देवी भागवत उत्तरार्द्ध — पृष्ठ 841–850

देवी भागवत उत्तरार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 841–850

पृष्ठ 841

देवी भागवत उत्तरार्द्ध, पृष्ठ 841 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

८३२ क्रीडतः स्मेरवदने सुमस्तबककन्दुकैः अतीव रम्यं विपिनं मधुस्त्रावि समन्ततः दशयोजनपर्यन्तं कुसुमामोदवायुना पूरितं दिव्यगन्धर्वैः साङ्गनैर्गानलोलुपैः शोभितं तद्वनं दिव्यं मत्तकोकिलनादितम् वसन्तलक्ष्मीसंयुक्तं कामिकामप्रवर्धनम् ताम्रसालादुत्तरत्र सीससालः प्रकीर्तितः । समुच्छ्रायः स्मृतोऽप्यस्य सप्तयोजनसंख्यया सन्तानवाटिकामध्ये सालयोस्तु द्वयोर्नृप दशयोजनगन्धस्तु प्रसूनानां समन्ततः हिरण्याभानि कुसुमान्युत्फुल्लानि निरन्तरम् । अमृतद्रवसंयुक्तफलानि मधुराणि च ग्रीष्मर्तुर्नायकस्तस्या वाटिकाया नृपोत्तम । शुक्र श्रीश्च शुचिश्रीश्च द्वे भार्ये तस्य सम्मते सन्तापत्रस्तलोकास्तु वृक्षमूलेषु संस्थिताः । नानासिद्धैः परिवृतो नानादेवैः समन्वितः विलासिनीनां वृन्दैस्तु चन्दनद्रवपङ्किलैः । पुष्पमालाभूषितैस्तु तालवृन्तकराम्बुजैः

प्राकारः शोभितो राजञ्छीतलाम्बुनिषेविभिः ।

सीससालादुत्तरत्राप्यारकूटमयः शुभः ॥

प्राकारो वर्तते राजन् मुनियोजनदैर्घ्यवान् । हरिचन्दनवृक्षाणां वाटी मध्ये तयोः स्मृता

सालयोरधिनाथस्तु वर्षर्तुर्मेघवाहनः ।

विद्युत्पिङ्गलनेत्रश्च जीमूतकवचः स्मृतः ॥

श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १० । कन्दुक बनाकर क्रीडा करती रहती हैं । वह अत्यन्त ॥ ३ ९ रम्य वन चारों ओर मधुकी धारा प्रवाहित करता रहता है ॥ ३७–३९ ॥ । पुष्पों की गन्धको लेकर प्रवाहित होनेवाली वायुके द्वारा वहाँका दस योजनपर्यन्त स्थान सदा सुवासित ॥ ४० रहता है । इस प्रकार वह दिव्य वन वसन्तलक्ष्मीसे । संयुक्त, कामियोंके कामको उद्दीप्त करनेवाला, मतवाले कोकिलोंकी ध्वनिसे मुखरित तथा अपनी अंगनाओं सहित ॥ ४१ गान - लोलुप दिव्य गन्धर्वोंसे सदा सुशोभित रहता है ॥ ४०-४१ ॥ उस ताम्रके परकोटेके आगे एक सीसेका परकोटा ॥ ४२ है; इसकी भी ऊँचाई सात योजन कही गयी है । हे राजन्! इन दोनों प्राकारोंके मध्यमें सन्तान नामक । वाटिका है । वहाँके पुष्पोंकी सुगन्धि चारों ओर दस ॥ ४३ योजनतक फैली रहती है । सुवर्णकी आभावाले खिले हुए फूल तथा अमृत - तुल्य मधुर रसोंसे परिपूर्ण मधुर फल वहाँ सदा विद्यमान रहते हैं ॥ ४२–४४ ॥ ॥ ४४ हे नृपश्रेष्ठ! उस वाटिकाका नायक ग्रीष्मऋतु है । शुकश्री तथा शुचिश्री नामवाली उसकी दो प्रिय भार्याएँ हैं । सन्तापसे व्याकुल प्राणी उस वाटिकाके ॥ ४५ वृक्षोंकी छायामें सुखपूर्वक स्थित रहते हैं । अनेक सिद्धों तथा देवताओंसे वह प्राकार सदा समन्वित रहता है॥४५-४६ ॥ ॥ ४६ हे राजन्! पुष्प - मालाओंसे विभूषित होकर अपने करकमलोंमें ताड़का पंखा लिये और अपने अंगोंमें चन्दन लगाये तथा शीतल जलका सेवन करनेवाली अनेक विलासिनी अंगनाओंके द्वारा वह ॥ ४७ प्राकार नित्य सुशोभित रहता है ॥ ४७३ ॥

हे राजन्! उस सीसेके प्राकारके भी आगे परिमाणमें सात योजन लम्बा पीतलकी धातुसे निर्मित ४८ एक सुन्दर परकोटा है ॥ ४८३ ॥

उन दोनों परकोटोंके मध्यमें हरिचन्दन वृक्षोंकी एक वाटिका कही गयी है | वहाँका स्वामी ॥ ४ ९ मेघोंपर आसीन रहनेवाला वर्षाऋतु है । वह पिंगल-वर्णवाले विद्युत्को नेत्रके रूपमें तथा मेघोंको कवचके रूपमें धारण करनेवाला कहा गया है । विद्युत्का ५० गर्जन ही इसका मुख है और वह इन्द्रधनुषको

पृष्ठ 842

देवी भागवत उत्तरार्द्ध, पृष्ठ 842 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अ ० १० ] वज्रनिर्घोषमुखरश्चेन्द्रधन्वा समन्ततः सहस्रशो वारिधारा मुञ्चन्नास्ते गणावृतः नभः श्रीश्च नभस्यश्रीः स्वरस्या रस्यमालिनी अम्बा दुला निरनिश्चाभ्रमन्ती मेघयन्तिका वर्षयन्ती चिपुणिका वारिधारा च सम्मताः वर्षर्तोर्द्वादश प्रोक्ताः शक्तयो मदविह्वलाः नवपल्लववृक्षाश्च नवीनलतिकान्विताः । हरितानि तृणान्येव वेष्टिता यैर्धराखिला

