवनेश्वरी भगवती मणिद्वीपाधिष्ठा भगवान

पृष्ठ 74

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अ ० १२ ]

सकृत्कृत्वा महापूजां देवीपादजलं पिबन् ।

न जातु जननीगर्भे गच्छेदिति विनिश्चयः ॥

सर्वं दृश्यं महादेवी द्रष्टा साक्षी च सैव हि ।

इति तद्भावभरितस्तिष्ठेन्निर्भयचेतसा ॥

कृत्वा नित्यविधिं सम्यग्गन्तव्यं सदसि द्विजान् । समाहूय च प्रष्टव्यो धर्मशास्त्रविनिर्णयः सम्पूज्य ब्राह्मणान्पूज्यान्वेदवेदान्तपारगान् । गोभूहिरण्यादिकं च देयं पात्रेषु सर्वदा अविद्वान्ब्राह्मणः कोऽपि नैव पूज्यः कदाचन आहारादधिकं नैव देयं मूर्खाय कर्हिचित् ॥ न वा लोभात्त्वया पुत्र कर्तव्यं धर्मलङ्घनम् अतः परं न कर्तव्यं क्वचिद्विप्रावमाननम् ॥ ब्राह्मणा भूमिदेवाश्च माननीयाः प्रयत्नतः कारणं क्षत्रियाणां च द्विजा एव न संशयः अद्भ्योऽग्निर्ब्रह्मणः क्षत्रमश्मनो लोहमुत्थितम् तेषां सर्वत्रगं तेजः स्वासु योनिषु शाम्यति तस्माद्राज्ञा विशेषेण माननीया मुखोद्भवाः दानेन विनयेनैव सर्वथा भूतिमिच्छता दण्डनीतिः सदा कार्या धर्मशास्त्रानुसारतः कोशस्य संग्रहः कार्यो नूनं न्यायागतस्य ह सप्तम स्कन्ध ६५ एक बार भी भगवती जगदम्बाकी महापूजा कर ४४ उनके चरणोदकका पान करनेवाला मनुष्य फिर कभी माताके गर्भमें नहीं जाता, यह सर्वथा निश्चित है ॥ ४४ ॥

सारा जगत् दृश्य है और महादेवी द्रष्टा तथा ४५ साक्षी हैं - इस प्रकारकी भावनासे युक्त होकर सदा भयमुक्त चित्तसे रहना चाहिये ॥ ४५ ॥

[ हे पुत्र! ] तुम प्रतिदिन नित्य - नियमका पालन ॥ ४६ करके सभामें जाना और द्विजोंको बुलाकर उनसे धर्मशास्त्रसम्बन्धी निर्णय पूछना ॥४६ ॥

वेद - वेदान्तके पारगामी आदरणीय विद्वानोंकी ॥ ४७ विधिवत् पूजा करके सुयोग्य पात्रोंको गौ, भूमि तथा । सुवर्ण आदिका सदा दान करना ॥४७ ॥

४८ तुम कभी भी किसी मूर्ख ब्राह्मणकी पूजा मत करना और मूर्ख व्यक्तिको कभी भी भोजनसे अधिक । कुछ भी मत देना । हे पुत्र! तुम किसी भी परिस्थितिमें ४ ९ लोभवश धर्मका उल्लंघन मत करना । इसके अतिरिक्त तुम्हें कभी भी विप्रोंका अपमान नहीं करना चाहिये ॥ पृथ्वीके देवतास्वरूप ब्राह्मणोंका प्रयत्नपूर्वक सम्मान ॥ ५० करना चाहिये । क्षत्रियोंके एकमात्र आधार ब्राह्मण ही हैं, इसमें सन्देह नहीं है ॥ ४८-५० ॥ । जलसे अग्निकी, ब्राह्मणसे क्षत्रियकी और पत्थरसे ॥ ५१ लोहेकी उत्पत्ति हुई है । उनका सर्वत्रगामी तेज अपनी । ही योनि शान्त होता है । अत: ऐश्वर्यकी इच्छा रखनेवाले ॥ ५२ राजाको विशेषरूपसे विनम्रतापूर्वक दानके द्वारा ब्राह्मणोंका सत्कार करना चाहिये । राजाको चाहिये कि वह । धर्मशास्त्र के अनुसार दण्डनीतिका पालन करे और न्यायसे ॥ ५३ । उपार्जित धनका निरन्तर संग्रह करे ॥ ५१-५३ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां सप्तमस्कन्धे सत्यव्रताय राजनीत्युपदेशवर्णनं नामैकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥

अथ द्वादशोऽध्यायः राजा सत्यव्रतको महर्षि वसिष्ठका शाप तथा युवराज हरिश्चन्द्रका राजा बनना व्यास उवाच व्यासजी बोले - [ हे महाराज जनमेजय! ] एवं प्रबोधितः पित्रा त्रिशङ्कुः प्रणतो नृपः । इस प्रकार पिताके समझानेपर राजकुमार त्रिशंकुने हाथ जोड़कर प्रेमपूर्वक गद्गद वाणीमें पितासे कहा—

तथेति पितरं प्राह प्रेमगद्गदया गिरा ॥ १ । ' मैं वैसा ही करूँगा ' ॥ १ ॥

1898 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ द्वितीय खण्ड ] –3 A

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६६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १२

विप्रानाहूय मन्त्रज्ञान्वेदशास्त्रविशारदान् ।

अभिषेकाय सम्भारान् कारयामास सत्वरम् ॥ २

सलिलं सर्वतीर्थानां समानाय्य विशांपतिः ।

प्रकृतीश्च समाहूय सामन्तान्भूपतींस्तथा ॥ ३

पुण्येऽह्नि विधिवत्तस्मै ददावासनमुत्तमम् ।

अभिषिच्य सुतं राज्ये त्रिशङ्कं विधिवत्पिता ॥४

तृतीयमाश्रमं पुण्यं वने त्रिपथगाकूले काले प्राप्ते ययौ इन्द्रासनसमीपस्थो पूर्वं भगवता प्रोक्तं सत्यव्रतो वसिष्ठेन

जग्राह भार्यया युतः ।

चचार दुश्चरं तपः ॥ ५

स्वर्गं पूजितस्त्रिदशैरपि ।

रराज रविवत्सदा ॥ ६

राजोवाच

कथायोगेन साम्प्रतम् ।

शप्तो दोग्ध्रीवधात्किल ॥ ७

कुपितेन पिशाचत्वं प्रापितो गुरुणा ततः ।

कथं मुक्तः पिशाचत्वादित्येतत्संशयः प्रभो ॥ ८

न सिंहासनयोग्यो हि भवेच्छापसमन्वितः ।

मुनिना मोचितः शापात्केनान्येन च कर्मणा ॥

एतन्मे ब्रूहि विप्रर्षे शापमोक्षणकारणम् ।

आनीतस्तु कथं पित्रा स्वगृहे तादृशाकृतिः ॥ १०

व्यास उवाच

वसिष्ठेन च शप्तोऽसौ सद्य: पैशाचतां गतः ।

दुर्वेषश्चातिदुर्धर्षः सर्वलोकभयङ्करः ॥ ११

यदैवोपासिता देवी भक्त्या सत्यव्रतेन ह ।

तया प्रसन्नया राजन् दिव्यदेहः कृतः क्षणात् ॥ १२

पिशाचत्वं गतं तस्य पापं चैव क्षयं गतम् ।

विपाप्मा चातितेजस्वी सम्भूतस्तत्कृपामृतात् ॥ १३ ।

1898 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ द्वितीय खण्ड ] -3 B तत्पश्चात् महाराज अरुणने वेदशास्त्र के पारगामी विद्वान् तथा मन्त्रवेत्ता ब्राह्मणोंको बुलाकर अभिषेककी सारी सामग्रियाँ तुरंत एकत्र करायीं और सम्पूर्ण तीर्थोंका जल मँगाकर तथा सभी मन्त्रियों, सामन्तों और नरेशोंको बुलाकर शुभ दिनमें उस राजकुमारको विधिपूर्वक श्रेष्ठ राज्यासनपर आसीन कर दिया ॥ २-३३ ॥ इस प्रकार पिताने पुत्र त्रिशंकुको राज्यपर विधिपूर्वक अभिषिक्त करके अपनी धर्मपत्नीके साथ पवित्र तीसरे आश्रम ( वानप्रस्थ ) - को ग्रहण किया और वे वनमें गंगा के तटपर कठोर तप करने लगे ॥ ४-५ ॥ आयु समाप्त हो जानेपर वे स्वर्गको चले गये । वहाँ वे देवताओंके द्वारा भी पूजित हुए और इन्द्रके समीप स्थित रहते हुए सदा सूर्यकी भाँति सुशोभित होने लगे ॥६ ॥

