गर्ग संहिता — पृष्ठ 271–280
गर्ग संहिता · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 271–280
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अध्याय १३ ] प्रभास, सरस्वती, बोधपिप्पल और गोमती - सिन्धु- संगमका माहात्म्य २६५ नमस्कार है । द्रौपदीका चीर बढ़ाकर उसकी लाज बचानेवाले आप श्रीहरिको नमस्कार है । विष, अग्नि और वनवाससे पाण्डवोंकी रक्षा करनेवाले पाण्डव-सहायक आपको नमस्कार है । यदुकुलके रक्षक तथा इन्द्रके कोपसे व्रजके गोपोंकी रक्षा करनेवाले आपको नमस्कार है । गुरुको, माता देवकीको और ब्राह्मणको उनके मरे हुए पुत्रोंको लाकर देनेवाले श्रीकृष्ण! आपको बारंबार नमस्कार है । जरासंधकी कैदमें पड़े हुए नरेशोंको वहाँसे छुटकारा दिलानेवाले, राजा नृगका उद्धार करनेवाले तथा सुदामाकी दीनता हर लेनेवाले आप साक्षात् परमेश्वरको नमस्कार है । आप वासुदेव श्रीकृष्णको नमस्कार है । संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्धको भी नमस्कार है । इस प्रकार चतुर्व्यूह -रूपधारी आप परमेश्वरको मेरा प्रणाम है । देवदेव! इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें द्वारकाखण्डके अन्तर्गत आप ही मेरी माता, आप ही पिता, आप ही बन्धु, आप ही सखा, आप ही विद्या, आप ही धन और आप ही मेरे सब कुछ हैं * ॥ १३ – १ ९ ॥ श्रीनारदजी कहते हैं- राजन्! इस प्रकार श्रीहरिकी स्तुति करके प्रेम - पूरित कक्षीवान् एक श्रेष्ठ विमानपर आरूढ़ हो यादवोंके देखते - देखते, सैकड़ों सूर्योंके समान तेजस्वी होकर, दसों दिशाओंको उद्भासित करता हुआ समस्त उपद्रवोंसे रहित विष्णुधाममें चला गया । मैथिलेश्वर! श्रीहरिने जिस सरोवरके तटपर शङ्खका उद्धार किया था, वह उस घटनाके कारण ही परम पुण्यमय ' शङ्खोद्धार - तीर्थ ' के नामसे प्रसिद्ध हो गया । जो श्रेष्ठ मानव शङ्खोद्धारकी इस कथाको सुनता है, वह शङ्खोद्धारतीर्थमें स्नान करनेका फल पा जाता है— इसमें संशय नहीं है ॥ २०–२३ ॥ नारद - बहुलाश्व - संवादमें ' शङ्खोद्धार - तीर्थका माहात्म्य ' नामक बारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२ ॥
तेरहवाँ अध्याय प्रभास, सरस्वती, बोधपिप्पल और गोमती - सिन्धु- संगमका माहात्म्य श्रीनारदजी कहते हैं— महामते! विदेहराज! प्रभासतीर्थका भी माहात्म्य सुनो, जो सर्वपापापहारी, पुण्यदायक तथा तेजकी वृद्धि करनेवाला है । राजन्! सिंहराशिमें बृहस्पतिके रहते गोदावरीमें, कुम्भगत बृहस्पतिके होनेपर हरक्षेत्र ( हरद्वार ) - में, सूर्यग्रहण समय कुरुक्षेत्रमें और चन्द्रग्रहणके अवसरपर काशीमें स्नान और दान करके मनुष्य जिस पुण्यको पाता है, उससे सौगुना पुण्य प्रभासक्षेत्रमें प्रतिदिन स्नान करनेसे प्राप्त होता रहता है । दक्षके शापसे राजयक्ष्मा नामक * वासुदेव नमस्तेऽस्तु गोविन्द पुरुषोत्तम । ध्रुवे ध्रुवपदं दात्रे प्रह्लादस्यार्तिहारिणे । द्रौपदीचीरसंत्राणकारिणे हरये नमः । यादवत्राणकर्त्रे च शक्रादाभीररक्षिणे । जरासंधनिरोधार्तनृपाणां मोक्षकारिणे । वासुदेवाय कृष्णाय नमः संकर्षणाय च । रोग हो जानेपर नक्षत्रोंके स्वामी चन्द्रमा जहाँ स्नान करके तत्काल शाप - दोषसे मुक्त हो गये और पुनः उनकी कलाओंका उदय हुआ, वही ' प्रभासतीर्थ ' है ॥ १-४ ॥ राजन्! उस तीर्थमें परम पुण्यमयी पश्चिमवाहिनी सरस्वती प्रवाहित होती हैं । उनके जलमें स्नान करके पापी मनुष्य भी साक्षात् ब्रह्ममय हो जाता है । नरेश्वर! सरस्वतीके तटपर ' बोधपिप्पल ' नामसे प्रसिद्ध तीर्थ है, जहाँ भगवान् श्रीकृष्णने उद्धवको परम दीनवत्सल दीनेश द्वारकेश परेश्वर ॥ गजस्योद्धारिणे तुभ्यं बलेर्बलिविदे नमः ॥ गराग्निवनवासेभ्यः पाण्डवानां सहायिने ॥ गुरुमातृद्विजानां च पुत्रदात्रे नमो नमः ॥ नृगस्योद्धारिणे साक्षात् सुदाम्नो दैन्यहारिणे ॥ प्रद्युम्नायानिरुद्धाय चतुर्व्यूहाय ते नमः ॥ कल्याणमय त्वमेव माता च पिता त्वमेव त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव । त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव त्वमेव सर्वं मम देवदेव ॥ ( गर्ग ०, द्वारका ० १२ । १३ – १ ९ )
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२६६ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ द्वारकाखण्ड भागवत - धर्मका उपदेश दिया था । राजन्! उस बोधपिप्पलकी विधिवत् पूजा करके सिर नवाकर जो उसका स्पर्श करता है और ब्रह्मसम्मित भागवतपुराण -को सुनता है— मनको संयममें रखते हुए मौनभावसे भागवतका आधा श्लोक या चौथाई श्लोक भी सुन लेता है— उसके हाथमें भगवान् विष्णुका परमपद आ जाता है, अर्थात् उसके लिये परमपदकी प्राप्ति निश्चित हो जाती है । जो प्रभासमें भाद्रपद मासकी पूर्णिमा तिथिको सोनेके सिंहासनसे युक्त श्रीमद्भागवतपुराणका दान करता है, वह परमगतिको प्राप्त होता है । जिन्होंने कहीं या कभी श्रीमद्भागवतपुराण नहीं सुना, उन भूमिवासी मनुष्योंका जन्म व्यर्थ चला गया । जिन्होंने भागवतपुराण नहीं सुना, जिनके द्वारा पुराण - पुरुष परमात्माकी आराधना नहीं की गयी तथा जिन लोगोंने भूमिदेवों - ब्राह्मणोंके मुखरूपी अग्रिमें उत्तम भोजनकी आहुति नहीं दी, उन मनुष्योंका जन्म व्यर्थ चला गया * ॥