देवी भागवत उत्तरार्द्ध — पृष्ठ 721–730

देवी भागवत उत्तरार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 721–730

पृष्ठ 721

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७१२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १५ श्रीनारायण उवाच

इति देववचः श्रुत्वा देवं मूर्ध्ना प्रणम्य च ।

तदनुज्ञां समादाय ययौ देवान्तिकं हरिः ॥

तत्सर्वं कथयामास कारणं शङ्करोदितम् ।

साधु साध्विति ते प्रोचुरमरा मौलिचालनैः ॥

शशंसुर्भस्ममाहात्म्यं हरिब्रह्मादयः सुराः ।

पितरश्चैव सन्तुष्टास्तीर्थलाभात्परन्तप ॥

तत्तीर्थतीरे लिङ्गं च देव्या मूर्तिं यथाविधि ।

स्थापयामासुरमराः पूजयामासुरन्वहम् ॥

तत्र ये प्राणिनोऽभूवन्पापभोगार्थमास्थिताः ।

ते विमानं समारुह्य गताः कैलासमण्डलम् ॥

नाम्ना भद्रगणास्ते तु वसन्त्यद्यापि तत्र हि ।

पुनश्च दूरदेशे तु कुम्भीपाको विनिर्मितः ॥

निरुद्धं शैवगमनं देवैस्तत्र तु तद्दिनात् ।

इति ते सर्वमाख्यातं भस्ममाहात्म्यमुत्तमम् ॥

नातः परतरं किञ्चिदधिकं विद्यते मुने ।

ऊर्ध्वपुण्ड्रविधिं चैवाप्यधिकारिविभेदतः ॥

प्रवक्ष्ये मुनिशार्दूल वैष्णवागमलोकनात् ।

ऊर्ध्वपुण्ड्रप्रमाणानि दिव्यान्यङ्गुलिभेदतः ॥

वर्णाभिमन्त्रदेवांश्च प्रवक्ष्यामि फलानि च ।

पर्वताग्रे नदीतीरे शिवक्षेत्रे विशेषतः ॥

सिन्धुतीरे च वल्मीके तुलसीमूलमाश्रिते ।

मृद एतास्तु सङ्ग्राह्या वर्जयेदन्यमृत्तिकाः ॥

श्यामं शान्तिकरं प्रोक्तं रक्तं वश्यकरं भवेत् ।

श्रीकरं पीतमित्याहुर्धर्मदं श्वेतमुच्यते ॥

श्रीनारायण बोले- हे नारद! महादेवजीकी यह बात सुनकर विष्णुजीने सिर झुकाकर उन्हें प्रणाम किया ७० और उनसे आज्ञा लेकर वे देवताओंके पास चले गये । वहाँ पहुँचकर भगवान् विष्णुने शंकरजीद्वारा बतायी गयी समस्त बातें उनसे कहीं, जिसपर वे सभी देवता सिर ७१ हिलाकर ' साधु - साधु'- ऐसा कहने लगे ॥ ७०-७१ ॥ ब्रह्मा, विष्णु आदि देवता भस्मके माहात्म्यकी प्रशंसा करने लगे और हे परंतप! कुम्भीपाकके तीर्थ ७२ हो जानेसे पितरोंको बड़ी प्रसन्नता हुई ॥ ७२ ॥

देवताओंने उस तीर्थके तटपर शिवलिंग तथा देवीकी मूर्तिकी विधिपूर्वक स्थापना की और प्रतिदिन पूजन करने लगे ॥७३ ॥

७३ अपने पापकर्मोंका फल भोगनेके लिये उस कुण्डमें जितने भी जीव थे, वे सब विमानपर आरूढ होकर कैलासमण्डलको चले गये । वे इस समय भी वहाँ भद्रगण ७४ नामसे निवास करते हैं; और फिर वहाँसे दूर अन्य स्थानपर ' कुम्भीपाक ' निर्मित हुआ और उसी दिनसे देवताओंने भस्म तथा त्रिपुण्ड्रधारी शैवोंका कुम्भीपाक नरककुण्ड ७५ जाना निरुद्ध कर दिया ॥ ७४-७५३ ॥ इस प्रकार मैंने आपसे भस्मके उत्तम माहात्म्यका सारा वर्णन कर दिया । हे मुने! इस भस्मसे बढ़कर ७६ अन्य कुछ भी नहीं है ॥ ७६३ ॥

हे मुनिशार्दूल! वैष्णवशास्त्रोंके प्राप्त ज्ञानके अनुसार अब अधिकार - भेदसे ७७ विधिका भी वर्णन करूँगा ॥७७३ ॥

हे मुने! अँगुलिके नापसे दिव्य प्रमाण, उसके रंग, उसके मन्त्र, उसके ७८ उसके फलोंका वर्णन करूँगा ॥ ७८ ॥

इसके लिये पर्वतकी चोटी, नदीके रूपसे शिवक्षेत्र, समुद्रके तट, वल्मीक ( अवलोकनसे ऊर्ध्वपुण्ड्रकी ऊर्ध्वपुण्ड्रके देवता तथा तट, विशेष बाँबी ) और ७ ९ तुलसीके वृक्षकी जड़ - इन्हीं स्थानोंकी मिट्टियोंको लेना चाहिये, इसके अतिरिक्त अन्य मिट्टियाँ नहीं लेनी चाहिये ॥ ७ ९ -८० ॥ ८० श्यामवर्णकी मिट्टी शान्तिदायिनी कही गयी है तथा रक्तवर्णकी मिट्टी वशमें करनेवाली होती है । इसी प्रकार पीली मिट्टी श्रीदायिनी तथा श्वेत मिट्टी धर्मकी ८१ । ओर प्रवृत्त करनेवाली कही गयी है ॥८१ ॥