राजा [ जनमेजय ] बोले - [ हे व्यासजी! ] आप पूज्यवरने कथाके प्रसंगमें अभी - अभी बताया कि गुरुदेव वसिष्ठने पयस्विनी गौका वध कर देनेके कारण राजकुमार सत्यव्रतको कुपित होकर शाप दे दिया और वह पिशाचत्वको प्राप्त हो गया । हे प्रभो! तदनन्तर पैशाचिकतासे उसका कैसे उद्धार हुआ? इस विषयमें मुझे संशय हो रहा है । शापग्रस्त मनुष्य सिंहासनके योग्य नहीं होता । सत्यव्रतके दूसरे किस कर्मके प्रभावसे मुनि वसिष्ठने उसे अपने शाप से मुक्त कर दिया । हे विप्रर्षे! शापसे मुक्तिका कारण बताइये और मुझे यह भी बताइये कि वैसे [ निन्द्य ] आकृतिवाले पुत्रको उसके पिता [ राजा अरुण ] - ने अपने घर वापस क्यों बुला लिया? ॥ ७–१० ॥ व्यासजी बोले - [ हे राजन्! ] मुनि वसिष्ठके द्वारा शापित वह सत्यव्रत तत्काल पैशाचिकताको प्राप्त हो गया । इसके फलस्वरूप वह कुरूप, दुर्धर्ष तथा सभी प्राणियोंके लिये भयंकर हो गया, किंतु हे राजन्! जब उस सत्यव्रतने भक्तिपूर्वक भगवतीकी उपासना की, तब भगवतीने प्रसन्न होकर क्षणभरमें उसे दिव्य शरीरवाला बना दिया ॥ ११-१२ ॥ भगवतीके कृपारूपी अमृतसे उसकी पैशाचिकता

समाप्त हो गयी और उसका पाप विनष्ट हो गया ।

अब वह पापरहित तथा अतितेजस्वी हो गया ॥१३ ॥

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अ ० १२ ] सप्तम स्कन्ध ६७

वसिष्ठोऽपि प्रसन्नात्मा जातः शक्तिप्रसादतः ।

पितापि च बभूवास्य प्रेमयुक्तस्त्वनुग्रहात् ॥

राज्यं शशास धर्मात्मा मृते पितरि पार्थिवः ।

ईजे च विविधैर्यज्ञैर्देवदेवीं सनातनीम् ॥

तस्य पुत्रो बभूवाथ हरिश्चन्द्रः सुशोभनः ।

लक्षणैः शास्त्रनिर्दिष्टैः संयुतश्चातिसुन्दरः ॥

युवराजं सुतं कृत्वा त्रिशङ्कुः पृथिवीपतिः ।

मानुषेण शरीरेण स्वर्गं भोक्तुं मनो दधे ॥

वसिष्ठस्याश्रमं गत्वा प्रणम्य विधिवन्नृपः ।

उवाच वचनं प्रीतः कृताञ्जलिपुटस्तदा ॥

राजोवाच

ब्रह्मपुत्र महाभाग सर्वमन्त्रविशारद ।

विज्ञप्तिं मे सुमनसा श्रोतुमर्हसि तापस ॥

इच्छा मेऽद्य समुत्पन्ना स्वर्गलोकसुखाय च ।

अनेनैव शरीरेण भोगान्भोक्तुममानुषान् ॥

अप्सरोभिश्च संवासः क्रीडितुं नन्दने वने ।

देवगन्धर्वगानं च श्रोतव्यं मधुरं किल ॥

याजय त्वं मखेनाशु तादृशेन महामुने ।

यथानेन शरीरेण वसे लोकं त्रिविष्टपम् ॥

समर्थोऽसि मुनिश्रेष्ठ कुरु कार्यं ममाधुना ।

प्रापयाशु मखं कृत्वा देवलोकं दुरासदम् ॥

वसिष्ठ उवाच

राजन् मानुषदेहेन स्वर्गे वासः सुदुर्लभः ।

मृतस्य हि ध्रुवं स्वर्गः कथितः पुण्यकर्मणा ॥

तस्माद् बिभेमि सर्वज्ञ दुर्लभाच्च मनोरथात् । अप्सरोभिश्च संवासो जीवमानस्य दुर्लभः कुरु यज्ञान्महाभाग मृतः स्वर्गमवाप्स्यसि । 1898 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ द्वितीय खण्ड ] -3 C भगवतीकी कृपासे वसिष्ठजी भी प्रसन्नचित्त १४ हो गये और उसके पिता [ अरुण ] भी प्रेमसे परिपूर्ण हो गये ॥१४ ॥

पिताके मृत हो जानेपर धर्मात्मा राजा सत्यव्रत १५ राज्यपर सम्यक् शासन करने लगा । वह अनेक प्रकारके यज्ञोंद्वारा देवेश्वरी सनातनी भगवतीकी उपासनामें तत्पर रहने लगा ॥ १५ ॥

१६ उस त्रिशंकु ( सत्यव्रत ) - के पुत्र हरिश्चन्द्र हुए, जो शास्त्रोक्त शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न तथा परम सुन्दर स्वरूपवाले थे ॥ १६ ॥

१७ [ कुछ समय बाद ] राजा त्रिशंकुने अपने पुत्र हरिश्चन्द्रको युवराज बनाकर मानव शरीरसे ही स्वर्ग-१८ सुख भोगनेका निश्चय किया ॥ १७ ॥

