गर्ग संहिता — पृष्ठ 101–110
गर्ग संहिता · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 101–110
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तेरहवाँ अध्याय मुनिवर वेदशिरा और अश्वशिराका परस्परके शापसे क्रमशः कालियनाग और काकभुशुण्ड होना तथा शेषनागका भूमण्डलको धारण करना विदेहराज बहुलाश्वने पूछा- देवर्षे! संसारमें जिनकी धूलि अनेक जन्मोंमें योगियोंके लिये भी दुर्लभ है, भगवान्के साक्षात् वे ही चरणारविन्द कालियके मस्तकोंपर सुशोभित हुए । नागोंमें श्रेष्ठ यह कालिय पूर्वजन्ममें कौन - सा पुण्य कर्म कर चुका था, जिससे इसको यह सौभाग्य प्राप्त हुआ – यह मैं जानना चाहता हूँ । देवर्षिशिरोमणे! यह बात मुझे बताइये ॥ १-२ ॥ नारदजीने कहा- राजन्! पूर्वकालकी बात है । स्वायम्भुव मन्वन्तरमें वेदशिरा नामक मुनि, जिनकी उत्पत्ति भृगुवंशमें हुई थी, विन्ध्य पर्वतपर तपस्या करते थे । उन्हींके आश्रमपर तपस्या करनेके लिये अश्वशिरा मुनि आये । उन्हें देखकर वेदशिरा मुनिके नेत्र क्रोधसे लाल हो गये और वे रोषपूर्वक बोले ॥ ३-४ ॥ वेदशिराने कहा – ब्रह्मन्! मेरे आश्रममें तुम तपस्या न करो; क्योंकि वह सुखद नहीं होगी । तपोधन! क्या और कहीं तुम्हारे तपके योग्य भूमि नहीं है? ॥ ५ ॥
नारदजी कहते हैं— राजन्! वेदशिराकी यह बात सुनकर अश्वशिरा मुनिके भी नेत्र क्रोधसे लाल हो गये और वे मुनिपुंगवसे बोले ॥ ६ ॥
अश्वशिराने कहा - मुनिश्रेष्ठ! यह भूमि तो महाविष्णुकी है; न तुम्हारी है न मेरी । यहाँ कितने मुनियोंने उत्तम तपका अनुष्ठान नहीं किया है? तुम व्यर्थ ही सर्पकी तरह फुफकारते हुए क्रोध प्रकट करते हो, इसलिये सदाके लिये सर्प हो जाओ और तुम्हें गरुडसे भय प्राप्त हो ॥ ७-८ ॥ वेदशिरा बोले- दुर्मते! तुम्हारा भाव बड़ा ही दूषित है । तुम छोटे - से द्रोह या अपराधपर भी महान् दण्ड देनेके लिये उद्यत रहते हो और अपना काम बनानेके लिये कौएकी तरह इस पृथ्वीपर डोलते फिरते हो; अतः तुम भी कौआ हो जाओ ॥ ९ ॥
नारदजी कहते हैं— इसी समय भगवान् विष्णु परस्पर शाप देते हुए दोनों ऋषियोंके बीच प्रकट हो गये । वे दोनों अपने - अपने शापसे बहुत दुःखी थे । भगवान्ने अपनी वाणीद्वारा उन दोनोंको सान्त्वना दी ॥१० ॥
श्रीभगवान् बोले – मुनियो! जैसे शरीरमें दोनों भुजाएँ समान हैं, उसी प्रकार तुम दोनों समानरूपसे मेरे भक्त हो । मुनीश्वरो! मैं अपनी बात तो झूठी कर सकता हूँ, परंतु भक्तकी बातको मिथ्या करना नहीं चाहता-यह मेरी प्रतिज्ञा है । वेदशिरा! सर्पकी अवस्थामें तुम्हारे मस्तकपर मेरे दोनों चरण अङ्कित होंगे । उस समयसे तुम्हें गरुडसे कदापि भय नहीं होगा । अश्वशिरा! अब तुम मेरी बात सुनो । सोच न करो, सोच न करो । काकरूपमें रहनेपर भी तुम्हें निश्चय ही उत्तम ज्ञान प्राप्त होगा । योगसिद्धियोंसे युक्त उच्चकोटिका त्रिकालदर्शी ज्ञान सुलभ होगा ॥ ११ - १४ ॥ नारदजी कहते हैं— नरेश्वर! यों कहकर भगवान् विष्णु जब चले गये, तब अश्वशिरा मुनि साक्षात् योगीन्द्र काकभुशुण्ड हो गये और नीलपर्वतपर रहने लगे । वे सम्पूर्ण शास्त्रोंके अर्थको प्रकाशित करनेवाले महातेजस्वी रामभक्त हो गये । उन्होंने ही महात्मा गरुडको रामायणकी कथा सुनायी थी ॥ १५-१६ ॥ मिथिलानरेश! चाक्षुष मन्वन्तरके प्रारम्भमें प्रचेताओंके पुत्र प्रजापति दक्षने महर्षि कश्यपको अपनी परम मनोहर ग्यारह कन्याएँ पत्नीरूपमें प्रदान कीं । उन कन्याओंमें जो श्रेष्ठ कद्रू थी, वही इस समय वसुदेवप्रिया रोहिणी होकर प्रकट हुई हैं, जिनके पुत्र बलदेवजी हैं । उस कद्रूने करोड़ों महासर्पोको जन्म दिया । वे सभी सर्प अत्यन्त उद्भट, विषरूपी बलसे सम्पन्न, उग्र तथा पाँच सौ फनोंसे युक्त थे । वे महान् मणिरत्न धारण किये रहते थे । उनमेंसे कोई - कोई सौ मुखोंवाले एवं दुस्सह विषधर थे । उन्हींमें वेदशिरा ' कालिय ' नामसे प्रसिद्ध महानाग हुए । उन सबमें प्रथम राजा फणिराज शेष हुए, जो
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९ ६ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ श्रीवृन्दावनखण्ड अनन्त एवं परात्पर परमेश्वर हैं । वे ही आजकल ' बलदेव'के नामसे प्रसिद्ध हैं । वे ही राम, अनन्त और अच्युताग्रज आदि नाम धारण करते हैं ॥ १७–२१ ॥ एक दिनकी बात है । प्रकृतिसे परे साक्षात् भगवान् श्रीहरिने प्रसन्नचित्त होकर मेघके समान गम्भीर वाणीमें शेषसे कहा ॥ २२ ॥
श्रीभगवान् बोले- इस भूमण्डलको अपने ऊपर धारण करनेकी शक्ति दूसरे किसीमें नहीं है, इसलिये इस भूगोलको तुम्हीं अपने मस्तकपर धारण करो । तुम्हारा पराक्रम अनन्त है, इसीलिये तुम्हें ' अनन्त ' कहा गया है । जन - कल्याणके हेतु तुम्हें यह कार्य अवश्य करना चाहिये ॥ २३-२४ ॥ शेषने कहा – प्रभो! पृथ्वीका भार उठानेके लिये आप कोई अवधि निश्चित कर दीजिये । जितने दिनकी अवधि होगी, उतने समयतक मैं आपकी आज्ञासे भूमिका भार अपने सिरपर धारण करूँगा ॥२५ ॥
