देवी भागवत उत्तरार्द्ध — पृष्ठ 761–770

देवी भागवत उत्तरार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 761–770

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७५२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २३

पवित्रग्रन्थिमुत्सृज्य मण्डले भुवि निक्षिपेत् ।

पात्रे तु निक्षिपेद्यस्तु स विप्रः पङ्गिदूषकः ॥

उच्छिष्टस्तेन संस्पृष्टः शुना शूद्रेण च द्विजः ।

उपोष्य रजनीमेकां पञ्चगव्येन शुध्यति ॥

अनुच्छिष्टेन संस्पृष्टैः स्नानमेव विधीयते ।

एकाहुतिप्रदानेन कोटियज्ञफलं लभेत् ॥

पञ्चभिः पञ्चकोटीनां तदनन्तफलं स्मृतम् ।

प्राणाग्निहोत्रवेत्रे यो ह्यन्नदानं करोति च ॥

दातुश्चैव तु यत्पुण्यं भोक्तुश्चैव तु यत्फलम् ।

प्राप्नुतस्तौ तदेव द्वावुभौ तौ स्वर्गगामिनी ॥

सपवित्रकरो भुङ्गे यस्तु विप्रो विधानतः ।

ग्रासे ग्रासे फलं तस्य पञ्चगव्यसमं भवेत् ॥

पूजाकालत्रये नित्यं जपस्तर्पणमेव च ।

होमो ब्राह्मणभुक्तिश्च पुरश्चरणमुच्यते ॥

अधः शयानो धर्मात्मा जितक्रोधो जितेन्द्रियः ।

लघुमिष्टहिताशी च विनीतः शान्तचेतसा ॥

नित्यं त्रिषवणस्नायी नित्यं स शुभभाषणः ।

स्त्रीशूद्रपतितव्रात्यनास्तिकोच्छिष्टभाषणम् ॥

चाण्डालभाषणं चैव न कुर्यान्मुनिसत्तम ।

नत्वा नैव च भाषेत जपहोमार्चनादिषु ॥

मैथुनस्य तथालापं तद्गोष्ठीमपि वर्जयेत् ।

कर्मणा मनसा वाचा सर्वावस्थासु सर्वदा ॥

सर्वत्र मैथुनत्यागो ब्रह्मचर्यं प्रचक्षते ।

राज्ञश्चैव गृहस्थस्य ब्रह्मचर्यमुदाहृतम् ॥

[ भोजनके समय अँगुलीमें पड़े हुए ] पवित्रककी ४ ग्रन्थि खोलकर पृथ्वीपर रख दे । जो विप्र उसे पात्रमें ही रख देता है, वह पंक्तिदूषक कहा जाता है ॥४ ॥

यदि उच्छिष्ट द्विजका किसी उच्छिष्टसे या कुत्ते ५ अथवा शूद्रसे स्पर्श हो जाता है, तो वह द्विज एक रात उपवास करके पुनः पंचगव्य ग्रहण करनेसे शुद्ध हो जाता है और अनुच्छिष्टसे स्पर्श होनेपर केवल ६ स्नान करनेका विधान है । प्राणाग्निमें एक आहुति देनेसे करोड़ यज्ञका फल मिलता है, पाँच आहुतियाँ देनेसे पाँच करोड़ यज्ञोंका अनन्त फल प्राप्त होना बताया गया है । जो मनुष्य प्राणाग्निहोत्रवेत्ताको ७ अन्नका दान करता है, उस दाताको जो पुण्य होता तथा भोक्ताको जो फल मिलता है, वह उनको समानरूपमें प्राप्त होता है । वे दोनों ही स्वर्ग प्राप्त ८ करते हैं ॥५–८ ॥ जो विप्र हाथमें पवित्रक धारण करके विधिपूर्वक भोजन ग्रहण करता है, उसे प्रत्येक ग्रासमें पंचगव्य-प्राशनके समान फल प्राप्त होता है ॥ ९ ॥

पूजाके तीनों कालों ( प्रात:, मध्याह्न, सायं ) - में प्रतिदिन जप, तर्पण, होम, ब्राह्मणभोजन [ तथा मार्जन ] -१० को पुरश्चरण कहा जाता है । वह साधक नीचे भूमिपर शयन करे, धर्मपरायण रहे, क्रोधपर तथा इन्द्रियोंपर नियन्त्रण रखे, अल्प; मधुर तथा हितकर ११ पदार्थोंको ग्रहण करे, शान्त मनसे विनम्रतापूर्वक रहे । नित्य तीनों समय स्नान करे तथा सदा सुन्दर वाणी बोले । हे मुनिवर! स्त्री, शूद्र, पतित, व्रात्य, नास्तिक, १२ जूठे मुखवाले व्यक्ति तथा चाण्डालसे वार्तालाप नहीं करना चाहिये । जप, होम, पूजन आदिके समय किसीको नमस्कार करके बातचीत नहीं करनी १३ चाहिये ॥ १० - १३ ॥ मन, वाणी तथा कर्मसे सभी स्थितियोंमें सर्वदा मैथुनसम्बन्धी बातचीत तथा उससे सम्बन्धित १४ गोष्ठीका भी त्याग कर देना चाहिये । सभी तरहसे मैथुनका त्याग ही ब्रह्मचर्य कहा जाता है । राजा तथा गृहस्थके लिये भी ब्रह्मचर्यपालन बताया गया १५ है ॥ १४-१५ ॥