तब राजा त्रिशंकु वसिष्ठके आश्रममें गये और उन्हें विधिवत् प्रणाम करके दोनों हाथ जोड़कर प्रसन्नतापूर्वक उनसे यह वचन कहने लगे ॥ १८ ॥

१ ९ राजा बोले- हे ब्रह्मपुत्र! हे महाभाग! हे सर्वमन्त्र-विशारद! हे तापस! आप प्रसन्नतापूर्वक मेरी प्रार्थना सुननेकी कृपा कीजिये । अब स्वर्ग लोकका सुख २० भोगनेकी इच्छा मेरे मनमें उत्पन्न हुई है । अप्सराओंके साथ रहने, नन्दनवनमें क्रीड़ा करने तथा देव-गन्धर्वोंका मधुर गीत सुनने आदि दिव्य भोगोंको मैं २१ इसी मानव शरीरसे भोगना चाहता हूँ ॥ १ ९ - २१ ॥ हे महामुने! आप शीघ्र ही मुझसे ऐसा यज्ञ सम्पन्न कराइये, जिससे मैं इसी मानव - शरीरसे स्वर्ग-२२ लोकमें निवास कर सकूँ । हे मुनिश्रेष्ठ! आप सर्वसमर्थ हैं, अतः मेरा यह कार्य अब पूर्ण कर दीजिये; यज्ञ सम्पन्न कराकर मुझे अत्यन्त दुर्लभ देवलोककी प्राप्ति २३ करा दीजिये ॥ २२-२३ ॥ वसिष्ठजी बोले - हे राजन्! मानव - शरीरसे स्वर्ग - लोकमें निवास अत्यन्त दुर्लभ है । मरनेके २४ पश्चात् ही पुण्य कर्मके प्रभावसे स्वर्गकी सुनिश्चित प्राप्ति कही गयी है । अतः हे सर्वज्ञ! तुम्हारे इस दुर्लभ मनोरथको पूर्ण करनेमें मैं डर रहा हूँ । जीवित ॥ २५ प्राणीके लिये अप्सराओंके साथ निवास दुर्लभ है । अतः हे महाभाग! आप अनेक यज्ञ कीजिये, मृत्यु अनन्तर आप स्वर्ग प्राप्त कर लेंगे ॥ २४-२५३ ॥

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६८ व्यास उवाच इत्याकर्ण्य वचस्तस्य राजा परमदुर्मनाः उवाच वचनं भूयो वसिष्ठं पूर्वरोषितम् । न त्वं याजयसे ब्रह्मन् गर्वावेशाच्च मां यदि अन्यं पुरोहितं कृत्वा यक्ष्येऽहं किल साम्प्रतम् । तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य वसिष्ठः कोपसंयुतः

शशाप भूपतिं चेति चाण्डालो भव दुर्मते ।

अनेन त्वं शरीरेण श्वपचो भव सत्वरम् ॥

स्वर्गकृन्तन पापिष्ठ सुरभीवधदूषित ।

ब्रह्मपत्नीहरोच्छिन्न धर्ममार्गविदूषक ॥

न ते स्वर्गगतिः पाप मृतस्यापि कथञ्चन । व्यास उवाच इत्युक्तो गुरुणा राजस्त्रिशङ्कस्तत्क्षणादपि ॥

