गर्ग संहिता — पृष्ठ 161–170

गर्ग संहिता · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 161–170

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अध्याय ९ ] पूर्वकालमें एकादशी व्रत करके मनोवाञ्छित फल पानेवालोंका परिचय १५५ मनुष्योंद्वारा जो दान दिया गया हो, वह भी एकादशीके उपवासकी सोलहवीं कलाके बराबर नहीं है । गोपियो! जैसे नागोंमें शेष, पक्षियोंमें गरुड़, देवताओंमें विष्णु, वर्णोंमें ब्राह्मण, वृक्षोंमें पीपल तथा पत्रोंमें तुलसीदल सबसे श्रेष्ठ है, उसी प्रकार व्रतोंमें एकादशी तिथि सर्वोत्तम है । जो मनुष्य दस इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें माधुर्यखण्डके अन्तर्गत हजार वर्षोंतक घोर तपस्या करता है, उसके समान ही फल वह मनुष्य भी पा लेता है, जो एकादशीका व्रत करता है । व्रजाङ्गनाओ! इस प्रकार मैंने तुमसे एकादशियोंके फलका वर्णन किया । अब तुम शीघ्र इस व्रतको आरम्भ करो । बताओ, अब और क्या सुनना चाहती हो? ॥ ४५–५३ ॥ श्रीनारद - बहुलाश्व - संवादमें ' यज्ञसीताओंका उपाख्यान एवं एकादशी - माहात्म्य ' नामक आठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८ ॥

नवाँ अध्याय पूर्वकालमें एकादशीका व्रत करके मनोवाञ्छित फल पानेवाले पुण्यात्माओंका परिचय तथा यज्ञसीतास्वरूपा गोपिकाओं को एकादशी - व्रतके प्रभावसे श्रीकृष्ण - सांनिध्यकी प्राप्ति गोपियाँ बोलीं – सम्पूर्ण शास्त्रोंके अर्थज्ञानमें पारंगत सुन्दरी वृषभानु- नन्दिनी! तुम अपनी वाणीसे बृहस्पति मुनिकी वाणीका अनुकरण करती हो । राधे! यह एकादशी - व्रत पहले किसने किया था? यह हमें विशेषरूपसे बताओ; क्योंकि तुम साक्षात् ज्ञानकी निधि हो ॥ १-२ ॥ श्रीराधाने कहा — गोपियो! सबसे पहले देवताओंने अपने छीने गये राज्यकी प्राप्ति तथा दैत्योंके विनाशके लिये एकादशीव्रतका अनुष्ठान किया था । राजा वैशन्तने पूर्वकालमें यमलोकगत पिताके उद्धारके लिये एकादशी व्रत किया था । लुम्पक नामके एक राजाको उसके पापके कारण कुटुम्बी - जनोंने अकस्मात् त्याग दिया था । लुम्पकने भी एकादशीका व्रत किया और उसके प्रभावसे अपना खोया हुआ राज्य प्राप्त कर लिया । भद्रावती नगरीमें पुत्रहीन राजा केतुमान्ने संतोंके कहनेसे एकादशी व्रतका अनुष्ठान किया और उन्हें पुत्रकी प्राप्ति हो गयी । एक ब्राह्मणीको देवपत्नियोंने एकादशी व्रतका पुण्य प्रदान किया, जिससे उस मानवीने धन - धान्य तथा स्वर्गका सुख प्राप्त किया । पुष्पदन्ती और माल्यवान् — दोनों इन्द्रके शापसे पिशाचभावको प्राप्त हो गये थे । उन दोनोंने एकादशीका व्रत किया और उसके पुण्य - प्रभावसे उन्हें पुनः गन्धर्वत्वकी प्राप्ति हो गयी । पूर्वकालमें श्रीरामचन्द्रजीने समुद्रपर सेतु बाँधने तथा रावणका वध करनेके लिये एकादशीका व्रत किया था । प्रलयके अन्तमें उत्पन्न हुए आँवलेके वृक्षके नीचे बैठकर देवताओंने सबके कल्याणके लिये एकादशी-का व्रत किया था । पिताकी आज्ञासे मेधावीने एकादशीका व्रत किया, जिससे वे अप्सराके साथ सम्पर्कके दोषसे मुक्त हो निर्मल तेजसे सम्पन्न हो गये । ललित नामक गन्धर्व अपनी पत्नीके साथ ही शापवश राक्षस हो गया था, किंतु एकादशी व्रतके अनुष्ठानसे उसने पुनः गन्धर्वत्व प्राप्त कर लिया । एकादशीके व्रतसे ही राजा मांधाता, सगर, ककुत्स्थ और महामति मुचुकुन्द पुण्यलोकको प्राप्त हुए । धुन्धुमार आदि अन्य बहुत - से राजाओंने भी एकादशी व्रतके प्रभावसे ही सद्गति प्राप्त की तथा भगवान् शंकर ब्रह्मकपालसे मुक्त हुए । कुटुम्बीजनोंसे परित्यक्त महादुष्ट वैश्य - पुत्र धृष्टबुद्धि एकादशीव्रत करके ही वैकुण्ठलोकमें गया था । राजा रुक्माङ्गदने भी एकादशीका व्रत किया था और उसके प्रभावसे भूमण्डलका राज्य भोगकर वे पुरवासियोंसहित वैकुण्ठलोकमें पधारे थे । राजा अम्बरीषने भी एकादशीका व्रत किया था, जिससे कहीं भी प्रतिहत न होनेवाला ब्रह्मशाप उन्हें छू न सका ।

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१५६ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ माधुर्यखण्ड हेममाली नामक यक्ष कुबेरके शापसे कोढ़ी हो गया था, किंतु एकादशी व्रतका अनुष्ठान करके वह पुन: चन्द्रमाके समान कान्तिमान् हो गया । राजा महीजित्ने भी एकादशीका व्रत किया था, जिसके प्रभावसे सुन्दर पुत्र प्राप्तकर वे स्वयं भी वैकुण्ठगामी हुए । राजा हरिश्चन्द्रने भी एकादशीका व्रत किया था, जिससे पृथ्वीका राज्य भोगकर वे अन्तमें पुरवासियोंसहित वैकुण्ठ - धामको गये । पूर्वकालके सत्ययुगमें राजा मुचुकुन्दका दामाद शोभन भारतवर्षमें एकादशीका उपवास करके उसके पुण्य - प्रभावसे देवताओंके साथ मन्दराचलपर चला गया । वह आज भी वहाँ अपनी रानी चन्द्रभागाके साथ कुबेरकी भाँति राज्यसुख भोगता है । गोपियो! एकादशीको सम्पूर्ण तिथियोंकी परमेश्वरी समझो । उसकी समानता करनेवाली दूसरी कोई तिथि नहीं है ॥ ३ - २२ ॥ श्रीनारदजी कहते हैं— राजन्! श्रीराधाके मुख-से इस प्रकार एकादशीकी महिमा सुनकर यज्ञसीता-स्वरूपा गोपिकाओंने श्रीकृष्ण - दर्शनकी लालसासे विधिपूर्वक एकादशी व्रतका अनुष्ठान किया । एकादशी-व्रतसे प्रसन्न हुए साक्षात् भगवान् श्रीहरिने मार्गशीर्ष मासकी पूर्णिमाकी रातमें उन सबके साथ रास किया ॥ २३-२४ ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें माधुर्यखण्डके अन्तर्गत नारद - बहुलाश्व - संवादमें यज्ञसीतोपाख्यानके प्रसङ्गमें ' एकादशीका माहात्म्य ' नामक नवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९ ॥

