देवी भागवत उत्तरार्द्ध — पृष्ठ 741–750

देवी भागवत उत्तरार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 741–750

पृष्ठ 741

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७३२ पुष्पाणि विविधान्याहुः पूजाकर्मणि साधवः

तानि दत्त्वा यथालाभं कैलासं लभते स्वयम् ।

बिल्वपत्राण्यमोघानि यो दद्यात्परशक्तये ॥

तस्य दुःखं कदाचिच्च क्वचिच्च न भविष्यति ।

बिल्वपत्रत्रये रक्तचन्दनेन तु संल्लिखेत् ॥

मायाबीजत्रयं यत्नात्सुस्फुटं चातिसुन्दरम् ।

मायाबीजादिकं नाम चतुर्थ्यन्तं समुच्चरेत् ॥

नमोऽन्तं परया भक्त्या देवीचरणपङ्कजे ।

समर्पयेन्महादेव्यै कोमलं तच्च पत्रकम् ॥

य एवं कुरुते भक्त्या मनुत्वं लभते हि सः ।

यस्तु कोटिदलैरेवं कोमलैरतिनिर्मलैः ॥

पूजयेद्भुवनेशानीं ब्रह्माण्डाधिपतिर्भवेत् ।

कुन्दपुष्पैर्नवनैस्तु लुलितैरष्टगन्धतः ॥

कोटिसङ्ख्यैः पूजयेत्तु प्राजापत्यं लभेद् ध्रुवम् ।

मल्लिकामालतीपुष्पैरष्टगन्धेन लोलितैः ॥

कोटिसङ्ख्यैः पूजया तु जायते स चतुर्मुखः ।

दशकोटिभिरप्येवं तैरेव कुसुमैर्मुने ॥

विष्णुत्वं लभते मर्त्यो यत्सुरेष्वपि दुर्लभम् ।

विष्णुनैतद् व्रतं पूर्वं कृतं स्वपदलब्धये ॥

शतकोटिभिरप्येवं सूत्रात्मत्वं व्रजेद् ध्रुवम् ।

व्रतमेतत्पुरा सम्यक्कृतं भक्त्या प्रयत्नतः ॥

तेन व्रतप्रभावेण हिरण्योदरतां व्रजेत् ।

जपाकुसुमपुष्पस्य बन्धूककुसुमस्य च ॥

श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १८ ॥ १८ साधुपुरुषोंने पूजाकर्ममें प्रयुक्त होनेवाले अनेक प्रकारके पुष्पोंका वर्णन किया है; यथोपलब्ध उन पुष्पों को देवीको अर्पण करके मनुष्य स्वयं कैलासधाम १ ९ प्राप्त कर लेता है ॥ १८३ ॥

जो मनुष्य पराशक्ति जगदम्बाको अमोघ बिल्वपत्र अर्पित करता है, उसे कभी किसी भी परिस्थिति में दुःख नहीं होता है ॥ १ ९ ३ ॥ २० तीन पत्तेवाले बिल्वदलपर लाल चन्दनसे यत्नपूर्वक अत्यन्त स्पष्ट एवं सुन्दर अक्षरोंमें मायाबीज ( ह्रीं ) तीन बार लिखे । मायाबीज जिसके आदिमें हो, २१ भुवनेश्वरी इस नामके साथ चतुर्थी विभक्तिका उच्चारण करके उसके अन्तमें ' नमः ' जोड़कर ( ॐ ह्रीं भुवनेश्वर्यै नमः ) इस मन्त्रसे महादेवी भगवतीके २२ चरणकमलमें परम भक्तिपूर्वक वह कोमल बिल्वपत्र समर्पित करे । जो इस प्रकार भक्तिपूर्वक करता है, वह मनुत्व प्राप्त कर लेता है और जो अत्यन्त कोमल तथा २३ निर्मल एक करोड़ बिल्वपत्रोंसे भुवनेश्वरीकी पूजा करता है, वह सम्पूर्ण ब्रह्माण्डका अधिपति होता है ॥ २०–२३३ ॥ अष्टगन्धसे चर्चित एक करोड़ नवीन तथा २४ सुन्दर कुन्द - पुष्पोंसे जो उनकी पूजा करता है, वह निश्चितरूपसे प्रजापतिका पद प्राप्त करता है । इसी प्रकार अष्टगन्धसे चर्चित एक करोड़ मल्लिका तथा २५ मालतीके पुष्पोंसे भगवतीकी पूजाके द्वारा वह चतुर्मुख ब्रह्मा हो जाता है ॥ २४-२५३ ॥ हे मुने! इसी तरह दस करोड़ उन्हीं पुष्पोंसे २६ भगवतीका अर्चन करके मनुष्य विष्णुत्व प्राप्त कर लेता है, जो देवताओंके लिये भी दुर्लभ है । अपना विष्णुपद प्राप्त करनेके लिये भगवान् विष्णुने भी २७ पूर्वकालमें यह व्रत किया था । सौ करोड़ पुष्पोंसे देवीकी पूजा करनेवाला मनुष्य सूत्रात्मत्व ( सूक्ष्म ब्रह्मपद ) अवश्य ही प्राप्त कर लेता है । भगवान् विष्णुने भी पूर्व कालमें प्रयत्नपूर्वक भक्तिके साथ २८ सम्यक् प्रकारसे इस व्रतको अनुष्ठित किया था; उसी व्रतके प्रभावसे वे हिरण्यगर्भ हुए ॥ २६ - २८३ ॥ जपाकुसुम, बन्धूक और दाडिमका पुष्प भी २ ९ | देवीको अर्पित किया जाता है - ऐसी विधि कही गयी