श्रीभगवान् बोले – नागराज! तुम अपने सहस्र मुखोंसे प्रतिदिन पृथक् - पृथक् मेरे गुणोंसे स्फुरित होनेवाले नूतन नामका सब ओर उच्चारण किया करो । जब मेरे दिव्य नाम समाप्त हो जायँ, तब तुम अपने सिरसे पृथ्वीका भार उतारकर सुखी हो जाना ॥ २६-२७ ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें वृन्दावनखण्डके अन्तर्गत ' शेषके शेषने कहा - प्रभो! पृथ्वीका आधार तो मैं हो जाऊँगा, किंतु मेरा आधार कौन होगा? बिना किसी आधारके मैं जलके ऊपर कैसे स्थित रहूँगा? ॥ २८ ॥
श्रीभगवान् बोले- मेरे मित्र! इसकी चिन्ता मत करो । मैं ' कच्छप ' बनकर महान् भारसे युक्त तुम्हारे विशाल शरीरको धारण करूँगा ॥ २ ९ ॥ श्रीनारदजी कहते हैं— नरेश्वर! तब शेषने उठकर भगवान् श्रीगरुडध्वजको नमस्कार किया । फिर वे पातालसे लाख योजन नीचे चले गये । वहाँ अपने हाथसे इस अत्यन्त गुरुतर भूमण्डलको पकड़कर प्रचण्ड पराक्रमी शेषने अपने एक ही फनपर धारण कर लिया । परात्पर अनन्तदेव संकर्षणके पाताल चले जानेपर ब्रह्माजीकी प्रेरणासे अन्यान्य नागराज भी उनके पीछे - पीछे चले गये । कोई अतलमें, कोई वितलमें, कोई सुतल और महातलमें तथा कितने ही तलातल एवं रसातलमें जाकर रहने लगे । ब्रह्माजीने उन सर्पोंके लिये पृथ्वीपर ' रमणकद्वीप ' प्रदान किया था । कालिय आदि नाग उसीमें सुखपूर्वक निवास करने लगे । राजन्! इस प्रकार मैंने तुमसे कालियका कथानक कह सुनाया, जो सारभूत तथा भोग और मोक्ष देनेवाला है । अब और क्या सुनना चाहते हो? ॥ ३०–३५ ॥ उपाख्यानका वर्णन ' नामक तेरहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३ ॥
चौदहवाँ कालियका गरुडके भयसे बचनेके राजा बहुलाश्वने पूछा- ब्रह्मन्! रमणकद्वीपमें रहनेवाले अन्य सर्पोको छोड़कर केवल कालियनाग -को ही गरुडसे भय क्यों हुआ? यह सारी बात आप मुझे बताइये ॥ १ ॥
श्रीनारदजीने कहा- राजन्! रमणकद्वीपमें नागका विनाश करनेवाले गरुड प्रतिदिन जाकर बहुत -से नागका संहार करते थे । अतः एक दिन भयसे व्याकुल हुए वहाँके सर्पोंने उस द्वीपमें पहुँचे हुए क्षुब्ध गरुडसे इस प्रकार कहा ॥२ ॥
अध्याय लिये यमुना जलमें निवासका रहस्य नाग बोले- हे गरुत्मन्! तुम्हें नमस्कार है । तुम साक्षात् भगवान् विष्णुके वाहन हो । जब इस प्रकार हम सर्पोंको खाते रहोगे तो हमारा जीवन कैसे सुरक्षित रहेगा । इसलिये प्रत्येक मासमें एक बार पृथक् - पृथक् एक - एक घरसे एक सर्पकी बलि ले लिया करो । उसके साथ वनस्पति तथा अमृतके समान मधुर अन्नकी सेवा भी प्रस्तुत की जायगी । यह सब विधानके अनुसार तुम शीघ्र स्वीकार करो ॥ ३-४ ॥ गरुडजी बोले- आपलोग एक - एक घरसे
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अध्याय १४ ] कालिका गरुडके भयसे बचनेके एक - एक नागकी बलि प्रतिदिन दिया करें; अन्यथा सर्पके बिना दूसरी वस्तुओंकी बलिसे मैं कैसे पेट भर सकूँगा? वह तो मेरे लिये पानके बीड़ेके तुल्य होगी ॥ ५ ॥
नारदजी कहते हैं— राजन्! उनके यों कहनेपर सब सर्पोंने आत्मरक्षाके लिये एक - एक करके उन महात्मा गरुडके लिये नित्य दिव्य बलि देना आरम्भ किया ॥ ६ ॥
नरेश्वर! जब कालियके घरसे बलि मिलनेका अवसर आया, तब उसने गरुडको दी जानेवाली बलिकी सारी वस्तुएँ बलपूर्वक स्वयं ही भक्षण कर लीं । उस समय प्रचण्ड पराक्रमी गरुड बड़े रोषमें भरकर आये । आते ही उन्होंने कालियनागके ऊपर अपने पंजेसे प्रहार किया । गरुडके उस पाद - प्रहारसे कालिय मूर्च्छित हो गया । फिर उठकर लंबी साँस लेते और जिह्वाओंसे मुँह चाटते हुए नागोंमें श्रेष्ठ बलवान् कालियने अपने सौ फण फैलाकर विषैले दाँतोंसे गरुडको वेगपूर्वक डँस लिया । तब दिव्य वाहन गरुडने उसे चोंचमें पकड़कर पृथ्वीपर दे मारा और पाँखोंसे बारंबार पीटना आरम्भ किया । गरुडकी चोंचसे निकलकर सर्पने उनके दोनों पंजोंको आवेष्टित कर लिया और बारंबार फुंकार करते हुए उनकी पाँखोंको खींचना आरम्भ किया । उस समय उनकी पाँखसे दो पक्षी उत्पन्न हुए -नीलकण्ठ और मयूर । मिथिलेश्वर! आश्विन शुक्ला दशमीको उन पक्षियोंका दर्शन पवित्र एवं सम्पूर्ण मनोवाञ्छित फलोंका देनेवाला माना गया है । रोषसे भरे हुए गरुडने पुन: कालियको चोंचसे पकड़कर पृथ्वीपर पटक दिया और सहसा वे उसके शरीरको घसीटने लगे । तब भयसे विह्वल हुआ कालिय गरुडकी चोंचसे छूटकर भागा । प्रचण्ड पराक्रमी पक्षिराज गरुड भी सहसा उसका पीछा करने लगे । सात द्वीपों, सात खण्डों और सात समुद्रोंतक वह जहाँ - जहाँ गया, वहाँ - वहाँ उसने गरुडको पीछा करते देखा । वह नाग भूर्लोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक और महर्लोकमें क्रमशः जा पहुँचा और वहाँसे भागता हुआ जनलोकमें पहुँच गया । जहाँ जाता, वहीं गरुड भी पहुँच जाते । इसलिये वह पुनः नीचे - नीचेके लिये यमुना - जलमें निवासका रहस्य ९ ७ लोकोंमें क्रमशः गया; किंतु श्रीकृष्ण ( भगवान् विष्णु ) के भयसे किसीने उसकी रक्षा नहीं की । जब उसे कहीं भी शान्ति नहीं मिली, तब भयसे व्याकुल कालिय देवाधिदेव शेषके चरणोंके निकट गया और भगवान् शेषको प्रणाम करके परिक्रमापूर्वक हाथ जोड़ विशाल पृष्ठवाला कालिय दीन, भयातुर और कम्पित होकर बोला ॥ ७ - २० ॥ कालियने कहा – भूमिभर्ता भुवनेश्वर! भूमन्! भूमि- भारहारी प्रभो! आपकी लीलाएँ अपार हैं, आप सर्वसमर्थ पूर्ण परात्पर पुराणपुरुष हैं; मेरी रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये ॥ २१ ॥
