देवी भागवत उत्तरार्द्ध — पृष्ठ 781–790
देवी भागवत उत्तरार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 781–790
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७७२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ०४
गुह्यं रक्षतु योकार ऊरू द्वौ नः पदाक्षरम् ।
प्रकारो जानुनी रक्षेच्चोकारो जङ्घदेशकम् ॥ २२
दकारं गुल्फदेशे तु यकारः पदयुग्मकम् ।
तकारव्यञ्जनं चैव सर्वाङ्गं मे सदावतु ॥ २३
इदं तु कवचं दिव्यं बाधाशतविनाशनम् ।
चतुःषष्टिकलाविद्यादायकं मोक्षकारकम् ॥ २४
मुच्यते सर्वपापेभ्यः परं ब्रह्माधिगच्छति ।
पठनाच्छ्रवणाद्वापि गोसहस्रफलं लभेत् ॥ २५
उदरकी, ' धि ' कार नाभिदेशकी, ' यो ' कार कटिप्रदेशकी, पुनः ' यो ' कार गुह्य अंगोंकी, ' न: ' पद दोनों ऊरुओंकी, ' प्र ' कार दोनों घुटनोंकी, ' चो ' कार दोनों जंघाओंकी, ' द ' कार गुल्फोंकी, ' या ' कार दोनों पैरोंकी और ' त ' कार व्यंजन ( त् ) सर्वदा मेरे सम्पूर्ण अंगोंकी रक्षा करे ॥ १७–२३ ॥ [ हे नारद! ] भगवती गायत्रीका यह दिव्य कवच सैकड़ों विघ्नोंका विनाश करनेवाला, चौंसठ कलाओं तथा समस्त विद्याओंको देनेवाला और मोक्षकी प्राप्ति करानेवाला है । इस कवचके प्रभावसे व्यक्ति सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है और परब्रह्मभावकी प्राप्ति कर लेता है । इसे पढ़ने अथवा सुननेसे भी मनुष्य एक हजार गोदानका फल प्राप्त कर लेता है ॥ २४-२५ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्रयां संहितायां द्वादशस्कन्धे गायत्रीमन्त्रकवचवर्णनं नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥
अथ चतुर्थोऽध्यायः गायत्रीहृदय तथा नारद उवाच
भगवन् देवदेवेश भूतभव्यजगत्प्रभो ।
कवचं च श्रुतं दिव्यं गायत्रीमन्त्रविग्रहम् ॥ १
अधुना श्रोतुमिच्छामि गायत्रीहृदयं परम् ।
यद्धारणाद्भवेत्पुण्यं गायत्रीजपतोऽखिलम् ॥ २
श्रीनारायण उवाच
देव्याश्च हृदयं प्रोक्तं नारदाथर्वणे स्फुटम् ।
तदेवाहं प्रवक्ष्यामि रहस्यातिरहस्यकम् ॥ ३
विरारूपां महादेवीं गायत्रीं वेदमातरम् ।
ध्यात्वा तस्यास्त्वथाङ्गेषु ध्यायेदेताश्च देवताः ॥ ४
पिण्डब्रह्माण्डयोरैक्याद्भावयेत्स्वतनौ तथा ।
देवीरूपे निजे देहे तन्मयत्वाय साधकः ॥ ५
उसका अंगन्यास नारदजी बोले - हे भगवन्! हे देवदेवेश! हे भूतभव्यजगत्प्रभो! मैंने गायत्रीमन्त्रविग्रह तथा दिव्य गायत्रीकवचके विषयमें सुन लिया । अब मैं श्रेष्ठ ' गायत्रीहृदय ' सुनना चाहता हूँ, जिसके धारण करनेसे गायत्रीजपसे प्राप्त होनेवाला सम्पूर्ण पुण्य प्राप्त हो जाता है ॥ १-२ ॥ श्रीनारायण बोले- हे नारद! देवीका गायत्री-हृदय अथर्ववेदमें स्पष्टरूपसे वर्णित है । रहस्योंमें भी अति रहस्ययुक्त उसी प्रसंगका वर्णन मैं आपसे करूँगा ॥३ ॥
विराट् रूपवाली वेदमाता महादेवी गायत्रीका ध्यान करनेके बाद अंगोंमें इन देवताओंका ध्यान करना चाहिये ॥ ४ ॥
पिण्ड तथा ब्रह्माण्डमें स्थापित एकत्वकी भाँति अपने तथा देवीमें अभेदकी भावना करनी चाहिये । साधकको देवीके रूपमें तथा अपने शरीरमें तन्मयताभाव | रखना चाहिये ॥ ५ ॥
1898 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ द्वितीय खण्ड ] –25 D
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अ ० ४ ] द्वादश
नादेवोऽभ्यर्चयेद्देवमिति वेदविदो विदुः ।
ततोऽभेदाय काये स्वे भावयेद्देवता इमाः ॥ ६
अथ तत्सम्प्रवक्ष्यामि तन्मयत्वमथो भवेत् ।
गायत्रीहृदयस्यास्याप्यहमेव ऋषिः स्मृतः ॥ ७
गायत्रीच्छन्द उद्दिष्टं देवता परमेश्वरी ।
पूर्वोक्तेन प्रकारेण कुर्यादङ्गानि षट्क्रमात् ।
आसने विजने देशे ध्यायेदेकाग्रमानसः ॥ ८
