देवी भागवत उत्तरार्द्ध — पृष्ठ 851–860
देवी भागवत उत्तरार्द्ध · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 851–860
पृष्ठ 851
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
८४२ तासां नामानि वक्ष्यामि शृणु मे नृपसत्तम कराली विकराली च तथोमा च सरस्वती श्रीदुर्गाषा तथा लक्ष्मीः श्रुतिश्चैव स्मृतिर्धृतिः श्रद्धा मेधा मतिः कान्तिरार्या षोडश शक्तयः नीलजीमूतसंकाशाः करवालकराम्बुजाः समाः खेटकधारिण्यो युद्धोपक्रान्तमानसाः सेनान्यः सकला एताः श्रीदेव्या जगदीशितुः प्रतिब्रह्माण्डसंस्थानां शक्तीनां नायिकाः स्मृताः ब्रह्माण्डक्षोभकारिण्यो देवीशक्त्युपबृंहिताः । नानारथसमारूढा नानाशक्तिभिरन्विताः एतत्पराक्रमं वक्तुं सहस्त्रास्योऽपि न क्षमः इन्द्रनीलमहासालादग्रे तु बहुविस्तृतः मुक्ताप्राकार उदितो दशयोजनदैर्घ्यवान् । मध्यभूः पूर्ववत्प्रोक्ता तन्मध्ये ऽष्टदलाम्बुजम् मुक्तामणिगणाकीर्णं विस्तृतं तु सकेसरम् । तत्र देवीसमाकारा देव्यायुधधराः सदा सम्प्रोक्ता अष्टमन्त्रिण्यो जगद्वार्ताप्रबोधिकाः । देवीसमानभोगास्ता इङ्गितज्ञास्तु पण्डिताः कुशलाः सर्वकार्येषु स्वामिकार्यपरायणाः । देव्यभिप्रायबोध्यस्ताश्चतुरा अतिसुन्दराः नानाशक्तिसमायुक्ताः प्रतिब्रह्माण्डवर्तिनाम् । प्राणिनां ताः समाचारं ज्ञानशक्त्या विदन्ति च
तासां नामानि वक्ष्यामि मत्तः शृणु नृपोत्तम ।
अनङ्गकुसुमा प्रोक्ताप्यनङ्गकुसुमातुरा ॥
श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ११ । हे नृपश्रेष्ठ! अब मैं उन शक्तियोंके नामोंका ॥ ६८ वर्णन करूँगा, सुनिये - कराली, विकराली, उमा, सरस्वती, श्री, दुर्गा, उषा, लक्ष्मी, श्रुति, स्मृति, धृति, । श्रद्धा, मेधा, मति, कान्ति और आर्या – ये सोलह ॥ ६ ९ शक्तियाँ हैं ॥ ६८-६९ ॥ अपने करकमलोंमें ढाल तथा तलवार धारण । किये हुए, नीले मेघके समान वर्णवाली तथा अपने मनमें सदा युद्धकी लालसा रखनेवाली ये सभी ॥ ७० शक्तियाँ जगदीश्वरी श्रीदेवीकी सेनानी हैं । ये प्रत्येक ब्रह्माण्डमें स्थित रहनेवाली शक्तियोंकी नायिकाएँ
।
कही गयी हैं ॥ ७०-७१ ॥
॥ ७१ अनेक शक्तियोंको साथ लेकर भाँति - भाँतिके रथोंपर विराजमान ये शक्तियाँ भगवती जगदम्बाकी शक्तिसे सम्पन्न होनेके कारण सम्पूर्ण ब्रह्माण्डको । ७२ । क्षुब्ध करनेमें समर्थ हैं । हजार मुखवाले शेषनाग भी इनके पराक्रमका वर्णन करनेमें समर्थ नहीं हैं ॥ ७२ ॥
। उस इन्द्रनीलमणिके विशाल प्राकारके आगे दस ॥ ७३ योजनकी ऊँचाईतक उठा हुआ एक अतिविस्तीर्ण तथा प्रकाशमान मोतीका प्राकार है । इसके मध्यकी भूमि भी मोतीकी बनी हुई कही गयी है । उसके ॥ ७४ मध्यमें मुक्तामणियोंसे निर्मित तथा केसरयुक्त आठ दलोंवाला एक विशाल कमल विद्यमान है । उन आठों दलोंपर भगवती जगदम्बाके ही समान आकारवाली ॥ ७५ देवियाँ अपने हाथोंमें आयुध धारण किये सदा विराजमान रहती हैं । जगत्का समाचार सूचित करनेवाली ये आठ देवियाँ भगवतीकी मन्त्रिणी कही गयी हैं ॥ ७३ ३–७५१ ॥ ॥ ७६ वे देवियाँ भगवतीके समान भोगवाली, उनके संकेतको समझनेवाली, बुद्धिसम्पन्न, सभी कार्यों में कुशल, अपनी स्वामिनीके कार्य सम्पादनमें तत्पर, ॥ ७७ भगवतीके अभिप्रायको जाननेवाली, चतुर तथा अत्यन्त सुन्दर हैं ॥ ७६-७७ ॥ विविध शक्तियोंसे सम्पन्न वे देवियाँ अपनी ॥ ७८ ज्ञान- शक्तिके द्वारा प्रत्येक ब्रह्माण्डमें रहनेवाले प्राणियोंका समाचार जान लेती हैं । हे नृपश्रेष्ठ! मैं उनके नाम बता रहा हूँ, आप सुनिये - अनंगकुसुमा, ७ ९ | अनंगकुसुमातुरा, अनंगमदना, अनंगमदनातुरा, भुवन-
पृष्ठ 852
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० ११ ] द्वादश
अनङ्गमदना तद्वदनङ्गमदनातुरा ।
भुवनपाला गगनवेगा चैव ततः परम् ॥ ८०
शशिरेखा च गगनरेखा चैव ततः परम् ।
पाशाङ्कुशवराभीतिधरा अरुणविग्रहाः ॥ ८१
विश्वसम्बन्धिनीं वार्तां बोधयन्ति प्रतिक्षणम् ।
मुक्तासालादग्रभागे महामारकतोऽपरः ॥ ८२
सालोत्तमः समुद्दिष्टो दशयोजनदैर्घ्यवान् ।
नानासौभाग्यसंयुक्तो नानाभोगसमन्वितः ॥ ८३
मध्यभूस्तादृशी प्रोक्ता सदनानि तथैव च ।
षट्कोणमत्र विस्तीर्णं कोणस्था देवताः शृणु ॥ ८४
पूर्वकोणे चतुर्वक्त्रो गायत्रीसहितो विधिः ।
कुण्डिकाक्षगुणाभीतिदण्डायुधधरः परः ॥ ८५
तदायुधधरा देवी गायत्री परदेवता ।