५–११ ॥ द्वारकामें गोमती और समुद्रका संगम सब तीर्थों-का राजा है, जिसमें स्नान करके मनुष्य निर्मल वैकुण्ठधामको प्राप्त होता है । गङ्गासागर संगम -तीर्थमें स्नान करनेसे सौ अश्वमेधयज्ञोंका पुण्यफल प्राप्त होता है । उससे भी सहस्रगुना पुण्य गोमती-सागर - संगममें स्नान करनेसे सुलभ होता है । इसी विषयमें पुराणवेत्ता पुरुष इस पुरातन इतिहासका कथन किया करते हैं, जिसके श्रवणमात्रसे मनुष्य पापतापसे मुक्त हो जाता है ॥ १२–१४ ॥ पूर्वकालमें हस्तिनापुरमें राजमार्गपति नामक एक श्रेष्ठ वैश्य निवास करता था । वह महान् गौरवशाली तथा कुबेरके समान निधिपति था । आगे चलकर वह वैश्य वेश्याओंके प्रसङ्गमें रहने लगा । वह विटों ( धूर्ती और लम्पटों ) की गोष्ठीमें बड़ा चतुर समझा जाता था । जुआ खेलनेमें उसकी बड़ी आसक्ति थी । वह लोभ, मोह और मदसे उन्मत्त रहता था । वह * पुराणं न श्रुतं यैस्तु श्रीमद्भागवतं क्वचित् । यैर्न श्रुतं भागवतं पुराणं नाराधितो यैः पुरुषः पुराणः । महादुष्ट वैश्य सदा झूठ बोलता और कुकर्ममें लगा रहता था । उसने ब्राह्मणों, पितरों और देवताओंके निमित्त कभी धनका दान नहीं किया । वह यदि कहीं दूरसे भगवान्की कथा - वार्ता होती देख लेता तो कतराकर जल्दी ही और दूर निकल जाता था । उसने माँ- बापकी कभी सेवा नहीं की और अपने पुत्रोंको भी धन नहीं दिया । वह ऐसा दुर्बुद्धि और खल था कि धनाढ्य होनेपर भी अपनी पत्नीको त्यागकर उससे अलग रहने लगा । वेश्याओंके सङ्गमें रहनेसे उसका आधा धन नष्ट हो गया, आधा चोर चुरा ले गये और जो कुछ थोड़ा - सा पृथ्वीमें गड़ा हुआ था, वह स्वतः वहीं विलीन हो गया; क्योंकि पुण्यसे लक्ष्मी बढ़ती है और पापसे निश्चय ही नष्ट हो जाती है ॥ १५–२० ॥ इस प्रकार वेश्याओंमें आसक्त हुआ वह महादुष्ट वैश्य निर्धन हो गया और उसी रमणीय नगर हस्तिनापुरमें चोरीका काम करने लगा । उन दिनों वहाँ राजा शंतनु राज्य करते थे । उन्होंने चोरीके कर्ममें लगे हुए उस वैश्यको रस्सियोंसे बाँधकर अपने देशसे बाहर निकलवा दिया । वनमें रहकर वह जीवोंकी हिंसा करने लगा । उन्हीं दिनों वहाँ बहुत वर्षोंतक वर्षा नहीं हुई । तब दुर्भिक्षसे पीड़ित हुआ वह वैश्य पश्चिम दिशाकी ओर चला गया । वहाँ एक वनमें किसी सिंहने अपने पंजेसे उसको मार डाला । उसी समय यमदूत आये और उसे पाशोंमें बाँधकर नीचे मुख करके लटकाये तथा कोड़ोंसे पीटते हुए यमलोकके मार्गपर ले चले । तदनन्तर कोई महान् गृध्र उसकी बाँहका मांस लेकर आकाशमें उड़ गया और अपनी चोंचसे तुरंत ही उसको खाने लगा । अन्य पक्षी जिन्हें मांस नहीं मिला था, वे सब आतुर हो उसीमेंसे अपने लिये भी मांस ग्रहण करने लगे । इस प्रकार चील आदि पक्षियोंका वहाँ महान् कोलाहल होने लगा; तथापि उस गृध्रने अपने मुखसे उस मांसको नहीं छोड़ा । वह उड़ते - उड़ते पश्चिम दिशाकी ओर चला गया । वहाँ उसीके समान शक्तिशाली एक दूसरे गृध्रने तेषां वृथा जन्म गतं नराणां भूमिवासिनाम् ॥ हुतं मुखे नैव धरामराणां तेषां वृथा जन्म गतं नराणाम् ॥ ( गर्ग ०, द्वारका ० १३ । १०-११ )
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अध्याय १४ ] द्वारका क्षेत्रके समुद्र तथा उसके मुखपर अपनी तीखी चोंचसे प्रहार किया । तब उसके मुँहसे वह मांस गोमती -सागर - संगममें गिर गया । उस तीर्थमें उसके मांसके डूबते ही यह महापातकी वैश्य यमदूतोंके पाशोंको स्वयं तोड़कर चार भुजाओंसे युक्त देवता हो गया और उन दूतोंके देखते - देखते दिव्य रैवतक पर्वतका माहात्म्य २६७ विमानपर आरूढ़ हो सम्पूर्ण दिशाओंको प्रकाशित करता हुआ वह श्रीहरिके परमधाममें चला गया ॥ २१-३१ ॥ जो मनुष्य गोमती - समुद्र - संगमके इस माहात्म्य-को सुनता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो भगवान् विष्णुके लोकमें जाता है ॥ ३२ ॥
इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें द्वारकाखण्डके अन्तर्गत नारद - बहुलाश्व - संवादमें ' प्रभास, सरस्वती, बोधपिप्पल तथा गोमती - सिन्धु- संगमका माहात्म्य ' नामक तेरहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥१३ ॥
चौदहवाँ द्वारका क्षेत्रके समुद्र तथा श्रीनारदजी कहते हैं— सबको सम्मान देनेवाले नरेश! अब द्वारावती और समुद्रके माहात्म्यका वर्णन सुनो, जो सब पापोंको हर लेनेवाला, पुण्यदायक तथा उन तीर्थोंमें स्नानका फल देनेवाला है ॥ १ ॥