न्यास द्यौर्मूर्धिर्ध्न दैवतम् । दन्तपङ्क्तावश्विनौ । उभे सन्ध्ये चोष्ठौ । मुखमग्निः । जिह्वा सरस्वती । ग्रीवायां तु बृहस्पतिः । स्तनयोर्वसवोऽष्टौ 1 । बाह्वोर्मरुतः । हृदये पर्जन्यः । आकाशमुदरम् । नाभावन्तरिक्षम् । कट्यो -रिन्द्राग्नी । जघने विज्ञानघनः प्रजापतिः । कैलास-मलये ऊरू । विश्वेदेवा जान्वोः । जङ्घायां कौशिकः । गुह्यमयने । ऊरू पितरः । पादौ पृथिवी । वनस्पत-योऽङ्गुलीषु । ऋषयो रोमाणि । नखानि मुहूर्तानि । अस्थिषु ग्रहाः । असृङ्मांसमृतवः । संवत्सरा वै निमि-षम् । अहोरात्रावादित्यश्चन्द्रमाः । प्रवरां दिव्यां गायत्रीं सहस्रनेत्रां शरणमहं प्रपद्ये । ॐ तत्सवितुर्वरेण्याय नमः । ॐ तत्पूर्वाजयाय नमः । तत्प्रातरादित्याय नमः । तत्प्रातरादित्यप्रतिष्ठायै नमः । प्रातरधीयानो रात्रिकृतं पापं नाशयति । सायमधीयानो दिवसकृतं पापं नाशयति । सायंप्रातरधीयानो अपापो भवति । सर्वतीर्थेषु स्नातो भवति । सर्वैर्देवैर्ज्ञातो भवति । अवाच्यवचनात्पूतो भवति । अभक्ष्यभक्षणात्पूतो । स्कन्ध ७७३ देवभावसे सम्पन्न हुए बिना देवताकी पूजा नहीं करनी चाहिये - ऐसा वेदवेत्ताओंने कहा है । इसलिये अभेदसम्पादनके लिये अपने शरीरमें इन देवताओंकी भावना करनी चाहिये ॥ ६ ॥
[ हे नारद ] अब मैं वह उपाय बता रहा हूँ जिससे तन्मयता प्राप्त हो सकती है । स्वयं मैं नारायण ही इस गायत्रीहृदयका ऋषि कहा गया हूँ । गायत्री इसका छन्द है और भगवती परमेश्वरी इसकी देवता हैं । पूर्व कही गयी रीतिसे अपने छहों अंगोंमें क्रमसे इनका न्यास करना चाहिये । इसके लिये सर्वप्रथम निर्जन स्थानमें किसी आसनपर बैठकर एकाग्रचित्त हो भगवती गायत्रीका ध्यान करना चाहिये ॥ ७-८ ॥ [ अब अंगन्यासकी विधि बतायी जाती है- ] मस्तकमें द्यौ नामक देवता, दन्तपंक्तिमें दोनों अश्विनीकुमारों, दोनों ओठोंमें दोनों संध्याओं, मुखमें अग्नि, जिह्वामें सरस्वती, ग्रीवामें बृहस्पति, दोनों स्तनोंमें आठों वसुओं, दोनों भुजाओंमें मरुद्गणों, हृदयमें पर्जन्य, उदरमें आकाश, नाभिमें अन्तरिक्ष, दोनों कटिदेशमें इन्द्र तथा अग्नि, जघनमें विज्ञानघन प्रजापति, एक उरुमें कैलास तथा मलयगिरि, दोनों घुटनोंमें विश्वेदेवों, पिण्डलीमें कौशिक, गुह्यदेशमें उत्तरायण एवं दक्षिणायनके अधिष्ठातृदेवता, दूसरे उरुमें पितरों, पैरोंमें पृथ्वी, अँगुलियोंमें वनस्पतियों, रोमोंमें ऋषियों, नखोंमें मुहूर्तों, हड्डियोंमें ग्रहों तथा रुधिर एवं मांसमें ऋतुओंकी भावना करे । संवत्सर जिनके लिये एक पलके समान है तथा जिनके आदेशसे सूर्य और चन्द्रमा दिन - रातका विभाजन करते हैं, मैं उन परम श्रेष्ठ, दिव्य तथा सहस्र नेत्रोंवाली भगवती गायत्रीकी शरण ग्रहण करता हूँ । ॐ सूर्यके उस श्रेष्ठ तेजको नमस्कार है । ॐ पूर्व दिशामें उदय होनेवाले उन सूर्यको नमस्कार है । प्रातः कालीन उन सूर्यको नमस्कार है । आदित्यमण्डलमें प्रतिष्ठा प्राप्त करनेवाली उन गायत्रीको नमस्कार है । प्रातः काल गायत्रीहृदयका पाठ करनेवाला रात्रिमें किये हुए पापका नाश करता है, सायंकालमें इसका पाठ करनेवाला दिनमें किये गये पापोंका शमन करता है और सायं तथा प्रातः दोनों वेलाओं में पाठ करनेवाला निष्पाप हो जाता है । वह समस्त तीर्थोंमें स्नान किया हुआ हो जाता है । वह सभी देवताओंके लिये ज्ञात हो जाता है । गायत्रीकी कृपासे
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७७४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ०५ भवति । अभोज्यभोजनात्पूतो भवति । अचोष्यचोष -णात्पूतो भवति । असाध्यसाधनात्पूतो भवति । दुष्प्रतिग्रहशतसहस्त्रात्पूतो भवति । सर्वप्रतिग्रहात्पूतो भवति । पङ्क्तिदूषणात्पूतो भवति । अनृतवचनात्पूतो भवति । अथाब्रह्मचारी ब्रह्मचारी भवति । अनेन हृदयेनाधीतेन क्रतुसहस्त्रेणेष्टं भवति । षष्टिशत-सहस्त्रगायत्र्या जप्यानि फलानि भवन्ति । अष्टौ ब्राह्मणान्सम्यग्ग्राहयेत् । तस्य सिद्धिर्भवति । य इदं नित्यमधीयानो ब्राह्मणः प्रातः शुचिः सर्वपापैः प्रमुच्यत इति । ब्रह्मलोके महीयते । इत्याह भगवान् श्रीनारायणः । | मनुष्य अभाष्यभाषण, अभक्ष्यभक्षण, अभोज्यभोजन, अचोष्यचोषण, असाध्यसाधन, लाखों