वेदाः सर्वे मूर्तिमन्तः शास्त्राणि विविधानि च ॥ ८६
स्मृतयश्च पुराणानि मूर्तिमन्ति वसन्ति हि ।
ये ब्रह्मविग्रहाः सन्ति गायत्रीविग्रहाश्च ये ॥ ८७
व्याहृतीनां विग्रहाश्च ते नित्यं तत्र सन्ति हि ।
रक्षःकोणे शङ्खचक्रगदाम्बुजकराम्बुजा ॥ ८८
सावित्री वर्तते तत्र महाविष्णुश्च तादृशः ।
ये विष्णुविग्रहाः सन्ति मत्स्यकूर्मादयोऽखिलाः ॥ ८ ९
सावित्रीविग्रहा ये च ते सर्वे तत्र सन्ति हि ।
वायु परश्वक्षमालाभयवरान्वितः ॥ ९ ०
महारुद्रो वर्ततेऽत्र सरस्वत्यपि तादृशी ।
ये ये तु रुद्रभेदाः स्युर्दक्षिणास्यादयो नृप ॥ ९ १
गौरीभेदाश्च ये सर्वे ते तत्र निवसन्ति हि ।
चतुःषष्ट्यागमा ये च ये चान्येऽप्यागमाः स्मृताः ॥ ९ २
ते सर्वे मूर्तिमन्तश्च तत्रैव निवसन्ति हि । स्कन्ध ८४३ पाला, गगनवेगा, शशिरेखा और गगनरेखा । अपने हाथोंमें पाश, अंकुश, वर तथा अभय मुद्राएँ धारण किये हुए लाल विग्रहवाली वे देवियाँ विश्वसे सम्बन्धित सभी बातोंसे भगवतीको प्रतिक्षण अवगत कराती रहती हैं ॥ ७८–८१३ ॥ इस मुक्ता - प्राकारके आगे महामरकतमणिसे निर्मित एक दूसरा श्रेष्ठ प्राकार कहा गया है । वह दस योजन लम्बा और अनेकविध सौभाग्य तथा भोगवाली सामग्रियोंसे परिपूर्ण है ॥ ८२-८३ ॥ इसके मध्यकी भूमि भी वैसी ही कही गयी है अर्थात् मरकत - मणिके सदृश है और वहाँके भवन भी उसी मणिसे निर्मित हैं । उस प्राकारमें भगवतीका एक विशाल तथा छ: कोणोंवाला यन्त्र है । अब आप उन कोणोंपर विराजमान रहनेवाले देवताओंके विषयमें सुनिये ॥ ८४ ॥
इसके पूर्वकोणमें कमण्डलु, अक्षसूत्र, अभयमुद्रा, दण्ड तथा आयुध धारण करनेवाले चतुर्मुख श्रेष्ठ ब्रह्माजी भगवती गायत्रीके साथ विराजमान रहते हैं । परादेवता भगवती गायत्री भी उन्हीं आयुधोंको धारण किये रहती हैं । समस्त वेद, विविध शास्त्र, स्मृतियाँ तथा पुराण मूर्तिमान् होकर वहाँ निवास करते हैं । ब्रह्माके जो विग्रह हैं, गायत्रीके जो विग्रह हैं और व्याहृतियोंके जो विग्रह हैं - वे सभी वहाँ नित्य निवास करते हैं ॥ ८५–८७३ ॥ नैर्ऋत्यकोणमें भगवती सावित्री अपने करकमलमें शंख, चक्र, गदा और कमल धारण किये विराजमान हैं । महाविष्णु भी वहाँपर उसी रूपमें विराजमान रहते हैं । मत्स्य तथा कूर्म आदि जो महाविष्णुके विग्रह हैं और जो भगवती सावित्रीके विग्रह हैं - वे सब वहाँ निवास करते हैं ॥ ८८-८९ ३ ॥ वायुकोणमें परशु, अक्षमाला, अभय और वरमुद्रा धारण करनेवाले महारुद्र विराजमान हैं और सरस्वती भी उसी रूपमें वहाँ रहती हैं । हे राजन्! भगवान् रुद्रके दक्षिणास्य आदि जो - जो रूप हैं और इसी प्रकार भगवती गौरीके जो - जो रूप हैं - वे सभी वहाँ निवास करते हैं । चौंसठ प्रकारके जो आगम तथा इसके अतिरिक्त भी जो अन्य आगमशास्त्र कहे गये हैं - वे सभी मूर्तिमान् होकर वहाँ विराजमान रहते हैं ॥ ९ ० - ९ २३ ॥
पृष्ठ 853
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
८४४ अग्निकोणे रत्नकुम्भं तथा मणिकरण्डकम् दधानो निजहस्ताभ्यां कुबेरो धनदायकः नानावीथीसमायुक्तो महालक्ष्मीसमन्वितः देव्या निधिपतिस्त्वास्ते स्वगुणैः परिवेष्टितः वारुणे तु महाकोणे मदनो रतिसंयुतः पाशाङ्कुशधनुर्बाणधरो नित्यं विराजते श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ११ ॥ ९ ३ अग्निकोणमें धन प्रदान करनेवाले कुबेर अपने दोनों हाथोंमें रत्नयुक्त कुम्भ तथा मणिमय करण्डक । ( पात्र ) धारण किये हुए विराजमान हैं । अनेक ॥ ९ ४ प्रकारकी वीथियोंसे युक्त और अपने सद्गुणोंसे सम्पन्न देवीकी निधिके स्वामी कुबेर महालक्ष्मीके साथ वहाँ । विराजमान रहते हैं ॥ ९ ३ - ९ ४३ ॥ ॥ ९ ५ पश्चिमके महान् वरुणकोणमें अपनी भुजाओंमें पाश, अंकुश, धनुष और बाण धारण करनेवाले । कामदेव रतिके साथ निवास करते हैं । सभी प्रकार शृङ्गारा मूर्तिमन्तस्तु तत्र सन्निहिताः सदा ॥ ९ ६ शृंगार मूर्तिमान् होकर वहाँ सदा विराजमान रहते ईशानकोणे विघ्नेशो नित्यं पुष्टिसमन्वितः पाशाङ्कुशधरो वीरो विघ्नहर्ता विराजते विभूतयो गणेशस्य या याः सन्ति नृपोत्तम ताः सर्वा निवसन्त्यत्र महैश्वर्यसमन्विताः प्रतिब्रह्माण्डसंस्थानां ब्रह्मादीनां समष्टयः । एते ब्रह्मादयः प्रोक्ताः सेवन्ते जगदीश्वरीम्
महामारकतस्याग्रे शतयोजनदैर्घ्यवान् ।
प्रवालसालोऽस्त्यपरः कुङ्कुमारुणविग्रहः ॥
