देवी भागवत उत्तरार्द्ध — पृष्ठ 771–780
देवी भागवत उत्तरार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 771–780
पृष्ठ 771
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
७६२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २४
सुवर्णकुड्मलं हुत्वा शतमायुरवाप्नुयात् ।
दूर्वाभिः पयसा वापि मधुना सर्पिषापि वा ॥ ४ ९
शतं शतं च सप्ताहमपमृत्युं व्यपोहति ।
शमीसमिद्भिरन्नेन पयसा वा च सर्पिषा ॥ ५०
शतं शतं च सप्ताहमपमृत्युं व्यपोहति ।
न्यग्रोधसमिधो हुत्वा पायसं होमयेत्ततः ॥ ५१
शतं शतं च सप्ताहमपमृत्युं व्यपोहति ।
क्षीराहारो जपेन्मृत्योः सप्ताहाद्विजयी भवेत् ॥ ५२
अनश्नन्वाग्यतो जप्त्वा त्रिरात्रं मुच्यते यमात् ।
निमज्ज्याप्सु जपेदेवं सद्यो मृत्योर्विमुच्यते ॥ ५३
जपेद् बिल्वं समाश्रित्य मासं राज्यमवाप्नुयात् ।
बिल्वं हुत्वाप्नुयाद्राज्यं समूलफलपल्लवम् ॥५४
हुत्वा पद्मशतं मासं राज्यमाप्नोत्यकण्टकम् ।
यवागूं ग्राममाप्नोति हुत्वा शालिसमन्वितम् ॥ ५५
अश्वत्थसमिधो हुत्वा युद्धादौ जयमाप्नुयात् ।
अर्कस्य समिधो हुत्वा सर्वत्र विजयी भवेत् ॥५६
संयुक्तैः पयसा पत्रैः पुष्यैर्वा वेतसस्य च ।
पायसेन शतं हुत्वा सप्ताहं वृष्टिमाप्नुयात् ॥ ५७
नाभिदघ्ने जले जप्त्वा सप्ताहं वृष्टिमाप्नुयात् ।
जले भस्मशतं हुत्वा महावृष्टिं निवारयेत् ॥ ५८
पालाशाभिरवाप्नोति समिद्भिर्ब्रह्मवर्चसम् ।
पलाशकुसुमैर्हुत्वा सर्वमिष्टमवाप्नुयात् ॥ ५ ९
पयो हुत्वाप्नुयान्मेधामाज्यं बुद्धिमवाप्नुयात् ।
अभिमन्त्र्य पिबेद् ब्राह्मं रसं मेधामवाप्नुयात् ॥ ६० ।
सुनहरे रंगके कमलकी आहुति देकर मनुष्य सौ वर्षकी आयु प्राप्त करता है । दूर्वा, दूध, मधु अथवा घीसे सप्ताहपर्यन्त प्रतिदिन सौ - सौ आहुति देकर मनुष्य अपमृत्यु दूर कर देता है । उसी प्रकार शमीकी समिधाओं, अन्न, दूध तथा घीसे एक सप्ताहतक प्रतिदिन सौ - सौ आहुतियोंसे अपमृत्युका विनाश कर देता है । बरगदकी समिधाओंसे हवन करके खीरका हवन करना चाहिये; एक सप्ताहतक प्रतिदिन इनकी सौ - सौ आहुतियोंसे मनुष्य अपमृत्युको नष्ट कर देता है । यदि कोई दुग्ध आहारपर रहकर गायत्रीका जप करे तो वह सप्ताहभरमें मृत्युपर विजय प्राप्त कर लेता है और बिना कुछ आहार ग्रहण किये मौन रहकर जप करे तो तीन रातमें ही यमसे मुक्ति प्राप्त कर लेता है । इसी प्रकार यदि जलमें निमग्न होकर जप करे तो वह उसी क्षण मृत्युसे मुक्ति पा लेता है ॥ ४ ९ –५३ ॥ बिल्ववृक्षके नीचे जप करनेसे एक मासमें राज्य मिल जाता है । बिल्ववृक्षके मूल, फल तथा पल्लवकी आहुति से भी मनुष्य राज्य प्राप्त कर लेता है ॥५४ ॥
एक मासतक कमलकी सौ आहुति देनेपर मनुष्य निष्कण्टक राज्य प्राप्त करता है । शालिचावलकी लपसीकी आहुतिसे ग्रामकी प्राप्ति होती है । पीपलवृक्षकी समिधाओंसे हवन करके मनुष्य युद्ध आदिमें विजय करता है और मदारकी समिधाओंसे हवन करके सभी जगह विजयी सिद्ध होता है ॥ ५५-५६ ॥ दुग्ध तथा खीरसे युक्त बेंतके पुष्पों अथवा पत्रोंसे सप्ताहपर्यन्त सौ - सौ आहुति देनेसे वृष्टि प्राप्त होती है । नाभिपर्यन्त जलमें खड़े रहकर एक सप्ताहतक जप करनेसे वृष्टि होती है । जलमें भस्मकी सौ आहुति देनेसे महावृष्टिका निवारण हो जाता है ॥ ५७-५८ ॥ पलाशकी समिधाओंसे हवन करके मनुष्य ब्रह्मतेज प्राप्त करता है और पलाशके पुष्पोंसे हवनद्वारा उसे समस्त अभीष्टकी प्राप्ति हो जाती है ॥ ५ ९ ॥ मनुष्य दूधकी आहुति देकर मेधा तथा घीकी आहुति देकर बुद्धि प्राप्त करता है । गायत्रीमन्त्रसे अभिमन्त्रित ब्राह्मीके रसका पान करनेसे मनुष्यको मेधाकी प्राप्ति होती है ॥६० ॥
पृष्ठ 772
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० २४ ] एकादश स्कन्ध ७६३
पुष्पहोमे भवेद्वासस्तन्तुभिस्तद्विधं पटम् ।
लवणं मधुसम्मिश्रं हुत्वेष्टं वशमानयेत् ॥
नयेदिष्टं वशं हुत्वा लक्ष्मीपुष्पैर्मधुप्लुतैः ।
नित्यमञ्जलिनात्मानमभिषिञ्चेज्जले स्थितः ॥
मतिमारोग्यमायुष्यमग्र्यं स्वास्थ्यमवाप्नुयात् ।
कुर्याद्विप्रोऽन्यमुद्दिश्य सोऽपि पुष्टिमवाप्नुयात् ॥
अथ चारुविधिर्मासं सहस्त्रं प्रत्यहं जपेत् ।
आयुष्कामः शुचौ देशे प्राप्नुयादायुरुत्तमम् ॥
आयुरारोग्यकामस्तु जपेन्मासद्वयं द्विजः ।
भवेदायुष्यमारोग्यं श्रियै मासत्रयं जपेत् ॥