दुष्प्रतिग्रहों, सभी प्रकारके प्रतिग्रहों, पंक्तिदूषण तथा असत्यवचन — इन सभीसे पवित्र हो जाता है । उनकी कृपासे अब्रह्मचारी भी ब्रह्मचारी हो जाता है । इस गायत्रीहृदयके पाठसे हजार यज्ञोंके करनेसे होनेवाला फल प्राप्त हो जाता है । इसके पाठ से साठ लाख गायत्रीजपसे मिलनेवाले फल प्राप्त हो जाते हैं । इसके अनुष्ठानमें सम्यक् प्रकारसे आठ ब्राह्मणोंका वरण करना चाहिये; ऐसा करनेसे उस व्यक्तिको सिद्धि प्राप्त हो जाती है । जो ब्राह्मण प्रतिदिन प्रातः काल पवित्र होकर इस गायत्रीहृदयका पाठ करता है, वह समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है और ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठित होता है - ऐसा स्वयं भगवान् श्रीनारायणने कहा है । इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां द्वादशस्कन्धे गायत्रीहृदयं नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥
अथ पञ्चमोऽध्यायः गायत्रीस्तोत्र तथा नारद उवाच
भक्तानुकम्पिन् सर्वज्ञ हृदयं पापनाशनम् ।
गायत्र्याः कथितं तस्माद् गायत्र्याः स्तोत्रमीरय ॥ १
श्रीनारायण उवाच
आदिशक्ते जगन्मातर्भक्तानुग्रहकारिणि ।
सर्वत्र व्यापिकेऽनन्ते श्रीसन्ध्ये ते नमोऽस्तु ते ॥ २
त्वमेव सन्ध्या गायत्री सावित्री च सरस्वती ।
ब्राह्मी च वैष्णवी रौद्री रक्ता श्वेता सितेतरा ॥ ३
प्रातर्बाला च मध्याह्ने यौवनस्था भवेत्पुनः ।
वृद्धा सायं भगवती चिन्त्यते मुनिभिः सदा ॥ ४
हंसस्था गरुडारूढा तथा वृषभवाहिनी ।
ऋग्वेदाध्यायिनी भूमौ दृश्यते या तपस्विभिः ॥ ५
यजुर्वेदं पठन्ती च अन्तरिक्षे विराजते ।
सा सामगापि सर्वेषु भ्राम्यमाणा तथा भुवि ॥ ६
उसके पाठका फल नारदजी बोले - हे भक्तोंपर अनुकम्पा करनेवाले! हे सर्वज्ञ! आपने पापोंका नाश करनेवाले गायत्रीहृदयका तो वर्णन कर दिया; अब गायत्रीस्तोत्रका कथन कीजिये ॥१ ॥
श्रीनारायण बोले- हे आदिशक्ते! हे जगन्मातः! हे भक्तोंपर कृपा करनेवाली! हे सर्वत्र व्याप्त रहनेवाली! हे अनन्ते! हे श्रीसन्ध्ये! आपको नमस्कार है ॥ २ ॥
आप ही सन्ध्या, गायत्री, सावित्री, सरस्वती, ब्राह्मी, वैष्णवी तथा रौद्री हैं । आप रक्त, श्वेत तथा कृष्ण वर्णोंवाली हैं ॥ ३ ॥
आप प्रातःकालमें बाल्यावस्थावाली, मध्याह्नकालमें युवावस्थासे युक्त तथा सायंकालमें वृद्धावस्थासे सम्पन्न हो जाती हैं । मुनिगण इन रूपोंमें आप भगवतीका सदा चिन्तन करते रहते हैं ॥ ४ ॥
आप प्रातः काल हंसपर, मध्याह्नकालमें गरुडपर तथा सायंकालमें वृषभपर विराजमान रहती हैं । आप ऋग्वेदका पाठ करती हुई भूमण्डलपर तपस्वियोंको दृष्टिगोचर होती हैं । आप यजुर्वेदका पाठ करती हुई अन्तरिक्षमें विराजमान रहती हैं । वही आप सामगान करती । हुई भूमण्डलपर सर्वत्र भ्रमण करती रहती हैं ॥ ५-६ ॥
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अ ० ५ ]
रुद्रलोकं गता त्वं हि विष्णुलोकनिवासिनी ।
त्वमेव ब्रह्मणो लोकेऽमर्त्यानुग्रहकारिणी ॥
सप्तर्षिप्रीतिजननी माया बहुवरप्रदा ।
शिवयोः करनेत्रोत्था ह्यश्रुस्वेदसमुद्भवा ॥
आनन्दजननी दुर्गा दशधा परिपठ्यते ।
वरेण्या वरदा चैव वरिष्ठा वरवर्णिनी ॥
गरिष्ठा च वराह च वरारोहा च सप्तमी ।
नीलगङ्गा तथा सन्ध्या सर्वदा भोगमोक्षदा ॥
भागीरथी मर्त्यलोके पाताले भोगवत्यपि ।
त्रिलोकवाहिनी देवी स्थानत्रयनिवासिनी ॥
भूर्लोकस्था त्वमेवासि धरित्री लोकधारिणी ।
भुवो लोके वायुशक्तिः स्वर्लोके तेजसां निधिः ॥
महर्लोके महासिद्धिर्जनलोके जनेत्यपि ।
तपस्विनी तपोलोके सत्यलोके तु सत्यवाक् ॥
कमला विष्णुलोके च गायत्री ब्रह्मलोकदा । रुद्रलोके स्थिता गौरी हरार्धाङ्गनिवासिनी ।
अहमो महतश्चैव प्रकृतिस्त्वं हि गीयसे ।
साम्यावस्थात्मिका त्वं हि शबलब्रह्मरूपिणी ॥
ततः परा परा शक्तिः परमा त्वं हि गीयसे ।
इच्छाशक्तिः क्रियाशक्तिर्ज्ञानशक्तिस्त्रिशक्तिदा ॥
गङ्गा च यमुना चैव विपाशा च सरस्वती ।
