गर्ग संहिता — पृष्ठ 291–300

गर्ग संहिता · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 291–300

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श्रीराधाकृष्णाभ्यां नमः विश्वजित्खण्ड पहला अध्याय राजा मरुत्तका उपाख्यान

नमो भगवते तुभ्यं वासुदेवाय साक्षिणे ।

प्रद्युम्नायानिरुद्धाय नमः संकर्षणाय च ॥ १ ॥

सबके हृदयमें वास करनेवाले सर्वसाक्षी वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न तथा अनिरुद्ध - चतुर्व्यूहस्वरूप आप भगवान्‌को नमस्कार है ॥१ ॥

अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जनशलाकया ।

चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥ २ ॥

मेँ अज्ञानरूपी रतौंधीके रोगसे अंधा हो रहा था । जिन्होंने ज्ञानाञ्जनकी शलाकासे मेरी दिव्य दृष्टि खोल दी है, उन श्रीगुरुदेवको मेरा नमस्कार है ॥ २ ॥

श्रीगर्गजीने कहा- मुने! इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्णका चरित्र मैंने तुमसे कह सुनाया, जो मनुष्योंको धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष - चारों पुरुषार्थोंका देने-वाला है । अब और क्या सुनना चाहते हो? ॥ ३ ॥

शौनकने कहा - तपोधन! श्रीकृष्णके प्रिय भक्त तथा श्रीहरिमें प्रगाढ़ प्रीति रखनेवाले मैथिलराज बहुलाश्वने फिर देवर्षि नारदसे क्या पूछा, वही प्रसङ्ग मुझे सुनाइये ॥ ४ ॥

श्रीगर्गजी बोले - – मुने! भगवान् श्रीकृष्णने ( मरुत्तके अवतार ) उग्रसेनको यादवोंका राजा बनाया, यह सुनकर मिथिलानरेश बहुलाश्वको बड़ा विस्मय हुआ । उन्होंने नारदजीसे प्रश्न किया ॥ ५ ॥

बहुलाश्व बोले- देवर्षे! ये मरुत्त कौन थे? ये किस पुण्यसे भूतलपर यदुवंशियोंके राजा उग्रसेन हो गये? जिनके स्वयं भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र भी सहायक हुए, उनकी महिमा अद्भुत है । देवर्षि - शिरोमणे! उनकी महत्ता क्या थी? यह मुझे बताइये ॥ ६-७ ॥ श्रीनारदजीने कहा- राजन्! सत्ययुगमें सूर्यवंशी राजा मरुत्त चक्रवर्ती सम्राट् थे । उन्होंने विधिपूर्वक विश्वजित् - यज्ञका अनुष्ठान किया था । वे हिमालयके उत्तर भागमें बहुत बड़ी सामग्री एकत्र करके, मुनिश्रेष्ठ संवर्तको आचार्य बनाकर यज्ञके लिये दीक्षित हुए । उनके यज्ञमें पाँच योजन विस्तृत कुण्ड बना था । एक योजनका तो ब्रह्मकुण्ड था और दो - दो कोसके पाँच कुण्ड और बने थे । कुण्डके गर्तका जो विस्तार था, तदनुसार वेदियोंसे दस मेखलाएँ बनी थीं । उस यज्ञमण्डपमें जो स्तम्भ बना था, उसकी ऊँचाई एक हजार हाथकी थी । वह महान् यज्ञस्तम्भ बड़ी शोभा पाता था । उसमें सोनेका यज्ञमण्डप बना था, जिसका विस्तार बीस योजन था । चंदोवों, बंदनवारों और कदलीखण्डसे वह यज्ञमण्डप मण्डित था । उस यज्ञमें ब्रह्मा - रुद्र आदि देवता अपने गणों के साथ पधारे थे । समस्त ऋषि - मुनि स्वयं उस यज्ञमें आये थे । उस यज्ञमें दस लाख होता, दस लाख दीक्षित, पाँच लाख अध्वर्यु और उद्गाता अलग थे । वहाँ चारों वेदोंके विद्वान् ब्राह्मण बुलाये गये थे, जो सम्पूर्ण शास्त्रोंके अर्थतत्त्वके ज्ञाता थे । और भी करोड़ों ब्राह्मण उसमें पूजित हुए थे । उस यज्ञमें हाथीकी सूँड़के समान घीकी मोटी घृत - धाराओंकी आहुति दी गयी थी, जिसको खाकर अग्निदेवको अजीर्णका रोग हो गया । मिथिलेश्वर! उस यज्ञके विषयमें ऐसा होना कोई विचित्र बात न जानो ॥ ८-१६ ॥ उस यज्ञमें विश्वेदेवगण सभासद् थे । वे जिन-जिनके लिये भाग देना आवश्यक बताते थे, उन-उनके लिये भागका परिवेषण ( परोसनेका कार्य ) स्वयं मरुद्गण करते थे । उस यज्ञके समय त्रिलोकी में कोई भी ऐसे जीव नहीं थे, जो भूखे रह गये हों । सम्पूर्ण देवताओंको सोमरस पीते - पीते अजीर्ण हो गया था । यजमान राजा मरुत्तने उस यज्ञमें आचार्य संवर्त-