आयुः श्रीपुत्रदाराद्याश्चतुर्भिश्च यशो जपात् ।
पुत्रदारायुरारोग्यं श्रियं विद्यां च पञ्चभिः ॥
एवमेवोत्तरान्कामान् मासैरेवोत्तरैर्व्रजेत् ।
एकपादो जपेदूर्ध्वबाहुः स्थित्वा निराश्रयः ॥
मासं शतत्रयं विप्रः सर्वान्कामानवाप्नुयात् ।
एवं शतोत्तरं जप्त्वा सहस्त्रं सर्वमाप्नुयात् ॥
रुद्ध्वा प्राणमपानं च जपेन्मासं शतत्रयम् ।
यदिच्छेत्तदवाप्नोति सहस्त्रात्परमाप्नुयात् ॥
ब्राह्मीपुष्पोंके हवनसे सुगन्ध तथा उसके तन्तुओंके हवनसे उसीके समान वस्त्रकी प्राप्ति होती है । मधु-६१ मिश्रित लवणकी आहुति देकर मनुष्य अभीष्टको वशमें कर लेता है । इसी प्रकार शहदसे सिक्त किये गये बिल्वपुष्पोंसे हवन करनेपर मनुष्य अपने इष्टको वशमें कर लेता है । जलमें खड़े होकर [ गायत्रीमन्त्रका ६२ जप करते हुए ] अंजलिसे अपने ऊपर नित्य अभिषेक करनेसे मनुष्य बुद्धि, आरोग्य, उत्तम आयु और स्वास्थ्य प्राप्त करता है । यदि किसी अन्य व्यक्तिके निमित्त कोई ब्राह्मण ऐसा करे तो वह भी पुष्टि प्राप्त ६३ करता है॥६१–६३ ॥ आयुकी कामना करनेवालेको किसी पवित्र स्थानमें उत्तम विधिके साथ मासपर्यन्त प्रतिदिन एक - एक हजार गायत्रीका जप करना चाहिये; ६४ इससे उसे उत्तम आयु प्राप्त होती है । आयु तथा आरोग्य दोनोंकी कामना करनेवाले द्विजको दो मासतक गायत्री जप करना चाहिये । इसी प्रकार आयु, आरोग्य तथा लक्ष्मीकी कामना करनेवालेको ६५ तीन मासतक जप करना चाहिये । द्विजको चार मासतक जप करनेसे आयु, लक्ष्मी, पुत्र, स्त्री तथा यशकी प्राप्ति होती है और पाँच मासतक जप करनेसे पुत्र, स्त्री, आयु, आरोग्य, लक्ष्मी और ६६ विद्याकी प्राप्ति होती है । इस तरहसे जितने मनोरथ संख्यामें बढ़ते जायँ, उसीके अनुसार जपके लिये मास - संख्या भी बढ़ानी चाहिये । विप्रको एक पैरपर स्थित होकर बिना किसी आश्रयके बाँहोंको ऊपर किये हुए तीन सौ गायत्रीमन्त्रोंका प्रतिदिन मास-६७ पर्यन्त जप करना चाहिये; ऐसा करनेसे वह सभी मनोरथोंको पूर्ण कर लेता है । इस प्रकार ग्यारह सौ मन्त्र नित्य मासपर्यन्त जप करके वह सब कुछ प्राप्त कर लेता है ॥ ६४–६८ ॥ ६८ प्राण और अपान वायु रोककर प्रतिदिन तीन सौ गायत्रीमन्त्रका जप मासपर्यन्त करनेसे पुरुषको वह सब कुछ प्राप्त हो जाता है, जिसकी वह अभिलाषा रखता है; और इसी तरह एक हजार जप करनेसे ६ ९ । सर्वस्वकी प्राप्ति हो जाती है ॥ ६ ९ ॥
पृष्ठ 773
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
७६४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २४ एकपादो जपेदूर्ध्वबाहू रुद्ध्वानिलं वशः । इन्द्रियोंको वशमें करके एक पैरपर स्थित होकर मासं शतमवाप्नोति यदिच्छेदिति कौशिकः ॥ ७० बाँहें ऊपर उठाये हुए श्वास निरुद्ध करके मासभर प्रतिदिन एक सौ गायत्रीमन्त्र जपनेसे मनुष्य जो चाहता है, उसकी वह अभिलाषा पूर्ण हो जाती है-एवं शतत्रयं जप्त्वा सहस्त्रं सर्वमाप्नुयात् । ऐसा विश्वामित्रजीका कथन है । इसी प्रकार तेरह सौ निमज्ज्याप्सु जपेन्मासं शतमिष्टमवाप्नुयात् एवं शतत्रयं जप्त्वा सहस्त्रं सर्वमाप्नुयात् एकपादो जपेदूर्ध्वबाहू रुद्ध्वा निराश्रयः नक्तमश्नन् हविष्यान्नं वत्सरादृषितामियात् गीरमोघा भवेदेवं जप्त्वा संवत्सरद्वयम् ॥ त्रिवत्सरं जपेदेवं भवेत्त्रैकालदर्शनम् । आयाति भगवान्देवश्चतुः संवत्सरं जपेत्
पञ्चभिर्वत्सरैरेवमणिमादिगुणो भवेत् ।
एवं षड्वत्सरं जप्त्वा कामरूपित्वमाप्नुयात् ॥
सप्तभिर्वत्सरैरेवममरत्वमवाप्नुयात् मनुत्वं नवभिः सिद्धमिन्द्रत्वं दशभिर्भवेत् ॥
एकादशभिराप्नोति प्राजापत्यं सुवत्सरैः ।
ब्रह्मत्वं प्राप्नुयादेवं जप्त्वा द्वादशवत्सरान् ॥
एतेनैव जिता लोकास्तपसा नारदादिभिः ।
शाकमन्ये परे मूलं फलमन्ये पयः परे ॥
घृतमन्ये परे सोममपरे चरुवृत्तयः ।
ऋषयः पक्षमश्नन्ति केचिद्भैक्ष्याशिनोऽहनि ॥