महीपते! जो वैशाख मासकी पूर्णमासीको व्रत रहकर, स्नानपूर्वक नदीपति समुद्रका विधिवत् पूजन और उसे नमस्कार करके रत्नोंका दान करता है, उसके शरीरमें तीनों देवता ( ब्रह्मा, विष्णु, महेश ) निवास करते हैं तथा उसके दर्शनमात्रसे मनुष्य कृतार्थ हो जाता है । इतना ही नहीं— उसके शरीरके स्पर्शसे तत्काल ब्रह्महत्या छूट जाती है तथा वह जहाँ - जहाँ जाता है वहाँ - वहाँकी भूमि मङ्गलमयी हो जाती है । जगत्का वध करनेवाला पापी मनुष्य भी उसका दर्शन करके मरनेपर अपने पाप - समूहका उच्छेद कर डालता और परम मोक्षको प्राप्त होता है ॥२-५ ॥ मानद! अब रैवत पर्वतका माहात्म्य सुनो, जो समस्त पापको दूर करनेवाला, पुण्यदायक तथा भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाला है । गौतमका पुत्र मेधावी बड़ा बुद्धिमान् और विष्णुभक्त था । उसने सौ अयुत ( दस लाख ) वर्षोंतक विन्ध्याचल पर्वतपर तपस्या की । एक दिन साक्षात् अपान्तरतमा नामक मुनि उससे मिलनेके लिये आये, परंतु उत्कट तपस्वी मेधावी अपने आसनसे नहीं उठा । तब अपान्तरतमा रोषसे भर गये और उसे शाप देते हुए बोले- ' संतोंके प्रति अध्याय रैवतक पर्वतका माहात्म्य भक्ति न रखनेवाले पापात्मन्! तुझे अपने तपोबलपर बड़ा गर्व हो गया है । तेरी स्थिति पर्वतके समान है । अतः दुर्मते! तू यहीं पर्वत हो जा । ' यों कहकर साक्षात् अपान्तरतमामुनि चले गये । मेधावी शैलभावको प्राप्त हो श्रीशैलका पुत्र हुआ । परंतु वह महाबुद्धिमान् तपस्वी तथा विष्णुभक्तिके प्रभावसे पूर्वजन्मकी बातोंका स्मरण करनेवाला हुआ ॥ ६ – ११ ॥ एक दिन मेरे मुखसे द्वारकापुरीका माहात्म्य सुनकर श्रीशैलके पुत्रने कहा - मुने! आप शीघ्र राजा रैवतके पास जाइये और उनसे मेरी कही हुई प्रार्थना सुना दीजिये; क्योंकि आप बड़े दीनवत्सल हैं । ये महाबली राजा रैवत यदि प्रसन्न हो जायँ और मुझे यहाँसे उठा ले चलें, तब मेरा द्वारकापुरीके क्षेत्रमें निवास सम्भव होगा । ' विष्णुभक्तोंको शान्ति प्रदान करना तो मेरा काम ही ठहरा । मैंने उस पर्वतकुमारकी बात सुनकर शीघ्र ही राजा रैवतके पास जा उसकी कही हुई बात सुना दी । राजन्! मेरी बात सुनकर राजा रैवत बड़े प्रसन्न हुए और बोले — ' यहाँ कोई पर्वत नहीं है; अतः उस शैलपुत्रको दोनों भुजाओंसे उखाड़कर यहाँ लाऊँगा और द्वारकामें उसकी स्थापना करूँगा ।'— ऐसी प्रतिज्ञा उन्होंने की ॥ १२ – १६ ॥ राजा रैवत उस पर्वतको चुरा लानेके लिये ज्यों ही प्रस्थित हुए, उनसे भी पहले मैं श्रीशैलके नगरमें जा पहुँचा । मुझे कलह प्रिय लगता है, इसलिये मैंने
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२६८ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ द्वारकाखण्ड महात्मा श्रीशैलको राजाका उसके पुत्रकी चोरीसे सम्बन्ध रखनेवाला सारा वृत्तान्त कह सुनाया । श्रीशैलने पुत्रके मोहवश उसको डाँटकर कहा- ' तू कहाँ जा रहा है? ' इसके बाद श्रीशैल गिरिराज सुमेरु और नगेश्वर हिमवान्के पास गया । वह धर्मात्मा पर्वत पुत्र - स्नेहसे बहुत व्याकुल था । उसने उन पर्वतराजोंसे कहा - ' मुझे दैवने यही एक पुत्र दिया है, मेरे बहुत - से पुत्र नहीं हैं; उस एकको भी यहाँसे हर ले जानेके लिये महाबली राजा रैवत आये हैं । इन महात्मा राजाके कारण मेरा पुत्र विदेश चला जा रहा है । मैं पुत्र स्नेहसे विकल होकर आप दोनोंकी शरणमें आया हूँ । आप-लोग राजा रैवतको जीतकर शीघ्र ही मुझे मेरा पुत्र दिला दें ॥ १७ - २२ ॥ जातिके प्रति पक्षपात होनेके कारण वे दोनों पर्वत, सुमेरु और हिमालय, लाखों दूसरे पर्वतोंसे घिरे हुए तुरंत ही युद्धके लिये आये । उधर हनुमान्जीने जैसे द्रोणगिरिको उखाड़ लिया था, उसी प्रकार रैवतने अपनी दोनों भुजाओंसे उस पर्वतको उखाड़कर बल-पूर्वक ऊपर उठा लिया और ज्यों ही वहाँसे चलनेका विचार किया, त्यों ही अस्त्र - शस्त्र धारण किये बहुत - से पर्वतोंको वहाँ उपस्थित देखा । उन्हें देखकर राजाने उच्चस्वरसे अट्टहास किया, मानो विद्युत्पातकी गड़गड़ाहट हुई हो । उनके उस सिंहनादसे सातों लोकों और सातों पातालोंके साथ सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड गूँज उठा । उसी समय उन समस्त योद्धाओंके हाथोंसे सारे अस्त्र -शस्त्र स्वतः गिर गये । जब वे पर्वत निःशस्त्र हो गये, तब बार - बार कोलाहल करते हुए मार्गमें पर्वत-सहित जाते हुए रैवतको मुक्कों और घुटनोंसे उसी प्रकार मारने लगे, जैसे पूर्वकालमें द्रोणाचलके रक्षक महाबली हनुमान्जीके पीछे उन्हें मार गिरानेके लिये कुछ दूरतक गये थे । उन पर्वतोंके चोट करनेपर इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें द्वारकाखण्डके अन्तर्गत भी राजा रैवतने छोड़ा ॥ २३–२८ ॥ इधर मेरे ही आक्रमण सुनकर भक्तकी सहायताके गये और राजाको मत ' - यों कहकर, हो गये । भगवान्के अपने हाथसे उक्त पर्वतको नहीं मुखसे राजा रैवतके ऊपर पर्वतोंका भक्तवत्सल भगवान् श्रीकृष्ण अपने लिये तत्काल आकाशमार्गसे आ अपना उत्कृष्ट तेज देकर ' डरो अभयदान दे, तुरंत वहीं अन्तर्धान चले जानेपर उन्हींके तेजसे सम्पन्न हो राजा रैवतने एक हाथपर उस पर्वतको रख लिया और वज्रको भी चूर कर देनेवाले अपने मुक्केसे सुमेरु पर्वतको इस प्रकार मारा, मानो महाबली वज्रधारी इन्द्रने किसी पर्वतपर वज्रसे प्रहार किया हो । उनके मुक्केकी मारसे मेरु पर्वत व्याकुल होकर गिर पड़ा । फिर हिमवान्को भी अपने बाहुवेगसे धराशायी करके उस रणदुर्मद नरेशने विन्ध्य आदि अन्य पर्वतोंको अपने पैरोंसे रौंद डाला ॥ २ ९ -३३ ॥ विन्ध्य आदि सभी पर्वत उनके पैरोंके आघातसे कुचले जानेके कारण भयभीत हो युद्धका मैदान छोड़-कर दसों दिशाओंमें भाग चले । इस प्रकार पर्वतोंके समुदायपर विजय पाकर पर्वतके समान सुदृढ़ शरीर-वाले राजा रैवतने उस पर्वतको विजय गर्जनाके साथ ले जाकर आनर्त्तदेशमें स्थापित कर दिया ॥ ३४-३५ ॥ राजन्! वह पर्वत राजा रैवतके ही नामपर ' रैवतकाचल ' के रूपमें विख्यात हुआ । भगवान्के प्रति भक्तिभावसे युक्त वह श्रेष्ठ पर्वत आज भी द्वारका क्षेत्रमें विराजमान है । उसके दर्शनमात्रसे ब्रह्महत्याका पाप छूट जाता है । उसके स्पर्शमात्रसे मनुष्य सौ यज्ञोंका फल प्राप्त कर लेता है । उस पर्वतकी यात्रा और परिक्रमा करके नतमस्तक हो जो मनुष्य ब्राह्मणको भोजन देता है, वह भगवान् विष्णुके परमपदको प्राप्त कर लेता है॥३६–३८ ॥ नारद - बहुलाश्व - संवादमें ' समुद्र और रैवतकाचलका माहात्म्य ' नामक चौदहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १४ ॥
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पंद्रहवाँ अध्याय यज्ञतीर्थ, कपिटङ्कतीर्थ, नृगकूप, गोपीभूमि तथा गोपीचन्दनकी महिमा; द्वारकाकी मिट्टीके स्पर्शसे श्रीनारदजी कहते हैं - राजन्! उस पर्वत-पर पूर्वकालमें राजा रैवतने यज्ञतीर्थका निर्माण किया, जहाँ एक यज्ञ करके मनुष्य कोटियज्ञोंका फल पाता है । वहीं ' कपिटङ्क ' नामक तीर्थ है, जो एक कपिके मार गिराये जानेसे प्रकट हुआ था । राजन्! रैवतक गिरिपर वह तीर्थ सब पापोंका नाश करने-वाला है ॥ १-२ ॥ भौमासुरका सखा एक द्विविद नामक वानर था, जो बड़ा ही दुष्ट था । उसे बलरामजीने वज्रके समान चोट करनेवाले मुक्केसे जहाँ मारा था, वही स्थान ' कपिटङ्क-तीर्थ ' है । वह वानर सत्पुरुषोंकी अवहेलना करनेवाला था, तो भी वहाँ मारे जानेसे तत्काल मुक्त हो गया । नरेश्वर! उस तीर्थमें स्नान करनेके लिये सदा देवता -लोग आया करते हैं । ‘ कलविङ्कतीर्थ ' की यात्रा करने पर कोटि गोदानका फल प्राप्त होता है । इससे दूना पुण्य शुभ दण्डकारण्यकी यात्रा करनेपर मिलता है । उससे भी चौगुना पुण्य सैन्धव नामक विशाल वनकी यात्रा करनेपर सुलभ होता है । उसकी अपेक्षा भी पाँच गुना अधिक पुण्य जम्बूमार्गकी यात्रा करनेसे मनुष्यको मिल जाता है । पुष्करतीर्थके वनमें उससे भी दस गुना पुण्य प्राप्त होता है । उससे दसगुना पुण्य ' उत्पलावर्त -तीर्थ ' की यात्रासे सुलभ होता है । उसकी अपेक्षा भी दसगुना पुण्य ' नैमिषारण्यतीर्थ ' में बताया गया है । विदेहराज! नैमिषारण्यसे भी सौगुना पुण्य ' कपिटङ्क-तीर्थ ' में स्नान करनेसे प्राप्त होता है ॥ ३–८ ॥ द्वारकामें एक ' नृगकूप ' है, जो तीर्थोंमें सर्वोत्तम तीर्थ है । उसके दर्शनमात्रसे ब्रह्महत्याका पाप छूट जाता है । राजा नृगने अनजानमें एक ब्राह्मणकी गायको दूसरे ब्राह्मणके हाथमें दे दिया था । उसी पापसे उन्हें गिरगिटका शरीर धारण करके कूपमें रहना पड़ा । दानियोंमें सर्वश्रेष्ठ राजा नृग भी एक छोटे - से पापके कारण अन्धकूपमें गिरे और चार युगोंतक उसीमें रहे । फिर सत्पुरुषोंके देखते - देखते भगवान् श्रीकृष्णने एक महान् पापीका उद्धार उनका उद्धार किया । महीपते! उसी दिनसे ' नृगकूप ' तीर्थस्वरूप हो गया । कार्तिककी पूर्णिमाको उस कूपके जलसे स्नान करना चाहिये । ऐसा करनेवाला मनुष्य कोटिजन्मोंके किये हुए पापसे छुटकारा पा जाता है, इसमें संशय नहीं है । वहाँ विधिपूर्वक जो एक भी गोदान करता है, वह निस्संदेह कोटि गोदानके पुण्यफलका भागी होता है ॥ ९ – १३३ । 11 राजन्! अब ' गोपीभूमि ' का माहात्म्य सुनो, जो पापहारी उत्तम तीर्थ है । उसके श्रवणमात्रसे कर्म-बन्धनसे छुटकारा मिल जाता है । जहाँ गोपियोंने निवास किया था, उस निवासके कारण ही वह स्थान ' गोपीभूमि ' के नामसे प्रसिद्ध हुआ । वहाँ गोपियोंके अङ्गरागसे उत्पन्न उत्तम गोपीचन्दन उपलब्ध होता है । जो अपने अङ्गोंमें गोपीचन्दन लगाता है, उसे गङ्गा-स्नानका फल मिलता है । जो सदा गोपीचन्दनकी मुद्राओंसे मुद्रित होता है, अर्थात् गोपीचन्दनका छापा-तिलक लगाता है, उसे प्रतिदिन महानदियोंमें स्नान करनेका पुण्यफल प्राप्त होता है । उसने सहस्र अश्वमेध और सौ राजसूय यज्ञ कर लिये । सब तीर्थोंका सेवन, दान और व्रतोंका अनुष्ठान भी कर लिया । निस्संदेह वह नित्य गोपीचन्दन लगानेमात्रसे कृतार्थ हो जाता है । गङ्गाकी मिट्टीसे दुगुना पुण्य चित्रकूटकी रजका माना गया है, उससे भी दसगुना पुण्य पञ्चवटीकी रजका है, उसकी अपेक्षा भी सौगुना पुण्य गोपीचन्दन रजका है । गोपीचन्दनको तुम वृन्दावनकी रजके समान समझो । जिसके शरीरमें गोपीचन्दन लगा हो, वह सैकड़ों पापोंसे युक्त हो तो भी उसे यमराज भी अपने साथ नहीं ले जा सकते, फिर यमदूतोंकी तो बात ही क्या है । पापी होनेपर भी जो पुरुष प्रतिदिन गोपीचन्दनका तिलक धारण करता है, वह श्रीहरिके गोलोकधाममें जाता है, जहाँ प्राकृत गुणोंका प्रवेश नहीं है ॥ १४ – २२ ॥ सिन्धुदेशका एक राजा था, जिसका नाम दीर्घबाहु