पृष्ठ 722

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अ ० १५ ] एकादश

अङ्गुष्ठः पुष्टिदः प्रोक्तो मध्यमायुष्करी भवेत् ।

अनामिकान्नदा नित्यं मुक्तिदा च प्रदेशिनी ॥ ८२

एतैरङ्गुलिभेदैस्तु कारयेन्न नखैः स्पृशेत् ।

वर्तिदीपावलिकृतिं वेणुपत्राकृतिं तथा ॥ ८३

पद्मस्य मुकुलाकारं तथा कुर्यात्प्रयत्नतः ।

मत्स्यकूर्माकृतिं वापि शङ्खाकारं ततः परम् ॥ ८४

दशाङ्गुलिप्रमाणं तु उत्तमोत्तममुच्यते ।

नवाङ्गुलं मध्यमं स्यादष्टाङ्गुलमतः परम् ॥ ८५

सप्तषट्पञ्चभिः पुण्ड्रं मध्यमं त्रिविधं स्मृतम् ।

चतुस्त्रिद्व्यङ्गुलैः पुण्ड्रं कनिष्ठं त्रिविधं भवेत् ॥ ८६

ललाटे केशवं विद्यान्नारायणमथोदरे ।

माधवं हृदि विन्यस्य गोविन्दं कण्ठकूपके ॥ ८७

उदरे दक्षिणे पार्श्वे विष्णुरित्यभिधीयते ।

तत्पार्श्वबाहुमध्ये च मधुसूदनमेव च ॥ ८८

त्रिविक्रमं कर्णदेशे वामकुक्षौ तु वामनम् ।

श्रीधरं बाहुके वामे हृषीकेशं तु कर्णके ॥ ८ ९

पृष्ठे च पद्मनाभं तु ककुद्दामोदरं स्मरेत् ।

द्वादशैतानि नामानि वासुदेवेति मूर्धनि ॥ ९ ०

पूजाकाले च होमे च सायं प्रातः समाहितः ।

नामान्युच्चार्य विधिना धारयेदूर्ध्वपुण्ड्रकम् ॥ ९ १ ।

स्कन्ध ७१३ अँगूठा पुष्टि देनेवाला कहा गया है । मध्यमा अँगुली आयु प्रदान करनेवाली है । अनामिका नित्य अन्न देनेवाली तथा तर्जनी मुक्तिदायिनी कही गयी है । अँगुलिभेदसे इन्हींसे ही ऊर्ध्वपुण्ड्र लगाये तथा लगाते समय नखोंसे स्पर्श न करे । दीपककी बत्तीकी लौके आकारका, बाँसके पत्तेके आकारका, कमलकी कलीकी आकृतिका, मत्स्यके आकारका, कछुएके आकारका अथवा शंखके आकारका ऊर्ध्वपुण्ड्र प्रयत्नपूर्वक धारण करना चाहिये ॥ ८२ – ८४ ॥ दस अंगुल परिमाणवाला ऊर्ध्वपुण्ड्र उत्तम कोटिमें उत्तम कहा जाता है । नौ अंगुल परिमाणवाला ऊर्ध्वपुण्ड्र उत्तम कोटिमें मध्यम तथा आठ अंगुल परिमाणवाला ऊर्ध्वपुण्ड्र उत्तम कोटिमें कनिष्ठ होता है ॥ ८५ ॥

इसी प्रकार सात, छ: तथा पाँच अंगुल परिमाणवाला मध्यम कोटिका ऊर्ध्वपुण्ड्र भी [ क्रमशः उत्तम, मध्यम तथा कनिष्ठ ] - तीन प्रकारका कहा गया है और चार, तीन तथा दो अंगुल परिमाणवाला कनिष्ठ कोटिका ऊर्ध्वपुण्ड्र भी [ क्रमशः उत्तम, मध्यम तथा कनिष्ठ ] तीन प्रकारका होता है ॥ ८६ ॥

ललाटके ऊर्ध्वपुण्ड्रको ' केशव ', उदरके ऊर्ध्वपुण्ड्रको ' नारायण ', हृदयके ऊर्ध्वपुण्ड्रको ' माधव ' तथा कण्ठके ऊर्ध्वपुण्ड्रको ' गोविन्द ' जानना चाहिये । उदरके दाहिने पार्श्वमें धारित ऊर्ध्वपुण्ड्रको ' विष्णु ' कहा जाता है । उदरके वाम पार्श्वके ऊर्ध्व-पुण्ड्रको ' मधुसूदन ', कर्णदेशके ऊर्ध्वपुण्ड्रको ' त्रिविक्रम ', वाम कुक्षिके ऊर्ध्वपुण्ड्रको ' वामन ', बायें बाहु ऊर्ध्वपुण्ड्रको ' श्रीधर ', दाहिने कानके ऊर्ध्वपुण्ड्रको ' हृषीकेश ', पीठके ऊर्ध्वपुण्ड्रको ' पद्मनाभ ', ककुद्देश ऊर्ध्वपुण्ड्रको ' दामोदर ' – इन बारह नामोंसे तथा मूर्धाके ऊर्ध्वपुण्ड्रको वासुदेवके रूपमें समझकर उन-उन स्थानोंपर उन उन देवताओंका स्मरण करना चाहिये । इस प्रकार प्रातः कालीन तथा सायंकालीन पूजन तथा हवनके समय शान्तचित्त होकर इन नामोंका उच्चारण करके विधिपूर्वक ऊर्ध्वपुण्ड्र धारण करना चाहिये ॥ ८७ – ९ १ ॥