मध्यभूस्तादृशी प्रोक्ता सदनानि च पूर्ववत् ।
तन्मध्ये पञ्चभूतानां स्वामिन्यः पञ्च सन्ति च ॥
हृल्लेखा गगना रक्ता चतुर्थी तु करालिका ।
महोच्छुष्मा पञ्चमी च पञ्चभूतसमप्रभाः ॥
पाशाङ्कुशवराभीतिधारिण्योऽमितभूषणाः ।
देवीसमानवेषाढ्या नवयौवनगर्विताः ॥
प्रवालसालादग्रे तु नवरत्नविनिर्मितः ।
बहुयोजनविस्तीर्णो महासालोऽस्ति भूमिप ॥
तत्र चाम्नायदेवीनां सदनानि बहून्यपि ।
नवरत्नमयान्येव तडागाश्च सरांसि च ॥
हैं ॥ ९ ५ - ९ ६ ॥
। ईशानकोणमें विघ्नको दूर करनेवाले तथा पराक्रमी ॥ ९ ७ विघ्नेश्वर गणेशजी अपने हाथोंमें पाश तथा अंकुश धारण किये हुए देवी पुष्टिके साथ सदा विराजमान । रहते हैं । हे नृपश्रेष्ठ! गणेशजीकी जो - जो विभूतियाँ ॥ ९ ८ हैं, वे सभी महान् ऐश्वर्योंसे सम्पन्न होकर वहाँ निवास करती हैं ॥ ९ ७ - ९ ८ ॥ प्रत्येक ब्रह्माण्डमें रहनेवाले ब्रह्मा आदिकी समष्टियाँ ॥ ९९ ब्रह्मा आदि नामसे कही गयी हैं- ये सभी भगवती जगदीश्वरीकी सेवामें संलग्न रहती हैं ॥ ९९ ॥
इस महामरकतमणि - निर्मित प्राकारके आगे १०० कुमकुमके समान अरुण विग्रहवाला तथा सौ योजन लम्बाईवाला एक दूसरा प्रवालमणिका प्राकार है । उसके मध्यकी भूमि तथा भवन भी उसी १०१ प्रकारके कहे गये हैं । उसके मध्यभागमें पंचभूतोंकी पाँच स्वामिनियाँ निवास करती हैं । हृल्लेखा, गगना, रक्ता, चौथी करालिका और पाँचवीं महोच्छुष्मा १०२ नामक ये शक्तियाँ पंचभूतोंके समान ही प्रभावाली हैं । पाश, अंकुश, वर तथा अभय मुद्रा धारण करनेवाली ये शक्तियाँ अनेक प्रकारके भूषणोंसे १०३ अलंकृत, नूतन यौवनसे गर्वित और भगवती जगदम्बाके सदृश वेषभूषासे मण्डित हैं ॥ १००-१०३ ॥ हे राजन्! इस प्रवालमय प्राकारके आगे नौ १०४ रत्नोंसे बना हुआ अनेक योजन विस्तृत एक विशाल प्राकार है । आम्नायमें वर्णित देवियोंके बहुतसे भवन, तडाग तथा सरोवर – वे सभी उन्हीं नौ रत्नोंसे निर्मित १०५ । हैं । हे भूपाल! श्रीदेवीके जो - जो अवतार हैं, वे सब
पृष्ठ 854
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० १२ ]
श्रीदेव्या येऽवताराः स्युस्ते तत्र निवसन्ति हि ।
महाविद्या महाभेदाः सन्ति तत्रैव भूमिप ॥
निजावरणदेवीभिर्निजभूषणवाहनैः I सर्वदेव्यो विराजन्ते कोटिसूर्यसमप्रभाः ॥
सप्तकोटिमहामन्त्रदेवताः सन्ति तत्र हि ।
नवरत्नमयादग्रे चिन्तामणिगृहं महत् ॥
तत्रत्यं वस्तुमात्रं तु चिन्तामणिविनिर्मितम् ।
सूर्योद्गारोपलैस्तद्वच्चन्द्रोद्गारोपलैस्तथा ॥
विद्युत्प्रभोपलैः स्तम्भाः कल्पितास्तु सहस्रशः ।
येषां प्रभाभिरन्तःस्थं वस्तु किञ्चिन्न दृश्यते ॥
द्वादश स्कन्ध ८४५ वहाँ निवास करते हैं और महाविद्याके सभी रूप १०६ वहाँ विद्यमान हैं । करोड़ों सूर्योंके समान प्रभासे युक्त सभी देवियाँ अपनी - अपनी आवरणशक्तियों, अपने भूषणों तथा वाहनोंके साथ वहाँ विराजमान १०७ रहती हैं । सात करोड़ महामन्त्रोंके देवता भी वहाँ
रहते हैं । १०४ - १०७ ३ ॥
इस नौ रत्नमय प्राकारके आगे चिन्तामणिसे १०८ बना हुआ एक विशाल भवन है । वहाँकी प्रत्येक वस्तु चिन्तामणिसे निर्मित है । उसमें सूर्य, चन्द्रमा १० ९ और विद्युत्के समान दीप्तिवाले पत्थरोंसे निर्मित हजारों स्तम्भ हैं, जिनकी तीव्र प्रभाके कारण उस भवनके अन्दर स्थित कोई भी वस्तु दृष्टिगोचर ११० | नहीं हो पाती है ॥१०८–११० ॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां द्वादशस्कन्धे पद्मरागादिमणिविनिर्मितप्राकारवर्णनं नामैकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥
अथ द्वादशोऽध्यायः भगवती जगदम्बाके मण्डपका व्यास उवाच
तदेव देवीसदनं मध्यभागे विराजते ।
सहस्त्रस्तम्भसंयुक्ताश्चत्वारस्तेषु मण्डपाः ॥ १
शृङ्गारमण्डपश्चैको मुक्तिमण्डप एव च ।
ज्ञानमण्डपसंज्ञस्तु तृतीयः परिकीर्तितः ॥ २
एकान्तमण्डपश्चैव चतुर्थः परिकीर्तितः ।
नानावितानसंयुक्ता नानाधूपैस्तु धूपिताः ॥ ३
कोटिसूर्यसमाः कान्त्या भ्राजन्ते मण्डपाः शुभाः ।
तन्मण्डपानां परितः काश्मीरवनिका स्मृता ॥ ४
मल्लिकाकुन्दवनिका यत्र पुष्कलकाः स्थिताः ।
असंख्याता मृगमदैः पूरितास्तत्स्स्रवा नृप ॥ ५
महापद्माटवी तद्वद्रत्नसोपाननिर्मिता ।
सुधारसेन सम्पूर्णा गुञ्जन्मत्तमधुव्रता ॥ ६
हंसकारण्डवाकीर्णा गन्धपूरितदिक्तटा ।