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अ ० २३ ] एकादश स्कन्ध ७५३

ऋतुस्नातेषु दारेषु सङ्गतिर्या विधानतः ।

संस्कृतायां सवर्णायामृतुं दृष्ट्वा प्रयत्नतः ॥ १६

तु गमनं कार्यं ब्रह्मचर्यं हरेन्न तत् ।

ऋणत्रयमसंशोध्य त्वनुत्पाद्य सुतानपि ॥ १७

तथा यज्ञाननिष्ट्वा च मोक्षमिच्छन्द्रजत्यधः ।

अजागलस्य यज्जन्म तज्जन्म श्रुतिचोदितम् ॥ १८

अतः कार्यं तु विप्रेन्द्र ऋणत्रयविशोधनम् ।

ते देवानामृषीणां च पितॄणामृणिनस्तथा ॥ १ ९

ऋषिभ्यो ब्रह्मचर्येण पितृभ्यस्तु तिलोदकैः ।

मुच्येद्यज्ञेन देवेभ्यः स्वाश्रमं धर्ममाचरेत् ॥ २०

क्षीराहारी फलाशी वा शाकाशी वा हविष्यभुक् ।

भिक्षाशी वा जपेद्विद्वान्कृच्छ्रचान्द्रायणादिकृत् ॥ २१

लवणं क्षारमम्लं च गृञ्जनं कांस्यभोजनम् ।

ताम्बूलं च द्विभुक्तं च दुष्टवासः प्रमत्तनम् ॥ २२

श्रुतिस्मृतिविरोधं च जपं रात्रौ विवर्जयेत् ।

वृथा न कालं गमयेद् द्यूतस्त्रीस्वापवादतः ॥२३

गमयेद्देवतापूजास्तोत्रागमविलोकनैः भूशय्या ब्रह्मचारित्वं मौनचर्या तथैव च ॥ २४

नित्यं त्रिषवणस्नानं शूद्रकर्मविवर्जनम् ।

नित्यपूजा नित्यदानमानन्दस्तुतिकीर्तनम् ॥ २५

नैमित्तिकार्चनं चैव विश्वासो गुरुदेवयोः ।

जपनिष्ठस्य धर्मा ये द्वादशैते सुसिद्धिदाः ॥ २६

नित्यं सूर्यमुपस्थाय तस्य चाभिमुखो जपेत् ।

देवताप्रतिमादौ वा वह्नौ वाभ्यर्च्य तन्मुखः ॥ २७ ।

ऋतुस्नान की हुई अपनी भार्याके साथ ही विधिपूर्वक सहवास करना चाहिये । अपने समान वर्णवाली पाणि - गृहीती भार्याका ऋतुकाल उपस्थित जानकर ही प्रयत्नपूर्वक रात्रिमें उसके साथ गमन करना चाहिये । उससे ब्रह्मचर्यका नाश नहीं होता है । तीनों ऋणोंका मार्जन, पुत्रोंकी उत्पत्ति तथा पंचमहायज्ञादि किये बिना ही मोक्षकी कामना करनेवाले व्यक्तिका अध: पतन हो जाता है । बकरी गलेके स्तनकी भाँति उसका जन्म श्रुतियोंद्वारा निष्फल बताया गया है ॥ १६–१८ ॥ अतएव हे विप्रेन्द्र! तीनों ऋणोंसे मुक्त होनेका प्रयत्न करना चाहिये । मनुष्य देवताओं, ऋषियों तथा पितरोंके ऋणी होते हैं । मनुष्य ब्रह्मचर्यद्वारा ऋषियोंके, तिलोदकदानसे पितरोंके तथा यज्ञानुष्ठानसे देवताओंके ऋणसे मुक्त हो जाता है । मनुष्यको चाहिये कि अपने - अपने आश्रमसम्बन्धी धर्मोंका पालन करे ॥ १ ९ -२० ॥ कृच्छ्रचान्द्रायण आदि व्रत करनेवाले विद्वान्‌को दुग्ध, फल, शाक, हविष्यान्न तथा भिक्षान्नके आहारपर रहते हुए जप करना चाहिये । उसे लवण, क्षार, अम्ल, गाजर, कांस्यपात्रमें भोजन, ताम्बूल, दो बार भोजन, दुष्टोंकी संगति, उन्मत्तता, श्रुति - स्मृतिके विरुद्ध व्यवहार तथा रातमें जप आदिका त्याग कर देना चाहिये । जुआ खेलने, स्त्रीसंग करने तथा निन्दा आदिमें समयको व्यर्थ व्यतीत नहीं करना चाहिये; अपितु देवताओंकी पूजा, स्तुति तथा शास्त्रावलोकनमें ही समय व्यतीत करना चाहिये ॥ २१ - २३३ ॥ भूमिपर शयन, ब्रह्मचर्यपालन, मौनधारण, प्रतिदिन त्रिकाल स्नान, नीच कर्मोंसे विरत रहना, प्रतिदिन पूजा करना, दान देना, आनन्दित रहना, स्तुति करना, कीर्तनमें तत्पर रहना, नैमित्तिक पूजन तथा गुरु और देवतामें विश्वास रखना - जपपरायण पुरुषके लिये महान् सिद्धि प्रदान करनेवाले ये बारह धर्म हैं ॥ २४–२६ ॥ प्रतिदिन सूर्योपस्थान करके उनके सम्मुख होकर जप करना चाहिये । देवप्रतिमा आदि अथवा अग्निमें सूर्यका अभ्यर्चन करके उनके सम्मुख स्थित होकर

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७५४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २३ स्नानपूजाजपध्यानहोमतर्पणतत्परः निष्कामो देवतायां च सर्वकर्मनिवेदकः ॥

