गर्ग संहिता — पृष्ठ 111–120
गर्ग संहिता · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 111–120
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अठारहवाँ अध्याय श्रीकृष्णके द्वारा गोपदेवीरूपसे श्रीराधाके प्रेमकी परीक्षा तथा श्रीराधाको श्रीकृष्णका दर्शन श्रीनारदजी कहते हैं - मिथिलेश्वर! तदनन्तर रात व्यतीत होनेपर मायासे नारीका रूप धारण करनेवाले श्रीहरि श्रीराधाका दुःख शान्त करनेके लिये वृषभानु-भवनमें गये । उन्हें आया देखकर श्रीराधा उठकर बड़े हर्षके साथ भीतर लिवा ले गयीं और आसन देकर विधि विधानके साथ उनका पूजन किया ॥ १-२ ॥ श्रीराधा बोलीं- सखी! तुम्हारे बिना मैं रातभर बहुत दुःखी रही और तुम्हारे आ जानेसे मुझे इतनी प्रसन्नता हुई है, मानो कोई खोयी हुई वस्तु मिल गयी हो । जैसे कुपथ्य - सेवनसे पहले तो सुख मालूम होता है, किंतु पीछे दुःख भोगना पड़ता है, इसी तरह सत्सङ्गसे भी पहले सुख होता है और पीछे वियोगका दुःख उठाना पड़ता है ॥३ ॥
श्रीनारदजी कहते हैं— राजन्! श्रीराधाकी यह बात सुनकर गोपदेवी अनमनी हो गयीं । वे श्रीराधासे कुछ भी नहीं बोलीं । किसी दुःखिनीकी भाँति चुपचाप बैठी रहीं । गोपदेवीको खिन्न जानकर श्रीराधिकाने सखियोंके साथ विचार करके, स्नेहतत्पर हो, इस प्रकार कहा ॥ ४-५ ॥ श्रीराधा बोलीं – गोपदेवि! तुम अनमनी क्यों हो गयीं? कल्याणि! मुझे इसका कारण बताओ । माता, पति, ननद अथवा सासने कुपित होकर तुम्हें फटकारा तो नहीं है? मनोहरे! किसी सौतके दोषसे या अपने पतिके वियोगसे अथवा अन्यत्र चित्त लग जानेसे तो तुम्हारा मन खिन्न नहीं हुआ है? क्या कारण है? महाभागे! रास्ता चलनेकी थकावटसे या शरीरमें कोई रोग हो जानेसे तो तुम्हें खेद नहीं हुआ है? अपने दुःखका कारण शीघ्र बताओ । रम्भोरु! किसी कृष्ण-भक्त या ब्राह्मणको छोड़कर दूसरे जिस किसीने भी तुमसे कोई कुत्सित बात कह दी हो तो मैं उसकी चिकित्सा करूँगी ( उसे दण्ड दूँगी ) । यदि तुम्हारी इच्छा हो तो हाथी, घोड़े आदि वाहन, नाना प्रकारके रत्न, वस्त्र, धन और विचित्र भवन मुझसे ग्रहण करो । धन देकर शरीरकी रक्षा करे, शरीरका भी उत्सर्ग करके लाजकी रक्षा करे तथा मित्रके कार्यकी सिद्धिके लिये तन, धन और लज्जाको भी अर्पित कर दे । धन देकर निरन्तर प्राणोंकी रक्षा करे । जो बिना किसी कारण या कामनाके निश्छल भावसे मित्रताका निर्वाह करता है, वही मनुष्य परम धन्य है । जो मैत्री स्थापित करके कपट करता है, उस स्वार्थ साधनमें पटु लम्पट नटको धिक्कार है । राजेन्द्र! उनका यह प्रेमपूर्ण वचन सुनकर गोपदेवीके रूपमें आये हुए भगवान् उन कीर्तिनन्दिनी श्रीराधासे हँसते हुए बोले ॥ ६ – १३ ॥ गोपदेवीने कहा- राधे! वरसानुगिरिकी घाटियोंमें जो मनोहर सँकरी गली है, उसीसे होकर मैं स्वयं दही बेचने जा रही थी । इतनेमें नन्दजीके नवतरुण कुमार श्यामसुन्दरने मुझे मार्गमें रोक लिया । उनके हाथमें वंशी और बेंतकी छड़ी थी । उन रसिकशेखरने लाजको तिलाञ्जलि दे, तुरंत मेरा हाथ पकड़ लिया और जोर-जोरसे हँसते हुए, उस एकान्त वनमें वे इस प्रकार कहने लगे – ' सुन्दरी! मैं कर लेनेवाला हूँ । अतः तू मुझे करके रूपमें दहीका दान दे । ' मैंने कहा- ' चलो, हटो । अपने - आप कर लेनेवाले बने हुए तुम जैसे गोरस-लम्पटको मैं कदापि दान नहीं दूँगी । ' मेरे इतना कहते ही उन्होंने सिरपरसे दहीका मटका उतार लिया और उसे फोड़ डाला । मटका फोड़कर थोड़ी - सी दही पीकर मेरी चादर उतार ली और नन्दीश्वर गिरिकी ईशानकोणवाली दिशाकी ओर वे चल दिये । इससे मैं बहुत अनमनी हो रही हूँ । जातका ग्वाला, काला - कलूटा रंग, न धनवान्, न वीर, न सुशील और न सुरूप? सुशीले! ऐसे पुरुषके प्रति तुमने प्रेम किया, यह ठीक नहीं । मैं कहती हूँ, तुम आजसे शीघ्र ही उस निर्मोही कृष्णको मनसे निकाल दो ( उसे सर्वथा त्याग दो ) । इस प्रकार वैरभावसे युक्त कठोर वचन सुनकर वृषभानुनन्दिनी श्रीराधाको बड़ा विस्मय हुआ । वे वाक्य और पदोंके प्रयोगके सम्बन्धमें सरस्वतीके चरणोंका स्मरण करती हुई
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१०६ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ श्रीवृन्दावनखण्ड उनसे बोलीं ॥ १४–१९ ॥ बद्धचित्त होकर भक्तोंके पीछे - पीछे चलते हैं । अतः श्रीराधाने कहा- सखी! जिनकी प्राप्तिके लिये श्रीकृष्ण केवल सुशील ही नहीं, समस्त लोकोंके ब्रह्मा और शिव आदि देवता अपनी उत्कृष्ट योगरीतिसे सुजन - समुदायके चूडामणि हैं । वे भक्तोंके पीछे चलते पञ्चाग्निसेवनपूर्वक तप करते हैं; दत्तात्रेय, शुक, कपिल, हुए अपने रोम - रोममें स्थित लोकोंको पवित्र करते रहते आसुरि और अङ्गिरा आदि भी जिनके चरणारविन्दोंके हैं । वे परमात्मा अपने भक्तजनोंके प्रति सदा ही मकरन्द और परागका सादर स्पर्श करते हैं; उन्हीं अभिरुचि सूचित करते रहते हैं । अतः अत्यन्त भजन अजन्मा, परिपूर्ण देवता, लीलावतारधारी, सर्वजनदुःखहारी, भूतल - भूरि - भार- हरणकारी तथा सत्पुरुषोंके कल्याणके लिये यहाँ प्रकट हुए आदिपुरुष श्रीकृष्णकी निन्दा कैसे करती हो? तुम तो