वनिकानां सुगन्धैस्तु मणिद्वीपं सुवासितम् ॥ ७
वर्णन तथा मणिद्वीपकी महिमा व्यासजी बोले- त्रिकोणके मध्यभागमें भगवती
जगदम्बाका वही चिन्तामणि नामक भवन विराजमान है ।
उसमें हजार स्तम्भोंवाले चार मण्डप विद्यमान हैं ॥ १ ॥
उनमें पहला श्रृंगारमण्डप, दूसरा मुक्तिमण्डप, तीसरा ज्ञानमण्डप और चौथा एकान्तमण्डप कहा गया है ॥२३ ॥
अनेक प्रकारके वितानोंसे युक्त तथा नानाविध धूपोंसे सुवासित ये सुन्दर मण्डप कान्तिमें करोड़ों सूर्योंके समान दीप्तिमान् रहते हैं ॥ ३३ ॥
हे राजन्! उन मण्डपोंके चारों ओर केसर, मल्लिका और कुन्दकी वाटिकाएँ बतायी गयी हैं, जिनमें मृगमदोंसे परिपूर्ण तथा मदस्रावी असंख्य गन्धमृग स्थित हैं । उसी प्रकार मण्डपोंके चारों ओर रत्नसे निर्मित सोपानोंवाली महापद्माटवी है । वह अमृतरससे परिपूर्ण, गुंजार करते हुए मतवाले भौरोंसे युक्त, कारण्डवों तथा हंसोंसे सदा सुशोभित और चारों ओरसे सुगन्धसे परिपूर्ण तटवाली है । इस प्रकार वह मणिद्वीप इन वाटिकाओंकी सुगन्धोंसे सदा सुवासित रहता है॥४-७ ॥
पृष्ठ 855
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
८४६ शृङ्गारमण्डपे देव्यो गायन्ति विविधैः स्वरैः सभासदो देववरा मध्ये श्रीजगदम्बिका मुक्तिमण्डपमध्ये तु मोचयत्यनिशं शिवा ज्ञानोपदेशं कुरुते तृतीये नृप मण्डपे श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १२ । शृंगारमण्डपके मध्यभागमें विराजमान जगदम्बिका ॥ ८ चारों ओर सभासद्के रूपमें श्रेष्ठ देवगण विद्यमान रहते हैं और वहाँ देवियाँ नानाविध स्वरोंमें सदा गाती । रहती हैं । मुक्तिमण्डपके मध्यमें विराजमान होकर ॥ ९ कल्याणमयी भगवती जगदम्बा भक्तोंको सदा मुक्ति प्रदान करती रहती हैं और हे राजन्! तीसरे ज्ञानमण्डपमें चतुर्थमण्डपे चैव जगद्रक्षाविचिन्तनम् । विराजमान होकर वे ज्ञानका उपदेश करती हैं । मन्त्रिणीसहिता नित्यं करोति जगदम्बिका चिन्तामणिगृहे राजञ्छक्तितत्त्वात्मकैः परैः सोपानैर्दशभिर्युक्तो मञ्चको ऽप्यधिराजते ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च ईश्वरश्च सदाशिवः एते मञ्चखुराः प्रोक्ताः फलकस्तु सदाशिवः तस्योपरि महादेवो भुवनेशो विराजते या देवी निजलीलार्थं द्विधाभूता बभूव ह सृष्ट्यादौ तु स एवायं तदर्धाङ्गो महेश्वरः कन्दर्पदर्पनाशोद्यत्कोटिकन्दर्पसुन्दरः पञ्चवक्त्रस्त्रिनेत्रश्च मणिभूषणभूषितः हरिणाभीतिपरशून् वरं च निजबाहुभिः दधानः षोडशाब्दोऽसौ देवः सर्वेश्वरो महान् कोटिसूर्यप्रतीकाशश्चन्द्रकोटिसुशीतलः शुद्धस्फटिकसंकाशस्त्रिनेत्रः शीतलद्युतिः वामाङ्के सन्निषण्णास्य देवी श्रीभुवनेश्वरी नवरत्नगणाकीर्णकाञ्चीदामविराजिता तप्तकाञ्चनसन्नद्धवैदूर्याङ्गदभूषणा कनच्छ्रीचक्रताटङ्कविटङ्कवदनाम्बुजा ललाटकान्तिविभवविजितार्धसुधाकरा ॥ १० एकान्तमण्डप नामक चौथे मण्डपमें अपनी मन्त्रिणियोंके
साथ भगवती जगत्की रक्षाके विषयमें नित्य विचार-। विमर्श किया करती हैं ॥ ८-१० ॥
॥ ११ हे राजन्! चिन्तामणिगृहमें भगवतीके शक्ति– तत्त्वरूपी दस श्रेष्ठ सोपानोंसे युक्त उनका मंच । अत्यधिक सुशोभित होता है ॥११ ॥
ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र और सदाशिव ईश्वर - ये उस ॥ १२ मंचके पाये कहे गये हैं । सदाशिव मंचके फलक हैं ॥ उसके ऊपर भुवनेश्वर महादेव विराजमान हैं ॥ १२३ ॥
सृष्टिके आदिमें अपनी लीला करनेके लिये जो ॥ १३ भगवती स्वयं दो रूपोंमें प्रकट हुई थीं, उन्हींके अर्धांगस्वरूप ये भगवान् महेश्वर हैं ॥ १३३ ॥
। वे कामदेव अभिमानका नाश करनेमें ॥ १४ परम कुशल, करोड़ों कामदेवके समान सुन्दर, पाँच मुख तथा तीन नेत्रोंसे युक्त और मणिके भूषणोंसे । विभूषित हैं ॥ १४३ ॥
॥ १५ सदा सोलह वर्षके प्रतीत होनेवाले वे सर्वेश्वर महादेव अपनी भुजाओंमें हरिण, अभयमुद्रा, परशु । तथा वरमुद्रा धारण किये हुए हैं ॥ १५३ ॥
वे त्रिनेत्र महादेव करोड़ों सूर्यके समान प्रकाशमान, ॥ १६ करोड़ों चन्द्रमाके समान शीतल, शुद्ध स्फटिकमणिके समान आभावाले तथा शीतल कान्तिवाले हैं ॥ १६३ ॥
। इनके वाम अंकमें देवी श्रीभुवनेश्वरी विराजमान ॥ १७ हैं, वे नौ प्रकारके रत्नोंसे जटित सुवर्णकी करधनीसे सुशोभित हैं और तप्त सुवर्ण तथा वैदूर्यमणिसे निर्मित 1 बाजूबन्दसे भूषित हैं ॥ १७-१८ ॥ ॥१८ कमलके समान मुखवाली भगवतीके कानोंमें श्रीचक्रकी आकृतिके समान सुवर्णका कर्णफूल सुशोभित हो रहा है । उनके ललाटकी कान्ति ॥ १ ९ वैभवने अर्धचन्द्रके सौन्दर्यको जीत लिया है ॥ १ ९ ॥