पृष्ठ 723

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७१४

अशुचिर्वाप्यनाचारो मनसा पापमाचरेत् ।

शुचिरेव भवेन्नित्यं मूर्ध्नि पुण्ड्राङ्कितो नरः ॥

ऊर्ध्वपुण्ड्रधरो मर्त्यो म्रियते यत्र कुत्रचित् ।

श्वपाकोऽपि विमानस्थो मम लोके महीयते ॥

एकान्तिनो महाभागा मत्स्वरूपविदोऽमलाः ।

सान्तरालान्प्रकुर्वन्ति पुण्ड्रान्विष्णुपदाकृतीन् ॥

परमैकान्तिनोऽप्येवं मत्पादैकपरायणाः ।

हरिद्राचूर्णसंयुक्ताञ्छूलाकारांस्तु वामलान् ॥

अन्ये तु वैष्णवाः पुण्ड्रानच्छिद्रानपि भक्तितः ।

प्रकुर्वीरन्दीपपद्मवेणुपत्रोपमाकृतीन् ॥

अच्छिद्रानपि सच्छिद्रान् कुर्युः केवलवैष्णवाः ।

अच्छिद्रकरणे तेषां प्रत्यवायो न विद्यते ॥

एकान्तिनां प्रपन्नानां परमैकान्तिनामपि ।

अच्छिद्रपुण्ड्राकरणे प्रत्यवायो महान्भवेत् ॥

ऊर्ध्वपुण्ड्रं तु यः कुर्याद्दण्डाकारं तु शोभनम् ।

मध्ये छिद्रं वैष्णवाश्च नमोऽन्तैः केशवादिभिः ॥

विमलान्यूर्ध्वपुण्ड्राणि सान्तरालानि यो नरः ।

करोति विपुलं तत्र मन्दिरं मे करोति सः ॥

ऊर्ध्वपुण्ड्रस्य मध्ये तु विशाले सुमनोहरे ॥

लक्ष्म्या साकं सहासीनो रमते विष्णुरव्ययः ॥

निरन्तरालं यः कुर्यादूर्ध्वपुण्ड्रं द्विजाधमः ।

स हि तत्र स्थितं विष्णुं श्रियं चैव व्यपोहति ॥

श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १५ कोई भी अपवित्र, अनाचारी अथवा मनसे भी निरन्तर पापकर्मका चिन्तन करनेवाला मनुष्य अपने ९ २ सिरपर ऊर्ध्वपुण्ड्र धारण कर लेनेमात्रसे पवित्र हो जाता है॥९ २ ॥ ऊर्ध्वपुण्ड्र धारण करनेवाले चाण्डाल मनुष्यकी ९ ३ भी मृत्यु चाहे कहीं भी हो, वह विमानमें स्थित होकर मेरे लोक पहुँचकर प्रतिष्ठा प्राप्त करता है ॥ ९ ३ ॥ विशुद्ध आत्मावाले तथा मेरे स्वरूपको जाननेवाले ९ ४ महाभाग्यशाली ऐकान्तिक वैष्णवजन भगवान् विष्णुके चरणके आकारवाले तथा बीचमें रिक्त स्थानसे युक्त ऊर्ध्वपुण्ड्र धारण करते हैं । इसी प्रकार एकमात्र मेरे चरणोंके प्रति परायणता रखनेवाले परम ऐकान्तिक ९ ५ भक्त निर्मल, शूलकी आकृतिवाले ऊर्ध्वपुण्ड्रको हल्दीके चूर्णसे धारण करते हैं ॥ ९ ४ - ९ ५ ॥ अन्य वैष्णवजनोंको भक्तिपूर्वक दीपककी ९ ६ बत्तीकी तरह, कमलकी तरह अथवा बाँसके पत्तेकी आकृतिके सदृश तथा रेखाओंके मध्य रिक्तस्थान-रहित ऊर्ध्वपुण्ड्र धारण करना चाहिये । साधारण वैष्णव गृहस्थ अच्छिद्र ( रेखाओंके बीच रिक्त ९ ७ स्थानसे रहित ) अथवा सच्छिद्र ( रेखाओंके बीच रिक्त स्थानयुक्त ) कोई भी त्रिपुण्ड्र धारण कर सकते हैं । अच्छिद्र ऊर्ध्वपुण्ड्र लगानेसे उन्हें पाप नहीं लगता ९ ८ है । किंतु प्रपन्न ऐकान्तिक तथा परम ऐकान्तिक वैष्णवोंको अच्छिद्र ऊर्ध्वपुण्ड्र धारण करनेपर महान् पाप लगता है ॥ ९ ६ - ९ ८ ॥ जो वैष्णव दण्डके आकारके, सुन्दर, ९९ रेखाओंके बीचमें रिक्त स्थान छोड़कर पूर्वोक्त ‘ केशव ’ आदिके साथ ' नमः ' जोड़कर विभिन्न अंगोंमें विमल ऊर्ध्वपुण्ड्रोंको धारण करता है, वह उन - उन स्थानोंपर १०० मानो मेरा विशाल मन्दिर ही बनाता है ॥ ९९ -१०० ॥ ऊर्ध्वपुण्ड्रके मध्य विशाल तथा अत्यन्त मनोहर रिक्त स्थानमें शाश्वत विष्णुजी लक्ष्मीके साथ विराजमान १०१ होकर आनन्दित होते हैं ॥ १०१ ॥

जो अधम द्विज रेखाओंके बीचमें रिक्तस्थान छोड़े बिना ऊर्ध्वपुण्ड्र धारण करता है, वह उस स्थानपर विराजमान विष्णु तथा लक्ष्मीका तिरस्कार १०२ | करता है ॥ १०२ ॥

पृष्ठ 724

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अ ०१५ ]

अच्छिद्रमूर्ध्वपुण्ड्रं तु यः करोति विमूढधीः ।

स पर्यायेण तानेति नरकानेकविंशतिम् ॥

ऋजूनि स्फुटपार्श्वोनि सान्तरालानि विन्यसेत् ।

ऊर्ध्वपुण्ड्राणि दण्डाब्जदीपमत्स्यनिभानि च ॥

शिखोपवीतवद्धार्यमूर्ध्वपुण्ड्रं द्विजेन च ।

विना कृताश्चेद्विफलाः क्रियाः सर्वा महामुने ॥

तस्मात्सर्वेषु कार्येषु कार्यं विप्रस्य धीमतः ।

ऊर्ध्वपुण्ड्रं त्रिशूलं च वर्तुलं चतुरस्त्रकम् ॥

अर्धचन्द्रादिकं लिङ्गं वेदनिष्ठो न धारयेत् ।

जन्मना लब्धजातिस्तु वेदपन्थानमाश्रितः ॥

पुण्ड्रान्तरं भ्रमाद्वापि ललाटे नैव धारयेत् ।

ख्यातिकान्त्यादिसिद्ध्यर्थं चापि विष्ण्वागमादिषु ॥

स्थितं पुण्ड्रान्तरं नैव धारयेद्वैदिको जनः ।

तिर्यक्त्रिपुण्ड्रं सन्त्यज्य श्रौतं कथमपि भ्रमात् ॥

ललाटे भस्मना तिर्यक्त्रपुण्ड्रस्य च धारणम् ।

विना पुण्ड्रान्तरं मोहाद्धारयन्नारकी भवेत् ॥

वेदमार्गैकनिष्ठस्तु मोहेनाप्यङ्कितो यदि ।

पतत्येव न सन्देहस्तथा पुण्ड्रान्तरादपि ॥

नाङ्कनं विग्रहे कुर्याद्वेदमार्गं समाश्रितः ।

श्रौतधर्मैकनिष्ठानां लिङ्गं तु श्रौतमेव हि ॥

अश्रौतधर्मनिष्ठानामश्रौतं लिङ्गमीरितम् ।

देवता वेदसिद्धा यास्तासां लिङ्गं तु वैदिकम् ॥

अश्रौततन्त्रनिष्ठा यास्तासामश्रौतमेव हि । एकादश स्कन्ध ७१५ जो मूर्ख अच्छिद्र ( रेखाओंके बीच रिक्त १०३ स्थानरहित ) ऊर्ध्वपुण्ड्र धारण करता है, वह क्रमशः इक्कीस नरकोंको प्राप्त होता रहता है ॥ १०३ ॥