बड़ी ढीठ जान पड़ती हो । ग्वाले सदा गौओंका पालन करते हैं, गोरजकी गङ्गामें नहाते हैं, उसका स्पर्श करते हैं तथा गौओंके उत्तम नामोंका जप करते हैं । इतना ही नहीं, उन्हें दिन - रात गौओंके सुन्दर मुखका दर्शन होता है । मेरी समझमें तो इस भूतलपर गोप- जातिसे बढ़कर दूसरी कोई जाति ही नहीं है । तुम उसे काला - कलूटा बताती हो; किंतु उन श्यामसुन्दर श्रीकृष्णकी श्याम - विभासे विलसित सुन्दर कलाका दर्शन करके उन्हींमें मन लग जानेके कारण भगवान् नीलकण्ठ औरोंके सुन्दर मुखको छोड़कर जटाजूट, हलाहल विष, भस्म, कपाल और सर्प धारण किये उस काले - कलूटेके लिये ही पागलोंकी भाँति व्रजमें दौड़ते फिरते हैं! स्वर्गलोक, सिद्ध, मुनि, यक्ष और मरुद्गणोंके पालक तथा समस्त नरों, किंनरों और नागके स्वामी भी निरन्तर भक्तिभावसे जिनके चरणारविन्दोंमें प्रणिपात करके उत्कृष्ट लक्ष्मी एवं ऐश्वर्यको पाकर निश्चय ही उन्हें बलि ( कर ) समर्पित किया करते हैं, उनको तुम निर्धन कहती हो? वत्सासुर, अघासुर कालियनाग, बकासुर, यमलार्जुन वृक्ष, तृणावर्त, शकटासुर और पूतना आदिका वध ( सम्भवतः तुम्हारी दृष्टिमें उनकी वीरताका परिचायक नहीं है! मेरा भी ऐसा ही मत है । ) उन मुरारिके लिये क्या यश देनेवाला हो सकता है, जो कोटि - कोटि ब्रह्माण्ड समूहोंके एकमात्र स्रष्टा और संहारक हैं? उन पुरुषोत्तमके लिये भक्तसे बढ़कर कोई प्रिय हो, ऐसा ज्ञात नहीं होता । शंकर, ब्रह्मा, लक्ष्मी तथा रोहिणीनन्दन बलरामजी भी उनके लिये भक्तोंसे अधिक प्रिय नहीं हैं । वे भक्तिसे करनेवालोंको भगवान् मुकुन्द मुक्ति तो अनायास दे देते हैं, किंतु उत्तम भक्तियोग कदापि नहीं देते; क्योंकि उन्हें भक्तिके बन्धनमें बँधे रहना पड़ता है॥२०–२७ ॥ गोपदेवी बोली - श्रीराधे! तुम्हारी बुद्धि बृहस्पतिका भी उपहास करती है और वाणी अपने प्रवचन-कौशलसे वेदवाणीका अनुकरण करती है । किंतु देवि! तुम्हारे बुलानेसे यदि परमेश्वर श्रीकृष्ण सचमुच यहाँ आ जायँ और तुम्हारी बातका उत्तर दें, तब मैं मान लूँगी कि तुम्हारा कथन सच है ॥ २८ ॥
श्रीराधा बोलीं- शुभ्रु! यदि परमेश्वर श्रीकृष्ण मेरे बुलानेसे यहाँ आ जायँ, तब मैं तुम्हारे प्रति क्या करूँ, यह तुम्हीं बताओ । परंतु अपनी ओरसे इतना ही कह सकती हूँ कि यदि मेरे स्मरण करनेसे वनमालीका शुभागमन नहीं हुआ तो मैं अपना सारा धन और यह भवन तुम्हें दे दूँगी ॥ २ ९ ॥ श्रीनारदजी कहते हैं- राजन्! तदनन्तर श्रीराधा उठकर श्रीनन्दनन्दनको नमस्कार करके आसनपर बैठ गयीं और उनका ध्यान करने लगीं । उस समय उनके नेत्र ध्यानरत होनेके कारण निश्चल हो गये थे । श्रीहरिने देखा - ' प्रियतमा श्रीराधा मेरे दर्शनके लिये उत्कण्ठित हैं । इनके अङ्ग अङ्गमें स्वेद ( पसीना ) हो आया है और मुखपर आँसुओंकी धारा बह चली है । ' यह देख अपना पुरुषरूप धारण करके भक्तवत्सल श्रीकृष्ण सखियोंके देखते - देखते सहसा वहाँ प्रकट हो गये और प्रसन्नचित्त हो घनगर्जनके समान गम्भीर वाणीमें श्रीराधासे बोले ॥३०-३२ ॥ श्रीकृष्णने कहा- रम्भोरु! चन्द्रवदने! व्रज - सुन्दरी-शिरोमणे! नूतनयौवनशालिनि! मानशीले! प्रिये राधे! तुमने अपनी मधुरवाणीसे मुझे बुलाया है, इसलिये मैं तुरंत यहाँ आ गया हूँ । अब आँख खोलकर मुझे देखो ।
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अध्याय १ ९ ] रामक्रीडाका वर्णन १०७ ललने! ' प्रियतम कृष्ण! आओ ' – यह वाक्य यहाँसे प्रकट हुआ और मैंने सुना । फिर उसी क्षण अपने गोकुल और गोपवृन्दको छोड़कर, वंशीवट और यमुनाके तसे वेगपूर्वक दौड़ता हुआ तुम्हारी प्रसन्नताके लिये यहाँ आ पहुँचा हूँ । मेरे आते ही कोई सखीरूपधारिणी यक्षी, आसुरी, देवाङ्गना अथवा किंनरी, जो कोई भी मायाविनी तुम्हें छलनेके लिये आयी थी, यहाँसे चल इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें वृन्दावनखण्डके दी । अतः तुम्हें ऐसी नागिनपर विश्वास ही नहीं करना चाहिये ॥ ३३ – ३५ ॥ श्रीनारदजी कहते हैं - तदनन्तर श्रीराधा श्रीहरिको देखकर उनके चरण - कमलोंमें प्रणत हो परमानन्दमें निमग्न हो गयीं । उनका मनोरथ तत्काल पूर्ण हो गया । श्रीकृष्णचन्द्रके ऐसे अद्भुत चरित्रोंका जो भक्तिभावसे श्रवण करता है, वह मनुष्य कृतार्थ हो जाता है ॥ ३६-३७ ॥ अन्तर्गत ' श्रीराधाको श्रीकृष्णचन्द्रका दर्शन ' नामक अठारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १८ ॥
उन्नीसवाँ अध्याय रासक्रीडाका वर्णन राजा बहुलाश्वने पूछा- देवर्षे! श्रीराधाको दर्शन दे, उसके प्रेमकी परीक्षा करके, भगवान् श्रीकृष्णने अपनी लीलाशक्तिके द्वारा आगे चलकर कौन - सी लीला प्रकट की? ॥ १ ॥