पृष्ठ 856
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० १२ ] द्वादश स्कन्ध ८४७ बिम्बकान्तितिरस्कारिरदच्छदविराजिता लसत्कुङ्कुमकस्तूरीतिलकोद्भासितानना दिव्यचूडामणिस्फारचञ्चच्चन्द्रसूर्यका उद्यत्कविसमस्वच्छनासाभरणभासुरा चिन्ताकलम्बितस्वच्छमुक्तागुच्छविराजिता पाटीरपङ्ककर्पूरकुङ्कुमालङ्कृतस्तनी विचित्रविविधाकल्पा कम्बुसंकाशकन्धरा दाडिमीफलबीजाभदन्तपङ्क्तिविराजिता अनर्घ्यरत्नघटितमुकुटाञ्चितमस्तका मत्तालिमालाविलसदलकाढ्यमुखाम्बुजा कलङ्ककार्श्यनिर्मुक्तशरच्चन्द्रनिभानना जाह्नवीसलिलावर्तशोभिनाभिविभूषिता माणिक्यशकलाबद्धमुद्रिकाङ्गलिभूषिता पुण्डरीकदलाकारनयनत्रयसुन्दरी कल्पिताच्छमहारागपद्मरागोज्ज्वलप्रभा रत्नकिङ्किणिकायुक्तरत्नकङ्कणशोभिता मणिमुक्तासरापारलसत्पदकसन्ततिः रत्नाङ्गुलिप्रविततप्रभाजाललसत्करा कञ्चुकीगुम्फितापारनानारत्नततिद्युतिः मल्लिकामोदिधम्मिल्लमल्लिकालिसरावृता I वे बिम्बाफलकी कान्तिको तिरस्कृत करनेवाले ॥ २० होठोंसे सुशोभित हैं । कुमकुम - कस्तूरीके तिलकसे अनुलिप्त उनका मुखमण्डल अति प्रकाशित है ॥ २० ॥
कान्तियुक्त चन्द्रमा तथा सूर्यके समान दिव्य । तथा उज्ज्वल रत्नमय चूडामणि उनके मस्तकपर ॥ २१ विराजमान है । उदयकालीन शुक्रनक्षत्रके सदृश स्वच्छ नासिकाभूषणसे वे सुशोभित हैं ॥ २१ ॥
चिन्ताक नामक कण्ठभूषणमें लटकते हुए । मोतीके गुच्छसे वे सुशोभित हो रही हैं । चन्दन, ॥ २२ कपूर और कुमकुमके अनुलेपसे उनका वक्ष: स्थल अलंकृत है ॥ २२ ॥
वे अनेक रूपोंसे सुसज्जित, शंखके समान । ग्रीवावाली तथा अनारके दानोंके सदृश दन्तपंक्तिसे ॥ २३ सुशोभित हो रही हैं ॥ २३ ॥
वे अपने मस्तक पर बहुमूल्य रत्नोंसे निर्मित 1 मुकुट धारण किये रहती हैं । उनके मुखकमल-पर मतवाले भ्रमरोंकी पंक्तिके सदृश अलकावली ॥ २४ सुशोभित है ॥ २४ ॥
वे कलंककी कालिमासे रहित शारदीय चन्द्रमा I सदृश मुखमण्डलवाली हैं और गंगाके जलावर्त ( भँवर ) -तुल्य सुन्दर नाभिसे विभूषित हैं ॥ २५ ॥
॥ २५ वे माणिक्यके दानोंसे जटित मुद्रिकासे युक्त अँगुलियोंसे सुशोभित हैं और कमलदलकी आकृतिवाले । तीन नेत्रोंसे वे अत्यन्त सौन्दर्यमयी प्रतीत होती हैं ॥ २६ ॥
॥२६ वे शानपर चढ़ाकर अतीव स्वच्छ किये गये महाराग तथा पद्मरागमणिके सदृश उज्ज्वल कान्तिसे सम्पन्न हैं और रत्नमय घुँघरूवाली करधनी तथा I रत्ननिर्मित कंकणसे सुशोभित हैं ॥ २७ ॥
॥ २७ उनके चरणकमल मणियों और मोतियोंकी मालाओंमें विराजमान रहनेवाली अपार शोभासे सम्पन्न हैं । वे रत्नोंसे युक्त अँगुलियोंसे फैलते हुए प्रभाजालसे I सुशोभित हाथवाली हैं ॥ २८ ॥
॥२८ उनकी कंचुकीमें गुथे हुए नानाविध रत्नोंकी पंक्तियोंसे अनुपम प्रकाश निर्गत हो रहा है । मल्लिकाकी सुगन्धिसे पूर्ण केशके जूड़ेपर स्थित मल्लिकाकी I मालापर मँडरानेवाले भौंरोंके समूहसे देवी सुशोभित ॥ २ ९ | हो रही हैं ॥ २ ९ ॥
पृष्ठ 857
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
८४८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १२
सुवृत्तनिविडोत्तुङ्गकुचभारालसा शिवा ।
वरपाशाङ्कुशाभीतिलसद्बाहुचतुष्टया ॥३०
सर्वशृङ्गारवेषाढ्या सुकुमाराङ्गवल्लरी ।
सौन्दर्यधारासर्वस्वा निर्व्याजकरुणामयी ॥ ३१
निजसंलापमाधुर्यविनिर्भत्सितकच्छपी 1 कोटिकोटिरवीन्दूनां कान्तिं या बिभ्रती परा ॥ ३२
नानासखीभिर्दासीभिस्तथा देवाङ्गनादिभिः ।
सर्वाभिर्देवताभिस्तु समन्तात्परिवेष्टिता ॥ ३३
इच्छाशक्त्या ज्ञानशक्त्या क्रियाशक्त्या समन्विता ।
लज्जा तुष्टिस्तथा पुष्टिः कीर्तिः कान्तिः क्षमा दया ॥ ३४
बुद्धिर्मेधा स्मृतिर्लक्ष्मीर्मूर्तिमत्योऽङ्गनाः स्मृताः ।
जया च विजया चैवाप्यजिता चापराजिता ॥ ३५
नित्या विलासिनी दोग्ध्री त्वघोरा मङ्गला नव ।
पीठशक्तय एतास्तु सेवन्ते यां पराम्बिकाम् ॥ ३६
यस्यास्तु पार्श्वभागे स्तो निधी तौ शङ्खपद्मकौ ।
नवरत्नवहा नद्यस्तथा वै काञ्चनस्त्रवाः ॥ ३७
सप्तधातुवहा नद्यो निधिभ्यां तु विनिर्गताः ।
सुधासिन्ध्वन्तगामिन्यस्ताः सर्वा नृपसत्तम ॥ ३८
सा देवी भुवनेशानी तद्वामाङ्के विराजते ।
सर्वेशत्वं महेशस्य यत्सङ्गादेव नान्यथा ॥ ३ ९