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२८६ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ विश्वजित्खण्ड को जम्बूद्वीपका राज्य दे दिया । इसके सिवा चौदह लाख हाथी, चौदह लाख भार सुवर्ण, सौ अरबी घोड़े तथा नौ करोड़ बहुमूल्य रत्न भी यज्ञान्तमें महात्मा आचार्यको दक्षिणाके रूपमें दिये । प्रत्येक ब्राह्मणको उन्होंने पाँच - पाँच हजार घोड़े, सौ - सौ हाथी और सौ -सौ भार सुवर्ण प्रदान किया । जलपात्र और भोजनपात्र सब सुवर्णके बने हुए थे, जो अत्यन्त उद्दीप्त दिखायी देते थे । उनमें भोजन करके सब ब्राह्मण संतुष्ट होकर विदा हुए । ब्राह्मणोंके फेंके हुए उच्छिष्ट स्वर्णपात्रोंसे हिमालयके पार्श्वमें सौ योजनका सुवर्णमय पर्वत बन गया था, जो आज भी देखा जा सकता है ॥ १७–२३ ॥ राजा मरुत्तका जैसा यज्ञ हुआ, वैसा दूसरे किसी राजाका कभी नहीं हुआ । राजेन्द्र! सुनो, त्रिलोकीमें वैसा यज्ञ न हुआ है न होगा । उस यज्ञकुण्डमें साक्षात् परिपूर्णतम भगवान् श्रीकृष्णने प्रकट होकर महात्मा राजा मरुत्तको अपने स्वरूपका दर्शन कराया था । उन श्रीहरिका दर्शन करके, उनके चरणोंमें माथा नवाकर, राजा मरुत्त दोनों हाथ जोड़े खड़े रहे; कुछ बोल न सके । उनके शरीरमें रोमाञ्च हो आया और वे प्रेमसे विह्वल हो गये । इस तरह उन प्रेमपूरित नरेशको अपने चरणोंमें प्रणत हुआ देख साक्षात् भगवान् श्रीकृष्ण मेघ समान गम्भीर वाणीमें बोले ॥ २४ - २७ ॥ श्रीभगवान् ने कहा- राजन्! तुमने अपने विनयसे मुझे संतुष्ट किया है । निष्कामभावसे सम्पादित उत्तम यज्ञोंद्वारा मेरी पूजा की है । महामते! तुम मुझसे कोई उत्तम वर माँग लो । मैं तुम्हें वह वरदान दूँगा, जो स्वर्गके देवताओंके लिये भी दुर्लभ है ॥ २८ ॥

श्रीनारदजी कहते हैं - राजन्! राजा मरुत्तने भगवान्‌का उपर्युक्त वचन सुनकर, हाथ जोड़ परिक्रमा करके, उन परमेश्वर हरिका परम भक्तिभावसे विशद उपचारोंद्वारा पूजन किया और प्रणाम करके अत्यन्त गद्गद वाणीमें कहा ॥ २ ९ ॥ मरुत्त बोले - श्रीपुरुषोत्तमोत्तम! आपके चरणारविन्दोंसे बढ़कर दूसरा कोई उत्तम वर मैं नहीं जानता । जैसे प्यास लगनेपर दुर्बुद्धि नरपशु गङ्गाजीके तटपर पहुँचकर भी प्यास बुझानेके लिये कुआँ खोदते हैं ( उसी प्रकार आपके चरणारविन्दोंको पाकर दूसरे किसी वरकी इच्छा करना दुर्बुद्धिका ही परिचय देना है ) तथापि हे व्रजेश्वर! आपकी आज्ञाका गौरव रखनेके लिये मैं यही वर माँगता हूँ कि मेरे हृदय-कमलसे आपका चरणारविन्द कदापि दूर न जाय; क्योंकि वही चारों पुरुषार्थों तथा अर्थ - सम्पदाओंका मूल कहा गया है॥३०-३१ ॥ श्रीभगवान् बोले – राजन्! तुम्हारी निर्मल मति धन्य है । तुम्हें वरदानका लोभ दिये जानेपर भी तुम्हारी बुद्धिमें किसी कामनाका उदय नहीं हुआ है । तथापि तुम मुझसे कोई अभीष्ट वर माँग लो; क्योंकि फल देकर भक्तको सुखी किये बिना मुझे सुख नहीं मिलता ॥३२ ॥