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अ ० १८ ] एकादश स्कन्ध ७३३

दाडिमीकुसुमस्यापि विधिरेष उदीरितः ।

एवमन्यानि पुष्पाणि श्रीदेव्यै विधिनार्पयेत् ॥

तस्य पुण्यफलस्यान्तं न जानातीश्वरोऽपि सः ।

तत्तदृतूद्भवैः पुष्पैर्नामसाहस्त्रसंख्यया ॥

समर्पयेन्महादेव्यै प्रतिवर्षमतन्द्रितः ।

य एवं कुरुते भक्त्या महापातकसंयुतः ॥

उपपातकयुक्तोऽपि मुच्यते सर्वपातकैः ।

देहान्ते श्रीपदाम्भोजं दुर्लभं देवसत्तमैः ॥

प्राप्नोति साधकवरो मुने नास्त्यत्र संशयः ।

कृष्णागुरुं सकर्पूरं चन्दनेन समन्वितम् ॥

सिल्हकं चाज्यसंयुक्तं गुग्गुलेन समन्वितम् ।

धूपं दद्यान्महादेव्यै येन स्याद्धूपितं गृहम् ॥

तेन प्रसन्ना देवेशी ददाति भुवनत्रयम् ।

दीपं कर्पूरखण्डैश्च दद्याद्देव्यै निरन्तरम् ॥

सूर्यलोकमवाप्नोति नात्र कार्या विचारणा ।

शतदीपांस्तथा दद्यात्सहस्त्रान्वा समाहितः ॥

नैवेद्यं पुरतो देव्याः स्थापयेत्पर्वताकृतिम् ।

लेह्यैश्चोष्यैस्तथा पेयैः षड्रसैस्तु समाहितैः ॥

नानाफलानि दिव्यानि स्वादूनि रसवन्ति च ।

स्वर्णपात्रस्थितान्नानि दद्याद्देव्यै निरन्तरम् ॥

तृप्तायां श्रीमहादेव्यां भवेत्तृप्तं जगत्त्रयम् ।

यतस्तदात्मकं सर्वं रज्जौ सर्पो यथा तथा ॥

ततः पानीयकं दद्याच्छुभं गङ्गाजलं महत् ।

कर्पूरवालासंयुक्तं शीतलं कलशस्थितम् ॥

है । इसी प्रकार अन्य पुष्प भी श्रीदेवीको विधिपूर्वक ३० अर्पित करने चाहिये । उसके पुण्यफलकी सीमा वे ईश्वर भी नहीं जानते ॥ २ ९ -३०३ ॥ जिस - जिस ऋतुमें जो - जो पुष्प उपलब्ध हो ३१ सकें, सहस्रनामकी संख्याके अनुसार उन पुष्पोंको प्रमादरहित होकर प्रत्येक वर्ष भगवतीको समर्पित करना चाहिये । जो भक्तिपूर्वक ऐसा करता है, वह ३२ महापातकों तथा उपपातकोंसे युक्त होनेपर भी सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥ ३१-३२३ ॥ हे मुने! ऐसा श्रेष्ठ साधक देहावसान के पश्चात् श्रेष्ठ देवताओंके लिये भी दुर्लभ श्रीदेवीके ३३ चरणकमलको प्राप्त कर लेता है; इसमें कोई सन्देह नहीं है ॥ ३३३ ॥

कृष्ण अगुरु, कर्पूर, चन्दन, सिल्हक ( लोहबान ), ३४ घृत और गुग्गुलसे संयुक्त धूप महादेवीको समर्पित करना चाहिये, जिससे मन्दिर धूपित हो जाय; इससे प्रसन्न होकर देवेश्वरी तीनों लोक प्रदान कर देती ३५ हैं ॥ ३४-३५३ ॥ देवीको कर्पूर - खण्डोंसे युक्त दीपक निरन्तर अर्पित करना चाहिये; ऐसा करनेवाला उपासक ३६ सूर्यलोक प्राप्त कर लेता है; इसमें संशय नहीं करना चाहिये । समाहितचित्त होकर एक सौ अथवा हजार दीपक देवीको प्रदान करने चाहिये ॥ ३६-३७ ॥ ३७ देवीके सम्मुख पर्वतकी आकृतिके रूपमें नैवेद्यराशि स्थापित करे; जिसमें लेह्य, चोष्य, पेय तथा षड्सोंवाले पदार्थ हों । अनेक प्रकारके दिव्य, स्वादिष्ट तथा ३८ रसमय फल एवं अन्न स्वर्णपात्रमें रखकर भगवतीको निरन्तर अर्पित करे ॥ ३८-३९ ॥ श्रीमहादेवीके तृप्त होनेपर तीनों लोक तृप्त हो ३ ९ जाते हैं; क्योंकि सम्पूर्ण जगत् उन्हींका आत्मरूप है; जिस प्रकार रज्जुमें सर्पका आभास मिथ्या है, उसी प्रकार जगत्का आभास भी मिथ्या है ॥ ४० ॥

४० तत्पश्चात् अत्यन्त पवित्र गंगाजल भगवतीको पीनेके लिये निवेदित करे और कर्पूर तथा नारियल-जलसे युक्त कलशका शीतल जल भी देवीको ४१ । समर्पित करे ॥ ४१ ॥

पृष्ठ 743

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७३४ ताम्बूलं च ततो देव्यै कर्पूरशकलान्वितम् एलालवङ्गसंयुक्तं मुखसौगन्ध्यदायकम् दद्याद्देव्यै महाभक्त्या येन देवी प्रसीदति । मृदङ्गवीणामुरजढक्कादुन्दुभिनिःस्वनैः

धात्रीं गायनैरतिमोहनैः ।

वेदपारायणैः स्तोत्रैः पुराणादिभिरप्युत ॥

छत्रं च चामरे द्वे च दद्याद्देव्यै समाहितः ।

राजोपचारान् श्रीदेव्यै नित्यमेव समर्पयेत् ॥

प्रदक्षिणां नमस्कारं कुर्याद्देव्या अनेकधा ।

क्षमापयेज्जगद्धात्रीं जगदम्बां मुहुर्मुहुः ॥

सकृत्स्मरणमात्रेण यत्र देवी प्रसीदति ।

एतादृशोपचारैश्च प्रसीदेदत्र कः स्मयः ॥

स्वभावतो भवेन्माता पुत्रेऽतिकरुणावती ।

तेन भक्तौ कृतायां तु वक्तव्यं किं ततः परम् ॥

अत्र ते कथयिष्यामि पुरा वृत्तं सनातनम् ।

बृहद्रथस्य राजर्षेः प्रियं भक्तिप्रदायकम् ॥

चक्रवाकोऽभवत्पक्षी क्वचिद्देशे हिमालये ।

भ्रमन्नानाविधान्देशान्ययौ काशीपुरं प्रति ॥

अन्नपूर्णा महास्थाने प्रारब्धवशतो द्विजः ।

जगाम लीलया तत्र कणलोभादनाथवत् ॥

कृत्वा प्रदक्षिणामेकां जगाम स विहायसा ।

देशान्तरं विहायैव पुरीं मुक्तिप्रदायिनीम् ॥

कालान्तरे ममारासौ गतः स्वर्गपुरीं प्रति ।

बुभुजे विषयान्सर्वान् दिव्यरूपधरो युवा ॥

श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १८ । तत्पश्चात् कर्पूरके छोटे - छोटे टुकड़ों, लवंग ॥ ४२ तथा इलायचीसे युक्त और मुखको सुगन्धि प्रदान करनेवाला ताम्बूल अत्यन्त भक्तिपूर्वक देवीको अर्पित करे, जिससे देवी प्रसन्न हो जायँ । इसके ॥ ४३ बाद मृदंग, वीणा, मुरज, ढक्का तथा दुन्दुभि आदिकी ध्वनियोंसे; अत्यन्त मनोहर गीतोंसे; वेद-पारायणोंसे; स्तोत्रोंसे तथा पुराण आदिके पाठसे जगत्को धारण करनेवाली भगवतीको सन्तुष्ट करना ४४ चाहिये ॥ ४२–४४ ॥ तदनन्तर समाहितचित्त होकर देवीको छत्र तथा दो चँवर अर्पण करे । उन श्रीदेवीको नित्य राजोचित ४५ उपचार समर्पित करना चाहिये ॥ ४५ ॥