नारदजी कहते हैं— कालियको दीन और भयातुर देख फणीश्वरदेव जनार्दनने मधुर वाणीसे उसको प्रसन्न करते हुए कहा ॥ २२ ॥
शेष बोले- महामते कालिय! मेरी उत्तम बात सुनो । इसमें संदेह नहीं कि संसारमें कहीं भी तुम्हारी रक्षा नहीं होगी । ( रक्षाका एक ही उपाय है; उसे बताता हूँ, सुनो - ) पूर्वकालमें सौभरि नामसे प्रसिद्ध एक सिद्ध मुनि थे । उन्होंने वृन्दावनमें यमुनाके जलमें रहकर दस हजार वर्षोंतक तपस्या की । उस जलमें मीनराजका विहार देखकर उनके मनमें भी घर बसानेकी इच्छा हुई । तब उन महाबुद्धि महर्षिने राजा मान्धाताकी सौ पुत्रियोंके साथ विवाह किया । श्रीहरिने उन्हें परम ऐश्वर्यशालिनी वैष्णवी सम्पत्ति प्रदान की, जिसे देखकर राजा मान्धाता आश्चर्यचकित हो गये और उनका धनविषयक सारा अभिमान जाता रहा । यमुनाके जलमें जब सौभरि मुनिकी दीर्घकालिक तपस्या चल रही थी, उन्हीं दिनों उनके देखते - देखते गरुडने मीनराजको मार डाला । मीन- परिवारको अत्यन्त दुःखी देखकर दूसरोंका दुःख दूर करनेवाले दीनवत्सल मुनिश्रेष्ठ सौभरिने कुपित हो गरुडको शाप दे दिया ॥ २३ - २८ ॥ सौभरि बोले- पक्षिराज! आजके दिनसे लेकर भविष्यमें यदि तुम इस कुण्डके भीतर बलपूर्वक मछलियोंको खाओगे तो मेरे शापसे उसी क्षण तुरंत तुम्हारे प्राणोंका अन्त हो जायगा ॥ २ ९ ॥ शेषजी कहते हैं— उस दिनसे मुनिके शापसे
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९ ८ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ श्रीवृन्दावनखण्ड भयभीत हुए गरुड वहाँ कभी नहीं आते । इसलिये नारदजी कहते हैं - राजन्! शेषनागके य कालिय! तुम मेरे कहनेसे शीघ्र ही श्रीहरिके कहनेपर भयभीत कालिय अपने स्त्री- बालकोंके विपिन - वृन्दावनमें चले जाओ । वहाँ यमुनामें निर्भय साथ कालिन्दीमें निवास करने लगा । फिर होकर अपना निवास नियत कर लो । वहाँ कभी तुम्हें श्रीकृष्णने ही उसे यमुनाजलसे निकालकर बाहर गरुडसे भय नहीं होगा ॥ ३०-३१ ॥ भेजा ॥ ३२ ॥
इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें वृन्दावनखण्डके अन्तर्गत ' कालियके उपाख्यानका वर्णन ' नामक चौदहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १४ ॥
पंद्रहवाँ अध्याय श्रीराधाका गवाक्षमार्गसे श्रीकृष्णके रूपका दर्शन करके प्रेम - विह्वल होना; ललिताका श्रीकृष्णसे राधाकी दशाका वर्णन करना और उनकी आज्ञाके अनुसार लौटकर श्रीराधाको श्रीकृष्ण- प्रीत्यर्थ सत्कर्म करनेकी प्रेरणा देना नारदजी कहते हैं— राजन्! यह मैंने तुमसे कालिय - मर्दनरूप पवित्र श्रीकृष्ण चरित्र कहा । अब और क्या सुनना चाहते हो? ॥ १ ॥
बहुलाश्व बोले- देवर्षे! जैसे देवता अमृत पीकर तथा भ्रमर कमल - कर्णिकाका रस लेकर तृप्त नहीं होते, उसी प्रकार श्रीकृष्णकी कथा सुनकर कोई भी भक्त तृप्त नहीं होता ( वह उसे अधिकाधिक सुनना चाहता है ) । जब शिशुरूपधारी परमात्मा श्रीकृष्ण रास करनेके लिये भाण्डीरवनमें गये और उनका यह लघुरूप देखकर श्रीराधा मन - ही - मन खेद करने लगीं, तब देववाणीने कहा- ' कल्याणि! सोच न करो । मनोहर वृन्दावनमें महात्मा श्रीकृष्णके द्वारा तुम्हारा मनोरथ पूर्ण होगा । ' देववाणीद्वारा इस प्रकार कहा गया वह मनोरथका महासागर किस तरह पूर्ण हुआ और उस मनोहर वृन्दावनमें भगवान् श्रीकृष्ण किस रूपमें प्रकट हुए? उस वृन्दा - विपिनमें साक्षात् परिपूर्णतम भगवान्ने श्रीराधाके साथ मनोहर रास - क्रीड़ा किस प्रकार की? ॥२-६ ॥ नारदजीने कहा- राजन्! तुमने बहुत अच्छा प्रश्न किया । मैं उस मङ्गलमय भगवच्चरित्रका, उस मनोहर लीलाख्यानका, जो देवताओंको भी पूर्णतया ज्ञात नहीं है, वर्णन करता हूँ । एक दिनकी बात है, श्रीराधाकी दो प्रधान सखियाँ, शुभस्वरूपा ललिता और विशाखा, वृषभानुके घर पहुँचकर एकान्तमें श्रीराधासे मिलीं ॥ ७-८ ॥ सखियाँ बोलीं- राधे! तुम जिनका चिन्तन करती हो और स्वतः जिनके गुण गाती रहती हो, वे भी प्रतिदिन ग्वाल - बालोंके साथ वृषभानुपुरमें आते हैं । राधे! तुम्हें रातके पिछले पहरमें, जब वे गो- चारणके लिये निकलते हैं, उनका दर्शन करना चाहिये । वे बड़े सुन्दर हैं ॥ ९ -१० ॥ राधा बोलीं- पहले उनका मनोहर चित्र बनाकर तुम शीघ्र मुझे दिखाओ, उसके बाद मैं उनका दर्शन करूँगी - इसमें संशय नहीं है ॥ ११ ॥