श्रीनारदजीने कहा- राजन्! माधव ( वैशाख ) मासमें माधवी लताओंसे व्याप्त वृन्दावनमें रासेश्वर माधवने स्वयं रासका आरम्भ किया । वैशाख मासकी कृष्णपक्षीया पञ्चमीको जब सुन्दर चन्द्रोदय हुआ, उस समय मनोहर श्यामसुन्दरने यमुनाके तटवर्ती उपवनमें रासेश्वरी श्रीराधाके साथ रास - विहार किया । मिथिलेश्वर! इसके पूर्व गोलोकसे जिस भूमिका पृथ्वीपर अवतरण हो चुका था, वह सब की सब तत्काल सुवर्ण तथा पद्मरागमणिसे मण्डित हो गयी । वृन्दावन भी दिव्यरूप धारण करके, कामपूरक कल्पवृक्षों तथा माधवी लताओंसे समलंकृत हो, अपनी शोभासे नन्दनवनको भी तिरस्कृत करने लगा । राजन्! रत्नोंके सोपानों और सुवर्ण - निर्मित तोलिकाओं ( गुमटियों ) से मण्डित तथा हंसों और कमल आदिके पुष्पोंसे व्याप्त यमुना नदीकी अपूर्व शोभा हो रही थी । गिरिराज गोवर्धन गजराजके समान शोभा पाता था । जैसे गजराजके गण्डस्थलसे मदकी धाराएँ झरती हैं और उसपर भ्रमरोंकी भीड़ लगी रहती है, उसी प्रकार गिरिराजकी घाटियोंसे जलके निर्झर प्रवाहित होते थे और सुन्दरी दरियों ( कन्दराओं ) तथा भ्रमरियोंसे वह पर्वत व्याप्त था T । वहाँ विभिन्न धातुओंकी जगह नाना प्रकारके रत्न उद्भासित होते थे । उसके रत्नमय शिखरोंकी दिव्य दीप्ति सब ओर प्रकाशित हो रही थी । वह पक्षियोंके कलरवसे मुखरित तथा लता - पुष्पोंसे मनोहर जान पड़ता था । गिरिराजके चारों ओर समस्त निकुञ्ज दिव्यरूप धारण करके सुशोभित होने लगे । सभा-मण्डपोंसे मण्डित वीथियाँ, प्राङ्गण और खंभोंकी पंक्तियाँ उनकी शोभा बढ़ाने लगीं । नरेश्वर! फहराती हुई दिव्य पताकाएँ, सुवर्णमय कलश तथा पुष्पमय मन्दिरोंमें विद्यमान श्वेतारुण पुष्पदल उन निकुञ्जको विभूषित कर रहे थे । उन सबमें वसन्त ऋतुकी माधुरी भरी थी । वहाँ कोकिल और सारस अपने मीठे बोल सुना रहे थे । जहाँ - तहाँ सब ओर कबूतर और मोर आदि पक्षी कलरव करते थे । श्रीराधा - कृष्णकी पुण्यमयी गाथाका गान करते हुए टूट पड़नेवाले मधुमत्त भ्रमरोंसे सभी कुञ्ज विशेष शोभा पाते थे । यमुना - पुलिनपर सहस्रदल कमलोंके पुष्प - परागको बारंबार बिखेरता हुआ शीतल- मन्द- सुगन्ध समीर प्रवाहित हो रहा था ॥ २ - १३ ॥ इसी समय बहुत - सी गोपाङ्गनाएँ श्रीकृष्णकी सेवामें उपस्थित हुईं । कोई गोलोकनिवासिनी थीं, कोई शय्या सजानेमें सहयोग करनेवाली थीं । कोई शृङ्गार
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१०८ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ श्रीवृन्दावनखण्ड धारण करानेकी कलामें कुशल थीं, तो कोई द्वारपालिका थीं । कुछ गोपियाँ ' पार्षद ' नामधारिणी थीं, कुछ छत्र - चँवर धारण करनेवाली सखियाँ थीं और कुछ श्रीवृन्दावनकी रक्षामें नियुक्त थीं । कुछ गोवर्धनवासिनी, कुछ कुञ्जविधायिनी और कुछ निकुञ्जनिवासिनी थीं । कोई नृत्यमें निपुण और कोई वाद्य वादनमें प्रवीण थीं । नरेश्वर! उन सबके मुख अपने सौन्दर्य- माधुर्यसे चन्द्रमाको भी लज्जित करते थे । वे सब - की - सब किशोरावस्थावाली तरुणियाँ थीं । इन सबके बारह यूथ श्रीकृष्णके समीप आये । इसी प्रकार साक्षात् यमुना भी अपना यूथ लिये आयीं । उनके अङ्गोंपर नीलवस्त्र शोभा पा रहे थे । वे रत्नमय आभूषणोंसे विभूषित तथा श्यामा ( सोलह वर्षकी अवस्था अथवा श्याम कान्तिसे युक्त ) थीं । उनके नेत्र प्रफुल्ल कमलदलको तिरस्कृत कर रहे थे । उन्हींकी तरह जह्नुनन्दिनी गङ्गा भी यूथ बाँधकर वहाँ आ पहुँची । उनकी अङ्ग - कान्ति श्वेतगौर थी । वे श्वेत वस्त्र तथा मोतीके आभूषणोंसे विभूषित थीं । वैसे ही साक्षात् रमा भी अपना यूथ लिये आयीं । उनके श्रीअङ्गपर अरुण वस्त्र सुशोभित थे । चन्द्रमाकी-सी अङ्गकान्ति, अधरोंपर मन्द मन्द हासकी छटा तथा विभिन्न अङ्गोंमें पद्मरागमणिके बने हुए अलंकार शोभा दे रहे थे ॥ १४ - २० इसी तरह कृष्णपत्त्रीके नामसे अपना परिचय देने वाली मधुमाधवी ( वसन्त - लक्ष्मी ) भी वहाँ आयीं । उनके साथ भी सखियोंका समूह था । वे सब की सब प्रफुल्ल कमलकी - सी अङ्ग - कान्तिवाली, पुष्पहारसे अलंकृत तथा सुन्दर वस्त्रोंसे सुशोभित थीं । इसी रीतिसे साक्षात् विरजा भी सखियोंका यूथ लिये वहाँ आयीं । उनके अङ्गपर हरे रंगके वस्त्र शोभा दे रहे थे । वे गौरवर्णा तथा रत्नमय अलंकारोंसे अलंकृत थीं । ललिता, विशाखा और लक्ष्मीके भी यूथ वहाँ आये । * वृन्दावने यथाऽऽकाशे चन्द्रस्तारागणैर्यथा वेत्र भृद्वादयन् वंशीं गोपीनां प्रीतिमावहन् राधया शुशुभे रासे यथा स्त्या रतीश्वरः यमुनापुलिनं पुण्यमाययौ राधया युतः निषसाद हरिः कृष्णातीरे नीरमनोहरे इसी प्रकार अष्टसखियोंके, षोडश सखियोंके तथा बत्तीस सखियोंके सम्पूर्ण यूथ भी वहाँ आ पहुँचे । राजन्! भगवान् श्यामसुन्दर श्रीकृष्ण उन युवतीजनोंके साथ रासमण्डलकी रङ्गभूमिमें बड़ी शोभा पाने लगे॥२१–२४ ॥ जैसे आकाशमें चन्द्रमा ताराओंके साथ सुशोभित होते हैं, उसी प्रकार श्रीवृन्दावनमें उन सुन्दरियोंके साथ श्रीकृष्णचन्द्रकी शोभा हो रही थी । उनकी कमरमें पीताम्बर कसा हुआ था । वे नटवेषमें सबका मन मोहे लेते थे । उनके हाथमें बेंतकी छड़ी थी । वे वंशी बजाकर उन गोप- सुन्दरियोंकी प्रीति बढ़ा रहे थे । माथेपर मोरपंखका मुकुट, वक्षःस्थलपर पुष्पहार एवं वनमाला तथा कानोंमें कुण्डल - ये ही उनके अलंकार थे । रतिके साथ रतिनाथकी जैसी शोभा होती है, उसी प्रकार रासमण्डलमें श्रीराधाके साथ राधावल्लभकी हो रही थी । इस प्रकार सुन्दरियोंके अलापसे संयुक्त होकर साक्षात् श्रीहरि अपनी प्रिया राधाके साथ यमुनाके पुण्य- पुलिनपर आये । उन्होंने अपनी प्राणवल्लभाका हाथ अपने करकमलमें ले रखा था । यमुनाके मनोहर तीरपर उन सुन्दरियोंके साथ श्यामसुन्दर थोड़ी देर बैठे रहे । * फिर मधुर - मधुर बातें करते हुए अपने प्रिय वृन्दाविपिनकी शोभा निहारने लगे ॥