गर्ग संहिता — पृष्ठ 151–160
गर्ग संहिता · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 151–160
पृष्ठ 151
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अध्याय २ ] ऋषिरूपा उन सबका मनोरथ पूर्ण कर दिया था ॥ ३ ९ –४१ ॥ गोपियाँ बोलीं- प्रभो! हमने दुर्वासा मुनिका दर्शन उनके सामने जाकर किया है; किंतु आप दोनोंके वचनोंको सुनकर उनकी सत्यताके सम्बन्धमें हमारे मनमें संदेह उत्पन्न हो गया है । जैसे गुरुजी असत्यवादी हैं, उसी तरह चेलाजी भी मिथ्यावादी हैं- इसमें संशय नहीं है । अघनाशन! आप तो गोपियोंके उपपति और बचपनसे ही रसिक हैं, फिर आप बाल - ब्रह्मचारी कैसे हुए - यह हमें स्पष्ट बताइये; और हमारे सामने बहुत-सा अन्न ( भार - के - भार छप्पन भोग ) खा जानेवाले ये दुर्वासामुनि केवल दूर्वाका रस पीकर रहनेवाले कैसे हैं? व्रजेश्वर! हमारे मनमें यह भारी संदेह उठा है॥४२–४४३ १ ॥ श्रीभगवान् ने कहा — गोपियो! मैं ममता और अहंकारसे रहित, सबके प्रति समान भाव रखने-वाला, सर्वव्यापी, सबसे उत्कृष्ट, सदा विषमताशून्य तथा प्राकृत गुणोंसे रहित हूँ - इसमें संशय नहीं है । तथापि जो भक्त मेरा जिस प्रकार भजन करते हैं, उनका उसी प्रकार मैं भी भजन करता हूँ । इसी प्रकार ज्ञानी साधु - महात्मा भी सदा विषम भावनासे रहित होते हैं । योगयुक्त विद्वान् पुरुषको चाहिये कि वह कर्मोंमें आसक्त हुए अज्ञानीजनोंमें बुद्धि - भेद न उत्पन्न करे । गोपियोंका उपाख्यान १४५ उनसे सदा समस्त कर्मोंका सेवन ही कराये । जिस पुरुषके सभी समारम्भ ( आयोजन ) कामना और संकल्पसे शून्य होते हैं, उनके सारे कर्म ज्ञानरूपी अग्निमें दग्ध हो जाते हैं ( अर्थात् उनके लिये वे कर्म बन्धनकारक नहीं होते ) । ऐसे पुरुषको ज्ञानीजन पण्डित ( तत्त्वज्ञ ) कहते हैं । जिसके मनमें कोई कामना नहीं है, जिसने चित्त और बुद्धिको अपने वशमें कर रखा है तथा जो समस्त संग्रह - परिग्रह छोड़ चुका है, वह केवल शरीर - निर्वाह - सम्बन्धी कर्म करता हुआ किल्विष ( कर्मजनित शुभाशुभ फल ) को नहीं प्राप्त होता । इस संसारमें ज्ञानके समान पवित्र दूसरी कोई वस्तु नहीं है । योगसिद्ध पुरुष समयानुसार स्वयं ही अपने - आपमें उस ज्ञानको प्राप्त कर लेता है । जो समस्त कर्मोंको ब्रह्मार्पण करके आसक्ति छोड़कर कर्म करता है, वह पापसे उसी प्रकार लिप्त नहीं होता, जैसे कमलका पत्र जलसे । इसलिये दुर्वासामुनि तुम सबके हित - साधनमें तत्पर होकर बहुत खानेवाले हो गये । स्वतः उन्हें कभी भोजनकी इच्छा नहीं होती । वे केवल परिमित दूर्वारसका ही आहार करते हैं॥४५–५२ ॥ श्रीनारदजी कहते हैं— मैथिलेश्वर! श्रीकृष्णका यह वचन सुनकर समस्त गोपियोंका संशय नष्ट हो गया । वे श्रुतिरूपा गोपाङ्गनाएँ ज्ञानमयी हो गयीं ॥ ५३ ॥
इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें माधुर्यखण्डके अन्तर्गत श्रीनारद - बहुलाश्व - संवादमें ' श्रुतिरूपा गोपियोंका उपाख्यान ' नामक पहला अध्याय पूरा हुआ ॥ १ ॥
दूसरा अध्याय ऋषिरूपा गोपियोंका उपाख्यान - वङ्गदेशके मङ्गल - गोपकी कन्याओंका नन्दराजके व्रजमें आगमन तथा यमुनाजीके तटपर रासमण्डलमें प्रवेश श्रीनारदजी कहते हैं— मैथिल! अब तुम मिथिलेश्वर! उसके पाँच हजार पत्नियाँ थीं । किसी ऋषिरूपा गोपियोंकी कथा सुनो । वह सब पापोंको हर समय दैवयोगसे उसका सारा धन नष्ट हो गया । चोरोंने लेनेवाली, परम पावन तथा श्रीकृष्णके प्रति भक्ति- उसकी गौओंका अपहरण कर लिया । कुछ गौओंको भावकी वृद्धि करनेवाली है । वङ्गदेशमें मङ्गल नामसे उस देशके राजाने बलपूर्वक अपने अधिकारमें कर प्रसिद्ध एक महामनस्वी गोप था, जो लक्ष्मीवान्, लिया । इस प्रकार दीनता प्राप्त होनेपर मङ्गल - गोप शास्त्रज्ञानसे सम्पन्न तथा नौ लाख गौओंका स्वामी था । बहुत दुःखी हो गया । उन्हीं दिनों श्रीरामचन्द्रजीके
पृष्ठ 152
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१४६ गोलोकधामाधिपतिं परेशं वरदानसे स्त्रीभावको प्राप्त हुए दण्डकारण्यके निवासी ऋषि उसकी कन्याएँ हो गये । उस कन्या - समूहको देखकर दुःखी गोप मङ्गल और भी दुःखमें डूब गया
और आधि - व्याधिसे व्याकुल रहने लगा । उसने मन-ही मन इस प्रकार कहा ॥ १-६ ॥