नदीनदप्रवाहाश्च प्रवहन्ति च वेगतः ।

सरांसि कलुषाम्बूनि रागिचित्तसमानि च ॥

वसन्ति देवाः सिद्धाश्च ये देवीकर्मकारिणः ।

वापीकूपतडागाश्च ये देव्यर्थं समर्पिताः ॥

ते गणा निवसन्त्यत्र सविलासाश्च साङ्गनाः ।

आरकूटमयादग्रे सप्तयोजनदैर्घ्यवान् ॥

पञ्चलोहात्मकः सालो मध्ये मन्दारवाटिका ।

नानापुष्पलताकीर्णा नानापल्लवशोभिता ॥

अधिष्ठातात्र सम्प्रोक्तः शरदृतुरनामयः ।

इषुलक्ष्मीरूर्जलक्ष्मी भार्ये तस्य सम्मते ॥

नानासिद्धा वसन्त्यत्र साङ्गनाः सपरिच्छदाः ।

पञ्चलोहमयादग्रे सप्तयोजनदैर्घ्यवान् ॥

दीप्यमानो महाशृङ्गैर्वर्तते रौप्यसालकः ।

पारिजाताटवीमध्ये प्रसूनस्तबकान्विता ॥

दशयोजनगन्धीनि कुसुमानि समन्ततः ।

मोदयन्ति गणान्सर्वान्ये देवीकर्मकारिणः ॥

1898 श्रीमद्देवी..... महापुराण [ द्वितीय खण्ड ] —27 A द्वादश स्कन्ध ८३३ । धनुषरूपमें धारण किये रहता है । वह अपने गणोंसे ॥ ५१ आवृत होकर चारों ओर हजारों जलधाराएँ छोड़ता रहता है ॥४ ९ –५१ ॥ । नभः श्री, नभस्यश्री, स्वरस्या, रस्यमालिनी, ॥ ५२ अम्बा, दुला, निरत्नि, अभ्रमन्ती, मेघयन्तिका, वर्षयन्ती, चिपुणिका और वारिधारा - ये बारह वर्षाऋतुकी । प्रिय शक्तियाँ कही गयी हैं, जो सदा मदसे विह्वल ॥ ५३ रहती हैं ॥ ५२-५३ ॥ नवीन लताओंसे समन्वित तथा नवीन पल्लवोंसे युक्त वृक्ष तथा हरे - भरे तृण वहाँ सदा विद्यमान ॥ ५४ रहते हैं, जिनसे वहाँकी सम्पूर्ण भूमि आच्छादित रहती है । वहाँ नदी तथा नद अत्यन्त वेगसे प्रवाहित होते रहते हैं । राग - द्वेषसे युक्त मनुष्योंके चित्तके ५५ समान गन्दे जलवाले अनेक सरोवर भी वहाँ विद्यमान हैं ॥ ५४-५५ ॥ देवता तथा सिद्धपुरुष वहाँ निवास करते ५६ हैं । देवी - कर्ममें निरन्तर तत्पर रहनेवाले तथा वापी, कूप और तालाबका निर्माण कराके देवीको अर्पण करनेवाले वे लोग अपनी स्त्रियोंके साथ वहाँ ५७ । आनन्दपूर्वक रहते हैं ॥ ५६३ ॥

उस पीतलके प्राकारके आगे सात योजनकी लम्बाईवाला एक पंचलौह - निर्मित परकोटा है, जिसके ५८ बीचमें नानाविध पुष्पों, लताओं तथा पल्लवोंसे सुशोभित मन्दारवाटिका विराजमान है ॥ ५७-५८ ॥ विकाररहित शरद् ऋतुको यहाँका अधिष्ठाता ५ ९ कहा गया है । इक्षुलक्ष्मी और ऊर्जलक्ष्मी – ये उसकी दो प्रिय भार्याएँ हैं । अनेक सिद्धलोग अपनी भार्याओं तथा अनुचरोंके साथ यहाँ निवास करते हैं ॥ ५ ९ ३ ॥ ६० उस पंचलौहमय परकोटेके आगे विशाल शिखरों तथा सात योजन लम्बाईवाला एक दीप्तियुक्त रजत-निर्मित परकोटा है । उसके मध्यमें पुष्पोंके गुच्छोंसे ६१ परिपूर्ण पारिजात - वन विद्यमान है ॥ ६०-६१ ॥ चारों ओर दस योजनकी दूरीतक सुगन्ध फैलानेवाले पुष्प वहाँपर देवी - पूजन आदि कर्मोंमें तत्पर सभी ६२ गणोंको प्रसन्न किये रहते हैं ॥६२ ॥

पृष्ठ 843

देवी भागवत उत्तरार्द्ध, पृष्ठ 843 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

८३४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १०

तत्राधिनाथः सम्प्रोक्तो हेमन्तर्तुर्महोज्ज्वलः ।

सगणः सायुधः सर्वान् रागिणो रञ्जयन्नृप ॥ ६३

सहश्रीश्च सहस्य श्री भार्ये तस्य सम्मते ।

वसन्ति तत्र सिद्धाश्च ये देवीव्रतकारिणः ॥ ६४

रौप्यसालमयादग्रे सप्तयोजनदैर्घ्यवान् ।

सौवर्णसालः सम्प्रोक्तस्तप्तहाटककल्पितः ॥ ६५

मध्ये कदम्बवाटी तु पुष्पपल्लवशोभिता ।

कदम्बमदिराधाराः प्रवर्तन्ते सहस्त्रशः ॥ ६६

याभिर्निपीतपीताभिर्निजानन्दोऽनुभूयते I तत्राधिनाथः सम्प्रोक्तः शैशिरर्तुर्महोदयः ॥ ६७

तपः श्रीश्च तपस्यश्री भार्ये तस्य सम्मते ।

मोदमानः सहैताभ्यां वर्तते शिशिराकृतिः ॥ ६८

नानाविलाससंयुक्तो नानागणसमावृतः ।

निवसन्ति महासिद्धा ये देवीदानकारिणः ॥ ६ ९

नानाभोगसमुत्पन्नमहानन्दसमन्विताः I साङ्गनाः परिवारैस्तु सङ्घशः परिवारिताः ॥ ७०

स्वर्णसालमयादग्रे मुनियोजनदैर्घ्यवान् ।

पुष्परागमयः सालः कुङ्कुमारुणविग्रहः ॥ ७१

पुष्परागमयी भूमिर्वनान्युपवनानि च ।

रत्नवृक्षालवालाश्च पुष्परागमयाः स्मृताः ॥ ७२

प्राकारो यस्य रत्नस्य तद्रत्नरचिता द्रुमाः ।

वनभूः पक्षिणश्चैव रत्नवर्णजलानि च ॥ ७३

मण्डपा मण्डपस्तम्भाः सरांसि कमलानि च ।

प्राकारे तत्र यद्यत्स्यात्तत्सर्वं तत्समं भवेत् ॥ ७४

हे राजन्! महान् उज्ज्वल हेमन्तऋतु वहाँका स्वामी कहा गया है । वह सभी रागी पुरुषोंको आनन्दित करते हुए हाथमें आयुध लेकर अपने गणोंके साथ वहाँ उपस्थित रहता है ॥ ६३ ॥

उसकी सहश्री तथा सहस्य श्री नामक दो प्रिय भार्याएँ हैं । भगवतीका व्रत करनेवाले जो सिद्धलोग हैं, वे वहाँ निवास करते हैं ॥ ६४ ॥

उस रजतके परकोटेके आगे तप्त स्वर्णसे निर्मित सात योजन लम्बा एक अन्य परकोटा है, जिसे सौवर्णसाल कहा गया है ॥ ६५ ॥

