गर्ग संहिता — पृष्ठ 261–270
गर्ग संहिता · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 261–270
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अध्याय ७ ] श्रीकृष्णके हाथोंसे रुक्मीकी पराजय तथा द्वारकामें रुक्मिणी और श्रीकृष्णका विवाह २५५ टेढ़ा दाँत बच रहा था, वह भी भूमिपर गिर पड़ा । फिर तो रुक्मिणीसहित दैत्यनाशन श्रीहरि हँसने लगे । इसी समय रोषसे भरे हुए बलदेवजीने अपने मुसलसे शीघ्रतापूर्वक पौण्ड्रक, जरासंध तथा दुष्ट विदूरथको भी चोट पहुँचायी । ये तीनों ही वीर खूनसे लथपथ हो युद्धभूमिमें मूच्छित होकर गिर पड़े ॥ ३६-४१ ॥ इसके बाद वहाँ आयी हुई सारी सेनाको कुपित हुए महाबली बलदेवने हलसे खींचकर मुसलकी मारसे मौत के घाट उतार दिया । उस समराङ्गणमें दस योजन दूरतक हाथी, घोड़े और पैदल सैनिक पिस उठे, चूर - चूर हो गये और धरतीपर सदाके लिये सो गये । तब मरनेसे बचे हुए जरासंध आदि समस्त नरेश मैदान छोड़कर भाग गये और जिसकी उमंग नष्ट हो गयी थी तथा जो अत्यन्त हतोत्साह हो चला था, उस शिशुपालके पास जाकर बोले – ' पुरुषसिंह! तुम अपने मनकी इस ग्लानिको त्याग दो । एक विवाह तो क्या, इस भूतलपर तुम्हारे सौ विवाह हो जायँगे । हमलोग आज ही द्वारकामें चलकर बलराम और श्रीकृष्णको बाँध लेंगे तथा समुद्रकी काञ्ची धारण करनेवाली इस पृथ्वीको यादवोंसे सूनी कर डालेंगे ' ॥४२–४६ ॥ इस प्रकार मित्रोंके प्रबोध देनेपर चेदिराज शिशुपाल चन्द्रिकापुरको चला गया और मरनेसे बचे हुए दूसरे समस्त नरेश भी अपने - अपने नगरको पधारे ॥ ४७ ॥
इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें द्वारकाखण्डके अन्तर्गत नारद - बहुलाश्व - संवादमें ' रुक्मिणी हरण और यदुवंशियोंकी विजय ' नामक छठा अध्याय पूरा हुआ ॥ ६ ॥
सातवाँ श्रीकृष्णके हाथोंसे रुक्मीकी पराजय तथा श्रीनारदजी कहते हैं— रुक्मिणीके हरण और मित्रोंकी पराजयका वृत्तान्त सुनकर भीष्मकपुत्र रुक्मीने समस्त भूपालोंके सुनते हुए यह प्रतिज्ञा की— ' राजाओ! मैं आपलोगोंके सामने यह सच्ची प्रतिज्ञा करता हूँ कि युद्धमें श्रीकृष्णको मारकर रुक्मिणीको लौटाये बिना मैं कुण्डिनपुरमें प्रवेश नहीं करूँगा ' ॥१-२ ॥ यों कहकर उस महा उद्भट वीरने दिव्य कवच धारण किया, जो ठोस देखकर ऐसा प्रतीत होता निर्मित हुआ हो । फिर शिरस्त्राण ( टोप ) रखा; सुन्दर धनुष, लाट देशके तलवार, कुटज देशकी गुजरातकी गदा, बंगालका एवं श्यामवर्णका था । उसे था, मानो वह नील मेघसे उसने सिरपर सिन्धुदेशीय सौवीर देशका बना हुआ दो तरकस, म्लेच्छ देशकी ढाल, येठरकी महाशक्ति, परिघ और कोङ्कण देशका हस्तत्राण ( दस्ताना ) धारण करके अङ्गुलियोंमें गोधाके चर्मसे निर्मित अङ्गुलित्राण बाँध लिया और किरीट, रत्नमय कुण्डल तथा सोनेके बाजूबंदसे विभूषित हो अध्याय द्वारकामें रुक्मिणी और श्रीकृष्णका विवाह रुक्मीने युद्ध करनेका निश्चय किया । फिर चञ्चल घोड़ोंसे युक्त जैत्ररथपर आरूढ़ हो, दो अक्षौहिणी सेना साथ लिये उसने श्रीकृष्णका पीछा किया । शत्रुओंकी सेनाको पुनः आती देख महाबली बलरामने यादवोंकी सेना साथ ले समराङ्गणमें उसका सामना किया । रुक्मी बार - बार धनुष टंकारता और कठोर वचन बोलता हुआ अतिरथी देवेश्वर श्रीकृष्णके पास जा पहुँचा और बोला- ' अरे! खड़ा रह, खड़ा रह । यदि जीवित रहना चाहता है तो तुरंत मेरी बहिनको छोड़ दे । नहीं तो मैं सेनासहित तुझे इसी समय यमलोकको भेज दूँगा । तेरे कुलपर राजा ययातिका शाप लगा हुआ है और तू ग्वालोंकी जूठन खानेवाला है । जरासंधके भयसे भीत रहता है और कालयवनके आगेसे पीठ दिखाकर भाग चुका है ' ॥ ३ – ११ ॥ यों कहकर उसने अपने तरकससे एक बाण निकालकर धनुषपर चढ़ा दिया और उसे कान खींचकर श्रीकृष्णकी छातीको लक्ष्य करके चला दिया । उस बाणसे आहत होनेपर भी भगवान्
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२५६ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ द्वारकाखण्ड श्रीकृष्णने एक सायकसे उसके धनुषकी टंकार करने-वाली प्रत्यञ्चा इस प्रकार काट दी, मानो गरुडने किसी सर्पिणीको छिन्न - भिन्न कर डाला हो । फिर रुक्मीने शीघ्र ही अपने धनुषपर टंकार ध्वनि करनेवाली दूसरी स्वर्णभूषित प्रत्यञ्चा चढ़ा ली और दस बाणोंद्वारा रणभूमिमें श्रीहरिको घायल कर दिया । तब श्रीकृष्णने एक बाण मारकर रुक्मीके प्रत्यञ्चासहित धनुषको उसी क्षण वैसे ही काट दिया, जैसे ज्ञानके द्वारा त्रिगुणात्मक संसार - बन्धनको काट दिया जाता है । श्रीकृष्णने अपने अमोघ बाणद्वारा बीचसे ही उसके धनुषके दो टुकड़े कर दिये । फिर उन्होंने रुक्मीको सौ बाण मारकर युद्धमें क्षत - विक्षत कर दिया । धनुष कट जानेपर विदर्भराजकुमारने श्रीहरिके ऊपर चमचमाती हुई महाशक्ति उसी प्रकार चलायी, जैसे किसी मुनिने विज्ञानके लिये महाशक्तिका प्रयोग किया हो । गदाधारी भगवान् गदाग्रजने