देवी भागवत उत्तरार्द्ध — पृष्ठ 81–90

देवी भागवत उत्तरार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 81–90

पृष्ठ 81

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७२ अहमप्यति वामोरु पीडितः क्षुधया वने प्रविष्टश्चौरभावेन कुत्रचिच्छ्वपचालये श्वपचं निद्रितं दृष्ट्वा क्षुधया पीडितो भृशम् महानसं परिज्ञाय भक्ष्यार्थं समुपस्थितः यदा भाण्डं समुद्घाट्य पक्वं श्वतनुजामिषम् गृह्णामि भक्षणार्थाय तदा दृष्टस्तु तेन वै पृष्टः कस्त्वं कथं प्राप्तो गृहे मे निशि सादरम् । ब्रूहि कार्यं किमर्थं त्वमुद्घाटयसि भाण्डकम् इत्युक्तः श्वपचेनाहं क्षुधया पीडितो भृशम् तमवोचं सुकेशान्ते कामं गद्गदया गिरा ॥

ब्राह्मणोऽहं महाभाग तापसः क्षुधयार्दितः ।

चौरभावमनुप्राप्तो भक्ष्यं पश्यामि भाण्डके ॥

चौरभावेन सम्प्राप्तोऽस्म्यतिथिस्ते महामते ।

क्षुधितोऽस्मि ददस्वाज्ञां मांसमद्मि सुसंस्कृतम् ॥

विश्वामित्र उवाच

श्वपचस्तु वचः श्रुत्वा मामुवाच सुनिश्चितम् ।

भक्षं मा कुरु वर्णाग्र्य जानीहि श्वपचालयम् ॥

दुर्लभं खलु मानुष्यं तत्रापि च द्विजन्मता ।

द्विजत्वे ब्राह्मणत्वं च दुर्लभं वेत्सि किं न हि ॥

दुष्टाहारो न कर्तव्यः सर्वथा लोकमिच्छता ।

अग्राह्या मनुना प्रोक्ताः कर्मणा सप्त चान्त्यजाः ॥

त्याज्योऽहं कर्मणा विप्र श्वपचो नात्र संशयः । निवारयामि भक्ष्यात्त्वां न लोभेनाञ्जसा द्विज । वर्णसङ्करदोषोऽयं मा यातु त्वां द्विजोत्तम । श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १३ । हे सुजघने! वनमें एक दिन मैं भी भूखसे ॥ १० अत्यधिक विकल होकर चोरकी भाँति एक चाण्डालके घरमें प्रविष्ट हुआ । वहाँ चाण्डालको सोया हुआ । देखकर भूखसे अत्यन्त व्याकुल मैं रसोईघर खोजकर ॥ ११ कुछ खानेके लिये उसमें पहुँच गया॥१०-११ ॥ बर्तन खोलकर भोजन प्राप्त करनेके लिये मैंने । ज्यों ही बर्तनमें हाथ डाला, तभी उस चाण्डालने मुझे देख लिया । उसने आदरपूर्वक मुझसे पूछा -आप ॥ १२ कौन हैं? रातके समय मेरे घरमें आप क्यों प्रविष्ट हुए हैं और मेरे बर्तनको क्यों खोल रहे हैं? आप अपना उद्देश्य बताइये ॥ १२-१३ ॥ ॥ १३ हे सुन्दर केशोंवाली! चाण्डालके यह पूछनेपर क्षुधा अत्यधिक पीड़ित मैं गद्गद वाणीमें उससे कहने । लगा — हे महाभाग! मैं एक तपस्वी ब्राह्मण हूँ । मैं १४ भूखसे विकल होकर चोरीके विचारसे युक्त होकर यहाँ आया हूँ और इस बर्तनमें कोई खानेकी वस्तु देख रहा हूँ । हे महामते! चोरीके विचारसे यहाँ आया हुआ मैं १५ । आपका अतिथि हूँ । इस समय मैं भूखा हूँ । अतः आप मुझे आज्ञा दीजिये, जिससे मैं आपके द्वारा भलीभाँति पकाये गये पदार्थका भक्षण करूँ ॥ १४ - १६ ॥ १६ विश्वामित्र बोले - [ हे सुन्दरि! ] मेरी बात सुनकर चाण्डालने मुझसे कहा- हे चारों वर्णोंमें अग्रगण्य! इसे चाण्डालका घर जानिये, अतः आप मेरे यहाँ भोजन मत कीजिये; क्योंकि एक तो मानव-योनिमें जन्म पाना दुर्लभ है, उसमें भी द्विज ( ब्राह्मण, १७ क्षत्रिय तथा वैश्य ) - के यहाँ बड़ा ही दुर्लभ है । द्विजोंमें भी ब्राह्मण- कुलमें जन्म तो सर्वथा दुर्लभ है । क्या आप इसे नहीं जानते हैं? उत्तम लोककी कामना १८ करनेवाले व्यक्तिको कभी भी दूषित आहार ग्रहण नहीं करना चाहिये । भगवान् मनुने कर्मानुसार सात जातियोंको अन्त्यज मानकर उन्हें अग्राह्य बतलाया १ ९ है । हे विप्र! मैं चाण्डाल हूँ, अतः अपने कर्मके अनुसार त्याज्य हूँ; इसमें कोई सन्देह नहीं है । हे द्विज! मैं अपना धर्म समझकर ही आपको भोजन २० करनेसे रोक रहा हूँ, न कि [ अपने पदार्थके ] लोभसे । हे द्विजवर! वर्णसंकरताका दोष आपको न लगे,

केवल यही मेरा अभिप्राय है । १७ – २०१३ ॥

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अ ० १३ ] विश्वामित्र उवाच सत्यं वदसि धर्मज्ञ मतिस्ते विशदान्त्यज ॥