दसवाँ अध्याय पुलिन्द - कन्यारूपिणी गोपियोंके सौभाग्यका वर्णन श्रीनारदजी कहते हैं- अब पुलिन्द ( कोल -भील ) जातिकी स्त्रियोंका, जो गोपी भावको प्राप्त हुई थीं, मैं वर्णन करता हूँ । यह वर्णन समस्त पापका अपहरण करनेवाला, पुण्यजनक, अद्भुत और भक्ति-भावको बढ़ानेवाला है ॥१ ॥

विन्ध्याचलके वनमें कुछ पुलिन्द ( कोल - भील ) निवास करते थे । वे उद्भट योद्धा थे और केवल राजाका धन लूटते थे । गरीबोंकी कोई चीज कभी नहीं छूते थे । विन्ध्यदेशके बलवान् राजाने कुपित हो दो अक्षौहिणी सेनाओंके द्वारा उन सभी पुलिन्दोंपर घेरा डाल दिया । वे पुलिन्द भी तलवारों, भालों, शूलों, फरसों, शक्तियों, ऋष्टियों, भुशुण्डियों और तीर-कमानोंसे कई दिनोंतक राजकीय सैनिकोंके साथ युद्ध करते रहे । ( विजयकी आशा न देखकर ) उन्होंने सहायताके लिये यादवोंके राजा कंसके पास पत्र भेजा । तब कंसकी आज्ञासे बलवान् दैत्य प्रलम्ब वहाँ आया । उसका शरीर दो योजन ऊँचा था । देहका रंग मेघोंकी काली घटाके समान काला था । माथेपर मुकुट तथा कानोंमें कुण्डल धारण किये वह दैत्य सर्पोंकी मालासे विभूषित था । उसके पैरोंमें सोनेकी साँकल थी और हाथमें गदा लेकर वह दैत्य कालके समान जान पड़ता था । उसकी जीभ लपलपा रही थी और रूप बड़ा भयंकर था । वह शत्रुओंपर पर्वतकी चट्टानें तथा बड़े - बड़े वृक्ष उखाड़कर फेंकता था । पैरोंकी धमकसे धरतीको कँपाते हुए रणदुर्मद दैत्य प्रलम्बको देखते ही भयभीत तथा पराजित हो विन्ध्य-नरेश सेनासहित समराङ्गण छोड़कर सहसा भाग चले, मानो सिंहको देखकर हाथी भाग जाता हो । तब प्रलम्ब उन सब पुलिन्दोंको साथ ले पुनः मथुरापुरीको लौट आया ॥२ – ९ ॥ वे सभी पुलिन्द कंसके सेवक हो गये । नृपेश्वर! उन सबने अपने कुटुम्बके साथ कामगिरिपर निवास किया । उन्हींके घरोंमें भगवान् श्रीरामके उत्कृष्ट वरदानसे वे पुलिन्द - स्त्रियाँ दिव्य कन्याओंके रूपमें प्रकट हुईं, जो मूर्तिमती लक्ष्मीकी भाँति पूजित एवं प्रशंसित होती थीं । श्रीकृष्णके दर्शनसे उनके हृदयमें प्रेमकी पीडा जाग उठी । वे पुलिन्द - कन्याएँ प्रेमसे विह्वल हो भगवान्‌की श्रीसम्पन्न चरणरजको सिरपर

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अध्याय ११ ] लक्ष्मीजीकी सखियोंका वृषभानुओंके घरोंमें कन्यारूपसे उत्पन्न होना १५७ धारण करके दिन - रात उन्हींके ध्यान एवं चिन्तनमें डूबी रहती थीं । वे भी भगवान्‌की कृपासे रासमें आ पहुँचीं और साक्षात् गोलोकके अधिपति, सर्वसमर्थ, परिपूर्णतम परमेश्वर श्रीकृष्णको उन्होंने सदाके लिये प्राप्त कर लिया । अहो! इन पुलिन्द - कन्याओंका कैसा महान् सौभाग्य है कि देवताओंके लिये भी परम दुर्लभ श्रीकृष्ण चरणारविन्दोंकी रज उन्हें विशेषरूपसे प्राप्त हो गयी । जिसकी भगवान्‌के परम उत्कृष्ट पाद - पद्म - परागमें सुदृढ़ भक्ति है, वह न तो ब्रह्माजीका पद, न महेन्द्रका स्थान, न निरन्तर -स्थायी सार्वभौम सम्राट्का पद, न पाताललोकका आधिपत्य, न योगसिद्धि और न अपुनर्भव ( मोक्ष ) को ही चाहता है । जो अकिंचन हैं, अपने किये हुए कर्मोंके फलसे विरक्त हैं, वे हरि - चरण - रजमें आसक्त भगवान्‌के स्वजन महात्मा भक्त मुनि जिस पदका सेवन करते हैं, वही निरपेक्ष सुख है; दूसरे लोग जिसे सुख कहते हैं, वह वास्तवमें निरपेक्ष नहीं है * ॥१०–१६ ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें माधुर्यखण्डके अन्तर्गत नारद - बहुलाश्व - संवादमें ' पुलिन्दी - उपाख्यान ' नामक दसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १० ॥

ग्यारहवाँ अध्याय लक्ष्मीजीकी सखियोंका वृषभानुओंके घरोंमें कन्यारूपसे उत्पन्न होकर माघ मासके व्रतसे श्रीकृष्णको रिझाना और पाना श्रीनारदजी कहते हैं- मिथिलेश्वर! अब दूसरी गोपियोंका भी वर्णन सुनो, जो समस्त पापोंको हर लेनेवाला, पुण्यदायक तथा श्रीहरिके प्रति भक्ति -भावकी वृद्धि करनेवाला है ॥ १ ॥