अपनी गदासे उस महाशक्तिपर प्रहार किया, जिससे उसके दो टुकड़े हो गये । उस खण्डित शक्तिने रुक्मीके ही सारथिको मार डाला । भगवान्की वेगशालिनी कौमोदकी नामवाली भारी गदाने रुक्मीके रथके ऊपर पड़कर उसे घोड़ोंसहित उसी प्रकार चूर्ण कर दिया, जैसे वज्रके प्रहारसे कोई पर्वत चकनाचूर हो गया हो । तब भीष्मकुमार रुक्मीने भी श्रीहरिपर गदा चलायी, किंतु भगवान्ने उसे पुनः चक्र चलाकर चूर्ण कर दिया । सोनेके बाजूबंदसे विभूषित बलवान् रुक्मीने बंगालका परिघ हाथमें लेकर उसके द्वारा श्रीहरिके कंधेपर प्रहार किया और उस युद्ध - भूमिमें मेघके समान गर्जना करने लगा । परिघसे ताडित होनेपर भी पुष्पमालाके आघातको कुछ भी न गिननेवाले हाथीकी भाँति भगवान् अविचल रहे । उन्होंने उसी परिघसे समराङ्गणमें रुक्मीपर आघात किया । परिघकी चोट खाकर रुक्मी मन - ही - मन कुछ व्याकुल हो उठा । फिर उसने युद्धभूमिमें माधवकी भर्त्सना करते हुए ढाल और तलवार हाथमें ले ली । भगवान्ने भी अपने खड्गका प्रहार करके उसकी ढाल और तलवार काट दी । उस खड्गके अग्रभागसे रुक्मीका शिरस्त्राण और विशाल कवच कटकर गिर पड़े । लगे - हाथ उसके दस्ताने भी काट दिये गये । अब उस युद्धमें रुक्मीके हाथमें केवल तलवारकी मुट्ठी रह गयी थी । उस दशामें अपने पास आये हुए रुक्मीको श्रीहरिने भुजदण्डोंसे पकड़कर पृथ्वीपर दे मारा और जैसे मृगके ऊपर सिंह सवार हो जाय, उसी प्रकार वे उसके ऊपर चढ़ गये तथा रोषपूर्वक तीखी धारवाले अपने नन्दक नामके खड्गको हाथमें ले लिया । श्रीकृष्णको अपने भाईके वधके लिये उद्यत देख रुक्मिणी भयसे विह्वल हो उठी और पतिके चरणोंमें गिरकर उस सती - साध्वी राजकुमारीने करुणस्वरमें कहा॥१२–२७ ॥ श्रीरुक्मिणी बोली- अनन्त! देवेश्वर! जगन्निवास! योगेश्वर! आपकी शक्ति अचिन्त्य है । आप इस जगत्के पालक हैं । अतः करुणासागर! आपके द्वारा शालके समान विशाल भुजावाले मेरे भाईका वध होना उचित नहीं है ॥ २८ ॥
श्रीनारदजी कहते हैं- राजन्! डरके मारे विलाप करती हुई रुक्मिणीका मुँह दुःखके कारण सूख गया था । उसका कण्ठ रुँध गया । अपनी प्रिया सती रुक्मिणीकी ऐसी अवस्था देखकर श्रीहरि रुक्मीके वधसे विरत हो गये । फिर उसीके कमरबन्धसे बाँध-कर तीखी धारवाले खड्गसे श्रीहरिने रुक्मीके आधे मुखकी दाढ़ी - मूँछके बाल साफ कर दिये ॥ २ ९ -३० ॥ इतनेमें ही दो अक्षौहिणी सेनाको परास्त करके सैनिकोंसहित बलरामजी वहाँ आ पहुँचे । उन्होंने देखा कि रुक्मी कुरूप और दीन अवस्थामें बँधा पड़ा है । फिर तो उनके हृदयमें दया आ गयी और उसका बन्धन खोलकर बलरामजीने श्रीहरिको फटकारते हुए कहा— ' कृष्ण! तुमने यह अच्छा नहीं किया, यह लोकनिन्दित कर्म है । अपनी पत्नीके भाइयोंके साथ इस प्रकार परिहास नहीं किया जाता । जिसके बड़े भाईको तुमने विरूप कर दिया, वह रुक्मिणी भाईकी इस दुर्दशासे चिन्तित होकर तुम्हें क्या कहेगी? ' श्रीकृष्णसे यों कहकर वे रुक्मिणीसे बोले - " कल्याणि! तुम शोक न करो । शुचिस्मिते! स्वस्थ हो जाओ । आर्यकुमारी! महामते! तुम शोक बिलकुल छोड़ दो, मनमें दुःख मत मानो । प्रिय अथवा अप्रिय जो भी प्राप्त होता है, वह सब मैं कालका
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अध्याय ८ ] श्रीकृष्णका सोलह हजार एक किया हुआ मानता हूँ । जैसे घनमाला वायुके अधीन होती है, उसी प्रकार यह सारा जगत् कालके वशीभूत है । उस कालको तुम कलना करनेवालोंका स्वामी परमेश्वर एवं विष्णु समझो । ' मैं ' और ' मेरा ' यह भाव ही जगत्के लिये बन्धनका कारण होता है । अहंता और ममतासे रहित भाव ही ' मोक्ष ' है, इसमें संशय नहीं है; सुख और दुःख देनेवाला दूसरा कोई नहीं है । यह सब लोगोंका अपना भ्रम ही है । शत्रु मित्र और उदासीनकी कल्पना संसारी लोगोंद्वारा अज्ञानके कारण की गयी है " ॥ ३१–३८ ॥ इस प्रकार भगवान् बलरामके समझानेपर भीष्मकपुत्र रुक्मी वैमनस्य छोड़कर चला गया और रुक्मिणीको भी प्रसन्नता हुई । रुक्मीका मनोरथ व्यर्थ हो चुका था, बलराम और श्रीकृष्णके द्वारा जीवित छोड़ दिये जानेपर अपने विरूपकरणकी घटनाको याद करके उसने तपस्यामें लग जानेका विचार किया । किंतु मुख्य - मुख्य मन्त्रियोंके मना करनेपर उसने तपका सौ आठ रानियोंके साथ विवाह २५७ विचार छोड़ दिया, तथापि कुण्डिनपुरमें फिर पैर नहीं रखा । रुक्मीने अपने निवासके लिये भोजकट नामक एक उत्तम नगरका निर्माण कराया ॥ ३ ९ —४१ ॥ राजन्! बलराम और यदुवंशी योद्धाओंसे घिरे हुए रुक्मिणीसहित भगवान् गोविन्द अपनी विजय-दुन्दुभि बजवाते हुए द्वारकाको चले गये । वहाँ बड़ा भारी उत्सव मनाया गया । मार्गशीर्ष मासमें साक्षात् श्रीहरिने वैदिकविधिके अनुसार रुचिर मुखवाली रुक्मिणीके साथ विवाह किया । रुक्मिणीपति श्रीहरिका विवाह सम्पन्न हो जानेपर श्रीरुक्मिणी देवी उनके रुक्म-मन्दिर ( सुवर्णमय भवन ) - की शोभा बढ़ाने लगीं । पुण्यवती द्वारकापुरी उस समय देवराज इन्द्रकी अमरावतीके समान सुशोभित हो रही थी । भीष्म-नन्दिनी रुक्मिणीके विवाहकी इस विचित्र कथाको जो भक्तिभावसे सुनता और सुनाता है, वह भक्त इस लोकमें भी वैभवसे सम्पन्न रहता है और देहावसान के पश्चात् वही मोक्षका भागी होता है॥४२–४५ ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें द्वारकाखण्डके अन्तर्गत नारद - बहुलाश्व - संवादमें ' श्रीरुक्मिणीका विवाह ' नामक सातवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७ ॥