मरुत्तने कहा – प्रभो! यदि मुझे अभीष्ट वर देना ही है तो इस भूतलपर वैकुण्ठलोकको स्थापित कर दीजिये और भक्तवत्सल! उसी पुरमें श्रेष्ठ भक्तजनोंके साथ मैं निवास करूँ और आप मेरी रक्षा करते रहें ॥ ३३ ॥

श्रीभगवान् बोले- राजन्! जबतक इस मन्वन्तरके अट्ठाईस युग बीतेंगे, तबतक तुम स्वर्गका सुख भोगकर अट्ठाईसवें द्वापरमें मेरे साथ पृथ्वीपर आकर अपने मनोरथके समुद्रको गोवत्सकी खुरीके समान बना लोगे । अर्थात् उस समय तुम्हारा यह सारा मनोरथ अनायास ही पूर्ण हो जायगा ॥ ३४ ॥

श्रीनारदजी कहते हैं - मिथिलेश्वर! यों कहकर साक्षात् भगवान् श्रीकृष्ण वहीं अन्तर्धान हो गये । वे ही ये राजा मरुत्त उग्रसेन हुए । श्रीहरिने स्वयं उनसे राजसूय यज्ञ करवाया । मैथिलेश्वर! त्रिलोकीमें कौन - सी ऐसी वस्तु है, जो भगवद्भक्तोंके लिये दुर्लभ हो? नृपोत्तम! जो मनुष्य मरुत्तके इस चरित्रको सुनता है, उसे भक्तियुक्त ज्ञान और वैराग्यकी प्राप्ति होती है ॥ ३५-३७ ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें विश्वजित्खण्डके अन्तर्गत श्रीनारद - बहुलाश्व - संवादमें ' श्रीमरुत्तका उपाख्यान ' नामक पहला अध्याय पूरा हुआ ॥ १ ॥

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दूसरा अध्याय राजा उग्रसेनके राजसूय यज्ञका उपक्रम; प्रद्युम्नका दिग्विजयके लिये बीड़ा उठाना और उनका विजयाभिषेक बहुलाश्वने पूछा – मुने! राजा उग्रसेन श्रीकृष्णकी सहायतासे राजसूय यज्ञका किस प्रकार विधिवत् अनुष्ठान किया, यह मुझे बताइये ॥ १ ॥

श्रीनारदजीने कहा – एक सुधर्मा सभामें श्रीकृष्णकी पूजा नवाकर प्रसन्नचेता राजा उग्रसेनने धीरेसे कहा ॥ २ ॥

उग्रसेन बोले- भगवन्! जिसका महान् फल सुना गया है यज्ञका यदि आपकी आज्ञा हो समयकी बात है— करके, उन्हें शीश दोनों हाथ जोड़कर नारदजीके मुखसे , उस राजसूय नामक तो अनुष्ठान करूँगा । पुरुषोत्तम! आपके चरणोंकी सेवासे पहलेके राजालोग निर्भय होकर, जगत्को तिनकेके तुल्य समझकर अपने मनोरथके महासागरको पार कर गये थे ॥ ३-४ ॥ श्रीभगवान्‌ने कहा— राजन्! यादवेश्वर! आपने बड़ा उत्तम निश्चय किया है । उस यज्ञसे आपकी कीर्ति तीनों लोकोंमें फैल जायगी । प्रभो! सभामें समस्त यादवोंको सब ओरसे बुलाकर पानका बीड़ा रख दीजिये और प्रतिज्ञा करवाइये । समस्त यादव मेरे अंशसे प्रकट हुए हैं । वे लोक, परलोक – दोनोंको जीतनेकी इच्छा करते हैं । वे दिग्विजयके लिये यात्रा करके, शत्रुओंको जीतकर लौट आयेंगे और सम्पूर्ण दिशाओंसे आपके लिये भेंट और उपहार लायेंगे ॥ ५–७ ॥ श्रीनारदजी कहते हैं— राजन्! तदनन्तर इन्द्रके दिये सिंहासनपर विराजमान राजा उग्रसेनने अन्धक आदि यादवोंको सुधर्मा सभामें बुलवाया और पानका बीड़ा रखकर कहा ॥ ८ ॥