तथाप्यापदि धर्मस्य सूक्ष्ममार्गं ब्रवीम्यहम् ।

देहस्य रक्षणं कार्यं सर्वथा यदि मानद ॥

पापस्यान्ते पुनः कार्यं प्रायश्चित्तं विशुद्धये ।

दुर्गतिस्तु भवेत्पापादनापदि न चापदि ॥

मरणात्क्षुधितस्याथ नरको नात्र संशयः ।

तस्मात्क्षुधापहरणं कर्तव्यं शुभमिच्छता ॥

तेनाहं चौर्यधर्मेण देहं रक्षेऽप्यथान्त्यज ।

अवर्षणे च चौर्येण यत्पापं कथितं बुधैः ॥

यो न वर्षति पर्जन्यस्तत्तु तस्मै भविष्यति । विश्वामित्र उवाच इत्युक्ते वचने कान्ते पर्जन्यः सहसापतत् ॥ गगनाद्धस्तिहस्ताभिर्धाराभिरभिकाङ्क्षितः मुदितोऽहं घनं वीक्ष्य वर्षन्तं विद्युता सह तदाहं तद्गृहं त्यक्त्वा निःसृतः परया मुदा कथय त्वं वरारोहे कालो नीतस्त्वया कथम् कान्तारे परमः क्रूरः क्षयकृत्प्राणिनामिह व्यास उवाच इति तस्य वचः श्रुत्वा पतिमाह प्रियंवदा ॥

यथा शृणु मया नीतः कालः परमदारुणः ।

गते त्वयि मुनिश्रेष्ठ दुर्भिक्षं समुपागतम् ॥

अन्नार्थं पुत्रकाः सर्वे बभूवुश्चातिदुःखिताः क्षुधितान्बालकान्वीक्ष्य नीवारार्थं वने वने भ्रान्ताहं चिन्तयाविष्टा किञ्चित्प्राप्तं फलं तदा एवं च कतिचिन्मासा नीवारेणातिवाहिताः सप्तम स्कन्ध ७३ विश्वामित्र बोले- हे धर्मज्ञ! तुम सत्य कह २१ रहे हो । हे अन्त्यज! तुम्हारी बुद्धि अत्यन्त विशाल है, फिर भी मैं तुम्हें आपत्तिकालमें पालनीय धर्मका सूक्ष्म मार्ग बता रहा हूँ ॥ २१३ ॥

२२ हे मानद! मनुष्यको चाहिये कि जिस किसी भी उपायसे शरीरकी रक्षा करे । इसमें यदि कोई पाप हो जाय, तो बादमें पापसे मुक्ति के लिये प्रायश्चित्त कर २३ लेना चाहिये । आपत्तिकालमें किये गये पापकर्मके कारण दुर्गति नहीं होती, किंतु सामान्य समयमें किये गये पापके कारण दुर्गति अवश्य होती है । २२-२३ ॥ २४ भूख से मरनेवालेको नरक होता है, इसमें सन्देह नहीं है । अत: अपने कल्याणकी इच्छा रखनेवालेको भूख मिटानेका प्रयत्न करना चाहिये । हे अन्त्यज! २५ इसीलिये मैं भी चौर - कर्मसे अपने देहकी रक्षा कर रहा हूँ । विद्वानोंने कहा है कि अनावृष्टिके समय चोरी करनेसे जो पाप होता है, वह पाप उस मेघको लगता

है, जो पानी नहीं बरसाता है । २४ - २५३ ॥

२६ विश्वामित्र बोले - – हे प्रिये! मेरे ऐसा यह वचन कहते ही आकाशसे हाथीकी सूँड़की तरह मोटी । धारवाली मनोभिलषित जलवृष्टि सहसा होने लगी । ॥ २७ । बिजलीकी चमकके साथ बरसते हुए मेघको देखकर मैं अत्यन्त आनन्दित हुआ ॥ २६-२७ ॥ । उसी समय उस चाण्डालका घर छोड़कर मैं ॥ २८ परम प्रसन्नतापूर्वक बाहर निकल पड़ा । हे सुन्दरि! अब यह बताओ कि तुमने प्राणियोंका विनाश । करनेवाले उस अत्यन्त भीषण समयको इस वनमें किस प्रकार बिताया? ॥ २८३ ॥

२ ९ व्यासजी बोले – [ हे राजन्! ] पतिकी यह बात सुनकर उस प्रियभाषिणी स्त्रीने पति से कहा-मुनिश्रेष्ठ! मैंने जिस प्रकार उस अत्यन्त कष्टकारी ३० समयको व्यतीत किया, उसे आप सुनिये । आपके चले जानेके बाद यहाँ अकाल पड़ गया था । मेरे सभी । पुत्र अन्नके लिये बड़े दुःखित हुए ॥ २ ९ -३०३ ॥ ॥ ३१ बालकोंको भूखा देखकर घोर चिन्तासे ग्रस्त मैं नीवार ( जंगली धान्य ) - के लिये वन - वन घूमती रही ॥ उस समय मुझे कुछ फल मिल गये । इस प्रकार नीवार ॥ ३२ । अन्नके द्वारा मैंने कुछ महीने व्यतीत किये ॥ ३१-३२ ॥

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७४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १३