राजन्! व्रजमें छः वृषभानु उत्पन्न हुए हैं, जिनके नाम इस प्रकार हैं — नीतिवित्, मार्गद, शुक्ल, पतङ्ग, दिव्यावाहन तथा गोपेष्ट ( ये नामानुरूप गुणोंवाले थे ) । उनके घरमें लक्ष्मीपति नारायणके वरदानसे जो कुमारियाँ उत्पन्न हुईं, उनमेंसे कुछ तो रमा वैकुण्ठ-वासिनी और कुछ समुद्रसे उत्पन्न हुई लक्ष्मीजीकी सखियाँ थीं, कुछ अजितपदवासिनी और कुछ ऊर्ध्व-वैकुण्ठलोकनिवासिनी देवियाँ थीं, कुछ लोकाचल-वासिनी समुद्रसम्भवा लक्ष्मी - सहचारियाँ थीं । उन्होंने सदा श्रीगोविन्दके चरणारविन्दका चिन्तन करते हुए * परिपूर्णतमं साक्षाद्गोलोकाधिपतिं प्रभुम् ॥ श्रीकृष्णचरणाम्भोजरजो देवैः सुदुर्लभम् । अहोभाग्यं माघ मासका व्रत किया । उस व्रतका उद्देश्य था— श्रीकृष्णको प्रसन्न करना । माघ मासके शुक्लपक्षकी पञ्चमी तिथिको, जो भावी वसन्तके शुभागमनका सूचक प्रथम दिन है, उनके प्रेमकी परीक्षा लेनेके लिये श्रीकृष्ण उनके घरके निकट आये । वे व्याघ्रचर्मका वस्त्र पहने, जटाके मुकुट बाँधे, समस्त अङ्गोंमें विभूति रमाये योगीके वेषमें सुशोभित हो, वेणु बजाते हुए जगत्के लोगोंका मन मोह रहे थे । अपनी गलियोंमें उनका शुभागमन हुआ देख सब ओरसे मोहित एवं प्रेम - विह्वल हुई गोपाङ्गनाएँ उस तरुण योगीका दर्शन करनेके लिये आयीं । उन अत्यन्त सुन्दर योगीको देखकर प्रेम और आनन्दमें डूबी हुई समस्त गोपकन्याएँ परस्पर कहने लगीं ॥२- ९ ॥ गोपियाँ बोलीं- यह कौन बालक है, जिसकी पुलिन्दीनां तासां प्राप्तं विशेषतः ॥

यः पारमेष्ठ्यमखिलं न महेन्द्रधिष्ण्यं नो सार्वभौममनिशं न रसाधिपत्यम् ।

नो योगसिद्धिमभितो न पुनर्भवं वा वाञ्छत्यलं परमपादरजस्सुभक्तः ॥

निष्किञ्चनाः स्वकृतकर्मफलैर्विरागा यत्तत्पदं हरिजना मुनयो महान्तः ।

भक्ता जुषन्ति हरिपादरजः प्रसक्ता अन्ये वदन्ति न सुखं किल नैरपेक्ष्यम् ॥

( गर्ग, माधुर्य १० । १३ –१६ )

पृष्ठ 164

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१५८ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ माधुर्यखण्ड आकृति नन्दनन्दनसे ठीक - ठीक मिलती - जुलती है; अथवा यह किसी धनी राजाका पुत्र होगा, जो अपनी स्त्रीके कठोर वचनरूपी बाणसे मर्म बिंध जानेके कारण घरसे विरक्त हो गया और सारे कृत्यकर्म छोड़ बैठा है । यह अत्यन्त रमणीय है । इसका शरीर कैसा सुकुमार हैं! यह कामदेवके समान सारे विश्वका मन मोह लेनेवाला है । अहो! इसकी माता, इसके पिता, इसकी पत्नी और इसकी बहिन इसके बिना कैसे जीवित होंगी? यह विचार करके सब ओरसे झुंड -की - झुंड व्रजाङ्गनाएँ उनके पास आ गयीं और प्रेमसे विह्वल तथा आश्चर्यचकित हो उन योगीश्वरसे पूछने लगीं ॥१०–१२ ॥ गोपियोंने पूछा- योगीबाबा! तुम्हारा नाम क्या है? मुनिजी! तुम रहते कहाँ हो? तुम्हारी वृत्ति क्या है और तुमने कौन - सी सिद्धि पायी है? वक्ताओंमें श्रेष्ठ! हमें ये सब बातें बताओ ॥ १३ ॥

सिद्धयोगीने कहा- मैं योगेश्वर हूँ और सदा मानसरोवरमें निवास करता हूँ । मेरा नाम स्वयंप्रकाश है । मैं अपनी शक्तिसे सदा बिना खाये पीये ही रहता हूँ । व्रजाङ्गनाओ! परमहंसोंका जो अपना स्वार्थ -आत्मसाक्षात्कार है, उसीकी सिद्धिके लिये मैं जा रहा हूँ । मुझे दिव्यदृष्टि प्राप्त हो चुकी है । मैं भूत, भविष्य और वर्तमान तीनों कालोंकी बातें जानता हूँ । मन्त्र-विद्याद्वारा उच्चाटन, मारण, मोहन, स्तम्भन तथा वशीकरण भी जानता हूँ॥१४–१६ ॥ गोपियोंने पूछा — योगीबाबा! तुम तो बड़े बुद्धिमान् हो । यदि तुम्हें तीनों कालोंकी बातें ज्ञात हैं तो बताओ न, हमारे मनमें क्या है? ॥ १७ ॥

सिद्धयोगीने कहा – यह बात तो आप-लोगोंके कानमें कहनेयोग्य है । अथवा यदि आप-लोगोंकी आज्ञा हो तो सब लोगोंके सामने ही कह डालूँ ॥ १८ ॥

गोपियाँ बोलीं- मुने! तुम सचमुच योगेश्वर हो । तुम्हें तीनों कालोंका ज्ञान है, इसमें संशय नहीं । यदि तुम्हारे वशीकरण - मन्त्रसे, उसके पाठ करनेमात्रसे तत्काल वे यहीं आ जायँ, जिनका कि हम मन - ही-मन चिन्तन करती हैं, तब हम मानेंगी कि तुम मन्त्रज्ञों में सबसे श्रेष्ठ हो ॥१ ९ -२० ॥ सिद्धयोगीने कहा – व्रजाङ्गनाओ! तुमने तो ऐसा भाव व्यक्त किया है, जो परम दुर्लभ और दुष्कर है; तथापि मैं तुम्हारी मनोनीत वस्तुको प्रकट करूँगा; क्योंकि सत्पुरुषोंकी कही हुई बात झूठ नहीं होती । व्रजकी वनिताओ! चिन्ता न करो; अपनी आँखें मूँद लो । तुम्हारा कार्य अवश्य सिद्ध होगा, इसमें संशय नहीं है ॥ २१-२२ ॥ श्रीनारदजी कहते हैं- राजन्! ' बहुत अच्छा ' कहकर जब गोपियोंने अपनी आँखें मूँद लीं, तब भगवान् श्रीहरि योगीका रूप छोड़कर श्रीनन्दनन्दनके रूपमें प्रकट हो गये । गोपियोंने आँखें खोलकर देखा तो सामने नन्दनन्दन सानन्द मुस्करा रहे हैं । पहले तो वे अत्यन्त विस्मित हुई; फिर योगीका प्रभाव जाननेपर उन्हें हर्ष हुआ और प्रियतमका वह मोहन रूप देखकर वे मोहित हो गयीं । तदनन्तर माघ मासके महारासमें पावन वृन्दावनके भीतर श्रीहरिने उन गोपाङ्गनाओंके साथ उसी प्रकार विहार किया, जैसे देवाङ्गनाओंके साथ देवराज इन्द्र करते हैं ॥ २३ - २५ ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें माधुर्यखण्डके अन्तर्गत नारद - बहुलाश्व - संवादमें रमावैकुण्ठ, श्वेतद्वीप, ऊर्ध्ववैकुण्ठ, अजितपद तथा श्रीलोकाचलमें निवास करनेवाली ' लक्ष्मीजीकी सखियोंके गोपीरूपमें प्रकट होनेका आख्यान ' नामक ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११ ॥