उसके बीचमें पुष्पों तथा पल्लवोंसे सुशोभित एक कदम्ब - वाटिका है, जहाँ कदम्बके आसवकी हजारों धाराएँ निरन्तर बहती रहती हैं, जिसका सेवन करनेसे आत्मानन्दका अनुभव होता है । वहाँका स्वामी श्रेष्ठ शिशिर ऋतु कहा गया है ॥ ६६-६७ ॥ उसकी तपः श्री और तपस्यश्री नामक दो प्रिय भार्याएँ हैं । अपने अनेक गणोंसे घिरा हुआ शिशिर ऋतु इन दोनों भार्याओंके साथ प्रसन्नतापूर्वक अनेकविध क्रीडाओंमें तत्पर रहता है ॥ ६८३ ॥

देवीकी प्रसन्नताके निमित्त अनेक दान करनेवाले जो महान् सिद्धपुरुष हैं, वे अनेकविध भोगोंसे उत्पन्न महानन्दसे युक्त होकर और अपने परिवारजनों तथा भार्याओंको साथ लेकर वहाँ समूहमें निवास करते हैं ॥ ६ ९ -७० ॥ उस स्वर्णनिर्मित परकोटेके आगे कुमकुमके समान अरुणवर्णवाला तथा सात योजन लम्बा पुष्परागमणिनिर्मित परकोटा है ॥७१ ॥

वहाँकी भूमि पुष्परागमयी है । इसी प्रकार वहाँके वन, उपवन तथा थालोंसमेत वृक्ष पुष्परागरत्नसे युक्त कहे गये हैं ॥ ७२ ॥

वहाँ जिस रत्नका परकोटा बना हुआ है, उसी रत्नसे वहाँके वृक्ष, वन, भूमि, पक्षी, मण्डप, मण्डपोंके स्तम्भ, सरोवर और कमल भी निर्मित हैं; वहाँ जल भी उसी रत्नके वर्णका है । उस परकोटेके अन्दर जो - जो वस्तुएँ हैं, वे सब उसी रत्नके समान | हैं | ७३-७४ ॥ 1898 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ द्वितीय खण्ड ] –27 B

पृष्ठ 844

देवी भागवत उत्तरार्द्ध, पृष्ठ 844 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अ ० १० ] परिभाषेयमुद्दिष्टा रत्नसालादिषु प्रभो तेजसा स्याल्लक्षगुणः पूर्वसालात्परो नृप दिक्पाला निवसन्त्यत्र प्रतिब्रह्माण्डवर्तिनाम् दिक्पालानां समष्ट्यात्मरूपाः स्फूर्जद्वरायुधाः पूर्वाशायां समुत्तुङ्गशृङ्गा पूरमरावती नानोपवनसंयुक्तो महेन्द्रस्तत्र राजते

स्वर्गशोभा च या स्वर्गे यावती स्यात्ततोऽधिका ।

समष्टिशतनेत्रस्य सहस्त्रगुणतः स्मृता ॥

ऐरावतसमारूढो वज्रहस्तः प्रतापवान् ।

देवसेनापरिवृतो राजतेऽत्र शतक्रतुः ॥

देवाङ्गनागणयुता शची तत्र विराजते ।

वह्निकोणे वह्निपुरी वह्निपूः सदृशी नृप ॥

स्वाहास्वधासमायुक्तो वह्निस्तत्र विराजते ।

निजवाहनभूषाढ्यो निजदेवगणैर्वृतः ॥

याम्याशायां यमपुरी तत्र दण्डधरो महान् ।

स्वभटैर्वेष्टितो राजन् चित्रगुप्तपुरोगमैः ॥

निजशक्तियुतो भास्वत्तनयोऽस्ति यमो महान् ।

नैर्ऋत्यां दिशि राक्षस्यां राक्षसैः परिवारितः ॥

खड्गधारी स्फुरन्नास्ते निर्ऋतिर्निजशक्तियुक् ।

वारुण्यां वरुणो राजा पाशधारी प्रतापवान् ॥

महाझषसमारूढो वारुणीमधुविह्वलः । द्वादश स्कन्ध ८३५ । हे प्रभो! रत्ननिर्मित परकोटोंके विषयमें मैंने ॥ ७५ आपको यह सम्यक् परिचय दे दिया । हे राजन्! इनमें प्रत्येक अगला प्राकार अपने पहलेवाले प्राकारसे एक । लाख गुना अधिक तेजसम्पन्न है ॥ ७५ ॥

॥ ७६ प्रत्येक ब्रह्माण्डमें रहनेवाले दिक्पाल अपना एक समूह बनाकर हाथोंमें श्रेष्ठ तथा अत्यन्त । तेजोमय आयुध धारण किये हुए यहाँ निवास करते हैं ॥७६ ॥

॥ ७७ इस मणिद्वीपकी पूर्वदिशामें ऊँचे शिखरोंसे युक्त अमरावतीपुरी है । अनेकविध उपवनोंसे युक्त उस पुरीमें इन्द्र विराजमान रहते हैं ॥ ७७ ॥

७८ स्वर्गलोकमें जितनी शोभा स्वर्गकी है, उससे भी अधिक शोभा इस अमरावतीपुरीकी है । अनेक इन्द्रोंके हजार गुने से भी अधिक इसकी शोभा कही गयी है । ७ ९ | अपने ऐरावतपर आरूढ होकर हाथमें वज्र धारण किये हुए प्रतापी इन्द्र देवसेनाके साथ यहाँ सुशोभित होते हैं और वहीं पर अनेक देवांगनाओंके साथ शची ८० | भी विराजमान रहती हैं ॥ ७८-७९ ३ ॥ हे राजन्! उस मणिद्वीपके अग्निकोणमें अग्निसदृश प्रज्वलित वह्निपुरी है | वहाँपर अपने देवगणोंसे घिरे ८१ हुए अग्निदेव अपने वाहनों तथा भूषणोंसे सुशोभित होकर ' स्वाहा ' और ' स्वधा ' – इन दो शक्तियोंके साथ विराजमान रहते हैं ॥ ८०-८१ ॥ ८२ मणिद्वीपकी दक्षिणदिशामें यमपुरी है । राजन्! सूर्यपुत्र महाभाग श्रेष्ठ यमराज चित्रगुप्त आदि मन्त्रियोंके साथ अपने अनुचरोंसे घिरे रहकर हाथमें दण्ड धारण किये अपनी शक्तिके साथ वहाँ ८३ विराजमान रहते हैं ॥८२३ ॥

इस मणिद्वीपके नैर्ऋत्यकोणमें राक्षसोंकी पुरी विद्यमान है, जिसमें खड्गधारी निर्ऋति अपनी शक्तिके ८४ साथ राक्षसोंसे घिरे हुए विराजमान रहते हैं ॥ ८३३ ॥

पश्चिमदिशामें वरुणलोकमें वारुणीपानसे विह्वल, पाश धारण करनेवाले प्रतापवान् वरुणराज निजशक्तिसमायुक्तो निजयादोगणान्वितः ॥ ८५ विशाल मत्स्यपर सवार होकर वरुणानीमें आसक्त रहते हुए अपनी शक्ति वरुणानी तथा अपने गणोंके