अनेक प्रकारसे देवीकी प्रदक्षिणा करे तथा उन्हें नमस्कार करे और जगद्धात्री जगदम्बासे बार - बार ४६ क्षमाप्रार्थना करे ॥४६ ॥

एक बारके स्मरणमात्रसे जब देवी प्रसन्न हो जाती हैं तब इस प्रकारके पूजनोपचारोंसे वे प्रसन्न हो ४७ जायँ तो इसमें कौन - सा आश्चर्य है? ॥४७ ॥

माता स्वाभाविक रूपसे पुत्रपर अति करुणा करनेवाली होती है, फिर जो माताके प्रति भक्तिपरायण ४८ है, उसके विषयमें कहना ही क्या? ॥४८ ॥

इस विषयमें मैं राजर्षि बृहद्रथसे सम्बद्ध एक रोचक तथा भक्तिप्रदायक सनातन पौराणिक ४ ९ आख्यानका वर्णन आपसे करूँगा ॥४ ९ ॥ हिमालयपर किसी जगह एक चक्रवाक पक्षी रहता था । वह अनेकविध देशोंका भ्रमण करता हुआ ५० काशीपुरी पहुँच गया ॥५० ॥

वहाँ वह पक्षी प्रारब्धवश अनाथकी भाँति अन्न - कणोंके लोभसे लीलापूर्वक भगवती अन्नपूर्णाके ५१ दिव्य धाममें जा पहुँचा ॥ ५१ ॥

आकाशमें घूमते हुए वह पक्षी मन्दिरकी एक प्रदक्षिणा करके मुक्तिदायिनी काशीको छोड़कर किसी ५२ अन्य देशमें चला गया ॥ ५२ ॥

कालान्तरमें वह मृत्युको प्राप्त हो गया और स्वर्ग चला गया । वहाँ एक दिव्य रूपधारी युवक ५३ । होकर वह समस्त सुखोंका भोग करने लगा ॥ ५३ ॥

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अ ० १८ ] एकादश स्कन्ध ७३५

कल्पद्वयं तथा भुक्त्वा पुनः प्राप भुवं प्रति ।

क्षत्रियाणां कुले जन्म प्राप सर्वोत्तमोत्तमम् ॥

बृहद्रथेति नाम्नाभूत्प्रसिद्धः क्षितिमण्डले ।

महायज्वा धार्मिकश्च सत्यवादी जितेन्द्रियः ॥

त्रिकालज्ञः सार्वभौमो यमी परपुरञ्जयः ।

पूर्वजन्मस्मृतिस्तस्य वर्तते दुर्लभा भुवि ॥

इति श्रुत्वा किंवदन्तीं मुनयः समुपागताः ।

कृतातिथ्या नृपेन्द्रेण विष्टरेषूषुरेव ते ॥

पप्रच्छुर्मुनयः सर्वे संशयोऽस्ति महान्नृप ।

केन पुण्यप्रभावेण पूर्वजन्मस्मृतिस्तव ॥

त्रिकालज्ञानमेवापि केन पुण्यप्रभावतः ।

ज्ञानं तवेति तज्ज्ञातुमागताः स्म तवान्तिकम् ॥

वद निर्व्याजया वृत्त्या तदस्माकं यथातथम् । श्रीनारायण उवाच इति तेषां वचः श्रुत्वा राजा परमधार्मिकः ॥

उवाच सकलं ब्रह्मन् त्रिकालज्ञानकारणम् ।

श्रूयतां मुनयः सर्वे मम ज्ञानस्य कारणम् ॥

चक्रवाकः स्थितः पूर्वं नीचयोनिगतोऽपि वा ।

अज्ञानतोऽपि कृतवानन्नपूर्णाप्रदक्षिणाम् ॥

तेन पुण्यप्रभावेण स्वर्गे कल्पद्वयस्थितिः ।

त्रिकालज्ञानताप्यस्मिन्नभूज्जन्मनि सुव्रताः ॥

को वेद जगदम्बायाः पदस्मृतिफलं कियत् ।

स्मृत्वा तन्महिमानं तु पतन्त्यश्रूणि मेऽनिशम् ॥

धिगस्तु जन्म तेषां वै कृतघ्नानां तु पापिनाम् ।

ये सर्वमातरं देवीं स्वोपास्यां न भजन्ति हि ॥

इस प्रकार दो कल्पतक वहाँ सुखोपभोग करनेके ५४ । बाद वह पुनः पृथ्वीलोकमें आया । क्षत्रियोंके कुलमें उसने सर्वोत्तम जन्म प्राप्त किया और पृथ्वीमण्डलपर बृहद्रथ नामसे प्रसिद्ध हुआ । वह महान् यज्ञनिष्ठ, ५५ धर्मपरायण, सत्यवादी, इन्द्रियजयी, त्रिकालज्ञ, सार्वभौम, संयमी और शत्रु - राज्योंको जीतनेवाला राजा हुआ । उसे पूर्वजन्मकी बातोंका स्मरण था, जो पृथ्वीपर ५६ दूसरोंके लिये दुर्लभ है ॥ ५४–५६ ॥ जनश्रुतिके माध्यमसे उसके विषयमें सुनकर मुनिगण वहाँ आये । उन नृपेन्द्रसे आतिथ्य सत्कार ५७ पाकर वे आसनोंपर विराजमान हुए ॥ ५७ ॥

तत्पश्चात् सभी मुनियोंने पूछा – हे राजन्! हमलोगोंको इस बातका महान् सन्देह है कि किस ५८ पुण्यके प्रभावसे आपको पूर्वजन्मकी स्मृति हो जाती है और किस पुण्यके प्रभावसे आपको तीनों कालों ( भूत, भविष्य, वर्तमान ) का ज्ञान है? आपके उस ५ ९ ज्ञानके विषयमें जाननेके लिये हमलोग आपके पास आये हुए हैं | आप निष्कपट भावसे यथार्थरूपमें उसे हमें बतायें ॥ ५८-५९ ३ ॥ श्रीनारायण बोले- हे ब्रह्मन्! उनकी यह बात ६० सुनकर परम धार्मिक राजा अपने त्रिकालज्ञानका सारा रहस्य बताने लगे ॥ ६०१ ॥

हे मुनिगणो! आपलोग मेरे इस ज्ञानका कारण ६१ सुनिये । मैं पूर्वजन्ममें चक्रवाक पक्षी था । नीच योनिमें जन्म लेनेपर भी मैंने अज्ञानपूर्वक भगवती अन्नपूर्णाकी प्रदक्षिणा कर ली थी । हे सुव्रतो! उसी पुण्यप्रभावसे ६२ मैंने दो कल्पपर्यन्त स्वर्गमें निवास किया और उसके बाद इस जन्ममें भी मुझमें त्रिकालज्ञता विद्यमान है॥६१–६३ ॥ ६३ जगदम्बाके चरणोंके स्मरणका कितना फल होता है - इसे कौन जान सकता है? उनकी महिमाका स्मरण करते ही मेरी आँखोंसे निरन्तर अश्रु गिरने ६४ लगते हैं ॥ ६४ ॥