पृष्ठ 165

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बारहवाँ अध्याय दिव्यादिव्य, त्रिगुणवृत्तिमयी भूतल - गोपियोंका वर्णन तथा श्रीराधासहित गोपियोंकी श्रीकृष्णके साथ होली श्रीनारदजी कहते हैं - मिथिलेश्वर! यह मैंने तुमसे गोपियोंके शुभ चरित्रका वर्णन किया है, अब दूसरी गोपियोंका वर्णन सुनो । वीतिहोत्र, अग्निभुक्, साम्बु, श्रीकर, गोपति, श्रुत, व्रजेश, पावन तथा शान्त — ये व्रजमें उत्पन्न हुए नौ उपनन्दोंके नाम हैं । वे सब - के - सब धनवान्, रूपवान्, पुत्रवान् बहुत से शास्त्रोंका ज्ञान रखनेवाले, शील - सदाचारादि गुणोंसे सम्पन्न तथा दानपरायण हैं । इनके घरोंमें देवताओंकी आज्ञाके अनुसार जो कन्याएँ उत्पन्न हुईं, उनमेंसे कोई दिव्य, कोई अदिव्य तथा कोई त्रिगुणवृत्तिवाली थीं । वे सब नाना प्रकारके पूर्वकृत पुण्योंके फलस्वरूप भूतलपर गोपकन्याओंके रूपमें प्रकट हुई थीं । विदेहराज! वे सब श्रीराधिकाके साथ रहनेवाली उनकी सखियाँ थीं । एक दिनकी बात है, होलिका -महोत्सवपर श्रीहरिको आया हुआ देख उन समस्त व्रजगोपिकाओंने मानिनी श्रीराधासे कहा ॥ १-६ ॥ गोपियाँ बोलीं– रम्भोरु! चन्द्रवदने! मधु-मानिनि! स्वामिनि! ललने! श्रीराधे! हमारी यह सुन्दर बात सुनो । ये व्रजभूषण नन्दनन्दन तुम्हारी बरसाना - नगरीके उपवनमें होलिकोत्सव - विहार करने के लिये आ रहे हैं । शोभासम्पन्न यौवनके मदसे मत्त उनके चञ्चल नेत्र घूम रहे हैं । घुँघराली नीली अलकावली उनके कंधों और कपोलमण्डलको चूम रही है । शरीरपर पीले रंगका रेशमी जामा अपनी घनी शोभा बिखेर रहा है । वे बजते हुए नूपुरोंकी ध्वनिसे युक्त अपने अरुण चरणारविन्दोंद्वारा सबका ध्यान आकृष्ट कर रहे हैं । उनके मस्तकपर बालरविके समान कान्तिमान् मुकुट है । वे भुजाओंमें विमल अङ्गद, वक्षःस्थलपर हार और कानोंमें विद्युत्को भी विलज्जित करनेवाले मकराकार कुण्डल धारण किये हुए हैं । इस भूमण्डलपर पीताम्बरकी पीत प्रभासे सुशोभित उनका श्याम कान्तिमण्डल उसी प्रकार उत्कृष्ट शोभा पा रहा है, जैसे आकाशमें इन्द्रधनुषसे युक्त मेघमण्डल सुशोभित होता है । अबीर और केसरके रससे उनका सारा अङ्ग लिप्त है । उन्होंने हाथमें नयी पिचकारी ले रखी है तथा सखि राधे! तुम्हारे साथ रासरङ्गकी रसमयी क्रीडामें निमग्न रहनेवाले वे श्यामसुन्दर तुम्हारे शीघ्र निकलनेकी राह देखते हुए पास ही खड़े हैं । * तुम भी मान छोड़कर फगुआ ( होली ) के बहाने निकलो । निश्चय ही आज होलिकाको यश देना चाहिये और अपने भवनमें तुरंत ही रंग मिश्रित जल, चन्दनके पङ्क और मकरन्द ( इत्र आदि पुष्परस ) का अधिक मात्रामें संचय कर लेना चाहिये । परम बुद्धिमती प्यारी सखी! उठो और सहसा अपनी सखीमण्डलीके साथ उस स्थानपर चलो, जहाँ वे श्यामसुन्दर भी मौजूद हों । ऐसा समय फिर कभी नहीं मिलेगा । बहती धारामें हाथ धो लेना चाहिये - यह कहावत सर्वत्र विदित है ॥ ७ – १२ ॥ श्रीनारदजी कहते हैं- राजन्! तब मानवती राधा मान छोड़कर उठीं और सखियोंके समूहसे घिरकर होलीका उत्सव मनानेके लिये निकलीं । चन्दन, अगर, कस्तूरी, हल्दी तथा केसरके घोलसे भरी हुई डोलचियाँ

* ' श्रीयौवनोन्मदविघूर्णितलोचनोऽसौ नीलालकालिकलितांसकपोलगोलः ।

सत्पीतकञ्चुकधनान्तमशेषमारादाचालयन् ध्वनिमता स्वपदारुणेन ॥

बालार्कमौलिविमलाङ्गदहारमुद्यद्विद्युत्क्षिपन्मकरकुण्डलमादधानः I पीताम्बरेण जयति द्युतिमण्डलोऽसौ भूमण्डले स धनुषेव घनो दिविस्थः ॥

आबीरकुङ्कुमरसैश्च हस्ते गृहीतनवसेचनयन्त्र आरात् ।

प्रेक्षंस्तवाशु सखि वाटमतीव राधे त्वद्रासरङ्गरसकेलिरतः स्थितः सः ॥

( गर्ग ०, माधुर्य ० १२ । ८–१० )