सरयूर्देविका सिन्धुर्नर्मदैरावती तथा ॥
गोदावरी शतद्रुश्च कावेरी देवलोकगा ।
कौशिकी चन्द्रभागा च वितस्ता च सरस्वती ॥
गण्डकी तापिनी तोया गोमती वेत्रवत्यपि ।
इडा च पिङ्गला चैव सुषुम्णा च तृतीयका ॥
गान्धारी हस्तिजिह्वा च पूषापूषा तथैव च ।
अलम्बुषा कुहूश्चैव शङ्खिनी प्राणवाहिनी ॥
द्वादश स्कन्ध ७७५ विष्णुलोक में निवास करनेवाली आप रुद्रलोकमें ७ भी गमन करती हैं । देवताओंपर अनुग्रह करनेवाली आप ब्रह्मलोकमें भी विराजमान रहती हैं ॥ ७ ॥
मायास्वरूपिणी आप सप्तर्षियोंको प्रसन्न करनेवाली ८ तथा अनेक प्रकारके वर प्रदान करनेवाली हैं । आप शिवशक्तिके हाथ, नेत्र, अश्रु तथा स्वेदसे दस ९ प्रकारकी दुर्गाके रूपमें प्रादुर्भूत हुई हैं । आप आनन्दकी जननी हैं । वरेण्या, वरदा, वरिष्ठा, वरवर्णिनी, गरिष्ठा, वरार्हा, सातवीं वरारोहा, नीलगंगा, सन्ध्या और १० भोगमोक्षदा - आपके ये दस नाम हैं ॥ ८–१० ॥ आप मृत्युलोकमें भागीरथी, पातालमें भोगवती और स्वर्गमें त्रिलोकवाहिनी ( मन्दाकिनी ) - देवीके ११ रूपमें तीनों लोकोंमें निवास करती हैं ॥११ ॥
लोकको धारण करनेवाली आप ही धरित्रीरूपसे १२ भूलोकमें निवास करती हैं । आप भुवर्लोकमें वायुशक्ति, स्वर्लोकमें तेजोनिधि, महर्लोकमें महासिद्धि, जनलोकमें जना, तपोलोकमें तपस्विनी, सत्यलोकमें सत्यवाक्, १३ विष्णुलोकमें कमला, ब्रह्मलोकमें गायत्री और रुद्रलोक में शंकरके अर्धांगमें निवास करनेवाली गौरीके रूपमें स्थित हैं ॥ १२ - १४ ॥ १४ अहंकार और महत् तत्त्वोंकी प्रकृतिके रूपमें आप ही कही जाती हैं । नित्य साम्य अवस्थामें १५ विराजमान आप शबल ब्रह्मस्वरूपिणी हैं ॥१५ ॥
आप उससे भी बड़ी ' पराशक्ति ' तथा ' परमा ' कही गयी हैं । आप इच्छाशक्ति, क्रियाशक्ति और १६ ज्ञानशक्तिके रूपमें विद्यमान हैं और इन तीनों शक्तियोंको प्रदान करनेवाली हैं ॥ १६ ॥
आप गंगा, यमुना, विपाशा, सरस्वती, सरयू, १७ देविका, सिन्धु, नर्मदा, इरावती, गोदावरी, शतद्रु, देवलोकमें गमन करनेवाली कावेरी, कौशिकी, चन्द्रभागा, वितस्ता, सरस्वती, गण्डकी, तापिनी, तोया, गोमती १८ तथा वेत्रवती नदियोंके रूपमें विराजमान हैं और इडा, पिंगला, तीसरी सुषुम्ना, गान्धारी, हस्तिजिह्वा, पूषा, १ ९ अपूषा, अलम्बुषा, कुहू और शंखिनी – इन प्राणवाहिनी नाड़ियोंके रूपमें आपको ही प्राचीन विद्वानोंने शरीरमें स्थित बताया है । आप हृदयकमलमें प्राणशक्तिके २० | रूपमें, कण्ठदेशमें स्वप्ननायिकाके रूपमें, तालुओंमें
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७७६
नाडी च त्वं शरीरस्था गीयसे प्राक्तनैर्बुधैः ।
हृत्पद्मस्था प्राणशक्तिः कण्ठस्था स्वप्ननायिका ॥
तालुस्था त्वं सदाधारा बिन्दुस्था बिन्दुमालिनी ।
मूले तु कुण्डलीशक्तिर्व्यापिनी केशमूलगा ॥
शिखामध्यासना त्वं हि शिखाग्रे तु मनोन्मनी ।
किमन्यद् बहुनोक्तेन यत्किञ्चिज्जगतीत्रये ॥
तत्सर्वं त्वं महादेवि श्रिये सन्ध्ये नमोऽस्तु ते ।
इतीदं कीर्तितं स्तोत्रं सन्ध्यायां बहुपुण्यदम् ॥
महापापप्रशमनं महासिद्धिविधायकम् ।
य इदं कीर्तयेत्स्तोत्रं सन्ध्याकाले समाहितः ॥
अपुत्रः प्राप्नुयात्पुत्रं धनार्थी धनमाप्नुयात् ।
सर्वतीर्थतपोदानयज्ञयोगफलं लभेत् ॥
भोगान्भुक्त्वा चिरं कालमन्ते मोक्षमवाप्नुयात् ।
तपस्विभिः कृतं स्तोत्रं स्नानकाले तु यः पठेत् ॥
यत्र कुत्र जले मग्नः सन्ध्यामज्जनजं फलम् ।
लभते नात्र सन्देहः सत्यं सत्यं च नारद ॥
शृणुयाद्योऽपि तद्भक्त्या स तु पापात्प्रमुच्यते ।
पीयूषसदृशं वाक्यं सन्ध्योक्तं नारदेरितम् ॥