हविष्यमपरेऽश्नन्तः कुर्वन्त्येव परं तपः । ॥ ७१ मन्त्रोंका जप करनेसे मनुष्य सब कुछ प्राप्त कर लेता है । जलमें निमग्न होकर एक मासतक प्रतिदिन सौ मन्त्रोंका जप करनेसे मनुष्य अपना अभीष्ट प्राप्त कर । लेता है; इसी तरह तेरह सौ मन्त्रोंका जप करनेसे वह ॥ ७२ सब कुछ पा लेता है ॥ ७०-७१३ ॥ बिना किसी अवलम्बके एक पैरपर खड़े होकर । बाँहें ऊपर उठाये हुए श्वास- नियमन करके एक वर्षतक जप करे और रात्रिमें केवल हविष्यान्न भक्षण ७३ करे तो वह पुरुष ऋषित्वको प्राप्त हो जाता है । इसी तरह यदि मनुष्य दो वर्षतक जप करे तो उसकी वाणी अमोघ हो जाती है ॥ ७२-७३ ॥ इसी प्रकार तीन वर्षोंतक जप करे तो मनुष्य ॥ ७४ त्रिकालदर्शी हो जाता है और यदि चार वर्षोंतक जप करे तो भगवान् सूर्यदेव स्वयं उस व्यक्तिके समक्ष प्रकट हो जाते हैं । इसी प्रकार पाँच वर्षोंतक जप ७५ करनेसे मनुष्य अणिमा आदि सिद्धियाँ प्राप्त कर लेता है और इसी प्रकार छः वर्षोंतक जप करके वह कामरूपित्वको प्राप्त हो जाता है ॥ ७४-७५ ॥ सात वर्षोंतक जप करनेसे पुरुषको देवत्व, नौ ७६ वर्षोंतक जप करनेसे मनुत्व और दस वर्षोंतक जप करनेसे इन्द्रत्वकी प्राप्ति हो जाती है । ग्यारह वर्षोंतक जप करनेसे मनुष्य प्रजापति हो जाता है तथा बारह वर्षोंतक जप करके वह ब्रह्मत्वको प्राप्त हो जाता है ॥ ७६-७७ ॥ ७७ इसी प्रकारकी तपस्याके द्वारा नारद आदि ऋषियोंने सम्पूर्ण लोकोंको जीत लिया था । कुछ ऋषि केवल शाकके आहारपर, कुछ फलपर, कुछ मूलपर और कुछ दूधके आहारपर रहते थे । कुछ ऋषिगण ७८ घीके आहारपर, कुछ सोमरसके आहारपर और अन्य ऋषि चरुके आहारपर रहते थे । इसी प्रकार कुछ ऋषि पूरे पक्षभर केवल एक बार भोजन ग्रहण करते ७ ९ तथा कुछ ऋषि प्रतिदिन भिक्षान्नके आहारपर रहते थे और कुछ ऋषि हविष्यान्न ग्रहण करते हुए कठोर तपश्चर्या करते थे ॥ ७८-७९ ३ ॥
पृष्ठ 774
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० २४ ] एकादश अथ शुद्ध्यै रहस्यानां त्रिसहस्त्रं जपेद् द्विजः ॥ ८०
मासं शुद्धो भवेत्स्तेयात्सुवर्णस्य द्विजोत्तमः ।
जपेन्मासं त्रिसाहस्त्रं सुरापः शुद्धिमाप्नुयात् ॥ ८१
मासं जपेत् त्रिसाहस्त्रं शुचिः स्याद् गुरुतल्पगः ।
त्रिसहस्रं जपेन्मासं कुटीं कृत्वा वने वसन् ॥ ८२
ब्रह्महा मुच्यते पापादिति कौशिकभाषितम् ।
द्वादशाहं निमज्ज्यासु सहस्त्रं प्रत्यहं जपेत् ॥ ८३
मुच्येरन्नंहसः सर्वे महापातकिनो द्विजाः ।
त्रिसाहस्त्रं जपेन्मासं प्राणानायम्य वाग्यतः ॥ ८४
महापातकयुक्तो वा मुच्यते महतो भयात् ।
प्राणायामसहस्त्रेण ब्रह्महापि विशुध्यति ॥ ८५
षट्कृत्वस्त्वभ्यसेदूर्ध्वं प्राणापानौ समाहितः ।
प्राणायामो भवेदेष सर्वपापप्रणाशनः ॥ ८६
सहस्रमभ्यसेन्मासं क्षितिपः शुचितामियात् ।
द्वादशाहं त्रिसाहस्त्रं जपेद्धि गोवधे द्विजः ॥ ८७
अगम्यागमनस्तेयहननाभक्ष्यभक्षणे दशसाहस्त्रमभ्यस्ता गायत्री शोधयेद् द्विजम् ॥ ८८
प्राणायामशतं कृत्वा मुच्यते सर्वकिल्विषात् ।
सर्वेषामेव पापानां सङ्करे सति शुद्धये ॥ ८ ९
सहस्रमभ्यसेन्मासं नित्यजापी वने वसन् ।
उपवाससमं जप्यं त्रिसहस्रं तदित्यृचम् ॥ ९ ०
चतुर्विंशतिसाहस्त्रमभ्यस्तात्कृच्छ्रसंज्ञिता 1 चतुः षष्टिसहस्राणि चान्द्रायणसमानि तु ॥ ९९ । स्कन्ध ७६५ द्विजको चाहिये कि प्रच्छन्न पातकोंकी शुद्धिके लिये तीन हजार गायत्रीके मन्त्रोंका जप करे । द्विजोंमें श्रेष्ठ पुरुष एक महीनेतक प्रतिदिन इस प्रकार जप करनेसे सुवर्णकी चोरीके पापसे मुक्त हो जाता है । सुरापान करनेवाला मासपर्यन्त प्रतिदिन तीन हजार जप करे तो वह शुद्ध हो जाता है । गुरुपत्नीके साथ गमन करनेवाला व्यक्ति महीनेभर प्रतिदिन तीन हजार गायत्रीमन्त्र जपनेसे पवित्र हो जाता है । वनमें कुटी बनाकर वहीं रहते हुए महीनेभर प्रतिदिन तीन हजार गायत्रीजप करनेसे ब्रह्मघाती उस पापसे मुक्त हो जाता है - ऐसा विश्वामित्रऋषिने कहा है । जलमें निमग्न होकर बारह दिनोंतक प्रतिदिन एक - एक हजार गायत्रीमन्त्रका जप करनेसे सभी महापातकी द्विज सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाते हैं । ८० - ८३३ ॥ महापातकी व्यक्ति मौन रहकर प्राणायामपूर्वक मासपर्यन्त प्रतिदिन तीन हजार गायत्रीमन्त्रका जप करे तो वह महान् भयसे मुक्त हो जाता है । एक हजार प्राणायाम करनेसे ब्रह्महत्यारा भी पाप से मुक्त हो जाता है ॥ ८४-८५ ॥ प्राण और अपान वायुको ऊपर खींचकर संयमपूर्वक गायत्रीमन्त्रका छ: बार जप करे; यह प्राणायाम सभी प्रकारके पापों का नाश करनेवाला है ॥ ८६ ॥
मासपर्यन्त प्रतिदिन एक हजार गायत्रीका जप करनेसे राजा पवित्र हो जाता है । गोवधजन्य पापसे शुद्धिहेतु द्विजको बारह दिनोंतक प्रतिदिन तीन - तीन हजार गायत्रीजप करना चाहिये ॥ ८७ ॥।