मङ्गल बोला – क्या करूँ? कहाँ जाऊँ? कौन मेरा दुःख दूर करेगा? इस समय मेरे पास न तो लक्ष्मी है, न ऐश्वर्य है, न कुटुम्बीजन हैं और न कोई बल ही है । हाय! धनके बिना इन कन्याओंका विवाह कैसे होगा? जहाँ भोजनमें भी संदेह हो, वहाँ धनकी कैसी आशा? दीनता तो थी ही । काकतालीय न्यायसे कन्याएँ भी इस घरमें आ गयीं । इसलिये किसी धनवान् और बलवान् राजाको ये कन्याएँ अर्पित करूँगा, तभी इन कन्याओंको सुख मिलेगा ॥ ७ - -९ ९ ३ ॥ श्रीनारदजी कहते हैं- राजन्! इस प्रकार उन कन्याओंकी कोई परवा न करके उसने अपनी ही बुद्धिसे ऐसा निश्चय कर लिया और उसीपर डटा रहा । उन्हीं दिनों मथुरामण्डलसे एक गोप उसके यहाँ आया । वह तीर्थयात्री था । उसका नाम था जय । वह परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ माधुर्यखण्ड बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ और वृद्ध था । उसके मुखसे मङ्गलने नन्दराजके अद्भुत वैभवका वर्णन सुना । दीनतासे पीड़ित मङ्गलने बहुत सोच - विचारकर अपनी चारु-लोचना कन्याओंको नन्दराजके व्रजमण्डलमें भेज दिया । नन्दराजके घरमें जाकर वे रत्नमय भूषणोंसे विभूषित कन्याएँ उनके गोष्ठमें गौओंका गोबर उठानेका काम करने लगीं । वहाँ सुन्दर श्रीकृष्णको देखकर उन कन्याओंको अपने पूर्वजन्मकी बातोंका स्मरण हो आया और वे श्रीकृष्णकी प्राप्तिके लिये नित्य यमुनाजीकी सेवा - पूजा करने लगीं । तदनन्तर एक दिन श्यामल अङ्गोंवाली विशाललोचना यमुनाजी उन सबको दर्शन दे, वर प्रदान करनेके लिये उद्यत हुईं । उन गोपकन्याओंने यह वर माँगा कि ' व्रजेश्वर नन्दराजके पुत्र श्रीकृष्ण हमारे पति हों । ' तब ' तथास्तु ' कहकर यमुना वहीं अन्तर्धान हो गयीं । वे सब कन्याएँ वृन्दावनमें कार्तिक पूर्णिमाकी रातको रासमण्डलमें पहुँचीं । वहाँ श्रीहरिने उनके साथ उसी तरह विहार किया, जैसे देवाङ्गनाओंके साथ देवराज इन्द्र किया करते हैं ॥ १०-१७ ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें माधुर्यखण्डके अन्तर्गत नारद - बहुलाश्व - संवादमें ' ऋषिरूपा गोपियोंका उपाख्यान ' नामक दूसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ २ ॥
तीसरा मैथिलीरूपा गोपियोंका आख्यान; श्रीनारदजी कहते हैं - राजन्! मिथिलेश्वर! अब मिथिलादेशमें उत्पन्न गोपियोंका आख्यान सुनो । यह दशाश्वमेध - तीर्थपर स्नानका फल देनेवाला और भक्ति - भावको बढ़ानेवाला है । श्रीरामचन्द्रजीके वरसे जो नौ नन्दोंके घरोंमें उत्पन्न हुई थीं, वे मैथिलीरूपा गोपकन्याएँ परम कमनीय नन्दनन्दनका दर्शन करके मोहित हो गयीं । उन्होंने मार्गशीर्षके शुभ मासमें कात्यायनीका व्रत किया और उनकी मिट्टीकी प्रतिमा बनाकर वे षोडशोपचारसे उसकी पूजा करने लगीं । अरुणोदयकी वेलामें वे प्रतिदिन एक साथ भगवान् के गुण गाती हुई आतीं और श्रीयमुनाजीके जलमें स्नान अध्याय चीरहरणलीला और वरदान - प्राप्ति करती थीं । एक दिन वे व्रजाङ्गनाएँ अपने वस्त्र यमुनाजीके किनारे रखकर उनके जलमें प्रविष्ट हुईं और दोनों हाथोंसे जल उलीचकर एक - दूसरीको भिगोती हुई जल - विहार करने लगीं । प्रातः काल भगवान् श्यामसुन्दर वहाँ आये और तुरंत उन सबके वस्त्र लेकर कदम्बपर आरूढ़ हो चोरकी तरह चुपचाप बैठ गये । राजन्! अपने वस्त्रोंको न देखकर वे गोपकन्याएँ बड़े विस्मयमें पड़ीं तथा कदम्बपर बैठे हुए श्यामसुन्दरको देखकर लजा गयीं और हँसने लगीं । तब वृक्षपर बैठे हुए श्रीकृष्ण उन गोपियोंसे कहने लगे – ' तुम सब लोग यहाँ आकर अपने-
पृष्ठ 153
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अध्याय ४ ] व्रजमें गोपी होकर श्रीकृष्णके अपने कपड़े ले जाओ, अन्यथा मैं नहीं दूँगा । ' राजन्! तब वे गोपकन्याएँ शीतल जलके भीतर खड़ी खड़ी हँसती हुई लज्जासे मुँह नीचे किये बोलीं ॥ १ – ९ ॥ गोपियोंने कहा - हे मनोहर नन्दनन्दन! हे गोपरत्र! हे गोपाल - वंशके नूतन हंस! हे महान् पीड़ाको हर लेनेवाले श्रीश्यामसुन्दर! तुम जो आज्ञा करोगे, वही हम करेंगी । तुम्हारी दासी होकर भी हम यहाँ वस्त्रहीन होकर कैसे रहें? आप गोपियोंके वस्त्र लूटनेवाले और माखनचोर हैं । व्रजमें जन्म लेकर भी बड़े रसिक हैं । भय तो आपको छू नहीं सका है । हमारा वस्त्र हमें लौटा दीजिये; नहीं तो हम मथुरा-नरेशके दरबारमें आपके द्वारा इस अवसरपर की गयी बड़ी भारी अनीतिकी शिकायत करेंगी ॥ १०-११ ॥ श्रीभगवान् बोले— सुन्दर मन्दहास्यसे सुशोभित होनेवाली गोपाङ्गनाओ! यदि तुम मेरी दासियाँ हो तो इस कदम्बकी जड़के पास आकर अपने वस्त्र ले लो ।
नहीं तो मैं इन सब वस्त्रोंको अपने घर उठा ले जाऊँगा ।
अतः तुम अविलम्ब मेरे कथनानुसार कार्य करो ॥ १२ ॥
प्रति अनन्यभावसे प्रेम करना १४७ श्रीनारदजी कहते हैं— राजन्! तब वे सब व्रजवासिनी गोपियाँ अत्यन्त काँपती हुई जलसे बाहर निकलीं और आनत - शरीर हो, हाथोंसे योनिको ढककर शीतसे कष्ट पाते हुए श्रीकृष्णके हाथसे दिये गये वस्त्र लेकर उन्होंने अपने अङ्गोंमें धारण किये । इसके बाद श्रीकृष्णको लजीली आँखोंसे देखती हुई वहाँ मोहित हो खड़ी रहीं । उनके परम प्रेमसूचक अभिप्रायको जानकर मन्द मन्द मुस्कराते हुए श्यामसुन्दर श्रीकृष्ण उनपर चारों ओरसे दृष्टिपात करके इस प्रकार बोले ॥ १३ –१५ ॥ श्रीभगवान्ने कहा — गोपाङ्गनाओ! तुमने मार्गशीर्ष मासमें मेरी प्राप्तिके लिये जो कात्यायनी - व्रत किया है, वह अवश्य सफल होगा- इसमें संशय नहीं है । परसों दिनमें वनके भीतर यमुनाके मनोहर तटपर मैं तुम्हारे साथ रास करूँगा, जो तुम्हारा मनोरथ पूर्ण करनेवाला होगा ॥ १६-१७ ॥ यों कहकर परिपूर्णतम श्रीहरि जब चले गये, तब आनन्दोल्लाससे परिपूर्ण हो मन्दहासकी छटा बिखेरती हुई वे समस्त गोप- बालाएँ अपने घरोंको गयीं ॥१८ ॥
इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें माधुर्यखण्डके अन्तर्गत नारद - बहुलाश्व - संवादमें ' मैथिलीरूपा गोपियोंका उपाख्यान ' नामक तीसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ ३ ॥
चौथा अध्याय कोसलप्रान्तीय स्त्रियोंका व्रजमें गोपी होकर श्रीकृष्णके प्रति अनन्यभावसे प्रेम करना श्रीनारदजी कहते हैं - मिथिलेश्वर! अब कोसल- प्रदेशकी गोपिकाओंका वर्णन सुनो । यह श्रीकृष्ण चरितामृत समस्त पापोंका नाश करनेवाला तथा पुण्य - जनक है । कोसलप्रान्तकी स्त्रियाँ श्रीरामके वरसे व्रजमें नौ उपनन्दोंके घरोंमें उत्पन्न हुईं और व्रजके गोपजनोंके साथ उनका विवाह हो गया । वे सब - की - सब रत्नमय आभूषणोंसे विभूषित थीं । उनकी अङ्गकान्ति पूर्ण चन्द्रमाकी चाँदनीके समान थी । वे नूतन यौवनसे सम्पन्न थीं । उनकी चाल हंसके समान थी और नेत्र प्रफुल्ल कमलदलके समान विशाल थे । वे पद्मिनी जातिकी नारियाँ थीं । उन्होंने कमनीय महात्मा नन्द - नन्दन श्रीकृष्णके प्रति जारधर्मके अनुसार उत्तम, सुदृढ़ तथा सबसे अधिक स्नेह किया ॥ १-४ ॥ व्रजकी गलियोंमें माधव मुस्कराकर पीताम्बर छीनकर और आँचल खींचकर उनके साथ सदा हास परिहास किया करते थे । वे गोपबालाएँ जब दही बेचनेके लिये निकलतीं तो ' दही लो, दही लो ' - यह कहना भूलकर ' कृष्ण लो, कृष्ण लो ' कहने लगती थीं । श्रीकृष्णके प्रति प्रेमासक्त होकर वे कुञ्जमण्डलमें घूमा करती थीं । आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, नक्षत्र मण्डल, सम्पूर्ण दिशा, वृक्ष तथा जनसमुदायोंमें भी उन्हें केवल कृष्ण ही दिखायी देते थे । प्रेमके समस्त
पृष्ठ 154
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१४८ गोलोकधामाधिपतिं परेशं लक्षण उनमें प्रकट थे । श्रीकृष्णने उनके मन हर लिये थे । वे सारी व्रजाङ्गनाएँ आठों सात्त्विक भावोंसे सम्पन्न थीं * ॥ ५–८ ॥ प्रेमने उन सबको परमहंसों ( ब्रह्मनिष्ठ महात्माओं ) की अवस्थाको पहुँचा दिया था । नरेश्वर! वे कान्तिमती गोपाङ्गनाएँ श्रीकृष्णके आनन्दमें ही मग्न हो व्रजकी गलियोंमें विचरा करती थीं । उनमें जड़ - चेतनका भान नहीं रह गया था । वे जड, उन्मत्त और पिशाचोंकी भाँति कभी मौन रहतीं और कभी बहुत बोलने लगती थीं । वे लाज और चिन्ताको तिलाञ्जलि दे चुकी थीं । इस प्रकार कृतार्थ होकर जो श्रीकृष्णमें तन्मय हो रही थीं, वे गोपाङ्गनाएँ बलपूर्वक खींचकर श्रीकृष्णके मुखार -विन्दको चूम लेती थीं । राजन्! उनके तपका मैं क्या वर्णन करूँ? जो सारे लोक व्यवहार एवं मर्यादा-परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ माधुर्यखण्ड मार्गको तिलाञ्जलि देकर हृदय तथा इन्द्रिय आदिके द्वारा पूर्ण परब्रह्म वासुदेवमें अविचल प्रेम करती थीं; जो रास - क्रीडामें श्रीकृष्णके कंधोंपर अपनी बाँहें रखकर, प्रेमसे विगलितचित्त हो श्रीकृष्णको पूर्णतया अपने वशमें कर चुकी थीं; उनकी तपस्याका अपने सहस्रमुखोंसे वर्णन करनेमें नागराज शेष भी समर्थ नहीं हैं । विदेहराज! न्याय - वैशेषिक आदि दर्शनोंके तत्त्वज्ञोंमें श्रेष्ठतम महात्मा योग - सांख्य और शुभ-कर्मद्वारा जिस पदको प्राप्त करते हैं, वही पद केवल भक्ति भावसे उपलब्ध हो जाता है । आदिदेव श्रीहरि केवल भक्तिसे ही वशमें होते हैं, निश्चय ही इस विषयमें सदा गोपियाँ ही प्रमाण हैं । उन्होंने कभी सांख्य और योगका अनुष्ठान नहीं किया, तथापि केवल प्रेमसे ही वे भगवत्स्वरूपताको प्राप्त हो गयीं ॥ ९ – १५ ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें माधुर्यखण्डके अन्तर्गत नारद - बहुलाश्व - संवादमें ' कोसलप्रान्तीय गोपिकाओंका आख्यान ' नामक चौथा अध्याय पूरा हुआ ॥ ४ ॥
पाँचवाँ अध्याय अयोध्यावासिनी गोपियोंके आख्यानके प्रसङ्गमें राजा विमलकी संतानके लिये चिन्ता तथा महामुनि याज्ञवल्क्यद्वारा उन्हें बहुत - सी पुत्री होनेका विश्वास दिलाना श्रीनारदजी कहते हैं - राजन्! अब अयोध्या-वासिनी गोपियोंका वर्णन सुनो, जो चारों पदार्थोंको देनेवाला तथा साक्षात् श्रीकृष्णकी प्राप्ति करानेवाला सर्वोत्कृष्ट साधन है ॥ १ ॥