उग्रसेन बोले- जो समराङ्गणमें जम्बूद्वीपनिवासी समस्त नरेशोंको जीत सके, वह इन्द्रके समान धनुर्धर मनस्वी वीर यह पानका बीड़ा चबाये ॥ ९ ॥

श्रीनारदजी कहते हैं - मिथिलेश्वर! यह सुनकर अन्य सब राजा तो चुपचाप बैठे रह गये, किंतु शम्बर-शत्रु रुक्मिणीनन्दन महात्मा प्रद्युम्नने ही सबसे पहले राजाको प्रणाम करके वह पानका बीड़ा उठा लिया ॥ १० ॥

प्रद्युम्न बोले- मैं समरभूमिमें जम्बूद्वीपनिवासी समस्त राजाओंको जीतकर और उनसे बलपूर्वक भेंट लेकर लौट आऊँगा । यदि मैं यह कार्य न कर सकूँ तो मुझे अगम्या स्त्रीके साथ गमनका, कपिला ब्राह्मण, गुरु तथा गर्भस्थ शिशुके वधका पाप लगे ॥ ११-१२ ॥ श्रीनारदजी कहते हैं- राजन्! शम्बरारि प्रद्युम्नका यह वचन सुनकर समस्त यूथपति ' बहुत अच्छा, बहुत अच्छा ' कहकर साधुवाद देने लगे और उन सबके सामने ही यदु - कुल- तिलक प्रद्युम्नने ही दिग्विजयका बीड़ा उठाया । यदुकुलके आचार्य गर्गजीसे यत्नपूर्वक मुहूर्त पूछकर मुनियोंद्वारा वैदिक मन्त्रोंके उच्चारणपूर्वक राजाने प्रद्युम्नको स्नान करवाया । स्वयं उग्रसेनने प्रद्युम्नके भालमें तिलक लगाया तथा भेंट देकर समस्त यादवयूथपतियोंने उनको नमस्कार किया । उग्रसेनने महात्मा प्रद्युम्नको खड्ग दिया । साक्षात् महाबली बलदेवजीने कवच प्रदान किया । श्रीहरिने अपने तूणीरमेंसे खींचकर अक्षय बाणोंसे भरे हुए दो तरक्स दिये तथा अपने र्शाङ्ग-धनुषसे धनुष उत्पन्न करके उनके हाथमें दिया । वृद्ध शूरसेनने किरीट, दो दिव्य कुण्डल, मनोहर पीताम्बर तथा छत्र और चँवर दिये । महामनस्वी वसुदेवने उन्हें शतचन्द्र नामक ढाल दी । साक्षात् उद्धवने सुन्दर किञ्जल्किनी ( केसरयुक्त ) माला भेंट की । अक्रूरने विजय नामक दक्षिणावर्त शङ्ख दिया और मुनिवर गर्गाचार्यने श्रीकृष्ण - कवच नामक यन्त्र बाँध दिया ॥ १३–२० ॥ उसी समय लोकपालों सहित देवराज इन्द्र मनमें कौतुक लिये आ गये । ब्रह्मा, शिव तथा देवर्षिगण भी वहाँ पधारे । शूलधारी शिवने प्रद्युम्रको अग्नि के समान तेजस्वी त्रिशूल दिया । महाराज! ब्रह्माजीने पद्मराग नामक मस्तकमें धारण करनेयोग्य मणि दी । वरुणने पाश, शक्तिधारी स्कन्दने शत्रु - विनाशिनी शक्ति, वायुने दो दिव्य व्यजन और यमराजने यमदण्ड दिये । सूर्यने बड़ी भारी गदा, कुबेरने रत्नोंकी माला, चन्द्रमाने चन्द्र-