दस हजार गायत्रीका जप द्विजको अगम्यागमन, चोरी, हिंसा तथा अभक्ष्यभक्षणके पापसे शुद्ध कर देता है । सौ बार प्राणायाम करके मनुष्य सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है । सभी प्रकारके मिले - जुले पापोंसे शुद्धिके लिये प्रतिदिन एक मासतक तत्सवितु ० ऋचाका एक हजार जप वनमें रहकर करना चाहिये । इसका तीन हजार जप उपवासके समकक्ष होता है ॥ ८८ – ९ ० ॥ चौबीस हजार गायत्रीजप कृच्छ्रव्रतके समान और चौंसठ हजार गायत्रीजप चान्द्रायणव्रतके समान कहा गया है॥९ १ ॥
पृष्ठ 775
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
७६६
शतकृत्वोऽभ्यसेन्नित्यं प्राणानायम्य सन्ध्ययोः ।
तदित्यृचमवाप्नोति सर्वपापक्षयं परम् ॥
निमज्ज्याप्सु जपेन्नित्यं शतकृत्वस्तदित्यृचम् ।
ध्यायन्देवीं सूर्यरूपां सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥
इति ते सम्यगाख्याताः शान्तिशुद्ध्यादिकल्पनाः ।
रहस्यातिरहस्याश्च गोपनीयास्त्वया सदा ॥
इति संक्षेपतः प्रोक्तः सदाचारस्य संग्रहः ।
विधिनाचरणादस्य माया दुर्गा प्रसीदति ॥
नैमित्तिकं च नित्यं च काम्यं कर्म यथाविधि ।
आचरेन्मनुजः सोऽयं भुक्तिमुक्तिफलाप्तिभाक् ॥
आचारः प्रथमो धर्मो धर्मस्य प्रभुरीश्वरी ।
इत्युक्तं सर्वशास्त्रेषु सदाचारफलं महत् ॥
आचारवान्सदा पूतः सदैवाचारवान्सुखी ।
आचारवान्सदा धन्यः सत्यं सत्यं च नारद ॥
देवीप्रसादजनकं सदाचारविधानकम् ।
यदपि शृणुयान्मर्त्यो महासम्पत्तिसौख्यभाक् ॥
सदाचारेण सिद्धेच्च ऐहिकामुष्मिकं सुखम् । श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २४ प्रातः तथा सायंकालीन दोनों सन्ध्याओंके समय ९ २ नित्य प्राणायाम करके ‘ तत्सवितु ० ' इस ऋचाका एक सौ जप करनेवाले पुरुषके सभी पाप पूर्णरूपसे विनष्ट हो जाते हैं ॥९ २ ॥ जलमें निमग्न होकर सूर्यस्वरूपिणी देवीका ९ ३ ध्यान करते हुए गायत्रीमन्त्रका नित्य सौ बार जप करनेवाला समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है॥९ ३ ॥ हे नारद! इस प्रकार मैंने शान्ति, शुद्धि ९ ४ आदिसे सम्बन्धित अनुष्ठानोंका वर्णन आपसे कर दिया । रहस्योंमें भी अति रहस्य इस प्रसंगको आपको सदा गोपनीय रखना चाहिये; इस प्रकार यह ९ ५ सदाचार - संग्रह संक्षेपमें बतला दिया । इस सदाचारका विधिपूर्वक पालन करनेसे महामाया दुर्गा प्रसन्न हो जाती हैं ॥ ९ ४ - ९ ५ ॥ जो मनुष्य नित्य, नैमित्तिक तथा काम्य कर्मोंसे ९ ६ सम्बद्ध आचारोंका विधिपूर्वक पालन करता है, वह भोग तथा मोक्षके फलका अधिकारी होता है ॥ ९ ६ ॥ आचार प्रथम धर्म है और धर्मकी अधिष्ठात्री ९ ७ भगवती जगदम्बा हैं । इस प्रकार सभी शास्त्रोंमें सदाचारका महान् फल बताया गया है ॥ ९ ७ ॥ हे नारद! सदाचारपरायण पुरुष सर्वदा पवित्र, ९ ८ सुखी तथा धन्य होता है; यह सत्य है, सत्य है ॥ ९ ८ ॥ सदाचारका विधान देवीकी प्रसन्नताको उत्पन्न करनेवाला है । इस विधानको सुननेमात्रसे मनुष्य विपुल सम्पदा तथा सुखका अधिकारी हो जाता है । ९९ सदाचारके पालनसे मनुष्यको ऐहिक तथा पारलौकिक सुख सुलभ हो जाता है । उसी सदाचारका वर्णन मैंने आपसे किया है । [ हे नारद! ] अब आप और क्या तदेव ते मया प्रोक्तं किमन्यच्छ्रोतुमिच्छसि ॥ १०० सुनना चाहते हैं ॥ ९९ -१०० ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायामेकादशस्कन्धे सदाचारनिरूपणं नाम चतुर्विंशोध्यायः ॥ २४ ॥
॥ एकादशः स्कन्धः समाप्तः ॥
पृष्ठ 776
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥ ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥ श्रीमद्देवीभागवतमहापुराण द्वादशः स्कन्धः अथ प्रथमोऽध्यायः गायत्री जपका माहात्म्य तथा गायत्रीके नारद उवाच
सदाचारविधिर्देव भवता वर्णितः प्रभो ।
तस्याप्यतुलमाहात्म्यं सर्वपापविनाशनम् ॥
श्रुतं भवन्मुखाम्भोजच्युतं देवीकथामृतम् ।
व्रतानि यानि चोक्तानि चान्द्रायणमुखानि ते ॥
दुःखसाध्यानि जानीमः कर्तृसाध्यानि तानि च ।
तदस्मात्साम्प्रतं यत्तु सुखसाध्यं शरीरिणाम् ॥
देवीप्रसादजनकं शुभानुष्ठानसिद्धिदम् ।
तत्कर्म वद मे स्वामिन् कृपापूर्वं सुरेश्वर ॥
सदाचारविधौ यश्च गायत्रीविधिरीरितः ।
तस्मिन्मुख्यतमं किं स्यात्किं वा पुण्याधिकप्रदम् ॥
ये गायत्रीगता वर्णास्तत्त्वसंख्यास्त्वयेरिताः ।
तेषां के ऋषयः प्रोक्ताः कानि छन्दांसि वै मुने ॥