आठवाँ अध्याय श्रीकृष्णका सोलह हजार एक सौ आठ रानियोंके साथ विवाह और उनकी संतति वर्णन; प्रद्युम्नका प्राकट्य तथा रति और रुक्म - पुत्रीके साथ उनका विवाह श्रीनारदजी कहते हैं— मिथिलेश्वर! अब श्रीकृष्णकी अन्य पत्नियोंके मङ्गलमय विवाहका वृत्तान्त सुनो, जो समस्त पापको हर लेनेवाला, पुण्यदायक तथा आयुकी वृद्धिका सर्वोत्तम साधन है ॥ १ ॥
सत्राजित नामसे प्रसिद्ध यादवको साक्षात् भगवान् सूर्यस्यमन्तक मणि दे रखी थी । भगवान् श्रीकृष्णने राजा उग्रसेनके लिये वह मणि माँगी । मिथिलेश्वर! सत्राजितने द्रव्यके लोभसे वह मणि नहीं दी; क्योंकि उस मणिसे प्रतिदिन आठ भार सुवर्ण स्वतः प्राप्त होता रहता था । एक दिन सत्राजितका भाई प्रसेन उस मणिको अपने कण्ठमें बाँधकर सिन्धुदेशीय अश्वपर आरूढ़ हो शिकार खेलनेके लिये वनमें विचरने लगा । वहाँ एक सिंहने प्रसेनको मार डाला । फिर उस सिंहको भी जाम्बवान्ने मारा और तत्काल उस मणिको लेकर जाम्बवान् अपनी गुफामें चला गया । सत्राजित लोगों में यह प्रचार करने लगा कि ' मेरा भाई प्रसेन मणिको कण्ठमें धारण करके वनमें गया था, किंतु श्रीकृष्णने वहाँ उसका वध कर दिया; इसीलिये आज सबेरे वह सभाभवनमें नहीं आया'॥२–६ ॥ भगवान्पर कलङ्कका टीका लग गया । वे कुछ नागरिकोंको साथ ले वनमें गये । महामते! वहाँ उन्होंने पहले घोड़ेसहित मरे हुए प्रसेनके और किसी दूसरेके द्वारा मारे गये सिंहके शवको पड़ा देखा । यह देखकर पदचिह्नसे पता लगाते हुए वे ऋक्षराज
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२५८ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ द्वारकाखण्ड जाम्बवान्की गुफातक पहुँच गये । फिर वहाँसे मणि लानेके लिये साक्षात् श्रीहरिने गुफाके भीतर प्रवेश करके अट्ठाईस दिनोंतक युद्ध किया तथा ऋक्षराज जाम्बवान्पर विजय पायी । राजेन्द्र! जाम्बवान्ने अपनी सुन्दरी कन्या जाम्बवतीको उस मणिके साथ श्रीहरिके हाथमें दे दिया । उसे लेकर भगवान् द्वारकामें लौटे । उन्होंने सत्राजितको मणि दे दी और स्वयं कलङ्कसे मुक्त हुए । सत्राजितको अपने कृत्यपर बड़ी लज्जा आयी और वे मुँह नीचे किये भयभीत से रहने लगे । मिथिलेश्वर! उन्होंने यादव - परिवारमें शान्ति रखनेके लिये अपनी पुत्री सत्यभामा तथा उस मणिको भी भगवान्के चरणोंमें अर्पित कर दिया ॥ ७ – ११ ॥ तदनन्तर बन्धुवत्सल भगवान् श्रीकृष्ण पाण्डवोंकी सहायताके लिये इन्द्रप्रस्थ ( दिल्ली ) गये । उन्होंने वर्षाके चार महीने वहीं व्यतीत किये । एक दिन गाण्डीवधारी अर्जुनके साथ रथपर आरूढ़ हो श्रीहरि निर्मल नीरसे भरी हुई यमुनाके तीरपर शिकार खेलनेके लिये विचरने लगे । वहाँ साक्षात् कालिन्दी देवी भगवान् श्रीकृष्णको पतिरूपमें प्राप्त करनेकी इच्छासे तपस्या कर रही थीं । पाण्डव अर्जुनने उन्हें श्रीकृष्णको दिखाया । फिर वे भगवान् उन्हें साथ लेकर इन्द्रप्रस्थ आये । वहाँसे द्वारकामें पहुँचकर उन्होंने मनोहराङ्गी सूर्यकन्या कालिन्दीके साथ विधिपूर्वक विवाह किया । उस समय परम मङ्गलमय उत्सवका विस्तारके साथ आयोजन किया गया था ॥ १२ – १५ ॥ अवन्तीके नरेशकी एक पुत्री थी, जो रूप- लावण्यसे मनको हर लेनेवाली थी । उसका नाम था मित्रविन्दा । भगवान् श्रीकृष्ण रुक्मिणीकी ही भाँति मित्रविन्दाको भी स्वयंवरसे हर लाये ॥ १६ ॥
राजा नग्नजित्के एक पुत्री थी, जो लोगोंमें सत्याके नामसे विख्यात थी । उसके विवाहके लिये राजाने यह प्रतिज्ञा की थी कि ' सात साँड़ोंको जो एक साथ ही नाथ देगा, उसी वीरको मैं अपनी पुत्री दूँगा । ' भगवान् श्रीकृष्णने सब लोगोंके देखते - देखते उन सातों साँड़ोंको नाथकर सत्याके साथ विवाह किया ॥ १७ ॥
केकयराजकुमारी भद्राको भी भगवान् श्रीहरि उसकी इच्छाके अनुसार अपने घर ले आये । वहाँ कालिन्दीकी ही भाँति भद्राके साथ उन्होंने विधिपूर्वक विवाह किया ॥ १८ ॥
राजन्! राजा बृहत्सेनके एक पुत्री थी, जिसे लोग लक्ष्मणा कहते थे । वह समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न थी । उसके यहाँ स्वयंवरमें मत्स्यवेधकी शर्त रखी गयी थी । भगवान्ने उस मत्स्यका भेदन किया और अपने ऊपर आक्रमण करनेवाले शत्रुओंको परास्त करके लक्ष्मणाका हाथ पकड़ा ॥१ ९ ॥ सोलह हजार एक सौ राजकुमारियाँ भौमासुरके कारागारमें बंद थीं । भगवान्ने भौमासुरका वध करके उसकी कैदसे उनको छुड़ाया । उन चारुदर्शना युवतियों-की इच्छा देखकर वे उन्हें अपने साथ ले आये ॥ २० ॥