पृष्ठ 166

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१६० गोलोकधामाधिपतिं परेशं लिये वे बहुसंख्यक व्रजाङ्गनाएँ एक साथ होकर चलीं । रँगे हुए लाल - लाल हाथ, वासन्ती रंगके पीले वस्त्र, बजते हुए नूपुरोंसे युक्त पैर तथा झनकारती हुई करधनीसे सुशोभित कटिप्रदेश बड़ी मनोहर शोभा थी उन गोपाङ्गनाओंकी । वे हास्ययुक्त गालियोंसे सुशोभित होलीके गीत गा रही थीं । अबीर, गुलालके चूर्ण मुट्ठियोंमें ले - लेकर इधर - उधर फेंकती हुई वे व्रजाङ्गनाएँ भूमि, आकाश और वस्त्रको लाल किये देती थीं । वहाँ अबीरकी करोड़ों मुट्ठियाँ एक साथ उड़ती थीं । सुगन्धित गुलालके चूर्ण भी कोटि - कोटि हाथोंसे बिखेरे जाते थे ॥ १३ – १७ ॥ इसी समय व्रजगोपियोंने श्रीकृष्णको चारों ओरसे घेर लिया, मानो सावनकी साँझमें विद्युन्मालाओंने मेघको सब ओरसे अवरुद्ध कर लिया हो । पहले परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ माधुर्यखण्ड तो उनके मुँहपर खूब अबीर और गुलाल पोत दिया, फिर सारे अङ्गोंपर अबीर - गुलाल बरसाये तथा केसरयुक्त रंगसे भरी डोलचियोंद्वारा उन्हें विधिपूर्वक भिगोया । नृपेश्वर! वहाँ जितनी गोपियाँ थीं, उतने ही रूप धारण करके भगवान् भी उनके साथ विहार करते रहे । वहाँ होलिका - महोत्सवमें श्रीकृष्ण श्रीराधाके साथ वैसी ही शोभा पाते थे, जैसे वर्षाकालकी संध्या - वेलामें विद्युन्मालाके साथ मेघ सुशोभित होता है । श्रीराधाने श्रीकृष्णके नेत्रोंमें काजल लगा दिया । श्रीकृष्णने भी अपना नया उत्तरीय ( दुपट्टा ) गोपियोंको उपहारमें दे दिया । फिर वे परमेश्वर श्रीनन्दभवनको लौट गये । उस समय समस्त देवता उनके ऊपर फूलोंकी वर्षा करने लगे ॥ १८-२२ ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें माधुर्यखण्डके अन्तर्गत नारद - बहुलाश्व - संवादमें होलिकोत्सवके प्रसङ्गमें ' दिव्यादिव्य-त्रिगुणवृत्तिमयी भूतल - गोपियोंका उपाख्यान ' नामक बारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥१२ ॥

तेरहवाँ अध्याय देवाङ्गनास्वरूपा गोपियाँ श्रीनारदजी कहते हैं— मिथिलेश्वर! अब देवाङ्गनास्वरूपा गोपियोंका वर्णन सुनो, जो मनुष्योंको चारों पदार्थ देनेवाला तथा उनके भक्तिभावको बढ़ानेवाला सर्वोत्तम साधन है ॥ १ ॥

मालवदेशमें एक गोप थे, जिनका नाम था -दिवस्पति नन्द । उनके एक धनवान् और नीतिज्ञ थे । प्रसङ्गसे उनका मथुरामें व्रजाधीश्वर नन्दराजका नाम लिये गोकुल गये । वहाँ वृन्दावनकी शोभा देखकर राजकी आज्ञासे वहीं रहने सहस्र पत्रियाँ थीं । वे बड़े एक समय तीर्थयात्राके आगमन हुआ । वहाँ सुनकर वे उनसे मिलनेके नन्दराजसे मिलकर और महामना दिवस्पति नन्द-लगे । उन्होंने दो योजन भूमिको घेरकर गौओंके लिये गोष्ठ बनाया । राजन्! उस व्रजमें अपने कुटुम्बी बन्धुजनोंके साथ रहते हुए दिवस्पतिको बड़ी प्रसन्नता प्राप्त हुई । देवल मुनिके आदेशसे समस्त देवाङ्गनाएँ उन्हीं दिवस्पतिकी महादिव्य कन्याएँ हुईं, जो प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्विनी थीं ॥ २-६ ॥ किसी समय श्यामसुन्दर श्रीकृष्णका दर्शन पाकर वे सब कन्याएँ मोहित हो गयीं और उन दामोदरकी प्राप्ति-के लिये उन्होंने परम उत्तम माघ मासका व्रत किया । आधे सूर्यके उदित होते - होते प्रतिदिन वे व्रजाङ्गनाएँ यमुनामें जाकर स्नान करतीं और प्रेमानन्दसे विह्वल हो उच्चस्वरसे श्रीकृष्णकी लीलाएँ गाती थीं । भगवान् श्रीकृष्ण उनपर प्रसन्न होकर बोले- ' तुम कोई वर माँगो । ' तब उन्होंने दोनों हाथ जोड़कर उन परमात्माको प्रणाम करके उनसे धीरे - धीरे कहा ॥ ७ - ९ ॥ गोपियाँ बोलीं- प्रभो! निश्चय ही आप योगीश्वरोंके लिये भी दुर्लभ हैं । सबके ईश्वर तथा कारणोंके भी कारण हैं । आप वंशीधारी हैं । आपका अङ्ग मन्मथके मनको भी मथ डालनेवाला ( मोह लेने-वाला ) है । आप सदा हमारे नेत्रोंके समक्ष रहें ॥ १० ॥

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अध्याय १४ ] कौरव सेनासे पीड़ित रंगोजि गोपका कंसकी सहायतासे सीमापर निवास १६१ राजन्! तब ' तथास्तु ' कहकर जिन आदिदेव श्रीहरिने गोपियोंके लिये अपने दर्शनका द्वार उन्मुक्त कर दिया, वे सदा तुम्हारे हृदयमें नेत्रमार्गमें बसे रहें और बुलाये हुए - से तत्काल चित्तमें आकर स्थित हो जायँ । जिन्होंने कमरमें पीताम्बर बाँध रखा जिनके सिरपर मोरपंखका मुकुट सुशोभित है और गर्दन झुकी हुई है, जिनके हाथमें बाँसुरी और लकुटी इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें माधुर्यखण्डके अन्तर्गत है तथा कानोंमें रत्नमय कुण्डल झलमला रहे हैं, उन पटुतर नटवेषधारी श्रीहरिका मैं भजन करता हूँ । आदिदेव श्रीहरि केवल भक्तिसे ही वशमें होते हैं । निश्चय ही इसमें गोपियाँ सदा प्रमाणभूत हैं, जिन्होंने न तो कभी सांख्यका विचार किया न योगका अनुष्ठान; केवल प्रेमसे ही वे भगवान्‌के स्वरूपको प्राप्त हो गयीं ॥ ११–१४ ॥ नारद - बहुलाश्व - संवादमें ' देवाङ्गनास्वरूपा गोपियोंका उपाख्यान ' नामक तेरहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३ ॥

चौदहवाँ अध्याय कौरव सेनासे पीड़ित रंगोजि गोपका कंसकी सहायतासे व्रजमण्डलकी सीमापर निवास तथा उसकी पुत्रीरूपमें नारदजी कहते हैं - मिथिलेश्वर! अब जालंधरके अन्तःपुरकी स्त्रियोंके गोपीरूपमें जन्म लेनेका वर्णन सुनो । महाराज! साथ ही उनके कर्मोंको भी सुनो, जो सदा ही मनुष्योंके पापका नाश करने वाले हैं ॥ १ ॥