श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ६ सर्वाधारस्वरूपिणीके रूपमें और भ्रूमध्यमें बिन्दु-२१ मालिनीके रूपमें विराजमान रहती हैं । आप मूलाधारमें कुण्डलीशक्तिके रूपमें तथा चूडामूलपर्यन्त व्यापिनीशक्तिके रूपमें स्थित हैं । शिखाके मध्यभागमें परमात्मशक्तिके २२ रूपमें तथा शिखाके अग्रभागमें मनोन्मनीशक्तिके रूपमें आप ही विराजमान रहती हैं । हे महादेवि! अधिक कहनेसे क्या लाभ? तीनों लोकोंमें जो कुछ भी है, २३ वह सब आप ही हैं । हे सन्ध्ये! मोक्षलक्ष्मीकी प्राप्तिके लिये आपको नमस्कार है ॥ १७ - २३३ ॥ [ हे नारद! ] सन्ध्याके समय पढ़ा गया यह स्तोत्र अत्यधिक पुण्य प्रदान करनेवाला, महान् पापोंका २४ नाश करनेवाला तथा महान् सिद्धियोंकी प्राप्ति करानेवाला है । जो व्यक्ति एकाग्रचित्त होकर सन्ध्याकालमें इस गायत्रीस्तोत्रका पाठ करता है, वह यदि पुत्रहीन है तो २५ पुत्र और यदि धनका अभिलाषी है तो धन प्राप्त कर लेता है । ऐसा करनेवालेको समस्त तीर्थ, तप, दान, यज्ञ तथा योगका फल प्राप्त हो जाता है और दीर्घ २६ कालतक सुखोंका उपभोग करके अन्तमें वह मोक्षको प्राप्त होता है ॥ २४ – २६१ ॥ हे नारद! जो पुरुष स्नानकालमें तपस्वियोंद्वारा २७ किये गये इस स्तोत्रका पाठ करता है, वह जहाँ कहीं भी जलमें स्नान करे, उसे सन्ध्यारूपी मज्जनसे होनेवाला फल प्राप्त हो जाता है, इसमें सन्देह नहीं २८ है; मेरा यह कथन सत्य है, सत्य है ॥ २७-२८ ॥ हे नारद! सन्ध्याको उद्देश्य करके कहे गये इस अमृततुल्य स्तोत्रको जो भी व्यक्ति भक्तिपूर्वक सुनता २ ९ है, वह पापसे मुक्त हो जाता है ॥२ ९ ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां द्वादशस्कन्धे श्रीगायत्रीस्तोत्रवर्णनं नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥
अथ षष्ठोऽध्यायः गायत्रीसहस्त्रनामस्तोत्र तथा उसके पाठका फल नारद उवाच नारदजी बोले - सभी धर्मोंको जाननेवाले तथा भगवन्सर्वधर्मज्ञ सर्वशास्त्रविशारद । सभी शास्त्रोंमें निष्णात हे भगवन्! मैंने आपके मुखसे श्रुतिस्मृतिपुराणानां रहस्यं त्वन्मुखाच्छुतम् ॥ १ श्रुतियों, स्मृतियों तथा पुराणोंसे सम्बद्ध सभी प्रकारके सर्वपापहरं देव येन विद्या प्रवर्तते । पापोंका नाश करनेवाला वह रहस्य सुन लिया,
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अ ० ६ ] द्वादश स्कन्ध ७७७ केन वा ब्रह्मविज्ञानं किं नु वा मोक्षसाधनम् ॥
ब्राह्मणानां गतिः केन केन वा मृत्युनाशनम् ।
ऐहिकामुष्मिकफलं केन वा पद्मलोचन ॥
वक्तुमर्हस्यशेषेण सर्वं निखिलमादितः । श्रीनारायण उवाच साधु साधु महाप्राज्ञ सम्यक् पृष्टं त्वयानघ ॥
शृणु वक्ष्यामि यत्नेन गायत्र्यष्टसहस्रकम् ।
नाम्नां शुभानां दिव्यानां सर्वपापविनाशनम् ॥
सृष्ट्यादौ यद्भगवता पूर्वं प्रोक्तं ब्रवीमि ते ।
अष्टोत्तरसहस्त्रस्य ऋषिर्ब्रह्मा प्रकीर्तितः ॥
छन्दोऽनुष्टुप् तथा देवी गायत्री देवता स्मृता ।
हलो बीजानि तस्यैव स्वराः शक्तय ईरिताः ॥
अङ्गन्यासकरन्यासावुच्येते मातृकाक्षरैः ।
अथ ध्यानं प्रवक्ष्यामि साधकानां हिताय वै ॥
रक्तश्वेतहिरण्यनीलधवलैर्युक्तां त्रिनेत्रोज्ज्वलां रक्तां रक्तनवस्त्रजं मणिगणैर्युक्तां कुमारीमिमाम् । गायत्रीं कमलासनां करतलव्यानद्धकुण्डाम्बुजां पद्माक्षीं च वरस्त्रजं च दधतीं हंसाधिरूढां भजे ॥
अचिन्त्यलक्षणाव्यक्ताप्यर्थमातृमहेश्वरी ।
अमृतार्णवमध्यस्थाप्यजिता चापराजिता ॥
जिससे विद्याकी प्राप्ति होती है । हे देव! किसके द्वारा ब्रह्मज्ञान प्राप्त होता है और मोक्षका साधन क्या है? हे कमलनयन! किस साधनसे ब्राह्मणोंको उत्तम गति मिलती है, किससे मृत्युका नाश होता है? और ३ किसके आश्रयसे मनुष्यको इहलोक तथा परलोकमें उत्तम फल प्राप्त होता है? इस सम्बन्धमें प्रारम्भसे लेकर सम्पूर्ण बातें विस्तारपूर्वक बतानेकी कृपा कीजिये ॥ १-३३ ॥ श्रीनारायण बोले- हे महाप्राज्ञ! हे अनघ! ४ आपको साधुवाद है, जो आपने इतनी उत्तम बात पूछी है । सुनिये, मैं प्रयत्नपूर्वक गायत्रीके दिव्य तथा मंगलकारी एक हजार आठ नामोंवाले सर्वपापहारीस्तोत्रका वर्णन करता हूँ॥४-५ ॥ ५ पूर्वकालमें सृष्टिके आदिमें भगवान्ने जिसे कहा था, वही मैं आपको बता रहा हूँ । इस एक हजार आठ नामवाले स्तोत्रके ऋषि ब्रह्माजी कहे गये हैं । अनुष्टुप् इसका छन्द है तथा भगवती गायत्री इसकी ६ देवता कही गयी हैं । हल् ( व्यंजन ) वर्ण इसके बीज और स्वर इसकी शक्तियाँ कही गयी हैं । मातृकामन्त्रके छः अक्षर ही इसके छ: अंगन्यास और करन्यास कहे जाते हैं ॥ ६-७३ ॥ ७ अब साधकोंके कल्याणके लिये देवीका ध्यान बताता हूँ । रक्त - श्वेत - पीत - नील एवं धवलवर्ण ( - वाले मुखों ) - से सम्पन्न, तीन नेत्रोंसे देदीप्यमान विग्रहवाली, रक्तवर्णवाली, नवीन रक्तपुष्पोंकी माला ८ धारण करनेवाली, अनेक मणिसमूहोंसे युक्त, कमलके आसनपर विराजमान, अपने दो हाथोंमें कमल और कुण्डिका एवं अन्य दो हाथोंमें वर तथा अक्षमाला धारण करनेवाली, कमलके समान नेत्रोंवाली, हंसपर विराजमान रहनेवाली तथा कुमारी अवस्थासे सम्पन्न भगवती गायत्रीकी मैं उपासना करता हूँ ॥ ८- ९ ॥ [ देवीके सहस्रनाम इस प्रकार हैं - ] ९ १. अचिन्त्यलक्षणा ( बुद्धिकी पहुँचसे परे लक्षणोंवाली ) २. अव्यक्ता, ३. अर्थमातृमहेश्वरी ( अर्थ आदि पार्थिव पदार्थोंके परिच्छेदक ब्रह्मा आदि देवताओंपर नियन्त्रण करनेवाली ) ४. अमृता ( अमृतस्वरूपिणी ), १० ५. अर्णवमध्यस्था ( समुद्रके भीतर विराजमान रहनेवाली ),
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७७८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ६ अणिमादिगुणाधाराप्यर्कमण्डलसंस्थिता । ६. अजिता, ७. अपराजिता ८. अणिमादिगुणा-अजराजापराधर्मा धारा ( अणिमा आदि सिद्धियोंकी आश्रयभूता ), अक्षसूत्रधराधरा ॥ ११ अकारादिक्षकारान्ताप्यरिषड्वर्गभेदिनी अञ्जनाद्रिप्रतीकाशाप्यञ्जनाद्रिनिवासिनी अदितिश्चाजपाविद्याप्यरविन्दनिभेक्षणा अन्तर्बहिःस्थिताविद्याध्वंसिनी चान्तरात्मिका
अजा चाजमुखावासाप्यरविन्दनिभानना ।
अर्धमात्रार्थदानज्ञाप्यरिमण्डलमर्दिनी ॥
असुरघ्नी ह्यमावास्याप्यलक्ष्मीघ्न्यन्त्यजार्चिता ।
आदिलक्ष्मीश्चादिशक्तिराकृतिश्चायतानना ॥
९. अर्कमण्डलसंस्थिता ( सूर्यमण्डलमें विराजमान ), १०. अजरा ( सदा तरुण अवस्थामें रहनेवाली ), ११. अजा ( जन्मरहित ), १२. अपरा ( जिनसे अतिरिक्त कोई दूसरा नहीं है ), १३. अधर्मा ( जात्यादिनिमित्तक लोकधर्मोंसे रहित ), १४. अक्षसूत्रधरा ( अक्षसूत्र धारण करनेवाली ), १५. अधरा ( अपने ही आधारपर स्थित ) ॥ १०-११ ॥ 1 १६. अकारादिक्षकारान्ता ( जिनके आदिमें अकार ॥ १२ तथा अन्तमें क्षकार है, वे वर्णमातृकास्वरूपिणी देवी ), १७. अरिषड्वर्गभेदिनी ( काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद एवं मात्सर्य - इन छः प्रकारके शत्रुओंका भेदन करनेवाली ), १८. अञ्जनाद्रिप्रतीकाशा ( अंजनगिरिके समान कृष्णवर्णकी प्रभासे सुशोभित ), १ ९. अञ्जनाद्रिनिवासिनी ( अंजनगिरिपर निवास करनेवाली ) ॥ १२ ॥
२०. अदितिः ( देवताओंकी माता ), २१. अजपा 1 ( अजपाजपरूपिणी ), २२. अविद्या ( माया ), ॥ १३ २३. अरविन्दनिभेक्षणा ( कमलसदृश नेत्रोंवाली ), २४. अन्तर्बहिः स्थिता ( सभीके भीतर तथा बाहर स्थित रहनेवाली ), २५. अविद्याध्वंसिनी ( अविद्याका नाश करनेवाली ), २६. अन्तरात्मिका ( सभीके अन्तःकरणमें विराजमान रहनेवाली ) ॥ १३ ॥
२७. अजा ( जन्मसे रहित प्रकृतिस्वरूपिणी ), २८. अजमुखावासा ( ब्रह्माके मुखमें निवास करनेवाली ), २ ९. अरविन्दनिभानना ( कमलके समान प्रफुल्लित मुखवाली ), ३०. अर्धमात्रा ( प्रणवांगभूत १४ अर्धमात्रास्वरूपा ), ३१. अर्थदानज्ञा ( धर्म आदि चारों पुरुषार्थोंका दान करनेमें कुशल ), ३२. अरिमण्डलमर्दिनी ( शत्रु- समूहों का मर्दन करनेवाली ) ॥ १४ ॥
३३. असुरघ्नी ( राक्षसों का संहार करनेवाली ), ३४. अमावास्या ( अमावस्यातिथिरूपा ), ३५. अलक्ष्मी-घ्न्यन्त्यजार्चिता ( अलक्ष्मीका संहार करनेवाली अन्त्यजा – मातंगीदेवीसे अर्चित होनेवाली ), ३६. आदि-लक्ष्मी:, ३७. आदिशक्ति: ( महामाया ), ३८. आकृतिः ( आकारस्वरूपिणी ), ३ ९. आयतानना ( विशाल १५ मुखवाली ) ॥ १५ ॥