एक ही मुहूर्तमें विभिन्न भवनोंमें रहती हुई उन युवतियोंके साथ अपनी मायासे उतने ही रूप धारण करके भगवान्ने उन सबका विधिपूर्वक पाणिग्रहण किया । इस प्रकार सोलह हजार एक सौ आठ रानियों-मेंसे प्रत्येकने श्रीकृष्णके दस - दस पुत्र उत्पन्न किये । वे सभी गुणोंमें पिताके समान थे ॥ २१-२२ ॥ भीष्मककन्या रुक्मिणीके गर्भसे सबसे पहले प्रद्युम्न प्रकट हुए । वे कामदेवके अवतार थे और पिताकी ही भाँति समस्त शुभलक्षणोंसे विभूषित थे । निर्दयी शम्बरासुरने दस दिनोंके भीतर ही उन्हें सूतिकागारसे उठाकर समुद्रमें फेंक दिया । वहाँ उन्हें एक मत्स्य निगल गया, तथापि वे श्रीकृष्णकुमार मत्स्यके उदरमें मरे नहीं । वह मत्स्य शम्बरासुरके पाकालयमें चीरा गया तो उसमेंसे प्रद्युम्र निकले । वहाँ उनकी पूर्वपत्नी रतिने उनका पालन किया । जब वे बड़े हुए और युवावस्था प्रारम्भ हुई, तब उन्हें अपने शत्रुकी करतूतका पता चला । राजन्! फिर अपने शत्रु शम्बरासुरका वध करके वे दिव्य भार्या रतिके साथ द्वारकामें आये । उनका वह कर्म बड़ा ही विचित्र एवं अद्भुत था ॥ २३–२६ ॥ राजन्! महारथी श्रीकृष्णपुत्र प्रद्युम्न रुक्मीकी बेटीको भोजकट नगरके स्वयंवरस्थलसे हर लाये और द्वारकामें उसके साथ उनका विवाह हुआ । प्रद्युम्नसे अनिरुद्ध नामक पुत्रका जन्म हुआ, जिसमें दस हजार हाथियोंका बल था । वे ब्रह्माजीके अवतार समझे जाते
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अध्याय ९ ] द्वारकापुरीके पृथ्वीपर आनेका कारण; राजा आनर्तकी तपस्या २५ ९ थे । उनकी कान्ति शरत्कालके प्रफुल्ल नील कमलके मङ्गलमय विचित्र चरित्रका तुमसे वर्णन किया है, जो समान श्याम थी ॥ २७-२८ ॥ समस्त पापोंको हर लेनेवाला, पुण्यदायक तथा इस प्रकार मैंने परिपूर्णतम भगवान्के आयुकी वृद्धिका उत्तम साधन है । राजन्! अब तुम पुनः चतुर्व्यूहावतारका तथा उनके विवाह सम्बन्धी परम क्या सुनना चाहते हो? ॥ २ ९ -३० ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें द्वारकाखण्डके अन्तर्गत नारद - बहुलाश्व - संवादमें ' श्रीकृष्णकी समस्त रानियोंके विवाहका वर्णन ' नामक आठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८ ॥
नवाँ अध्याय द्वारकापुरीके पृथ्वीपर आनेका कारण; राजा आनर्तकी तपस्या और उनपर भगवान् बहुलाश्व बोले – मुने! तीनों लोकोंमें विख्यात द्वारकापुरी धन्य है, जहाँ साक्षात् परिपूर्णतम भगवान् श्रीकृष्ण निवास करते हैं । आपके मुखसे सुना है कि द्वारकापुरी साक्षात् श्रीकृष्णके अङ्गसे प्रकट हुई है; प्रभो! ब्रह्मन्! किस कालमें वह पुरी यहाँ आयी, यह मुझे बताइये ॥ १-२ ॥ श्रीनारदजीने कहा- राजन्! तुम्हें साधुवाद है । तुमने बहुत अच्छा किया, जो द्वारकाके यहाँ आगमनका कारण पूछा, जिसे सुनकर लोकघाती पातकी भी शुद्ध हो जाता है ॥ ३ ॥
मनुके पुत्र शर्याति नामक एक राजा हुए, जो चक्रवर्ती सम्राट् थे । उन्होंने दस हजार वर्षोंतक इस भूतलपर धर्मपूर्वक राज्य किया । उनके तीन पुत्र हुए, जो समस्त धर्मज्ञ पुरुषोंमें श्रेष्ठ थे । उनके नाम थे— उत्तानबर्हि, आनर्त और भूरिषेण । राजा शर्यातिने उत्तानबर्हिको पूर्व दिशा, भूरिषेणको दक्षिण दिशा और आनर्तको सारी पश्चिम दिशाका राज्य दिया । फिर वे पुत्रोंसे बोले – ' यह सारी पृथ्वी मेरी है । मैंने धर्मपूर्वक इसका पालन किया है तथा बलिष्ठ होकर बलपूर्वक इसका अर्जन किया है; अतः तुमलोग इसका पालन करो । ' पिताकी यह बात सुनकर मझले पुत्र ज्ञानी आनर्तने मानो हँसते हुए यह ज्ञानमय वचन कहा ॥ ४–८ ॥ आर्त बोले- राजन्! यह सारी पृथ्वी आपकी नहीं है । न आपने कभी इसका पालन किया है और न आपके बलसे इसका अर्जन हुआ है । राजन्! बलिष्ठ श्रीकृष्णकी कृपा तो भगवान् श्रीकृष्ण ही हैं, अतः यह पृथ्वी श्रीकृष्णदेवकी है । उन्होंने इसका पालन किया और उन्हींके तेजसे इस सम्पूर्ण वसुंधराका अर्जन हुआ है । भगवान् श्रीहरिके समान बलिष्ठ दूसरा कोई नहीं है । वे ही भगवान् अपने द्वारा प्रकट किये गये इस जगत् की सृष्टि, पालन और संहार करते हैं । वे ही परब्रह्म परमात्मा हैं और वे ही भगवान् कलना करनेवालोंके स्वामी ' काल ' हैं । जो सम्पूर्ण भूतोंके भीतर प्रवेश करके सबका आश्रय है, वह विश्वसंज्ञक अधियज्ञ साक्षात् परिपूर्णतम श्रीहरि ही हैं । जिनके भयसे हवा चलती है, जिनके भयसे सूर्य तपते हैं, जिनके भयसे पर्जन्यदेव वर्षा करते हैं और जिनके भयसे मृत्यु घूमती रहती है, राजन्! उन साक्षात् परिपूर्णतम परमेश्वर श्रीकृष्णका सम्पूर्ण हृदयसे अहंकारशून्य होकर भजन कीजिये ॥ ९ – १४ ॥ नारदजी कहते हैं- मिथिलेश्वर! राजा शर्याति ज्ञानको प्राप्त होकर भी पुत्रके वाग्बाणोंसे आहत हो, रोषसे फड़कते हुए अधरोंद्वारा अपने मध्यम पुत्र आवर्तसे बोले ॥१५ ॥