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२७० गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ द्वारकाखण्ड था । वह अन्यायपूर्ण जीवन बितानेवाला, दुष्टात्मा और सदा वेश्यासङ्गमें रत रहनेवाला था । उसने भारतवर्षमें सैकड़ों ब्रह्महत्याएँ की थीं । उस दुरात्माने दस गर्भवती स्त्रियोंका वध किया था । उसने शिकार खेलते समय अपने बाण - समूहोंसे कपिला गौओंकी हत्या की थी । एक दिन वह सिंधी घोड़ेपर चढ़कर मृगयाके लिये वनमें गया । वहाँ उसके कुपित मन्त्रीने राज्यके लोभसे उस महाखल नरेशको तीखी धारवाली तलवारसे उस वनमें ही मार डाला । उसको पृथ्वीपर पड़ा और मृत्युको प्राप्त हुआ देख यमके सेवक बाँधकर परस्पर हर्ष प्रकट करते हुए उसे यमपुरी ले गये । उस पापीको सामने खड़ा देख बलवान् यमराजने तुरंत ही चित्रगुप्तसे पूछा - ' इसके योग्य कौन - सी यातना है? ' ॥ २३-२८ ॥ चित्रगुप्तने कहा – महाराज! निस्संदेह इसे चौरासी लाख नरकोंमें बारी - बारीसे गिराया जाय और जबतक चन्द्रमा और सूर्य विद्यमान हैं, तबतक यह नरकका कष्ट भोगता रहे । इसने भारतवर्षमें जन्म लेकर एक क्षण भी कभी पुण्य कर्म नहीं किया है । इसने दस गर्भवती स्त्रियोंकी और असंख्य कपिला गौओंकी हत्या की है । इसके सिवा वन्य पशुओंकी हत्या तो इसने हजारोंकी संख्यामें की है । इसलिये देवता और ब्राह्मणोंकी निन्दा करनेवाला यह महान् पापी है ॥ २ ९ - ३१ ॥ नारदजी कहते हैं- राजन्! उस समय यमकी आज्ञासे यमदूत उस पापात्माको लेकर कुम्भीपाक नरक में ले गये, जिसका दीर्घ विस्तार एक सहस्र योजनका था । वहाँ विशाल कड़ाहमें तपाया हुआ तेल भरा था । उस खौलते हुए तेलमें फेन उठ रहे थे । यमदूतोंने उस पापीको उसी कुम्भीपाकमें गिरा दिया । उसके गिरते ही वहाँकी प्रलयानिके समान प्रज्वलित अग्नि तत्काल शीतल हो गयी । विदेहराज! जैसे प्रह्लादको खौलते हुए तेलमें फेंकनेपर वह शीतल हो गया था, उसी प्रकार उस पापीको नरकमें गिरानेसे वहाँकी ज्वाला शान्त हो गयी । यमदूतोंने उसी समय यह विचित्र घटना महात्मा यमको बतायी । चित्रगुप्त साथ धर्मराज बड़ी चिन्तामें पड़े और सोचने लगे— ' इसने तो भूतलपर क्षणभर भी कभी कोई पुण्य नहीं किया है । ' नरेश्वर! इसी समय धर्मराजकी सभामें व्यासजी पधारे । उनकी विधिपूर्वक पूजा करके परम बुद्धिमान् धर्मात्मा धर्मराजने उन्हें प्रणाम करके पूछा ॥ ३२-३६ ॥ यम बोले- भगवन्! इस पापीने पहले कभी कहीं कोई सुकृत नहीं किया है । इसलिये जिसमें फेन उठ रहा था, ऐसे खौलते हुए तेल से भरे कुम्भीपाक के महान् कड़ाहमें इसको फेंका गया था । इसके डालते ही वहाँकी आग तत्काल शीतल हो गयी । इस संदेहके कारण मेरे चित्तमें निश्चय ही बड़ा खेद है ॥ ३७-३८ ॥ श्रीव्यासजीने कहा – महाराज! पाप - पुण्यकी गति उसी प्रकार बड़ी सूक्ष्म होती है, जैसे सम्पूर्ण शास्त्रोंके विद्वानोंमें श्रेष्ठ प्रज्ञावान् पुरुषोंने ब्रह्मकी गति सूक्ष्म बतायी है । दैवयोगसे इसको स्वयं ही प्रत्यक्ष एवं सार्थक पुण्य प्राप्त हो गया है । महामते! जिस पुण्यसे वह शुद्ध हुआ है, उसे बताता हूँ; सुनो । जहाँ किसीके हाथसे द्वारकाकी मिट्टी पड़ी हुई थी, वहीं इस पापीकी मृत्यु हुई है । उस मृत्तिकाके प्रभावसे ही यह पापी शुद्ध हो गया है । जिसके अङ्गमें गोपीचन्दनका लेप हो, वह ' नर ' से ' नारायण ' हो जाता है । उसके दर्शनमात्रसे तत्काल ब्रह्महत्या छूट जाती है ॥ ३ ९ -४२ ॥ नारदजी कहते हैं - राजन्! यह सुनकर धर्मराज उसे ले आये और इच्छानुसार चलनेवाले एक विशेष विमानपर उसे बैठाकर उन्होंने प्रकृतिसे परे वैकुण्ठधामको भेज दिया । गोपीचन्दनके सुयश ( प्रताप ) का ज्ञान उनको अकस्मात् उसी समय हुआ । राजन्! इस प्रकार मैंने तुम्हें गोपीचन्दनकी महिमा बतायी । जो श्रेष्ठ मनुष्य गोपीचन्दनके इस माहात्म्यको सुनता ह, वह महात्मा श्रीकृष्णके परमधाममें जाता है॥४३-४४ ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें द्वारकाखण्डके अन्तर्गत नारद- व्यास - संवादमें ' कपिटङ्क, नृगकूप तथा गोपी भूमिकी महिमाका वर्णन ' नामक पंद्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५ ॥
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सोलहवाँ अध्याय सिद्धाश्रमकी महिमाके प्रसङ्गमें श्रीराधा और गोपाङ्गनाओंके साथ श्रीकृष्ण और उनकी सोलह हजार रानियोंका समागम नारदजी कहते हैं - महामते विदेहराज! अब सिद्धाश्रमका माहात्म्य सुनो, जिसका स्मरण करने मात्रसे समस्त पाप छूट जाते हैं । जिसके स्पर्शमात्रसे साक्षात् श्रीहरिसे कभी वियोग नहीं होता, उसी तीर्थको पुराणवेत्ता पुरुष ' सिद्धाश्रम ' कहते हैं । जिसके दर्शनसे सालोक्य, स्पर्शसे सामीप्य, जिसमें स्नान करनेसे सारूप्य और जहाँ निवास करनेसे सायुज्य मोक्षकी प्राप्ति होती है, उसे ही ' सिद्धाश्रम ' जानो ॥ १-३ ॥ एक समय चद्ररानना सखीके मुखसे सिद्धाश्रम तीर्थका माहात्म्य सुनकर श्रीकृष्णके वियोगसे व्याकुल हुई श्रीराधाने उसमें नहानेका विचार किया । वैशाख मासमें सूर्यग्रहणके पर्वपर सिद्धाश्रम तीर्थकी यात्राके लिये कदली - वनसे उठकर श्रीराधाने गोपाङ्गनाओंके सौ यूथ और समस्त गोपगणोंके साथ वहाँ जानेका मन - ही - मन निश्चय किया । श्रीदामाके शापके कारण होनेवाले श्रीकृष्णवियोगके सौ वर्ष बीत चुके थे । श्रीराधिका शिविकामें आरूढ़ हुईं । उनपर छत्र - चँवर डुलाये जाने लगे । इस प्रकार वे सती श्रीराधा आनर्त-देशके महातीर्थ सिद्धाश्रमको गयीं ॥ ४–७ ॥ नरेश्वर! वहीं साक्षात् भगवान् श्रीकृष्ण अपनी सोलह हजार रानियोंके साथ यादवगणोंसे घिरे हुए तीर्थयात्राके लिये आये । करोड़ों बलिष्ठ गोपाल हाथोंमें अस्त्र - शस्त्र लिये श्रीराधिकाकी आज्ञाके अनुसार सिद्धाश्रमकी चारों ओरसे रक्षा कर रहे थे । गोपियोंके सौ यूथ भी बड़े शक्तिशाली थे । वे तथा अन्य गोपाङ्गनाएँ हाथोंमें बेंतकी छड़ी लिये सिद्धाश्रममें विधिपूर्वक स्नान करती हुई श्रीराधाकी सेवामें तत्पर थीं । द्वारकावासी स्नानकी इच्छासे वहाँ आकर खड़े थे । शस्त्र और वेत्र धारण करनेवाले गोपोंने उन्हें मार - मारकर दूर हटा दिया । इसी समय भगवान् श्रीकृष्णकी रानियोंने सिद्धाश्रममें प्रवेश किया । उन रानियोंने भगवान् श्रीकृष्णसे पूछा – ' देवकीनन्दन! आप सर्वज्ञ हैं, अतः हमें बताइये, यह कौन स्त्री स्नान कर रही है, जिसका वैभव अद्भुत दिखायी देता है तथा जिसका गौरव मानकर समस्त यादव - पुंगव यहाँ भयभीत से खड़े हैं । अहो! यह किसकी प्रिया है, इसका क्या नाम है और यह कहाँकी रहने-वाली है? ॥ ८–१३ ॥ श्रीभगवान् बोले – ये साक्षात् वृषभानुकी पुत्री कीर्तिनन्दिनी श्रीराधा हैं, जो सम्पूर्ण व्रजकी अधीश्वरी, गोपाङ्गनाओंकी स्वामिनी तथा मेरी प्राणवल्लभा हैं । ये व्रजसे गोपीगणोंके साथ सिद्धाश्रममें स्नान करनेके लिये आयी हैं । इन्हींके गौरवसे ये यादव त्रस्त होकर खड़े हैं । इन्हींका यह अद्भुत वैभव है ॥१४- १५ ॥ श्रीकृष्णकी यह बात सुनकर अपने अनुपम रूप और यौवनपर गर्व करनेवाली भामिनी सत्यभामा अपनी सौतोंके बीच धीरे - धीरे बोलीं- ' क्या राधा ही रूपवती हैं, मैं रूपवती नहीं हूँ? पूर्वकालमें बहुतसे लोगोंने मेरी याचना की थी । मैं अपने रूप और औदार्य - गुणसे सदा ही पूजित रही हूँ । सखियो! मेरे रूपके ही कारण शतधन्वाकी मृत्यु हुई, अक्रूर और कृतवर्माको यदुपुरीसे पलायन करना पड़ा । जो स्यमन्तकमणि प्रतिदिन अपने - आप आठ भार सुवर्णकी सृष्टि करती है, जिसके रहनेसे दुर्भिक्ष, महामारी आदि कष्ट स्वतः भाग जाते हैं तथा जिसकी पूजाके स्थानमें सर्प, आधि - व्याधि, अमङ्गल और मायावी लोग नहीं रह पाते, मेरे पिताने वही स्यमन्तक-मणि मेरे दहेजमें दी थी । उस मणिसे मेरे घरमें भी सम्पूर्ण अद्भुत वैभव प्रकट हो गया है । मैं अपने महान् प्रेमसे श्रीकृष्णको वशमें रखती हूँ, उनके साथ गरुडपर बैठकर यात्रा करती हूँ । प्राग्ज्योतिषपुरमें भौमासुरके साथ जो महान् युद्ध हुआ था, उसे मैंने अपनी आँखोंसे देखा है । मेरी ही कृपासे तुम सब प्राग्ज्योतिषपुरसे द्वारकापुरीमें आयीं और सब - की - सब श्रीकृष्णकी पत्नी हुईं, इसमें संशय नहीं है । मेरी ही बातका आदर करके इन श्रीकृष्णने इन्द्रको छत्र दिया ।
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२७२ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ द्वारकाखण्ड मेरा ही प्रिय करनेकी इच्छासे इन्होंने देवमाता अदितिको उनके दोनों कुण्डल अर्पित किये । ऐरावतके वंशमें उत्पन्न बड़े - बड़े गजराज, जो भौमासुरकी सम्पत्ति थे, मेरी ही इच्छासे महात्मा श्रीकृष्णद्वारा द्वारकामें लाये गये । मेरे ही कारण श्रीहरिने देवराज इन्द्रसे भी महान् वैर ठान लिया । मेरे द्वारपर वृक्षराज पारिजात सदा सुशोभित होता है । मैंने अपने पातिव्रतधर्मसे ही श्रीकृष्णको वशमें कर रखा है । मैंने समस्त सामग्रियोंके साथ नारदजीके हाथ श्रीकृष्णका दान कर दिया था । मेरे समान गौरव और वैभव किसी भी स्त्रीको नहीं प्राप्त हो सकता । रूप और उदारता भी मेरे तुल्य किसी भी स्त्रीमें नहीं है । फिर राधाकी तो बात ही क्या है? जिनके रूपपर चेदिराज शिशुपाल आदिने रणभूमिमें श्रीकृष्णके साथ युद्ध छेड़ दिया था, उन रुक्मिणीका रूप - सौन्दर्य क्या किसीसे कम है? सुन्दर भौंहोंवाली बहिन रुक्मिणी! तुम क्योंकर रूपवती नहीं हो? सखियो! राधा एक गोपकी कन्या है और तुम सब राजकुमारियाँ हो; सभी धन्य और मान्य हो तथा मानवती स्त्रियोंमें श्रेष्ठ हो ' ॥ १६ - २ ९ ॥ मिथिलेश्वर! सत्यभामाके इस प्रकार कहनेपर रुक्मिणी आदि सभी श्रेष्ठ रानियाँ मानवती हो गयीं । उन सबको अपने कुल, कौशल, शील, धन, रूप और यौवनपर गर्व था । वे आठों पटरानियाँ सबको मान देनेवाले श्रीकृष्णसे बोलीं ॥३०-३१ ॥ रानियाँ बोलीं- प्रभो! आपके मुँहसे पहले हमने राधाके रूपकी बड़ी बड़ाई सुनी है, जिनके प्रति तुम सदा अनुरक्त रहते हो और वे भी सदा तुम्हारे अनुरागके रंगमें रँगी रहती हैं । आज हम उन्हीं तुम्हारी व्रजवासिनी प्रियतमा राधाको देखना चाहती हैं, जो सदा तुम्हारे वियोगसे खिन्न रहती हैं और यहाँ स्नानके लिये आयी हुई हैं ॥ ३२-३३ ॥ नारदजी कहते हैं— राजन्! तब ' तथास्तु ' कहकर पटरानियोंसे घिरे हुए श्रीकृष्ण सोलह हजार रानियोंके साथ श्रीराधाका दर्शन करनेके लिये गये । इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें द्वारकाखण्डके अन्तर्गत ' श्रीराधाके रूपका दर्शन ' नामक सोनेके रमणीय शिविरमें— जो ध्वजा - पताकाओं से सुशोभित था और जिस सुन्दर शिविरमें चन्द्र-मण्डलकी शोभाको तिरस्कृत करनेवाला चँदोवा तना था; मोतियोंकी झालरोंसे युक्त परदा लगा था और जहाँ स्वच्छ वस्त्रोंका सुन्दर बिछौना बिछा था; मालतीके मकरन्द एवं इत्र आदिकी सुगन्ध जहाँ सब ओर छा रही थी और उसीके कारण भ्रमरावलियाँ जहाँ मधुर गुञ्जन कर रही थीं- पटरानी श्रीराधा, जिनका चित्त श्रीकृष्णने चुरा लिया था, विराजमान थीं और सखियाँ हंसके समान श्वेत एवं दिव्य व्यजन डुलाकर उनकी सेवा करती थीं । कोई सखी उनके ऊपर छत्र ताने हुए थीं, कुछ सखियाँ झूलेकी डोर पकड़कर झुला रही थीं और कुछ इधर - उधर आती-जाती दिखायी देती थीं । श्रीराधाके कानोंमें बालरविके समान कान्तिमान् कुण्डल झलमला रहे थे । विद्युत्के समान उद्दीप्त माला धारण करनेके कारण उनकी मनोहरता और भी बढ़ गयी थी । उनके श्रीअङ्गोंसे कोटि चन्द्रमाओंके समान प्रकाश फैल रहा था । वे तन्वङ्गी तथा कोमलाङ्गी थीं । वे अपने पैरोंकी सुन्दर अङ्गुलियोंके अग्रभागसे पुष्पाच्छादित मनोहर भूमिपर अत्यन्त कोमल चरणारविन्द धीरे- धीरे रख रही थीं ॥ ३४-४० ॥ महाराज! उन श्रीराधाको दूरसे श्रीकृष्णकी वे सहस्र रानियाँ उनके मोहित होकर मूर्च्छित हो गयीं । उनके कान्ति उसी तरह विलुप्त हो गयी, जैसे तारिकाएँ । इन्हें जो रूपका अभिमान रहा । ये सब रानियाँ परस्पर इस लगीं- अहो! ऐसा अद्भुत रूप तो कहीं भी नहीं है । हमने इनके अद्वितीय ही देखकर रूपसे अत्यन्त तेजसे इनकी सूर्योदय होनेपर था, वह जाता प्रकार कहने तीनों लोकोंमें मनोहर रूपको जैसा सुना था, वैसा ही देखा । ' इस प्रकार आपसमें बात करती हुई वे रानियाँ श्रीकृष्णको आगे करके श्रीराधिकाके पास जा पहुँचीं । गोपाङ्गनाओं तथा राजकुमारियोंके नेत्र आपसमें मिले ॥ ४१ - ४४ ॥ नारद - बहुलाश्व - संवादमें सिद्धाश्रम - माहात्म्यके प्रसङ्गमें सोलहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १६ ॥
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सत्रहवाँ अध्याय सिद्धाश्रममें श्रीराधा और श्रीकृष्णका मिलन; श्रीकृष्णकी रानियोंका श्रीराधाको अपने शिविरमें बुलाकर उनका सत्कार करना तथा श्रीहरिके द्वारा उनकी उत्कृष्ट प्रीतिका प्रकाशन श्रीनारदजी कहते हैं - राजन्! पटरानियोंसहित श्रीकृष्णको आया देख गोपाङ्गनाएँ अत्यन्त हर्षसे खिल उठीं और तत्काल जय - जयकार करने लगीं । श्रीराधा सहसा उठीं और हाथ जोड़, श्रीहरिकी परिक्रमा करके अपने कमलोपम नेत्रोंसे आनन्दके आँसू बहाने लगीं । उन्होंने श्रीकृष्णके बैठनेके लिये एक सोनेका सिंहासन दिया, जिसके पायोंमें स्यमन्तकमणि जड़ी हुई थी । पार्श्वभागमें चिन्तामणि जगमगा रही थी, मध्यभागमें पद्मरागमणि शोभा दे रही थी । वह सिंहासन चन्द्र-मण्डलके समान गोलाकार था । उसकी पादपीठिकामें कौस्तुभमणियाँ जड़ी गयी थीं । वह सिंहासन कुण्ड -मण्डलसे मण्डित था; पारिजातके पुष्पोंसे सज्जित और अमृतवर्षी छत्रसे अलंकृत था ॥ १-४ ॥ उन्हें सिंहासन देकर श्रीराधा हासयुक्त मुखसे बोलीं- ' आज मेरा जन्म सफल हो गया, आज मेरी तपस्याका फल मिल गया । श्रीहरे! तुम आ गये तो आज मेरा धर्म - कर्म सफल हो गया । श्रीसिद्धाश्रमका स्नान धन्य है, जिससे मेरा मनोरथ अद्भुत रीतिसे सफल हुआ । मैंने तो कभी तुम्हारी भक्ति भी नहीं की । तुम भक्तोंके सहायक हो । देव! तुमने मेरी सहायताके लिये इस भूतलपर बहुत - से असुरोंको मार भगाया । जिससे त्रिलोकविजयी कंस भी डरता था, उस शङ्खचूडको तुमने मेरे कहने से मार गिराया । हरे! मेरे प्रति प्रेम रखनेके कारण ही तुमने व्रजमण्डलमें देवलोकका वैभव दिखाया । देव! तुमने बलपूर्वक इन्द्रका मान भङ्ग किया और मेरे ही कारण व्रजकी रक्षा करते हुए गोवर्धन पर्वतको धारण किया । रासमण्डलमें गोपियोंने तुम्हारा यथेष्ट आलिङ्गन किया और तुम उनके वशमें हो गये । देव! तुम्हारा यह चरित्र नरलोककी विडम्बनामात्र है ' ॥५–१० ॥ श्रीनारदजी कहते हैं - राजन्! यों कहती हुई श्रीराधाने चन्द्राननाकी प्रेरणासे तुरंत श्रीकृष्णकी रानियोंपर दृष्टिपात किया और बड़े आदरके साथ उन सबको सम्मान दिया । रुक्मिणी, जाम्बवती, सत्यभामा, सत्या, भद्रा, लक्ष्मणा, कालिन्दी और मित्रविन्दासे परस्पर गले मिलकर, रोहिणी आदि सोलह हजार रानियों को भी प्रेमानन्दमयी श्रीराधाने दोनों भुजाओंसे पकड़कर सानन्द हृदयसे लगाया ॥ ११–१३ ॥ श्रीराधा बोलीं- बहिनो! जैसे चन्द्रमा एक है, किंतु उससे स्नेह रखनेवाले चकोर बहुत हैं, जैसे सूर्य एक हैं, किंतु उन्हें देखनेवाली दृष्टियाँ बहुत हैं, उसी प्रकार भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र एक हैं, किंतु इनमें भक्ति-भाव रखनेवाली हम सब बहुत - सी स्त्रियाँ हैं । जैसे कमलके प्रभावको भ्रमर जानता है तथा रत्नके प्रभावको उसकी परख करनेवाला जौहरी जानता है, जैसे विद्याके प्रभावको विद्वान् और काव्यके प्रभावको कवीन्द्र जानता है, जैसे सहस्रों मनुष्योंके होनेपर भी रसके प्रभावको केवल रसिक जानता है, उसी प्रकार, हे राजकुमारियो! इस भूतलपर श्रीकृष्णके प्रभावको यथार्थरूपसे इनका भक्त ही जानता है ॥ १४–१६ ॥ श्रीनारदजी कहते हैं - राजन्! श्रीराधाकी बात सुनकर उस समय सपत्नियोंसहित भीष्मनन्दिनी रुक्मिणीने कमललोचना श्रीराधासे कहा ॥ १७ ॥