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अ ० ६ ] द्वादश स्कन्ध ७७ ९ आदित्यपदवीचाराप्यादित्यपरिसेविता आचार्यावर्तनाचाराप्यादिमूर्तिनिवासिनी आग्नेयी चामरी चाद्या चाराध्या चासनस्थिता आधारनिलयाधारा चाकाशान्तनिवासिनी आद्याक्षरसमायुक्ता चान्तराकाशरूपिणी आदित्यमण्डलगता चान्तरध्वान्तनाशिनी इन्दिरा चेष्टदा चेष्टा चेन्दीवरनिभेक्षणा इरावती चेन्द्रपदा चेन्द्राणी चेन्दुरूपिणी इक्षुकोदण्डसंयुक्ता चेषुसन्धानकारिणी इन्द्रनीलसमाकारा चेडापिङ्गलरूपिणी इन्द्राक्षी चेश्वरी देवी चेहात्रयविवर्जिता ४०. आदित्यपदवीचारा ( आदित्यमार्गपर ॥ १६ चलनेवाली सूर्यगतिरूपा ), ४१. आदित्यपरिसेविता ( सूर्य आदि देवताओंसे सुसेवित ), ४२. आचार्या ( सदाचारकी व्याख्या करनेवाली ), ४३. आवर्तना ( भ्रमणशील जगत्की रचना करनेवाली ), ४४. आचारा ( आचारस्वरूपिणी ), ४५. आदिमूर्तिनिवासिनी ( आदिमूर्ति अर्थात् ब्रह्ममें निवास करनेवाली ) ॥ १६ ॥
। ४६. आग्नेयी ( अग्निकी अधिष्ठात्री ), ४७. आम ( देवताओंकी पुरी जिनका रूप माना जाता है ), ॥ १७ ४८. आद्या ( आदिस्वरूपिणी ), ४ ९. आराध्या ( सभीके द्वारा आराधित ), ५०. आसनस्थिता ( दिव्य आसनपर विराजमान रहनेवाली ), ५१. आधारनिलया ( मूलाधारमें निवास करनेवाली कुण्डलिनीस्वरूपिणी ), ५२. आधारा ( जगत्को धारण करनेवाली ), ५३. आकाशान्त-। निवासिनी ( आकाशतत्त्वके अन्तरूप अहंकारमें निवास करनेवाली ) ॥ १७ ॥
॥ १८ ५४. आद्याक्षरसमायुक्ता ( आदि अक्षर अर्थात् अकारसे युक्त ), ५५. आन्तराकाशरूपिणी ( दहराकाश-रूपिणी ), ५६. आदित्यमण्डलगता ( सूर्यमण्डलमें विद्यमान ), ५७. आन्तरध्वान्तनाशिनी ( अज्ञानरूप आन्तरिक अन्धकारका नाश करनेवाली ) ॥ १८ ॥
५८. इन्दिरा ( लक्ष्मी ), ५ ९. इष्टदा ( मनोरथ । पूर्ण करनेवाली ), ६०. इष्टा ( साधकोंकी अभीष्ट ॥ १ ९ देवतारूपिणी ), ६१. इन्दीवरनिभेक्षणा ( सुन्दर नीलकमलके समान नेत्रोंवाली ), ६२. इरावती ( इरा अर्थात् पृथ्वीसे युक्त ), ६३. इन्द्रपदा ( अपनी कृपासे इन्द्रको पद दिलानेवाली ), ६४. इन्द्राणी ( शचीरूपसे विराजमान ), ६५. इन्दुरूपिणी ( चन्द्रमाके समान सुन्दर रूपवाली ) ॥ १ ९ ॥ । ६६. इक्षुकोदण्डसंयुक्ता ( हाथमें इक्षुका धनुष ॥ २० धारण करनेवाली ), ६७. इषुसन्धानकारिणी ( बाणोंका संधान करनेमें दक्ष ), ६८. इन्द्रनीलसमाकारा ( इन्द्रनील-मणिके समान प्रभावाली ), ६ ९. इडापिङ्गलरूपिणी ( इडा और पिंगला आदि नाड़ीरूपिणी ) ॥ २० ॥
७०. इन्द्राक्षी ( शताक्षी नामवाली देवी ), ७१. ईश्वरी देवी ( अखिल ऐश्वर्योंसे युक्त भगवती ), । ७२. ईहात्रयविवर्जिता ( तीन प्रकारकी ईहा अर्थात्
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७८० उमा चोषा ह्युडुनिभा उर्वारुकफलानना उडुप्रभा चोडुमती ह्युडुपा ह्युडुमध्यगा ऊर्ध्वं चाप्यूर्ध्वकेशी चाप्यूर्ध्वाधोगतिभेदिनी ऊर्ध्वबाहुप्रिया चोर्मिमालावाग्ग्रन्थदायिनी । श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ६ ॥ २१ । लोकैषणा, वित्तैषणा और पुत्रैषणासे रहित ), ७३. उमा, ७४. उषा, ७५. उडुनिभा ( नक्षत्रके सदृश प्रभावाली ), ७६. उर्वारुकफलानना ( ककड़ीके फलके समान सदा प्रफुल्लित मुखवाली ) ॥ २१ ॥
७७. उडुप्रभा ( जलके समान वर्णवाली ), ७८. उडुमती ( रात्रिरूपिणी ), ७ ९. उडुपा ( चन्द्रमा । अथवा नौकारूपिणी ), ८०. उडुमध्यगा ( नक्षत्रमण्डलके ॥ २२ मध्य विराजमान ), ८१. ऊर्ध्वम् ( ऊर्ध्वदेशरूपिणी ), ८२. ऊर्ध्वकेशी ( ऊपरकी ओर उठे हुए केशोंवाली ), ८३. ऊर्ध्वाधोगतिभेदिनी ( ऊर्ध्वगति अर्थात् स्वर्ग और अधोगति अर्थात् नरक दोनोंका भेदन करनेवाली ) ॥ २२ ॥
८४. ऊर्ध्वबाहुप्रिया ( भुजाओंको ऊपर उठाकर आराधना करनेवाले भक्तोंसे प्रेम करनेवाली ), ८५. ऊर्मिमालावाग्ग्रन्थदायिनी ( तरंगमालाओंके समान श्रेष्ठ वाणीसे सम्पन्न ग्रन्थ - रचनाका सामर्थ्य ऋतं चर्षिऋतुमती ऋषिदेवनमस्कृता ॥ २३ प्रदान करनेवाली ), ८६. ऋतम् ( सूनृत - स्वरूपिणी ),
ऋग्वेदा ऋणहर्त्री च ऋषिमण्डलचारिणी ।