२५–२९ ॥ वे श्रीराधाके साथ चलते और हास - विनोद करते हुए कुञ्जवनमें विचरने लगे । एक कुञ्जमें प्रियाका हाथ छोड़कर वे तुरंत कहीं छिप गये । किंतु एक शाखाकी ओटमें उन्हें खड़ा देख श्रीराधाने माधवको अविलम्ब जा पकड़ा । फिर श्रीराधा उनके हाथसे छूटकर पग-पगपर नूपुरोंका झंकार प्रकट करती हुई भागीं और माधवके देखते - देखते कुञ्जोंमें छिपने लगीं । माधव हरि ज्यों ही दौड़कर उनके स्थानपर पहुँचे, त्यों - ही राधा वहाँसे अन्यत्र चली गयीं । वृक्षोंके पास हाथ-भरकी दूरीपर इधर - उधर वे भागने लगीं । उस समय । पीतवासः परिकरो नटवेषो मनोहरः ॥ । मयूरपक्षभृन्मौलिः स्रग्वी कुण्डलमण्डितः ॥ । एवं गायन् हरिः साक्षात् सुद्ररीरागसंवृतः ॥ । गृहीत्वा हस्तपद्येन पद्माभं स्वप्रियाकरम् ॥ । ( गर्ग ०, वृन्दावन ० १ ९ । २५-२८३ )
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अध्याय २० ] श्रीराधा और श्रीकृष्णके परस्पर शृङ्गार - धारण, रास, जलविहार आदिका वर्णन १० ९ श्रीराधाके साथ श्यामसुन्दर हरिकी उसी तरह शोभा हो रही थी, जैसे सुवर्णलतासे श्याम तमालकी, चपलासे घनमण्डलकी तथा सोनेकी खानसे नीलाचलकी होती है । वृन्दावनमें रासकी रङ्गस्थलीमें रतिके साथ कामदेवकी भाँति विश्वमोहिनी श्रीराधाके साथ मदनमोहन श्रीकृष्ण सुशोभित हो रहे थे । जितनी व्रजसुन्दरियाँ वहाँ विद्यमान थीं, उतने ही रूप धारण करके रङ्गभूमिमें नटके समान नटवर श्रीकृष्ण रासरङ्गमें नृत्य करने लगे । उनके साथ सम्पूर्ण मनोहर गोप - सुन्दरियाँ भी गाने और नृत्य करने लगीं । अनेक कृष्णचन्द्रोंके साथ वे गोपसुन्दरियाँ ऐसी जान पड़ती थीं, मानो बहुसंख्यक इन्द्रोंके साथ देवाङ्गनाएँ नृत्य कर रही हों । तदनन्तर मधुसूदन श्रीकृष्ण समस्त गोप- सुन्दरियोंके साथ यमुनाजलमें विहार करने लगे-ठीक उसी तरह जैसे यक्ष- सुन्दरियोंके साथ यक्षराज कुबेर विहार करते हैं । उन सुन्दरियोंके केशपाश तथा कबरी ( बँधी हुई चोटी ) से खिसककर गिरे हुए सुन्दर इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें वृन्दावनखण्डके अन्तर्गत चित्र - विचित्र पुष्पोंसे यमुनाजीकी ऐसी शोभा हो रही थी, जैसे किसी नीलपटपर विभिन्न रंगके फूल छाप दिये गये हों । मृदङ्ग और खड़तालोंकी मधुर ध्वनिके साथ वे व्रजाङ्गनाएँ मधुसूदनका यश गाती थीं । उनका मनोरथ पूर्ण हो गया । श्रीहरिने उनकी सारी व्यथा हर ली थी । उनके पुष्पहार चञ्चल हो रहे थे और वे परमानन्दमें निमग्न हो गयी थीं । जिनके सुन्दर हाथोंसे ताडित हो उछलते हुए वारि - बिन्दु, जो फुहारोंसे छूटते हुए असंख्य अनुपम जलकणोंकी छवि धारण कर रहे थे, उन व्रज-सुन्दरियोंके साथ वृन्दावनाधीश्वर श्रीकृष्ण ऐसी शोभा पा रहे थे, मानो बहुत - सी हथिनियोंके साथ यूथपति गजराज सुशोभित हो रहा हो । आकाशमें खड़ी हुई विद्याधरियाँ, देवाङ्गनाएँ तथा गन्धर्वपत्त्रियाँ उस रास - रङ्गको देखती हुई वहाँ देवताओंके साथ पुष्पवर्षा कर रही थीं । वे सब की सब मोहको प्राप्त हो गयी थीं । उनके वस्त्रोंके नीवी - बन्ध ढीले पड़कर खिसक रहे थे ॥ ३०-४१ ॥ ' रासलीला ' नामक उन्नीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १ ९ ॥ बीसवाँ अध्याय श्रीराधा और श्रीकृष्णके परस्पर शृङ्गार - धारण, रास, जलविहार एवं वनविहारका वर्णन श्रीनारदजी कहते हैं— राजन्! तदनन्तर मनोहर श्यामसुन्दर श्रीहरि जलक्रीड़ा समाप्त करके समस्त गोपाङ्गनाओंके साथ गोवर्धन पर्वतको गये । उस पर्वतकी कन्दरामें रत्नमयी भूमिपर रासेश्वरी श्रीराधाके साथ साक्षात् श्रीहरिने रासनृत्य किया । वहाँ पुष्पोंसे सुसज्जित रम्य सिंहासनपर दोनों प्रिया - प्रियतम श्रीराधा - माधव विराजमान हुए, मानो किसी पर्वतपर विद्युत् - सुन्दरी और श्याम - घन एक साथ सुशोभित हो रहे हों । वहाँ सब सखियोंने बड़ी प्रसन्नताके साथ स्वामिनी श्रीराधाका शृङ्गार किया । चन्दन, केसर, कस्तूरी आदिसे तथा महावर, इत्र, अरगजा और काजल तथा सुगन्धित पुष्प - रसोंसे कीर्तिकुमारी श्रीराधाकी विधिपूर्वक अर्चना करके साक्षात् श्रीयमुनाने उन्हें नूपुर धारण कराया । जहुनन्दिनी गङ्गाने मञ्जीर नामक दिव्य भूषण अर्पित किया । श्रीरमाने कटिप्रदेशमें किङ्किणी- जाल पहिनाया । श्रीमधुमाधवीने कण्ठमें हार अर्पित किया । विरजाने कोटि चन्द्रमाओंके समान उज्ज्वल एवं सुन्दर चन्द्रहार धारण कराया । ललिताने मणिमण्डित कञ्चुकी पहनायी । विशाखाने कण्ठभूषण धारण कराया । चन्द्राननाने रत्नमयी मुद्रिकाएँ अर्पित कीं । एकादशीकी अधिष्ठात्री देवीने श्रीराधाको रत्न-जटित दो कंगन भेंट किये । शतचन्द्रानना सखीने रत्नमय भुजकङ्कण ( बाजूबंद, बिजायठ, जोसन और झबिया आदि ) दिये । साक्षात् मधुमतीने दो अङ्गद भेंट किये, जिनमें जड़े हुए रत्न उद्दीप्त हो रहे थे । बन्दीने दो ताटङ्क ( तरकियाँ ) और सुखदायिनीने दो कुण्डल दिये । सखियोंमें प्रधान आनन्दीने श्रीराधाको भालतोरण भेंट किया । पद्माने चन्द्रकलाके समान