समास्ते वारुणे लोके वरुणानीरताकुलः । साथ विराजमान रहते हैं ॥ ८४-८५३ ॥

1898 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ द्वितीय खण्ड ] –27 C

पृष्ठ 845

देवी भागवत उत्तरार्द्ध, पृष्ठ 845 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

८३६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १० वायुकोणे वायुलोको वायुस्तत्राधितिष्ठति ॥

वायुसाधनसंसिद्धयोगिभिः परिवारितः ।

ध्वजहस्तो विशालाक्षो मृगवाहनसंस्थितः ॥

मरुद्गणैः परिवृतो निजशक्तिसमन्वितः ।

उत्तरस्यां दिशि महान् यक्षलोकोऽस्ति भूमिप ॥

यक्षाधिराजस्तत्रास्ते वृद्धिऋद्ध्यादिशक्तिभिः ।

नवभिर्निधिभिर्युक्तस्तुन्दिलो धननायकः ॥

मणिभद्रः पूर्णभद्रो मणिमान्मणिकन्धरः ।

मणिभूषो मणिस्रग्वी मणिकार्मुकधारकः ॥

इत्यादियक्षसेनानीसहितो निजशक्तियुक् ॥

ईशानकोणे सम्प्रोक्तो रुद्रलोको महत्तरः ॥

अनर्घ्यरत्नखचितो यत्र रुद्रोऽधिदैवतम् ।

मन्युमान्दीप्तनयनो बद्धपृष्ठमहेषुधिः ॥

स्फूर्जद्धनुर्वामहस्तोऽधिज्यधन्वभिरावृतः ।

स्वसमानैरसंख्यातरुद्रैः शूलवरायुधैः ॥

विकृतास्यैः करालास्यैर्वमद्वह्निभिरास्यतः ।

दशहस्तैः शतकरैः सहस्त्रभुजसंयुतैः ॥

दशपादैर्दशग्रीवैस्त्रिनेत्रैरुग्रमूर्तिभिः अन्तरिक्षचरा ये च ये च भूमिचराः स्मृताः ॥

रुद्राध्याये स्मृता रुद्रास्तैः सर्वैश्च समावृतः ।

रुद्राणीकोटिसहितो भद्रकाल्यादिमातृभिः ॥

नानाशक्तिसमाविष्टडामर्यादिगणावृतः वीरभद्रादिसहितो रुद्रो राजन् विराजते ॥

मुण्डमालाधरो नागवलयो नागकन्धरः ।

व्याघ्रचर्मपरीधानो गजचर्मोत्तरीयकः ॥

चिताभस्माङ्गलिप्ताङ्गः प्रमथादिगणावृतः ।

निनदड्डुमरुध्वानैर्बधिरीकृतदिङ्मुखः ॥

अट्टहासास्फोटशब्दैः सन्त्रासितनभस्तलः । ८६ मणिद्वीप वायव्यकोणमें वायुलोक स्थित है । विशाल नेत्रोंवाले वायुदेव प्राणायाम करनेमें परम सिद्ध योगियोंके समूह तथा मरुद्गणोंसे सदा घिरे रहकर हाथमें ८७ ध्वजा धारण करके मृगपर आरूढ होकर अपनी शक्तिके साथ वहाँ निवास करते हैं ॥ ८६-८७३ ॥ हे राजन्! मणिद्वीपकी उत्तरदिशामें यक्षोंका ८८ महान् लोक है । वहाँपर अपनी शक्तिसहित यक्षोंके अधिराज तुन्दिल कुबेर वृद्धि - ऋद्धि आदि शक्तियों, ८ ९ नौ निधियों और मणिभद्र, पूर्णभद्र, मणिमान्, मणिकन्धर, मणिभूष, मणिस्रग्वी, मणिकार्मुकधारक आदि यक्षसेनानियोंके साथ अपनी शक्तिसे समन्वित होकर ९ ० विराजमान रहते हैं ॥ ८८ - ९ ०३ ॥ मणिद्वीपके ईशानकोणमें बहुमूल्य रत्नोंसे सम्पन्न महान् रुद्रलोक कहा गया है, जहाँ प्रज्वलित नेत्रों ९ १ तथा कोपयुक्त विग्रहवाले भगवान् रुद्र अपनी पीठपर महान् तरकस बाँधे तथा बायें हाथमें तेजस्वी धनुष लिये हुए अधिदेवताके रूपमें प्रतिष्ठित हैं । वे भगवान् ९ २ रुद्र धनुष्कोटिपर प्रत्यंचा चढ़ाये हुए धनुर्धारियों, हाथमें शूल तथा श्रेष्ठ आयुध धारण करनेवाले, ९ ३ विकृत मुखवाले, विकराल मुखाकृतिवाले, मुखसे निरन्तर अग्निज्वाला उगलनेवाले, दस भुजाओंवाले, कोई सौ भुजाओंवाले, कितने हजार भुजाओंवाले, दस ९ ४ पैरोंवाले, दस गर्दनवाले, तीन नेत्रोंवाले और अत्यन्त उग्र विग्रहवाले अपने ही सदृश असंख्य रुद्रोंसे सदा घिरे रहते हैं । अन्तरिक्षलोकमें तथा भूलोकमें विचरण ९ ५ करनेवाले जो - जो रुद्र प्रसिद्ध हैं और रुद्राध्यायमें भी जो रुद्र वर्णित हैं; उन सबसे वे भगवान् रुद्र वहाँ ९ ६ आवृत रहते हैं । इसी प्रकार वे करोड़ों रुद्राणियों, भद्रकाली आदि मातृकाओं और विविध शक्तियोंसे युक्त डामरी आदि गणोंसे सदा घिरे रहते हैं । हे ९ ७ राजन्! गलेमें मुण्डकी माला, हाथमें सर्प - वलय, कन्धेपर सर्पका यज्ञोपवीत, शरीरपर बाघम्बर और उत्तरीयके रूपमें गज - चर्म धारण करनेवाले; शरीर ९ ८ अंगोंमें सदा चिताकी भस्म लगाये रहनेवाले; अपने डमरूकी तीव्र ध्वनिसे दिशाओंको बधिर बना देनेवाले; अपने अट्टहास और आस्फोट शब्दोंसे गगनमण्डलको ९९ भयभीत कर देनेवाले, भूतसमुदायसे युक्त रहनेवाले तथा समस्त प्राणियोंके आवासस्वरूप भगवान् महेश्वर 1898 श्रीमद्देवी.... महापुराण [ द्वितीय खण्ड ] −27 D

पृष्ठ 846

देवी भागवत उत्तरार्द्ध, पृष्ठ 846 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अ ० ११ ] द्वादश स्कन्ध ८३७ भूतसङ्घसमाविष्टो भूतावासो महेश्वरः । रुद्र वहाँपर वीरभद्र आदि गणोंके साथ सदा विराजमान रहते हैं । ये ईशानदिशाके अधिपति हैं; इसीलिये ये ईशानदिक्पतिः सोऽयं नाम्ना चेशान एव च ॥ १०० | ' ईशान ' नामसे विख्यात हैं । ९ १ - १०० ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां द्वादशस्कन्धे मणिद्वीपवर्णनं नाम दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥।