तत्र तेन शरीरेण बभूव श्वपचाकृतिः ।

कुण्डलेऽश्ममये वापि जाते तस्य च तत्क्षणात् ॥

देहे चन्दनगन्धश्च विगन्धो ह्यभवत्तदा ।

नीलवर्णेऽथ सञ्जाते दिव्ये पीताम्बरे तनौ ॥

गजवर्णोऽभवद्देहः शापात्तस्य महात्मनः ।

शक्त्युपासकरोषेण फलमेतदभून्नृप ॥

तस्माच्छ्रीशक्तिभक्तो हि नावमान्यः कदाचन ।

गायत्रीजपनिष्ठो हि वसिष्ठो मुनिसत्तमः ॥

दृष्ट्वा निन्द्यं निजं देहं राजा दुःखमवाप्तवान् ।

न जगाम गृहे दीनो वनमेवाभितो ययौ ॥

चिन्तयामास दुःखार्तस्त्रिशङ्कुः शोकविह्वलः ।

किं करोमि क्व गच्छामि देहो मेऽतीव निन्दितः ॥

कर्तव्यं नैव पश्यामि येन मे दुःखसंक्षयः ।

गृहे गच्छामि चेत्पुत्रः पीडितोऽद्य भविष्यति ॥

1898 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ द्वितीय खण्ड ] —3 D श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १२ व्यासजी बोले – [ हे राजन्! ] वसिष्ठजीका ॥ २६ । यह वचन सुनकर अत्यन्त उदास मनवाले राजा त्रिशंकुने पहलेसे ही कुपित उन मुनिवर वसिष्ठसं कहा- हे ब्रह्मन्! यदि आप अभिमानवश मेरा यज्ञ ॥ २७ नहीं करायेंगे, तो मैं किसी दूसरेको अपना पुरोहित बनाकर इसी समय यज्ञ करूँगा ॥ २६-२७३ ॥ उनका यह वचन सुनते ही वसिष्ठजीने ॥ २८ क्रोधित होकर राजाको शाप दे दिया – ' हे दुर्बुद्धि! चाण्डाल हो जाओ । इसी शरीरसे तुम अभी नीच योनिको प्राप्त हो जाओ । स्वर्गको नष्ट करनेवाले २ ९ तथा सुरभीके वधके दोषसे युक्त हे पापिष्ठ! विप्रकी भार्याका हरण करनेवाले तथा धर्ममार्गको दूषित करनेवाले हे पापी! मरनेके बाद भी तुम किसी प्रकार ३० । स्वर्ग नहीं प्राप्त कर सकते ॥ २८–३०३ ॥ व्यासजी बोले- हे राजन्! गुरु वसिष्ठके ऐसा कहते ही त्रिशंकु तत्क्षण उसी शरीरसे चाण्डाल हो गये । उनके रत्नमय कुण्डल उसी क्षण ३१ पत्थर हो गये तथा शरीरमें लगा हुआ सुगन्धित चन्दन दुर्गन्धयुक्त हो गया I । उनके शरीरपर धारण किये हुए ३२ दिव्य पीताम्बर कृष्ण वर्णके हो गये । महात्मा वसिष्ठके शापसे उनका शरीर गजवर्ण - जैसा धूमिल हो गया ॥ ३१–३३३ ॥ ३३ हे राजन्! भगवतीके उपासक मुनि वसिष्ठके रोषके कारण ही त्रिशंकुको यह फल प्राप्त हुआ । इसलिये भगवती जगदम्बाके भक्तका कभी भी अपमान ३४ नहीं करना चाहिये । मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठ बड़ी निष्ठाके साथ गायत्रीजपमें संलग्न रहते थे ॥ ३४-३५ ॥ [ हे राजन्! ] उस समय अपना कलंकित शरीर ३५ देखकर राजा त्रिशंकु अत्यन्त दुःखित हुए । इस प्रकार दीन - दशाको प्राप्त वे राजा घर नहीं गये, अपितु ३६ जंगलकी ओर चले गये ॥ ३६ ॥

शोक - सन्तप्त वे त्रिशंकु दुःखित होकर सोचने लगे- अब मैं क्या करूँ और कहाँ जाऊँ? मेरा शरीर ३७ तो अत्यन्त निन्दित हो गया । मुझे ऐसा कोई उपाय नहीं सूझ रहा है, जिससे मेरा दुःख दूर हो सके । यदि मैं आज घर जाता हूँ, तो मुझे इस स्वरूपमें देखकर ३८ | पुत्रको महान् पीड़ा होगी और भार्या भी मुझे चाण्डालके

पृष्ठ 78

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अ ० १२ ]