नारदजी कहते हैं— तब दोनों सखियोंने नन्द-नन्दनका सुन्दर चित्र बनाया, जिसमें नूतन यौवनका माधुर्य भरा था । वह चित्र उन्होंने तुरंत श्रीराधाके हाथमें दिया । वह चित्र देखकर श्रीराधा हर्षसे खिल उठीं और उनके हृदयमें श्रीकृष्णदर्शनकी लालसा जाग उठी । हाथमें रखे हुए चित्रको निहारती हुई वे आनन्दमग्न होकर सो गयीं । भवनमें सोती हुई श्रीराधाने स्वप्नमें देखा - ' यमुनाके किनारे भाण्डीरवनके एक देशमें नीलमेघकी - सी कान्तिवाले पीतपटधारी श्यामसुन्दर श्रीकृष्ण मेरे निकट ही नृत्य कर रहे हैं । ' विदेहराज! उसी समय श्रीराधाकी नींद टूट गयी और वे शय्यासे उठकर, परमात्मा श्रीकृष्णके वियोगसे विह्वल हो, उन्हींके कमनीय रूपका चिन्तन करती हुई त्रिलोकीको तृणवत् मानने लगीं । इतनेमें
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अध्याय १५ ] श्रीराधाका गवाक्षमार्गसे श्रीकृष्णके रूपका दर्शन करके प्रेम - विह्वल होना; ९९ ही व्रजेश श्रीनन्दनन्दन अपने भवनसे चलकर वृषभानुनगरकी सँकरी गलीमें आ गये । सखीने तत्काल खिड़कीके पास आकर श्रीराधाको उनका दर्शन कराया । उन्हें देखते ही सुन्दरी श्रीराधा मूच्छित हो गयीं । लीलासे मानव-शरीर धारण करनेवाले माधव श्रीकृष्ण भी सुन्दर रूप और वैदग्ध्यसे युक्त गुणनिधि श्रीवृषभानुनन्दिनीका दर्शन करके मन - ही - मन उनके साथ विहारकी अत्यधिक कामना करते हुए अपने भवनको लौटे । वृषभानुनन्दिनी श्रीराधाको इस प्रकार श्रीकृष्ण - वियोगसे विह्वल तथा अतिशय कामज्वरसे संतप्तचित्त देखकर सखियोंमें श्रेष्ठ ललिताने उनसे इस प्रकार कहा ॥ १२–१८ ॥ ललिताने पूछा- राधे! तुम क्यों इतनी विह्वल, मूच्छित ( बेसुध ) और अत्यन्त व्यथित हो? सुन्दरी! यदि श्रीहरिको प्राप्त करना चाहती हो तो उनके प्रति अपना स्नेह दृढ़ करो । वे इस समय त्रिलोकीके भी सम्पूर्ण सुखपर अधिकार किये बैठे हैं । शुभे! वे ही दुःखाग्निकी ज्वालाको बुझा सकते हैं । उनकी उपेक्षा पैरोंसे ठुकरायी हुई कुम्हारके आँवेंकी अग्रिके समान दाहक होगी ॥ १ ९ - २० ॥ नारदजी कहते हैं- राजन्! ललिताकी यह ललित बात सुनकर व्रजेश्वरी श्रीराधाने आँखें खोलीं और अपनी उस प्रिय सखीसे वे गद्गद वाणीमें यों बोलीं ॥ २१ ॥
राधाने कहा – सखी! यदि मुझे व्रजभूषण श्यामसुन्दरके चरणारविन्द नहीं प्राप्त हुए तो मैं कदापि अपने शरीरको नहीं धारण करूँगी - यह मेरा निश्चय है ॥ २२ ॥
नारदजी कहते हैं - मिथिलेश्वर! श्रीराधाकी यह बात सुनकर ललिता भयसे विह्वल हो, यमुनाके मनोहर तटपर श्रीकृष्णके पास गयी । वे माधवीलताके जालसे आच्छन्न और भ्रमरोंकी गुंजारोंसे व्याप्त एकान्त प्रदेशमें कदम्बकी जड़के पास अकेले बैठे थे । वहाँ ललिताने श्रीहरिसे कहा ॥ २३-२४ ॥ ललिता बोली - श्यामसुन्दर! जिस दिनसे श्रीराधाने तुम्हारे अद्भुत मोहनरूपको देखा है, उसी दिनसे वह स्तम्भनरूप सात्त्विकभावके अधीन हो गयी है । काठकी पुतलीकी भाँति किसीसे कुछ बोलती नहीं । अलंकार उसे अग्रिकी ज्वालाकी भाँति दाहक प्रतीत होते हैं । सुन्दर वस्त्र भाड़की तपी हुई बालूके समान जान पड़ते हैं । उसके लिये हर प्रकारकी सुगन्ध कड़वी तथा परिचारिकाओंसे भरा हुआ भवन भी निर्जन वन हो गया है । है प्यारे! तुम यह जान लो कि तुम्हारे विरहमें मेरी सखीको फूल बाण - सा तथा चन्द्र - बिम्ब विषकंद-सा प्रतीत होता है । अतः श्रीराधाको तुम शीघ्र दर्शन दो । तुम्हारा दर्शन ही उसके दुःखोंको दूर कर सकता है । तुम सबके साक्षी हो । भूतलपर कौन - सी ऐसी बात है, जो तुम्हें विदित न हो । तुम्हीं इस जगत् की सृष्टि, पालन और संहार करते हो । यद्यपि परमेश्वर होनेके कारण तुम सब लोगोंके प्रति समानभाव रखते हो, तथापि अपने भक्तोंका भजन करते हो ( उनके प्रति अधिक प्रेम-भाव रखते हो ) ॥ २५ – २८ ॥ नारदजी कहते हैं- राजन्! ललिताकी यह ललित बात सुनकर व्रजके साक्षात् देवता भगवान् श्रीकृष्ण मेघगर्जनके समान गम्भीर वाणीमें बोले ॥२ ९ ॥ श्रीभगवान्ने कहा – भामिनि! मनका सारा भाव स्वतः एकमात्र मुझ परात्पर पुरुषोत्तमकी ओर नहीं प्रवाहित होता; अतः सबको अपनी ओरसे मेरे प्रति प्रेम ही करना चाहिये । इस भूतलपर प्रेमके समान दूसरा कोई साधन नहीं है ( मैं प्रेमसे ही सुलभ होता हूँ ) । भाण्डीरवनमें श्रीराधाके हृदयमें जैसे मनोरथका उदय हुआ था, वह उसी रूपमें पूर्ण होगा । सत्पुरुष अहैतुक प्रेमका आश्रय लेते हैं । संत, महात्मा उस निर्हेतुक प्रेमको निश्चय ही निर्गुण ( तीनों गुणोंसे अतीत ) मानते हैं । जो मुझ केशवमें और श्रीराधिकामें थोड़ा-सा भी भेद नहीं देखते, बल्कि दूध और उसकी शुकृताके समान हम दोनोंको सर्वथा अभिन्न मानते हैं, उन्हींके अन्तःकरणमें अहैतुकी भक्तिके लक्षण प्रकट होते हैं तथा वे ही मेरे ब्रह्मपद ( गोलोकधाम ) में प्रवेश पाते हैं । रम्भोरु! इस भूतलपर जो कुबुद्धि मानव मुझ केशव हरिमें तथा श्रीराधिकामें भेदभाव रखते हैं, वे जबतक चन्द्रमा और सूर्यकी सत्ता है, तबतक निश्चय ही कालसूत्र नामक नरकमें पड़कर