अथैकादशोऽध्यायः मणिद्वीपके रत्नमय व्यास उवाच

पुष्परागमयादग्रे कुङ्कुमारुणविग्रहः ।

पद्मरागमयः सालो मध्ये भूश्चैव तादृशी ॥ १

दशयोजनवान्दैर्घ्यं गोपुरद्वारसंयुतः ।

तन्मणिस्तम्भसंयुक्ता मण्डपाः शतशो नृप ॥ २

मध्ये भुवि समासीनाश्चतुःषष्टिमिताः कलाः ।

नानायुधधरा वीरा रत्नभूषणभूषिताः ॥ ३

प्रत्येकलोकस्तासां तु तत्तल्लोकस्य नायकाः ।

समन्तात्पद्मरागस्य परिवार्य स्थिताः सदा ॥ ४

स्वस्वलोकजनैर्जुष्टाः स्वस्ववाहनहेतिभिः ।

तासां नामानि वक्ष्यामि शृणु त्वं जनमेजय ॥ ५

पिङ्गलाक्षी विशालाक्षी समृद्धिर्वृद्धिरेव च ।

श्रद्धा स्वाहा स्वधाभिख्या माया संज्ञा वसुन्धरा ॥ ६

त्रिलोकधात्री सावित्री गायत्री त्रिदशेश्वरी ।

सुरूपा बहुरूपा च स्कन्दमाताच्युतप्रिया ॥ ७

विमला चामला तद्वदरुणी पुनरारुणी ।

प्रकृतिर्विकृतिः सृष्टिः स्थितिः संहृतिरेव च ॥ ८

सन्ध्या माता सती हंसी मर्दिका वज्रिका परा ।

देवमाता भगवती देवकी कमलासना ॥ ९

त्रिमुखी सप्तमुख्यन्या सुरासुरविमर्दिनी ।

लम्बोष्ठी चोर्ध्वकेशी च बहुशीर्षा वृकोदरी ॥ १०

रथरेखाह्वया पश्चाच्छशिरेखा तथापरा ।

गगनवेगा पवनवेगा वेगा चैव ततः परम् ॥ ११

अग्रे भुवनपाला स्यात्तत्पश्चान्मदनातुरा ।

अनङ्गानङ्गमथना तथैवानङ्गमेखला ॥ १२

अनङ्गकुसुमा पश्चाद्विश्वरूपा सुरादिका ।

क्षयङ्करी भवेच्छक्तिरक्षोभ्या च ततः परम् ॥ १३

सत्यवादिन्यथ प्रोक्ता बहुरूपा शुचिव्रता ।

उदाराख्या च वागीशी चतुः षष्टिमिताः स्मृताः ॥ १४ ।

नौ प्राकारोंका वर्णन व्यासजी बोले- पुष्परागनिर्मित प्राकारके आगे कुमकुमके समान अरुण विग्रहवाला पद्मरागमणियुक्त प्राकार है, जिसके मध्यमें भूमि भी उसी प्रकारकी है । अनेक गोपुर और द्वारोंसे युक्त यह प्राकार लम्बाईमें दस योजन परिमाणवाला है । हे राजन्! वहाँ उसी मणिसे निर्मित खम्भोंसे युक्त सैकड़ों मण्डप विद्यमान हैं ॥ १-२ ॥ उसके मध्यकी भूमिपर रत्नमय भूषणोंसे भूषित, अनेक आयुध धारण करनेवाली तथा पराक्रमसम्पन्न चौंसठ कलाएँ विराजमान रहती हैं । उन कलाओंका एक - एक पृथक् लोक है और अपने - अपने लोककी वे अधीश्वरी हैं । वहाँ चारों ओरकी सभी वस्तुएँ पद्म-रागमणिसे निर्मित हैं । अपने - अपने लोकके वाहनों तथा आयुधोंसे युक्त वे कलाएँ अपने - अपने लोकके निवासियोंसे सदा घिरी रहती हैं । हे जनमेजय! अब मैं उन कलाओंके नाम बता रहा हूँ; आप सुनें ॥ ३–५ ॥ पिंगलाक्षी, विशालाक्षी, समृद्धि, वृद्धि, श्रद्धा, स्वाहा, स्वधा, अभिख्या, माया, संज्ञा, वसुन्धरा, त्रिलोकधात्री, सावित्री, गायत्री, त्रिदशेश्वरी, सुरूपा, बहुरूपा, स्कन्दमाता, अच्युतप्रिया, विमला, अमला, अरुणी, आरुणी, प्रकृति, विकृति, सृष्टि, स्थिति, संहृति, सन्ध्यामाता, सती, हंसी, मर्दिका, परा वज्रिका, देवमाता, भगवती, देवकी, कमलासना, त्रिमुखी, सप्तमुखी, सुरासुरविमर्दिनी, लम्बोष्ठी, ऊर्ध्वकेशी, बहुशीर्षा, वृकोदरी, रथरेखा, शशिरेखा, गगनवेगा, पवनवेगा, भुवनपाला, मदनातुरा, अनंगा, अनंगमथना, अनंगमेखला, अनंगकुसुमा, विश्वरूपा, सुरादिका, क्षयंकरी, शक्ति, अक्षोभ्या, सत्यवादिनी, बहुरूपा, शुचिव्रता, उदारा और वागीशी— ये चौंसठ कलाएँ कही गयी हैं ॥ ६–१४ ॥

पृष्ठ 847

देवी भागवत उत्तरार्द्ध, पृष्ठ 847 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