शर्यातिने कहा - ओ खोटी बुद्धिवाले बालक! दूर हट जाओ । गुरुकी भाँति उपदेश कैसे कर रहे हो? जहाँतक मेरा राज्य है, वहाँतककी भूमिपर तुम निवास मत करो । तुमने जिन सर्वसहायक श्रीकृष्णकी आराधना की है, वे भगवान् भी क्या तुम्हारे लिये कोई नयी पृथ्वी दे देंगे? ॥ १६-१७ ॥
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२६० गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ द्वारकाखण्ड नारदजी कहते हैं - मिथिलेश्वर! उनके यों कहनेपर दूसरोंको मान देनेवाले आनर्तने राजासे कहा - ' जहाँतक पृथ्वीपर आपका राज्य है, वहाँतक मेरा निवास नहीं होगा? ' ॥ १८ ॥
पिता राजा शर्यातिद्वारा निकाले गये आनर्त उनसे विदा ले समुद्रके तटपर चले गये और समुद्रकी वेलामें पहुँचकर दस हजार वर्षोंतक तपस्या करते रहे । आनर्तकी प्रेमलक्षणा - भक्तिसे प्रसन्न हो भगवान् श्रीहरिने उन्हें अपने स्वरूपका दर्शन कराया और वर माँगनेके लिये कहा । आनर्त दोनों हाथ जोड़कर शीघ्रतापूर्वक उठे और रोमाञ्चयुक्त तथा प्रेमसे विह्वल हो उन्होंने भगवान् श्रीकृष्णके चरणारविन्दोंमें प्रणाम किया ॥ १ ९ - २१ ॥ आनर्त बोले- सबके हृदयमें वास करनेवाले आप वासुदेवको नमस्कार है । आकर्षण शक्तिके अधिष्ठातृ - देवता आप संकर्षणको नमस्कार है । कामावतार प्रद्युम्न और ब्रह्मावतार अनिरुद्धको भी नमस्कार है । भगवन्! आप साधु - संतोंके प्रतिपालक हैं, आपको बारंबार नमस्कार है । देव! मेरे पिताने मुझे राज्यसे बाहर निकाल दिया है, अतः मैं आपकी शरणमें आया हूँ । मुझे दूसरी कोई भूमि दीजिये, जहाँ मेरा निवास हो सके । ध्रुव भी जिनके कृपा-प्रसादसे सर्वोत्तम पदको प्राप्त हुए, प्रणतजनोंका क्लेश दूर करनेवाले उन भगवान् ( आप ) - को मेरा नमस्कार है * ॥ २२–२४ ॥ श्रीनारदजी कहते हैं— राजन्! आनर्तको आनत एवं दीन जानकर दीनवत्सल भगवान्ने प्रसन्न हो मेघके समान गम्भीर वाणीमें श्रीमुखसे कहा ॥ २५ ॥
श्रीभगवान् बोले – नरेश्वर! इस लोकमें दूसरी कोई पृथ्वी तो है नहीं, फिर मैं क्या करूँ? परंतप! तुम्हारी भक्तिसे मैं संतुष्ट हूँ, अतः अपनी बात सत्य करनेके लिये तुम्हें अपने दिव्यलोक वैकुण्ठधामका सौ योजन लंबा - चौड़ा भूखण्ड लाकर देता हूँ । वह
अत्यन्त निर्मल तथा शुभद है । २६ - २७ ॥
श्रीनारदजी कहते हैं — विदेहराज! आनर्त-नरेशसे यों कहकर भक्तवत्सल भगवान् श्रीकृष्णने वैकुण्ठसे सौ योजन विशाल भूखण्ड उखाड़ मँगाया और भयंकर शब्द करनेवाले समुद्रमें सुदर्शन चक्रकी नींव बनाकर उसीके ऊपर उस भूखण्डको स्थापित किया । राजा आनर्तने एक लाख वर्षोंतक पुत्र -पौत्रों- - प से सम्पन्न हो वहाँ राज्य किया । उस राज्यमें वैकुण्ठका वैभव भरा हुआ था । आनर्तके पिता शर्यातिने जब यह समाचार सुना, तब उन्हें बड़ा विस्मय हुआ । आनर्तके प्रसादसे ही ' आनर्त ' नामक देश प्रकट हुआ । आनर्तके रेवत नामका पुत्र हुआ । पूर्वकालमें श्रीशैल नामक पर्वतका एक पुत्र था । आनर्तने उसे अपने हाथोंसे उखाड़कर आनर्त देशमें स्थापित किया । रेवतके द्वारा लाये जानेसे उन्हींके नामपर वह पर्वत ' रैवतक ' नामसे विख्यात हुआ । राजा रेवत कुशस्थलीपुरीका निर्माण कराके वहाँ दीर्घकालतक राज्य करनेके पश्चात् अपनी कन्या रेवतीको साथ ले ब्रह्मलोकमें गये, यह सब कथा मेरे द्वारा बलदेव - विवाहके प्रसङ्गमें कही जा चुकी है । इसी कारण पुण्यमयी द्वारकापुरीको देवताओंने ' मोक्षका द्वार ' माना है ॥ २८–३५ ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें द्वारकाखण्डके अन्तर्गत नारद - बहुलाश्व - संवादमें ' द्वारकापुरीके पृथ्वीपर आनेका कारण ' नामक नवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९ ॥
* आनर्त उवाच -नमस्ते वासुदेवाय नमः संकर्षणाय च । प्रद्युम्नायानिरुद्धाय सात्वतां पतये नमः ॥ X x X x X
ध्रुवोऽपि यत्प्रसादेन ययौ सर्वोत्तमं पदम् । तस्मै नमो भगवते प्रणतक्लेशहारिणे ॥
( गर्ग ०, द्वारका ० ९ । २२, २४ )
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दसवाँ अध्याय द्वारकापुरी, गोमती और चक्रतीर्थका माहात्म्य; कुबेरके वैष्णवयज्ञमें दुर्वासामुनि-द्वारा घण्टानाद और पार्श्वमौलिको शाप श्रीनारदजी कहते हैं- राजन्! इस प्रकार मैंने तुमसे द्वारकाके आगमनका कारण बताया, जो समस्त पापोंको हर लेनेवाला और पुण्यदायक है; अब तुम और क्या सुनना चाहते हो ॥ १ ॥
बहुलाश्वने पूछा – मुनिश्रेष्ठ! कल्याणस्वरूपा द्वारकासे द्वारकानगरीकी भूमि सर्वतीर्थमयी है, अतः वहाँके मुख्य - मुख्य तीर्थोंको मुझे बताइये ॥ २ ॥