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१०० गोलोकधामाधिपतिं परेशं दुःख भोगते हैं * ॥ ३०–३३ ॥ नारदजी कहते हैं— राजन्! श्रीकृष्णकी यह सारी बात सुनकर ललिता सखी उन्हें प्रणाम करके श्रीराधाके पास गयी और एकान्तमें बोली । बोलते समय उसके मुखपर मधुर हासकी छटा छा रही थी ॥ ३४ ॥
ललिताने कहा- सखी! जैसे तुम श्रीकृष्णको चाहती हो, उसी तरह वे मधुसूदन श्रीकृष्ण भी तुम्हारी अभिलाषा रखते हैं । तुम दोनोंका तेज भेद - भावसे रहित, एक है । लोग अज्ञानवश ही उसे दो मानते हैं । तथापि सती - साध्वी देवि! तुम श्रीकृष्णके लिये परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ श्रीवृन्दावनखण्ड निष्काम कर्म करो, जिससे पराभक्तिके द्वारा तुम्हारा मनोरथ पूर्ण हो ॥ ३५-३६ ॥ नारदजी कहते हैं— नरेश्वर! ललिता सखीकी यह बात सुनकर रासेश्वरी श्रीराधाने सम्पूर्ण धर्म-वेत्ताओंमें श्रेष्ठ चन्द्रानना सखीसे कहा ॥ ३७ ॥
श्रीराधा बोलीं- सखी! तुम श्रीकृष्णकी प्रसन्नताके लिये किसी देवताकी ऐसी पूजा बताओ, जो परम सौभाग्यवर्द्धक, महान् पुण्यजनक तथा मनोवाञ्छित वस्तु देनेवाली हो । भद्रे! महामते! तुमने गर्गाचार्यजीके मुखसे शास्त्रचर्चा सुनी है । इसलिये तुम मुझे कोई व्रत या पूजन बताओ ॥ ३८-३९ ॥ इस प्रकार श्रीगर्ग संहितामें वृन्दावनखण्डके अन्तर्गत ' श्रीराधाकृष्णके प्रेमोद्योगका वर्णन ' नामक पंद्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५ ॥
सोलहवाँ अध्याय तुलसीका माहात्म्य, श्रीराधाद्वारा तुलसीसेवन - व्रतका अनुष्ठान तथा दिव्य तुलसीदेवीका प्रत्यक्ष प्रकट श्रीनारदजी कहते हैं— राजन्! श्रीराधाकी बात सुनकर समस्त सखियोंमें श्रेष्ठ चन्द्राननाने अपने हृदयमें एक क्षणतक कुछ विचार किया फिर इस प्रकार उत्तर दिया ॥ १ ॥
चन्द्रानना बोलीं- राधे! परमसौभाग्यदायक, महान् पुण्यजनक तथा श्रीकृष्णकी भी प्राप्तिके लिये वरदायक व्रत है— तुलसीकी सेवा । मेरी रायमें तुलसी सेवनका ही नियम तुम्हें लेना चाहिये; क्योंकि तुलसीका यदि स्पर्श अथवा ध्यान, नाम - कीर्तन, * श्रीभगवानुवाच-सर्वं हि भावं मनसः परात्परं न ह्येकतो भामिनि जायते ततः । यथा हि भाण्डीरवने मनोरथो बभूव तस्या हि तथा भविष्यति । ये राधिकायां मयि केशवे मनाग् भेदं न पश्यन्ति हि दुग्धशौवल्यवत् । ये राधिकायां मयि केशवे हरौ कुर्वन्ति भेदं कुधियो जना भुवि । † ललितोवाच-त्वमिच्छसि यथा कृष्णं तथा त्वां मधुसूदनः । तथापि देवि कृष्णाय कर्म निष्कारणं कुरु । हो श्रीराधाको वरदान देना स्तवन, आरोपण, सेचन और तुलसीदलसे ही नित्य पूजन किया जाय तो वह महान् पुण्यप्रद होता है । शुभे! जो प्रतिदिन तुलसीकी नौ प्रकारसे भक्ति करते हैं, वे कोटि सहस्र युगोंतक अपने उस सुकृत्यका उत्तम फल भोगते हैं । मनुष्योंकी लगायी हुई तुलसी जबतक शाखा, प्रशाखा, बीज, पुष्प और सुन्दर दलोंके साथ पृथ्वीपर बढ़ती रहती है, तबतक उनके वंशमें जो - जो जन्म लेते हैं, वे सब उन आरोपण करनेवाले मनुष्योंके साथ दो हजार कल्पोंतक श्रीहरिके प्रेमैव कर्तव्यमतो मयि स्वतः प्रेम्णा समानं भुवि नास्ति किंचित् ॥ अहैतुकं प्रेम च सद्भिराश्रितं तच्चापि सन्तः किल निर्गुणं विदुः ॥ त एव मे ब्रह्मपदं प्रयान्ति तद्ध्यर्हेतुकस्फूर्जितभक्तिलक्षणाः ॥ ते कालसूत्रे प्रपतन्ति दुःखिता रम्भोरु यावत्किल चन्द्रभास्करौ ॥ ( गर्ग ०, वृन्दावन ० १५ । ३०–३३ ) युवयोर्भेदरहितं तेजस्त्वेकं द्विधा जनैः ॥ येन ते वाञ्छितं भूयाद् भक्त्या परमया सति ॥ ( गर्ग ०, वृन्दावन ० १५ । ३५-३६ )
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अध्याय १६ ] तुलसीका माहात्म्य, श्रीराधाद्वारा तुलसीसेवन - व्रतका अनुष्ठान १०१ धाममें निवास करते हैं । राधिके! सम्पूर्ण पत्रों और पुष्पको भगवान्के चरणोंमें चढ़ानेसे जो फल मिलता है, वह सदा एकमात्र तुलसीदलके अर्पणसे प्राप्त हो जाता है । जो मनुष्य तुलसीदलोंसे श्रीहरिकी पूजा करता है, वह जलमें पद्मपत्रकी भाँति पापसे कभी लिप्त नहीं होता । सौ भार सुवर्ण तथा चार सौ भार रजतके दानका जो फल है, वही तुलसीवनके पालनसे मनुष्यको प्राप्त हो जाता है । राधे! जिसके घरमें तुलसीका वन या बगीचा होता है, उसका वह घर तीर्थरूप है । वहाँ यमराजके दूत कभी नहीं जाते । जो श्रेष्ठ मानव सर्वपापहारी, पुण्यजनक तथा मनोवाञ्छित वस्तु देनेवाले तुलसीवनका रोपण करते हैं, वे कभी सूर्यपुत्र यमको नहीं देखते । रोपण, पालन, सेचन, दर्शन और स्पर्श करनेसे तुलसी मनुष्योंके मन, वाणी और शरीरद्वारा संचित समस्त पापोंको दग्ध कर देती है । पुष्कर आदि तीर्थ, गङ्गा आदि नदियाँ तथा वासुदेव आदि देवता तुलसीदलमें सदा निवास करते हैं । जो तुलसीकी मञ्जरी सिरपर रखकर प्राण त्याग करता है, वह सैकड़ों पापोंसे युक्त क्यों न हो, यमराज उसकी ओर देख भी नहीं सकते । जो मनुष्य तुलसी - काष्ठका घिसा हुआ चन्दन लगाता है, उसके शरीरको यहाँ क्रियमाण पाप भी नहीं छूता । शुभे! * यदा स्पृष्टाथवा ध्याता कीर्तिता नामभिः स्तुता । नवधा तुलसीभक्तिं ये कुर्वन्ति दिने दिने