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११० गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ श्रीवृन्दावनखण्ड चमकनेवाली माथेकी बिंदी ( टिकुली ) दी । सती पद्मावतीने नासिकामें मोतीकी बुलाक पहना दी, जो थोड़ी - थोड़ी हिलती रहती थी । राजन्! सुन्दरी चन्द्र-कान्ता सखीने श्रीराधाको प्रात: कालिक सूर्यकी कान्तिसे युक्त मनोहर शीशफूल अर्पित किया । सुन्दरीने चूडामणि तथा प्रहर्षिणीने रत्नमयी वेणी प्रदान की । वृन्दावनाधीश्वरी वृन्दादेवीने श्रीराधाको करोड़ों बिजलियोंके समान विद्योतमान चन्द्र - सूर्य नामक दो आभूषण भेंट किये । इस प्रकार शृङ्गार धारण करके श्रीराधाका रूप दिव्य ज्योतिसे उद्भासित हो उठा ॥ १-१४ ॥ राजन्! उनके साथ गिरिराजपर श्रीहरि दक्षिणाके साथ यज्ञनारायणकी भाँति सुशोभित हुए । मिथिलेश्वर! जहाँ रासमें श्रीराधाने शृङ्गार धारण किया, गोवर्धन पर्वतपर वह स्थान ' शृङ्गार - मण्डल ' के नामसे विख्यात हो गया । तदनन्तर श्रीकृष्ण अपनी प्रिया गोपसुन्दरियोंके साथ चन्द्रसरोवरपर गये । उसके जलमें उन्होंने हथिनियोंके साथ गजराजकी भाँति विहार किया । वहाँ साक्षात् चन्द्रमाने आकर स्वामिनी श्रीराधा और श्यामसुन्दर श्रीहरिको दो सुन्दर चन्द्रकान्तमणियाँ तथा दो सहस्रदल कमल भेंट किये । तत्पश्चात् साक्षात् श्रीहरि कृष्ण वृन्दावनकी शोभा निहारते हुए लता - वल्लरियोंसे व्याप्त बहुलावनमें गये । वहाँ सम्पूर्ण सखीजनोंको पसीनेसे भींगा देख वंशीधरने ' मेघमल्लार ' नामक राग गाया । फिर तो वहाँ उसी समय बादल घिर आये और जलकी फुहारें बरसाने लगे ॥ १५-२० ॥ विदेहराज! उसी समय अपनी सुगन्धसे सबका मन मोह लेनेवाली शीतल वायु चलने लगी । उससे समस्त गोपाङ्गनाओंको बड़ा सुख मिला । वे वहाँ एकत्र हो सम्मिलित उच्चस्वरसे श्रीमुरारिका यश गाने लगीं । वहाँसे राधावल्लभ श्रीकृष्ण तालवनको गये । उस वनमें व्रजवधूटियोंसे घिरे हुए श्रीहरिने मण्डलाकार रासनृत्य आरम्भ किया । उस नृत्यमें समस्त गोप-सुन्दरियाँ पसीना - पसीना हो गयीं और प्याससे व्याकुल हो उठीं । उन सबने हाथ जोड़कर रासमण्डलमें रासेश्वरसे कहा ॥ २१–२३३ ॥ गोपियाँ बोलीं- देव! गङ्गाजी तो यहाँसे बहुत दूर हैं और हमलोगोंको बड़े जोरसे प्यास लगने लगी है । हरे! हम यह भी चाहती हैं कि आप यहीं दिव्य मनोहर रास करें । हम आपके साथ यहीं जलविहार और जलपान करेंगी । आप इस जगत्के सृष्टि, पालन तथा संहारके भी नायक हैं ॥ २४-२५ ॥ श्रीनारदजी कहते हैं - यह सुनकर श्रीकृष्णने बेंतकी छड़ीसे भूमिपर ताड़न किया । इससे वहाँ तत्काल पानीका स्रोत निकल आया, जिसे ' वेत्रगङ्गा ' कहते हैं । उसके जलका स्पर्श करनेमात्रसे ब्रह्महत्या दूर हो जाती है । मिथिलेश्वर! उस वेत्रगङ्गामें स्नान करके कोई भी मनुष्य गोलोकधाममें जानेका अधिकारी हो जाता है । मदनमोहनदेव भगवान् श्रीकृष्ण हरि वहाँ श्रीराधा तथा गोपाङ्गनाओंके साथ जलविहार करके कुमुदवनमें गये, जो लता - बेलोंके जालसे मनोहर जान पड़ता था । वहाँ भ्रमरोंकी ध्वनि सब ओर गूँज रही थी । उस वनमें भी सखियोंके साथ श्रीहरिने रास किया । वहीं श्रीराधाने व्रजाङ्गनाओंके सामने नाना प्रकारके दिव्य पुष्पोंद्वारा श्रीकृष्णका शृङ्गार किया । चम्पाके फूलोंसे कटिप्रदेशको अलंकृत किया । सुनहरी जूहीके पुष्पोंद्वारा निर्मित बाजूबंद धारण कराया । सहस्रदल कमलकी कर्णिकाओंको कुण्डलका रूप देकर उससे कानोंकी शोभा बढ़ायी गयी । मोहिनी, मालिनी, कुन्द और केतकीके फूलोंसे निर्मित हार श्रीकृष्णने धारण किया । कदम्बके फूलोंसे शोभायमान किरीट और कड़े धारण करके श्रीहरिके श्रीअङ्ग और भी उद्भासित हो उठे थे । मन्दार- पुष्पोंका उत्तरीय ( दुपट्टा ) और कमलके फूलोंकी छड़ी धारण किये प्रभु श्यामसुन्दर बड़ी शोभा पाते थे । तुलसी-मञ्जरीसे युक्त वनमाला उन्हें विभूषित कर रही थी । राजन्! अपनी प्रियतमाके द्वारा इस प्रकार शृङ्गार धारण कराये जानेपर श्रीकृष्ण उस कुमुदवनमें हर्षोत्फुल्ल मूर्तिमान् वसन्तकी भाँति शोभा पाने लगे ॥ २६-३४ ॥ मृदङ्ग, वीणा, वंशी, मुरचंग, झाँझ और करताल आदि वाद्योंके साथ गोपियाँ ताली बजाती हुई मनोहर गीत गाने लगीं । भैरव, मेघमल्लार, दीपक, मालकोश, श्रीराग और हिन्दोल राग - इन सबको पृथक् - पृथक्
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अध्याय २१ ] गोपाङ्गनाओंके साथ गाकर आठ ताल, तीन ग्राम और सात स्वरोंसे तथा हाव - भाव - समन्वित नाना प्रकारके रमणीय नृत्योंसे कटाक्ष - विक्षेपपूर्वक व्रजगोपिकाएँ श्रीराधा और श्यामसुन्दरको रिझाने लगीं । वहाँसे मधुर गीत गाते हुए माधव उन सुन्दरियोंके साथ मधुवनमें गये । वहाँ पहुँचकर स्वयं रासेश्वर श्रीकृष्णने रासेश्वरी श्रीराधाके साथ रासक्रीड़ा की । वैशाख मासके चन्द्रमाकी इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें वृन्दावनखण्डके अन्तर्गत श्रीकृष्णका वन विहार १११ चाँदनीमें प्रकाशमान सौगन्धिक कह्लार - कुसुमोंसे झरते हुए परागोंसे पूर्ण तथा मालतीकी सुगन्धसे वासित वायु चल रही थी और चारों ओर माधवी लताओंके फूल खिल रहे थे । इन सबसे सुशोभित निर्जन वनमें गोपाङ्गनाओंके साथ श्रीकृष्ण उसी प्रकार रम रहे थे, जैसे नन्दनवनमें देवराज इन्द्र विहार करते हैं ॥ ३५ -४१ ॥ ' रासक्रीड़ा ' नामक बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २० ॥