किंतु उन कृतघ्न तथा पापियोंके जन्मको धिक्कार हैं, जो सभी प्राणियोंकी जननी तथा अपनी उपास्य ६५ । भगवतीकी आराधना नहीं करते ॥ ६५ ॥

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७३६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १ ९

न शिवोपासना नित्या न विष्णूपासना तथा ।

नित्योपास्तिः परा देव्या नित्या श्रुत्यैव चोदिता ॥ ६६

किं मया बहु वक्तव्यं स्थाने संशयवर्जिते ।

सेवनीयं पदाम्भोजं भगवत्या निरन्तरम् ॥ ६७

नातः परतरं किञ्चिदधिकं जगतीतले ।

सेवनीया परा देवी निर्गुणा सगुणाथवा ॥ ६८

श्रीनारायण उवाच

इति तस्य वचः श्रुत्वा राजर्षेर्धार्मिकस्य च ।

प्रसन्नहृदयाः सर्वे गताः स्वस्वनिकेतनम् ॥ ६ ९

एवंप्रभावा सा देवी तत्पूजायाः फलं कियत् ।

अस्तीति केन प्रष्टव्यं वक्तव्यं वा न केनचित् ॥ ७०

येषां तु जन्मसाफल्यं तेषां श्रद्धा तु जायते ।

येषां तु जन्मसाङ्कर्यं तेषां श्रद्धा न जायते ॥ ७ ९ ।

न तो शिवकी उपासना नित्य है और न तो विष्णुकी उपासना नित्य है । एकमात्र परा भगवतीकी उपासना ही नित्य है; क्योंकि श्रुतिद्वारा वे नित्या कही गयी हैं ॥ ६६ ॥

इस सन्देहरहित विषयमें मैं अधिक क्या कहूँ! भगवतीके चरणकमलोंकी सेवा निरन्तर करनी चाहिये ॥ ६७ ॥

इन भगवतीसे बढ़कर इस धरातलपर श्रेष्ठ कुछ भी नहीं है । अतः सगुणा अथवा निर्गुणा किसी भी रूपमें उन परा भगवतीकी उपासना करनी चाहिये ॥ ६८ ॥

श्रीनारायण बोले- उन धार्मिक राजर्षिका यह वचन सुनकर प्रसन्न हृदयवाले वे सभी मुनि अपने-अपने स्थानपर चले गये ॥ ६ ९ ॥ वे भगवती जगदम्बा इस प्रकारके प्रभाववाली हैं तथा उनकी पूजाका कितना फल होता है — इस विषयमें न कोई पूछनेमें समर्थ है और न कोई बतानेमें समर्थ है ॥ ७० ॥

जिनका जन्म सफल होनेको होता है, उन्हीं लोगों के मनमें देवीके प्रति श्रद्धा उत्पन्न होती है । जो लोग वर्णसंकर जन्मवाले हैं, उनके मनमें देवी प्रति श्रद्धा नहीं उत्पन्न होती ॥७१ ॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायामेकादशस्कन्धे देवीमाहात्म्ये बृहद्रथकथानकं नामाष्टादशोऽध्यायः ॥ १८ ॥

अथैकोनविंशोऽध्यायः मध्याह्नसन्ध्या तथा श्रीनारायण उवाच

अथातः श्रूयतां ब्रह्मन् सन्ध्यां माध्याह्निकीं शुभाम् ।

यदनुष्ठानतोऽपूर्वं जायते ऽत्युत्तमं फलम् ॥ १

सावित्रीं युवतीं श्वेतवर्णां चैव त्रिलोचनाम् ।

वरदां चाक्षमालाढ्यां त्रिशूलाभयहस्तकाम् ॥ २

वृषारूढां यजुर्वेदसंहितां रुद्रदेवताम् ।

तमोगुणयुतां चैव भुवर्लोकव्यवस्थिताम् ॥ ३ ।

गायत्रीजपका फल श्रीनारायण बोले- हे ब्रह्मन्! अब आप मध्याह्न-कालीन पुण्यदायिनी सन्ध्याके विषयमें सुनिये, जिसका अनुष्ठान करनेसे अद्भुत तथा अतिश्रेष्ठ फल प्राप्त होता है ॥ १ ॥

युवावस्थावाली, श्वेत वर्णवाली, तीन नेत्रोंवाली, हाथोंमें वरदमुद्रा - अक्षमाला - त्रिशूल तथा अभयमुद्रा धारण करनेवाली, वृषभपर विराजमान, यजुर्वेदसंहिता-स्वरूपिणी, रुद्रके द्वारा उपास्य, तमोगुणसे सम्पन्न, भुवर्लोकमें स्थित रहनेवाली तथा सूर्यको उनके मार्गपर संचरण करानेवाली, महामाया गायत्रीको मैं