मिथिलेश्वर! सिन्धुदेशमें चम्पका नामसे प्रसिद्ध एक नगरी थी, जिसमें धर्मपरायण विमल नामक राजा हुए थे । वे कुबेरके समान कोषसे सम्पन्न तथा सिंहके समान मनस्वी थे । वे भगवान् विष्णुके भक्त और प्रशान्तचित्त महात्मा थे । वे अपनी अविचल भक्तिके कारण मूर्तिमान् प्रह्लाद - से प्रतीत होते थे । उन भूपालके छः हजार रानियाँ थीं । वे सब की सब सुन्दर रूपवाली * आठ सात्त्विक भावोंके नाम इस प्रकार हैं-तथा कमलनयनी थीं, परंतु भाग्यवश वे वन्ध्या हो गयीं । राजन्! ' मुझे किस पुण्यसे उत्तम संतानकी प्राप्ति होगी? ' - ऐसा विचार करते हुए राजा विमलके बहुत वर्ष व्यतीत हो गये॥२-५ ॥ एक दिन उनके यहाँ मुनिवर याज्ञवल्क्य पधारे । राजाने उनको प्रणाम करके उनका विधिवत् पूजन किया और फिर उनके सामने वे विनीतभावसे खड़े हो गये । नृपतिशिरोमणि राजाको चिन्तासे आकुल देख सर्वज्ञ, सर्ववित् तथा शान्तस्वरूप महामुनि याज्ञवल्क्यने उनसे पूछा ॥ ६-७ ॥ याज्ञवल्क्य बोले— राजन्! तुम दुर्बल क्यों हो स्तम्भः स्वेदोऽथ रोमाञ्चः स्वरभङ्गोऽथ वेपथुः । वैवर्ण्यमश्रु प्रलय इत्यष्टौ सात्त्विका मताः ॥ ' अङ्गोंका अकड़ जाना, पसीना होना, रोमाञ्च हो आना, बोलते समय आवाजका बदल जाना, शरीरमें कम्पन होना, मुँहका रंग उड़ जाना, नेत्रोंसे आँसू बहना तथा मरणान्तिक अवस्थातक पहुँच जाना - ये आठ प्रेमके सात्त्विक भाव माने गये हैं । '
पृष्ठ 155
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अध्याय ६ ] अयोध्यापुरवासिनी स्त्रियोंका राजा गये हो? तुम्हारे हृदयमें कौन- सी चिन्ता खड़ी हो गयी है? इस समय तुम्हारे राज्यके सातों अङ्गोंमें तो कुशल-मङ्गल ही दिखायी देता है? ॥ ८ ॥
विमलने कहा— ब्रह्मन्! आप अपनी तपस्या एवं दिव्यदृष्टिसे क्या नहीं जानते हैं? तथापि आपकी आज्ञाका गौरव मानकर मैं अपना कष्ट बता रहा हूँ । मुनिश्रेष्ठ! मैं संतानहीनताके दुःखसे चिन्तित हूँ । कौन - सा तप और दान करूँ, जिससे मुझे संतानकी प्राप्ति हो ॥ ९ -१० ॥ श्रीनारदजी कहते हैं - विमलकी यह बात सुनकर याज्ञवल्क्यमुनिके नेत्र ध्यानमें स्थित हो गये । वे मुनिश्रेष्ठ भूत और वर्तमानका चिन्तन करते हुए दीर्घकालतक ध्यानमें मग्न रहे ॥ ११ ॥
याज्ञवल्क्य बोले— राजेन्द्र! इस जन्ममें तो तुम्हारे भाग्यमें पुत्र नहीं है, नहीं है, परंतु नृपश्रेष्ठ! तुम्हें पुत्रियाँ करोड़ोंकी संख्यामें प्राप्त होंगी ॥ १२ ॥
राजाने कहा – मुनीन्द्र! पुत्रके बिना कोई भी इस भूतलपर पूर्वजोंके ऋणसे मुक्त नहीं होता । पुत्रहीनके घरमें सदा ही व्यथा बनी रहती है । उसे इस लोक या परलोकमें कुछ भी सुख नहीं मिलता ॥ १३ ॥
याज्ञवल्क्य बोले- राजेन्द्र! खेद न करो । भविष्यमें भगवान् श्रीकृष्णका अवतार होनेवाला है । तुम उन्हींको दहेजके साथ अपनी सब पुत्रियाँ समर्पित कर देना । नृपश्रेष्ठ! उसी कर्मसे तुम देवताओं, ऋषियों विमलके यहाँ पुत्रीरूपसे उत्पन्न होना १४ ९ तथा पितरोंके ऋणसे छूटकर परममोक्ष प्राप्त कर लोगे ॥ १४-१५ ॥ श्रीनारदजी कहते हैं - महामुनिका यह वचन सुनकर उस समय राजाको बड़ा हर्ष हुआ । उन्होंने महर्षि याज्ञवल्क्यसे पुनः अपना संदेह पूछा? ॥१६ ॥
राजा बोले- मुनीश्वर! कितने वर्ष बीतनेपर किस देशमें और किस कुलमें साक्षात् श्रीहरि अवतीर्ण होंगे? उस समय उनका रूप - रंग क्या होगा? ॥१७ ॥
याज्ञवल्क्य बोले – महाबाहो! इस द्वापरयुगके जो अवशेष वर्ष हैं, उन्हींमें तुम्हारे राज्यकालसे एक सौ पंद्रह वर्ष व्यतीत होनेपर यादवपुरी मथुरामें यदुकुलके भीतर भाद्रपदमास, कृष्णपक्ष, बुधवार, रोहिणी नक्षत्र, हर्षण योग, वृषलग्न, वव करण और अष्टमी तिथिमें आधी रातके समय चन्द्रोदय - कालमें, जब कि सब कुछ अन्धकारसे आच्छन्न होगा, वसुदेव - भवनमें देवकीके गर्भसे साक्षात् श्रीहरिका आविर्भाव होगा— ठीक उसी तरह जैसे यज्ञमें अरणि - काष्ठसे अग्निका प्राकट्य होता है । भगवान् के वक्षःस्थलपर श्रीवत्सका चिह्न होगा । उनकी अङ्गकान्ति मेघके समान श्याम होगी । वे वनमालासे अलंकृत और अतीव सुन्दर होंगे । पीताम्बरधारी, कमलनयन तथा अवतारकालमें चतुर्भुज होंगे । तुम उन्हें अपनी कन्याएँ देना । तुम्हारी आयु अभी बहुत है । तुम उस समयतक जीवित रहोगे, इसमें संशय नहीं है ॥ १८-२२ ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें माधुर्यखण्डके अन्तर्गत नारद - बहुलाश्व - संवादमें ' अयोध्यावासिनी गोपाङ्गनाओंका उपाख्यान ' नामक पाँचवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५ ॥
छठा अध्याय अयोध्यापुरवासिनी स्त्रियोंका राजा विमलके यहाँ पुत्रीरूपसे उत्पन्न होना; उनके विवाहके लिये राजाका मथुरामें श्रीकृष्णको देखनेके निमित्त दूत भेजना; वहाँ पता न लगनेपर भीष्मजीसे अवतार - रहस्य जानकर उनका श्रीकृष्णके पास दूत प्रेषित करना श्रीनारदजी कहते हैं— राजन्! यों कहकर जब रानियोंके गर्भसे पुत्रीरूपमें प्रकट हुईं । वे सभी साक्षात् महामुनि याज्ञवल्क्य चले गये, तब चम्पका राजकन्याएँ बड़ी सुन्दरी थीं । उन्हें विवाहके योग्य नगरीके स्वामी राजा विमलको बड़ा हर्ष हुआ । अवस्थामें देखकर नृपशिरोमणि चम्पकेश्वरको चिन्ता अयोध्यापुरवासिनी स्त्रियाँ श्रीरामके वरदानसे उनकी हुई । उन्होंने याज्ञवल्क्यजीकी बातको याद करके
पृष्ठ 156