तदभावे मया कान्त चिन्तितं मनसा पुनः ।

भिक्षा किल दुर्भिक्षे नीवारा नापि कानने ॥

न वृक्षेषु फलान्यासुर्न मूलानि धरातले ।

क्षुधा पीडिता बाला रुदन्ति भृशमातुराः ॥

किं करोमि क्व गच्छामि किं ब्रवीमि क्षुधार्दितान् ।

एवं विचिन्त्य मनसा निश्चयस्तु मया कृतः ॥

पुत्रमेकं ददाम्यद्य कस्मैचिद्धनिने किल ।

गृहीत्वा तस्य मौल्यं तु तेन द्रव्येण बालकान् ॥

पालयेऽहं क्षुधार्तांस्तु नान्योपायोऽस्ति पालने ।

इति सञ्चिन्त्य मनसा पुत्रोऽयं प्रहितो मया ॥

विक्रयार्थं महाभाग क्रन्दमानो भृशातुरः ।

क्रन्दमानं गृहीत्वैनं निर्गताहं गतत्रपा ॥

तदा सत्यव्रतो मार्गे मामुद्वीक्ष्य भृशातुराम् ।

पप्रच्छ स च राजर्षिः कस्माद्रोदिति बालकः ॥

तदाहं तमुवाचेदं वचनं मुनिसत्तम ।

विक्रयार्थं नीयतेऽसौ बालकोऽद्य मया नृप ॥

श्रुत्वा मे वचनं राजा दयार्द्रहृदयस्ततः ।

मामुवाच गृहं याहि गृहीत्वैनं कुमारकम् ॥

भोजनार्थे कुमाराणामामिषं विहितं तव ।

प्रापयिष्याम्यहं नित्यं यावन्मुनिसमागमः ॥

अहन्यहनि भूपालो वृक्षेऽस्मिन्मृगसूकरान् ।

विन्यस्य याति हत्वासौ प्रत्यहं दययान्वितः ॥

तेनैव बालकाः कान्त पालिता वृजिनार्णवात् ।

वसिष्ठेनाथ शप्तोऽसौ भूपतिर्मम कारणात् ॥

हे कान्त! उसके भी समाप्त हो जानेपर मैं मन-३३ ही - मन पुनः सोचने लगी- ' इस वनमें अब नीवारान भी नहीं मिल रहा है और इस अकालमें भिक्षा भी नहीं मिल सकती । वृक्षोंपर फल नहीं रह गये और ३४ धरतीमें कन्दमूल भी नहीं रहे । भूखसे पीड़ित बालक व्याकुल होकर बहुत रो रहे हैं । अब मैं क्या करूँ. कहाँ जाऊँ और भूखसे तड़पते हुए इन बालकोंसे क्या कहूँ'॥३३-३४३ ॥ ३५ ऐसा सोचकर मैंने मनमें यही निश्चय किया कि किसी धनी व्यक्तिके हाथ आज अपने एक पुत्रको बेचूँगी और उसका मूल्य लेकर उस द्रव्यसे ३६ भूखसे पीड़ित अपने बालकोंका पालन करूँगी: क्योंकि इनके पालन - पोषणका कोई दूसरा उपाय नहीं रह गया है॥३५-३६१ ॥ ३७ अपने मनमें यह विचार करके मैंने इस पुत्रको बेचनेका दृढ़ निश्चय कर लिया । हे महाभाग! उस समय मेरा यह पुत्र व्याकुल होकर जोर - जोरसे ३८ | रोने - चिल्लाने लगा, किंतु मैं निर्लज्ज होकर अपने रोते - चिल्लाते इस पुत्रको लेकर घरसे निकल पड़ी ॥ ३७-३८ ॥ ३ ९ उस समय राजर्षि सत्यव्रतने मार्गमें मुझ अति व्याकुल चित्तवालीको देखकर पूछा कि यह बालक

क्यों रो रहा है? ॥। ३ ९ ॥

४० हे मुनिवर! तब मैंने उनसे यह वचन कहा— हे राजन्! मैं इस बालकको आज बेचनेके लिये ले जा रही हूँ ॥४० ॥

४१ तब मेरी बात सुनकर राजाका हृदय दयासे भर गया और उन्होंने मुझसे कहा - ' तुम इस बालकको लेकर अपने घर लौट जाओ । जबतक मुनि विश्वामित्र लौटकर आ नहीं जाते, तबतक तुम्हारे इन बालकोंके ४२ भोजनके लिये सामग्री प्रतिदिन तुम्हारे यहाँ पहुँचा दिया करूँगा ' ॥ ४१-४२ ॥ तभी दयालु राजा सत्यव्रत प्रतिदिन कुछ ४३ भोज्य - सामग्री इस पेड़पर रखकर चले जाते थे ॥ ४३ ॥

हे कान्त! उन्होंने ही संकटके सागरसे इन बालकोंकी रक्षा की, किंतु मेरे ही कारण राजा सत्यव्रतको मुनि ४४ । वसिष्ठके शापका भागी होना पड़ा ॥४४ ॥

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अ ० १३ ]

कस्मिंश्चिद्दिवसे मांसं न प्राप्तं तेन कानने ।

हता दोग्ध्री वसिष्ठस्य तेनासौ कुपितो मुनिः ॥

त्रिशङ्कुरिति भूपस्य कृतं नाम महात्मना ।

कुपितेन वधाद्धेतोश्चाण्डालश्च कृतो नृपः ॥

तेनाहं दुःखिता जाता तस्य दुःखेन कौशिक ।

श्वपचत्वमसौ प्राप्तो मत्कृते नृपनन्दनः ॥

येन केनाप्युपायेन भवता नृपतेः किल ।

तस्माद्रक्षा प्रकर्तव्या तपसा प्रबलेन ह ॥

व्यास उवाच

इति भार्यावचः श्रुत्वा कौशिको मुनिसत्तमः ।

तामाह कामिनीं दीनां सान्त्वपूर्वमरिन्दम ॥

विश्वामित्र उवाच

मोचयिष्यामि तं शापान्नृपं कमललोचने ।

उपकारः कृतो येन कान्ताराद्रक्षितासि वै ॥

विद्यातपोबलेनाहं करिष्ये दुःखसंक्षयम् ।

इत्याश्वास्य प्रियां तत्र कौशिकः परमार्थवित् ॥

चिन्तयामास नृपतेः कथं स्याद्दुःखनाशनम् ।

संविमृश्य मुनिस्तत्र जगाम यत्र पार्थिवः ॥

त्रिशङ्कुः पक्वणे दीनः संस्थितः श्वपचाकृतिः ।

आगच्छन्तं मुनिं दृष्ट्वा विस्मितोऽसौ नराधिपः ॥

दण्डवन्निपपातोर्व्यां पादयोस्तरसा मुनेः ।

गृहीत्वा तं करे भूपं पतितं कौशिकस्तदा ॥

उत्थाप्योवाच वचनं सान्त्वपूर्वं द्विजोत्तमः ।

मत्कृते त्वं महीपाल शप्तोऽसि मुनिना यतः ॥

वाञ्छितं ते करिष्यामि ब्रूहि किं करवाण्यहम् । सप्तम स्कन्ध ७५ किसी दिन राजा सत्यव्रत जंगलमें कोई सामग्री ४५ नहीं पा सके । तब उन्होंने वसिष्ठजीकी दूध देनेवाली गाय मार डाली; इससे मुनि वसिष्ठ उनपर बहुत कुपित हुए ॥ ४५ ॥

४६ कुपित महात्मा वसिष्ठने राजाका नाम ' त्रिशंकु ' रख दिया और गोवध करनेके कारण राजाको चाण्डाल बना दिया ॥ ४६ ॥