स्पष्ट तथा सीधी रेखाओंवाले, बीचमें रिक्त स्थानवाले, दण्ड, कमल, दीपककी लौ १०४ अथवा मत्स्यकी आकृतिवाले ऊर्ध्वपुण्ड्रोंको धारण करना चाहिये ॥ १०४ ॥

द्विजको शिखा और यज्ञोपवीतकी भाँति १०५ ऊर्ध्वपुण्ड्र धारण करना चाहिये I । हे महामुने! इसे धारण किये बिना किये गये समस्त कर्म निष्फल हो जाते हैं । अतः बुद्धिमान् ब्राह्मणको समस्त कर्मोंमें १०६ त्रिशूलके आकारका गोल अथवा चौकोर ऊर्ध्वपुण्ड्र धारण करना चाहिये ॥ १०५-१०६ ॥ वेदनिष्ठ ब्राह्मणको अर्धचन्द्रके आकारका तिलक नहीं लगाना चाहिये । जन्मसे ब्राह्मणजातिमें उत्पन्न १०७ तथा वैदिकपन्थके अनुयायी व्यक्तिको भूलकर भी अपने ललाटपर ऊर्ध्वपुण्ड्रके अतिरिक्त अन्य पुण्ड्र नहीं धारण करना चाहिये । श्रौत तिर्यक् त्रिपुण्ड्र १०८ छोड़कर प्रसिद्धि अथवा शारीरिक कान्ति आदिकी प्राप्तिके लिये वैष्णवशास्त्रादिमें वर्णित दूसरे प्रकारके पुण्ड्र वैदिक व्यक्तिको भूलकर भी नहीं धारण करने १० ९ चाहिये ॥ १०७ - १० ९ ॥ ललाटपर भस्मसे तिर्यक् त्रिपुण्ड्र धारण न करके अज्ञानवश अन्य प्रकारका त्रिपुण्ड्र धारण करनेवाला वैदिक ब्राह्मण नरकगामी होता है । एकमात्र ११० वेदमार्गका अनुयायी व्यक्ति यदि अज्ञानवश भी भिन्न प्रकारका पुण्ड्र शरीरपर धारण कर लेता है तो वह नरकमें अवश्य ही पड़ता है; इसमें संशय नहीं १११ | है ॥ ११०-१११ ॥ वैदिक धर्मावलम्बी मनुष्यको अपने शरीरपर किसी प्रकारका चिह्न नहीं करना चाहिये । वैदिक ११२ धर्मका पालन करनेवालोंके लिये एकमात्र वैदिक चिह्न त्रिपुण्ड्र ही है । अश्रौत धर्ममें निष्ठ लोगोंके लिये अश्रौत चिह्न बताया गया है ॥ ११२३ ॥

वेदोंमें जो - जो देवता वर्णित हैं, उनके चिह्न ११३ वैदिक ही हैं । अश्रौततन्त्रमें निष्ठा रखनेवाले जो लोग हैं, उनके चिह्न अश्रौत ही हैं ॥ ११३ ॥

पृष्ठ 725

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७१६ वेदसिद्धो महादेवः साक्षात्संसारमोचकः ॥

भक्तानामुपकाराय श्रौतं लिङ्गं दधाति च ।

वेदसिद्धस्य विष्णोश्च श्रौतं लिङ्गं न चेतरत् ॥

प्रादुर्भावविशेषाणामपि तस्य तदेव हि ।

श्रौतं लिङ्गं तु विज्ञेयं त्रिपुण्ड्रोद्धूलनादिकम् ॥

अश्रौतमूर्ध्वपुण्ड्रादि नैव तिर्यक्त्रिपुण्ड्रकम् ।

वेदमार्गैकनिष्ठानां वेदोक्तेनैव वर्त्मना ॥

ललाटे भस्मना तिर्यक्त्रपुण्ड्रं धार्यमेव हि ।

यस्तु नारायणं देवं प्रपन्नः परमं पदम् ।

धारयेत्सर्वदा शूलं ललाटे गन्धवारिणा ॥

श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १६ ११४ भवबन्धनसे मुक्ति प्रदान करनेवाले वेदसिद्ध महादेवजी भक्तोंके उपकारके लिये श्रौत चिह्न ( भस्म - त्रिपुण्ड्र ) धारण करते हैं ॥ ११४३ ॥

११५ वेदसिद्ध भगवान् विष्णुका भी वैदिक चिह्न ही है, इसके अतिरिक्त दूसरा नहीं । विशेष अवतारोंमें भी उनका चिह्न वही [ भस्म - त्रिपुण्ड्र ] रहता है ॥ ११५३ ॥

११६ सर्वांगमें भस्म लगाने तथा त्रिपुण्ड्र धारण करनेको वैदिक चिह्न समझना चाहिये । ऊर्ध्वपुण्ड्र आदि अश्रौत चिह्न हैं, तिर्यक् त्रिपुण्ड्र अश्रौत नहीं है । ११६३ ॥ एकमात्र वेदमार्गका अनुगमन करनेवालेको ११७ | वेदोक्त पद्धतिसे भस्मद्वारा ललाटपर तिर्यक् त्रिपुण्ड्र धारण करना चाहिये । जो भगवान् नारायणके शरणागत हो तथा उनके परमपदका अभिलाषी हो, उसे गन्ध-द्रव्य - युक्त जलसे अपने ललाटपर शूलकी आकृति ११८ | धारण करनी चाहिये ॥ ११७-११८ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायामेकादशस्कन्धे त्रिपुण्ड्रोर्ध्वपुण्ड्र धारणविधिवर्णनं नाम पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥

अथ षोडशोऽध्यायः सन्ध्योपासना श्रीनारायण उवाच

अथातः श्रूयतां पुण्यं सन्ध्योपासनमुत्तमम् ।

भस्मधारणमाहात्म्यं कथितं चैव विस्तरात् ॥

प्रातः सन्ध्याविधानं च कथयिष्यामि तेऽनघ ।

प्रातःसन्ध्यां सनक्षत्रां मध्याह्ने मध्यभास्कराम् ॥

ससूर्यां पश्चिमां सन्ध्यां तिस्रः सन्ध्या उपासते ।

तद्भेदानपि वक्ष्यामि शृणु देवर्षिसत्तम ॥

उत्तमा तारकोपेता मध्यमा लुप्ततारका ।

अधमा सूर्यसहिता प्रातः सन्ध्या त्रिधा मता ॥

तथा उसका माहात्म्य श्रीनारायण बोले - [ हे नारद! ] मैंने आपसे भस्म धारण करनेके माहात्म्यका विस्तारपूर्वक १ वर्णन कर दिया; अब आप पुण्यदायक तथा उत्तम सन्ध्योपासनके विषयमें सुनिये ॥ १ ॥