श्रीनारदजी कहते हैं- राजन्! द्वारकासे प्रभास-तककी सीमा बनाकर जो तीर्थमयी यज्ञभूमि है, वही मोक्षदायिनी ‘ द्वारका ' है । उसका विस्तार सौ योजन है । द्वारकानगरीका दर्शन करके नर नारायण हो जाता है । द्वारकामें कोई गधा भी मर जाय तो वह चतुर्भुज होकर वैकुण्ठलोकमें जाता है । जो द्वारकाका दर्शन करता है, उसकी कथा सुनता है तथा कभी ' द्वारका ' इस नामका उच्चारण करता है, अथवा वहाँ दर्शन - स्नान करके तिनकेका भी दान करता है वह मृत्युके पश्चात् परमगतिको प्राप्त होता है ॥३-५ ॥ एक समय भक्त रेवतको प्रेमानन्दमें आकुल देख श्रीहरिने उसे अपने स्वरूपका दर्शन कराया । उस समय उनके मुँहपर अश्रुधारा बह चली थी । भगवान्के नेत्रबिन्दुओंसे महानदी गोमती प्रकट हुई, जिसके दर्शनमात्रसे ब्रह्महत्या - जैसे पातकोंसे छुटकारा मिल जाता है । जो मनुष्य गोमती तटकी पवित्र रज लेकर अपने सिरपर धारण करता है, वह सौ जन्मोंके किये हुए पापसे तत्काल मुक्त हो जाता है - इसमें संशय नहीं है । मनुष्य कहीं भी स्नान करते समय यदि ' गोमती ' – इस नामका उच्चारण कर लेता है तो उसे निस्संदेह गोमतीमें स्नान करनेका पुण्यफल प्राप्त हो जाता है । विदेहराज! जो मकर राशिमें सूर्यके स्थित रहते समय माघ मासमें प्रयागकी त्रिवेणीमें स्नान करता है, वह सौ अश्वमेध यज्ञोंका पुण्यफल पा लेता है; परंतु यदि वह सूर्यके मकरगत होनेपर गोमतीमें स्नान कर ले तो उसे प्रयागस्नानकी अपेक्षा सहस्रगुना अधिक पुण्य प्राप्त होता है । गोमतीका माहात्म्य बतानेमें चार मुखोंवाले ब्रह्मा भी समर्थ नही हैं । गोमतीके ' चक्रतीर्थ में जो - जो पाषाण हैं, वे सब-के - सब चक्रभावको प्राप्त होते हैं; अतः उनकी यत्नपूर्वक पूजा करनी चाहिये । जो चक्रके चिह्नसे युक्त चक्रतीर्थमें द्वादशीको स्नान करता है, वह पाप - भाजन होनेपर भी चक्रपाणिके पदको प्राप्त होता है । करोड़ों जन्मोंके संचित पापोंसे पतित हुआ पातकी मनुष्य भी चक्रतीर्थकी सीढ़ियोंतक पहुँचकर मोक्ष - पदपर आरूढ़ हो जाता है ॥ ६-१४ ॥ बहुलाश्वने पूछा – महामते! महानदी गोमतीमें जो चक्रतीर्थ है, वह शुभ अर्थको देनेवाला तथा लोगोंके लिये अधिक माननीय कैसे हो गया? यह मुझे बताइये ॥ १५ ॥
श्रीनारदजीने कहा- राजन्! इसी विषयमें विज्ञजन इस प्राचीन इतिहासका वर्णन किया करते हैं, जिसके श्रवणमात्रसे सर्वथा पापोंकी हानि हो जाती है ॥१६ ॥
एक समयकी बात है, अलकापुरीके स्वामी राजाधिराज धर्मात्मा निधिपति भगवान् कुबेरने कैलासके उत्तर तटकी भूमिपर वैष्णवयज्ञ आरम्भ किया । उनके उस यज्ञमें स्वयं भगवान् विष्णु अपने धामसे उतर आये थे । ब्रह्मा, शिव, जम्भभेदी इन्द्र, जल - जन्तुओंके अधिपति वरुण, वायु, यम, सूर्य, सोम, सर्वजनेश्वरी पृथ्वी, गन्धर्व, अप्सरा और सिद्ध - सभी उस यज्ञमें वहाँ पधारे थे ॥ १७-१९ ॥ नरेश्वर! समस्त देवर्षि और ब्रह्मर्षि भी वहाँ आये । उस समय कुबेरका पुत्र नलकूबर धनाध्यक्ष था । यज्ञकी रक्षामें वीरभद्रको नियुक्त किया गया था । सत्पुरुषोंकी सेवाका भार गजानन गणपतिके ऊपर था । समस्त मरुद्गण रसोई परोसनेका कार्य करते थे ।
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२६२ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ द्वारकाखण्ड स्वामिकार्तिकेय धर्मपरायण रहकर सभामण्डपमें समागत अतिथिजनोंकी पूजा - सत्कार करते थे तथा घण्टानाद और पार्श्वमौलि - ये दोनों कुबेरके मन्त्री, जो सम्पूर्ण शास्त्रवेत्ताओंमें श्रेष्ठ थे, दानाध्यक्ष बनाये गये थे । इस प्रकार महान् उत्सवसे परिपूर्ण उस यज्ञका विधिपूर्वक अनुष्ठान सम्पन्न हुआ ॥ २०–२३ ॥ यज्ञान्तका अवभृथ - स्नान करके महामनस्वी राजराज कुबेरने देवताओंको उनका उत्तम भाग दिया और ब्राह्मणोंको पर्याप्त दक्षिणा दी । इस प्रकार उस श्रेष्ठ यज्ञके परिपूर्ण होनेपर जब समस्त देवर्षिगण संतुष्ट हो गये, तब दण्ड, छत्र और जटा धारण किये महर्षि दुर्वासा वहाँ आ पहुचे । वे स्वभावसे ही क्रोधी और कृशकाय थे । उनके चरणोंमें खड़ाऊँ शोभा पाती थी । दाढ़ी - मूँछ के बाल बढ़े हुए थे । पेट सूखकर सट गया था । कुशासन, समिधा, जलपात्र और मृगचर्म धारण किये वे श्रेष्ठ मुनि वहाँ पधारे । वहाँ पधारे हुए उन महर्षिके पास जाकर उनकी विधिपूर्वक पूजा करके भयभीत हुए कुबेरने परिक्रमापूर्वक उनके चरणोंमें प्रणाम किया और कहा - ' ब्रह्मन्! आपके पदार्पण करनेसे आज मेरा जन्म सफल हो गया, भवन सार्थक हो गया और यह मेरा यज्ञ भी सफल हो गया ' ॥ २४ - २८ ॥ इस तरह उनके संतोष देनेपर भगवान् दुर्वासा मुनि जोर - जोरसे हँसते हुए उन मनुष्यधर्मा देवता कुबेरसे बोले- ' तुम राजराज, धर्मात्मा, दानी और ब्राह्मण-भक्त हो । तुमने भगवान् विष्णुको संतुष्ट करनेवाले वैष्णव - यज्ञका अनुष्ठान किया है । प्रभो! वैश्रवण! मैंने कहीं कभी भी तुमसे कुछ नहीं माँगा है, परंतु आज तुम्हें दानिशिरोमणि समझकर मैं याचना करूँगा । यदि तुमने मेरी याचना सफल कर दी तो मैं तुम्हें उत्तम वर दूँगा; नहीं तो अत्यन्त भयंकर शाप देकर तुम्हें भस्म कर डालूँगा । त्रिलोकीकी सारी - नवों निधियाँ तुम्हारे घरमें मौजूद हैं, उन सबको मुझे दे दो; तुम्हारा भला हो । मैं उन निधियोंके लिये ही यहाँ आया हूँ ॥२ ९ –३३ ॥ नारदजी कहते हैं- राजन्! यह सुनकर दान-शील, उदारचेता, गुह्यकोंके स्वामी राजराजने उनसे कहा - ' बहुत अच्छा, आप मेरा प्रतिग्रह स्वीकार करें । ' इस प्रकार निधियोंको दे डालनेकी चेष्टा करते हुए निधिपति कुबेरसे उनके दानाध्यक्ष मन्त्री घण्टानाद और पार्श्वमौलि लोभसे मोहित उन दोनोंने कहा-ही तो है, सारी निधियाँ एक लाख दिव्य दीनार दे रखिये । अपनी वृत्तिकी रक्षा कीजिये ॥ ३६ ॥