एवमादींश्च नियमान्पुरश्चरणकृच्चरेत् ।

तस्माद् द्विजः प्रसन्नात्मा जपहोमपरायणः ॥

तपस्यध्ययने युक्तो भवेद्भूतानुकम्पकः ।

तपसा स्वर्गमाप्नोति तपसा विन्दते महत् ॥

तपोयुक्तस्य सिध्यन्ति कर्माणि नियतात्मनः ।

विद्वेषणं संहरणं मारणं रोगनाशनम् ॥

येन येनाथ ऋषिणा यदर्थं देवताः स्तुताः ।

स स कामः समृद्ध्येत तेषां तेषां तथा तथा ॥

तानि कर्माणि वक्ष्यामि विधानानि च कर्मणाम् ।

पुरश्चरणमादौ च कर्मणां सिद्धिकारकम् ॥

स्वाध्यायाभ्यसनस्यादौ प्राजापत्यं चरेद् द्विजः ।

केशश्मश्रुलोमनखान् वापयित्वा ततः शुचिः ॥

तिष्ठेदहनि रात्रौ तु शुचिरासीत वाग्यतः ।

सत्यवादी पवित्राणि जपेद्व्याहृतयस्तथा ॥

ॐकाराद्यास्तु ता जप्त्वा सावित्रीं च तदित्यृचम् ।

आपो हि ष्ठेति सूक्तं च पवित्रं पापनाशनम् ॥

पुनन्त्यः स्वस्तिमत्यश्च पावमान्यस्तथैव च ।

सर्वत्रैतत्प्रयोक्तव्यमादावन्ते च कर्मणाम् ॥

आसहस्त्रादाशताद्वाप्यादशादथवा जपेत् ।

ॐकारं व्याहृतीस्तिस्रः सावित्रीमथवायुतम् ॥

तर्पयित्वाद्भिराचार्यानृषींश्छन्दांसि देवताः ।

अनार्येण न भाषेत शूद्रेणापि न गर्हितैः ॥

नापि चोदक्यया वध्वा पतितैर्नान्त्यजैर्नृभिः ।

न देवब्राह्मणद्विष्टैर्नाचार्यगुरुनिन्दकैः ॥

जप करना चाहिये । इस प्रकार स्नान, पूजा, जप, २८ ध्यान, होम तथा तर्पणमें तत्पर रहना चाहिये और निष्काम होकर अपने सम्पूर्ण कर्म देवताको समर्पित कर देने चाहिये । पुरश्चरण करनेवाले व्यक्तिको २ ९ | चाहिये कि वह इन प्रारम्भिक नियमोंका पालन अवश्य करे । अतएव द्विजको प्रसन्न मनसे जप तथा होममें लगे रहना चाहिये । उसे तपस्या तथा अध्ययनमें ३० निरत और प्राणियोंके प्रति दयाभाववाला होना चाहिये ॥ २७ - २ ९ ३ ॥ मनुष्य तपस्यासे स्वर्ग प्राप्त करता है तथा ३१ तपस्यासे महान् फल पाता है । संयत आत्मावाला तपपरायण पुरुष विद्वेषण, संहरण, मारण तथा रोगशमन आदि सभी कार्योंको सिद्ध कर लेता है ॥ ३०-३१ ॥ ३२ जिस - जिस ऋषिने जिस - जिस प्रयोजनके लिये देवताओंकी स्तुति की, उन सभीकी वह Land वह कामना सिद्ध हुई । अब उन कर्मों तथा उनके विधानोंके ३३ विषयमें बताऊँगा । कर्मोंके आरम्भके पूर्व पुरश्चरण कर लेना कर्मसिद्धिका कारक होता है ॥ ३२-३३ ॥ स्वाध्यायाभ्यसन अर्थात् गायत्रीमन्त्रके पुरश्चरणमें ३४ द्विजको पहले प्राजापत्यव्रत करना चाहिये । इसके लिये सिर तथा दाढ़ीके केश और नखोंको कटाकर शुद्ध हो जाय । इसके बाद एक दिन - रात शरीरकी ३५ पवित्रता बनाये रखे । वाणीसे पवित्र रहे । सत्य भाषण करे और पवित्र मन्त्रोंका जप करे । गायत्रीकी व्याहृतियोंके आदिमें ॐकार लगाकर ' तत्सवितुः ०, ३६ इस सावित्री ऋचाका जप करना चाहिये । ' आपो हि ष्ठा ० ' यह सूक्त पवित्र तथा पापनाशक है । इसी प्रकार ‘ पुनन्त्यः स्वस्तिमत्यश्च ० ' एवं ' पावमान्यः ०, ३७ इन पवित्र मन्त्रोंका प्रयोग सभी कर्मोंके आदि तथा अन्तमें सर्वत्र करना चाहिये । शान्तिके लिये एक हजार, एक सौ अथवा दस बार इनका जप कर लेना चाहिये । ३८ अथवा ॐकार और तीनों व्याहृतियोंसहित गायत्रीमन्त्रका दस हजार जप करना चाहिये ॥ ३४ – ३८ ॥ आचार्यों, ऋषियों, छन्दों तथा देवताओंका ३ ९ जलसे तर्पण करना चाहिये । अनार्य, शूद्र, निन्द्य पुरुषों, ऋतुमती स्त्री, पुत्रवधू, पतितजनों, चाण्डालों, देवता - ब्राह्मणसे द्वेष रखनेवाले, आचार्य तथा गुरुकी ४० निन्दा करनेवाले और माता - पितासे द्वेष रखनेवाले

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अ ० २३ ] न मातृपितृविद्विष्टैर्नावमन्येत कञ्चन कृच्छ्राणामेष सर्वेषां विधिरुक्तोऽनुपूर्वशः प्राजापत्यस्य कृच्छ्रस्य तथा सान्तपनस्य च पराकस्य च कृच्छ्रस्य विधिश्चान्द्रायणस्य च पञ्चभिः पातकैः सर्वैर्दुष्कृतैश्च प्रमुच्यते तप्तकृच्छ्रेण सर्वाणि पापानि दहति क्षणात् त्रिभिश्चान्द्रायणैः पूतो ब्रह्मलोकं समश्नुते अष्टभिर्देवताः साक्षात्पश्येत वरदास्तदा छन्दांसि दशभिर्ज्ञात्वा सर्वान्कामान्समश्नुते त्र्यहं प्रातस्त्र्यहं सायं त्र्यहमद्यादयाचितम् ॥ त्र्यहं परं च नाश्नीयात्प्राजापत्यं चरेद् द्विजः गोमूत्रं गोमयं क्षीरं दधि सर्पिः कुशोदकम् ॥ एकरात्रोपवासश्च कृच्छ्रं सान्तपनं स्मृतम् एकैकं ग्रासमश्नीयादहानि त्रीणि पूर्ववत्

त्र्यहं चोपवसेदित्थमतिकृच्छ्रं चरेद् द्विजः ।

एवमेव त्रिभिर्युक्तं महासान्तपनं स्मृतम् ॥

तप्तकृच्छ्रं चरन्विप्रो जलक्षीरघृतानिलान् । प्रतित्र्यहं पिबेदुष्णान्सकृत्स्नायी समाहितः

नियतस्तु पिबेदापः प्राजापत्यविधिः स्मृतः ।

यतात्मनोऽप्रमत्तस्य द्वादशाहमभोजनम् ॥

एकादश स्कन्ध ७५५ । व्यक्तियोंके साथ बातचीत न करे तथा किसीका भी ॥ ४१ अपमान न करे । सम्पूर्ण कृच्छ्र व्रतोंकी यही विधि है, जिसका आनुपूर्वी वर्णन मैंने कर दिया ॥ ३ ९ -४१ ॥ अब कृच्छ्र, प्राजापत्य, सान्तपन, पराक, चान्द्रायण । आदि कृच्छ्र व्रतोंकी विधि कही जाती है । इसके ॥ ४२ प्रभावसे मनुष्य पाँच प्रकारके पातकों तथा समस्त दुष्कृत्योंसे मुक्त हो जाता है । तप्तकृच्छ्रव्रतसे मनुष्यके सम्पूर्ण पाप क्षणभरमें भस्म हो जाते हैं ॥ ४२-४३ ॥ । तीन चान्द्रायणव्रतोंको कर लेनेसे मनुष्य पवित्र ॥ ४३ होकर ब्रह्मलोकको प्राप्त होता है, आठ चान्द्रायणव्रतोंसे वर प्रदान करनेवाले देवताओंका साक्षात् दर्शन प्राप्त कर लेता है और दस चान्द्रायणव्रतोंके द्वारा वेदोंका । ज्ञान प्राप्त करके अपने सभी मनोरथोंको पूर्ण कर ॥ ४४ लेता है ॥ ४४ ॥