हे कौशिक! उनके इसी कष्टसे मैं अत्यन्त ४७ दुःखित हूँ; क्योंकि मेरे ही कारण वे राजकुमार सत्यव्रत चाण्डाल हो गये हैं । इसलिये अब आपको जिस किसी भी उपायसे; यहाँतक कि अपनी उग्र ४८ तपस्याके प्रभावसे राजाकी रक्षा चाहिये ॥ ४७-४८ ॥ व्यासजी बोले- हे शत्रुका ४ ९ [ राजा जनमेजय ]! अपनी पत्नीकी मुनिश्रेष्ठ विश्वामित्र उस दुःखित देते हुए कहने लगे ॥ ४ ९ ॥ अवश्य करनी दमन करनेवाले यह बात सुनकर स्त्रीको सान्त्वना विश्वामित्र बोले- हे कमलनयने! जिन्होंने ५० तुम्हारा उपकार किया है और घोर वनमें तुम्हारी रक्षा की है, उन राजा सत्यव्रतको मैं शापमुक्त अवश्य करूँगा । मैं अपनी योगविद्या तथा तपस्याके प्रभावसे ५१ उनका दुःख दूर कर दूँगा ॥५०३ परमतत्त्ववेत्ता विश्वामित्रजी इस तरह आश्वस्त करके सोचने सत्यव्रतका दुःख किस प्रकार दूर ५२ तब भलीभाँति विचार करके मुनि स्थानपर गये, जहाँ राजा सत्यव्रत ॥ अपनी भार्याको लगे कि राजा हो सकता है? विश्वामित्र उस ( त्रिशंकु ) दीन अवस्थाको प्राप्त होकर चाण्डालके रूपमें एक ५३ कुटियामें रह रहे थे ॥ ५१-५२३ ॥ मुनिको आते देखकर राजा त्रिशंकु विस्मयमें पड़ गये । वे तत्काल मुनिके चरणोंपर दण्डकी भाँति ५४ गिर पड़े । तब भूमिपर पड़े हुए राजाको हाथसे पकड़कर द्विजश्रेष्ठ विश्वामित्रने उठाया और उन्हें सान्त्वना देते हुए यह वचन कहा - ' हे राजन्! मेरे ही कारण ५५ वसिष्ठमुनिने आपको शाप दिया है, अतः मैं आपकी सारी कामना पूर्ण करूँगा । अब आप बताइये कि मैं आपका कौन - सा कार्य करूँ? ' ॥ ५३ - ५५३ ॥

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७६ राजोवाच मया सम्प्रार्थितः पूर्वं वसिष्ठो मखहेतवे मां याजय मुनिश्रेष्ठ करोमि मखमुत्तमम् यथेष्टं कुरु विप्रेन्द्र यथा स्वर्गं व्रजाम्यहम् अनेनैव शरीरेण शक्रलोकं सुखालयम् कोपं कृत्वा वसिष्ठोऽसौ मामाहेति सुदुर्मते मानुषेण हि देहेन स्वर्गवासः कुतस्तव पुनर्मयोक्तो भगवान्स्वर्गलुब्धेन चानघ अन्यं पुरोहितं कृत्वा यक्ष्येऽहं यज्ञमुत्तमम् । तदा तेनैव शप्तोऽहं चाण्डालो भव पामर इत्येतत्कथितं सर्वं कारणं शापसम्भवम् । श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १४ राजा बोले- पूर्वकालमें मैंने यज्ञ कराने के ॥ ५६ लिये वसिष्ठजीसे यह प्रार्थना की थी - हे मुनिश्रेष्ठ! मैं महान् यज्ञ करना चाहता हूँ, अतः आप मुझसे । यज्ञ सम्पन्न कराइये । हे विप्रेन्द्र! आप मेरा यह ॥ ५७ अभीष्ट कार्य कीजिये, जिससे मैं स्वर्ग चला जाऊँ; मैं इसी मानव - देहसे सुखोंके निधान इन्द्रलोक जाना । चाहता हूँ॥५६-५७३ ॥ ॥ ५८ इसपर वसिष्ठमुनिने क्रोधित होकर मुझसे कहा-अरे दुर्बुद्धि! इस मानवशरीरसे तुम्हारा स्वर्गमें वास । कैसे हो सकता है? ॥ ५८३ ॥

॥ ५ ९ तब स्वर्गकी उत्कट लालसावाले मैंने भगवान् वसिष्ठसे पुनः कहा- हे निष्पाप! तब मैं किसी अन्यको पुरोहित बनाकर वह श्रेष्ठ यज्ञ आरम्भ करूँगा । उसी समय उन्होंने मुझे यह शाप दे दिया ॥ ६० ' हे नीच! तुम चाण्डाल हो जाओ ' ॥ ५ ९ -६० ॥ हे मुनीश्वर! इस प्रकार मैंने शाप पानेका सारा कारण आपसे कह दिया । अब एकमात्र आप ही मेरा मम दुःखविनाशाय समर्थोऽसि मुनीश्वर ॥ ६१ दुःख दूर करनेमें समर्थ हैं ॥६१ ॥

कष्टकी पीड़ासे व्यथित राजा त्रिशंकु इतना इत्युक्त्वा विररामासौ राजा दुःखरुजार्दितः । कहकर चुप हो गये और विश्वामित्रजी भी उनके कौशिकोऽपि निराकर्तुं शापं तस्य व्यचिन्तयत् ॥ ६२ | शापको दूर करनेका उपाय सोचने लगे ॥ ६२ ॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां सप्तमस्कन्धे त्रिशङ्कुशापोद्धाराय विश्वामित्रसान्त्वनवर्णनं नाम त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥

अथ चतुर्दशोऽध्यायः विश्वामित्रका सत्यव्रत ( त्रिशंकु आराधनासे राजा व्यास उवाच विचिन्त्य मनसा कृत्यं गाधिसूनुर्महातपाः प्रकल्प्य यज्ञसम्भारान्मुनीनामन्त्रयत्तदा मुनयस्तं मखं ज्ञात्वा विश्वामित्रनिमन्त्रिताः नागताः सर्व एवैते वसिष्ठेन निवारिताः ) - को सशरीर स्वर्ग भेजना, वरुणदेवकी हरिश्चन्द्रको पुत्रकी प्राप्ति व्यासजी बोले- हे राजन्! महातपस्वी गाधिपुत्र । विश्वामित्रने यज्ञानुष्ठानका विचार करके यज्ञसम्बन्धी ॥ १ सामग्रियाँ जुटाकर सभी मुनियोंको निमन्त्रित किया । तत्पश्चात् विश्वामित्रके द्वारा निमन्त्रित किये गये मुनिगण उस यज्ञके बारेमें जानकर भी वहाँ नहीं । आये; क्योंकि वसिष्ठजीने उन सबको आनेसे मना ॥ २ कर दिया था ॥ १-२ ॥

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अ ० १४ ] सप्तम स्कन्ध ७७

गाधिसूनुस्तदाज्ञाय विमनाश्चातिदुःखितः ।

आजगामाश्रमं तत्र यत्रासौ नृपतिः स्थितः ॥

तमाह कौशिकः क्रुद्धो वसिष्ठेन निवारिताः । नागता ब्राह्मणाः सर्वे यज्ञार्थं नृपसत्तम