नारदजी कहते हैं-होकर बोले ॥३४-३५ ॥ यह लोभी ब्राह्मण अकेला लेकर क्या करेगा? इसे दीजिये, बाकी अपने पास तथा इस उत्तर दिशाकी राजन्! उन मन्त्रियोंका वह कठोर वचन सुनकर दुर्वासा रोषसे आग बबूला हो उठे । उनकी भौंहें टेढ़ी हो गयीं तथा उनके नेत्र लाल हो गये । सारा ब्रह्माण्ड बटलोईकी तरह दो निमेषतक हिलता रहा । कुबेरको अपने चरणोंमें पड़ा देख मुनिने उन दोनों मन्त्रियोंको शाप दे दिया ॥ ३७-३८ ॥ मुनिने कहा - महादुष्ट घण्टानाद! तेरी बुद्धि पापमें ही लगी रहनेवाली है । तू अत्यन्त लोभी है, ग्राहकी भाँति धनग्राही है; अतः हे महाखल! तू ग्राह हो जा । पापपूर्ण विचार रखनेवाले पार्श्वमौले! तू भी धनके लोभ और मदसे भरा हुआ है और हाथीकी भाँति प्रेरणा दे रहा है; अतः दुर्बुद्धे! तू हाथी हो जा ॥ ३ ९ -४० ॥ श्रीनारदजी कहते हैं - राजन्! उन दोनोंको शाप दे कुबेरसे निधि लेकर मुनिवर दुर्वासाने पुनः कुबेरको अत्यन्त दुर्लभ वर प्रदान किया - ' कुबेर! इस दानसे तुम्हारे पास नौ निधियाँ द्विगुणित होकर आ जायँ । ' यों कहकर वे निधियोंके साथ वहाँसे चल दिये । अहा! परम तेजस्वी महर्षियोंका बल कैसा अद्भुत है! ॥ ४१-४२ ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें द्वारकाखण्डके अन्तर्गत नारद - बहुलाश्व - संवादमें गोमतीके उपाख्यानके प्रसङ्गमें ' चक्रतीर्थका माहात्म्य ' नामक दसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १० ॥
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ग्यारहवाँ अध्याय गज और ग्राह बने हुए मन्त्रियोंका युद्ध और भगवान् विष्णुके द्वारा उनका उद्धार नारदजी कहते हैं- राजन्! कुबेरके दोनों मन्त्री ब्राह्मणके शापसे मोहित होकर अत्यन्त दीन - दुखी हो गये । उस यज्ञमें साक्षात् भगवान् विष्णु पधारे थे । वे अपनी शरणमें आये हुए उन दोनों मन्त्रियोंसे बोले ॥ १ ॥
श्रीभगवान् ने कहा – मेरी अर्चनासे युक्त इस यज्ञमें तुम दोनोंको दुःख उठाना पड़ा है । ब्राह्मणोंकी कही हुई बातको टाल देने या अन्यथा करनेकी शक्ति मुझमें नहीं है । तुम दोनों ग्राह और हाथी हो जाओ । जब कभी तुम दोनोंमें युद्ध छिड़ जायगा, तब मेरी कृपासे तुम दोनों अपने पूर्ववर्ती स्वरूपको प्राप्त हो जाओगे ॥ २-३ ॥ नारदजी कहते हैं— राजन्! भगवान् विष्णुके यों कहनेपर राजाधिराज कुबेरके वे दोनों मन्त्री ग्राह और हाथी हो गये, परंतु उन्हें अपने पूर्वजन्मकी बातोंका स्मरण बना रहा । घण्टानाद ग्राह हो गया और सैकड़ों वर्षोंतक गोमतीमें रहा । वह बड़ा विकराल, अत्यन्त भयंकर तथा सदा रौद्ररूप धारण किये रहता था । पार्श्वमौलि रैवतक पर्वतके जंगलमें चार दाँतों वाला हाथी हुआ । उसके शरीरका रंग काजलके समान काला था । उसके पृष्ठ भागकी ऊँचाई सौ धनुषके बराबर थी । वञ्जुल, कुरब, कुन्द, बदर, बेंत, बाँस, केला, भोजपत्रका पेड़, कचनार, बिजैसार, अर्जुन, मन्दार, बकायन, अशोक, बरगद, आम, चम्पा, चन्दन, कटहल, गूलर, पीपल, खजूर, बिजौरा नींबू, चिरौंजी, आमड़ा, आम्र तथा क्रमुक ( पूगीफल ) के वृक्षोंसे परिमण्डित रैवतकके विशाल वनमें वह महागजराज विचरा करता था ॥ ४ - ९ ॥ एक समय वैशाख मासमें वह गजराज पर्वतीय कन्दरासे निकलकर अपने गणोंके साथ चिग्घाड़ता हुआ गोमती - गङ्गामें स्नानके लिये आया । बहुत देरतक जलमें स्नान करके इधर - उधर सूँड़ घुमाते हुए उस गजराजने अपनी सूँड़के जलसे हाथियोंके सभी छोटे-छोटे बच्चोंको नहलाया । वह महाबलिष्ठ महान् ग्राह भी दैवकी प्रेरणासे उसी जलमें विद्यमान था । उसने दैवकी प्रेरणासे रोषसे भरकर उस गजराजका एक पैर पकड़ लिया । वह बलोन्मत्त गजराजको अपने घरमें खींच ले गया । फिर हाथी भी उसे खींचकर जलके बाहर ले आया । तत्पश्चात् उसने पुनः हाथीको खींचा । हथिनियाँ और उसके बच्चे उस गजराजको संकटसे उबारनेमें असमर्थ थे । इस प्रकार युद्ध करते और परस्पर एक - दूसरेको खींचते हुए उन दोनोंके पचपन वर्ष व्यतीत हो गये । सत्पुरुषोंके नेत्रोंके समक्ष यह घटना घटित हो रही थी । इस प्रकार कष्टमें पड़कर कालपाशके वशीभूत हो पूर्वजन्मकी बातोंको स्मरण करनेवाला वह महान् गजराज प्रेमलक्षणा - भक्तिसे श्रीहरिके चरणोंका आश्रय ले उन्हींका चिन्तन करने लगा ॥ १०–१६ ॥ गजेन्द्र बोला – हे श्रीकृष्ण! हे कृष्ण ( अर्जुन ) के सखा तथा हे श्याम शरीर धारण करनेवाले देवेश्वर विष्णुदेव! आप श्रीकृष्णको मेरा प्रणाम प्राप्त हो । हे पूर्ण प्रभो! हे परमपावन पुण्यकीर्ते! हे परमेश्वर! पापके पाशसे मेरी रक्षा करो, रक्षा करो * ॥ १७ ॥