राजन्! सप्तनदीके किनारे ' रङ्गपत्तन ' नामसे प्रसिद्ध एक उत्तम नगर था, जो सब प्रकारकी सम्पदाओंसे सम्पन्न तथा विशाल था । वह दो योजन विस्तृत गोलाकार नगर था । उस नगरका मालिक या पुराधीश रंगोजि नामक एक गोप था, जो महान् बलवान् था । वह पुत्र - पौत्र आदिसे संयुक्त तथा धन - धान्यसे समृद्धिशाली था । हस्तिनापुरके स्वामी राजा धृतराष्ट्रको वह सदा एक करोड़ स्वर्णमुद्राएँ वार्षिक करके रूपमें दिया करता था । मिथिलेश्वर! एक समय वर्ष बीत जानेपर भी धनके मदसे उन्मत्त गोपने राजाको वार्षिक कर नहीं दिया । इतना ही नहीं, वह गोपनायक रंगोजि मिलनेतक नहीं गया । तब धृतराष्ट्रके भेजे हुए दस हजार वीर जाकर उस गोपको बाँधकर हस्तिनापुरमें ले आये । कई वर्षोंतक तो रंगोजि कारागारमें बँधा पड़ा रहा । बाँधे और पीटे जानेपर भी वह लोभी गोप डरा नहीं । उसने राजा धृतराष्ट्रको थोड़ा - सा भी धन नहीं दिया ॥ २८ ॥

जालंधरी गोपियोंका प्राकट्य किसी समय गोपनायक रंगोजि उस महाभयंकर कारागारसे भाग निकला तथा रातों - रात रङ्गपुरमें आ गया । तब पुनः उसे पकड़ लानेके लिये धृतराष्ट्रकी भेजी हुई शक्तिशाली बल - वाहनसे सम्पन्न तीन अक्षौहिणी सेना गयी । वह गोप भी कवच धारण करके युद्धभूमिमें बारंबार धनुषकी टंकार फैलाता हुआ तीखी धारवाले चमकीले बाणसमूहोंकी वर्षा करके धृतराष्ट्रकी उस सेनाका सामना करने लगा । शत्रुओंने उसके कवच और धनुष काट दिये तथा उसके स्वजनोंका भी वध कर डाला; तब वह अपने पुर ( दुर्ग ) में आकर कुछ दिनोंतक युद्ध चलाता रहा । अन्तमें अनाथ एवं भयसे पीड़ित रंगोजि किसी शरणदाता या रक्षककी इच्छा करने लगा । उसने यादवराज कंसके पास अपना दूत भेजा । दूत मथुरा पहुँचकर राज-दरबारमें गया और उसने मस्तक झुकाकर दोनों हाथोंकी अञ्जलि बाँधे उग्रसेनकुमार कंसको प्रणाम करके करुणासे आर्द्र वाणीमें कहा ॥ ९ - १४ ॥ ' महाराज! रङ्गपत्तनमें रंगोजि नामसे प्रसिद्ध एक गोप हैं, जो उस नगरके स्वामी तथा नीतिवेत्ताओंमें श्रेष्ठ हैं । शत्रुओंने उनके नगरको चारों ओरसे घेर लिया है । वे बड़ी चिन्तामें पड़ गये हैं और अनाथ होकर आपकी शरणमें आये हैं । इस भूतलपर केवल आप ही दीनों

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१६२ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ माधुर्यखण्ड और दुःखियोंकी पीड़ा हरनेवाले हैं । भौमासुरादि वीर आपके गुण गाया करते हैं । आप महाबली हैं और देवता, असुर तथा उद्भट भूमिपालोंको युद्धमें जीतकर देवराज इन्द्रके समान अपनी राजधानीमें विराजमान हैं । जैसे चकोर चन्द्रमाको, कमलोंका समुदाय सूर्यको, चातक शरद् ऋतुके बादलोंद्वारा बरसाये गये जलकणको, भूखसे व्याकुल मनुष्य अन्नको तथा प्याससे पीड़ित प्राणी पानीको ही याद करता है, उसी प्रकार रंगोजि गोप शत्रुके भयसे आक्रान्त हो केवल आपका स्मरण कर रहे हैं ' ॥ १५ – १७ ॥ नारदजी कहते हैं— राजन्! दूतकी यह बात सुनकर दीनवत्सल कंसने करोड़ों दैत्योंकी सेनाके साथ वहाँ जानेका विचार किया । उसके हाथीके गण्ड-स्थलपर गोमूत्रमें घोले गये सिन्दूर और कस्तूरीके द्वारा पत्र - रचना की गयी थी । वह हाथी विन्ध्याचलके समान ऊँचा था और उसके गण्डस्थलसे मद झर रहे थे । उसके पैरमें साँकलें थीं । वह मेघकी गर्जनाके समान जोर - जोरसे चिग्घाड़ता था । ऐसे कुवलयापीड नामक गजराजपर चढ़कर मदमत्त राजा कंस सहसा कवच आदिसे सुसज्जित हो चाणूर, मुष्टिक आदि मल्लों तथा केशी, व्योमासुर और वृषासुर आदि दैत्य-योद्धाओंके साथ रङ्गपत्तनकी ओर प्रस्थित हुआ । वहाँ यादवों और कौरवोंकी सेनाओंमें परस्पर बाणों, खड्गों और त्रिशूलोंके प्रहारसे घोर युद्ध हुआ । जब बाणोंसे सब ओर अन्धकार - सा छा गया, तब कंस एक विशाल गदा हाथमें लेकर कौरव सेनामें उसी प्रकार घुसा, जैसे वनमें दावानल प्रविष्ट हुआ हो । जैसे इन्द्र अपने वज्रसे पर्वतको गिरा देते हैं, उसी प्रकार कंसने अपनी वज्र - सरीखी गदाकी मारसे कितने ही कवचधारी वीरोंको धराशायी कर दिया । उसने पैरोंके आघातसे रथोंको रौंद डाला, एड़ियोंसे मार - मारकर घोड़ोंका कचूमर निकाल दिया । हाथीको हाथीसे ही मारकर कितने ही गजोंको उनके पाँव पकड़कर उछाल दिया । महाबली कंसने कितने ही हाथियोंके कंधों अथवा कक्षभागोंको पकड़कर उन्हें हौदों और झूलों-सहित बलपूर्वक घुमाते हुए आकाशमें फेंक दिया । राजन्! उस युद्धभूमिमें बलवान् व्योमासुर हाथियोंके शुण्डदण्ड पकड़कर उन्हें चञ्चल घंटाओंसहित उछालकर सामने फेंक देता था । दुष्ट दैत्य बलवान् वृषासुर घोड़ोंसहित रथोंको अपने सींगोंपर उठाकर बारंबार घुमाता हुआ चारों दिशाओंमें फेंकने लगा । राजेन्द्र! बलवान् दैत्यराज केशीने बलपूर्वक अपने पिछले पैरोंसे बहुत - से वीरों और अश्वोंको इधर - उधर धराशायी कर दिया । ऐसा भयंकर युद्ध देखकर कौरव सेनाके शेष वीर भयसे व्याकुल हो दसों दिशाओंमें भाग गये । दैत्यराज वीर कंस विजयके उल्लासमें नगारे बजवाता हुआ कुटुम्बसहित रंगोजि गोपको अपने साथ ही मथुरा ले गया ॥ १८-३१ ॥ अपनी सेनाकी पराजयका समाचार सुनकर कौरव क्रोधसे मूच्छित हो उठे । परंतु वर्तमान समयको दैत्योंके अनुकूल देखकर वे सब - के - सब चुप रह गये । व्रजमण्डलकी सीमापर बर्हिषद् नामसे प्रसिद्ध एक मनोहर पुर था, जिसे बलवान् दैत्यराज कंसने रंगोजिको दे दिया । गोपनायक रंगोजि वहीं निवास करने लगा । श्रीहरिके वरदानसे जालंधरके अन्तः-पुरकी स्त्रियाँ उसी गोपकी पत्नियोंके गर्भसे उत्पन्न हुईं । रूप और यौवनसे विभूषित वे गोपकन्याएँ दूसरे दूसरे गोपजनोंको ब्याह दी गयीं, परंतु वे जारभावसे भगवान् श्रीकृष्णके प्रति प्रगाढ़ प्रेम करने लगीं । वृन्दावनेश्वर श्यामसुन्दरने चैत्र मासके महारासमें उन सबके साथ पुण्यमय रमणीय वृन्दावन-के भीतर विहार किया ॥ ३२-३६ ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें माधुर्यखण्डके अन्तर्गत नारद - बहुलाश्व - संवादमें ' जालंधरी गोपियोंका उपाख्यान ' नामक चौदहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १४ ॥