पश्य मे तपसः सिद्धिं यथा त्वां सुरसद्मनि ।

प्रापयामि महाराज वाञ्छितं ते करोम्यहम् ॥

इत्युक्त्वा जलमादाय हस्तेन मुनिसत्तमः ।

ददौ पुण्यं तदा तस्मै गायत्रीजपसम्भवम् ॥

दत्त्वाथ सुकृतं राज्ञे तमुवाच महीपतिम् । यथेष्टं गच्छ राजर्षे त्रिविष्टपमतन्द्रितः पुण्येन मम राजेन्द्र बहुकालार्जितेन च । याहि शक्रपुरीं प्रीतः स्वस्ति तेऽस्तु सुरालये व्यास उवाच

इत्युक्तवति विप्रेन्द्रे त्रिशङ्कुस्तरसा ततः ।

उत्पपात यथा पक्षी वेगवांस्तपसो बलात् ॥

उत्पत्य गगने राजा गतः शक्रपुरीं यदा ।

दृष्टो देवगणैस्तत्र क्रूरश्चाण्डालवेषभाक् ॥

कथितोऽसौ सुरेन्द्राय कोऽयमायाति सत्वरः ।

गगने देववद्वा यो दुर्दर्शः श्वपचाकृतिः ॥

सहसोत्थाय शक्रस्तमपश्यत्पुरुषाधमम् ।

ज्ञात्वा त्रिशङ्कुमपि स निर्भर्त्स्य तरसाब्रवीत् ॥

श्वपच क्व समायासि देवलोके जुगुप्सितः ।

याहि शीघ्रं ततो भूमौ नात्र स्थातुं त्वयोचितम् ॥

इत्युक्तः स्खलितः स्वर्गाच्छक्रेणामित्रकर्शन ।

निपपात तदा राजा क्षीणपुण्यो यथामरः ॥

यह जानकर गाधिपुत्र विश्वामित्र खिन्नमनस्क ३ तथा अतिदुःखित हुए और उस आश्रम में आये, जहाँ राजा [ त्रिशंकु ] विराजमान थे ॥ ३ ॥

कुपित विश्वामित्रने उन त्रिशंकुसे कहा- - हे नृपश्रेष्ठ! ॥ ४ । वसिष्ठजीके मना कर देनेके कारण सभी ब्राह्मण तो यज्ञमें नहीं आये, किंतु हे महाराज! मेरे तपका वह प्रभाव देखिये, जिससे मैं आपको अभी सुरलोक पहुँचाता ५ हूँ और आपकी अभिलाषा पूरी करता हूँ ॥ ४-५ ॥ यह कहकर मुनिश्रेष्ठ विश्वामित्रने हाथमें जल लेकर गायत्रीजपसे अर्जित अपना समस्त पुण्य उन्हें ६ दे दिया ॥ ६ ॥

राजाको अपना पुण्य देकर विश्वामित्रने उन पृथ्वीपति से कहा - हे राजर्षे! अब आप अपने ॥ ७ अभीष्ट स्वर्गलोकको जाइये । हे राजेन्द्र! बहुत दिनोंसे मेरे द्वारा अर्जित किये गये पुण्यसे अब आप प्रसन्नतापूर्वक इन्द्रलोक जायँ और वहाँ देवलोकमें ॥ ८ आपका कल्याण हो ॥ ७-८ ॥ व्यासजी बोले – [ हे राजन्! ] विप्रेन्द्र विश्वामित्रके इतना कहते ही राजा त्रिशंकु मुनिके तपोबलसे बड़े वेगसे उड़नेवाले पक्षीकी भाँति तुरंत ऊपरकी ओर उड़े ॥ ९ ॥

आकाशमें उड़कर जब राजा त्रिशंकु इन्द्रपुरी पहुँचे, तब सभी देवताओंने देखा कि चाण्डालवेषधारी १० कोई क्रूर व्यक्ति चला आ रहा है । तत्पश्चात् उन लोगोंने इन्द्रसे पूछा कि चाण्डालके समान आकृतिवाला तथा दुर्दर्श यह कौन व्यक्ति देवताकी भाँति आकाशमार्गसे ११ बड़े वेगसे चला आ रहा है? ॥१०-११ ॥ तब इन्द्रने सहसा उठकर उस अधम पुरुषकी ओर देखा । उसे त्रिशंकुके रूपमें पहचानकर तत्काल १२ डाँटते हुए इन्द्र कहने लगे — हे चाण्डाल! घृणित कर्मवाले तुम देवलोकमें कहाँ चले आ रहे हो! तुम अभी पृथ्वीलोकको लौट जाओ; क्योंकि तुम्हारे लिये यहाँ निवास करना सर्वथा उचित नहीं है ॥ १२-१३ ॥ १३ [ व्यासजी बोले- ] हे शत्रुओंका दमन करनेवाले जनमेजय! इन्द्रके ऐसा कहते ही त्रिशंकु स्वर्गसे वैसे ही नीचे गिरने लगे, जैसे पुण्यके क्षीण १४ । होनेपर देवताओंका स्वर्गसे पतन हो जाता है ॥ १४ ॥

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७८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १४