भार्यापि श्वपचं दृष्ट्वा नाङ्गीकारं करिष्यति ।

सचिवा नादरिष्यन्ति वीक्ष्य मामीदृशं पुनः ॥

ज्ञातयो बन्धुवर्गश्च सङ्गतो न भजिष्यति ।

सर्वैस्त्यक्तस्य मे नूनं जीवितान्मरणं वरम् ॥

विषं वा भक्षयित्वाद्य पतित्वा वा जलाशये ।

कृत्वा वा कण्ठपाशं च देहत्यागं करोम्यहम् ॥

अग्नौ वा ज्वलिते देहं जुहोमि विधिवद् बलात् ।

कृत्वा वानशनं प्राणांस्त्यजामि दूषितान्भृशम् ॥

आत्महत्या भवेन्नूनं पुनर्जन्मनि जन्मनि । श्वपचत्वं च शापश्च हत्यादोषाद्भवेदपि

पुनर्विचार्य भूपालश्चेतसा समचिन्तयत् ।

आत्महत्या न कर्तव्या सर्वथैव मयाधुना ॥

भोक्तव्यं स्वकृतं कर्म देहेनानेन कानने । भोगेनास्य विपाकस्य भविता सर्वथा क्षयः प्रारब्धकर्मणां भोगादन्यथा न क्षयो भवेत् । तस्मान्मयात्र भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम् कुर्वन्पुण्याश्रमाभ्याशे तीर्थानां सेवनं तथा स्मरणं चाम्बिकायास्तु साधूनां सेवनं तथा एवं कर्मक्षयं नूनं करिष्यामि वने वसन् भाग्ययोगात्कदाचित्तु भवेत्साधुसमागमः इति सञ्चिन्त्य मनसा त्यक्त्वा स्वनगरं नृपः गङ्गातीरे गतः कामं शोचंस्तत्रैव संस्थितः सप्तम स्कन्ध ६ ९ रूपमें देखकर स्वीकार नहीं करेगी । इस प्रकारके ३ ९ चाण्डाल रूपवाले मुझ निन्द्यको देखकर मेरे मन्त्रीगण तथा जातिवाले भी आदर नहीं करेंगे और भाई - बन्धु भी संगमें नहीं रहेंगे । इस प्रकार सभी लोगोंके द्वारा परित्यक्त किये जानेवाले मेरे लिये तो ४० जीनेकी अपेक्षा मर जाना ही अच्छा है । अतः अब मैं विष खाकर, जलाशयमें कूदकर या गलेमें फाँसी लगाकर देह इ - - त त्याग कर दूँ अथवा विधिवत् ४१ प्रज्वलित अग्निमें अपने देहको जला डालूँ या फिर अनशन करके अपने कलंकित प्राणोंका त्याग कर दूँ ॥ ३७–४२ ॥ ४२ [ ऐसा विचार आते ही उन्होंने पुनः सोचा ] आत्महत्या करनेसे मुझे निश्चय ही जन्म - जन्मान्तरमें पुन: चाण्डाल होना पड़ेगा और आत्महत्या-॥ ४३ दोषके परिणामस्वरूप मैं शापसे कभी मुक्त नहीं हो सकूँगा ॥ ४३ ॥

ऐसा सोचनेके बाद राजाने अपने मनमें पुनः ४४ विचार किया कि इस समय मुझे किसी भी स्थितिमें आत्महत्या नहीं करनी चाहिये, अपितु वनमें रहकर मुझे अपने द्वारा किये गये कर्मका फल इसी शरीरसे ॥ ४५ भोग लेना चाहिये; क्योंकि इससे इस कुकर्मका फल सर्वथा समाप्त हो जायगा ॥ ४४-४५ ॥ भोगसे ही प्रारब्ध कर्मोंका क्षय होता है, अन्यथा इनका क्षय नहीं होता । इसलिये अब यहीं पर ॥ ४६ तीर्थोंका सेवन, भगवती जगदम्बाका स्मरण तथा । साधुजनोंकी सेवा करते हुए मुझे अपने द्वारा किये गये ॥ ४७ शुभ तथा अशुभ कर्मोंका फल भोग लेना चाहिये । इस प्रकार वनमें रहते हुए मैं अपने कर्मोंका क्षय अवश्य ही करूँगा । साथ ही, सम्भव है कि भाग्यवश । किसी साधुजनसे मिलनेका भी कभी अवसर प्राप्त हो ॥ ४८ जाय ॥ ४६–४८ ॥ मनमें ऐसा सोचकर राजा [ त्रिशंकु ] अपना । नगर छोड़कर गंगाके तटपर चले गये और अत्यधिक ॥ ४ ९ चिन्तित रहते हुए वहीं रहने लगे ॥४ ९ ॥ उसी समय पिताके शापका कारण जानकर हरिश्चन्द्रस्तदा ज्ञात्वा पितुः शापस्य कारणम् । राजा हरिश्चन्द्र अत्यन्त दुःखित हुए और उन्होंने दुःखितः सचिवांस्तत्र प्रेषयामास पार्थिवः ॥ ५० | अपने मन्त्रियोंको पिता त्रिशंकुके पास भेजा ॥५० ॥

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७० सचिवास्तत्र गत्वाशु तमूचुः प्रश्रयान्विताः प्रणम्य श्वपचाकारं निःश्वसन्तं मुहुर्मुहुः ॥ राजन् पुत्रेण ते नूनं प्रेषितान्समुपागतान् । अवेहि सचिवांस्त्वं नो हरिश्चन्द्राज्ञया स्थितान्

युवराजसुतः प्राह यत्तच्छृणु नराधिप ।

आनयध्वं नृपं यूयं सम्मान्य पितरं मम ॥

तस्माद्राजन् समागच्छ राज्यं प्रति गतव्यथः । सेवां सर्वे करिष्यन्ति सचिवाश्च प्रजास्तथा गुरुं प्रसादयिष्यामः स यथा तु दयेत वै । प्रसन्नोऽसौ महातेजा दुःखस्यान्तं करिष्यति