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२८८ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ विश्वजित्खण्ड कान्तमणि तथा अग्निदेवने परिघ प्रदान किये । पृथ्वीने दो योगमयी दिव्य पादुकाएँ दीं तथा वेगशालिनी भद्रकालीने प्रद्युम्नको माला भेंट की । इन्द्रने महात्मा प्रद्युम्रको सहस्रों ध्वजोंसे सुशोभित महादिव्य रत्नमय विजय दिलानेवाला रथ प्रदान किया ॥ २१ - २८ ॥ उस समय शङ्ख और दुन्दुभियाँ बजने लगीं । इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें विश्वजित्खण्डके ताल और वीणा आदिके शब्द होने लगे । जय-जयकारकी ध्वनिसे युक्त मृदङ्ग और वेणुओंके उत्तम नादसे तथा वेद - मन्त्रोंके घोषसे वहाँका स्थान गूँज उठा । मोतियोंकी वर्षाके साथ खील और फूलोंकी वृष्टि होने लगी । देवताओंने प्रद्युम्नके ऊपर पुष्पों की झड़ी लगा दी ॥ २ ९ -३० ॥ अन्तर्गत श्रीनारद - बहुलाश्व - संवादमें ' प्रद्युम्नका विजयाभिषेक ' नामक दूसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ २ ॥

तीसरा अध्याय प्रद्युम्नके नेतृत्वमें दिग्विजयके लिये प्रस्थित हुई यादवोंकी गजसेना, अश्वसेना तथा योद्धाओंका वर्णन श्रीनारदजी कहते हैं - राजन्! तदनन्तर भगवान् श्रीकृष्ण, राजा उग्रसेन, बलरामजी तथा गुरु गर्गाचार्यको नमस्कार करके, उनकी आज्ञा ले, प्रद्युम्न रथपर आरूढ़ हो कुशस्थली पुरीसे बाहर निकले । फिर उनके पीछे समस्त उद्धव आदि यादव, भोजवंशी, वृष्णिवंशी, अन्धकवंशी, मधुवंशी, शूरवंशी और दशार्हवंशमें उत्पन्न वीर चले । फिर श्रीकृष्णके भाई गद आदि सब वीर श्रीकृष्णकी अनुमति ले पुत्रों और सेनाओंके साथ चल दिये । साम्ब आदि महारथी भी प्रद्युम्न के साथ गये ॥ १–३ ॥ वे सभी यादव - वीर किरीट, कुण्डल तथा लोहेके बने हुए कवचसे अलंकृत थे । उनके साथ करोड़ोंकी संख्यामें चतुरङ्गिणी सेना थी । वे सब द्वारकापुरीसे बाहर निकले । उनके रथ मोर, हंस, गरुड, मीन और तालके चिह्नसे युक्त ध्वजोंसे सुशोभित थे, सूर्यमण्डलके समान तेजोमय थे और चञ्चल अश्व उनमें जोते गये थे । उन रथोंके कलश और शिखर सोनेके बने थे, मोतियोंकी बन्दनवारें उनकी शोभा बढ़ाती थीं । वे सभी रथ वायुवेगका अनुकरण करते थे । उनमें दिव्य चँवर डुलाये जा रहे थे । वे वीरोंके समुदायसे सुशोभित तथा सुनहरे देव- विमानोंके समान प्रकाशमान थे, ऐसे रथोंद्वारा उन मनोहर वीरोंकी बड़ी शोभा हो रही थी । उस सेनामें अत्यन्त उद्भट ऊँचे-ऊँचे गजराज थे, जिनके गण्डस्थलसे मद झर रहे थे । उनके मुखमण्डलपर चित्र - विचित्र पत्र - रचना की गयी थी । वे सुनहरे कवचसे सुशोभित थे । उनकी पीठपर लाल रंगकी झूल पड़ी थी और उनके उभय पार्श्वमें लटकाये गये घंटे बज रहे थे । नरेश्वर! उस राजसेनाके हाथी गिरिराजके शिखर - जैसे जान पड़ते थे । वे भद्रजातीय गजेन्द्र विभिन्न दिशाओं में विद्यमान गजराजों - दिग्गजोंकी नकल करते दिखायी देते थे । कोई भद्र - जातीय थे, जिनकी चर्चा की गयी है । दूसरी भद्रमृग जातिके थे । कुछ हाथी विन्ध्याचल पर्वतमें उत्पन्न हुए थे और कुछ कश्मीरी थे । कितने ही मलयाचलमें उत्पन्न थे । बहुत - से हिमालयमें पैदा हुए थे । कुछ मुरण्ड देशमें उत्पन्न हुए थे और कितने ही कैलास पर्वतके जंगलोंमें पैदा हुए थे । कितनोंके जन्म ऐरावत- कुलमें हुए थे, जिनके चार दाँत थे और उनकी गर्दनोंमें जंजीर ( गरदनी या गिराँव ) सुशोभित थीं । उनके ऊर्ध्वभागमें तीन - तीन सूँड़ें थीं और वे भूतलपर तथा आकाशमें भी चल सकते थे॥४–१२ ॥ करोड़ों हाथी ध्वजा - पताकाओंसे सुशोभित थे । उनपर करोड़ों दुन्दुभियाँ रखी गयी थीं । उस सेनाके भीतर करोड़ोंकी संख्यामें विद्यमान वे हाथी रत्न-समूहसे मण्डित थे और महावतोंसे प्रेरित होकर चलते थे । गर्जना करते हुए, मेघोंकी घटाके समान काले तथा नीले रंगकी झुलसे आच्छादित वे गजराज उस सैन्य सागरमें इधर - उधर मगरमच्छोंके समान शोभा