तीन दिन प्रातःकाल, तीन दिन सायंकाल तथा तीन दिन बिना माँगे प्राप्त हुआ भोज्यपदार्थ ग्रहण । करे । इसके बाद तीन दिनोंतक कुछ भी नहीं ग्रहण ४५ करना चाहिये; इस प्रकारसे द्विजको प्राजापत्यव्रत करना चाहिये ॥ ४५१ ॥

। प्रथम दिन गोमूत्र, गोमय, गोदुग्ध, दधि, घृत तथा कुशोदकको एकमें सम्मिश्रित करके पी ले; फिर ४६ दूसरे दिन उपवास करे – यह कृच्छ्रसान्तपनव्रत कहा जाता है ॥ ४६ ॥

। तीन दिनोंतक एक - एक ग्रास प्रातः काल तथा तीन दिनोंतक एक - एक ग्रास सायंकाल और तीन ॥ ४७ दिनोंतक अयाचित रूपसे एक - एक ग्रास ग्रहण करना चाहिये और तीन दिनोंतक उपवास करना चाहिये; इस प्रकार द्विजको अतिकृच्छ्रव्रत करना चाहिये । इस ४८ व्रतके नियमोंका तीन गुने रूपसे पालन करना महासान्तपनव्रत कहा गया है ॥ ४७-४८ ॥ इसी प्रकार तप्तकृच्छ्रव्रतका अनुष्ठान करनेवाले विप्रको चाहिये कि समाहितचित्त होकर ॥ ४ ९ तीन - तीन दिनोंतक क्रमसे उष्ण जल, उष्ण दुग्ध, उष्ण घृत तथा उष्ण वायुके आहारपर रहे और एक बार स्नान करे ॥ ४ ९ ॥ नियमपूर्वक केवल जल पीकर रहना ५० प्राजापत्यव्रतकी विधि कही गयी है । मनको अधिकारमें

पृष्ठ 765

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७५६ पराको नाम कृच्छ्रोऽयं सर्वपापप्रणोदनः एकैकं तु ग्रसेत्पिण्डं कृष्णे शुक्ले च वर्धयेत् अमावास्यां न भुञ्जीत एवं चान्द्रायणे विधिः उपस्पृश्य त्रिषवणमेतच्चान्द्रायणं स्मृतम् चतुरः प्रातरश्नीयाद्विप्रः पिण्डान्कृताह्निकः चतुरोऽस्तमिते सूर्ये शिशुचान्द्रायणं स्मृतम् ॥ अष्टावष्टौ समश्नीयात्पिण्डान्मध्यन्दिने स्थिते नियतात्मा हविष्यस्य यतिचान्द्रायणं व्रतम् एतद्रुद्रास्तथादित्या वसवश्च चरन्ति हि सर्वे कुशलिनो देवा मरुतश्च भुवा सह एकैकं सप्तरात्रेण पुनाति विधिवत्कृतम् । त्वगसृपिशितास्थीनि मेदोमज्जावसास्तथा एकैकं सप्तरात्रेण शुध्यत्येव न संशयः श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २३ । रखना, प्रमत्तकी भाँति आचरण न करना तथा बारह दिनोंतक उपवास करना - यही पराक नामक कृच्छ्रव्रत ॥ ५१ है: यह समस्त पापोंको नष्ट करनेवाला है ॥५०३ ॥

[ अब चान्द्रायणव्रतकी विधि कही जा रही । है ] - कृष्णपक्षमें एक - एक ग्रास कम करके तथा ॥ ५२ शुक्लपक्षमें एक - एक ग्रास बढ़ाकर आहार ग्रहण करना चाहिये तथा अमावास्याके दिन भोजन नहीं करना चाहिये - इस प्रकारकी विधिका चान्द्रायण-। व्रतमें पालन करना चाहिये । इसमें तीनों समय स्नान करनेका विधान है । इन सभी नियमोंका पालन ५३ चान्द्रायणव्रत कहा गया है ॥ ५१-५२ ॥ प्रात: काल स्नान आदि आह्निक कृत्य सम्पन्नकर । विप्र प्रातः चार ग्रास भोजन करे तथा सूर्यास्त हो ॥५४ जानेपर भी चार ही ग्रास ग्रहण करे, इसे शिशुचान्द्रायण– व्रत कहा गया है । संयमित आत्मावाले पुरुषको [ मासपर्यन्त ] दिनके मध्याह्नकालमें हविष्यके आठ-। आठ ग्रास ग्रहण करने चाहिये । इसे यतिचान्द्रायणव्रत ॥ ५५ | कहते हैं॥५३-५४ ॥ रुद्र, आदित्य, वसुगण, मरुद्गण, पृथ्वी तथा सभी कुशल देवता इस व्रतका अनुष्ठान सदैव करते रहते हैं । विधि - विधानसे किया गया यह व्रत सात ॥ ५६ रात्रिमें शरीरकी त्वचा, रक्त, मांस, अस्थि, मेद, मज्जा तथा वसा - इन धातुओंको एक - एक करके पवित्र कर देता है; इस प्रकार सात रातोंमें वह व्रती शुद्ध हो । जाता है, इसमें सन्देह नहीं है ॥ ५५-५६३ ॥ एभिर्व्रतैर्विपूतात्मा कर्म कुर्वीत नित्यशः ॥ ५७ अतएव व्रतीको चाहिये कि इन व्रतोंके द्वारा एवं शुद्धस्य कर्माणि सिध्यन्त्येव न संशयः । शुद्धात्मा कर्म कुर्वीत सत्यवादी जितेन्द्रियः इष्टान्कामांस्ततः सर्वान्सम्प्राप्नोति न संशयः । त्रिरात्रमेवोपवसेद्रहितः सर्वकर्मणा