८३८

ज्वलज्जिह्वाननाः सर्वा वमन्त्यो वह्निमुल्बणम् ।

जलं पिबामः सकलं संहरामो विभावसुम् ॥

पवनं स्तम्भयामोऽद्य भक्षयामोऽखिलं जगत् ।

इति वाचं संगिरते क्रोधसंरक्तलोचनाः ॥

चापबाणधराः सर्वा युद्धायैवोत्सुकाः सदा । दंष्ट्राकटकटारावैर्बधिरीकृतदिङ्मुखाः पिङ्गोर्ध्वकेश्यः सम्प्रोक्ताश्चापबाणकराः सदा । शताक्षौहिणिका सेनाप्येकैकस्याः प्रकीर्तिता एकैकशक्तेः सामर्थ्यं लक्षब्रह्माण्डनाशने शताक्षौहिणिका सेना तादृशी नृपसत्तम किं न कुर्याज्जगत्यस्मिन्नशक्यं वक्तुमेव तत् सर्वापि युद्धसामग्री तस्मिन्साले स्थिता मुने रथानां गणना नास्ति हयानां करिणां तथा शस्त्राणां गणना तद्वद् गणानां गणना तथा पद्मरागमयादग्रे गोमेदमणिनिर्मितः दशयोजनदैर्घ्येण प्राकारो वर्तते महान् भास्वज्जपाप्रसूनाभो मध्यभूस्तस्य तादृशी गोमेदकल्पितान्येव तद्वासिसदनानि च पक्षिणः स्तम्भवर्याश्च वृक्षा वाप्यः सरांसि च गोमेदकल्पिता एव कुङ्कुमारुणविग्रहाः तन्मध्यस्था महादेव्यो द्वात्रिंशच्छक्तयः स्मृताः नानाशस्त्रप्रहरणा गोमेदमणिभूषिताः प्रत्येकलोकवासिन्यः परिवार्य समन्ततः गोमेदसाले सन्नद्धाः पिशाचवदना नृप श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ११ के कारण अति रक्त नेत्रोंवाली तथा प्रज्वलित १५ जिह्वासे युक्त मुखवाली वे सभी कलाएँ प्रचण्ड अग्नि उगलती हुई सदा इन शब्दोंका उच्चारण करती रहती हैं— ' हम अभी सम्पूर्ण जल पी डालेंगी, हम अग्निको १६ नष्ट कर देंगी, हम वायुको रोक देंगी और समस्त संसारका भक्षण कर डालेंगी ' ॥ १५ - १६ ॥ वे सभी कलाएँ धनुष - बाण धारण करके सदा युद्धके लिये तत्पर रहती हैं और दाँतोंके कटकटानेकी ॥ १७ ध्वनिसे दिशाओंको बधिर - सी बना देती हैं ॥ १७ ॥

अपने हाथमें सदा धनुष और बाण धारण करनेवाली ये शक्तियाँ पिंगलवर्णके उठे हुए केशोंसे ॥ १८ सम्पन्न कही गयी हैं । इनमें से एक - एक कलाके पास सौ - सौ अक्षौहिणी सेना बतायी गयी है । लाखों । ब्रह्माण्डोंको नष्ट कर डालनेकी क्षमता एक - एक ॥ १ ९ शक्तिमें विद्यमान है । हे नृपश्रेष्ठ! तो फिर वैसी शक्तियोंसे सम्पन्न सौ अक्षौहिणी सेना इस संसारमें । क्या नहीं कर सकती - उसे बतानेमें मैं असमर्थ ॥ २० हूँ ॥ १८-१९ ३ ॥ हे मुने! युद्धकी समस्त सामग्री उस पद्मरागके । प्राकारमें सदा विद्यमान रहती है । उसमें रथों, घोड़ों, ॥ २१ हाथियों और शस्त्रोंकी गणना नहीं है । उसी प्रकार गणोंकी भी कोई गणना नहीं है । २०-२१ ॥ । इस पद्मरागमय प्राकारके आगे गोमेदमणिसे ॥ २२ । निर्मित दस योजन लम्बा एक परकोटा है, जो प्रभायुक्त जपाकुसुमके समान कान्तिमान् है । इसके । मध्यकी भूमि भी वैसी ही है । वहाँके निवासियोंके भवन, पक्षी, उत्तम खम्भे, वृक्ष, वापी तथा सरोवर-॥ २३ ये सभी गोमेदमणिसे ही निर्मित हैं । गोमेदमणिसे बनी । वहाँकी सभी वस्तुओंका विग्रह कुमकुमके समान

अरुण वर्णका है । २२-२४ ॥

॥ २४ उस प्राकारके मध्यमें गोमेदमणिसे भूषित तथा अनेकविध शस्त्र धारण करनेवाली बत्तीस । महादेवियाँ निवास करती हैं, जो शक्तियाँ कही ॥ २५ गयी हैं । हे राजन्! गोमेदनिर्मित उस प्राकारमें पिशाचोंके समान भयंकर मुखवाली प्रत्येक लोककी । निवासिनी शक्तियाँ सावधान होकर चारों ओरसे उसे ॥ २६ । घेरकर स्थित रहती हैं ॥ २५-२६ ॥

पृष्ठ 848

देवी भागवत उत्तरार्द्ध, पृष्ठ 848 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अ ० ११ ] स्वर्लोकवासिभिर्नित्यं पूजिताश्चक्रबाहवः क्रोधरक्तेक्षणा भिन्धि पचच्छिन्धि दहेति च वदन्ति सततं वाचं युद्धोत्सुकहृदन्तराः एकैकस्या महाशक्तेर्दशाक्षौहिणिका मता सेना तत्राप्येकशक्तिर्लक्षब्रह्माण्डनाशिनी तादृशीनां महासेना वर्णनीया कथं नृप रथानां नैव गणना वाहनानां तथैव च । सर्वयुद्धसमारम्भस्तत्र देव्या विराजते