नारदजी कहते हैं- राजन्! इस प्रकार ग्राहने जिसका पैर पकड़ लिया था, उस हाथीको अपना स्मरण करता जान, दीनवत्सल श्रीहरि गरुडपर आरूढ़ हो बड़े वेगसे दौड़े आये । उन्होंने स्वयं ही गरुडसे उतरकर दौड़ते हुए उस ग्राहपर चक्र चलाया । चक्रके वहाँ पहुँचनेके पहले ही ग्राहका वह अद्भुत मस्तक उसके धड़से कटकर अलग हो गया, जैसे दीनताके प्राप्त होते ही धन चला जाता है । इसके बाद वह चक्र गोमतीके कुण्डमें महान् शब्द करता हुआ गिरा । उसने वहाँके
* श्रीकृष्ण कृष्णसख कृष्णवपुर्दधान कृष्णाय ते प्रणतिरस्तु सुरेश विष्णो । ।
पूर्णप्रभो परमपावन पुण्यकीर्ते मां पाहि पाहि परमेश्वर पापपाशात् ॥
( गर्ग ०, द्वारका ० ११। १७ )
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२६४ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ द्वारकाखण्ड समस्त प्रस्तर - समूहोंको चक्रसे चिह्नित कर दिया । चले गये । देवतालोग फूल बरसाते हुए जय - जयकार उसकी नेमिकी रगड़से वहाँ कल्याणकारी ' चक्रतीर्थ ' करने लगे । भगवान् प्रकृतिसे परे विद्यमान अपने प्रकट हो गया । राजन्! उस चक्रतीर्थके दर्शनसे ब्रह्म- साक्षात् धाममें चले गये । जो नरश्रेष्ठ चक्रतीर्थकी इस हत्या छूट जाती है । मस्तक कट जानेसे ग्राहने अपना कथाको सुनता है, वह चक्रतीर्थमें स्नान करनेका फल पूर्वरूप धारण कर लिया और श्रीकृष्णके अनुग्रहसे पाता है - इसमें संशय नहीं है । जो एकाग्रचित्त हो गज उस हाथीका दिव्य रूप हो गया ॥ १८-२२ ॥ और ग्राहकी इस पुण्यमयी कथाको सुनता है, उसके फिर श्रीहरिकी परिक्रमा, नमस्कार और स्तुति करके बुरे स्वप्न नष्ट हो जाते हैं तथा निश्चय ही उसे अच्छे हाथ जोड़े हुए वे दोनों कुबेर - मन्त्री पुनः अपने स्थानको स्वप्न दिखायी देते हैं ॥ २३ - २६ ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें द्वारकाखण्डके अन्तर्गत नारद - बहुलाश्व - संवादमें चक्रतीर्थकी उत्पत्तिके प्रसङ्गमें ' गज और ग्राहका शापसे उद्धार ' नामक ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११ ॥
बारहवाँ अध्याय महामुनि त्रितके शापसे कक्षीवान्का शङ्खरूप होकर सरोवरमें रहना और श्रीकृष्णके द्वारा उसका उद्धार श्रीनारदजी कहते हैं - राजन्! द्वारकामें जो ' शङ्खोद्धार ' नामक तीर्थ है, वह सब तीर्थोंमें प्रधान है । जो मनुष्य उस तीर्थमें स्नान करके सुवर्णका दान देता है, वह सम्पूर्ण उपद्रवोंसे रहित विष्णुलोक में जाता है ॥ १ ॥
एक समय श्रीकृष्णभक्त शान्तचित्त महामुनि त्रित तीर्थयात्राके प्रसङ्गसे आनर्तदेशमें आये । वहाँ एक सुन्दर सरोवर देखकर मुनिने उसमें स्नान करके श्रीहरिकी पूजा की । उस पूजामें सुन्दर लक्षणोंसे युक्त जो महाशङ्ख वे बजाया करते थे, उसे उन्हींके शिष्य कक्षीवान्ने अत्यन्त लोभके कारण चुरा लिया । पूजाका शङ्ख चुराया गया देख मुनिवर त्रित कुपित होकर बोले- ' जो मेरा शङ्ख ले गया है, वह अवश्य ही शङ्ख हो जाय । ' कक्षीवान् तत्काल शापसे पीड़ित हो शङ्ख हो गया और गुरुके चरणोंमें गिरकर बोला- ' भगवन्! मेरी रक्षा कीजिये । ' त्रितमुनि शीघ्र ही शान्त हो गये और बोले- ' दुर्बुद्धे! यह तुमने क्या किया? चोरीके दोषसे जो पाप हुआ है, उसका फल भोग । मेरी बात झूठी नहीं हो सकती । तू यहाँ श्रीकृष्णके चरण - कमलोंका चिन्तन करता रह; वे ही तेरा उद्धार करेंगे ॥ २-६ ॥ राजन्! यों कहकर जब महामुनि त्रितदेव वहाँसे होना; शङ्खोद्धार - तीर्थकी महिमा चले गये, तब शङ्खरूपधारी कक्षीवान् उस सरोवरमें कूद पड़ा और ' कृष्ण! कृष्ण!! ' पुकारता हुआ सौ वर्षोंतक वहीं रहा ॥ ७-८ ॥ तदनन्तर भक्तवत्सल परिपूर्णतम साक्षात् भगवान् श्रीकृष्ण उस सरोवरके तटपर आये और उसे अभय-दान देते हुए बोले- ' डरो मत । ' मेघ गर्जनाके समान भगवान्की वह गम्भीर वाणी सुनकर वह जलचर शङ्ख चीख उठा - ' देवदेव! जगत्पते!! मेरी रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये । ' तब सर्वसामर्थ्यशाली कृपापरायण भगवान्ने नागराजके शरीरकी भाँति अपने हृष्ट - पुष्ट भुजाके द्वारा उस भक्त शङ्खका उसी प्रकार जलसे उद्धार किया, जैसे किसी समय उन्होंने गजका उद्धार किया था । कक्षीवान् उसी क्षण शङ्खका रूप छोड़कर दिव्यरूपधारी हो गया और हाथ जोड़ श्रीहरिको नमस्कार करके उनकी स्तुति करने लगा ॥ ९ -१२ ॥ कक्षीवान्ने कहा- वासुदेव! आपको नमस्कार है । गोविन्द! पुरुषोत्तम! दीनवत्सल! दीनानाथ! द्वारकानाथ! परमेश्वर! आपको मेरा बारंबार प्रणाम है । आपने ही ध्रुवको ध्रुवपद प्रदान किया, प्रह्लादकी पीड़ा हर ली, गजराजका उद्धार किया तथा राजा बलिकी भेंट स्वीकार की; आपको बारंबार