इक्कीसवाँ अध्याय गोपाङ्गनाओंके साथ श्रीकृष्णका वन विहार, रास - क्रीड़ा; मानवती गोपियोंको छोड़कर श्रीराधाके साथ एकान्त - विहार तथा मानिनी श्रीराधाको भी छोड़कर उनका अन्तर्धान होना श्रीनारदजी कहते हैं— नरेश्वर! इस प्रकार रमणीय कुमुदवनमें मालती पुष्पोंके सुन्दर वनमें; आम, नारंगी तथा नीबुओंके सघन उपवनमें; अनार, दाख और बादामोंके विपिनमें; कदम्ब, श्रीफल ( बेल ) और कुटजोंके काननमें; बरगद, कटहल और पीपलोंके सुन्दर वनमें; तुलसी, कोविदार, केतकी, कदली, करील - कुञ्ज, बकुल ( मौलिश्री ) तथा मन्दारोंके मनोहर विपिनमें विचरते हुए श्यामसुन्दर व्रजवधूटियोंके साथ कामवनमें जा पहुँचे ॥ १–४ ॥ वहीं एक पर्वतपर श्रीकृष्णने मधुर स्वरमें बाँसुरी बजायी । उसकी मोहक तान सुनकर व्रजसुन्दरियाँ मूच्छित और विह्वल हो गयीं । राजन्! आकाशमें देवताओंके साथ विमानोंपर बैठी हुई देवाङ्गनाएँ भी मोहित हो गयीं । कामदेवके बाणोंसे उनके अङ्ग अङ्ग बिंध गये तथा उनके नीबी - बन्ध ढीले होकर खिसकने लगे । स्थावरोंसहित चारों प्रकारके जीवसमुदाय मोहको प्राप्त हो गये, नदियों और नदोंका पानी स्थिर हो गया तथा पर्वत भी पिघलने लगे । कामवनकी पहाड़ी श्यामसुन्दरके चरणचिह्नोंसे युक्त हो गयी, जिसे ' चरण - पहाड़ी ' कहते हैं । उसके दर्शनमात्रसे मनुष्य कृतकृत्य हो जाता है॥५–८ ॥ तदनन्तर राधावल्लभ श्रीकृष्णने नन्दीश्वर तथा बृहत्सानुगिरियोंके तट - प्रान्तमें रास - विलास किया । मिथिलेश्वर! वहाँ गोपियोंको अपने सौभाग्यपर बड़ा अभिमान हो गया, तब श्रीहरि उन सबको वहीं छोड़ श्रीराधाके साथ अदृश्य हो गये । मिथिलानरेश! उस निर्जन वनमें श्रीकृष्णके बिना समस्त गोपाङ्गनाएँ विरहकी आगमें जलने लगीं । उनके नेत्र आँसुओंसे भर गये और वे चकित हिरनियोंकी भाँति इधर - उधर भटकने लगीं । जैसे वनमें हाथीके बिना हथिनियाँ और कुररके बिना कुररियाँ व्यथित होकर करुण - क्रन्दन करती हैं, उसी प्रकार श्रीकृष्णको न देखकर व्यथित तथा विरहसे अत्यन्त व्याकुल हो व्रजाङ्गनाएँ फूट-फूटकर रोने लगीं । राजन्! नरेश्वर! वे सब - की - सब एक साथ मिलकर तथा पृथक् - पृथक् दल बनाकर वन - वनमें जातीं और उन्मत्तकी तरह वृक्षों तथा लता - समूहोंसे पूछतीं - ' तरुओ तथा वल्लरियो! शीघ्र बताओ, हमारे प्यारे नन्दनन्दन कहाँ जा छिपे हैं? " अपनी वाणीसे ' श्रीकृष्ण! श्रीकृष्ण! ' कहकर पुकारती थीं । उनका चित्त श्रीकृष्णचरणारविन्दोंमें ही लगा हुआ था । अतः वे सब अङ्गनाएँ श्रीकृष्णस्वरूपा हो गय— ठीक उसी तरह जैसे भृङ्गके द्वारा बंद किया हुआ कीड़ा उसीके चिन्तनसे भृङ्गरूप हो जाता है । इसमें कोई आश्चर्यकी बात नहीं है । श्रीकृष्णकी चरणपादुकासे
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११२ गोलोकधामाधिपतिं परेशं चिह्नित स्थानपर पहुँचकर गोपियाँ श्रीपादुकाब्जकी शरणमें गयीं । तदनन्तर भगवान्की ही कृपासे उनके चरणचिह्नके अर्चन और दर्शनसे गोपियोंको भगवच्चरणचिह्नोंसे अलंकृत भूमिका विशेषरूपसे दर्शन होने लगा ॥ ९ –१६ ॥ बहुलाश्वने पूछा – प्रभो! राधावल्लभ श्याम-सुन्दर अन्य गोपियोंको छोड़कर श्रीराधिकाके साथ कहाँ चले गये? फिर गोपियोंको उनका दर्शन कैसे हुआ? ॥ १७ ॥
श्रीनारदजी कहते हैं— राजन्! भगवान् श्रीकृष्ण श्रीराधिकाके साथ संकेतवटके नीचे चले गये और वहाँ प्रियतमा श्रीराधाके केशपाशोंकी वेणीमें पुष्परचना करने लगे । श्रीकृष्णके नीले केशोंमें श्रीराधिकाने वक्रता स्थापित की अर्थात् अपने केशरचना - कौशलसे उनके केशोंको घुँघराला बना दिया और उनके पूर्ण-चन्द्रोपम मुखमण्डलमें उन्होंने विचित्र पत्रावलीकी रचना की । इस प्रकार परस्पर शृङ्गार करके श्रीकृष्ण प्रियाके साथ भद्रवन, महान् खदिरवन, बिल्ववन और कोकिलावनमें गये । उधर श्रीकृष्णको खोजती हुई गोपियोंने उनके चरणचिह्न देखे । जौ, चक्र, ध्वजा, छत्र, स्वस्तिक, अङ्कुश, बिन्दु, अष्टकोण, वज्र, कमल, नीलशङ्ख, घट, मत्स्य, त्रिकोण, बाण, ऊर्ध्वरेखा, धनुष, गोखुर और अर्धचन्द्रके चिह्नोंसे सुशोभित महात्मा श्रीकृष्णके पदचिह्नोंका अनुसरण करती हुई गोपाङ्गनाएँ उन चिह्नोंकी धूलि ले - लेकर अपने मस्तकपर रखतीं और आगे बढ़ती जाती थीं । फिर उन्होंने श्रीकृष्णके चरणचिह्नोंके साथ - साथ दूसरे पदचिह्न भी देखे । वे ध्वजा, पद्म, छत्र, जौ, ऊर्ध्वरेखा, चक्र, अर्धचन्द्र, अङ्कुश और बिन्दुओंसे शोभित थे । विदेहराज! लवङ्गलता, गदा, पाठीन ( मत्स्य ), शङ्ख, गिरिराज, शक्ति, सिंहासन, रथ और दो बिन्दुओंके चिह्नोंसे विचित्र शोभाशाली उन चरणचिह्नोंको देखकर गोपियाँ परस्पर कहने लगीं - ' निश्चय ही नन्दनन्दन श्रीराधिकाको साथ लेकर गये हैं । ' श्रीकृष्ण - चरण-अरविन्दोंके चिह्न निहारती हुई गोपियाँ कोकिलावनमें जा पहुँचीं॥