पृष्ठ 746

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अ ० १ ९ ] एकादश स्कन्ध ७३७

आदित्यमार्गसंचारकर्त्री मायां नमाम्यहम् ।

आदिदेवीमथ ध्यात्वाचमनादि च पूर्ववत् ॥

अथ चार्घ्यप्रकरणं पुष्पाणि चिनुयात्ततः ।

तदलाभे बिल्वपत्रं तोयेन मिश्रयेत्ततः ॥

ऊर्ध्वं च सूर्याभिमुखं क्षिप्त्वार्घ्यं प्रतिपादयेत् ।

प्रातः सन्ध्यादिवत्सर्वमुपसंहारपूर्वकम् ॥

मध्याह्ने केचिदिच्छन्ति सावित्रीं तु तदित्यृचम् ।

असम्प्रदायं तत्कर्म कार्यहानिस्तु जायते ॥

कारणं सन्ध्ययोश्चात्र मन्देहा नाम राक्षसाः ।

भक्षितुं सूर्यमिच्छन्ति कारणं श्रुतिचोदितम् ॥

अतस्तु कारणाद्विप्रः सन्ध्यां कुर्यात्प्रयत्नतः ।

सन्ध्ययोरुभयोर्नित्यं गायत्र्या प्रणवेन च ॥

अम्भस्तु प्रक्षिपेत्तेन नान्यथा श्रुतिघातकः ।

आकृष्णेनेति मन्त्रेण पुष्पैर्वाम्बुविमिश्रितम् ॥

अलाभे बिल्वदूर्वादिपत्रेणोक्तेन पूर्वकम् ।

अर्घ्यं दद्यात्प्रयत्नेन साङ्गं सन्ध्याफलं लभेत् ॥

अत्रैव तर्पणं वक्ष्ये शृणु देवर्षिसत्तम ।

भुवः पुनः पूरुषं तु तर्पयामि नमो नमः ॥

यजुर्वेदं तर्पयामि मण्डलं तर्पयामि च ।

हिरण्यगर्भं च तथान्तरात्मानं तथैव च ॥

सावित्रीं च ततो देवमातरं साङ्कृतिं तथा ।

सन्ध्यां तथैव युवतीं रुद्राणीं नीमृजां तथा ॥

सर्वार्थानां सिद्धिकरीं सर्वमन्त्रार्थसिद्धिदाम् ।

भूर्भुवः स्वः पूरुषं तु इति मध्याह्नतर्पणम् ॥

उदुत्यमिति सूक्तेन सूर्योपस्थानमेव च ।

चित्रं देवानामिति च सूर्योपस्थानमाचरेत् ॥

1898 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ द्वितीय खण्ड ] -24 A प्रणाम करता हूँ – इस प्रकार आदिदेवीका ध्यान ४ करके आचमन आदि सभी क्रियाएँ पूर्वकी भाँति करनी चाहिये ॥ २–४ ॥ अब अर्घ्यका प्रकरण बताता हूँ । इसके लिये ५ पुष्प चुनना चाहिये । पुष्पके अभावमें बिल्वपत्रको जलमें मिला लेना चाहिये और सूर्यकी ओर मुख करके ऊपरकी ओर जल छोड़कर अर्घ्य प्रदान करना ६ चाहिये । आदिसे लेकर अन्ततक सभी नियम प्रातः कालीन सन्ध्याके ही समान हैं ॥५-६ ॥ कुछ लोग मध्याह्नसन्ध्यामें गायत्रीमन्त्र ७ ' तत्सवितुः ० ' पढ़कर अर्घ्य प्रदान करनेकी सम्मति देते हैं, किंतु वह कर्म परम्पराविरुद्ध है और इससे कार्यकी हानि होती है ॥ ७ ॥

८ [ प्रातः तथा सायं ] दोनों सन्ध्याओंको करनेका वेदोक्त कारण यह है कि मन्देहा नामवाले राक्षस सूर्यका भक्षण करना चाहते हैं । अतएव उन राक्षसोंके ९ निवारणके निमित्त ब्राह्मणको प्रयत्नपूर्वक सन्ध्या करनी चाहिये । प्रातः तथा सायंकालकी दोनों सन्ध्याओं में नित्य प्रणवसहित गायत्रीमन्त्रसे [ अर्घ्यके निमित्त ] १० जलका प्रक्षेप करना चाहिये, अन्यथा वह श्रुतिघातक होता है । [ मध्याह्नकालकी सन्ध्यामें ] जलमिश्रित पुष्पोंसे और यदि पुष्प न मिल सके तो बिल्व और ११ दूर्वा आदिके पत्रसे पूर्वमें बतायी गयी विधिके अनुसार प्रयत्नपूर्वक ‘ आकृष्णेन ० ' इस मन्त्रसे सूर्यको अर्घ्य १२ प्रदान करना चाहिये । ऐसा करनेवाला सांगोपांग सन्ध्याका फल प्राप्त करता है ॥ ८- ११ ॥ हे देवर्षिसत्तम! अब इसी प्रकरणमें तर्पणी १३ विधि बता रहा हूँ, उसे सुनिये । ' भुवः पूरुषं तर्पयामि नमो नमः ', ' यजुर्वेदं तर्पयामि नमो नमः ', ‘ मण्डलं तर्पयामि नमो नमः ' - इसी प्रकार हिरण्यगर्भ, १४ अन्तरात्मा, सावित्री, देवमाता, सांकृति, सन्ध्या, युवती, रुद्राणी, नीमृजा, सर्वार्थसिद्धिकरी, सर्वार्थमन्त्रसिद्धिदा और भूर्भुवः स्वः पूरुषं – इन नामोंके साथ ' तर्पयामि १५ नमो नमः ' जोड़कर तर्पण करना चाहिये । यह मध्याह्न - तर्पण है ॥ १२–१५ ॥ तदनन्तर ‘ उदुत्यम् ० ' तथा ' चित्रं देवानाम् ० ' १६ । इन मन्त्रोंसे सूर्योपस्थान करना चाहिये । तत्पश्चात्

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७३८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २०

ततो जपं प्रकुर्वीत मन्त्रसाधनतत्परः ।

जपस्यापि प्रकारं तु वक्ष्यामि शृणु नारद ॥

कृत्वोत्तानौ करौ प्रातः सायं चाधः करौ तथा ।

मध्याह्ने हृदयस्थौ तु कृत्वा जपमुदीरयेत् ॥

पर्वद्वयमनामिक्याः कनिष्ठादिक्रमेण तु ।

तर्जनीमूलपर्यन्तं करमाला प्रकीर्तिता ॥

गोघ्नः पितृघ्नो मातृघ्नो भ्रूणहा गुरुतल्पगः ।

ब्रह्मस्वक्षेत्रहारी च यश्च विप्रः सुरां पिबेत् ॥

स गायत्र्याः सहस्त्रेण पूतो भवति मानवः ।

मानसं वाचिकं पापं विषयेन्द्रियसङ्गजम् ॥

तत्किल्विषं नाशयति त्रीणि जन्मानि मानवः ।

गायत्रीं यो न जानाति वृथा तस्य परिश्रमः ॥

पठेच्च चतुरो वेदान् गायत्रीं चैकतो जपेत् ।

वेदानां चावृतेस्तद्वद् गायत्रीजप उत्तमः ॥

इति मध्याह्नसन्ध्यायाः प्रकारः कीर्तितो मया ।

अतः परं प्रवक्ष्यामि ब्रह्मयज्ञविधिक्रमम् ॥

मन्त्र - साधनमें तत्पर रहनेवाले साधकको जप करना चाहिये । हे नारद! अब मैं जपका भी प्रकार बताऊँगा; १७ सुनिये ॥ १६-१७ ॥ प्रातः काल दोनों हाथोंको उत्तान करके, सायंकालमें १८ हाथोंको नीचेकी ओर करके तथा मध्याह्न - कालमें उन्हें हृदयके पास करके जप करना चाहिये ॥ १८ ॥

अनामिका अँगुलीके दूसरे पर्व ( मध्य पोर ) -से १ ९ आरम्भ करके कनिष्ठिका आदिके क्रमसे तर्जनी अँगुलीके मूलपर्यन्त करमाला कही गयी है ॥ १ ९ ॥ जो गोहत्यारा, माता - पिताकी हत्या करनेवाला, २० भ्रूणघाती, गुरुपत्नीके साथ गमन करनेवाला, ब्राह्मणका धन तथा भूमि हरनेवाला है और जो विप्र सुरापान करता है, वह गायत्रीके एक हजार जपसे पवित्र हो २१ । जाता है । गायत्री - जप तीन जन्मोंके मानसिक तथा वाचिक पाप और विषयेन्द्रियोंके संयोगसे उत्पन्न होनेवाले पापको विनष्ट कर देता है । जो मनुष्य २२ | गायत्रीमन्त्र नहीं जानता, उसका सम्पूर्ण परिश्रम