त्रीणि नक्तानि वा कुर्यात्ततः कर्म समारभेत् ।

एवं विधानं कथितं पुरश्चर्याफलप्रदम् ॥

पवित्र मनवाला होकर सदा सत्कर्म करता रहे । इस प्रकार शुद्धिको प्राप्त हुए मनुष्यके सभी कार्य सिद्ध हो जाते हैं; इसमें कोई संशय नहीं है । मनुष्यको ॥ ५८ विशुद्धात्मा, सत्यवादी तथा जितेन्द्रिय होकर कर्म करना चाहिये; तभी वह अपनी सम्पूर्ण अभिलषित कामनाओंकी प्राप्ति करता है, इसमें सन्देह नहीं है ॥ ५७-५८३ ॥ ॥ ५ ९ सम्पूर्ण कर्मोंसे अनासक्त होकर पहले तीन दिन उपवास रखे अथवा तीन दिन केवल रातमें भोजन करे; इसके बाद कार्यका आरम्भ करे । यह विधान पुरश्चरणका फल प्रदान करनेवाला कहा ६० । गया है । हे देवर्षे! इस प्रकार मैंने सम्पूर्ण वांछित

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अ ० २४ ] एकादश

गायत्र्याश्च पुरश्चर्या सर्वकामप्रदायिनी ।

कथिता तव देवर्षे महापापविनाशिनी ॥ ६१

आदौ कुर्याद् व्रतं मन्त्री देहशोधनकारकम् ।

पुरश्चर्यां ततः कुर्यात्समस्तफलभाग्भवेत् ॥ ६२

इति ते कथितं गुह्यं पुरश्चर्याविधानकम् ।

एतत्परस्मै नो वाच्यं श्रुतिसारं यतः स्मृतम् ॥ ६३ ।

स्कन्ध ७५७ फल प्रदान करनेवाले तथा महान् पापोंका नाश करनेवाले गायत्रीपुरश्चरणका वर्णन आपसे कर दिया ॥ ५ ९ –६१ ॥ मन्त्रसाधकको आरम्भमें शरीरकी शुद्धि करनेवाला व्रत करना चाहिये । इसके बाद ही पुरश्चरण प्रारम्भ करना चाहिये, तभी साधक सम्पूर्ण फलका भागी होता है है ॥ ॥६२ ६२ ॥ ॥ [ हे नारद! ] इस प्रकार मैंने पुरश्चरणका यह गोपनीय विधान आपको बता दिया है । इसे दूसरोंको नहीं बताना चाहिये; क्योंकि यह श्रुतियोंका सार कहा गया है ॥ ६३ ॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायामेकादशस्कन्धे तप्तकृच्छ्रादिलक्षणवर्णनं नाम त्रयोविंशोऽध्यायः ॥ २३ ॥

अथ चतुर्विंशोऽध्यायः कामना - सिद्धि और उपद्रव - शान्तिके लिये गायत्रीके विविध प्रयोग नारद उवाच

नारायण महाभाग गायत्र्यास्तु समासतः ।

शान्त्यादिकान्प्रयोगांस्तु वदस्व करुणानिधे ॥

श्रीनारायण उवाच

अतिगुह्यमिदं पृष्टं त्वया ब्रह्मतनूद्भव ।

न कस्यापि च वक्तव्यं दुष्टाय पिशुनाय च ॥

अथ शान्तिः पयोऽक्ताभिः समिद्भिर्जुहुयाद् द्विजः ।

शमीसमिद्भिः शाम्यन्ति भूतरोगग्रहादयः ॥

आर्द्राभिः क्षीरवृक्षस्य समिद्भिर्जुहुयाद् द्विजः ।

जुहुयाच्छकलैर्वापि भूतरोगादिशान्तये ॥

जलेन तर्पयेत्सूर्यं पाणिभ्यां शान्तिमाप्नुयात् ।

जानुदघ्ने जले जप्त्वा सर्वान्दोषाञ्छमं नयेत् ॥

कण्ठदघ्ने जले जप्त्वा मुच्येत्प्राणान्तिकाद्भयात् ।

सर्वेभ्यः शान्तिकर्मभ्यो निमज्याप्सु जपः स्मृतः ॥

नारदजी बोले - हे महाभाग! हे नारायण! हे करुणा - निधान! अब आप गायत्रीके शान्ति आदिसे १ सम्बद्ध प्रयोगोंका संक्षेपमें वर्णन कीजिये ॥ १ ॥

श्रीनारायण बोले – हे ब्रह्मापुत्र! आपने यह अत्यन्त गोपनीय बात पूछी है; किसी भी दुष्ट तथा चुगलखोरको इसे नहीं बताना चाहिये ॥ २ ॥

हे नारद! अब मैं शान्तिका वर्णन करता हूँ । २ द्विजको दुग्धमिश्रित समिधाओंसे हवन करना चाहिये । शमीकी समिधाओंसे भूत, रोग, ग्रह आदि शान्त हो जाते हैं । द्विजको चाहिये कि भूत, रोग आदिकी शान्तिके ३ लिये क्षीरवृक्ष ( पीपल, गूलर, पाकड़, वट आदि ) -की गीली समिधाओंसे हवन करे अथवा उन क्षीरवृक्षोंकी समिधाओंके खण्डोंसे हवन करे ॥ ३-४ ॥ ४ दोनों हाथोंमें जल लेकर सूर्यका तर्पण करे और इससे शान्ति प्राप्त करे । जानुपर्यन्त जलमें स्थित होकर गायत्रीका जप करके अपने सभी दोषोंको शान्त करे । कण्ठपर्यन्त जलमें स्थित होकर जप ५ करनेसे मनुष्य प्राणका अन्त करनेवाले भयसे भी मुक्त हो जाता है । सभी प्रकारके शान्तिकर्मोंके लिये जलमें निमग्न होकर गायत्रीका जप करना ६ । बताया गया है ॥ ५-६ ॥

पृष्ठ 767

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७५८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २४ सौवर्णे राजते वापि पात्रे ताम्रमयेऽपि वा क्षीरवृक्षमये वापि निर्व्रणे मृण्मयेऽपि वा सहस्त्रं पञ्चगव्येन हुत्वा सुज्वलितेऽनले क्षीरवृक्षमयैः काष्ठैः शेषं सम्पादयेच्छनैः प्रत्याहुतिं स्पृशञ्जप्त्वा सहस्त्रं पात्रसंस्थितम् तेन तं प्रोक्षयेद्देशं कुशैर्मन्त्रमनुस्मरन् ॥