तेषां का देवताः प्रोक्ताः सर्वं कथय मे प्रभो ।
महत्कौतूहलं मे च मानसे परिवर्तते ॥
श्रीनारायण उवाच
कुर्यादन्यन्न वा कुर्यादनुष्ठानादिकं तथा ।
गायत्रीमात्रनिष्ठस्तु कृतकृत्यो भवेद् द्विजः ॥
सन्ध्यासु चार्घ्यदानं च गायत्रीजपमेव च ।
सहस्रत्रितयं कुर्वन्सुरैः पूज्यो भवेन्मुने ॥
चौबीस वर्णोंके ऋषि, छन्द आदिका वर्णन नारदजी बोले - हे देव! हे प्रभो! आपने सदाचार-विधिका वर्णन कर दिया; उस विधिका माहात्म्य अत्यन्त १ अतुलनीय तथा सभी पापोंका नाश करनेवाला है ॥ १ ॥
आपके मुखकमलसे निःसृत देवीके कथारूप अमृतका श्रवण तो कर लिया; किंतु आपने जिन २ चान्द्रायण आदि मुख्य व्रतोंका वर्णन किया है, कर्तृसाध्य उन व्रतोंको मैं अत्यन्त कष्टसाध्य समझता हूँ । इसलिये अब आप ऐसा उपाय बताइये, जो ३ मनुष्योंके लिये सुखसाध्य हो । हे स्वामिन्! हे सुरेश्वर! आप मुझे कृपापूर्वक उस कर्मानुष्ठानके विषयमें बताइये; जो मंगलकारी, सिद्धि देनेवाला तथा भगवतीक ४ प्रसन्नताकी प्राप्ति करानेवाला हो॥२–४ ॥ सदाचारविधानके अन्तर्गत आपने जिस गायत्री-विधिका वर्णन किया है, उसमें मुख्यतम वस्तु क्या है ५ और क्या करनेसे अधिक पुण्यकी प्राप्ति होती है? ॥ ५ ॥
आपने गायत्रीके जिन चौबीस अक्षरोंको बताया ६ है, उन अक्षरोंके कौन - कौन ऋषि, कौन - कौन छन्द तथा कौन - कौन देवता कहे गये हैं? हे प्रभो! यह सब मुझे बताइये; क्योंकि इस सम्बन्धमें मेरे मनमें ७ महान् कौतूहल उत्पन्न हो रहा है ॥ ६-७ ॥ श्रीनारायण बोले- द्विज कोई दूसरा अनुष्ठान आदि कर्म करे अथवा न करे, किंतु एकनिष्ठ होकर केवल गायत्रीका अनुष्ठान कर ले तो वह कृतकृत्य हो ८ जाता है ॥ ८ ॥
मुने! तीनों संध्याओंमें भगवान् सूर्यको अर्घ्य प्रदान करनेवाला तथा तीन हजार गायत्रीजप करनेवाला ९ । पुरुष देवताओंका पूज्य हो जाता है॥९॥
पृष्ठ 777
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
७६८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १ न्यासान्करोतु वा मा वा गायत्रीमेव चाभ्यसेत् । न्यास करे अथवा न करे, किंतु निष्कपट ध्यात्वा निर्व्याजया वृत्त्या सच्चिदानन्दरूपिणीम् यदक्षरैकसंसिद्धेः स्पर्धते ब्राह्मणोत्तमः । हरिशङ्करकञ्जोत्थसूर्यचन्द्रहुताशनैः
अथातः श्रूयतां ब्रह्मन् वर्णऋष्यादिकांस्तथा ।
छन्दांसि देवतास्तद्वत्क्रमात्तत्त्वानि चैव हि ॥
वामदेवोऽत्रिर्वसिष्ठः शुक्रः कण्वः पराशरः ।
विश्वामित्रो महातेजाः कपिलः शौनको महान् ॥
याज्ञवल्क्यो भरद्वाजो जमदग्निस्तपोनिधिः ।
गौतमो मुद्गलश्चैव वेदव्यासश्च लोमशः ॥
अगस्त्यः कौशिको वत्सः पुलस्त्यो माण्डुकस्तथा ।
दुर्वासास्तपसां श्रेष्ठो नारदः कश्यपस्तथा ॥
इत्येते ऋषयः प्रोक्ता वर्णानां क्रमशो मुने ।
गायत्र्युष्णिगनुष्टुप् च बृहती पङ्क्तिरेव च ॥
त्रिष्टुभं जगती चैव तथातिजगती मता ।
शक्वर्यतिशक्वरी च धृतिश्चातिधृतिस्तथा ॥
विराट् प्रस्तारपङ्क्तिश्च कृतिः प्रकृतिराकृतिः ।
विकृतिः संकृतिश्चैवाक्षरपङ्क्तिस्तथैव च ॥
भूर्भुवः स्वरितिच्छन्दस्तथा ज्योतिष्मती स्मृतम् ।
इत्येतानि च छन्दांसि कीर्तितानि महामुने ॥
दैवतानि शृणु प्राज्ञ तेषामेवानुपूर्वशः ।
आग्नेयं प्रथमं प्रोक्तं प्राजापत्यं द्वितीयकम् ॥
तृतीयं च तथा सौम्यमीशानं च चतुर्थकम् ।
सावित्रं पञ्चमं प्रोक्तं षष्ठमादित्यदैवतम् ॥
बार्हस्पत्यं सप्तमं तु मैत्रावरुणमष्टमम् ।
नवमं भगदैवत्यं दशमं चार्यमेश्वरम् ॥
गणेशमेकादशकं त्वाष्ट्रं द्वादशकं स्मृतम् ।
पौष्णं त्रयोदशं प्रोक्तमैन्द्राग्नं च चतुर्दशम् ॥
वायव्यं पञ्चदशकं वामदैव्यं च षोडशम् ।
मैत्रावरुणिदैवत्यं प्रोक्तं सप्तदशाक्षरम् ॥
अष्टादशं वैश्वदेवमूनविंशं तु मातृकम् ।
वैष्णवं विंशतितमं वसुदैवतमीरितम् ॥
एकविंशतिसंख्याकं द्वाविंशं रुद्रदैवतम् ।
त्रयोविंशं च कौबेरमाश्विनं तत्त्वसंख्यकम् ॥
॥ १० भावसे सच्चिदानन्दस्वरूपिणी भगवतीका ध्यान करके गायत्रीजप अवश्य करना चाहिये ॥ १० ॥
॥ ११ उसके एक अक्षरकी भी सिद्धि हो जानेपर ब्राह्मणश्रेष्ठ ब्रह्मा, विष्णु, महेश, सूर्य, चन्द्र और १२ अग्नि के साथ स्पर्धा करनेयोग्य हो जाता है ॥ ११ ॥
हे ब्रह्मन्! अब आप गायत्रीके वर्ण, ऋषि, १३ छन्द, देवता तथा तत्त्व आदिके विषयमें क्रमसे सुनिये ॥ १२ ॥