तासां नामानि वक्ष्यामि पापनाशकराणि च ।

विद्याहीपुष्टयः प्रज्ञा सिनीवाली कुहूस्तथा ॥

रुद्रा वीर्या प्रभा नन्दा पोषिणी ऋद्धिदा शुभा ।

कालरात्रिर्महारात्रिर्भद्रकाली कपर्दिनी ॥

विकृतिर्दण्डिमुण्डिन्यौ सेन्दुखण्डा शिखण्डिनी ।

निशुम्भशुम्भमथिनी महिषासुरमर्दिनी ॥

इन्द्राणी चैव रुद्राणी शङ्करार्धशरीरिणी ।

नारी नारायणी चैव त्रिशूलिन्यपि पालिनी ॥

अम्बिका ह्लादिनी पश्चादित्येवं शक्तयः स्मृताः ।

यद्येताः कुपिता देव्यस्तदा ब्रह्माण्डनाशनम् ॥

पराजयो न चैतासां कदाचित्क्वचिदस्ति हि ।

गोमेदकमयादग्रे सद्वज्रमणिनिर्मितः ॥

दशयोजनतुङ्गोऽसौ गोपुरद्वारसंयुतः ।

कपाटशृङ्खलाबद्धो नववृक्षसमुज्ज्वलः ॥

सालस्तन्मध्यभूम्यादि सर्वं हीरमयं स्मृतम् ।

गृहाणि वीथयो रथ्या महामार्गाङ्गणानि च ॥

वृक्षालवालतरवः सारङ्गा अपि तादृशा: ।

दीर्घिका श्रेणयो वाप्यस्तडागाः कूपसंयुताः ॥

तत्र श्रीभुवनेश्वर्या वसन्ति परिचारिकाः ।

एकैका लक्षदासीभिः सेविता मदगर्विताः ॥

द्वादश स्कन्ध ८३ ९ । स्वर्गलोकके निवासियोंद्वारा नित्य पूजी जानेवाली ॥ २७ वे शक्तियाँ हृदयमें युद्धकी लालसासे युक्त होकर हाथोंमें चक्र धारण किये हुए तथा क्रोधके कारण नेत्र । लाल करके ' काटो, पकाओ, छेदो और भस्म कर ॥ २८ डालो ' – इन शब्दोंको निरन्तर बोलती रहती हैं । उनमें । एक - एक महाशक्तिके पास दस - दस अक्षौहिणी सेना ॥ २ ९ कही गयी है । उस सेनाकी एक ही शक्ति एक लाख ब्रह्माण्डोंका संहार करनेमें समर्थ है तो हे राजन्! उस प्रकारकी शक्तियोंसे युक्त विशाल सेनाका वर्णन कैसे ॥ ३० किया जा सकता है! ॥ २७–२९ ॥ उनके रथों तथा वाहनोंकी गणना नहीं की जा सकती । भगवतीकी युद्ध - सम्बन्धी समस्त सामग्री ३१ वहाँ विद्यमान रहती है । अब मैं भगवतीकी शक्तियोंके पापनाशक नामोंका वर्णन करूँगा - विद्या, ही, पुष्टि, ३२ प्रज्ञा, सिनीवाली, कुहू, रुद्रा, वीर्या, प्रभा, नन्दा, पोषिणी, ऋद्धिदा, शुभ्रा, कालरात्रि, महारात्रि, भद्रकाली, कपर्दिनी,, विकृति, दण्डिनी, मुण्डिनी, सेन्दुखण्डा, ३३ | शिखण्डिनी, निशुम्भशुम्भमथिनी, महिषासुरमर्दिनी, इन्द्राणी, रुद्राणी, शंकरार्धशरीरिणी, नारी, नारायणी, त्रिशूलिनी, पालिनी, अम्बिका और ह्लादिनी - ये शक्तियाँ ३४ कही गयी हैं । यदि ये देवियाँ कुपित हो जायँ, तो सम्पूर्ण ब्रह्माण्डका तत्क्षण नाश हो जायगा । कहीं किसी भी समय इन शक्तियोंकी पराजय सम्भव नहीं ३५ है ॥ ३०–३५३ ॥ गोमेदनिर्मित प्राकारके आगे वज्रमणि ( हीरे ) -३६ से निर्मित दस योजन ऊँचाईवाला एक परकोटा है । उस परकोटेमें अनेक गोपुर तथा द्वार बने हुए हैं । वह परकोटा कपाट और सांकलसे बन्द रहता है तथा ३७ नये - नये वृक्षोंसे सदा सुशोभित रहता है । उस प्राकारके मध्यभागकी समस्त भूमि हीरायुक्त कही गयी है । भवन, गलियाँ, चौराहे, महामार्ग, आँगन, ३८ वृक्षोंके थाले, वृक्ष, सारंग, अनेक बावलियाँ, वापी, तडाग तथा कुएँ – ये सब उसी प्रकार हीरकमय ३ ९ हैं ॥ ३६–३९ ॥ उस प्राकारमें भगवती भुवनेश्वरीकी परिचारिकाएँ रहती हैं । मदसे गर्वित रहनेवाली एक - एक परिचारिका ४० । लाखों दासियोंसे सेवित रहती हैं ॥४० ॥

पृष्ठ 849

देवी भागवत उत्तरार्द्ध, पृष्ठ 849 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

८४० तालवृन्तधराः काश्चिच्चषकाढ्यकराम्बुजाः । काश्चित्ताम्बूलपात्राणि धारयन्त्योऽतिगर्विताः काश्चित्तच्छत्रधारिण्यश्चामराणां विधारिकाः । नानावस्त्रधराः काश्चित्काश्चित्पुष्पकराम्बुजाः नानादर्शकराः काश्चित्काश्चित्कुङ्कमलेपनम् धारयन्त्यः कज्जलं च सिन्दूरचषकं पराः काश्चिच्चित्रकनिर्मात्र्यः पादसंवाहने रताः काश्चित्तु भूषाकारिण्यो नानाभूषाधराः पराः पुष्पभूषणनिर्मात्र्यः पुष्पशृङ्गारकारिकाः नानाविलासचतुरा बह्वय एवंविधाः पराः निबद्धपरिधानीया युवत्यः सकला अपि देवीकृपालेशवशात्तुच्छीकृतजगत्त्रयाः एता दूत्यः स्मृता देव्यः शृङ्गारमदगर्विताः तासां नामानि वक्ष्यामि शृणु मे नृपसत्तम अनङ्गरूपा प्रथमाप्यनङ्गमदना परा तृतीया तु ततः प्रोक्ता सुन्दरी मदनातुरा ततो भुवनवेगा स्यात्तथा भुवनपालिका स्यात्सर्वशिशिरानङ्गवदनानङ्गमेखला विद्युद्दामसमानाङ्गयः क्वणत्काञ्चीगुणान्विताः रणन्मञ्जीरचरणा बहिरन्तरितस्ततः धावमानास्तु शोभन्ते सर्वा विद्युल्लतोपमाः कुशलाः सर्वकार्येषु वेत्रहस्ताः समन्ततः अष्टदिक्षु तथैतासां प्राकाराद् बहिरेव च सदनानि विराजन्ते नानावाहनहेतिभिः वज्रसालादग्रभागे सालो वैदूर्यनिर्मितः दशयोजनतुङ्गोऽसौ गोपुरद्वारभूषितः श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ११ अत्यधिक गर्वित कई परिचारिकाएँ ताड़के पंखे, ॥ ४१ कई अपने करकमलोंमें मधुपात्र तथा कई अपने हाथमें ताम्बूलपात्र धारण किये रहती हैं । कई परिचारिकाएँ छत्र लिये रहती हैं, कई चामर धारण ॥ ४२ किये रहती हैं, कुछ अनेक प्रकारके वस्त्र धारण किये रहती हैं और कुछ अपने कमलसदृश हाथोंमें पुष्प । लिये स्थित रहती हैं ॥ ४१-४२ ॥ ॥ ४३ कुछ परिचारिकाएँ अपने हाथोंमें दर्पण, कुछ कुमकुमका लेप, कुछ काजल और कुछ सिन्दूर - पात्र । धारण किये खड़ी रहती हैं । कुछ चित्रकारी बनाने, ॥ ४४ कुछ चरण दबाने, कुछ भूषण सजाने तथा कुछ भगवतीके भूषणसे पूरित रत्नमय पात्र धारण करनेमें । तत्पर रहती हैं । कुछ पुष्पोंके आभूषण बनानेवाली, ॥ ४५ कुछ पुष्प- शृंगारमें कुशल तथा अनेक प्रकारके विलासमें चतुर इसी तरहकी बहुत - सी युवतियाँ वहाँ । विद्यमान रहती हैं ॥ ४३-४५ ॥ ॥ ४६ सुन्दर - सुन्दर परिधान धारण की हुई वे सभी । युवतियाँ भगवतीकी लेशमात्र कृपाके प्रभावसे तीनों लोकोंको तुच्छ समझती हैं । शृंगारके मदमें उन्मत्त ॥ ४७ ये सब देवीकी दूतिकाएँ कही गयी हैं । हे नृपश्रेष्ठ! अब मैं उनके नाम बता रहा हूँ, सुनिये ॥ ४६-४७ ॥ । पहली अनंगरूपा, दूसरी अनंगमदना और तीसरी ॥ ४८ सुन्दर रूपवाली मदनातुरा कही गयी है । तत्पश्चात् | भुवनवेगा, भुवनपालिका, सर्वशिशिरा, अनंगवदना ॥ ४ ९ और अनंगमेखला हैं । इनके सभी अंग विद्युत्की कान्तिके समान प्रकाशमान रहते हैं, इनके कटिभाग । कई लड़ियोंवाली ध्वनिमय किंकिणियोंसे सुशोभित हैं ॥ ५० और इनके चरण ध्वनि करते हुए नूपुरसे सुशोभित हैं । ये सभी दूतियाँ वेगपूर्वक बाहर तथा भीतर जाते समय । विद्युत्की लताके सदृश सुशोभित होती हैं । हाथमें बेंत ॥ ५१ लेकर सभी ओर भ्रमण करनेवाली ये दूतियाँ सभी कार्यों में दक्ष हैं । इस प्राकारसे बाहर आठों दिशाओंमें । इन दूतियोंके निवासहेतु अनेकविध वाहनों तथा ॥ ५२ शस्त्रोंसे सम्पन्न भवन विद्यमान हैं ॥ ४८–५२ ॥ वज्रमणि - निर्मित प्राकारसे आगे वैदूर्यमणिसे । बना हुआ एक प्राकार है । अनेक गोपुरों तथा द्वारोंसे ॥ ५३ । सुशोभित वह प्राकार दस योजन ऊँचाईवाला है ॥ ५३ ॥