रुक्मिणी बोलीं- श्रीराधे! वृषभानुनन्दिनि! तुम धन्य हो । तुम्हारे भक्ति भावसे ये श्रीकृष्ण सदा तुम्हारे वशमें रहते हैं । तीनों लोकोंके लोग जिनकी कथा - वार्ता निरन्तर कहते - सुनते हैं, वे ही भगवान् दिन - रात तुम्हारी कथा कहा करते हैं । श्रीहरिके प्रति तुम्हारे प्रेम - भावका स्वरूप जैसा हमने सुना था, वैसा ही देखा । तुम्हारे लिये कुछ भी आश्चर्यकी बात नहीं है । देवि! तुम हमारे शिविरमें शीघ्र चलो; हम सब तुम्हें ले चलनेके लिये ही यहाँ आयी हैं ॥ १८-१९ ॥
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२७४ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ द्वारकाखण्ड श्रीनारदजी कहते हैं - राजन्! यों कहकर भीष्मनन्दिनी रुक्मिणी कीर्तिकुमारी श्रीराधाको बड़े आदरसे महात्मा श्रीकृष्णके साथ अपने शिविरमें ले आयीं । सर्वतोभद्र नामक शिविरमें, जो कमलोंके केसरसे सुवासित था, सोनेके पलंगपर, शिरीष - पुष्पके समान कोमल बिछावन बिछाकर, तकिया लगाकर, वस्त्र, माला और शृङ्गारसामग्रीसे सपत्नियोंसहित सती रुक्मिणीने रात्रिके समय विधिवत् पूजा करके उन्हें सुखपूर्वक ठहराया । फिर गोपाङ्गनाओंके सौ यूथोंका भी पृथक् - पृथक् पूजन करके उन कृष्ण-प्रियाओंने सबके साथ बहुविध वार्तालाप किया । फिर श्रीराधाको वहाँ सुलाकर वे रानियाँ प्रसन्नतापूर्वक अपने - अपने शिविरमें गयीं । श्रीकृष्णके पास पहुँचकर रुक्मिणीने देखा कि वे बैठे - बैठे जग रहे हैं । तब उन्होंने श्रीकृष्णसे पूछा - ' स्वामिन्! आप सोते क्यों नहीं? ' ॥ २० -२४ ॥ श्रीभगवान् बोले – शुभ्र! तुमने अगवानी करके, विनयपूर्वक प्रेमभरी बातें सुनाकर, आश्वासन देकर व्रजेश्वरी श्रीराधाकी भलीभाँति पूजा की है और वे अत्यन्त प्रसन्न हुई हैं; परंतु एक बातकी ओर तुमने ध्यान नहीं दिया । वे प्रतिदिन सोनेसे पहले उत्तम दूध पिया करती हैं, किंतु सुन्दरि! आज श्रीराधाने दुग्धपान नहीं किया । महामते! इसीलिये अबतक उनके नेत्रोंमें नींद नहीं आयी है; और भीष्मनन्दिनि! यही कारण है कि मैं भी नहीं सो सका हूँ ॥ २५-२७ ॥ श्रीनारदजी कहते हैं - राजन्! पतिदेवताकी यह उत्तम बात सुनकर रुक्मिणी अपनी सौतोंके साथ दूध लेकर बड़े आदरसे श्रीराधाके समीप गयीं । सोनेके कटोरेमें मिश्री मिलाया हुआ गरम दूध डालकर भीष्मकनन्दिनीने बड़े प्रेमसे श्रीराधाको पिलाया । इस प्रकार विधिवत् पूजा करके उनके हाथमें पानका बीड़ा दिया और सत्यभामा आदि सपत्नियोंके साथ अपने शिविरमें लौट आयीं ॥ २८ - ३० ॥ श्रीकृष्णके समीप आकर शुभस्वरूपा श्रीरुक्मिणी अपने द्वारा की गयी दूध पहुँचाने और पिलानेकी सेवाका वर्णन करते हुए साक्षात् श्रीकृष्णके चरणारविन्दोंकी सेवामें लग गयीं । अपने कोमल कर- पल्लवोंसे निरन्तर रुक्मिणी श्रीकृष्णके आश्चर्यसे चकित हो आपके चरण- तलोंमें भगवन्! ये आज ही इसका कारण क्या है । ' को प्रकाशित करनेके सामने स्वयं रुक्मिणीसे श्रीचरणोंका लालन करती हुई पाद - तलमें नये छाले देख उठीं । उन्होंने पूछा- ' प्रभो! छाले कैसे उभड़ आये हैं? उभड़े हैं । मैं नहीं जानती कि तब श्रीहरिने श्रीराधाकी भक्ति-लिये सोलह हजार रानियोंके कहा ॥ ३१ - ३४ ॥ श्रीभगवान् बोले – श्रीराधिकाके हृदयारविन्दमें मेरा चरणारविन्द सदा विराजमान रहता है; उनके प्रेमपाशमें बँधकर वह निरन्तर वहीं रहता है, कभी निमेषमात्रके लिये भी अलग नहीं होता । आज तुमलोगोंने उन्हें कुछ अधिक गरम दूध पिला दिया है । वह दूध मेरे पैरोंपर पड़ा और उनमें छाले पड़ गये । तुम सबने उन्हें थोड़ा गरम दूध नहीं दिया, अधिक गरम दूध दे दिया ॥ ३५-३६ ॥ श्रीनारदजी कहते हैं— नरेश्वर! श्रीकृष्णकी बात सुनकर रुक्मिणी आदि सुन्दरियाँ बड़े प्रेमसे उनके पैर सहलाने लगीं और उन्हें सब ओरसे बड़ा विस्मय हुआ । वे परस्पर कहने लगीं - ' मधुसूदन माधवमें श्रीराधाकी प्रीति बहुत ही उच्च कोटिकी है । उनकी समानता करनेवाली कोई स्त्री नहीं है । ये श्रीराधा इस भूतलपर अद्वितीय नारी हैं ' ॥ ३७-३८ ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें द्वारकाखण्डके अन्तर्गत नारद - बहुलाश्व - संवादमें सिद्धाश्रममें श्रीराधाकृष्ण- समागमके प्रसङ्गमें ' श्रीराधाके प्रेमका प्रकाश ' नामक सत्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १७ ॥