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पंद्रहवाँ अध्याय बर्हिष्मतीपुरी आदिकी वनिताओंका गोपीरूपमें प्राकट्य तथा भगवान्‌के साथ उनका रासविलास; मांधाता और सौभरिके नारदजी कहते हैं- राजन्! व्रजमें शोणपुरके स्वामी नन्द बड़े धनी थे । मिथिलेश्वर! उनके पाँच हजार पत्रियाँ थीं । उनके गर्भसे समुद्रसम्भवा लक्ष्मीजीकी वे सखियाँ उत्पन्न हुईं, जिन्हें मत्स्यावतार -धारी भगवान्से वैसा वर प्राप्त हुआ था । नरेश्वर! इनके सिवा और भी, विचित्र ओषधियाँ, जो पृथ्वीके दोहनसे प्रकट हुई थीं, वहाँ गोपीरूपमें उत्पन्न हुईं । बर्हिष्मतीपुरीकी वे नारियाँ भी, जिन्हें महाराज पृथुका वर प्राप्त था, जातिस्मरा गोपियोंके रूपमें व्रजमें उत्पन्न हुई थीं तथा नर - नारायणके वरदानसे अप्सराएँ भी गोपीरूपमें प्रकट हुई थीं । सुतलवासिनी दैत्यनारियाँ वामन केवरसे तथा नागराजोंकी कन्याएँ भगवान् शेषके उत्तम वरसे व्रजमें उत्पन्न हुईं । दुर्वासामुनिने उन सबको अद्भुत ' कृष्णा - पञ्चाङ्ग ' दिया था, जिससे यमुनाजीकी पूजा करके उन्होंने श्रीपतिका वररूपमें वरण किया ॥ १-५ ॥ एक दिनकी बात है - मनोहर वृन्दावनमें दिव्य यमुनातटपर, जहाँ नर- कोकिलोंसे सुशोभित हरे - भरे वृक्ष - समुदाय शोभा दे रहे थे, भ्रमरोंके गुञ्जारवके साथ कोकिलों और सारसोंकी मीठी बोली गूँज रही थी, वासन्ती लताओंसे आवृत तथा शीतल - मन्द- सुगन्ध वायुसे परिसेवित मधुमासमें, उन गोपाङ्गनाओंके साथ, मदनमोहन श्यामसुन्दर श्रीहरिने कल्पवृक्षोंकी श्रेणीसे मनोरम प्रतीत होनेवाले कदम्बवृक्षके नीचे एकान्त-स्थानमें झूला झूलनेका उत्सव आरम्भ किया । वहाँ यमुना - जलकी उत्ताल तरङ्गोंका कोलाहल फैला हुआ था । वे प्रेमविह्वला गोपाङ्गनाएँ श्रीहरिके साथ झूला झूलनेकी क्रीड़ा कर रही थीं । जैसे रतिके साथ रति पति कामदेव शोभा पाते हैं, उसी प्रकार करोड़ों चन्द्रोंसे भी अधिक कान्तिमती कीर्तिकुमारी श्रीराधाके साथ वृन्दावनमें श्यामसुन्दर श्रीकृष्ण सुशोभित हो रहे थे । इस प्रकार जो साक्षात् परिपूर्णतम नन्दनन्दन श्रीकृष्णको संवादमें यमुना - पञ्चाङ्गकी प्रस्तावना प्राप्त हुई थीं, उन समस्त गोपाङ्गनाओंके तपका क्या वर्णन हो सकता है? नागराजोंकी समस्त सुन्दरी कन्याएँ, जो गोपीरूपमें उत्पन्न हुई थीं, मनोहर चैत्र मासमें यमुनाके तटपर श्रीबलभद्र हरिकी सेवामें उपस्थित थीं । राजन्! इस प्रकार मैंने तुमसे गोपियोंके शुभ चरित्रका वर्णन किया, जो परम पवित्र तथा समस्त पापोंको हर लेनेवाला है । अब पुनः क्या सुनना चाहते हो? ॥६-१३ ॥ बहुलाश्व बोले- मुने! प्रभो! दुर्वासाका दिया हुआ यमुनाजीका पञ्चाङ्ग क्या है, जिससे गोपियोंको गोविन्दकी प्राप्ति हो गयी? उसका मुझसे वर्णन कीजिये ॥ १४ ॥