१८–२७ ॥ उन गोपाङ्गनाओंका कोलाहल सुनकर माधवने परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ श्रीवृन्दावनखण्ड श्रीराधासे कहा - ' कोटि चन्द्रमाओंको अपने सौन्दर्यसे तिरस्कृत करनेवाली प्रिये श्रीराधे! सब ओरसे गोपिकाएँ आ पहुँचीं । अब वे तुम्हें अपने साथ ले जायँगी । अतः यहाँसे जल्दी निकल चलो । ' उस समय रूप, यौवन, कौशल्य ( चातुरी ) और शीलके गर्वसे गरबीली मानवती राधा रमापतिसे बोलीं ॥२८-३० ॥ श्रीराधाने कहा- प्यारे! मैं कभी राजभवनसे बाहर नहीं निकली थी, किंतु आज अधिक चलना पड़ा है; अतः अब एक पग भी चलनेमें समर्थ नहीं हूँ । देखते नहीं, मैं सुकुमारी राजकुमारी पसीना पसीना हो गयी हूँ? फिर मुझे कैसे ले चलोगे? ॥ ३१ ॥
श्रीनारदजी कहते हैं - यह वचन सुनकर राधिकावल्लभ श्रीकृष्ण श्रीराधाके ऊपर अपने दिव्य पीताम्बरसे हवा करने लगे । फिर उनका हाथ थामकर बोले – ' श्रीराधे! अब तुम अपनी मौजसे धीरे - धीरे चलो । ' उस समय श्रीकृष्णके बारंबार कहनेपर भी श्रीराधाने अपना पैर आगे नहीं बढ़ाया । वे श्रीहरिकी ओर पीठ करके चुपचाप खड़ी रहीं । तब संतोंके प्रिय श्रीकृष्णने मानिनी प्रिया राधासे कहा ॥ ३२-३४ ॥ श्रीभगवान् बोले — मानिनि! यहाँ अन्य गोपियाँ भी मुझसे मिलनेकी हार्दिक कामना रखती हैं, तथापि उन्हें छोड़कर मैं मनसे तुम्हारी आराधना करता हूँ; तुम्हें जो प्रिय हो, वही करता हूँ । राधे! मेरे कंधेपर चढ़कर तुम सुखपूर्वक शीघ्र यहाँसे चलो ॥ ३५ ॥
श्रीनारदजी कहते हैं— नरेश्वर! उनके यों कहने-पर प्रियाने जब उनके कंधेपर चढ़ना चाहा, तभी स्वच्छन्द गतिवाले ईश्वर प्रियतम श्रीकृष्ण वहाँसे अन्तर्धान हो गये । राजेन्द्र! फिर तो कीर्तिकुमारी राधाका मान उतर गया । वे उस महान् कोकिलावनमें भगवद् - विरहसे व्याकुल हो उच्चस्वरसे रोदन करने लगीं ॥ ३६-३७ ॥ मिथिलेश्वर! उसी समय गोपियोंके यूथ वहाँ आ पहुँचे । श्रीराधाका अत्यन्त दुःखजनक रोदन सुनकर उन्हें बड़ी दया और लज्जा आयी । कोई अपनी स्वामिनीको पुष्प- मकरन्दों ( इत्र आदि ) से नहलाने लगीं; कुछ चन्दन, अगुरु, कस्तूरी और केसरसे मिश्रित
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अध्याय २२ ] गोपाङ्गनाओं द्वारा श्रीकृष्णका स्तवन; भगवान्का उनके बीचमें प्रकट होना ११३ जलके छींटे देने लगीं; कुछ व्यजन और चँवर डुलाकर लगीं । मैथिलेन्द्र! श्रीराधाके मुखसे मानी श्रीकृष्णके अङ्गोंमें हवा देने लगीं तथा अनुनय - विनयमें कुशल द्वारा दिये गये सम्मानकी बात सुनकर मानवती नाना वचनोंद्वारा परादेवी श्रीराधाको धीरज बँधाने गोपाङ्गनाओंको बड़ा विस्मय हुआ ॥ ३८-४१ ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें वृन्दावनखण्डके अन्तर्गत ' रास - क्रीड़ा ' नामक इक्कीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २१ ॥
बाईसवाँ अध्याय गोपाङ्गनाओंद्वारा श्रीकृष्णका स्तवन; भगवान्का उनके बीचमें प्रकट होना; उनके पूछने पर हंसमुनिके उद्धारकी कथा सुनाना तथा गोपियोंको क्षीरसागर-श्वेतद्वीप नारायण - स्वरूपोंका दर्शन कराना श्रीनारदजी कहते हैं - राजन्! तदनन्तर श्रीकृष्णके शुभागमनके लिये समस्त व्रजाङ्गनाएँ मिलकर सुरम्य तालस्वरके साथ उन श्रीहरिके रमणीय गुणोंका गान करने लगीं ॥१ ॥
गोपियाँ बोलीं- लोकसुन्दर! जनभूषण! विश्वदीप! मदनमोहन! तथा जगत्की पापराशि एवं पीड़ा हर लेनेवाले! आनन्दकन्द यदुनन्दन! नन्दनन्दन! तुम्हारे चरणारविन्दोंका मकरन्द भी परम स्वच्छन्द है, तुम्हें बारंबार नमस्कार है । गौओं, ब्राह्मणों और साधु - संतोंके विजयध्वजरूप! देववन्द्य तथा कंसादि दैत्योंके वधके लिये अवतार धारण करनेवाले! श्रीनन्दराज - कुल - कमल-दिवाकर! देवाधिदेवोंके भी आदिकारण! मुक्त-जनदर्पण! तुम्हारी जय हो । गोपवंशरूपी सागरमें परम उज्ज्वल मोतीके समान रूप धारण करने वाले! गोपाल कुलरूपी गिरिराजके नीलरत्न! परमात्मन्! गोपालमण्डलरूपी सरोवरके प्रफुल्ल कमल! तथा गोपवृन्दरूपी चन्दनवनके प्रधान कलहंस! तुम्हारी जय हो । प्यारे श्यामसुन्दर! तुम श्रीराधिकाके मुखारविन्दका मकरन्द पान करनेवाले मधुप हो; श्रीराधाके मुखचन्द्रकी सुधामयी चन्द्रिका -के आस्वादक चकोर हो; श्रीराधाके वक्षःस्थलपर विद्योतमान चन्द्रहार हो तथा श्रीराधिकारूपिणी माधवीलताके लिये कुसुमाकर ( ऋतुराज वसन्त ) हो । जो रास - रङ्गस्थलीमें अपने वैभव ( लीला -शक्ति ) से भूरि - भूरि लीलाएँ प्रकट करते हैं, जो गोपाङ्गनाओंके नेत्रों और जीवनके मूलाधार एवं हारस्वरूप हैं तथा श्रीराधाके मान करनेपर जिन्होंने स्वयं मान कर लिया है, वे श्यामसुन्दर श्रीहरि हमारे नेत्रोंके समक्ष प्रकट हों । जिन्होंने गोपिकाओंके समस्त यूथको श्रीवृन्दावनकी भूमिको तथा गिरिराज गोवर्धनको अपनी चरण - धूलिसे अलंकृत किया है; जो सम्पूर्ण जगत् के उद्भव तथा पालनके लिये भूतलपर प्रकट हुए हैं; जिनकी कान्ति अत्यन्त श्याम है और भुजाएँ नागराजके शरीरकी भाँति सुशोभित होती हैं, उन नन्दनन्दन माधवकी हम आराधना करती हैं । प्राणनाथ! तुम्हारे बिना वियोग - व्यथासे पीड़ित हुई हम सब गोपियोंको चन्द्रमा सूर्यकी किरणोंके समान दाहक प्रतीत होता है । यह सम्पूर्ण वनान्त - भाग जो पहले प्रसन्नताका केन्द्र था, अब इसमें आनेपर ऐसा जान पड़ता है, मानो हमलोग असिपत्रवनमें प्रविष्ट हो गयी हैं और अत्यन्त मन्द मन्द गतिसे प्रवाहित होनेवाली वायु हमें बाण - सी लगती है । हरे! राजा सौदासकी रानी मदयन्तीको अपने पतिके विरहसे जो दुःख हुआ था, उससे हजारगुना दुःख नलकी महारानी दमयन्तीको पति वियोगके कारण प्राप्त हुआ था । उनसे भी कोटिगुना अधिक दुःख पतिविरहिणी जनकनन्दिनी सीताको हुआ था और उनसे भी अनन्तगुना अधिक दुःख आज हम सबको हो