हे अनघ! मैं सर्वप्रथम आपसे प्रातः कालीन सन्ध्याका विधान कह रहा हूँ । प्रातःकालकी सन्ध्या आकाशमें तारोंके रहते - रहते, मध्याह्नकी सन्ध्या सूर्यके २ मध्य- आकाशमें आनेपर और सायंकालकी सन्ध्या सूर्यके पश्चिम दिशामें रहनेपर करनेका विधान है; इस प्रकार इन तीनों सन्ध्याओंको करना चाहिये । हे देवर्षिश्रेष्ठ! अब मैं उनके भेद भी बताऊँगा, आप ३ सुनिये ॥ २-३ ॥ तारों के आकाशमें विद्यमान रहते की जानेवाली प्रातःसन्ध्या उत्तम, तारोंके लुप्त होनेसे लेकर सूर्योदयके बीचकी अवधि में की जानेवाली सन्ध्या मध्यम ४ और सूर्यके उदय हो जानेपर की जानेवाली सन्ध्या

पृष्ठ 726

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अ ० १६ ] एकादश स्कन्ध ७१७

उत्तमा सूर्यसहिता मध्यमास्तमिते रवौ ।

अधमा तारकोपेता सायंसन्ध्या त्रिधा मता ॥

विप्रो वृक्षो मूलकान्यत्र सन्ध्या वेदः शाखा धर्मकर्माणि पत्रम् । तस्मान्मूलं यत्नतो रक्षणीयं छिन्ने मूले नैव वृक्षो न शाखा ॥

सन्ध्या येन न विज्ञाता सन्ध्या येनानुपासिता ।

जीवमानो भवेच्छूद्रो मृतः श्वा चैव जायते ॥

तस्मान्नित्यं प्रकर्तव्यं सन्ध्योपासनमुत्तमम् ।

तदभावेऽन्यकर्मादावधिकारी भवेन्न हि ॥

उदयास्तमयादूर्ध्वं यावत्स्याद्घटिकात्रयम् ।

तावत्सन्ध्यामुपासीत प्रायश्चित्तं ततः परम् ॥

कालातिक्रमणे जाते चतुर्थार्घ्यं प्रदापयेत् ।

अथवाष्टशतं देवीं जप्त्वादौ तां समाचरेत् ॥

यस्मिन्काले तु यत्कर्म तत्कालाधीश्वरीं च ताम् ।

सन्ध्यामुपास्य पश्चात्तु तत्कालीनं समाचरेत् ॥

गृहे साधारणा प्रोक्ता गोष्ठे वै मध्यमा भवेत् ।

नदीतीरे चोत्तमा स्याद्देवीगेहे तदुत्तमा ॥

यतो देव्या उपासेयं ततो देव्यास्तु सन्निधौ ।

सन्ध्यात्रयं प्रकर्तव्यं तदानन्त्याय कल्पते ॥

अधम- यह तीन प्रकारकी प्रातः सन्ध्या कही गयी है । ५ सायंकालमें सूर्यके विद्यमान रहते की गयी सायं-सन्ध्या उत्तम, सूर्यके अस्त होने तथा तारोंके उदयके पूर्व की गयी सन्ध्या मध्यम और तारोंके उदयके पश्चात् की गयी सन्ध्या अधम- यह तीन प्रकारकी सायंसन्ध्या कही गयी है ॥४-५ ॥ विप्र वृक्ष है, ये सन्ध्याएँ ही उसकी जड़ें हैं, वेद उसकी शाखाएँ हैं और सभी धर्म - कर्म उसके पत्ते हैं । ६ अतएव प्रयत्नके साथ मूल अर्थात् सन्ध्याकी ही रक्षा करनी चाहिये; क्योंकि मूलके कट जानेपर न तो वृक्ष रहता है और न शाखा ॥६ ॥

जिसने सन्ध्याका ज्ञान नहीं किया तथा जिसने ७ सन्ध्योपासन नहीं किया, वह जीते - जी शूद्रके समान होता है और मृत्युके अनन्तर कुत्तेकी योनिमें जन्म लेता है ॥७ ॥

अतः द्विजको नित्य उत्तम सन्ध्या करनी चाहिये । ८ उसे न करनेवाला अन्य किसी भी शुभ कर्मको करनेका अधिकारी नहीं है ॥ ८ ॥

सूर्यके उदय होने तथा अस्त होनेके तीन - तीन घड़ी बादतक सन्ध्योपासना कर लेनी चाहिये । उसके ९ बाद सन्ध्या करनेपर प्रायश्चित्त करना पड़ता है ॥ ९ ॥

समय बीत जानेपर यदि सन्ध्या की जाय, तो [ तीन अर्घ्य के अतिरिक्त ] चौथा अर्घ्य देना चाहिये अथवा आरम्भमें एक सौ आठ बार गायत्रीका जप १० करके सन्ध्या करनी चाहिये ॥१० ॥

जिस समय जो कर्म करना हो, उस समयकी अधीश्वरी उस गायत्री - स्वरूपिणी सन्ध्याकी उपासना करनेके अनन्तर ही उस कार्यमें प्रवृत्त होना चाहिये ॥ ११ ॥

११ घरमें की गयी सन्ध्या साधारण कही गयी है, गोशालामें की गयी सन्ध्या मध्यम कोटिकी होती है, नदी तटपर की गयी सन्ध्या उत्तम होती है और देवीमन्दिरमें की गयी सन्ध्या उससे भी उत्तम कही १२ | गयी है ॥ १२ ॥

सन्ध्योपासन देवीकी उपासना है, अतः देवीकी सन्निधिमें ही तीनों कालों ( प्रातः, मध्याह्न, सायं ) -की सन्ध्या करनी चाहिये, वह उन्हें अनन्त फल १३ प्रदान करती है ॥१३ ॥

पृष्ठ 727

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७१८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १६