श्रीनारदजीने कहा- राजन्! इस विषय में विज्ञजन एक प्राचीन इतिहासका उदाहरण देते हैं, जिसके श्रवणमात्रसे पापोंकी पूर्णतया निवृत्ति हो जाती है । अयोध्यामें मांधाता नामसे प्रसिद्ध एक तेजस्वी राजशिरोमणि उस पुरीके अधिपति थे । एक दिन वे शिकार खेलनेके लिये वनमें गये और विचरते हुए, सौभरिमुनिके सुन्दर आश्रमपर जा पहुँचे । उनका वह आश्रम साक्षात् वृन्दावनमें यमुनाजीके मनोहर तटपर स्थित था । वहाँ अपने जामाता सौभरिमुनिको प्रणाम करके मानदाता मांधाताने कहा ॥ १५-१७ ॥ मांधाता बोले- भगवन्! आप साक्षात् सर्वज्ञ हैं, परावरवेत्ताओंमें सर्वश्रेष्ठ हैं और अज्ञानान्धकारसे अंधे हुए लोगोंके लिये दूसरे दिव्य सूर्यके समान हैं । मुझे शीघ्र ही ऐसा कोई उत्तम साधन बताइये, जिससे इस लोकमें सम्पूर्ण सिद्धियोंसे सम्पन्न राज्य बना रहे और परलोकमें भगवान् श्रीकृष्णका सारूप्य प्राप्त हो ॥ १८ - १ ९ ॥ सौभरि बोले- राजन्! मैं तुम्हारे सामने यमुनाजीके पञ्चाङ्गका वर्णन करूँगा, जो सदा समस्त सिद्धियोंको देनेवाला तथा श्रीकृष्णके सारूप्यकी 517 Srigraga - sanghita_Section_6_2_Front

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१६४ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ माधुर्यखण्ड प्राप्ति करानेवाला है । यह साधन जहाँसे सूर्यका उदय भी वशीभूत करनेवाला है । सूर्यवंशेन्द्र! किसी भी होता है और जहाँ वह अस्तभावको प्राप्त होता है, वहाँ देवताके कवच, स्तोत्र, सहस्रनाम, पटल तथा पद्धति-तकके राज्यकी प्राप्ति करानेवाला तथा यहाँ श्रीकृष्णको ये पाँच अङ्ग विद्वानोंने बताये हैं ॥२०–२२ ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें माधुर्यखण्डके अन्तर्गत नारद - बहुलाश्व - संवादमें ' सौभरि और मांधाताका संवाद तथा बर्हिष्मतीपुरीकी नारियों, अप्सराओं, सुतलवासिनी, असुर- कन्याओं तथा नागराज - कन्याओंके गोपीरूपमें उत्पन्न होनेका उपाख्यान ' नामक पंद्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५ ॥

सोलहवाँ अध्याय श्रीयमुना - कवच मांधाता बोले - – महाभाग! आप मुझे श्रीकृष्ण-की पटरानी यमुनाके सर्वथा निर्मल कवचका उपदेश दीजिये, मैं उसे सदा धारण करूँगा ॥ १ ॥

सौभरी बोले- महामते नरेश! यमुनाजीका कवच मनुष्योंकी सब प्रकारसे रक्षा करनेवाला तथा साक्षात् चारों पदार्थोंको देनेवाला है, तुम इसे सुनो-यमुनाजीके चार भुजाएँ हैं । वे श्यामा ( श्यामवर्णा एवं षोडश वर्षकी अवस्थासे युक्त ) हैं । उनके नेत्र प्रफुल्ल कमलदलके समान सुन्दर एवं विशाल हैं । वे परम सुन्दरी हैं और दिव्य रथपर बैठी हुई हैं । इस प्रकार उनका ध्यान करके कवच धारण करे ॥ २-३ ॥ स्नान करके पूर्वाभिमुख हो मौनभावसे कुशासन-पर बैठे और कुशोंद्वारा शिखा बाँधकर संध्या - वन्दन करनेके अनन्तर ब्राह्मण ( अथवा द्विजमात्र ) स्वस्तिकासनसे स्थित हो कवचका पाठ करे । ' यमुना ' मेरे मस्तककी रक्षा करें और ' कृष्णा ' सदा दोनों * यमुनायाश्च कवचं सर्वरक्षाकरं नृणाम् । कृष्णां चतुर्भुजां श्यामां पुण्डरीकदलेक्षणाम् । स्नातः पूर्वमुखो मौनी कृतसंध्यः कुशासने । यमुना मे शिरः पातु कृष्णा नेत्रद्वयं सदा । कपोलौ पातु मे साक्षात् परमानन्दरूपिणी । अधरौ पातु कालिन्दी चिबुकं सूर्यकन्यका । कृष्णप्रिया पातु पृष्ठं तटिनी मे भुजद्वयम् । ऊरुद्वयं तु रम्भोरूर्जानुनी त्वङ्घ्रिभेदिनी । अन्तर्बहिरधश्चोर्ध्वं दिशासु विदिशासु च । नेत्रोंकी । ' श्यामा ' भ्रूभंग - देशकी और ' नाकवासिनी ' नासिकाकी रक्षा करें । ' साक्षात् परमानन्दरूपिणी ' मेरे दोनों कपोलोंकी रक्षा करें । ' कृष्णवामांससम्भूता ' ( श्रीकृष्णके बायें कंधेसे प्रकट हुई वे देवी ) मेरे दोनों कानोंका संरक्षण ' सूर्यकन्या ' चिबुक ( यमराजकी बहिन ) हृदयकी रक्षा करें ' तटिनी ' मेरी दोनों श्रोणीतट ( नितम्ब कटिप्रदेशकी रक्षा ( ( ज‍ जाँघों ) की और ' करें । ' कालिन्दी ' अधरोंकी और ( ठोढ़ी ) की रक्षा करें । ' यमस्वसा ' मेरी ग्रीवाकी और ' महानदी ' मेरे । ' कृष्णप्रिया ' पृष्ठ - भागका और भुजाओंका रक्षण करें । ' सुश्रोणी ' ) की और ' चारुदर्शना ' मेरे करें । ' रम्भोरू ' दोनों ऊरुओं अङ्घ्रिभेदिनी ' मेरे दोनों घुटनोंकी रक्षा करें । ' रासेश्वरी ' गुल्फों ( घुट्ठियों ) का और ' पापापहारिणी ' पादयुगलका त्राण करें । ' परिपूर्णतम-प्रिया ' भीतर - बाहर, नीचे - ऊपर तथा दिशाओं और विदिशाओंमें सब ओरसे मेरी रक्षा करें * ॥४–१० ॥ चतुष्पदार्थदं साक्षाच्छृणु राजन् महामते रथस्थां सुन्दरीं ध्यात्वा धारयेत् कवचं ततः कुशैर्बद्धशिखो विप्रः पठेद् वै स्वस्तिकासनः श्यामा भ्रूभङ्गदेशं च नासिकां नाकवासिनी कृष्णवामांससम्भूता पातु कर्णद्वयं मम यमस्वसा कन्धरां च हृदयं मे महानदी श्रोणीतटं च सुश्रोणी कटिं मे चारुदर्शना गुल्फौ रासेश्वरी पातु पादौ पापापहारिणी समन्तात् पातु जगतः परिपूर्णतमप्रिया ॥ ॥ ॥ ॥ ॥ ॥ ॥ ॥ ॥ ( गर्ग ०, माधुर्य ० १६ । २–१० )