व्यर्थ है । २० - २२ ॥

मनुष्य एक ओर चारों वेदोंको पढ़े तथा २३ दूसरी ओर गायत्रीजप करे, इनमें वेदोंकी आवृत्तिसे गायत्रीजप उत्तम है । यह मैंने आपको मध्याह्न-सन्ध्याकी विधि बतायी और अब ब्रह्मयज्ञकी विधिका २४ | क्रम बताऊँगा ॥ २३-२४ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायामेकादशस्कन्धे मध्याह्नसंध्यावर्णनं नामैकोनविंशोऽध्यायः ॥ १ ९ ॥ अथ विंशोऽध्यायः तर्पण तथा सायंसन्ध्याका वर्णन श्रीनारायण उवाच

त्रिराचम्य द्विजः पूर्वं द्विर्मार्जनमथाचरेत् ।

उपस्पृशेत्सव्यपाणिं पादौ च प्रोक्षयेत्ततः ॥

शिरसि चक्षुषि तथा नासायां श्रोत्रदेशके ।

हृदये च तथा मौलौ प्रोक्षणं सम्यगाचरेत् ॥

देशकालौ समुच्चार्य ब्रह्मयज्ञमथाचरेत् ।

द्वौ दर्भों दक्षिणे हस्ते वामे त्रीनासने सकृत् ॥

श्रीनारायण बोले- हे नारद! द्विजको चाहिये कि पहले तीन बार आचमन करके दो बार मार्जन १ करे । इसके बाद पहले अपने दाहिने हाथका तदनन्तर पैरोंका प्रोक्षण करे । इसी प्रकार सिर, नेत्र, नासिका, कान, हृदय तथा शिखाका विधिवत् प्रोक्षण करना २ चाहिये ॥ १-२ ॥ तदनन्तर देश - कालका उच्चारण करके ब्रह्मयज्ञ करे । दाहिने हाथमें दो कुशा, बायें हाथमें तीन कुशा, ३ | आसनपर एक कुशा, यज्ञोपवीतमें एक कुशा, शिखापर 1898 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ द्वितीय खण्ड ] –24 B