पृष्ठ 850

देवी भागवत उत्तरार्द्ध, पृष्ठ 850 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अ ० ११ ] द्वादश स्कन्ध ८४१

वैदूर्यभूमिः सर्वापि गृहाणि विविधानि च ।

वीथ्यो रथ्या महामार्गाः सर्वे वैदूर्यनिर्मिताः ॥ ५४

वापीकूपतडागाश्च स्रवन्तीनां तटानि च ।

बालुका चैव सर्वापि वैदूर्यमणिनिर्मिता ॥ ५५

तत्राष्टदिक्षु परितो ब्राह्मयादीनां च मण्डलम् ।

निजैर्गणैः परिवृतं भ्राजते नृपसत्तम ॥५६

प्रतिब्रह्माण्डमातॄणां ताः समष्टय ईरिताः ।

ब्राह्मी माहेश्वरी चैव कौमारी वैष्णवी तथा ॥ ५७

वाराही च तथेन्द्राणी चामुण्डाः सप्त मातरः ।

अष्टमी तु महालक्ष्मीर्नाम्ना प्रोक्तास्तु मातरः ॥ ५८

ब्रह्मरुद्रादिदेवानां समाकारास्तु ताः स्मृताः ।

जगत्कल्याणकारिण्यः स्वस्वसेनासमावृताः ॥ ५ ९

तत्सालस्य चतुर्द्वार्षु वाहनानि महेशितुः ।

सज्जानि नृपते सन्ति सालङ्काराणि नित्यशः ॥ ६०

दन्तिनः कोटिशो वाहा: कोटिशः शिबिकास्तथा ।

हंसाः सिंहाश्च गरुडा मयूरा वृषभास्तथा ॥ ६१

तैर्युक्ताः स्यन्दनास्तद्वत्कोटिशो नृपनन्दन ।

पार्ष्णिग्राहसमायुक्ता ध्वजैराकाशचुम्बिनः ॥ ६२

कोटिशस्तु विमानानि नानाचिह्नान्वितानि च ।

नानावादित्रयुक्तानि महाध्वजयुतानि च ॥ ६३

वैदूर्यमणिसालस्याप्यग्रे सालः परः स्मृतः ।

दशयोजनतुङ्गोऽसाविन्द्रनीलाश्मनिर्मितः ॥ ६४

तन्मध्यभूस्तथा वीथ्यो महामार्गा गृहाणि च ।

वापीकूपतडागाश्च सर्वे तन्मणिनिर्मिताः ॥ ६५

तत्र पद्मं तु सम्प्रोक्तं बहुयोजनविस्तृतम् ।

षोडशारं दीप्यमानं सुदर्शनमिवापरम् ॥ ६६

तत्र षोडशशक्तीनां स्थानानि विविधानि च ।

सर्वोपस्करयुक्तानि समृद्धानि वसन्ति हि ॥ ६७ ।

वहाँकी सम्पूर्ण भूमि वैदूर्यमणियुक्त है । वहाँके अनेक प्रकारके भवन, गलियाँ, चौराहे तथा महामार्ग— ये सब वैदूर्यमणिसे निर्मित हैं । इस परकोटेकी बावलियाँ, कुएँ, तडाग, नदियोंके तट और बालू - ये सब वैदूर्यमणिसे निर्मित हैं ॥ ५४-५५ ॥ हे नृपश्रेष्ठ! उस प्राकारकी आठों दिशाओंमें सब ओर अपने गणोंसे सदा घिरी रहनेवाली ब्राह्मी आदि देवियोंका मण्डल सुशोभित रहता है । वे प्रत्येक ब्रह्माण्डके मातृकाओंकी समष्टियाँ कही गयी हैं । ब्राह्मी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, इन्द्राणी और चामुण्डा- - ये सात मातृकाएँ और आठवीं महालक्ष्मी नामवाली - इस प्रकार ये आठ मातृकाएँ कही गयी हैं ॥ ५६-५८ ॥ जगत्का कल्याण करनेवाली तथा अपनी-अपनी सेनाओंसे घिरी हुई वे मातृकाएँ ब्रह्मा, रुद्र आदि देवताओंके समान आकारवाली कही गयी हैं ॥ ५ ९ ॥ हे राजन्! उस परकोटेके चारों द्वारोंपर महेश्वरी भगवतीके वाहन अलंकारोंसे सुसज्जित होकर सर्वदा विराजमान रहते हैं ॥ ६० ॥

उनके वाहनके रूपमें करोड़ों हाथी, करोड़ों घोड़े, पालकियाँ, हंस, सिंह, गरुड, मयूर और वृषभ हैं । हे नृपनन्दन! उन वाहनोंसे युक्त करोड़ों रथ वहाँ विद्यमान रहते हैं, जिनपर सेनापति विराजमान रहते हैं और आकाशतक पहुँचनेवाली पताकाएँ सुशोभित

रहती हैं ।॥ ६१-६२ ॥

अनेकविध वाद्य - यन्त्रोंसे युक्त, विशाल ध्वजाओंसे सुशोभित और अनेक प्रकारके चिह्नोंसे अंकित करोड़ों विमान उस प्राकारमें स्थित रहते हैं ॥६३ ॥

वैदूर्यमणिमय प्राकारके भी आगे इन्द्रनीलमणि-निर्मित दस योजन ऊँचा एक दूसरा प्राकार कहा गया | है ॥ ६४ ॥

उस प्राकारके मध्यकी भूमि, गलियाँ, राजमार्ग, भवन, वापी, कुएँ और सरोवर- ये सब उसी मणिसे बने हुए हैं ॥ ६५ ॥

वहाँपर दूसरे सुदर्शन चक्रकी भाँति प्रतीत होनेवाला, अनेक योजन विस्तृत तथा सोलह दलोंवाला एक दीप्तिमान् कमल विद्यमान कहा गया है । उसपर सोलह शक्तियोंके लिये सभी सामग्रियों तथा समृद्धियोंसे सम्पन्न विविध स्थान बने हुए हैं ॥ ६६-६७ ॥