एतस्या अपरं दैवं ब्राह्मणानां च विद्यते ।

न विष्णूपासना नित्या न शिवोपासना तथा ॥

यथा भवेन्महादेव्या गायत्र्याः श्रुतिचोदिता ।

सर्ववेदसारभूता गायत्र्यास्तु समर्चना ॥

ब्रह्मादयोऽपि सन्ध्यायां तां ध्यायन्ति जपन्ति च ।

वेदा जपन्ति तां नित्यं वेदोपास्या ततः स्मृता ॥

तस्मात्सर्वे द्विजाः शाक्ता न शैवा न च वैष्णवाः ।

आदिशक्तिमुपासन्ते गायत्रीं वेदमातरम् ॥

आचान्तः प्राणमायम्य केशवादिकनामभिः ।

केशवश्च तथा नारायणो माधव एव च ॥

गोविन्दो विष्णुरेवाथ मधुसूदन एव च ।

त्रिविक्रमो वामनश्च श्रीधरोऽपि ततः परम् ॥

हृषीकेशः पद्मनाभो दामोदर अतः परम् ।

सङ्कर्षणो वासुदेवः प्रद्युम्नोऽप्यनिरुद्धकः ॥

पुरुषोत्तमाधोक्षजौ च नारसिंहो ऽच्युतस्तथा ।

जनार्दन उपेन्द्रश्च हरिः कृष्णोऽन्तिमस्तथा ॥

ॐकारपूर्वकं नाम चतुर्विंशतिसङ्ख्यया ।

स्वाहान्तैः प्राशयेद्वारि नमोऽन्तैः स्पर्शयेत्तथा ॥

केशवादित्रिभिः पीत्वा द्वाभ्यां प्रक्षालयेत्करौ ।

मुखं प्रक्षालयेद् द्वाभ्यां द्वाभ्यामुन्मार्जनं तथा ॥

एकेन पाणिं सम्प्रोक्ष्य पादावपि शिरोऽपि च । ब्राह्मणोंके लिये इन गायत्रीदेवीके अतिरिक्त अन्य देवता नहीं है । विष्णु तथा शिवकी उपासना भी १४ वैसी नित्य नहीं है, जैसी महादेवी गायत्रीकी वेदप्रतिपादित सन्ध्या नित्य है । गायत्रीदेवीकी आराधना सम्पूर्ण वेदोंका सार - स्वरूप है ॥ १४-१५ ॥ १५ ब्रह्मा आदि देवता भी सन्ध्योपासनाके समय उन गायत्रीदेवीका ध्यान तथा जप करते हैं । वेद उन गायत्रीका नित्य जप करते हैं, अतएव वे ' वेदोपास्या ' कही गयी हैं ॥ १६ ॥

१६ इसीलिये सभी द्विज शाक्त हैं, वे न शैव हैं न वैष्णव । वे सभी वेदमाता आदिशक्ति गायत्रीकी उपासना करते हैं ॥ १७ ॥

केशव आदि नामोंसे आचमन करनेके बाद १७ प्राणायाम करनेके अनन्तर सन्ध्योपासनमें प्रवृत्त होना चाहिये । केशव, नारायण, माधव, गोविन्द, विष्णु, मधुसूदन, त्रिविक्रम, वामन, श्रीधर, हृषीकेश, पद्मनाभ, १८ दामोदर, संकर्षण, वासुदेव, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध, पुरुषोत्तम, अधोक्षज, नरसिंह, अच्युत, जनार्दन, उपेन्द्र, हरि तथा श्रीकृष्ण - इन चौबीस नामोंके पूर्व ' ॐकार ' तथा अन्तमें ' स्वाहा ' जोड़कर जलका प्राशन ( आचमन ) १ ९ और इन्हीं नामोंके पूर्व ' ॐकार ' तथा अन्तमें ' नमः ' लगाकर शरीरके विभिन्न चाहिये ॥ १८-२२ ॥ ' ॐ केशवाय स्वाहा २० स्वाहा, ॐ माधवाय स्वाहा, तीन नाम - मन्त्रोंसे आचमन नमः ', ' ॐ विष्णवे नमः ' २१ दोनों हाथोंका प्रक्षालन करना अंगोंका स्पर्श करना ' आदि ( ॐ केशवाय ॐ नारायणाय स्वाहा ) करके ॐ गोविन्दाय – इन दो नाम - मन्त्रोंसे चाहिये । पुनः ‘ मधुसूदन ’ तथा ' त्रिविक्रम ' – इन दो नामोंसे अँगूठेके मूलद्वारा दोनों ओष्ठोंका प्रक्षालन और ' वामन ' तथा ' श्रीधर ' -इन नामोंसे मुखका सम्मार्जन करना चाहिये ॥ २३ ॥

२२ ' हृषीकेश ' - इस नामसे बायें हाथका, ' पद्मनाभ ' नामसे दोनों पैरोंका, तथा ' दामोदर ' नामसे सिरका प्रोक्षण करना चाहिये । इसी प्रकार ' संकर्षण ' आदि २३ देवनामोंसे बारह अंगोंका स्पर्श करना चाहिये । ( ' संकर्षण ' नामसे परस्पर मिली हुई बीचकी तीन अँगुलियोंद्वारा मुखका, ' वासुदेव ' तथा ' प्रद्युम्न ' – इन

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अ ० १६ ] सङ्कर्षणादिदेवानां द्वादशाङ्गानि संस्पृशेत् दक्षिणेनोदकं पीत्वा वामेन संस्पृशेद् बुधः तावन्न शुध्यते तोयं यावद्वामेन न स्पृशेत् गोकर्णाकृतिहस्तेन माषमात्रं जलं पिबेत् ततो न्यूनाधिकं पीत्वा सुरापायी भवेद् द्विजः संहताङ्गुलिना तोयं पाणिना दक्षिणेन तु मुक्ताङ्गुष्ठकनिष्ठाभ्यां शेषेणाचमनं विदुः प्राणायामं ततः कृत्वा प्रणवस्मृतिपूर्वकम् गायत्रीं शिरसा सार्धं तुरीयपदसंयुताम् दक्षिणे रेचयेद्वायुं वामेन पूरितोदरम् कुम्भेन धारयेन्नित्यं प्राणायामं विदुर्बुधाः