ऋद्धिदा ऋजुमार्गस्था ऋजुधर्मा ऋतुप्रदा ॥
ऋग्वेदनिलया ऋज्वी लुप्तधर्मप्रवर्तिनी ।
लूतारिवरसम्भूता लूतादिविषहारिणी ॥
एकाक्षरा चैकमात्रा चैका चैकैकनिष्ठिता । ८७. ऋषिः ( वेदरूपा ), ८८. ऋतुमती, ८ ९. ऋषिदेव-नमस्कृता ( ऋषियों तथा देवताओंसे नमस्कृत होनेवाली ) ॥ २३ ॥
९ ०. ऋग्वेदा ( ऋग्वेदरूपा ), ९९. ऋणहर्त्री ( देव ऋण, ऋषि ऋण और पितृ ऋणका नाश करनेवाली ), ९ २. ऋषिमण्डलचारिणी ( ऋषियोंकी २४ मण्डलीमें विचरण करनेवाली ), ९ ३. ऋद्धिदा ( समृद्धि प्रदान करनेवाली ), ९ ४. ऋजुमार्गस्था ( सदाचारके मार्गपर चलनेवाली ), ९ ५. ऋजुधर्मा ( सहज धर्मवाली ), ९ ६. ऋतुप्रदा ( अपनी कृपासे विभिन्न ऋतुएँ प्रदान करनेवाली ) ॥ २४ ॥
९ ७. ऋग्वेदनिलया ( ऋग्वेदमें निवास करनेवाली ), ९ ८. ऋज्वी ( सरल स्वभाववाली ), ९९. लुप्तधर्म-प्रवर्तिनी ( लुप्त धर्मोंका पुनः प्रवर्तन करनेवाली ), २५ १००. लूतारिवरसम्भूता ( लूता नामक रोगविशेषके महान् शत्रुरूपी मन्त्रोंको उत्पन्न करनेवाली ), १०१. लूतादिविषहारिणी ( मकड़ी आदिके विषका हरण करनेवाली ) ॥ २५ ॥
१०२. एकाक्षरा ( एक अक्षरसे युक्त ), १०३. एकमात्रा ( एक मात्रामें विराजनेवाली ), १०४. एका ( अद्वितीय ), १०५. एकनिष्ठा ( सर्वदा एकनिष्ठ
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अ ० ६ ] द्वादश स्कन्ध ७८१ ऐन्द्री ह्यैरावतारूढा चैहिकामुष्मिकप्रदा ॥
ओङ्कारा ह्योषधी चोता चोतप्रोतनिवासिनी ।
और्वा ह्यौषधसम्पन्ना औपासनफलप्रदा ॥
अण्डमध्यस्थिता देवी चा: कारमनुरूपिणी ।
कात्यायनी कालरात्रिः कामाक्षी कामसुन्दरी ॥
कमला कामिनी कान्ता कामदा कालकण्ठिनी ।
करिकुम्भस्तनभरा करवीरसुवासिनी ॥
कल्याणी कुण्डलवती कुरुक्षेत्रनिवासिनी ।
कुरुविन्ददलाकारा कुण्डली कुमुदालया ॥
कालजिह्वा करालास्या कालिका कालरूपिणी ।
कमनीयगुणा कान्तिः कलाधारा कुमुद्वती ॥
२६ | भावमें रहनेवाली ), १०६. ऐन्द्री ( इन्द्रकी शक्तिस्वरूपा ), १०७. ऐरावतारूढा ( ऐरावतपर आरूढ़ रहनेवाली ), १०८. ऐहिकामुष्मिकप्रदा ( इहलोक तथा परलोकका फल प्रदान करनेवाली ) ॥ २६ ॥
१० ९. ओङ्कारा ( प्रणवस्वरूपिणी ), ११०. ओषधी ( सांसारिक रोगों से ग्रस्त प्राणियोंके लिये ओषधिरूपा ), १११. ओता ( मणिमें सूत्रकी भाँति सम्पूर्ण प्राणियोंके २७ अन्तःकरणमें विराजमान ), ११२. ओतप्रोत -निवासिनी ( ब्रह्मसे व्याप्त ब्रह्माण्डमें निवास करनेवाली ), ११३. और्वा ( वाडवाग्निस्वरूपिणी ), ११४. औषधसम्पन्ना ( भवरोगके शमनहेतु औषधियोंसे सम्पन्न ), ११५. औपासनफलप्रदा ( उपासना करनेवालोंको श्रेष्ठ फल प्रदान करनेवाली ) ॥ २७ ॥
११६. अण्डमध्यस्थिता देवी ( ब्रह्माण्डके २८ भीतर विराजमान देवी ), ११७. अःकारमनुरूपिणी ( अ: कार अर्थात् विसर्गरूप मन्त्रमय विग्रहवाली ), ११८. ११ ९. रूपमें नेत्रोंमें सुन्दर २ ९ १२५. अपने कात्यायनी ( कात्यायनऋषिद्वारा उपासित ), कालरात्रि ( दानवोंके संहारके लिये कालरात्रि प्रकट करनेवाली ), १२०. कामाक्षी ( कामको धारण करनेवाली ), १२१. कामसुन्दरी ( यथेच्छ स्वरूप धारण करनेवाली ) ॥ २८ ॥
१२२. कमला, १२३. कामिनी, १२४. कान्ता, कामदा, १२६. कालकण्ठिनी ( कालको कण्ठमें समाहित कर लेनेवाली ), १२७. करिकुम्भस्तनभरा ( हाथीके कुम्भसदृश पयोधरोंवाली ), १२८. करवीरसुवासिनी ( करवीर अर्थात् महालक्ष्मीक्षेत्रमें निवास करनेवाली ) ॥ २ ९ ॥ १२ ९. कल्याणी, १३०. कुण्डलवती, १३१. कुरुक्षेत्रनिवासिनी, १३२. कुरुविन्ददलाकारा ३० ( कुरुविन्ददलके समान आकारवाली ), १३३. कुण्डली, १३४. कुमुदालया, १३५. कालजिह्वा ( राक्षसोंके संहारके लिये कालरूपिणी जिह्वासे सम्पन्न ), १३६. करालास्या ( शत्रुओंके समक्ष विकराल मुखाकृतिवाली ), १३७. कालिका, १३८. कालरूपिणी, १३ ९. कमनीयगुणा ( सुन्दर गुणोंसे सम्पन्न ), १४०. कान्तिः, १४१. कलाधारा ( समस्त चौंसठ कलाओंको धारण ३१ करनेवाली ), १४२. कुमुद्वती ॥ ३०-३१ ॥