१४ वामदेव, अत्रि, वसिष्ठ, शुक्र, कण्व, पराशर, महातेजस्वी विश्वामित्र, कपिल, महान् शौनक, १५ याज्ञवल्क्य, भरद्वाज, तपोनिधि जमदग्नि, गौतम, मुद्गल, वेदव्यास, लोमश, अगस्त्य, कौशिक, वत्स, १६ पुलस्त्य, माण्डुक, तपस्वियोंमें श्रेष्ठ दुर्वासा, नारद और कश्यप - हे मुने! ये चौबीस ऋषि क्रमसे १७ गायत्रीमन्त्रके वर्णोंके ' ऋषि ' कहे गये हैं । गायत्री, उष्णिक्, अनुष्टुप्, बृहती, पंक्ति, त्रिष्टुप् जगती, १८ अतिजगती, शक्वरी, अतिशक्वरी, धृति, अतिधृति, विराट्, प्रस्तारपंक्ति, कृति, प्रकृति, आकृति, विकृति, १ ९ संकृति, अक्षरपंक्ति, भूः भुवः स्वः तथा ज्योतिष्मती-हे महामुने! ये गायत्रीमन्त्रके वर्णोंके क्रमशः छन्द २० कहे गये हैं ॥ १३–१९ ॥ हे प्राज्ञ! अब क्रमशः उन वर्णोंके देवताओंके २१ नाम सुनिये | पहले वर्णके देवता अग्नि, दूसरेके प्रजापति, तीसरेके चन्द्रमा, चौथेके ईशान, पाँचवेंके २२ सविता, छठेके आदित्य, सातवेंके बृहस्पति, आठवेंके मित्रावरुण, नौवेंके भग, दसवेंके ईश्वर, ग्यारहवेंके २३ गणेश, बारहवेंके त्वष्टा, तेरहवेंके पूषा, चौदहवेंके इन्द्राग्नि, पन्द्रहवेंके वायु, सोलहवेंके वामदेव, सत्रहवेंके २४ मित्रावरुण, अठारहवेंके विश्वेदेव, उन्नीसवें मातृक, बीसवेंके विष्णु, इक्कीसवेंके वसु, बाईसवेंके रुद्र, २५ तेईसवेंके कुबेर और चौबीसवें वर्णके देवता अश्विनीकुमार कहे गये हैं । हे मुने! इस प्रकार मैंने गायत्रीके चौबीस २६ । वर्णोंके देवताओंका वर्णन कर दिया । यह नामसंग्रह
पृष्ठ 778
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० २ ] द्वादश स्कन्ध ७६ ९ चतुर्विंशतिवर्णानां देवतानां च सङ्ग्रहः । परम श्रेष्ठ और महान् पापोंका विनाश करनेवाला है, कथितः परमश्रेष्ठो महापापैकशोधनः । जिसके श्रवणमात्रसे सांगोपांग गायत्रीजपका फल
यदाकर्णनमात्रेण साङ्गं जाप्यफलं मुने ॥ २७ । प्राप्त हो जाता है ॥ २०–२७ ॥
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां द्वादशस्कन्धे गायत्रीविचारो नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
अथ द्वितीयोऽध्यायः गायत्रीके चौबीस वर्णोंकी शक्तियों, रंगों एवं मुद्राओंका वर्णन श्रीनारायण उवाच वर्णानां शक्तयः काश्च ताः शृणुष्व महामुने । वामदेवी प्रिया सत्या विश्वा भद्रविलासिनी । १
प्रभावती जया शान्ता कान्ता दुर्गा सरस्वती ।
विद्रुमा च विशालेशा व्यापिनी विमला तथा ॥ २
तमोऽपहारिणी सूक्ष्मा विश्वयोनिर्जया वशा ।
पद्मालया परा शोभा भद्रा च त्रिपदा स्मृता ॥ ३
चतुर्विंशतिवर्णानां शक्तयः समुदाहृताः ।
अतः परं वर्णवर्णान्व्याहरामि यथातथम् ॥४
चम्पका अतसीपुष्पसन्निभं विद्रुमं तथा ।
स्फटिकाकारकं चैव पद्मपुष्पसमप्रभम् ॥ ५
तरुणादित्यसङ्काशं शङ्खकुन्देन्दुसन्निभम् ।
प्रवालपद्मपत्राभं पद्मरागसमप्रभम् ॥ ६
इन्द्रनीलमणिप्रख्यं मौक्तिकं कुङ्कुमप्रभम् ।
अञ्जनाभं च रक्तं च वैदूर्यं क्षौद्रसन्निभम् ॥ ७
हारिद्रं कुन्ददुग्धाभं रविकान्तिसमप्रभम् ।
शुकपुच्छनिभं तद्वच्छतपत्रनिभं तथा ॥ ८
केतकीपुष्पसंकाशं मल्लिकाकुसुमप्रभम् ।
करवीरश्च इत्येते क्रमेण परिकीर्तिताः ॥ ९
वर्णाः प्रोक्ताश्च वर्णानां महापापविशोधनाः ।
पृथिव्यापस्तथा तेजो वायुराकाश एव च ॥ १०
गन्धो रसश्च रूपं च शब्दः स्पर्शस्तथैव च ।
उपस्थं पायुपादं च पाणी वागपि च क्रमात् ॥ ११
प्राणं जिह्वा च चक्षुश्च त्वक्श्रोत्रं च ततः परम् ।
प्राणोऽपानस्तथा व्यानः समानश्च ततः परम् ॥ १२
तत्त्वान्येतानि वर्णानां क्रमशः कीर्तितानि ` तु ।
अतः परं प्रवक्ष्यामि वर्णमुद्राः क्रमेण तु ॥ १३
सुमुखं सम्पुटं चैव विततं विस्तृतं तथा ।
द्विमुखं त्रिमुखं चैव चतुःपञ्चमुखं तथा ॥ १४