पीडयेद्दक्षिणां नाडीमङ्गुष्ठेन तथोत्तराम् ।

कनिष्ठानामिकाभ्यां तु मध्यमां तर्जनीं त्यजेत् ॥

रेचकः पूरकश्चैव प्राणायामोऽथ कुम्भकः ।

प्रोच्यते सर्वशास्त्रेषु योगिभिर्यतमानसैः ॥

एकादश स्कन्ध ७१ ९ ॥ २४ । दो नामोंसे अँगूठे और तर्जनी अँगुलियोंद्वारा दोनों नासापुटोंका, ' अनिरुद्ध ' तथा ' पुरुषोत्तम ' से अँगूठे और अनामिकाद्वारा दोनों नेत्रोंका, ' अधोक्षज ' और ' नारसिंह ' नामोंद्वारा दोनों कानोंका, ' अच्युत ' से । कनिष्ठिका और अँगूठेद्वारा नाभिका ' जनार्दन ' से ॥ २५ करतलद्वारा हृदयका, ' उपेन्द्र ' से सिरका एवं ‘ ॐ हरये नमः ' तथा ' ॐ कृष्णाय नमः ' – इन दो नाम - मन्त्रोंसे दाहिनी और बायीं भुजाका स्पर्श करना चाहिये ) ॥ २४ ॥

। बुद्धिमान् व्यक्तिको चाहिये कि दाहिने हाथसे ॥ २६ जल पीते समय बायें हाथसे उसे स्पर्श किये रहे; क्योंकि वह जल तबतक शुद्ध नहीं होता जबतक बायें हाथका स्पर्श नहीं होता ॥ २५ ॥

हाथ की मुद्रा गायके कानके आकारकी बनाकर । उससे मात्र एक माष जलसे आचमन करना चाहिये । ॥ २७ उससे अधिक या कम जलसे आचमन करनेवाला द्विज सुरापान करनेवालेके समान होता है ॥ २६ ॥

दाहिने हाथकी कनिष्ठिका तथा अँगूठेको अलग-अलग करके शेष तीन अँगुलियोंको सटाकर दाहिने । हाथसे जलसे आचमन करना बताया गया ॥ २७ ॥

॥ २८ तत्पश्चात् प्रणवका उच्चारण करके गायत्रीशिरस् तथा गायत्रीके तुरीय ( चतुर्थ ) पादसहित गायत्रीका जप करते हुए प्राणायाम करना चाहिये ॥ २८ ॥

नासिकाके दाहिने छिद्रसे वायुका रेचन करना । चाहिये, बायें छिद्रसे वायुको उदरमें भरना चाहिये ॥ २ ९ तथा उस वायुको उदरमें भरकर कुम्भरूपसे धारण किये रहना चाहिये -कहा है ॥ २ ९ ॥ [ वायुको खींचते छिद्रको अँगूठेसे दबाये ३० अनामिका अँगुलियोंसे कर ले; इसमें मध्यमा करना चाहिये ॥ ३० ॥

संयमित चित्तवाले प्रकारके पूरक, कुम्भक ३१ | बताया है ॥ ३१ ॥

इसीको विद्वानोंने प्राणायाम समय ] नासिकाके दाहिने । तत्पश्चात् कनिष्ठिका तथा बायें नासिका छिद्रको बन्द तथा तर्जनीका प्रयोग नहीं योगियोंने सभी शास्त्रोंमें इसी तथा रेचकको ही प्राणायाम

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७२०

रेचकः सृजते वायुं पूरकः पूरयेत्तु तम् ।

साम्येन संस्थितिर्यत्तत्कुम्भकः परिकीर्तितः ॥

नीलोत्पलदलश्यामं नाभिमध्ये प्रतिष्ठितम् ।

चतुर्भुजं महात्मानं पूरके चिन्तयेद्धरिम् ॥

कुम्भके तु हृदि स्थाने ध्यायेत्तु कमलासनम् ।

प्रजापतिं जगन्नाथं चतुर्वक्त्रं पितामहम् ॥

रेचके शङ्करं ध्यायेल्ललाटस्थं महेश्वरम् ।

शुद्धस्फटिकसंकाशं निर्मलं पापनाशनम् ॥

पूरके विष्णुसायुज्यं कुम्भके ब्रह्मणो गतिम् ।

रेचकेन तृतीयं तु प्राप्नुयादीश्वरं परम् ॥

पौराणाचमनाद्यं च प्रोक्तं देवर्षिसत्तम ।

श्रौतमाचमनाद्यं च शृणु पापापहं मुने ॥

प्रणवं पूर्वमुच्चार्य गायत्रीं तु तदित्यृचम् ।

पादादौ व्याहृतीस्तिस्रः श्रौताचमनमुच्यते ॥

गायत्रीं शिरसा सार्धं जपेद् व्याहतिपूर्विकाम् ।

प्रतिप्रणवसंयुक्तां त्रितयं प्राणसंयमः ॥

( सलक्षणं तु प्राणानामायामं कीर्त्यतेऽधुना । नानापापैकशमनं महापुण्यफलप्रदम् ॥ )

पञ्चाङ्गुलीभिर्नासाग्रं पीडयेत्प्रणवेन तु ।

सर्वपापहरा मुद्रा वानप्रस्थगृहस्थयोः ॥

कनिष्ठानामिकाङ्गुष्ठैर्यतेश्च ब्रह्मचारिणः । श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १६ ' रेचक ' वायुका सृजन करता है, ' पूरक ' उसे पूर्ण करता है तथा साम्य स्थितिमें जो उसे धारण ३२ किये रहता है, वह कुम्भक कहा गया है ॥ ३२ ॥

पूरक करते समय नीले कमल - पत्रके समान श्याम वर्णवाले चतुर्भुज परमात्मा श्रीहरिका नाभिदेशमें ३३ ध्यान करना चाहिये ॥ ३३ ॥

कुम्भक करते समय कमलके आसनपर विराजमान, चार मुखवाले, जगत् के स्वामी प्रजापति ब्रह्माका हृदयमें ध्यान करना चाहिये ॥ ३४ ॥

३४ रेचक करते समय शुद्ध स्फटिकके सदृश, निर्मल तथा पापों का नाश करनेवाले महेश्वर शिवका ललाटमें ध्यान करना चाहिये ॥ ३५ ॥

३५ मनुष्य पूरक प्राणायामसे विष्णु - सायुज्य, कुम्भक प्राणायामसे ब्रह्माका पद तथा तीसरे रेचक प्राणायामसे माहेश्वरपद प्राप्त करता है ॥ ३६ ॥

हे देवर्षिश्रेष्ठ! मैंने पहले पौराणिक आचमन ३६ बता दिया है । हे मुने! अब आप पापको दूर करनेवाले ' श्रौत आचमन ' के विषयमें सुनिये ॥ ३७ ॥

पहले प्रणव ( ॐ ) - का उच्चारण करके गायत्रीकी ऋचा ( तत्सवितुः आदि ) तथा पदके ३७ आदिमें तीनों व्याहृतियोंसे युक्त गायत्री मन्त्रको पढ़कर किया गया आचमन ' श्रौत - आचमन ' कहा जाता है ॥ ३८ ॥