पुनश्चुक्रोश भूपालो विश्वामित्रेति चासकृत् ।

पतामि रक्ष दुःखार्तं स्वर्गाच्चलितमाशुगम् ॥

तस्य तत्क्रन्दितं राजन् पततः कौशिको मुनिः ।

श्रुत्वा तिष्ठेति होवाच पतन्तं वीक्ष्य भूपतिम् ॥

वचनात्तस्य तत्रैव स्थितोऽसौ गगने नृपः ।

मुनेस्तपः प्रभावेण चलितोऽपि सुरालयात् ॥

विश्वामित्रोऽप्यपः स्पृष्ट्वा चकारेष्टिं सुविस्तराम् ।

विधातुं नूतनां सृष्टिं स्वर्गलोकं द्वितीयकम् ॥

तस्योद्यमं तथा ज्ञात्वा त्वरितस्तु शचीपतिः ।

तत्राजगाम सहसा मुनिं प्रति तु गाधिजम् ॥

किं ब्रह्मन् क्रियते साधो कस्मात्कोपसमाकुलः ।

अलं सृष्ट्या मुनिश्रेष्ठ ब्रूहि किं करवाणि ते ॥

विश्वामित्र उवाच

स्वं निवासं महीपालं च्युतं त्वद्भुवनाद् विभो ।

नयस्व प्रीतियोगेन त्रिशङ्कु चातिदुःखितम् ॥

व्यास उवाच

तस्य तं निश्चयं ज्ञात्वा तुराषाडतिशङ्कितः ।

तपोबलं विदित्वोग्रमोमित्योवाच वासवः ॥

दिव्यदेहं नृपं कृत्वा विमानवरसंस्थितम् ।

आपृच्छ्य कौशिकं शक्रोऽगमन्निजपुरीं तदा ॥

गते शक्रे तु वै स्वर्गं त्रिशङ्कसहिते ततः ।

विश्वामित्रः सुखं प्राप्य स्वाश्रमे सुस्थिरोऽभवत् ॥

हरिश्चन्द्रोऽथ तच्छ्रुत्वा विश्वामित्रोपकारकम् ।

पितुः स्वर्गमनं कामं मुदितो राज्यमन्वशात् ॥

तब राजा त्रिशंकु वहींसे बार - बार चिल्लाने १५ लगे - हे विश्वामित्र! हे विश्वामित्र! मैं स्वर्गसे च्युत होकर बड़े वेगसे नीचेकी ओर गिर रहा हूँ, अतः आप मुझ कष्टपीड़ितकी रक्षा कीजिये ॥ १५ ॥

१६ हे राजन्! गिरते हुए त्रिशंकुका करुणक्रन्दन सुनकर तथा उन्हें नीचेकी ओर गिरते देखकर विश्वामित्रने कहा – ' वहीं रुक जाइये ' ॥ १६ ॥

[ हे राजन्! ] यद्यपि त्रिशंकु देवलोकसे च्युत हो १७ चुके थे तथापि मुनि विश्वामित्रके ऐसा कहते ही उनके तपोबलके प्रभावसे वे त्रिशंकु वहींपर आकाशमें ही स्थित हो गये ॥ १७ ॥

१८ तत्पश्चात् विश्वामित्रने नयी सृष्टिकी रचनाद्वारा दूसरा स्वर्गलोक बनानेके लिये जलका स्पर्श करके एक दीर्घकालीन यज्ञ आरम्भ किया ॥ १८ ॥

१ ९ उनके उस प्रकारके प्रयत्नको जानकर इन्द्र गाधि - पुत्र मुनि विश्वामित्रके पास तुरंत आ पहुँचे । [ इन्द्र बोले— ] हे ब्रह्मन्! आप यह क्या कर रहे हैं? २० हे साधो! आप कुपित क्यों हैं? हे मुनिश्रेष्ठ! आप दूसरी सृष्टि मत कीजिये और बताइये कि मैं आपका कौन - सा कार्य करूँ? ॥ १ ९ -२० ॥ विश्वामित्र बोले- हे विभो! आपके लोकसे च्युत होकर अत्यन्त दुःखमें पड़े हुए राजा त्रिशंकुको २१ आप प्रेमपूर्वक अपने निवास स्थान ( स्वर्गलोक ) -में ले जाइये ॥ २१ ॥

व्यासजी बोले- हे राजन्! विश्वामित्रका वह निश्चय जानकर इन्द्रको बहुत भय हुआ । उन्होंने मुनिका २२ उग्र तपोबल समझकर कहा - ' ठीक है । ' तत्पश्चात् राजाको दिव्य शरीरवाला बनाकर तथा उन्हें एक उत्तम विमानपर बैठाकर इन्द्रने विश्वामित्रसे आज्ञा लेकर अपनी पुरीके लिये प्रस्थान किया ॥ २२-२३ ॥ २३ राजा त्रिशंकुसहित इन्द्रके स्वर्ग चले जाने के उपरान्त विश्वामित्र सुखी होकर अपने आश्रममें निश्चिन्त होकर रहने लगे ॥ २४ ॥

२४ इधर राजा हरिश्चन्द्र मुनि विश्वामित्रके द्वारा किये गये अपने पिताके स्वर्गगमन - सम्बन्धी

उपकारको सुनकर अत्यन्त हर्षित हुए और राज्य-२५ । शासन करने लगे ॥ २५ ॥

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अ ० १४ ]

अयोध्याधिपतिः क्रीडां चकार सह भार्यया ।

रूपयौवनचातुर्ययुक्तया प्रीतिसंयुतः ॥

अतीतकाले युवती न सा गर्भवती ह्यभूत् ।

तदा चिन्तातुरो राजा बभूवातीव दुःखितः ॥

वसिष्ठस्याश्रमं गत्वा प्रणम्य शिरसा मुनिम् ।

अनपत्यत्वजां चिन्तां गुरवे समवेदयत् ॥

दैवज्ञोऽसि भवान्कामं मन्त्रविद्याविशारदः ।

उपायं कुरु धर्मज्ञ सन्ततेर्मम मानद ॥

अपुत्रस्य गतिर्नास्ति जानासि द्विजसत्तम ।

कस्मादुपेक्षसे जानन् दुःखं मम च शक्तिमान् ॥

कलविकास्त्विमे धन्या ये शिशुं लालयन्ति हि ।

मन्दभाग्योऽहमनिशं चिन्तयामि दिवानिशम् ॥

व्यास उवाच इत्याकर्ण्य मुनिस्तस्य निर्वेदमिश्रितं वचः । सञ्चिन्त्य मनसा सम्यक् तमुवाच विधेः सुतः वसिष्ठ उवाच

सत्यं ब्रूषे महाराज संसारेऽस्मिन्न विद्यते ।

अनपत्यत्वजं दुःखं यत्तथा दुःखमद्भुतम् ॥

तस्मात्त्वमपि राजेन्द्र वरुणं यादसां पतिम् ।

समाराधय यत्नेन स ते कार्यं करिष्यति ॥

वरुणादधिको नास्ति देवः सन्तानदायकः ।

तमाराधय धर्मिष्ठ कार्यसिद्धिर्भविष्यति ॥

दैवं पुरुषकारश्च माननीयाविमौ नृभिः ।

उद्यमेन विना कार्यसिद्धिः सञ्जायते कथम् ॥

न्यायतस्तु नरैः कार्य उद्यमस्तत्त्वदर्शिभिः ।

कृते तस्मिन्भवेत्सिद्धिर्नान्यथा नृपसत्तम ॥

सप्तम स्कन्ध ७ ९ अयोध्यापति [ हरिश्चन्द्र ] रूप, यौवन तथा २६ चातुर्यसे सम्पन्न अपनी भार्याके साथ प्रेमपूर्वक विहार करने लगे ॥ २६ ॥