चिन्तामणिगृहस्यास्य प्रमाणं शृणु भूमिप ।
सहस्त्रयोजनायामं महान्तस्तत्प्रचक्षते ॥ ४०
तदुत्तरे महाशालाः पूर्वस्माद् द्विगुणाः स्मृताः ।
अन्तरिक्षगतं त्वेतन्निराधारं विराजते ॥ ४१
वृत्ताकार, सघन तथा उन्नत उरोजोंके भारसे कल्याणमयी भगवती अलसायी हुई प्रतीत होती हैं । उनकी चारों भुजाओंमें वर, पाश, अंकुश तथा अभयमुद्रा सुशोभित हो रही है ॥ ३० ॥
वे भगवती समस्त शृंगारवेषसे सम्पन्न, लताके समान अत्यन्त कोमल अंगोंवाली, समस्त सौन्दर्योंकी आधारस्वरूपा तथा निष्कपट करुणासे ओतप्रोत हैं ॥ ३१ ॥
वे अपनी वाणीकी मधुरतासे वीणाके स्वरोंको भी तुच्छ कर देती हैं । वे परा भगवती करोड़ों - करोड़ों सूर्यों तथा चन्द्रमाओंकी कान्ति धारण करती हैं ॥ ३२ ॥
वे बहुत - सी सखियों, दासियों, देवांगनाओं तथा समस्त देवताओंसे चारों ओरसे सदा घिरी रहती हैं ॥ ३३ ॥
वे इच्छाशक्ति, ज्ञानशक्ति और क्रियाशक्तिसे सम्पन्न हैं । लज्जा, तुष्टि, पुष्टि, कीर्ति, कान्ति, क्षमा, दया, बुद्धि, मेधा, स्मृति तथा लक्ष्मी – ये मूर्तिमती अंगनाएँ कही गयी हैं । जया, विजया, अजिता, अपराजिता, नित्या, विलासिनी, दोग्ध्री, अघोरा और मंगला - ये नौ पीठशक्तियाँ उन भगवती पराम्बाकी
निरन्तर सेवा करती रहती हैं । ३४ - ३६ ॥
शंख तथा पद्म नामक वे दोनों निधियाँ उन भगवतीके पार्श्वभागमें विराजमान रहती हैं । नवरत्नवहा ( नौ प्रकारके रत्नोंका वहन करनेवाली ), कांचनस्रवा ( स्वर्णका स्राव करनेवाली ) तथा सप्तधातुवहा ( सातों धातुओंका वहन करनेवाली ) नामक नदियाँ उन्हीं दोनों निधियोंसे निकली हुई हैं और हे राजेन्द्र! वे सभी नदियाँ अन्तमें सुधा - सिन्धुमें जाकर समाहित
होती हैं । ३७-३८ ॥
वे भगवती भुवनेश्वरी परमेश्वरके वाम अंकमें विराजमान रहती हैं । उन्हीं भगवतीके सांनिध्यसे महेश्वरको सर्वेश्वरत्व प्राप्त है, इसमें सन्देह नहीं है ॥ ३ ९ ॥ हे भूपाल! अब आप इस चिन्तामणिगृहके परिमाणके विषयमें सुनिये । यह विशाल भवन हजार योजन विस्तारवाला कहा जाता है ॥ ४० ॥
उसके उत्तर भागमें अनेक विशाल प्राकार हैं, जो परिमाणमें पूर्व प्राकारसे दुगुने कहे गये हैं । भगवतीका यह मणिद्वीप बिना किसी आधारके अन्तरिक्षमें विराजमान है ॥ ४१ ॥
पृष्ठ 858
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० १२ ] द्वादश स्कन्ध ८४ ९
सङ्कोचश्च विकासश्च जायतेऽस्य निरन्तरम् ।
पटवत्कार्यवशतः प्रलये सर्जने तथा ॥
शालानां चैव सर्वेषां सर्वकान्तिपरावधि ।
चिन्तामणिगृहं प्रोक्तं यत्र देवी महोमयी ॥
ये ये उपासकाः सन्ति प्रतिब्रह्माण्डवर्तिनः ।
देवेषु नागलोकेषु मनुष्येष्वितरेषु च ॥
श्रीदेव्यास्ते च सर्वेऽपि व्रजन्त्यत्रैव भूमिप ।
देवीक्षेत्रे ये त्यजन्ति प्राणान्देव्यर्चने रताः ॥
ते सर्वे यान्ति तत्रैव यत्र देवी महोत्सवा घृतकुल्या दुग्धकुल्या दधिकुल्या मधुस्रवाः ॥
स्यन्दन्ति सरितः सर्वास्तथामृतवहाः पराः ।
द्राक्षारसवहाः काश्चिज्जम्बूरसवहाः पराः ॥
आम्रेक्षुरसवाहिन्यो नद्यस्तास्तु सहस्रशः ।
मनोरथफला वृक्षा वाप्यः कूपास्तथैव च ॥
यथेष्टपानफलदा न न्यूनं किञ्चिदस्ति हि ।
न रोगपलितं वापि जरा वापि कदाचन ॥
न चिन्ता न च मात्सर्यं कामक्रोधादिकं तथा ।
सर्वे युवानः सस्त्रीकाः सहस्रादित्यवर्चसः ॥
भजन्ति सततं देवीं तत्र श्रीभुवनेश्वरीम् ।
केचित्सलोकतापन्नाः केचित्सामीप्यतां गताः ॥
सरूपतां गताः केचित्साष्टितां च परे गताः ।
या यास्तु देवतास्तत्र प्रतिब्रह्माण्डवर्तिनाम् ॥
समष्टयः स्थितास्तास्तु सेवन्ते जगदीश्वरीम् ।
सप्तकोटिमहामन्त्रा मूर्तिमन्त उपासते ॥
महाविद्याश्च सकलाः साम्यावस्थात्मिकां शिवाम् ।
कारणब्रह्मरूपां तां मायाशबलविग्रहाम् ॥
जैसे किसी कार्यवश पटका संकोच तथा विकास ४२ होता रहता है, वैसे ही प्रलयावस्थामें इस मणिद्वीपका संकोच तथा सृष्टिकालमें विकास हो जाता है । इसका सृष्टि - विनाश नहीं होता ॥ ४२ ॥
४३ सभी परकोटोंकी सम्पूर्ण कान्तिकी परम सीमाको ही चिन्तामणिगृह कहा गया है, जहाँ तेजोमयी देवी विराजमान रहती हैं ॥ ४३ ॥
४४ हे भूपाल! प्रत्येक ब्रह्माण्डमें रहनेवाले तथा देवलोक, नागलोक, मनुष्यलोक एवं अन्य लोकोंमें निवास करनेवाले जो भी श्रीदेवी भुवनेश्वरीके उपासक ४५ हैं, वे सब इसी मणिद्वीपको प्राप्त होते हैं ॥ ४४ ॥