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अ ० २० ] एकादश

उपवीते शिखायां च पादमूले सकृत्सकृत् ।

विमुक्तये सर्वपापक्षयार्थं चैवमेव हि ॥ ४

सूत्रोक्तदेवताप्रीत्यै ब्रह्मयज्ञं करोम्यहम् ।

गायत्रीं त्रिर्जपेत्पूर्वं चाग्निमीळे ततः परम् ॥

यदङ्गेति ततः प्रोच्य अग्निर्वै इति कीर्तयेत् ।

अथ महाव्रतं चैव पन्था एतच्च कीर्तयेत् ॥ ६

अथातः संहितायाश्च विदा मघवदित्यपि ।

महाव्रतस्येति तथा इषे त्वोर्जे इतीव हि ॥ ७

अग्न आयाहि चेत्येवं शन्नो देवीरितीति च ।

अथ तस्य समाम्नायो वृद्धिरादैजितीव हि ॥ ८

अथ शिक्षां प्रवक्ष्यामि पञ्चसंवत्सरेति च ।

मयरसतजभनेत्येव गौग्र्मा इत्येव कीर्तयेत् ॥ ९

अथातो धर्मजिज्ञासा अथातो ब्रह्म इत्यपि ।

तच्छंयोरिति च प्रोच्य ब्रह्मणे नम इत्यपि ॥ १० ।

तर्पणं चैव देवानां ततः कुर्यात्प्रदक्षिणम् ।

प्रजापतिश्च ब्रह्मा च वेदा देवास्तथर्षयः ॥ ११

सर्वाणि चैव छन्दांसि तथोङ्कारस्तथैव च ।

वषट्कारो व्याहृतयः सावित्री च ततः परम् ॥ १२

गायत्री चैव यज्ञाश्च द्यावापृथिवी इत्यपि ।

अन्तरिक्षं त्वहोरात्राणि च सांख्या अतः परम् ॥ १३

सिद्धाः समुद्रा नद्यश्च गिरयश्च ततः परम् ।

क्षेत्रौषधिवनस्पत्यो गन्धर्वाप्सरसस्तथा ॥ १४

नागा वयांसि गावश्च साध्या विप्रास्तथैव च ।

यक्षा रक्षांसि भूतानीत्येवमन्तानि कीर्तयेत् ॥ १५

अथो निवीती भूत्वा च ऋषीन्सन्तर्पयेदपि ।

शतर्चिनो माध्यमाश्च गृत्समदस्तथैव च ॥ १६

विश्वामित्रो वामदेवोऽत्रिर्भरद्वाज एव च ।

वसिष्ठश्च प्रगाथश्च पावमान्यस्ततः परम् ॥ १७

क्षुद्रसूक्ता महासूक्ताः सनकश्च सनन्दनः ।

सनातनस्तथैवात्र सनत्कुमार एव च ॥१८

कपिलासुरिनामानौ वोहलिः पञ्चशीर्षकः ।

प्राचीनावीतिना तच्च कर्तव्यमथ तर्पणम् ॥ १ ९

सुमन्तुर्जेमिनिर्वैशम्पायनः पैलसूत्रयुक् ।

भाष्यभारतपूर्वं च महाभारत इत्यपि ॥ २० ।

1898 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ द्वितीय खण्ड ] –24 C स्कन्ध ७३ ९ एक कुशा और पादमूलमें एक कुशा रखे । इसके बाद विमुक्त होनेके लिये, सम्पूर्ण पापोंके विनाशहेतु तथा सूत्रोक्त देवताकी प्रसन्नताके लिये मैं ब्रह्मयज्ञ कर रहा हूँ - ऐसा संकल्प करे ॥ ३-४३ ॥ पहले तीन बार गायत्रीका जप करे और इसके बाद ' अग्निमीडे ० ', फिर ' यदङ्गे ० ' का उच्चारण करके ' अग्निर्वै ० ' इस मन्त्रको बोलना चाहिये । तत्पश्चात् ‘ अथ महाव्रतं चैव पन्थाः ० ' - इसका भी पाठ करना चाहिये ॥ ५-६ ॥ तत्पश्चात् संहिताके ' विदा मघवत् ० ', ' महाव्रतस्य ० ', ' इषे त्वोर्जे ० ', ' अग्न आयाहि ० ', ' शन्नो देवी ० ', ' अथ तस्य समाम्नायो वृद्धिरादैच् ० ', " ' अथ शिक्षां प्रवक्ष्यामि ० ', ' पञ्चसंवत्सर ० ', ' मयरसतजभन ० ' और ' गौग्र्मा ० ' इत्यादि मन्त्रोंका भी पाठ करना चाहिये । पुनः ' अथातो धर्मजिज्ञासा ' और ' अथातो ब्रह्मजिज्ञासा ' के साथ ' तच्छंयो ० ' तथा ' ब्रह्मणे नमः ' - इन मन्त्रोंका भी पाठ करना चाहिये ॥ ७–१० ॥ तदनन्तर देवताओंका तर्पण करके प्रदक्षिणा करनी चाहिये । [ तर्पणके समय ] प्रजापति, ब्रह्मा, वेद, देवता, ऋषि, सभी छन्द, ॐकार, वषट्कार, व्याहृतियाँ, सावित्री, गायत्री, यज्ञ, द्यावा, पृथ्वी, अन्तरिक्ष, अहोरात्र, सांख्य, सिद्ध, समुद्र, नदियाँ, पर्वत, क्षेत्र, औषधि, वनस्पतियाँ, गन्धर्व, अप्सराएँ, नाग, पक्षी, गौएँ, साध्यगण, विप्रगण, यक्ष, राक्षस, भूत एवं यमराज आदिके नामोंका उच्चारण करना चाहिये ॥ ११ – १५ ॥ एतदनन्तर यज्ञोपवीतको कण्ठीकी भाँति करके शतर्चि, माध्यम, गृत्समद, विश्वामित्र, वामदेव, अत्रि, भरद्वाज, वसिष्ठ, प्रगाथ, पावमान्य, क्षुद्रसूक्त, महासूक्त, सनक, सनन्दन, सनातन, सनत्कुमार, कपिल, आसुरि, वोहलि तथा पंचशीर्ष - इन ऋषियोंका तर्पण करना चाहिये । इसके बाद अपसव्य होकर सुमन्तु, जैमिनि, वैशम्पायन, पैल, सूत्र, भाष्य, भारत, महाभारत तथा धर्माचार्योंका तर्पण करे तथा ये सभी तृप्त हो जायँ — ऐसा उच्चारण करे । इसी प्रकार जानन्ति, बाहवि, गार्ग्य, गौतम, शाकल, बाभ्रव्य, माण्डव्य, माण्डूकेय,

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७४० श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २०

धर्माचार्या इमे सर्वे तृप्यन्त्विति च कीर्तयेत् ।

जानन्ति बाहविगार्ग्यगौतमाश्चैव शाकलः ॥

बाभ्रव्यमाण्डव्ययुतोमाण्डूकेयस्ततः परम् ।

गार्गी वाचक्नवी चैव वडवा प्रातिथेयिका ॥

सुलभायुक्तमैत्रेयी कहोलश्च ततः परम् ।

कौषीतकं महाकौषीतकं वै तर्पयेत्ततः ॥

भारद्वाजं च पैङ्ग्यं च महापैङ्ग्यं सुयज्ञकम् ।

सांख्यायनमैतरेयं महैतरेयमेव च ॥

बाष्कलं शाकलं चैव सुजातवक्त्रमेव च ।

औदवाहिं च सौजामिं शौनकं चाश्वलायनम् ॥

ये चान्ये सर्व आचार्यास्ते सर्वे तृप्तिमाप्नुयुः ।

ये के चास्मत्कुले जाता अपुत्रा गोत्रिणो मृताः ॥

ते गृह्णन्तु मया दत्तं वस्त्रनिष्पीडनोदकम् ।

एवं ते ब्रह्मयज्ञस्य विधिरुक्तो महामुने ॥

यश्चायं कुरुते ब्रह्मयज्ञस्य विधिमुत्तमम् ।

सर्ववेदाङ्गपाठस्य फलमाप्नोति साधकः ॥

वैश्वदेवं ततः कुर्यान्नित्यश्राद्धं तथैव च ।

अतिथिभ्योऽन्नदानं च नित्यमेव समाचरेत् ॥

गोग्रासं च ततो दत्त्वा भुञ्जीत ब्राह्मणैः सह ।

अह्नस्तु पञ्चमे भागे प्रकुर्यादेतदुत्तमम् ॥

इतिहासपुराणाद्यैः षष्ठसप्तमकौ नयेत् ।

अष्टमे लोकयात्रा तु बहिः सन्ध्यां ततः पुनः ॥

अथ सायन्तनीं सन्ध्यां प्रवक्ष्यामि महामुने ।

यदनुष्ठानमात्रेण महामाया प्रसीदति ॥

आचम्य प्राणानायम्य साधकः स्थिरमानसः ।

बद्धपद्मासनो योगी सायंकाले स्थिरो भवेत् ॥

श्रुतिस्मृत्यादिकर्मादौ सगर्भः प्राणसंयमः ।

अगर्भो ध्यानमात्रं तु स चामन्त्रः प्रकीर्तितः ॥

भूतशुद्धयादिकं कृत्वा नान्यथा कर्म कीर्तितम् ।

सलक्षो देवतां ध्यात्वा पूरकुम्भकरेचकैः ॥

1898 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ द्वितीय खण्ड ] –24 D गार्गी, वाचक्नवी, वडवा, प्रातिथेयी, सुलभा, मैत्रेयी, २१ कहोल, कौषीतक, महाकौषीतक, भारद्वाज, पैंग्य, महापैंग्य, सुयज्ञ, सांख्यायन, ऐतरेय, महैतरेय, बाष्कल, शाकल, सुजातवक्त्र, औदवाहि, सौजामि, शौनक २२ और आश्वलायन - इनका तर्पण करे तथा जो अन्य आचार्य हों, वे सब भी तृप्तिको प्राप्त हों - ऐसा कहे । २३ | इसके बाद इस प्रकार उच्चारण करते हुए तर्पण करे - जो कोई भी मेरे कुलमें उत्पन्न होकर अपुत्र ही दिवंगत हो चुके हैं तथा मेरे गोत्रसे सम्बद्ध हैं, वे मेरे २४ द्वारा वस्त्र निचोड़कर दिये गये जलको ग्रहण करें । हे महामुने! इस प्रकार मैंने आपको ब्रह्मयज्ञकी विधि २५ | बतला दी ॥ १६-२७ ॥ जो साधक ब्रह्मयज्ञकी इस उत्तम विधिका सम्यक् पालन करता है, वह अंगोंसहित समस्त २६ वेदोंके पाठका फल प्राप्त कर लेता है ॥२८ ॥

इसके बाद वैश्वदेव तथा नित्यश्राद्ध करना चाहिये ।

२७ अतिथियोंको अन्नदान नित्य करना चाहिये ॥ २ ९ ॥

गोग्रास देनेके पश्चात् ब्राह्मणोंके साथ बैठकर भोजन करना चाहिये । यह उत्तम कार्य दिनके पाँचवें २८ भागमें करना चाहिये ॥ ३० ॥

दिनका छठाँ तथा सातवाँ भाग इतिहास, पुराण २ ९ आदिके स्वाध्यायमें व्यतीत करना चाहिये । दिनके आठवें भागमें लोकव्यवहारसम्बन्धी कार्योंको करे और इसके बाद सायंसन्ध्या करे ॥ ३१ ॥