यावच्छाखाप्रशाखाभिर्बीजपुष्पदलैः शुभैः । तेषां वंशेषु ये जाता गतास्ते वै सुरालये । यत्फलं सर्वपत्रेषु सर्वपुष्पेषु राधिके । तुलसीप्रभवैः पत्रैर्यो नरः पूजयेद्धरिम् सुवर्णभारशतकं रजतं यच्चतुर्गुणम् तुलसीकाननं राधे गृहे यस्यावतिष्ठति । सर्वपापहरं पुण्यं कामदं तुलसीवनम् । रोपणात् पालनात् सेकाद् दर्शनात् स्पर्शनान्नृणाम् । पुष्कराद्यानि तीर्थानि गङ्गाद्याः सरितस्तथा । तुलसीमञ्जरीयुक्तो यस्तु प्राणान् विमुञ्चति । तुलसीकाष्ठजं यस्तु चन्दनं धारयेन्नरः । तुलसीविपिनच्छाया यत्र यत्र भवेच्छुभे । तुलस्याः सखि माहात्म्यमादिदेवश्चतुर्मुखः । तुलसीसेवनं नित्यं कुरु त्वं गोपकन्यके । जहाँ - जहाँ तुलसीवनकी छाया हो, वहाँ - वहाँ पितरोंका श्राद्ध करना चाहिये । वहाँ दिया हुआ श्राद्ध - सम्बन्धी दान अक्षय होता है । सखी! आदिदेव चतुर्भुज ब्रह्माजी भी शार्ङ्गधन्वा श्रीहरिके माहात्म्यकी भाँति तुलसीके माहात्म्यको भी कहनेमें समर्थ नहीं हैं । अतः गोप-नन्दिनि! तुम भी प्रतिदिन तुलसीका सेवन करो, जिससे श्रीकृष्ण सदा ही तुम्हारे वशमें रहें * ॥२–१८ ॥ श्रीनारदजी कहते हैं— नरेश्वर! इस प्रकार चन्द्राननाकी कही हुई बात सुनकर रासेश्वरी श्रीराधाने साक्षात् श्रीहरिको संतुष्ट करनेवाले तुलसी सेवनका व्रत आरम्भ किया । केतकीवनमें सौ हाथ गोलाकार भूमिपर बहुत ऊँचा और अत्यन्त मनोहर श्रीतुलसीका मन्दिर बनवाया, जिसकी दीवार सोनेसे जड़ी थी और किनारे - किनारे पद्मरागमणि लगी थी । वह सुन्दर मन्दिर पन्ने, हीरे और मोतियोंके परकोटेसे अत्यन्त सुशोभित था तथा उसके चारों ओर परिक्रमाके लिये गली बनायी गयी थी, जिसकी भूमि चिन्तामणिसे मण्डित थी । बहुत ऊँचा तोरण ( मुख्यद्वार या गोपुर ) उस मन्दिरकी शोभा बढ़ाता था । वहाँ सुवर्णमय ध्वजदण्डसे युक्त पताका फहरा रही थी । चारों ओर ताने हुए सुनहले वितानों ( ( चँदोवों ) के कारण वह तुलसी- मन्दिर वैजयन्ती पताकासे युक्त इन्द्रभवन - सा देदीप्यमान था । ऐसे रोपिता सिञ्चिता नित्यं पूजिता तुलसीदलैः ॥ । युगकोटिसहस्राणि ते यान्ति सुकृतं शुभे ॥ रोपिता तुलसी मत्यैर्वर्धते वसुधातले ॥ आकल्पयुगसाहस्रं तेषां वासो हरेर्गृहे ॥ तुलसीदलेन चैकेन सर्वदा प्राप्यते तु तत् ॥ । लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा ॥ । तत्फलं समवाप्नोति तुलसीवनपालनात् ॥ तद्गृहं तीर्थरूपं हि न यान्ति यमकिंकराः ॥ रोपयन्ति नराः श्रेष्ठास्ते न पश्यन्ति भास्करिम् ॥ तुलसी दहते पापं वाङ्मनःकायसंचितम् ॥ वासुदेवादयो देवा वसन्ति तुलसीदले ॥ यमोऽपि नेक्षितुं शक्तो युक्तं पापशतैरपि ॥ तद्देहं न स्पृशेत्पापं क्रियमाणमपीह यत् ॥ तत्र श्राद्धं प्रकर्तव्यं पितॄणां दत्तमक्षयम् ॥ न समर्थो भवेद्वक्तुं यथा देवस्य शार्ङ्गिणः ॥ श्रीकृष्णो वश्यतां याति येन वा सर्वदैव हि ॥ ( गर्ग ०, वृन्दावन ०१६ । ३–१८ )
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१०२ गोलोकधामाधिपतिं परेशं तुलसी - मन्दिरके मध्यभागमें हरे पल्लवोंसे सुशोभित तुलसीकी स्थापना करके श्रीराधाने अभिजित् मुहूर्तमें उनकी सेवा प्रारम्भ की । श्रीगर्गजीको बुलाकर उनकी बतायी हुई विधिसे सती श्रीराधाने बड़े भक्तिभावसे श्रीकृष्णको संतुष्ट करनेके लिये आश्विन शुक्ला पूर्णिमासे लेकर चैत्र पूर्णिमातक तुलसी सेवन - व्रतका अनुष्ठान किया ॥ १ ९ - २५ ॥ व्रत आरम्भ करके उन्होंने प्रतिमास पृथक् पृथक् रससे तुलसीको सींचा । कार्तिकमें दूधसे, मार्गशीर्षमें ईखके रससे, पौषमें द्राक्षारससे, माघमें बारहमासी आमके रससे, फाल्गुन मासमें अनेक वस्तुओंसे मिश्रित मिश्रीके रससे और चैत्र मासमें पञ्चामृतसे उसका सेचन किया । नरेश्वर! इस प्रकार व्रत पूरा करके वृषभानुनन्दिनी श्रीराधाने गर्गजीकी बतायी हुई विधिसे वैशाख कृष्णा प्रतिपदाके दिन उद्यापनका उत्सव किया । उन्होंने दो लाख ब्राह्मणोंको छप्पन भोगोंसे तृप्त करके वस्त्र और आभूषणोंके साथ दक्षिणा दी । विदेहराज! मोटे - मोटे दिव्य मोतियोंका एक लाख भार और सुवर्णका एक कोटि भार श्रीगर्गाचार्यजीको दिया । उस समय आकाशमें देवताओंकी दुन्दुभियाँ बजने लगीं, अप्सराओंका नृत्य होने लगा और देवतालोग उस तुलसी - मन्दिरके ऊपर दिव्य पुष्पोंकी वर्षा करने लगे ॥ २६- ३० ॥ उसी समय सुवर्णमय सिंहासनपर विराजमान हरिप्रिया तुलसीदेवी प्रकट हुईं । उनके चार भुजाएँ थीं । कमलदलके समान विशाल नेत्र थे । सोलह वर्षकी - सी अवस्था एवं श्याम कान्ति थी । मस्तकपर इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें वृन्दावनखण्डके अन्तर्गत ' परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ श्रीवृन्दावनखण्ड हेममय किरीट प्रकाशित था और कानोंमें काञ्चनमय कुण्डल झलमला रहे थे । पीताम्बरसे आच्छादित केशोंकी बँधी हुई नागिन - जैसी वेणीमें वैजयन्ती माला धारण किये, गरुडसे उतरकर तुलसीदेवीने रङ्गवल्ली - जैसी श्रीराधाको अपनी भुजाओंसे अङ्कमें भर लिया और उनके मुखचन्द्रका चुम्बन किया * ॥ ३१-३२ ॥ तुलसी बोलीं- कलावती कुमारी राधे! मैं तुम्हारे भक्ति - भावसे वशीभूत हो निरन्तर प्रसन्न हूँ । भामिनि! तुमने केवल लोकसंग्रहकी भावनासे इस सर्वतोमुखी व्रतका अनुष्ठान किया है ( वास्तवमें तो तुम पूर्णकाम हो ) । यहाँ इन्द्रिय, मन, बुद्धि और चित्तद्वारा जो - जो मनोरथ तुमने किया है, वह सब तुम्हारे सम्मुख सफल हो । पति सदा तुम्हारे अनुकूल हों और इसी प्रकार कीर्तनीय परम सौभाग्य बना रहे ॥ ३३ - ३४ ॥ श्रीनारदजी कहते हैं - राजन्! यों कहती हुई हरिप्रिया तुलसीको प्रणाम करके वृषभानुनन्दिनी राधाने उनसे कहा – ' देवि! गोविन्दके युगल चरणारविन्दोंमें मेरी अहैतुकी भक्ति बनी रहे । ' मैथिलराजशिरोमणे! तब हरिप्रिया तुलसी ' तथास्तु ' कहकर अन्तर्धान हो गयीं । तबसे वृषभानुनन्दिनी राधा अपने नगरमें प्रसन्न-चित्त रहने लगीं । राजन्! इस पृथ्वीपर जो मनुष्य भक्तिपरायण हो श्रीराधिकाके इस विचित्र उपाख्यानको सुनता है, वह मन ही मन त्रिवर्ग - सुखका अनुभव करके अन्तमें भगवान्को पाकर कृतकृत्य हो जाता है ॥ ३५-३७ ॥ तुलसीपूजन ' नामक सोलहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १६ ॥
* तदाऽऽविरासीतुलसी हरिप्रिया सुवर्णपीठोपरिशोभितासना । चतुर्भुजा पद्मपलाशवीक्षणा श्यामा स्फुरद्धेमकिरीटकुण्डला ॥ पीताम्बराच्छादितसर्पवेणी स्रजं दधाना नववैजयन्तीम् । खगात्समुत्तीर्य च रङ्गवल्लीं चुचुम्ब राधां परिरभ्य बाहुभिः ॥ ( गर्ग ०, वृन्दावन ० १६ । ३१-३२ )
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सत्रहवाँ अध्याय श्रीकृष्णका गोपदेवीके रूपसे वृषभानु- भवनमें जाकर श्रीराधासे मिलना राजा बहुलाश्व बोले — मुने! श्रीराधाकृष्णके चरित्रको सुनते - सुनते मेरा मन अघाता नहीं — ठीक उसी तरह जैसे शरदऋतुके प्रफुल्ल कमलका रसपान करते समय भ्रमरोंको तृप्ति नहीं होती । ब्रह्मन्! तपोधन! श्रीकृष्णपत्नी रासेश्वरीद्वारा तुलसी सेवनका व्रत पूर्ण कर लिये जानेके बाद जो वृत्तान्त घटित हुआ, वह मुझे सुनाइये ॥ १-२ ॥ श्रीनारदजीने कहा- राजन्! श्रीराधिकाकी तुलसी - सेवाके निमित्त की गयी तपस्याको जानकर, उनकी प्रीतिकी परीक्षा लेनेके लिये एक दिन भगवान् श्रीकृष्ण वृषभानुपुरमें गये । उस समय उन्होंने अद्भुत गोपाङ्गनाका रूप धारण कर लिया था । चलते समय उनके पैरोंसे नूपुरोंकी मधुर झनकार हो रही थी । कटिकी करधनीमें लगी हुई क्षुद्रघण्टिकाओंकी भी मधुर खनखनाहट सुनायी पड़ती थी । अङ्गुलियोंमें मुद्रिकाओंकी अपूर्व शोभा थी । कलाइयोंमें रत्नजटित कंगन, बाँहोंमें भुजबंद तथा कण्ठ एवं वक्षःस्थलमें मोतियोंके हार शोभा दे रहे थे । बालरविके समान दीप्तिमान् शीशफूलसे सुशोभित केश- पाशोंकी वेणी-रचना अपूर्व कुशलताका परिचय मिलता था । नासिकामें मोतीकी बुलाक हिल रही थी । शरीरकी दिव्य आभा स्निग्ध अलकोंके समान ही श्याम थी । ऐसा रूप धारण करके श्रीहरिने वृषभानुके मन्दिरको देखा । खाई और परकोटोंसे युक्त वह वृषभानु- भवन चार दरवाजोंसे सुशोभित था तथा प्रत्येक द्वारपर काजल वर्णके समान वाले गजराज झूमते थे, जिससे उस राजभवनकी मनोहरता बढ़ गयी थी । उस मण्डपका प्राङ्गण वायु तथा मनके समान वेगशाली एवं हार और चँवरोंसे सुसज्जित विचित्र वर्णवाले अश्वोंसे शोभा पा रहा था ॥ ३८ ॥
नरेश्वर! सवत्सा गौओंके समुदाय तथा धर्मधुरंधर वृषभवृन्दसे भी उस भवनकी बड़ी शोभा हो रही थी । बहुत - से गोपाल वहाँ वंशी और बेंत धारण किये गीत गा रहे थे । मायामयी युवतीका वेष धारण किये श्यामसुन्दर उस प्राङ्गणसे अन्तःपुरमें प्रविष्ट हुए, जहाँ कोटि सूर्योंके समान कान्तिमान् कपाटों और खंभोंकी पंक्तियाँ प्रकाश फैला रही थीं । वहाँके रत्न - मण्डित आँगनोंमें बहुत - सी रत्नस्वरूपा ललनाएँ सुशोभित हो रही थीं । वीणा, ताल और मृदङ्ग आदि बाजे बजाती हुई वे मनोहारिणी गोप- सुन्दरियाँ फूलोंकी छड़ी लिये श्रीराधिकाके गुण गा रही थीं । उस अन्तःपुरमें दिव्य एवं विशाल उपवनकी छटा छा रही थी । उसके भीतर अनार, कुन्द, मन्दार, नींबू तथा अन्य ऊँचे - ऊँचे वृक्ष लहलहा रहे थे । केतकी, मालती और माधवी लताएँ उस उपवनको सुशोभित करती थीं । वहीं श्रीराधाका निकुञ्ज था, जिसमें कल्पवृक्षके पुष्पोंकी सुगन्ध भरी थी । नृपेश्वर! उस उपवनमें मधु पीकर मतवाले हुए भौरे टूट पड़ते थे । वहाँ शीतल मन्द- सुगन्ध वायु चल रही थी, जो सहस्रदल कमलोंके परागको बारंबार बिखेरा करती थी । उस उद्यानमें निकुञ्ज शिखरोंपर बैठे हुए नर- कोकिल, मादा - कोकिल, मोर, सारस और शुक पक्षी मीठी आवाजमें कूज रहे थे । वहाँ फूलोंकी सहस्रों शय्याएँ सज्जित थीं और पानीकी हजारों नहरें बह रही थीं । वहाँके मेघ मन्दिरमें सैकड़ों फुहारे छूट रहे थे । बालसूर्यके समान कान्तिमान् कुण्डल तथा विचित्र वर्णवाले वस्त्र धारण किये करोड़ों सुन्दरमुखी सखियाँ वहाँ श्रीराधाके सेवा कार्यमें अपनी कुशलताका परिचय देती थीं । उनके बीचमें श्रीराधिका रानी उस राजमन्दिरमें टहल रही थीं । वह राजमन्दिर केसरिया रंगके सूक्ष्म वस्त्रोंसे सजाया गया था । वहाँकी भूमिपर पर्वतीय पुष्प, जलज पुष्प तथा स्थलपर होनेवाले बहुत से पुष्प और कोमल पल्लव इतनी अधिक संख्यामें बिछाये गये थे कि वहाँ पाँव रखनेपर गुल्फ ( घुट्ठी ) तकका भाग ढक जाता था । मालतीके मकरन्दोंकी बूँदें वहाँ झरती रहती थीं । ऐसे आँगनमें करोड़ों चन्द्रोंके समान कान्तिमती, कोमलाङ्गी एवं कृशाङ्गी श्रीराधा धीरे - धीरे अपने कोमल चरणारविन्दोंका संचालन करती हुई घूम रही थीं । मणि- मन्दिरके आँगनमें आयी हुई उस नवीना गोप-सुन्दरीको वृषभानुनन्दिनी श्रीराधाने देखा । उसके तेजसे