इति पुत्रेण ते राजन् कथितं बहुधा किल ।

तस्माद् गमनमेवाशु रोचतां निजसद्मनि ॥

व्यास उवाच

इति तेषां नृपः श्रुत्वा भाषितं श्वपचाकृतिः ।

स्वगृहं गमनायासौ न मतिं कृतवानतः ॥

तानुवाच तदा वाक्यं व्रजन्तु सचिवाः पुरम् ।

गत्वा पुरं महाभागा ब्रुवन्तु वचनाच्च मे ॥

नागमिष्याम्यहं पुत्र कुरु राज्यमतन्द्रितः । श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १२ । मन्त्रीगण वहाँ शीघ्र पहुँचकर बार - बार दीर्घ ५१ श्वास ले रहे चाण्डालकी आकृतिवाले राजा त्रिशंकुको प्रणामकर विनम्रतापूर्वक उनसे बोले - हे राजन्! आपके पुत्र हरिश्चन्द्रकी आज्ञासे यहाँ आये हुए ॥ ५२ हमलोगोंको आप मन्त्री समझिये । हे महाराज! आपके पुत्र युवराज हरिश्चन्द्रने [ हमसे ] जो कहा है, उसे आप सुनिये - ' आपलोग मेरे पिता राजा त्रिशंकुको ५३ सम्मानपूर्वक यहाँ ले आइये'॥५१-५३ ॥ अतः हे राजन्! अब आप सारी चिन्ता छोड़कर अपने राज्य वापस लौट चलिये । वहाँ सभी मन्त्रीगण ॥ ५४ तथा प्रजाजन आपकी सेवा करेंगे ॥ ५४ ॥

हमलोग भी गुरु वसिष्ठको प्रसन्न करेंगे, जिससे वे आपके ऊपर दया करें । प्रसन्न हो जानेपर वे महान् ॥ ५५ तेजस्वी आपका कष्ट अवश्य दूर कर देंगे ॥ ५५ ॥

हे राजन्! इस प्रकार आपके पुत्रने बहुत प्रकारसे कहा है । अतः अब शीघ्रतापूर्वक अपने घर ५६ लौट चलनेकी कृपा कीजिये ॥ ५६ ॥

व्यासजी बोले - [ हे जनमेजय! ] उनकी बात सुनकर चाण्डालकी आकृतिवाले राजा त्रिशंकुने अपने घर चलनेका कोई विचार मनमें नहीं किया । उस ५७ समय राजाने उनसे कहा - हे सचिवगण! आपलोग नगरको लौट जाइये और हे महाभाग! वहाँ जाकर ५८ [ हरिश्चन्द्रसे ] मेरे शब्दोंमें कह दीजिये - ' हे पुत्र! मैं नहीं आऊँगा । तुम अनेकविध यज्ञोंके द्वारा ब्राह्मणोंका सम्मान करते हुए तथा देवताओंकी पूजा करते हुए मानयन्ब्राह्मणान्देवान्यजन्यज्ञैरनेकशः ॥५ ९ सदा सावधान होकर राज्य करो ' ॥ ५७–५९ ॥

नाहं श्वपचवेषेण गर्हितेन महात्मभिः ।

आगमिष्याम्ययोध्यायां सर्वे गच्छन्तु मा चिरम् ॥

पुत्रं सिंहासने स्थाप्य हरिश्चन्द्रं महाबलम् ।

कुर्वन्तु राज्यकर्माणि यूयं तत्र ममाज्ञया ॥

इत्यादिष्टास्ततस्ते तु रुरुदुश्चातुरा भृशम् ।

सचिवा निर्ययुस्तूर्णं नत्वा तं च वनाश्रमात् ॥

अयोध्यायामुपागत्य पुण्येऽह्नि विधिपूर्वकम् ।

अभिषेकं तदा चक्रुर्हरिश्चन्द्रस्य मूर्ध्नि ते ॥

[ हे सचिवगण! ] महात्माओंके द्वारा सर्वथा निन्दित इस चाण्डाल - वेशसे अब मैं अयोध्या नहीं ६० जाऊँगा । आप सभी लोग यहाँसे शीघ्र लौट जाइये । [ वहाँ जाकर ] मेरे महाबली पुत्र हरिश्चन्द्रको सिंहासनपर बिठाकर आपलोग मेरी आज्ञासे राज्यके समस्त कार्य ६१ कीजिये ॥ ६०-६१ ॥ इस प्रकार त्रिशंकुके उपदेश देनेपर सभी मन्त्री अत्यधिक दुःखी होकर रोने लगे और उन्हें प्रणाम ६२ करके वानप्रस्थ आश्रममें जीवन व्यतीत करनेवाले उन [ राजा त्रिशंकु ] -के पाससे लौट आये । अयोध्यामें आकर उन मन्त्रियोंने शुभ दिनमें हरिश्चन्द्रके मस्तक पर ६३ । विधिपूर्वक अभिषेक किया ॥ ६२-६३ ॥