बलिं किरंस्ततस्तस्मिन्ध्यायेत्तु परदेवताम् ।

अभिचारसमुत्पन्ना कृत्या पापं च नश्यति ॥

देवभूतपिशाचाद्यान् यद्येवं कुरुते वशे ।

गृहं ग्रामं पुरं राष्ट्रं सर्वं तेभ्यो विमुच्यते ॥

निखने मुच्यते तेभ्यो लिखने मध्यतोऽपि च ।

मण्डले शूलमालिख्य पूर्वोक्ते च क्रमेऽपि वा ॥

अभिमन्त्र्य सहस्त्रं तन्निखनेत्सर्वशान्तये ।

सौवर्णं राजतं वापि कुम्भं ताम्रमयं च वा ॥

मृण्मयं वा नवं दिव्यं सूत्रवेष्टितमव्रणम् ।

स्थण्डिले सैकते स्थाप्य पूरयेन्मन्त्रविज्जलैः ॥

दिग्भ्य आहृत्य तीर्थानि चतसृभ्यो द्विजोत्तमैः ।

एलाचन्दनकर्पूरजातीपाटलमल्लिकाः ॥

बिल्वपत्रं तथा क्रान्तां देवीं व्रीहियवांस्तिलान् ।

सर्षपान्क्षीरवृक्षाणां प्रवालानि च निक्षिपेत् ॥

सर्वाण्यभिविधायैवं कुशकूर्चसमन्वितम् ।

स्नातः समाहितो विप्रः सहस्त्रं मन्त्रयेद् बुधः ॥

। [ अब दूसरा प्रयोग कहा जाता है— ] सोना, चाँदी, ताँबा, मिट्टी अथवा दूधवाले वृक्षकी लकड़ीके ॥ ७ छिद्ररहित पात्रमें रखे हुए पंचगव्यद्वारा प्रज्वलित अग्निमें क्षीरवाले वृक्षकी समिधाओंसे एक हजार । गायत्रीमन्त्रका उच्चारण करके हवन करे । यह कार्य ॥ ८ धीरे - धीरे सम्पन्न करे । प्रत्येक आहुतिके समय पंचगव्यका स्पर्श करते हुए हवन करके पात्रमें । अवशिष्ट पंचगव्यको हजार बार गायत्रीमन्त्रसे ९ अभिमन्त्रितकर मन्त्रका स्मरण करते हुए कुशोंद्वारा पंचगव्यसे वहाँके स्थानका प्रोक्षण करे ॥ ७ – ९ ॥ तदनन्तर बलि - द्रव्य विकीर्ण करते हुए इष्ट देवताका ध्यान करना चाहिये । ऐसा करनेसे अभिचार १० कर्मोंसे उत्पन्न कृत्या तथा पापका नाश हो जाता है । यदि कोई ऐसा करता है तो देवता, भूत तथा पिशाच उसके वशीभूत हो जाते हैं । साथ ही उसके इस ११ कर्मसे गृह, ग्राम, पुर तथा राष्ट्र — ये सब उनके अनिष्टकारी प्रभावसे मुक्त हो जाते हैं ॥ १०-११ ॥ भूमिपर चतुष्कोणमण्डल बनाकर उसके मध्य भागमें गायत्रीमन्त्र पढ़कर त्रिशूल गाड़ दे । इससे भी १२ उन पिशाचादिसे मनुष्य मुक्ति प्राप्त कर लेता है । अथवा मन्त्रज्ञ पुरुषको चाहिये कि सभी प्रकारकी शान्तिके लिये पूर्वोक्त मण्डलमें ही गायत्रीके एक १३ हजार मन्त्रसे अभिमन्त्रित करके त्रिशूलको गाड़े और वहाँपर सोने, चाँदी, ताँबा अथवा मिट्टीका एक छिद्ररहित, सूत्रवेष्टित नवीन तथा दिव्य कलश बालूसे बनी हुई एक वेदीपर स्थापित करके जलसे उसे भर १४ दे ॥१२–१४ ॥ तत्पश्चात् श्रेष्ठ द्विजको चारों दिशाओंके तीर्थोंका उसमें आवाहन करके इलायची, चन्दन, कपूर, जाती, १५ गुलाब, मालती, बिल्वपत्र, विष्णुक्रान्ता, सहदेवी, धान, यव, तिल, सरसों तथा दूधवाले वृक्षोंके कोमल पत्तोंको उस कलशमें छोड़ देना चाहिये और उसमें १६ कुशोंसे बनाया गया एक कूर्च भी रख देना चाहिये । इस प्रकार सब कुछ सम्पन्न हो जानेपर स्नान आदि से पवित्र बुद्धिमान् विप्रको एकाग्रचित्त होकर एक हजार गायत्रीमन्त्रसे उस कलशको अभिमन्त्रित करना १७ | चाहिये ॥ १५–१७ ॥

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अ ० २४ ] दिक्षु सौरानधीयीरन्मन्त्रान्विप्रास्त्रयीविदः प्रोक्षयेत्पाययेदेनं नीरं तेनाभिषिञ्चयेत् भूतरोगाभिचारेभ्यः स निर्मुक्तः सुखी भवेत् अभिषेकेण मुच्येत मृत्योरास्यगतो नरः अवश्यं कारयेद्विद्वान्राजा दीर्घं जिजीविषुः गावो देयाश्च ऋत्विग्भ्य अभिषेके शतं मुने दक्षिणा येन वा तुष्टिर्यथाशक्त्याथवा भवेत् जपेदश्वत्थमालभ्य मन्दवारे शतं द्विजः भूतरोगाभिचारेभ्यो मुच्यते महतो भयात् गुडूच्याः पर्वविच्छिन्नाः पयोऽक्ता जुहुयाद् द्विजः एवं मृत्युञ्जयो होमः सर्वव्याधिविनाशनः आम्रस्य जुहुयात्पत्रैः पयोऽक्तैर्ज्वरशान्तये ॥ वचाभिः पयसाक्ताभिः क्षयं हुत्वा विनाशयेत् मधुत्रितयहोमेन राजयक्ष्मा विनश्यति निवेद्य भास्करायान्नं पायसं होमपूर्वकम् । राजयक्ष्माभिभूतं च प्राशयेच्छान्तिमाप्नुयात् लताः पर्वसु विच्छिद्य सोमस्य जुहुयाद् द्विजः । सोमे सूर्येण संयुक्ते पयोक्ताः क्षयशान्तये