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१५० गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ माधुर्यखण्ड दूतसे कहा ॥ १ - ३ ॥ विमल बोले – दूत! तुम मथुरा जाओ और वहाँ शूरपुत्र वसुदेवके सुन्दर घरतक पहुँचकर देखो । वसुदेवका कोई बहुत सुन्दर पुत्र होगा । उसके वक्षःस्थलमें श्रीवत्सका चिह्न होगा, अङ्गकान्ति मेघमालाकी भाँति श्याम होगी तथा वह वनमालाधारी एवं चतुर्भुज होगा । यदि ऐसी बात हो तो मैं उसके हाथमें अपनी समस्त सुन्दरी कन्याएँ दे दूँगा ॥ ४-५ ॥ श्रीनारदजी कहते हैं - राजन्! महाराज विमलकी यह बात सुनकर वह दूत मथुरापुरीमें गया और मथुराके बड़े - बड़े लोगोंसे उसने सारी अभीष्ट बातें पूछीं । उसकी बात सुनकर मथुराके बुद्धिमान् लोग, जो कंससे डरे हुए थे, उस दूतको एकान्तमें ले जाकर उसके कानमें बहुत धीमे स्वरसे बोले ॥ ६-७ ॥ मथुरानिवासियोंने कहा - वसुदेवके जो बहुत -से पुत्र हुए, वे कंसके द्वारा मारे गये । एक छोटी - सी कन्या बच गयी थी, किंतु वह भी आकाशमें उड़ गयी । वसुदेव यहीं रहते हैं, किंतु पुत्रोंसे बिछुड़ जानेके कारण उनके मनमें बड़ा दुःख है । इस समय जो बात तुम हम लोगोंसे पूछ रहे हो, उसे और कहीं न कहना; क्योंकि इस नगरमें कंसका भय है । मथुरापुरीमें जो वसुदेवकी संतान सम्बन्धमें कोई बात करता है, उसे उनके आठवें पुत्रका शत्रु कंस भारी दण्ड देता है ॥ ८-१० ॥ श्रीनारदजी कहते हैं— राजन्! जनसाधारणकी यह बात सुनकर दूत चम्पकापुरीमें लौट गया । वहाँ जाकर राजासे उसने वह अद्भुत संवाद कह सुनाया ॥ ११ ॥
दूत बोला - महाराज! मथुरामें शूरपुत्र वसुदेव अवश्य हैं, किंतु संतानहीन होनेके कारण अत्यन्त दीनकी भाँति जीवन व्यतीत करते हैं । सुना है कि पहले उनके अनेक पुत्र हुए थे, जो कंसके हाथसे मारे गये हैं । एक कन्या बची थी, किंतु वह भी कंसके हाथसे छूटकर आकाशमें उड़ गयी । यह वृत्तान्त सुनकर मैं यदुपुरीसे धीरे - धीरे बाहर निकला । वृन्दावनमें कालिन्दीके सुन्दर एवं रमणीय तटपर विचरते हुए मैंने लताओंके समूहमें अकस्मात् एक शिशु देखा । राजन्! गोपोंके मध्य दूसरा कोई ऐसा बालक नहीं था, जिसके लक्षण उसके समान हों । उस बालकके वक्षःस्थलपर श्रीवत्सका चिह्न था । उसकी अङ्गकान्ति मेघके समान श्याम थी और वह वनमाला धारण किये अत्यन्त सुन्दर दिखायी देता था । परंतु अन्तर इतना ही है कि उस गोप-बालकके दो ही बाँहें थीं और आपने वसुदेवकुमार श्रीहरिको चतुर्भुज बताया था । नरेश्वर! बताइये, अब क्या करना चाहिये? क्योंकि मुनिकी बात झूठी नहीं हो सकती । प्रभो! जहाँ - जहाँ, जिस तरह आपकी इच्छा हो, उसके अनुसार वहाँ - वहाँ मुझे भेजिये ॥१२–१७ ॥ श्रीनारदजी कहते हैं— राजन्! राजा विमल जब इस प्रकार विस्मित होकर विचार कर रहे थे, उसी समय हस्तिनापुरसे सिन्धुदेशको जीतनेके लिये भीष्म आये ॥ १८ ॥
विमल बोले- महाबुद्धिमान् भीष्मजी! पहले याज्ञवल्क्यजीने मुझसे कहा था कि मथुरामें साक्षात् श्रीहरि वसुदेवकी पत्नी देवकीके गर्भसे प्रकट होंगे, इसमें संशय नहीं है । परंतु इस समय वसुदेवके यहाँ परमेश्वर श्रीहरिका प्राकट्य नहीं हुआ है । साथ ही ऋषिकी बात झूठी हो नहीं सकती; अतः इस समय मैं अपनी कन्याओंका दान किसके हाथमें करूँ । आप साक्षात् महाभागवत हैं और पूर्वापरकी बातें जाननेवालोंमें सबसे श्रेष्ठ हैं । बचपनसे ही आपने इन्द्रियोंपर विजय पायी है । आप वीर, धनुर्धर एवं वसुओंमें श्रेष्ठ हैं । इसलिये यह बताइये कि अब मुझे क्या करना चाहिये ॥ १ ९ –२१ ॥ श्रीनारदजी कहते हैं— गङ्गानन्दन भीष्मजी महान् भगवद्भक्त, विद्वान्, दिव्यदृष्टिसे सम्पन्न, धर्मके तत्त्वज्ञ तथा श्रीकृष्णके प्रभावको जाननेवाले थे । उन्होंने राजा विमलसे कहा ॥२२ ॥
भीष्मजी बोले — राजन्! यह एक गुप्त बात है, जिसे मैंने वेदव्यासजीके मुँहसे सुनी थी । यह प्रसङ्ग समस्त पापको हर लेनेवाला, पुण्यप्रद तथा हर्षवर्धक है; इसे सुनो । परिपूर्णतम भगवान् श्रीहरि देवताओंकी रक्षा तथा दैत्योंका वध करनेके लिये वसुदेवके घरमें अवतीर्ण हुए हैं । किंतु आधी रातके समय वसुदेव कंसके भयसे उस बालकको लेकर तुरंत गोकुल चले गये और वहाँ अपने पुत्रको यशोदाकी शय्यापर
पृष्ठ 157
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अध्याय ७ ] राजा विमलका संदेश पाकर भगवान् सुलाकर, यशोदा और नन्दकी पुत्री मायाको साथ ले, मथुरापुरीमें लौट आये । इस प्रकार श्रीकृष्ण गोकुलमें गुप्तरूपसे पलकर बड़े हुए हैं, यह बात दूसरे कोई भी मनुष्य नहीं जानते । वे ही गोपालवेषधारी श्रीहरि वृन्दावनमें ग्यारह वर्षोंतक गुप्तरूपसे वास करेंगे । फिर कंस - दैत्यका वध करके प्रकट हो जायँगे । अयोध्यापुरवासिनी जो नारियाँ श्रीरामचन्द्रजीके वरसे गोपीभावको प्राप्त हुई हैं, वे सब तुम्हारी पत्नियोंके श्रीकृष्णका उन्हें दर्शन देना १५१ गर्भसे सुन्दरी कन्याओंके रूपमें उत्पन्न हुई हैं । तुम उन गूढरूपमें विद्यमान देवाधिदेव श्रीकृष्णको अपनी समस्त कन्याएँ अवश्य दे दो । इस कार्यमें कदापि विलम्ब न करो; क्योंकि यह शरीर कालके अधीन है ॥ २३ - २ ९ ॥ यों कहकर जब सर्वज्ञ भीष्मजी हस्तिनापुरको चले गये, तब राजा विमलने नन्दनन्दनके पास अपना दूत भेजा ॥ ३० ॥
इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें माधुर्यखण्डके अन्तर्गत नारद - बहुलाश्व - संवादमें ' अयोध्यापुरवासिनी गोपिकाओंका उपाख्यान ' नामक छठा अध्याय पूरा हुआ ॥ ६ ॥
सातवाँ अध्याय राजा विमलका संदेश पाकर भगवान् श्रीकृष्णका उन्हें दर्शन और मोक्ष प्रदान करना तथा उनकी राजकुमारियोंको साथ लेकर व्रजमण्डलमें लौटना श्रीनारदजी कहते हैं - राजन्! तदनन्तर दूत पुनः सिन्धुदेशसे मथुरा - मण्डलमें आया । वृन्दावनमें विचरते हुए यमुनाके तटपर उसको श्रीकृष्णका दर्शन हुआ । एकान्तमें श्रीकृष्णको प्रणाम करके दोनों हाथ जोड़कर और उनकी परिक्रमा करके उसने धीरे - धीरे राजा विमलकी कही हुई बात दुहरायी ॥ १-२ ॥ दूतने कहा- जो स्वयं परब्रह्म परमेश्वर हैं, सबसे परे और सबके द्वारा अदृश्य हैं, जो परिपूर्ण देव पुण्यकी राशिसे भी सदा दूर - ऊपर उठे हुए हैं, तथापि संतजनोंको प्रत्यक्ष दर्शन देनेवाले हैं, उन भगवान् श्रीकृष्णको मेरा नमस्कार है । गौ, ब्राह्मण देवता, वेद, साधु पुरुष तथा धर्मकी रक्षाके लिये जो अजन्मा होनेपर भी इन दिनों कंसादि दैत्योंके वधके लिये यदुकुलमें उत्पन्न हुए हैं, उन अनन्त गुणोंके महासागर आप श्रीहरिको मेरा नमस्कार है । अहो! व्रजवासियोंका बहुत बड़ा सौभाग्य है । आपके पिता नन्दराजका कुल धन्य यह व्रजमण्डल तथा यह वृन्दावन धन्य हैं, जहाँ आप परमेश्वर श्रीहरि साक्षात् प्रकट हैं । प्रभो! आप श्रीराधारानीके कण्ठमें सुशोभित सुन्दर ( नीलमणिमय ) हार हैं, कस्तूरीकी सुगन्धकी भाँति सर्वत्र प्रसिद्ध हैं और आपका सर्वत्र फैला हुआ निर्मल यश सम्पूर्ण त्रिलोकीको तत्काल श्वेत किये देता है । आप लोगोंके चित्तका सम्पूर्ण अभिप्राय जानते हैं; क्योंकि आप समस्त क्षेत्रोंके ज्ञाता आत्मा हैं और कर्मराशिके साक्षी हैं । तथापि राजा विमलने जो परम रहस्यकी और स्वधर्मसे सम्बद्ध बात कही है, उसको मैं आपसे एकान्तमें बताऊँगा । सिन्धुदेशमें जो चम्पका नामसे प्रसिद्ध इन्द्रपुरीके समान सुन्दर नगरी है, उसके पालक राजा विमल देवराज इन्द्रके समान ऐश्वर्यशाली हैं । उनकी चित्तवृत्ति सदा आपके चरणारविन्दोंमें लगी रहती है । उन्होंने आपकी प्रसन्नताके लिये सदा सैकड़ों यज्ञोंका अनुष्ठान किया है तथा दान, तप, ब्राह्मणसेवा, तीर्थसेवन और जप आदि किये हैं । उनके इन उत्तम साधनोंको निमित्त बनाकर आप उन्हें अपना सर्वोत्कृष्ट दर्शन अवश्य दीजिये । उनकी बहुत - सी कन्याएँ हैं, जो प्रफुल्ल कमल - दलके समान विशाल नेत्रोंसे सुशोभित हैं और आप पूर्ण परमेश्वरको पतिरूपमें अपने निकट पानेके शुभ अवसरकी प्रतीक्षा करती हैं । वे राजकुमारियाँ सदा आपकी प्राप्तिके लिये नियमों और व्रतोंके पालनमें तत्पर हैं तथा आपके चरणोंकी सेवासे उनके तन, मन निर्मल हो गये हैं । व्रजके
पृष्ठ 158
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१५२ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ माधुर्यखण्ड देवता! आप अपना उत्तम और अद्भुत दर्शन देकर उन सब राजकन्याओंका पाणिग्रहण कीजिये । इस समय आपके समक्ष जो यह कर्तव्य प्राप्त हुआ है, इसका विचार करके आप सिन्धुदेशमें चलिये और वहाँके लोगोंको अपने पावन दर्शनसे विशुद्ध कीजिये ॥ ३ – ११ ॥ श्रीनारदजी कहते हैं - राजन्! उस दूतकी यह बात सुनकर भगवान् श्रीहरि बड़े प्रसन्न हुए और क्षणभरमें दूतके साथ ही चम्पकापुरीमें जा पहुँचे । उस समय राजा विमलका महान् यज्ञ चालू था । उसमें वेदमन्त्रोंकी ध्वनि गूँज रही थी । दूतसहित भगवान् श्रीकृष्ण सहसा आकाशसे उस यज्ञमें उतरे । वक्षः -स्थल श्रीवत्स चिह्नसे सुशोभित, मेघके समान श्याम कान्तिधारी, सुन्दर वनमालालंकृत, पीतपटावृत कमलनयन श्रीहरिको यज्ञभूमिमें आया देख राजा विमल सहसा उठकर खड़े हो गये और प्रेमसे विह्वल हो, दोनों हाथ जोड़ उनके चरणोंके समीप गिर पड़े । उस समय उनके अङ्ग - अङ्गमें रोमाञ्च हो आया था । फिर उठकर राजाने रत्न और सुवर्णसे जटित दिव्य सिंहासनपर भगवान्को बिठाया, उनका स्तवन किया तथा विधिवत् पूजन करके वे उनके सामने खड़े हो गये । खिड़कियोंसे झाँककर देखती हुई सुन्दरी राजकुमारियोंकी ओर दृष्टिपात करके माधव श्रीकृष्णने मेघके समान गम्भीर वाणीमें राजा विमलसे कहा ॥ १२ - १७ ॥ श्रीभगवान् बोले – महामते! तुम्हारे मनमें जो वाञ्छनीय हो, वह वर मुझसे माँगो । महामुनि याज्ञवल्क्यके वचनसे ही इस समय तुम्हें मेरा दर्शन हुआ है ॥ १८ ॥