जो लोग भगवतीकी आराधनामें संलग्न रहते हुए देवीक्षेत्रमें प्राणोत्सर्ग करते हैं वे सब वहीं जाते हैं, जहाँ ४६ महानन्दस्वरूपिणी भगवती विराजमान रहती हैं ॥ ४५ ॥
घृतकुल्या, दुग्धकुल्या, दधिकुल्या तथा मधुस्रवा नदियाँ वहाँ सदा प्रवाहित रहती हैं । उसी प्रकार अमृतवहा, ४७ द्राक्षारसवहा, जम्बूरसवहा, आम्ररसवाहिनी तथा इक्षुर-सवाहिनी हजारों अन्य नदियाँ भी वहाँ हैं ॥ ४६-४७ ॥ वहाँ मनोरथरूपी फलवाले अनेक वृक्ष तथा वैसे ४८ ही बावलियाँ और कूप भी विद्यमान हैं, जो प्राणियोंकी इच्छाके अनुरूप उन्हें यथेष्ट फल तथा जल प्रदान करते हैं । वहाँ किसी प्रकारका अभाव नहीं है ॥ ४८३ ॥
४ ९ उस मणिद्वीपमें किसीको भी रोगोंसे जर्जरता, बुढ़ापा, चिन्ता, मात्सर्य, काम, क्रोध आदि कभी नहीं होते ॥ ४ ९ ३ ॥ वहाँ रहनेवाले सभी लोग युवावस्थासे सम्पन्न, ५० स्त्रीयुक्त और हजारों सूर्योंके समान तेजस्वी रहते हैं और वे श्रीभुवनेश्वरीदेवीकी निरन्तर उपासना करते हैं ॥ ५०३ ॥
उपासना – परायण लोगोंमेंसे कुछ लोग सालोक्य ५१ मुक्ति प्राप्त कर चुके हैं, कुछ सामीप्य मुक्तिको प्राप्त हुए हैं, कुछ सारूप्य मुक्ति प्राप्त कर चुके हैं तथा कुछ अन्य प्राणी साष्टि मुक्तिके अधिकारी हुए हैं ॥ ५१३ ॥
५२ प्रत्येक ब्रह्माण्डमें रहनेवाले जो - जो देवता हैं, उनके अनेक समूह वहाँ स्थित रहकर जगदीश्वरीकी उपासना करते हैं । मूर्तिमान् होकर सात करोड़ ५३ महामन्त्र तथा समस्त महाविद्याएँ उन साम्यावस्थावाली, कारणब्रह्मस्वरूपिणी तथा मायाशबलविग्रह धारण करनेवाली कल्याणमयी भगवतीकी उपासनामें तत्पर ५४ | रहते हैं ॥ ५२-५४ ॥
पृष्ठ 859
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
८५० श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० १२
इत्थं राजन् मया प्रोक्तं मणिद्वीपं महत्तरम् ।
न सूर्यचन्द्रौ नो विद्युत्कोटयो ऽग्निस्तथैव च ॥ ५५
एतस्य भासा कोट्यंशकोट्यंशेनापि ते समाः ।
क्वचिद्विद्रुमसंकाशं क्वचिन्मरकतच्छवि ॥ ५६
विद्युद्भानुसमच्छायं मध्यसूर्यसमं क्वचित् ।
विद्युत्कोटिमहाधारा सारकान्तिततं क्वचित् ॥ ५७
क्वचित्सिन्दूरनीलेन्द्रमाणिक्यसदृशच्छवि ।
हीरसारमहागर्भधगद्धगितदिक्तटम् ॥ ५८
कान्त्या दावानलसमं तप्तकाञ्चनसन्निभम् ।
क्वचिच्चन्द्रोपलोद्गारं सूर्योद्गारं च कुत्रचित् ॥ ५ ९
रत्नशृङ्गिसमायुक्तं रत्नप्राकारगोपुरम् ।
रत्नपत्रै रत्नफलैर्वृक्षैश्च परिमण्डितम् ॥ ६०
नृत्यन्मयूरसङ्घैश्च कपोतरणितोज्ज्वलम् ।
कोकिलाकाकलीलापैः शुकलापैश्च शोभितम् ॥ ६१
सुरम्यरमणीयाम्बुलक्षावधिसरोवृतम् तन्मध्यभागविलसद्विकचद्रलपङ्कजैः ॥६२
सुगन्धिभिः समन्तात्तु वासितं शतयोजनम् ।
मन्दमारुतसम्भिन्नचलद्रुमसमाकुलम् ॥ ६३
चिन्तामणिसमूहानां ज्योतिषा वितताम्बरम् ।
रत्नप्रभाभिरभितो धगद्धगितदिक्तटम् ॥ ६४ ।
वृक्षव्रातमहागन्धवातव्रातसुपूरितम् धूपधूपायितं राजन् मणिदीपायुतोज्ज्वलम् ॥ ६५ मणिजालकसच्छिद्रतरलोदरकान्तिभिः दिङ्मोहजनकं चैतद्दर्पणोदरसंयुतम् ॥ ६६
ऐश्वर्यस्य समग्रस्य शृङ्गारस्याखिलस्य च ।
सर्वज्ञतायाः सर्वायास्तेजसश्चाखिलस्य वै ॥ ६७
हे राजन्! इस प्रकार मैंने अत्यन्त महान् मणिद्वीपका वर्णन कर दिया । करोड़ों सूर्य, चन्द्रमा, विद्युत् और अग्नि - वे सब इस मणिद्वीपकी प्रभाके करोड़वें अंशके करोड़ों अंशके भी बराबर नहीं हैं । वहाँ कहींपर मूँगेके समान प्रकाश फैल रहा है, कहीं मरकतमणिकी छवि छिटक रही है, कहीं विद्युत् तथा भानुसदृश तेज विद्यमान है, कहीं मध्याह्नकालीन सूर्यके समान प्रचण्ड तेज फैला हुआ है और कहीं करोड़ों बिजलियोंकी महान् धाराओंकी दिव्य कान्ति व्याप्त है । कहीं सिन्दूर, नीलेन्द्रमणि और माणिक्यके समान छवि विद्यमान है । कुछ दिशाओंका भाग हीरा - मोतीकी रश्मियोंसे प्रकाशित हो रहा है, वह कान्तिमें दावानल तथा तपाये हुए सुवर्णके समान प्रतीत हो रहा है । कहीं - कहीं चन्द्रकान्तमणि और सूर्यकान्तमणिसे बने स्थान हैं॥५५–५९ ॥ इस मणिद्वीपका शिखर रत्नमय तथा इसके प्राकार और गोपुर भी रत्ननिर्मित हैं । यह रत्नमय पत्रों, फलों तथा वृक्षोंसे पूर्णतः मण्डित है ॥६० ॥
यह पुरी मयूरसमूहोंके नृत्यों, कबूतरोंकी बोलियों और कोयलोंकी काकली तथा शुकोंकी मधुर ध्वनियोंसे सुशोभित रहती है ॥६१ ॥