1898 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ द्वितीय खण्ड ] –25 A श्रीनारायण बोले - – हे महामुने! उन वर्णोंकी कौन - कौन - सी शक्तियाँ हैं, अब आप उन्हें सुनिये । वामदेवी, प्रिया, सत्या, विश्वा, भद्रविलासिनी, प्रभावती, जया, शान्ता, कान्ता, दुर्गा, सरस्वती, विद्रुमा, विशालेशा, व्यापिनी, विमला, तमोपहारिणी, सूक्ष्मा, विश्वयोनि, जया, वशा, पद्मालया, पराशोभा, भद्रा तथा त्रिपदा - चौबीस गायत्रीवर्णोंकी ये शक्तियाँ कही गयी हैं ॥१-३१ [ हे मुने! ] अब मैं उन अक्षरोंके वास्तविक वर्णों ( रंगों ) - के विषयमें बता रहा हूँ । गायत्री चौबीस वर्णोंके रंग क्रमशः चम्पा, अलसी - पुष्प, मूँगा, स्फटिक, कमल - पुष्प, तरुण सूर्य, शंख- -कुन्द-चन्द्रमा, रक्त कमलपत्र, पद्मराग, इन्द्रनीलमणि, मोती, कुमकुम, अंजन, रक्तचन्दन, वैदूर्य, मधु, हरिद्रा, कुन्द एवं दुग्ध, सूर्यकान्तमणि, तोतेकी पूँछ, कमल, केतकीपुष्प, मल्लिकापुष्प और कनेरके पुष्पकी आभाके समान कहे गये हैं । चौबीस अक्षरोंके बताये गये ये चौबीस वर्ण महान् पापोंको नष्ट करनेवाले हैं ॥४ – ९ ॥ पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, गन्ध, रस, रूप, शब्द, स्पर्श, जननेन्द्रिय, गुदा, पाद, हस्त, वागिन्द्रिय, नासिका, जिह्वा, नेत्र, त्वचा, कान, प्राण, अपान, व्यान तथा समान- ये वर्णोंके क्रमश: चौबीस तत्त्व कहे गये हैं ॥ १०–१२३ ॥ [ हे नारद! ] अब मैं क्रमशः वर्णोंकी मुद्राओंका वर्णन करूँगा । सुमुख, सम्पुट, वितत, विस्तृत, द्विमुख, त्रिमुख, चतुर्मुख, पंचमुख, षण्मुख, अधोमुख, व्यापकांजलि, शकट, यमपाश, ग्रथित, सन्मुखोन्मुख,
पृष्ठ 779
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
७७० श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ३
षण्मुखाधोमुखं चैव व्यापकाञ्जलिकं तथा ।
शकटं यमपाशं च ग्रथितं सन्मुखोन्मुखम् ॥ १५
विलम्बं मुष्टिकं चैव मत्स्यं कूर्मं वराहकम् ।
सिंहाक्रान्तं महाक्रान्तं मुद्गरं पल्लवं तथा ॥ १६
त्रिशूलयोनी सुरभिश्चाक्षमाला च लिङ्गकम् ।
अम्बुजं च महामुद्रास्तुर्यरूपाः प्रकीर्तिताः ॥ १७
इत्येताः कीर्तिता मुद्रा वर्णानां ते महामुने ।
महापापक्षयकराः कीर्तिदाः कान्तिदा मुने ॥ १८
विलम्ब, मुष्टिक, मत्स्य, कूर्म, वराह, सिंहाक्रान्त, महाक्रान्त, मुद्गर तथा पल्लव – गायत्रीके अक्षरोंकी ये चौबीस मुद्राएँ हैं । त्रिशूल, योनि, सुरभि, अक्षमाला, लिंग और अम्बुज - ये महामुद्राएँ गायत्रीके चौथे चरणकी कही गयी हैं । हे महामुने! गायत्रीके वर्णोंकी । इन मुद्राओंको मैंने आपको बता दिया । हे मुने! ये मुद्राएँ महान् पापोंका नाश करनेवाली, कीर्ति देनेवाली । तथा कान्ति प्रदान करनेवाली हैं ॥ १३–१८ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां द्वादशस्कन्धे गायत्रीशक्त्यादिप्रतिपादनं नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥
अथ तृतीयोऽध्यायः श्रीगायत्रीका ध्यान नारद उवाच
स्वामिन्सर्वजगन्नाथ संशयोऽस्ति मम प्रभो ।
चतुःषष्टिकलाभिज्ञ पातकाद्योगविद्वर ॥
मुच्यते केन पुण्येन ब्रह्मरूपः कथं भवेत् ।
देहश्च देवतारूपो मन्त्ररूपो विशेषतः ॥
कर्म तच्छ्रोतुमिच्छामि न्यासं च विधिपूर्वकम् ।
ऋषिश्छन्दोऽधिदैवं च ध्यानं च विधिवद्विभो ॥
श्रीनारायण उवाच
अस्त्येकं परमं गुह्यं गायत्रीकवचं तथा ।
पठनाद्धारणान्मर्त्यः सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥
सर्वान्कामानवाप्नोति देवीरूपश्च जायते ।
गायत्रीकवचस्यास्य ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः ॥
ऋषयो ऋग्यजुःसामाथर्वश्छन्दांसि नारद ।
ब्रह्मरूपा देवतोक्ता गायत्री परमा कला ॥
तद् बीजं भर्ग इत्येषा शक्तिरुक्ता मनीषिभिः ।
कीलकं च धियः प्रोक्तं मोक्षार्थे विनियोजनम् ॥
1898 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ द्वितीय खण्ड ] –25 B और गायत्रीकवचका वर्णन नारदजी बोले – हे स्वामिन्! हे सम्पूर्ण जगत्के नाथ! हे प्रभो! हे चौंसठ कलाओंके १ ज्ञाता! हे योगवेत्ताओंमें श्रेष्ठ! मनुष्य किस पुण्यकर्मसे पापमुक्त हो सकता है, किस प्रकार ब्रह्मरूपत्व प्राप्त कर सकता है और किस कर्मसे उसका देह २ देवतारूप तथा विशेषरूपसे मन्त्ररूप हो सकता है? हे प्रभो! उस कर्मके विषयमें साथ ही विधिपूर्वक न्यास, ऋषि, छन्द, अधिदेवता तथा ध्यानको विधिवत् ३ सुनना चाहता हूँ ॥ १–३ ॥ श्रीनारायण बोले- गायत्रीकवच नामक एक परम गोपनीय उपाय है, जिसके पाठ करने तथा धारण करनेसे मनुष्य समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है, उसके ४ सभी मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं तथा वह स्वयं देवीरूप हो जाता है ॥ ४३ ॥