३८ गायत्रीके पूर्व तीनों व्याहृतियाँ लगाकर तथा प्रत्येक व्याहृतिमें प्रणव ( ॐ ) जोड़कर शिरोभागके साथ गायत्री मन्त्रका जप करना चाहिये । पूरक, कुम्भक तथा रेचक करते समय इसका तीन बार जप ३ ९ ही प्राणायाम है ( अब लक्षणसहित प्राणायामका वर्णन किया जा रहा है । यह प्राणायाम नानाविध पापोंका शमन करनेवाला तथा महान् पुण्यफल प्रदान करनेवाला है ) । गृहस्थ तथा वानप्रस्थको प्रणवमन्त्रसे पाँचों अँगुलियोंद्वारा नासिकाके अग्रभागको दबाना चाहिये । यह मुद्रा सभी प्रकारके पापोंका हरण करनेवाली है । ब्रह्मचारी और संन्यासी कनिष्ठिका, ४० अनामिका तथा अँगूठा - इन अँगुलियोंसे प्राणायाम करें ॥ ३ ९ -४०३ ॥

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अ ० १६ ] एकादश आपो हि ष्ठेति तिसृभिः प्रोक्षणं स्यात्कुशोदकैः ॥ ४१

ऋगन्ते मार्जनं कुर्यात्पादान्ते वा समाहितः ।

नवप्रणवयुक्तेन आपो हि ष्ठेत्यनेन तु ॥ ४२

नश्येदघं मार्जनेन संवत्सरसमुद्भवम् ।

तत आचमनं कृत्वा सूर्यश्चेति पिबेदपः ॥ ४३

अन्तःकरणसम्भिन्नं पापं तस्य विनश्यति ।

प्रणवेन व्याहृतिभिर्गायत्र्या प्रणवाद्यया ॥ ४४

आपो हि ष्ठेति सूक्तेन मार्जनं चैव कारयेत् ।

उद्धृत्य दक्षिणे हस्ते जलं गोकर्णवत्कृते ॥ ४५

नीत्वा तं नासिकाग्रं तु वामकुक्षौ स्मरेदघम् ।

पुरुषं कृष्णवर्णं च ऋतं चेति पठेत्ततः ॥ ४६

द्रुपदां वा ऋचं पश्चाद्दक्षनासापुटेन च ।

श्वासमार्गेण तं पापमानयेत्करवारिणि ॥ ४७

नावलोक्यैव तद्वारि वामभागेऽश्मनि क्षिपेत् ।

निष्पापं तु शरीरं मे सञ्जातमिति भावयेत् ॥ ४८

उत्थाय तु ततः पादौ द्वौ समौ सन्नियोजयेत् ।

जलाञ्जलिं गृहीत्वा तु तर्जन्यङ्गुष्ठवर्जितम् ॥ ४ ९

वीक्ष्य भानुं क्षिपेद्वारि गायत्र्या चाभिमन्त्रितम् ।

त्रिवारं मुनिशार्दूल विधिरेषोऽर्घ्यमोचने ॥ ५०

ततः प्रदक्षिणां कुर्यादसावादित्यमन्त्रतः ।

मध्याह्ने सकृदेव स्यात्सन्ध्ययोस्तु त्रिवारतः ॥५१

ईषन्नम्रः प्रभाते तु मध्याह्ने दण्डवत्स्थितः ।

आसने चोपविष्टस्तु द्विजः सायं क्षिपेदपः ॥ ५२ ।

स्कन्ध ७२१ ' आपो हि ष्ठा ० ' इत्यादि तीन ऋचाओंसे कुशाके जलद्वारा शरीरका प्रोक्षण करे अथवा समाहित चित्तसे इन तीन ऋचाओं में विद्यमान नौ पदोंके आदिमें प्रणवका उच्चारण करके उनसे मार्जन करे । इस मार्जनसे वर्षभरमें किया गया समस्त पाप मिट जाता है॥४१-४२३ ॥ तत्पश्चात् ' सूर्यश्च ० ' इस मन्त्रसे जलसे आचमन करना चाहिये । जो ऐसा करता है, उसके अन्तःकरणमें प्रविष्ट पाप मिट जाता है ॥ ४३३ ॥

प्रणवयुक्त व्याहृतियोंके साथ आदिमें प्रणवसहित गायत्रीका और ' आपो हि ष्ठा ० ' इस सूक्तका एक साथ उच्चारण करके मार्जन करना चाहिये ॥ ४४३ ॥

दाहिने हाथको गायके कानके समान बनाकर उसमें जल भरे और उसे नासिकाके अग्रभागपर ले जाकर अपनी वामकुक्षिमें कृष्णवर्णवाले पुरुषरूप पापकी भावना करनी चाहिये और इसके बाद ' ऋतञ्च सत्यं ० ' - इस ऋचाका पाठ करना चाहिये ॥ ४५-४६ ॥ तत्पश्चात् ' द्रुपदा ० ' इस ऋचाका पाठ करके नासिकाके दाहिने पुटसे श्वासमार्गद्वारा उस पापको दाहिने हाथके जलमें लाये और उस जलपर दृष्टिपात न करते हुए उसे अपने वामभागमें भूमिपर फेंक दे और यह भावना करे कि मेरा शरीर अब पापरहित हो गया है ॥ ४७-४८ ॥ इसके बाद उठकर दोनों पैरोंको सीधा करके मिला ले । पुनः तर्जनी तथा अँगूठेको अलग रखते हुए अंजलिमें जल लेकर सूर्यकी ओर देखकर गायत्रीमन्त्रसे अभिमन्त्रित करके तीन बार सूर्यको जलांजलि अर्पित करे । हे मुनिश्रेष्ठ! सूर्यार्घ्य अर्पणकी यही विधि है ॥ ४ ९ -५० ॥ तदनन्तर उस उपासकको आदित्य - मन्त्रसे सूर्यकी प्रदक्षिणा करनी चाहिये । मध्याह्नमें एक बार और प्रातः तथा सायंकालकी दोनों सन्ध्याओंमें तीन - तीन बार अर्घ्यदान देना चाहिये ॥ ५१ ॥

द्विजको चाहिये कि प्रातः काल कुछ झुककर, मध्याह्नमें दण्डकी भाँति स्थित होकर तथा सायंकालमें आसनपर बैठकर सूर्यको जल अर्पण करे ॥ ५२ ॥