इस प्रकार बहुत समय व्यतीत हो जानेपर भी २७ जब वह युवती रानी गर्भवती नहीं हुई, तब राजा बड़े चिन्तित तथा दु: खी हुए ॥ २७ ॥

इसके बाद वसिष्ठमुनिके आश्रममें जाकर २८ तथा मस्तक झुकाकर उन्हें प्रणाम करनेके पश्चात् उन्होंने सन्तान उत्पन्न न होनेके कारण अपनी चिन्ता व्यक्त करते हुए गुरुसे कहा - हे धर्मज्ञ! हे मानद! २ ९ आप महान् ज्योतिर्विद् तथा मन्त्रविद्याके परम विद्वान् हैं । अतः आप मेरे लिये सन्तानप्राप्तिका कोई उपाय कीजिये ॥ २८-२९ ॥ ३० हे द्विजश्रेष्ठ! आप तो जानते ही हैं कि पुत्रहीनकी गति नहीं होती । मेरे दुःखको जानते हुए तथा [ उसे दूर करनेमें ] समर्थ होते हुए भी आप ३१ उपेक्षा क्यों कर रहे हैं? ॥ ३० ॥

ये गौरैया पक्षी बड़े धन्य हैं, जो अपने शिशुका लालन - पालन कर रहे हैं । मैं ही ऐसा भाग्यहीन हूँ, जो सदा दिन - रात चिन्तित रहता हूँ ॥ ३१ ॥

व्यासजी बोले - [ हे राजन्! ] उनकी व्यथाभरी ॥ ३२ वाणी सुनकर ब्रह्माजीके पुत्र वसिष्ठजी भलीभाँति मनमें विचार करके उनसे कहने लगे ॥ ३२ ॥

वसिष्ठजी बोले – हे महाराज! आप ठीक कह रहे हैं । जो दुःख पुत्र न होनेके कारण होता है, वैसा ३३ अद्भुत दु: ख इस संसारमें नहीं है । अतएव हे राजेन्द्र! आप प्रयत्नपूर्वक जलाधिपति वरुणदेवकी आराधना कीजिये, वे ही आपका कार्य करेंगे ॥ ३३-३४ ॥ ३४ हे धर्मिष्ठ! वरुणदेवसे बढ़कर कोई दूसरा सन्तानदाता देवता नहीं है । इसलिये आप उन्हींकी आराधना कीजिये, इससे आपका प्रयोजन अवश्य ३५ सिद्ध हो जायगा ॥३५ ॥

मनुष्योंको भाग्य तथा पुरुषार्थ – इन दोनोंका आदर करना चाहिये; क्योंकि बिना उद्योग किये ३६ कार्य - सिद्धि कैसे हो सकती है? ॥३६ ॥

हे नृपश्रेष्ठ! तत्त्वदर्शी मनुष्योंको न्यायपूर्वक उद्योग करना चाहिये । वैसा करनेसे सिद्धि अवश्य ३७ मिलती है, अन्यथा नहीं ॥ ३७ ॥

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८० श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १४

इति तस्य वचः श्रुत्वा गुरोरमिततेजसः ।

प्रणम्य निर्ययौ राजा तपसे कृतनिश्चयः ॥

गङ्गातीरे शुभे स्थाने कृतपद्मासनो नृपः ।

ध्यायन्पाशधरं चित्ते चचार दुश्चरं तपः ॥

एवं तपस्यतस्तस्य प्रचेता दृष्टिगोचरः ।

कृपयाभून्महाराज प्रसन्नमुखपङ्कजः ॥

हरिश्चन्द्रमुवाचेदं वचनं यादसां पतिः ।

वरं वरय धर्मज्ञ तुष्टोऽस्मि तपसा तव ॥

राजोवाच

अनपत्योऽस्मि देवेश पुत्रं देहि सुखप्रदम् ।

ऋणत्रयापहारार्थमुद्यमोऽयं मया कृतः ॥

नृपस्य वचनं श्रुत्वा प्रगल्भं दुःखितस्य च ।

स्मितपूर्वं ततः पाशी तमाह पुरतः स्थितम् ॥

वरुण उवाच

पुत्रो यदि भवेद्राजन् गुणी मनसि वाञ्छितः ।

सिद्धे कार्ये ततः पश्चात्किं करिष्यसि मे प्रियम् ॥

यदि त्वं तेन पुत्रेण मां यजेथा विशङ्कितः ।

पशुबन्धेन तेनैव ददामि नृपते वरम् ॥

राजोवाच

देव मे मास्तु वन्ध्यत्वं यजिष्येऽहं जलाधिप ।

पशुं कृत्वा सुतं पुत्रं सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥

वन्ध्यत्वे परमं दुःखमसह्यं भुवि मानद ।

शोकाग्निशमनं नृणां तस्माद्देहि सुतं शुभम् ॥

वरुण उवाच

भविष्यति सुतः कामं राजन् गच्छ गृहाय वै ।

सत्यं तद्वचनं कार्यं यद् ब्रवीषि ममाग्रतः ॥

अपरिमित तेजवाले उन गुरु वसिष्ठकी यह बात ३८ सुनकर राजा हरिश्चन्द्रने तप करनेका निश्चय किया और गुरुको प्रणाम करके वे निकल पड़े ॥ ३८ ॥

राजा हरिश्चन्द्र गंगानदीके तटपर एक शुभ ३ ९ स्थानमें पद्मासन लगाकर बैठ गये और अपने मनमें पाशधारी वरुणदेवका ध्यान करते हुए कठोर तप करने लगे ॥३ ९ ॥ हे महाराज! इस प्रकारका तप करनेवाले उन ४० [ राजा हरिश्चन्द्र ] | - - पर कृपा करके प्रसन्न मुख -कमलवाले वरुणदेव उनके सम्मुख प्रकट हो गये । जलाधिपति वरुणदेवने हरिश्चन्द्रसे यह वचन कहा— ४१ हे धर्मज्ञ! आपके तपसे मैं प्रसन्न हूँ, आप मुझसे वर

माँगिये । ४०-४१ ॥

राजा बोले- हे देवेश! मैं सन्तानहीन हूँ, अतः ४२ आप मुझे सुखदायक पुत्र दीजिये । मैंने देव -ऋण, ऋषि ऋण और पितृ ऋण - इन तीनों ऋणोंसे मुक्त होनेके लिये यह [ तपरूप ] उद्यम किया है ॥ ४२ ॥