हे नारद! इस गायत्रीकवचके ब्रह्मा, विष्णु तथा ५ महेश ऋषि हैं । ऋक्, यजुः, साम तथा अथर्व इसके छन्द हैं । परम कलाओंसे सम्पन्न ब्रह्मस्वरूपिणी ' गायत्री ' इसकी देवता कही गयी हैं ॥ ५-६ ॥ ६ भर्ग इसका बीज है, विद्वानोंने स्वयं इसीको शक्ति कहा है, बुद्धिको इसका कीलक कहा गया है और मोक्षके लिये इसके विनियोगका भी विधान ७ बताया गया है ॥ ७ ॥
पृष्ठ 780
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० ३ ] द्वादश
चतुर्भिर्हृदयं प्रोक्तं त्रिभिर्वर्णैः शिरः स्मृतम् ।
चतुर्भिः स्याच्छिखा पश्चात् त्रिभिस्तु कवचं स्मृतम् ॥ ८
चतुर्भिर्नेत्रमुद्दिष्टं चतुर्भिः स्यात्तदस्त्रकम् ।
अथ ध्यानं प्रवक्ष्यामि साधकाभीष्टदायकम् ॥ ९
मुक्ताविद्रुमहेमनीलधवलच्छायैर्मुखैस्त्रीक्षण-र्युक्तामिन्दुनिबद्धरत्नमुकुटां तत्त्वार्थवर्णात्मिकाम् । गायत्रीं वरदाभयाङ्कुशकशाः शुभ्रं कपालं गुणं शङ्खं चक्रमथारविन्दयुगलं हस्तैर्वहन्तीं भजे ॥ १०
गायत्री पूर्वतः पातु सावित्री पातु दक्षिणे ।
ब्रह्मसन्ध्या तु मे पश्चादुत्तरायां सरस्वती ॥ ११
पार्वती मे दिशं रक्षेत्पावकीं जलशायिनी ।
यातुधानी दिशं रक्षेद् यातुधानभयङ्करी ॥ १२
पावमानीं दिशं रक्षेत्पवमानविलासिनी ।
दिशं रौद्री च मे पातु रुद्राणी रुद्ररूपिणी ॥ १३
ऊर्ध्वं ब्रह्माणि मे रक्षेदधस्ताद्वैष्णवी तथा ।
एवं दश दिशो रक्षेत्सर्वाङ्गं भुवनेश्वरी ॥ १४
तत्पदं पातु मे पादौ जङ्घे मे सवितुः पदम् ।
वरेण्यं कटिदेशे तु नाभिं भर्गस्तथैव च ॥ १५
देवस्य मे तद्धृदयं धीमहीति च गल्लयोः ।
धियः पदं च मे नेत्रे यः पदं मे ललाटकम् ॥ १६
नः पातु मे पदं मूर्ध्नि शिखायां मे प्रचोदयात् ।
तत्पदं पातु मूर्धानं सकारः पातु भालकम् ॥ १७
चक्षुषी तु विकारार्णस्तुकारस्तु कपोलयोः ।
नासापुटं वकारार्णो रेकारस्तु मुखे तथा ॥ १८
णिकार ऊर्ध्वमोष्ठं तु यकारस्त्वधरोष्ठकम् ।
आस्यमध्ये भकारार्णो गकारश्चिबुके तथा ॥ १ ९
देकारः कण्ठदेशे तु वकारः स्कन्धदेशकम् ।
स्यकारो दक्षिणं हस्तं धीकारो वामहस्तकम् ॥ २०
|
मकारो हृदयं रक्षेद्धिकार उदरे तथा ।
धिकारो नाभिदेशे तु योकारस्तु कटिं तथा ॥ २१ ।
1898 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ द्वितीय खण्ड ] –25 C स्कन्ध ७७१ चार वर्णोंसे इसका हृदय, तीन वर्णोंसे सिर, चार वर्णोंसे शिखा, तीन वर्णोंसे कवच, चार वर्णोंसे नेत्र तथा चार वर्णोंसे अस्त्र कहा गया है ॥ ८३ ॥
[ हे नारद! ] अब मैं साधकोंको उनके अभीष्टकी प्राप्ति करानेवाले ध्यानका वर्णन करूँगा । मोती, मूँगा, स्वर्ण, नील और धवल आभावाले [ पाँच ] मुखों, तीन नेत्रों तथा चन्द्रकलायुक्त रत्नमुकुटको धारण करनेवाली, चौबीस अक्षरोंसे विभूषित और हाथोंमें वरद- अभयमुद्रा, अंकुश, चाबुक, शुभ्र कपाल, रज्जु, शंख, चक्र तथा दो कमलपुष्प धारण करनेवाली भगवती गायत्रीका मैं ध्यान करता हूँ ॥ ९ - १० ॥ [ इस प्रकार ध्यान करके कवचका पाठ करे - ] पूर्व दिशामें गायत्री मेरी रक्षा करें, दक्षिण दिशामें सावित्री रक्षा करें, पश्चिममें ब्रह्मसन्ध्या तथा उत्तरमें सरस्वती मेरी रक्षा करें । जलमें व्याप्त रहनेवाली भगवती पार्वती अग्निकोणमें मेरी रक्षा करें । राक्षसों में भय उत्पन्न करनेवाली भगवती यातुधानी नैर्ऋत्यकोणमें मेरी रक्षा करें । वायुमें विलासलीला करनेवाली भगवती पावमानी वायव्यकोणमें मेरी रक्षा करें । रुद्ररूप धारण करनेवाली भगवती रुद्राणी ईशानकोणमें मेरी रक्षा करें । ब्रह्माणी ऊपरकी ओर तथा वैष्णवी नीचे की ओर मेरी रक्षा करें । इस प्रकार भगवती भुवनेश्वरी दसों दिशाओंमें मेरे सम्पूर्ण अंगोंकी रक्षा करें ॥ ११ - – १४ ॥ ' तत् ' पद मेरे दोनों पैरोंकी, ' सवितुः ' पद मेरी दोनों जंघाओंकी, ' वरेण्यं ' पद कटिदेशकी, ' भर्गः ' पद नाभिकी, ' देवस्य पद हृदयकी, ' धीमहि ' पद दोनों कपोलोंकी, ' धियः ' पद दोनों नेत्रोंकी, ‘ यः ' पद ललाटकी, ' नः ' पद मस्तककी तथा ' प्रचोदयात् ' पद मेरी शिखाकी रक्षा करे ॥ १५-१६३ ॥ ' तत् ' पद मस्तककी रक्षा करे तथा ' स ' कार ललाटकी रक्षा करे । इसी तरह ' वि ' कार दोनों नेत्रोंकी, ' तु ' कार दोनों कपोलोंकी, ' व ' कार नासापुटकी, ' रे ' कार मुखकी, ' णि ' कार ऊपरी ओष्ठकी, ' य ' कार नीचेके ओष्ठकी, ' भ ' कार मुखके मध्यभागकी, रेफयुक्त ' गो ' कार ( र्गों ) ठुड्डीकी, ' दे ' कार कण्ठकी, ' व ' कार कन्धोंकी, ' स्य ' कार दाहिने हाथकी, ' धी ' कार बायें हाथकी, ' म ' कार हृदयकी, ' हि ' कार