कुसुमैः शङ्खवृक्षस्य हुत्वा कुष्ठं विनाशयेत् ।

अपस्मारविनाशः स्यादपामार्गस्य तण्डुलैः ॥

एकादश स्कन्ध ७५ ९ । पुनः वेदज्ञ ब्राह्मणोंको चारों दिशाओंमें बैठकर ॥ १८ सूर्य - सम्बन्धी मन्त्रोंका पाठ करना चाहिये । उस भूतादिग्रस्त पुरुषको वह अभिमन्त्रित जल पिलाना चाहिये और उसीसे उसका प्रोक्षण तथा अभिषेक भी । करना चाहिये । इस अभिषेकसे वह व्यक्ति भूतों, रोगों ॥ १ ९ तथा अभिचारोंसे मुक्त होकर सुखी हो जाता है; साक्षात् मृत्युके मुखमें गया हुआ प्राणी भी अभिषेकसे मुक्त हो जाता है ॥ १८-१९ ॥ । दीर्घ कालतक जीवन धारण करनेकी अभिलाषा ॥ २० रखनेवाले विद्वान् राजाको ऐसे अनुष्ठान अवश्य कराने चाहिये । हे मुने! अभिषेककी समाप्तिपर ऋत्विजोंको एक सौ गायें प्रदान करनी चाहिये और । दक्षिणा उतनी हो, जिससे ऋत्विक् सन्तुष्ट हो जायँ ॥ २१ अथवा अपनी सामर्थ्यके अनुसार भी दक्षिणा दी जा सकती है ॥ २०३ ॥

द्विजको चाहिये कि शनिवारको पीपलवृक्षके । नीचे गायत्रीका सौ बार जप करे । इससे वह भूत, ॥ २२ रोग तथा अभिचारसे उत्पन्न महान् भयसे मुक्त हो जाता है ॥ २१३ ॥

। द्विजको गाँठोंपरसे खण्ड - खण्ड किये गये २३ गुरुको दूधमें भिगोकर उससे हवन करना चाहिये । यह ‘ मृत्युंजयहोम ' है, जो समस्त व्याधियोंका नाश करनेवाला है ॥ २२३ ॥

। ज्वरकी शान्तिके लिये दूधमें भिगोये गये आमके ॥ २४ पत्तोंकी आहुति देनी चाहिये । दूधमें भिगोये गये ' वच ' का हवन करनेसे क्षयरोग समाप्त हो जाता है । तीनों मधु ( दूध, दही, घृत ) - से किये गये हवनसे राजयक्ष्मा नष्ट हो जाता है । खीरका हवन करके उसे ॥ २५ सूर्यको अर्पित करनेके बाद राजयक्ष्मासे ग्रस्त पुरुषको [ प्रसाद - रूपमें ] उसका प्राशन कराना चाहिये, जिससे

रोग शान्त हो जाता है । २३ - २५ ॥

द्विजको क्षयरोगकी शान्तिके लिये सोमलताको ॥ २६ गाँठोंपरसे अलग - अलग करके उसे दूधमें भिगोकर अमावास्या तिथिको उससे हवन करना चाहिये । शंखवृक्षके पुष्पोंसे हवन करके कुष्ठरोग दूर करे । इसी तरह अपामार्गके बीजोंसे हवन करनेपर अपस्मार २७ । ( मिर्गी ) रोगका नाश हो जाता है ॥ २६-२७ ॥

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७६० श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २४

क्षीरवृक्षसमिद्धोमादुन्मादोऽपि विनश्यति ।

औदुम्बरसमिद्धोमादतिमेहः क्षयं व्रजेत् ॥

प्रमेहं शमयेधुत्वा मधुनेक्षुरसेन वा ।

मधुत्रितयहोमेन नयेच्छान्तिं मसूरिकाम् ॥

कपिलासर्पिषा हुत्वा नयेच्छान्तिं मसूरिकाम् ।

उदुम्बरवटाश्वत्थैगगजाश्वामयं हरेत् ॥

पिपीलिमधुवल्मीके गृहे जाते शतं शतम् ।

शमीसमिद्भिरन्नेन सर्पिषा जुहुयाद् द्विजः ॥

तदुत्थं शान्तिमायाति शेषैस्तत्र बलिं हरेत् ।

अभ्रस्तनितभूकम्पालक्ष्यादौ वनवेतसः ॥

सप्ताहं जुहुयादेवं राष्ट्रे राज्यं सुखी भवेत् ।

यां दिशं शतजप्तेन लोष्ठेनाभिप्रताडयेत् ॥

ततोऽग्निमारुतारिभ्यो भयं तस्य विनश्यति ।

मनसैव जपेदेनां बद्धो मुच्येत बन्धनात् ॥

भूतरोगविषादिभ्यः स्पृशञ्जप्त्वा विमोचयेत् ।

भूतादिभ्यो विमुच्येत जलं पीत्वाभिमन्त्रितम् ॥

अभिमन्त्र्य शतं भस्म न्यसेद्भूतादिशान्तये ।

शिरसा धारयेद्भस्म मन्त्रयित्वा तदित्यृचा ॥

सर्वव्याधिविनिर्मुक्तः सुखी जीवेच्छतं समाः ।

अशक्तः कारयेच्छान्तिं विप्रं दत्त्वा तु दक्षिणाम् ॥

क्षीरवृक्षकी समिधासे किये गये होमसे उन्माद रोग दूर हो जाता है । गूलरकी समिधासे हवन करनेपर २८ अतिमेहरोग नष्ट हो जाता है; साथ ही मधु अथवा ईखके रससे हवन करके मनुष्य प्रमेहरोगको शान्त कर सकता है । मनुष्य त्रिमधु ( दूध, दही और घी ) -के हवनसे चेचकरोगको समाप्त कर सकता है, उसी २ ९ प्रकार कपिला गाय के घीसे हवन करके भी चेचकरोगको शान्त कर सकता है और गूलर, वट तथा पीपलकी समिधाओंसे हवन करके गाय, घोड़े और हाथियोंके रोगको नष्ट कर सकता है ॥ २८-३० ॥ ३० पिपीलिका और मधुवल्मीक जन्तुओंका घरमें उपद्रव होनेपर घृतयुक्त शमीकी समिधाओं तथा भातसे प्रत्येक कार्यके लिये सौ - सौ आहुतियाँ द्विजको ३१ देनी चाहिये | ऐसा करनेसे उनके द्वारा उत्पन्न उपद्रव शान्त हो जाता है । इसके बाद बचे हुए पदार्थोंसे वहाँ बलि प्रदान करनी चाहिये ॥ ३१ ॥

बिजली गिरने और भूकम्प आदिके लक्षित ३२ होनेपर जंगली बेंतकी समिधासे सात दिनोंतक हवन करना चाहिये; इससे राष्ट्रमें राज्यसुख विद्यमान रहता है ॥ ३२३ ॥