३० हे महामुने! अब मैं सायंकालकी सन्ध्याका वर्णन करूँगा, जिसके अनुष्ठानमात्रसे भगवती महामाया ३१ । प्रसन्न हो जाती हैं ॥ ३२ ॥

सायं वेलामें साधक योगीको आचमन तथा प्राणायाम करके शान्तचित्त हो पद्मासन लगाकर ३२ निश्चलरूपसे बैठ जाना चाहिये ॥ ३३ ॥

श्रुति स्मृतिसम्बन्धी कर्मोंमें प्राणवायुको संयमित ३३ करके किया जानेवाला समन्त्रक प्राणायाम सगर्भ कहा गया है तथा ध्यानमात्रवाला प्राणायाम अगर्भ है; वह अगर्भ प्राणायाम अमन्त्रक कहा गया है ॥ ३४ ॥

३४ भूतशुद्धि आदि करके ही कर्ममें प्रवृत्त होना चाहिये, अन्यथा उसे कर्म नहीं कहा जा सकता । लक्ष्य ३५ | स्थिर करके पूरक, कुम्भक और रेचक प्राणायामद्वारा

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अ ० २० ] एकादश स्कन्ध ७४१

ध्यानं प्रकुर्यात्सन्ध्यायां सायंकाले विचक्षणः ।

वृद्धां सरस्वतीं देवीं कृष्णाङ्गीं कृष्णवाससम् ॥

शङ्खचक्रगदापद्महस्तां गरुडवाहनाम् ।

नानारत्नलसद्भूषां क्वणन्मञ्जीरमेखलाम् ॥

अनर्घ्यरत्नमुकुटां तारहारावलीयुताम् ।

ताटङ्कबद्धमाणिक्यकान्तिशोभिकपोलकाम् ॥

पीताम्बरधरां देवीं सच्चिदानन्दरूपिणीम् ।

सामवेदेन सहितां संयुतां सत्त्ववर्त्मना ॥

व्यवस्थितां च स्वर्लोके आदित्यपथगामिनीम् ।

आवाहयाम्यहं देवीमायान्तीं सूर्यमण्डलात् ॥

एवं ध्यात्वा च तां देवीं सन्ध्यासङ्कल्पमाचरेत् ।

आपो हि ष्ठेति मन्त्रेण अग्निश्चेति तथैव च ॥

विदध्यादाचमनकं शेषं पूर्ववदीरितम् ।

गायत्रीमन्त्रमुच्चार्य श्रीनारायणप्रीतये ॥

अर्घ्यं दद्याच्च सूर्याय साधकः शुद्धमानसः ।

उभौ पादौ समौ कृत्वा हस्ते धृत्वा जलाञ्जलिम् ॥

देवं ध्यात्वा मण्डलस्थं क्षिपेदर्घ्यं ततः क्रमात् ।

अर्घ्यं दद्यात्तु यो नीरे मूढात्मा ज्ञानवर्जितः ॥

उल्लङ्घ्य स्मृतिमन्त्रांश्च प्रायश्चित्ती भवेद् द्विजः ।

ततः सूर्यमुपस्थायाप्यसावादित्यमन्त्रतः ॥

गायत्र्याश्च जपं कुर्यादुपविश्य ततो बृसीम् ।

सहस्त्रं वा तदर्थं वा श्रीदेवीध्यानपूर्वकम् ॥

यथा प्रातः पुनस्तद्वदुपस्थानादिकं चरेत् ।

सायं सन्ध्यातर्पणे च क्रमेण परिकीर्तयेत् ॥

इष्ट देवताका ध्यान करके विद्वान् पुरुषको सायंकालमें सन्ध्या करते समय इस प्रकार ध्यान करना चाहिये-३६ ' भगवती सरस्वती वृद्धावस्थाको प्राप्त हैं, कृष्णवर्ण हैं, वे कृष्ण वस्त्र धारण की हुई हैं, उन्होंने हाथोंमें शंख - चक्र - गदा - पद्म धारण कर रखा है, वे गरुडरूपी ३७ वाहनपर विराजमान हैं, वे अनेक प्रकारके रत्नोंसे जटित वेशभूषासे सुशोभित हो रही हैं, उनकी पैजनी तथा करधनीसे ध्वनि निकल रही है, उनके ३८ मस्तकपर अमूल्य रत्नोंसे निर्मित मुकुट विद्यमान है, वे तारोंके हारकी आवलीसे युक्त हैं, मणिमय कुण्डलोंकी कान्तिसे उनके कपोल सुशोभित हो ३ ९ रहे हैं, उन्होंने पीताम्बर धारण कर रखा है, वे सत् - चित् - आनन्दस्वरूपवाली हैं, वे सामवेद तथा सत्त्वमार्ग से संयुक्त हैं, वे स्वर्गलोकमें व्यवस्थित ४० हैं, वे सूर्यपथपर गमन करनेवाली हैं, सूर्यमण्डलसे निकलकर मेरी ओर आती हुई इन देवीका मैं आवाहन कर रहा हूँ'॥३५–४० ॥ इस प्रकार उन देवीका ध्यान करके सायंकालकी ४१ सन्ध्याका संकल्प करना चाहिये । ' आपो हि ष्ठा ० इस मन्त्रसे मार्जन तथा ' अग्निश्च ० ' इस मन्त्रसे आचमन करना चाहिये । शेष कर्म प्रातः कालीन ४२ । सन्ध्याके समान बताया गया है ॥४१३ ॥

साधक पुरुषको शुद्ध मनवाला होकर भगवान् नारायणके प्रसन्नतार्थ गायत्रीमन्त्रका उच्चारण करके ४३ सूर्यको अर्घ्य देना चाहिये ॥४२३ ॥

दोनों पैरोंको समानरूपसे सीधा करके हाथकी अंजलिमें जल लेकर मण्डलस्थ देवताका ध्यान करके ४४ क्रमसे अर्घ्य प्रदान करना चाहिये ॥ ४३२ ॥

जो मूढात्मा तथा अज्ञानी द्विज जलमें अर्घ्य प्रदान करता है, वह स्मृतिमन्त्रोंका उल्लंघन करके प्रायश्चित्तका भागी होता है ॥ ४४३ ॥

४५ तत्पश्चात् ‘ असावादित्य ० ' इस मन्त्रसे सूर्योपस्थान करके कुशके आसनपर बैठकर श्रीदेवीका ध्यान करते हुए एक हजार अथवा उसकी आधी संख्या में ४६ गायत्रीका जप करना चाहिये॥४५-४६ ॥ जैसे प्रातः कालकी सन्ध्यामें उपस्थान आदि किये जाते हैं, उसी तरह सायंकालीन सन्ध्याके ४७ । तर्पणमें उपस्थान आदि क्रमसे करने चाहिये ॥ ४७ ॥