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१०४ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ श्रीवृन्दावनखण्ड वहाँकी समस्त ललनाएँ हतप्रभ हो गयीं, जैसे चन्द्रमाके उदय होनेसे ताराओंकी कान्ति फीकी पड़ जाती है । उसके उत्तम एवं महान् गौरवका अनुभव करके श्रीराधाने अभ्युत्थान दिया ( अगवानी की ) और दोनों बाँहोंसे उसका गाढ़ आलिङ्गन करके उसे दिव्य सिंहासनपर बिठाया । फिर लोकरीतिके अनुसार जल आदि उपचार अर्पित करके उसका सुन्दर पूजन ( आदर - सत्कार ) आरम्भ किया ॥ ९ -२३ ॥ श्रीराधा बोलीं – सुन्दरी सखी! तुम्हारा स्वागत है । मुझे शीघ्र ही अपना नाम बताओ । तुम स्वतः आज यहाँ आ गयीं, यह मेरे लिये ही महान् सौभाग्यकी बात है । इस भूतलपर तुम्हारे समान दिव्य रूपका कहीं दर्शन नहीं होता । शुभ्रु! जहाँ तुम जैसी सुन्दरी निवास करती हैं, वह नगर निश्चय ही धन्य है । देवि! अपने आगमनका कारण विस्तारपूर्वक बताओ । मेरे योग्य जो कार्य हो, वह तुम्हें अवश्य कहना चाहिये । तुम अपनी बाँकी चितवन, सुन्दर दीप्ति, मधुर वाणी, मनोहर मुसकान, चाल - ढाल और आकृतिसे इस सदृश दिखायी देती हो । शुभे! मिलनेके लिये आया करो । यदि ही अपने निवासस्थानका संकेत विधिसे हमारा तुम्हारे साथ मिलना तुम्हें सदा उपयोगमें लानी चाहिये । शरीर मुझे बहुत प्यारा लगता है; समय मुझे श्रीपति तुम प्रतिदिन मुझसे न आ सको तो मुझे प्रदान करो । जिस सम्भव हो, वह विधि हे सखी! तुम्हारा यह क्योंकि मेरे प्रियतम श्रीव्रजराजनन्दनकी आकृति तुम्हारी ही जैसी है, जिन्होंने मेरे मनको हर लिया है । अतः तुम मेरे पास रहो । जैसे भौजाई अपनी ननदको प्यार करती है, उसी प्रकार मैं तुम्हारा आदर करूँगी ॥२४–२९ ॥ श्रीनारदजी कहते हैं- राजन्! यह सुनकर मायासे युवतीका वेष धारण करनेवाले भगवान् श्रीकृष्णने कमलनयनी राधासे इस प्रकार कहा ॥ ३० ॥
श्रीभगवान् बोले – रम्भोरु! नन्दनगर गोकुलमें नन्दभवनसे उत्तर दिशामें मेरा निवास है । मेरा नाम ' गोपदेवी ' है । मैंने ललिताके मुखसे तुम्हारी रूपमाधुरी और गुण - माधुरीका वर्णन सुना है; अतः हे चञ्चल लोचनोंवाली सुन्दरी! मैं तुम्हें देखनेके लिये यहाँ तुम्हारे घरमें चली आयी हूँ । कमललोचने! जहाँ ललित लवङ्गलताकी सुस्पष्ट सुगन्ध छा रही है, जहाँके गुञ्जा-निकुञ्जमें मधुपोंकी मधुर ध्वनिसे युक्त कंजपुष्प खिल रहे हैं, वह श्रुतिपथमें आया हुआ तुम्हारा नित्य - नूतन दिव्य नगर आज अपनी आँखों देख लिया । इसके समान सुन्दर तो देवराज इन्द्रकी पुरी अमरावती भी नहीं होगी ॥ ३१ - ३३ ॥ श्रीनारदजी कहते हैं- मिथिलेश्वर! इस प्रकार दोनों प्रिया - प्रियतमका मिलन हुआ । वे परस्पर प्रीतिका परिचय देते हुए वहाँ उपवनमें शोभा पाने लगे । पुष्पमय कन्दुक ( गेंद ) के खेल खेलते हुए वे दोनों हँसते और गीत गाते थे । वनके वृक्षोंको देखते हुए वे इधर - उधर विचरने लगे । राजन्! कला - कौशलसे सम्पन्न कमललोचना राधाको सम्बोधित करके गोपदेवीने मधुर वाणीसे कहा॥३४–३६ ॥ गोपदेवी बोली - व्रजेश्वरि! नन्दनगर यहाँसे दूर है और अब संध्या हो गयी है, अतः जाती हूँ । कल प्रातः-काल तुम्हारे पास आऊँगी, इसमें संशय नहीं है ॥३७ ॥
श्रीनारदजी कहते हैं - राजन्! गोपदेवीकी यह बात सुनकर व्रजेश्वरी श्रीराधाके नयनोंसे तत्काल आँसुओंकी धारा बह चली । वे रोमाञ्च तथा हर्षोद्गमके भावसे आवृत हो कटे हुए कदलीवृक्षकी भाँति पृथ्वीपर गिर पड़ीं । यह देख वहाँ सखियाँ सशङ्क हो गयीं और तुरंत व्यजन लेकर, पास खड़ी हो, हवा करने लगीं । उनके वस्त्रोंपर चन्दन - पुष्पोंके इत्र छिड़के गये । उस समय गोपदेवीने श्रीराधासे कहा ॥ ३८-३९ ॥ गोपदेवी बोली- राधिके! मैं प्रातःकाल अवश्य आऊँगी तुम चिन्ता न करो । यदि ऐसा न हो तो मुझे गाय, गोरस और अपने भाईकी सौगन्ध है ॥ ४० ॥
नारदजी कहते हैं— नृपेश्वर! यों कहकर मायासे युवतीका वेष धारण करनेवाले श्रीहरि राधाको धीरज बँधाकर श्रीनन्दगोकुल ( नन्दगाँव ) में चले गये ॥४१ ॥
इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें वृन्दावनखण्डके अन्तर्गत ' श्रीराधा - कृष्ण - संगम ' नामक सत्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १७ ॥