यह सुरम्य तथा रमणीय जलवाले लाखों सरोवरोंसे घिरा हुआ है । इस मणिद्वीपका मध्यभाग विकसित रत्नमय कमलोंसे सुशोभित है ॥ ६२ ॥
उसके चारों ओर सौ योजनतकका क्षेत्र उत्तम गन्धोंसे सर्वदा सुवासित रहता है । मन्द गति से प्रवाहित वायुके द्वारा हिलाये गये वृक्षोंसे यह व्याप्त रहता है ॥ ६३ ॥
चिन्तामणिके समूहोंकी ज्योतिसे वहाँका विस्तृत आकाश सदा प्रकाशित रहता है और रत्नोंकी प्रभासे सभी दिशाएँ प्रज्वलित रहती हैं ॥६४ ॥
वृक्षसमूहोंकी मधुर सुगन्धोंसे सुपूरित वायु वहाँ सदा बहती रहती है । हे राजन्! दस हजार योजनतक प्रकाशमान वह मणिद्वीप सदा सुगन्धित धूपसे सुवासित रहता है ॥ ६५ ॥
रत्नमयी जालियोंके छिद्रोंसे निकलनेवाली चपल | किरणोंकी कान्ति तथा दर्पणसे युक्त यह मणिद्वीप दिशाभ्रम उत्पन्न कर देनेवाला है ॥ ६६ ॥
हे राजन्! समग्र ऐश्वर्य, सम्पूर्ण श्रृंगार, समस्त | सर्वज्ञता, समग्र तेज, अखिल पराक्रम, समस्त उत्तम
पृष्ठ 860
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अ ० १३ ]
पराक्रमस्य सर्वस्य सर्वोत्तमगुणस्य च ।
सकलाया दयायाश्च समाप्तिरिह भूपते ॥
राज्ञ आनन्दमारभ्य ब्रह्मलोकान्तभूमिषु ।
आनन्दा ये स्थिताः सर्वे तेऽत्रैवान्तर्भवन्ति हि ॥
इति ते वर्णितं राजन् मणिद्वीपं महत्तरम् ।
महादेव्याः परं स्थानं सर्वलोकोत्तमोत्तमम् ॥
एतस्य स्मरणात्सद्यः सर्वं पापं विनश्यति ।
प्राणोत्क्रमणसन्धौ तु स्मृत्वा तत्रैव गच्छति ॥
अध्यायपञ्चकं त्वेतत्पठेन्नित्यं समाहितः ।
भूतप्रेतपिशाचादिबाधा तत्र भवेन्न हि ॥
नवीनगृहनिर्माणे वास्तुयागे तथैव च ।
पठितव्यं प्रयत्नेन कल्याणं तेन जायते ॥
द्वादश स्कन्ध ८५१ गुण और समग्र दयाकी इस मणिद्वीपमें अन्तिम सीमा ६८ | है ॥ ६७-६८ ॥ एक राजाके आनन्दसे लेकर ब्रह्मलोकपर्यन्त जो - जो आनन्द हो सकते हैं, वे सब इस मणिद्वीप के ६ ९ आनन्दमें अन्तर्निहित हैं ॥ ६ ९ ॥ हे राजन्! इस प्रकार मैंने आपसे अति महनीय मणिद्वीपका वर्णन कर दिया । महादेवीका यह परम ७० धाम सम्पूर्ण उत्तम लोकोंसे भी उत्तम है ॥ ७० ॥
इस मणिद्वीपके स्मरणमात्रसे सम्पूर्ण पाप शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं और मृत्युकालमें इसका स्मरण हो ७ ९ जानेपर प्राणी उसी पुरीको प्राप्त हो जाता है ॥ ७१ ॥
इन पाँच अध्यायोंका ( अध्याय आठसे लेकर बारहतक ) जो प्राणी सावधान होकर नित्य पाठ करता ७२ है; उसे भूत, प्रेत, पिशाच आदि बाधाएँ नहीं होतीं ॥ ७२ ॥
नये भवनके निर्माण तथा वास्तुयज्ञके अवसरपर प्रयत्नपूर्वक इसका पाठ करना चाहिये; उससे कल्याण ७३ | होता है ॥ ७३ ॥
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्त्र्यां संहितायां द्वादशस्कन्धे मणिद्वीपवर्णनं नाम द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥
अथ त्रयोदशोऽध्यायः राजा जनमेजयद्वारा अम्बायज्ञ और व्यास उवाच इति ते कथितं भूप यद्यत्पृष्टं त्वयानघ । नारायणेन यत्प्रोक्तं नारदाय महात्मने । १
श्रुत्वैतत्तु महादेव्याः पुराणं परमाद्भुतम् ।
कृतकृत्यो भवेन्मर्त्यो देव्याः प्रियतमो हि सः ॥ २
कुरु चाम्बामखं राजन् स्वपित्रुद्धरणाय वै ।
खिन्नोऽसि येन राजेन्द्र पितुर्ज्ञात्वा तु दुर्गतिम् ॥ ३
गृहाण त्वं महादेव्या मन्त्रं सर्वोत्तमोत्तमम् ।
यथाविधिविधानेन जन्मसाफल्यदायकम् ॥ ४
सूत उवाच
तच्छ्रुत्वा नृपशार्दूलः प्रार्थयित्वा मुनीश्वरम् ।
तस्मादेव महामन्त्रं देवीप्रणवसंज्ञकम् ॥ ५
श्रीमद्देवीभागवतमहापुराणका माहात्म्य व्यासजी बोले- हे राजन्! हे अनघ! आपने मुझसे जो - जो पूछा था, वह मैंने आपको बता दिया, जिसे पूर्वमें नारायणने महात्मा नारदसे कहा था ॥ १ ॥
महादेवीका यह परम अद्भुत पुराण सुनकर मनुष्य कृतकृत्य हो जाता है और वह भगवतीका प्रियतम हो जाता है ॥ २ ॥
हे राजेन्द्र! चूँकि अपने पिताकी दुर्गतिके विषयमें जानकर आप अत्यन्त विषादग्रस्त हैं, अतएव हे राजन्! अब आप अपने पिताके उद्धारके निमित्त देवीयज्ञ कीजिये । आप विधि - विधानके अनुसार महादेवीके सर्वोत्तमोत्तम मन्त्रकी दीक्षा ग्रहण कीजिये, जो मनुष्य-जन्मको सार्थक कर देता है ॥ ३-४ ॥ सूतजी बोले- उसे सुनकर नृपश्रेष्ठ जनमेजयने मुनीन्द्र व्याससे प्रार्थना करके उन्हींसे विधिपूर्वक । देवीके प्रणवसंज्ञक महामन्त्रकी दीक्षा ग्रहण की ।