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११४ गोलोकधामाधिपतिं परेशं रहा है * ॥२- ९ ॥ श्रीनारदजी कहते हैं— राजन्! इस प्रकार रोती हुई गोपाङ्गनाओंके बीचमें कमलनयन श्रीकृष्ण सहसा प्रकट हो गये, मानो अपना अभीष्ट मनोरथ स्वयं आकर मिल गया हो । उनके मस्तकपर किरीट, भुजाओंमें केयूर और अङ्गद तथा कानोंमें कुण्डल नामक भूषण अपनी दीप्ति फैला रहे थे । स्निग्ध, निर्मल, सुगन्धपूर्ण, नीले, घुँघराले केश - कलाप मनको मोहे लेते थे । उन्हें आया हुआ देख समस्त व्रजाङ्गनाएँ एक साथ उठकर खड़ी हो गयीं, जैसे शब्दादि सूक्ष्म-भूतोंके समूहको देखकर ज्ञानेन्द्रियाँ सहसा सचेष्ट हो जाती हैं । राजन्! उन गोपसुन्दरियोंके मध्यभागमें राधाके साथ श्यामसुन्दर श्रीकृष्ण बाँसुरी बजाते हुए इस प्रकार नृत्य करने लगे, मानो रतिके साथ मूर्तिमान् काम नाच रहा हो । जितनी संख्यामें समस्त गोपियाँ थीं, उतने ही रूप धारण करके श्रीहरि उनके साथ व्रजमें रास - विहार करने लगे - ठीक उसी तरह, जैसे जाग्रत् आदि अवस्थाओंके साथ मन क्रीड़ा कर रहा हो । उस समय उस वनप्रदेशमें दुःखरहित हुई व्रजाङ्गनाएँ वहाँ खड़े हुए श्यामसुन्दर श्रीकृष्णसे हाथ जोड़ गद्गद वाणीमें बोलीं ॥१०–१५ ॥ गोपियोंने पूछा— श्यामसुन्दर! जो सारे जगत्-को तिनकेकी भाँति त्यागकर तुम्हारे चरणारविन्दोंमें अपना तन, मन और प्राण अर्पित कर चुकी हैं, उन्हीं इन गोपियोंके इस महान् समुदायको छोड़कर तुम कहाँ चले गये थे? ॥ १६ ॥
* ' गोप्य ऊचुः-लोकाभिराम जनभूषण विश्वदीप कंदर्पमोहन जगद्वृजिनार्तिहारिन् गोविप्रसाधुविजयध्वज देववन्द्य कंसादिदैत्यवधहेतुकृतावतार परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ श्रीवृन्दावनखण्ड श्रीभगवान् बोले – गोपाङ्गनाओ! पुष्करद्वीप दधिमण्डोद समुद्रके भीतर रहकर ' हंस ' नामक महामुनि तपस्या कर रहे थे । वे मेरे ध्यानमें रत रहकर बिना किसी हेतु या कामनाके भजन करते थे । उन तपस्वी महामुनिको तपस्या करते हुए दो मन्वन्तरका समय इसी तरह बीत गया । उन्हें आज ही आधे योजन लंबा शरीर धारण करनेवाला एक मत्स्य निगल गया था । फिर उसे भी मत्स्यरूपधारी महान् असुर पौण्ड्र निगल गया । इस प्रकार कष्टमें पड़े हुए मुनिवर हंसके उद्धारके लिये मैं शीघ्र वहाँ गया और चक्रसे उन दोनों मत्स्योंका वध करके मुनिको संकटसे छुड़ाकर श्वेत-द्वीपमें चला गया । व्रजाङ्गनाओ! वहाँ क्षीरसागरके भीतर शेषशय्यापर मैं सो गया था । फिर अपनी प्रियतमा तुम सब गोपियोंको दुःखी जान नींद त्यागकर सहसा यहाँ आ पहुँचा; क्योंकि मैं सदा भक्तोंके वशमें रहता हूँ । जो जितेन्द्रिय, समदर्शी तथा किसी भी वस्तुकी इच्छा न रखनेवाले महान् संत हैं, वे निरपेक्षताको ही मेरा परम सुख जानते हैं; जैसे ज्ञानेन्द्रियाँ आदि रस आदि सूक्ष्म भूतोंको ही सुख
समझते हैं । ॥ १७ – २३ ॥
गोपियोंने कहा – माधव! यदि हमपर प्रसन्न हों तो क्षीरसागरमें शेषशय्यापर तुमने जो रूप धारण किया था, उसका हमें भी दर्शन कराओ ॥ २४ ॥
श्रीनारदजी कहते हैं - तब ' तथास्तु ' कहकर भगवान् गोपी - समुदायके देखते - देखते आठ भुजाधारी नारायण हो गये और श्रीराधा लक्ष्मीरूपा हो गयीं ॥ आनन्दकंद यदुनन्दन नन्दसूनो स्वच्छन्दपद्ममकरन्द नमो नमस्ते ॥ । श्रीनन्दराजकुलपद्मदिनेश देव देवादिमुक्तजनदर्पण ते जयोऽस्तु ॥ गोपालसिन्धुपरमौक्तिकरूपधारिन् गोपालवंशगिरिनीलमणे परात्मन् । गोपालमण्डलसरोवरकंजमूर्ते गोपालचन्दनवने कलहंसमुख्य ॥ श्रीराधिकावदनपङ्कजषट्पदस्त्वं श्रीराधिकावदनचन्द्रचकोररूपः यो रासरङ्गनिजवैभवभूरिलीलो यो गोपिकानयनजीवनमूलहारः यो गोपिकासकलयूथमलंचकार वृन्दावनं च निजपादरजोभिरद्रिम् चन्द्रं प्रतप्तकिरणज्वलनं प्रसन्नं सर्वे वनान्तमसिपत्रवनप्रवेशम् सौदासराजमहिषीविरहादतीव जातं सहस्रगुणितं नलपट्टराज्ञ्याः ↑ जानन्ति सन्तः समदर्शिनो ये दान्ता महान्तः किल नैरपेक्ष्याः । श्रीराधिकाहृदयसुन्दरचन्द्रहारः श्रीराधिकामधुलताकुसुमाकरोऽसि ॥ । मानं चकार रहसा किल मानवत्यां सोऽयं हरिर्भवतु नो नयनाग्रगामी ॥ । यः सर्वलोकविभवाय बभूव भूमौ तं भूरिनीलमुरगेन्द्रभुजं भजामः ॥ । बाणं प्रभञ्जनमतीवसुमन्दयानं मन्यामहे किल भवन्तमृते व्यथार्ताः ॥ । तस्मात्तु कोटिगुणितं जनकात्मजायास्तस्मादनन्तमतिदुःखमलं हरे नः ॥ ( गर्ग ०, वृन्दावन ० २२ । २ – ९ ) । ते नैरपेक्ष्यं परमं सुखं मे ज्ञानेन्द्रियादीनि यथा रसादीन् ॥ ( गर्ग ०, वृन्दावन ० २२ । २३ )