४३ तब दुःखित राजाका यह प्रगल्भ वचन सुनकर वरुणदेव अपने सम्मुख स्थित राजा हरिश्चन्द्रसे मुसकराते हुए कहने लगे ॥ ४३ ॥

वरुण बोले- हे राजन्! यदि आपको मनोवांछित ४४ गुणवान् पुत्र उत्पन्न हो तब मनोरथ पूरा हो जानेके पश्चात् आप मेरा कौन - सा प्रिय कार्य करेंगे? ॥ ४४ ॥

हे राजन्! यदि आप शंकारहित भावसे उस ४५ पुत्रको बलिपशु बनाकर मेरा यज्ञ करें, तो मैं आपको वर प्रदान करूँगा ॥४५ ॥

राजा बोले — हे देव! मैं सन्तानहीन न रहूँ । हे जलाधिप! मैं उस पुत्रको बलिपशु बनाकर आपका यज्ञ करूँगा । मैं आपसे यह सत्य कह रहा हूँ । हे ४६ मानद! इस पृथ्वीलोकमें मनुष्योंके लिये सन्तान न होनेका दुःख अत्यन्त असह्य होता है, अतः आप मुझे कल्याणकारी तथा मेरी शोकाग्निको शान्त करनेवाला ४७ पुत्र प्रदान कीजिये ॥। ४६-४७ ॥ वरुण बोले – राजन्! आपको अपनी कामनाके अनुकूल पुत्र प्राप्त होगा । अब आप घर लौट जाइये, किंतु अभी मेरे सामने आपने जो वचन कहा है, उसे ४८ । सत्य कीजियेगा ॥ ४८ ॥

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अ ० १५ ] व्यास उवाच इत्युक्तो वरुणेनासौ हरिश्चन्द्रो गृहं ययौ । भार्यायै कथयामास वृत्तान्तं वरदानजम् तस्य भार्याशतं पूर्णं बभूवातिमनोहरम् पट्टराज्ञी शुभा शैव्या धर्मपत्नी पतिव्रता काले गतेऽथ सा गर्भं दधार वरवर्णिनी बभूव मुदितो राजा श्रुत्वा दोहदचेष्टितम् कारयामास विधिवत्संस्कारान्नृपतिस्तदा मासेऽथ दशमे पूर्णे सुषुवे सा शुभे दिने ताराग्रहबलोपेते पुत्रं देवसुतोपमम् पुत्रे जाते नृपः स्नात्वा ब्राह्मणैः परिवेष्टितः चकार जातकर्मादौ ददौ दानानि भूरिशः राज्ञश्चातिप्रमोदोऽभूत्पुत्रजन्मसमुद्भवः बभूव परमोदारो धनधान्यसमन्वितः विशेषदानसंयुक्तो गीतवादित्रसंकुलः सप्तम स्कन्ध ८१ व्यासजी बोले- वरुणदेवके ऐसा कहनेपर राजा हरिश्चन्द्र घर चले गये और वरदान - सम्बन्धी ॥ ४ ९ । सारा वृत्तान्त अपनी रानीसे कहा ॥४ ९ ॥ उनकी एक सौ परम सुन्दर रानियाँ थीं । उनमेंसे । कल्याणी तथा पतिव्रता शैव्या ही उनकी प्रधान धर्मपत्नी तथा पटरानी थीं ॥ ५० ॥

॥ ५० कुछ समय बीतनेपर सुन्दरी शैव्याने गर्भ धारण किया । तब उनकी गर्भकालीन अभिलाषाको सुनकर

राजा परम प्रसन्न हुए ॥ ५१ ॥

॥ ५१

उस समय राजाने विधिपूर्वक [ पुंसवन आदि ] । सभी संस्कार सम्पन्न कराये । दसवाँ महीना पूरा होनेपर रानीने नक्षत्र तथा ग्रहके उत्तम प्रभावसे युक्त ॥ ५२ शुभ दिनमें देवपुत्र के समान कान्तिमान् पुत्रको जन्म । दिया ॥५२३ ॥

॥ ५३ पुत्रके जन्म लेनेपर राजाने ब्राह्मणोंके साथ जाकर स्नान करके सर्वप्रथम बालकका जातकर्म-। संस्कार किया और बहुत दान दिये । पुत्रका जन्म ॥५४ होनेसे राजाको परम प्रसन्नता हुई । उस समय उन्होंने धन - धान्यसे युक्त होकर परम उदारतापूर्वक अनेक । प्रकारके विशिष्ट दान दिये और गीत - वाद्योंके साथ ॥ ५५ | महोत्सव मनाया ॥ ५३–५५ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां सप्तमस्कन्धे वरुणकृपया शैव्यायां पुत्रोत्पत्तिवर्णनं नाम चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥

अथ पञ्चदशोऽध्यायः प्रतिज्ञा पूर्ण न करनेसे वरुणका क्रुद्ध होना और राजा हरिश्चन्द्रको जलोदरग्रस्त होनेका शाप देना व्यास उवाच प्रवृत्ते सदने तस्य राज्ञः राज्ञः पुत्रमहोत्सवे । आजगाम तदा पाशी विप्रवेषधरः शुभः स्वस्तीत्युक्त्वा नृपं प्राह वरुणोऽहं निशामय पुत्रो जातस्तवाधीश यजानेन नृपाशु माम् सत्यं कुरु वचो राजन् यत्प्रोक्तं भवतः पुरा वन्ध्यत्वं तु गतं तेऽद्य वरदानेन मे किल व्यासजी बोले – [ राजा जनमेजय! ] राजा । हरिश्चन्द्रके घरमें पुत्रका जन्मोत्सव मनाया जा रहा ॥ १ था, उसी समय सुन्दर ब्राह्मणका वेष धारण करके वरुणदेव वहाँ आ पहुँचे ॥१ ॥

। 4 ' आपका कल्याण हो ' - ऐसा कहकर उन्होंने राजा हरिश्चन्द्रसे कहा- हे राजन्! मैं वरुणदेव हूँ, मेरी बात ॥ २ सुनिये । हे नृप! आपको पुत्र हो गया है, इसलिये अब इसके द्वारा मेरा यज्ञ कीजिये । हे राजन्! मेरे वरदानसे अब आपकी । सन्तानहीनताका दोष समाप्त हो चुका है, अतः आपने ॥ ३ । जो बात पहले कही है, उसे सत्य कीजिये ॥ २-३ ॥