कोई पुरुष सौ बार गायत्रीमन्त्रका जप करके ३३ जिस दिशामें मिट्टीका ढेला फेंकता है, उसे उस दिशामें अग्नि, हवा तथा शत्रुओंसे होनेवाला भय दूर हो जाता है । मन - ही - मन इस गायत्रीका जप करना चाहिये; इससे बन्धनमें पड़ा मनुष्य उस बन्धनसे छूट ३४ जाता है॥३३-३४ ॥ कोई मनुष्य भूत, रोग तथा विषसे संग्रस्त व्यक्तिको स्पर्श करते हुए गायत्रीका जप करके इनसे मुक्त कर देता है । गायत्रीसे अभिमन्त्रित जल पीकर ३५ मनुष्य भूत - प्रेतादिसे मुक्त हो जाता है ॥ ३५ ॥

भूत आदिसे शान्तिके लिये गायत्रीमन्त्रका सौ बार उच्चारण करके भस्मको अभिमन्त्रितकर उसे रख लेना चाहिये और ' तत्सवितु ० ' ऋचासे उस भस्मको ३६ सिरपर धारण करना चाहिये ॥ ३६ ॥

ऐसा करनेसे वह पुरुष समस्त व्याधियों से मुक्त होकर सौ वर्षतक सुखपूर्वक जीता है । यदि कोई इसे करनेमें असमर्थ हो तो किसी विप्रको दक्षिणा देकर ३७ उससे शान्ति - कर्म करा लेना चाहिये ॥ ३७ ॥

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अ ० २४ ] एकादश

अथ पुष्टिं श्रियं लक्ष्मीं पुष्पैर्हुत्वाप्नुयाद् द्विजः ।

श्रीकामो जुहुयात्पद्यै रक्तैः श्रियमवाप्नुयात् ॥ ३८

हुत्वा श्रियमवाप्नोति जातीपुष्पैर्नवैः शुभैः ।

शालितण्डुलहोमेन श्रियमाप्नोति पुष्कलाम् ॥ ३ ९

समिद्भिर्बिल्ववृक्षस्य हुत्वा श्रियमवाप्नुयात् ।

बिल्वस्य शकलैर्हुत्वा पत्रैः पुष्पैः फलैरपि ॥ ४०

श्रियमाप्नोति परमां मूलस्य शकलैरपि ।

समिद्भिर्बिल्ववृक्षस्य पायसेन च सर्पिषा ॥ ४१

शतं शतं च सप्ताहं हुत्वा श्रियमवाप्नुयात् ।

लाजैस्त्रिमधुरोपेतैर्होमे कन्यामवाप्नुयात् ॥ ४२

अनेन विधिना कन्या वरमाप्नोति वाञ्छितम् ।

रक्तोत्पलशतं हुत्वा सप्ताहं हेम चाप्नुयात् ॥ ४३ ।

सूर्यबिम्बे जलं हुत्वा जलस्थं हेम चाप्नुयात् ।

अन्नं हुत्वाप्नुयादन्नं व्रीहीन्व्रीहिपतिर्भवेत् ॥ ४४

करीषचूर्णैर्वत्सस्य हुत्वा पशुमवाप्नुयात् ।

प्रियङ्गुपायसाज्यैश्च भवेद्धोमादिभिः प्रजा ॥ ४५

निवेद्य भास्करायान्नं पायसं होमपूर्वकम् ।

भोजयेत्तदृतुस्नातां पुत्रं परमवाप्नुयात् ॥ ४६

सप्ररोहाभिरार्द्राभिरायुर्हुत्वा समाप्नुयात् ।

समिद्भिः क्षीरवृक्षस्य हुत्वायुषमवाप्नुयात् ॥ ४७

सप्ररोहाभिरार्द्राभी रक्ताभिर्मधुरत्रयैः ।

व्रीहीणां च शतं हुत्वा हेम चायुरवाप्नुयात् ॥ ४८ ।

स्कन्ध ७६१ पुष्पोंकी आहुति देकर द्विज पुष्टि, श्री तथा लक्ष्मी प्राप्त करता है । लक्ष्मीकी कामना करनेवाले पुरुषको लाल कमलपुष्पोंसे हवन करना चाहिये, इससे वह श्रीकी प्राप्ति करता है । जाती नवीन शुभ पुष्पोंसे आहुति देकर मनुष्य लक्ष्मी प्राप्त करता है तथा शालिके चावलोंके हवनसे वियुक्त लक्ष्मी प्राप्त करता है । बिल्ववृक्षकी समिधाओंसे हवन करके मनुष्य लक्ष्मी प्राप्त करता है । साथ ही बिल्वफलके खण्डों, पत्तों, पुष्पों, फलों तथा बिल्व-वृक्षके मूलके खण्डोंसे हवन करके उत्तम लक्ष्मी प्राप्त करता है । इसी प्रकार खीर तथा घृतसे मिश्रित बिल्ववृक्षकी समिधाओंकी सात दिनोंतक सौ - सौ आहुतियाँ देकर मनुष्य लक्ष्मीको प्राप्त कर लेता है ॥ ३८–४१३ ॥ मधुत्रय ( दूध, दही, घी ) - से युक्त लावाका हवन करनेसे पुरुष कन्या प्राप्त करता है और इसी विधिसे कन्या भी अभिलषित वर प्राप्त कर लेती है । एक सप्ताहतक रक्तकमलकी सौ आहुतियाँ देकर पुरुष सुवर्ण प्राप्त कर लेता है और सूर्यके बिम्बमें जलकी आहुति देकर मनुष्य जलमें स्थित सोना प्राप्त कर लेता है ॥ ४२-४३३ ॥ अन्नका हवन करके मनुष्य अन्न प्राप्त करता है तथा व्रीहिका हवन करके व्रीहिका स्वामी हो जाता है । बछड़ेके गोमयके चूर्णसे हवन करके पुरुष पशुओं की प्राप्ति करता है । प्रियंगु, दूध तथा घीके द्वारा हवनसे प्रजा – सन्तान प्राप्त होती है । खीरका हवन करके तथा सूर्यको निवेदित करके उसे ऋतुस्नाता स्त्रीको खिलाये; ऐसा करनेवाला पुरुष श्रेष्ठ पुत्र प्राप्त करता है॥४४–४६ ॥ अंकुरित शाखाओंवाली आर्द्र समिधाओंसे हवन करनेपर आयुकी प्राप्ति होती है । इसी प्रकार दूधवाले वृक्षोंकी समिधासे हवन करके मनुष्य आयु प्राप्त करता है । अंकुरित शाखाओंवाली गीली, लाल समिधाओं और मधुत्रय ( दूध, दही, घी ) - से युक्त व्रीहिकी सौ आहुति देकर मनुष्य स्वर्ण तथा दीर्घ आयु प्राप्त करता है ॥ ४७-४८ ॥