विमलने कहा – देवदेव! मेरा मन आपके चरणारविन्दमें भ्रमर होकर निवास करे, यही मेरी इच्छा है । इसके सिवा दूसरी कोई अभिलाषा कभी मेरे मनमें नहीं होती ॥ १ ९ ॥ श्रीनारदजी कहते हैं— यों कहकर राजा विमलने अपना सारा कोश और महान् वैभव, हाथी, घोड़े एवं रथोंके साथ श्रीकृष्णार्पण कर दिया । अपने - आपको भी उनके चरणोंकी भेंट कर दिया । नरेश्वर! अपनी समस्त कन्याओंको विधिपूर्वक श्रीहरिके हाथोंमें समर्पित करके भक्ति - विह्वल राजा विमलने श्रीकृष्णको नमस्कार किया । उस समय जन मण्डलमें जय-जयकारका शब्द गूँज उठा और आकाशमें खड़े हुए देवताओंने वहाँ दिव्य पुष्पोंकी वर्षा की । फिर उसी समय राजा विमलको भगवान् श्रीकृष्णका सारूप्य प्राप्त हो गया । उनकी अङ्गकान्ति कामदेवके समान प्रकाशित हो उठी । शत सूर्योंके समान तेज धारण किये वे दिशामण्डलको उद्भासित करने लगे । उस यज्ञमें उपस्थित सम्पूर्ण मनुष्योंके देखते - देखते पत्रियोंसहित राजा विमल गरुडपर आरूढ हो भगवान् श्रीगरुडध्वजको नमस्कार करके वैकुण्ठलोकमें चले गये॥२०-२४ ॥ इस प्रकार राजाको मोक्ष प्रदान करके स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण उनकी सुन्दरी कुमारियोंको साथ ले, व्रजमण्डलमें आ गये । वहाँ रमणीय कामवनमें, जो दिव्य मन्दिरोंसे सुशोभित था, वे सुन्दरी कृष्णप्रियाएँ आकर रहने लगीं और भगवान् के साथ कन्दुक-क्रीड़ासे मन बहलाने लगीं । जितनी संख्यामें वे श्रीकृष्णप्रिया सखियाँ थीं, उतने ही रूप धारण करके सुन्दर व्रजराज श्रीकृष्ण रासमण्डलमें उनका मनोरञ्जन करते हुए विराजमान हुए । उस रासमण्डलमें उन विमलकुमारियोंके नेत्रोंसे जो आनन्दजनित जलबिन्दु च्युत होकर गिरे, उन सबसे वहाँ ' विमलकुण्ड ' नामक तीर्थ प्रकट हो गया, जो सब तीर्थोंमें उत्तम है । नृपेश्वर! विमलकुण्डका दर्शन करके, उसका जल पीकर तथा उसमें स्नान - पूजन करके मनुष्य मेरुपर्वतके समान विशाल पापको भी नष्ट कर डालता और गोलोकधाममें जाता है । जो मनुष्य अयोध्यावासिनी गोपियोंके इस कथानकको सुनेगा, वह योगिदुर्लभ परमधाम गोलोकमें जायगा ॥२५–३० ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें माधुर्यखण्डके अन्तर्गत नारद - बहुलाश्व - संवादमें ' अयोध्यापुरवासिनी गोपियोंका उपाख्यान ' नामक सातवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७ ॥
पृष्ठ 159
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
आठवाँ अध्याय यज्ञसीतास्वरूपा गोपियोंके पूछनेपर श्रीराधाका श्रीकृष्णकी प्रसन्नताके लिये एकादशी-व्रतका अनुष्ठान बताना और उसके विधि, नियम और माहात्म्यका वर्णन करना श्रीनारदजी कहते हैं - मिथिलेश्वर! अब यज्ञ-सीतास्वरूपा गोपियोंका वर्णन सुनो, जो सब पापोंको हर लेनेवाला, पुण्यदायक, कामनापूरक तथा मङ्गलका धाम है ॥ १ ॥
दक्षिण दिशामें उशीनर नामसे प्रसिद्ध एक देश है, जहाँ एक समय दस वर्षोंतक इन्द्रने वर्षा नहीं की । उस देशमें जो गोधनसे सम्पन्न गोप थे, वे अनावृष्टिके भयसे व्याकुल हो अपने कुटुम्ब और गोधनोंके साथ व्रजमण्डलमें आ गये । नरेश्वर! नन्दराजकी सहायतासे वे पवित्र वृन्दावनमें यमुनाके सुन्दर एवं सुरम्य तटपर वास करने लगे । भगवान् श्रीरामके वरसे यज्ञसीता -स्वरूपा गोपाङ्गनाएँ उन्हींके घरोंमें उत्पन्न हुईं । उन सबके शरीर दिव्य थे तथा वे दिव्य यौवनसे विभूषित थीं । नृपेश्वर! एक दिन वे सुन्दर श्रीकृष्णका दर्शन करके मोहित हो गयीं और श्रीकृष्णकी प्रसन्नताके लिये कोई व्रत पूछनेके उद्देश्यसे श्रीराधाके पास गयीं ॥२-६ ॥ गोपियाँ बोलीं- दिव्यस्वरूपे, कमललोचने, वृषभानुनन्दिनी श्रीराधे! आप हमें श्रीकृष्णकी प्रसन्नताके लिये कोई शुभव्रत बतायें । जो देवताओंके लिये भी अत्यन्त दुर्लभ हैं, वे श्रीनन्दनन्दन तुम्हारे वशमें रहते हैं । राधे! तुम विश्वमोहिनी हो और सम्पूर्ण शास्त्रोंके अर्थज्ञानमें पारंगत भी हो ॥ ७-८ ॥ श्रीराधाने कहा- प्यारी बहिनो! श्रीकृष्णकी प्रसन्नताके लिये तुम सब एकादशी व्रतका अनुष्ठान करो । उससे साक्षात् श्रीहरि तुम्हारे वशमें हो जायँगे, इसमें संशय नहीं है ॥ ९ ॥
गोपियोंने पूछा- राधिके! पूरे वर्षभरकी एकादशियोंके क्या नाम हैं, यह बताओ । प्रत्येक मासमें एकादशीका व्रत किस भावसे करना चाहिये? ॥ १० ॥
श्रीराधाने कहा – गोपकुमारियो! मार्गशीर्ष मासके कृष्णपक्षमें भगवान् विष्णुके शरीरसे-मुख्यतः उनके मुखसे एक असुरका वध करनेके लिये एकादशीकी उत्पत्ति हुई, अतः वह तिथि अन्य सब तिथियोंसे श्रेष्ठ है । प्रत्येक मासमें पृथक् - पृथक् एकादशी होती है । वही सब व्रतोंमें उत्तम है । मैं तुम सबके हितकी कामनासे उस तिथिके छब्बीस नाम बता रही हूँ । ( मार्गशीर्ष कृष्ण एकादशीसे आरम्भ करके कार्तिक शुक्ला एकादशीतक चौबीस एकादशी तिथियाँ होती हैं । उनके नाम क्रमशः इस प्रकार हैं - ) उत्पन्ना, मोक्षा, सफला, पुत्रदा, षट्तिला, जया, विजया, आमलकी, पापमोचनी, कामदा, वरूथिनी, मोहिनी, अपरा, निर्जला, योगिनी, देवशयनी, कामिनी, पवित्रा, अजा, पद्मा, इन्दिरा, पापाङ्कुशा, रमा तथा प्रबोधिनी । दो एकादशी तिथियाँ मलमासकी होती हैं । उन दोनोंका नाम सर्वसम्पत्प्रदा है । इस प्रकार जो एकादशीके छब्बीस नामोंका पाठ करता है, वह भी वर्षभरकी द्वादशी ( एकादशी ) तिथियोंके व्रतका फल पा लेता है ॥ ११ - १७३ ॥ व्रजाङ्गनाओ! अब एकादशी व्रतके नियम सुनो! मनुष्यको चाहिये कि वह दशमीको एक ही समय भोजन करे और रातमें जितेन्द्रिय रहकर भूमिपर शयन करे । जल भी एक ही बार पीये । धुला हुआ वस्त्र पहने और तन- मनसे अत्यन्त निर्मल रहे । फिर ब्राह्म-मुहूर्तमें उठकर एकादशीको श्रीहरिके चरणोंमें प्रणाम करे । तदनन्तर शौचादिसे निवृत्त हो स्नान करे । कुएँका स्नान सबसे निम्नकोटिका है, बावड़ीका स्नान मध्यमकोटिका है, तालाब और पोखरेका स्नान उत्तम श्रेणीमें गिना गया है और नदीका स्नान उससे भी उत्तम है । इस प्रकार स्नान करके व्रत करनेवाला नरश्रेष्ठ क्रोध और लोभका त्याग करके उस दिन नीचों और पाखण्डी