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अ ० १३ ] सप्तम स्कन्ध ७१ अभिषिक्तस्तु तेजस्वी सचिवैश्च नृपाज्ञया । राजा [ त्रिशंकु ] - की आज्ञासे मन्त्रियोंके द्वारा राज्याभिषिक्त होकर तेजस्वी तथा धर्मपरायण हरिश्चन्द्र अपने पिताका निरन्तर स्मरण करते हुए

राज्यं चकार धर्मिष्ठः पितरं चिन्तयन्भृशम् ॥ ६४ । राज्य करने लगे ॥ ६४ ॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां सप्तमस्कन्धे त्रिशङ्कपाख्यानवर्णनं नाम द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥

अथ त्रयोदशोऽध्यायः राजर्षि विश्वामित्रका सत्यव्रतद्वारा किये राजोवाच

हरिश्चन्द्रः कृतो राजा सचिवैर्नृपशासनात् ।

त्रिशङ्कुस्तु कथं मुक्तस्तस्माच्चाण्डालदेहतः ॥

मृतो वा वनमध्ये तु गङ्गातीरे परिप्लुतः ।

गुरुणा वा कृपां कृत्वा शापात्तस्माद्विमोचितः ॥

एतद् वृत्तान्तमखिलं कथयस्व ममाग्रतः ।

चरितं तस्य नृपतेः श्रोतुकामोऽस्मि सर्वथा ॥

व्यास उवाच

अभिषिक्तं सुतं कृत्वा राजा सन्तुष्टमानसः ।

कालातिक्रमणं तत्र चकार चिन्तयञ्छिवाम् ॥

एवं गच्छति काले तु तपस्तप्त्वा समाहितः ।

द्रष्टुं दारान्सुतादींश्च तदागात्कौशिको मुनिः ॥

आगत्य स्वजनं दृष्ट्वा सुस्थितं मुदमाप्तवान् ।

भार्यां पप्रच्छ मेधावी स्थितामग्रे सपर्यया ॥

दुर्भिक्षे तु कथं कालस्त्वया नीतः सुलोचने ।

अन्नं विना त्विमे बालाः पालिता केन तद्वद ॥

अहं तपसि सन्नद्धो नागतः शृणु सुन्दरि ।

किं कृतं तु त्वया कान्ते विना द्रव्येण शोभने ॥

मया चिन्ता कृता तत्र श्रुत्वा दुर्भिक्षमद्भुतम् ।

नागतोऽहं विचार्यैवं किं करिष्यामि निर्धनः ॥

अपने आश्रममें आना और गये उपकारको जानना राजा [ जनमेजय ] बोले- [ हे व्यासजी! ] राजा त्रिशंकुके आदेशसे सचिवोंने हरिश्चन्द्रको राजा १ बना दिया, किंतु स्वयं त्रिशंकुने उस चाण्डाल - देहसे मुक्ति कैसे प्राप्त की? वे वनमें कहीं मर गये अथवा गंगा - तटपर जलमें डूब गये अथवा गुरु वसिष्ठने कृपा २ करके उन्हें शापसे मुक्त कर दिया । यह सम्पूर्ण वृत्तान्त आप मेरे समक्ष कहिये; मैं राजा त्रिशंकुका चरित्र भलीभाँति सुनना चाहता हूँ॥१-३ ॥ ३ व्यासजी बोले - [ हे राजन्! ] अपने पुत्रका राज्याभिषेक करके राजा त्रिशंकुका चित्त बहुत प्रसन्न हुआ और वे वहीं जंगलमें कल्याणकारिणी भगवती जगदम्बाका ध्यान करते हुए समय व्यतीत करने लगे ॥ ४ ॥

४ इस तरह कुछ समय बीतनेके बाद कौशिक-मुनि एकाग्रचित्त होकर तपस्या पूर्ण करके अपनी पत्नी तथा पुत्रों आदिको देखनेके लिये [ अपने ५ आश्रममें ] आये । वहाँ आकर अपने स्त्री - पुत्रादिको स्वस्थ देखकर वे परम हर्षित हुए । मेधावी ऋषिने पूजाके लिये आगे स्थित अपनी भार्यासे पूछा – हे ६ सुनयने! दुर्भिक्षकी स्थितिमें तुमने समय कैसे व्यतीत किया? तुमने अन्नके बिना इन बालकोंको किस ७ उपायसे पाला; यह मुझे बताओ ॥ ५-७ ॥ हे सुन्दरि! मैं तो तपस्यामें संलग्न था, इसलिये नहीं आ सका । हे प्रिये! हे शोभने! बिना धनके तुमने ८ क्या व्यवस्था की? ॥ ८ ॥

यहाँ पर भीषण अकालका समाचार सुनकर मैं अत्यधिक चिन्तित था, किंतु यह सोचकर नहीं आया ९ कि धनहीन मैं [ वहाँ जाकर ] करूँगा ही क्या! ॥ ९ ॥