पृष्ठ 160
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१५४ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ माधुर्यखण्ड मनुष्योंसे बात न करे । जो असत्यवादी, ब्राह्मणनिन्दक, दुराचारी, अगम्या स्त्रीके साथ समागममें रत रहनेवाले, परधनहारी, परस्त्रीगामी, दुर्वृत्त तथा मर्यादाका भङ्ग करनेवाले हैं, उनसे भी व्रती मनुष्य बात न करे । मन्दिरमें भगवान् केशवका पूजन करके वहाँ नैवेद्य लगवाये और भक्तियुक्त चित्तसे दीपदान करे । ब्राह्मणोंसे कथा सुनकर उन्हें दक्षिणा दे, रातको जागरण करे और श्रीकृष्ण - सम्बन्धी पदोंका गान एवं कीर्तन करे । वैष्णवव्रत ( एकादशी ) का पालन करना हो तो दशमीको काँसेका पात्र, मांस, मसूर, कोदो, चना, साग, शहद, पराया अन्न, दुबारा भोजन तथा मैथुन – इन दस वस्तुओंको त्याग दे । जुएका खेल, निद्रा, मद्य - पान, दन्तधावन, परनिन्दा, चुगली, चोरी, हिंसा, रति, क्रोध और असत्य भाषण -एकादशीको इन ग्यारह वस्तुओंका त्याग कर देना चाहिये । काँसेका पात्र, मांस, शहद, तेल, मिथ्याभोजन, पिठ्ठी, साठीका चावल और मसूर आदिका द्वादशीको सेवन न करे । इस विधिसे उत्तम एकादशीव्रतका अनुष्ठान करे ॥ १८-३० ॥ गोपियाँ बोलीं- परमबुद्धिमती श्रीराधे! एकादशीव्रतका समय बताओ । उससे क्या फल होता है, यह भी कहो तथा एकादशीके माहात्म्यका भी यथार्थरूपसे वर्णन करो ॥ ३१ ॥
श्रीराधाने कहा - यदि दशमी पचपन घड़ी ( दण्ड ) तक देखी जाती हो तो वह एकादशी त्याज्य है । फिर तो द्वादशीको ही उपवास करना चाहिये । यदि पलभर भी दशमीसे वेध प्राप्त हो तो वह सम्पूर्ण एकादशी तिथि त्याग देनेयोग्य है - ठीक उसी तरह, जैसे मदिराकी एक बूँद भी पड़ जाय तो गङ्गाजलसे भरा हुआ कलश त्याज्य हो जाता है । यदि एकादशी बढ़कर द्वादशीके दिन भी कुछ कालतक विद्यमान हो तो दूसरे दिनवाली एकादशी ही व्रतके योग्य है । पहली एकादशीको उस व्रतमें उपवास नहीं करना चाहिये ॥ ३२ - ३४ ॥ व्रजाङ्गनाओ! अब मैं तुम्हें इस एकादशी व्रतका फल बता रही हूँ, जिसके श्रवणमात्रसे वाजपेय यज्ञका फल मिलता है । जो अट्ठासी हजार ब्राह्मणोंको भोजन कराता है, उसको जिस फलकी प्राप्ति होती है, उसीको एकादशीका व्रत करनेवाला मनुष्य उस व्रतके पालन-मात्रसे पा लेता है । जो समुद्र और वनोंसहित सारी वसुंधराका दान करता है, उसे प्राप्त होनेवाले पुण्यसे भी हजारगुना पुण्य एकादशीके महान् व्रतका अनुष्ठान करनेसे सुलभ हो जाता है । जो पापपङ्कसे भरे हुए संसार सागरमें डूबे हैं, उनके उद्धारके लिये एकादशी -का व्रत ही सर्वोत्तम साधन है । रात्रिकालमें जागरण-पूर्वक एकादशी - व्रतका पालन करनेवाला मनुष्य यदि सैकड़ों पापोंसे युक्त हो तो भी यमराजके रौद्ररूपका दर्शन नहीं करता । जो द्वादशीको तुलसीदलसे भक्ति-पूर्वक श्रीहरिका पूजन करता है, वह जलसे कमल-पत्रकी भाँति पापसे लिप्त नहीं होता । सहस्त्रों अश्वमेध तथा सैकड़ों राजसूययज्ञ भी एकादशीके उपवासकी सोलहवीं कलाके बराबर नहीं हो सकते । एकादशीका व्रत करनेवाला मनुष्य मातृकुलकी दस, पितृकुलकी दस तथा पत्नीके कुलकी दस पीढ़ियोंका उद्धार कर देता है । जैसी शुपक्षकी एकादशी है, वैसी ही कृष्णपक्षकी भी है; दोनोंका समान फल है । दुधारू गाय जैसी सफेद वैसी काली - दोनोंका दूध एक - सा ही होता है । गोपियो! मेरु और मन्दराचलके बराबर बड़े - बड़े सौ जन्मोंके पाप एक ओर और एक ही एकादशीका व्रत दूसरी ओर हो तो वह उन पर्वतोपम पापको उसी प्रकार जलाकर भस्म कर देती है, जैसे आगकी चिनगारी रूईके ढेरको दग्ध कर देती है॥३५–४४ ॥ गोपङ्गनाओ! विधिपूर्वक हो या अविधिपूर्वक, यदि द्वादशीको थोड़ा - सा भी दान कर दिया जाय तो वह मेरु पर्वतके समान महान् हो जाता है । जो एकादशीके दिन भगवान् विष्णुकी कथा सुनता है, वह सात द्वीपोंसे युक्त पृथ्वीके दानका फल पाता है । यदि मनुष्य शङ्खोद्धारतीर्थमें स्नान करके गदाधर देव दर्शनका महान् पुण्य संचित कर ले तो भी वह पुण्य एकादशीके उपवासकी सोलहवीं कलाकी भी समानता नहीं कर सकता है । प्रभास, कुरुक्षेत्र, केदार, बदरिकाश्रम, काशी तथा सूकरक्षेत्रमें चन्द्रग्रहण, सूर्यग्रहण तथा चार लाख संक्रान्तियोंके अवसरपर