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अध्याय ३ ] प्रद्युम्नके नेतृत्वमें दिग्विजयके लिये प्रस्थित हुई यादवोंकी सेना आदिका वर्णन २८ ९ पाते थे । वे अपनी सूँड़ोंसे लता - झाड़ियोंको उखाड़कर सूर्यमण्डलकी ओर फेंकते, पैरोंके आघातसे धरतीको कम्पित करते और मदकी वर्षासे पर्वतोंको आर्द्र किये देते थे । वे अपने कुम्भस्थलोंकी टक्करसे दुर्ग, शैल और शिलाखण्डों को भी गिराने तथा शत्रुसेनाको खण्डित करनेकी शक्ति रखते थे । उस हाथी विद्यमान थे ॥ १३-१६ ॥ राजन्! गजसेनाके पीछे उन घोड़ोंमें कुछ मत्स्यदेशके कुछ उशीनर देशके, कुछ कुरुजाङ्गल देशके थे । कोई कोई सृञ्जयदेशीय, कोई केकय यादव - सेनामें ऐसे - ऐसे घोड़ोंकी सेना निकली । , कुछ कलिन्दपर्वतके, कोसल, विदर्भ और काम्बोजीय ( काबुली ), और कुन्ति देशोंके पैदा हुए थे । कोई दरद, केरल, अङ्ग, वङ्ग और विकट जनपदोंमें पैदा हुए थे । कितने ही कोङ्कण, कोटक, कर्नाटक तथा गुजरातमें पैदा हुए घोड़े थे । कोई सौवीर देशके और कोई सिंधी थे । कितने ही पञ्चाल ( पंजाब ) और आबूमें उत्पन्न हुए थे । कितने ही कच्छी घोड़े थे । कुछ आनर्त, गन्धार और मालव देशके अश्व थे । कुछ महाराष्ट्रमें उत्पन्न, कुछ तैलंग देशमें पैदा हुए और कुछ दरियाई घोड़े थे॥१७–२० ॥ परिपूर्णतम परमात्मा श्रीकृष्णकी अश्वशालाओंमें जो घोड़े विद्यमान थे, वे भी सब - के - सब उस दिग्विजय यात्रामें निकल पड़े । कुछ श्वेतद्वीपसे आये थे । कुछ जो वैकुण्ठ, अजितपद तथा रमावैकुण्ठ-लोकसे प्राप्त हुए अश्व थे, वे भी उस सेनाके साथ निकल गये । वे सोनेके हारोंसे सुशोभित और मोतियोंकी मालाओंसे मनोहर दिखायी देते थे । उनकी शिखामें मणि पहिनायी गयी थी, जिसकी सुदूरतक फैली हुई किरणें उन अश्वोंकी शोभा बढ़ाती थीं और उनके साज - सामान भी बहुत सुन्दर थे । चामर ( कलँगी ) से अलंकृत हुए उन घोड़ोंकी पूँछ, मुख और पैरोंसे प्रभा - सी छिटक रही थी । यादवोंकी उस विशाल सेनामें ऐसे - ऐसे घोड़े दृष्टिगोचर होते थे, जो वायु और मनके समान वेगशाली थे । वे अपने पैरोंसे धरतीका तो स्पर्श ही नहीं करते थे- उड़ते से चलते थे । मिथिलेश्वर! उनकी गति ऐसी हलकी थी कि वे कच्चे सूतोंपर और बुद्बुदोंपर भी चल सकते थे । पारे पर मकड़ीके जालोंपर और पानीके फुहारोंपर भी वे निराधार चलते दिखायी देते थे । वे चञ्चल अश्व पर्वतोंकी घाटियों, नदियों, दुर्गमस्थानों, गड्ढों और ऊँचे - ऊँचे प्रासादोंको भी निरन्तर लाँघते जा रहे थे । मैथिलेन्द्र! वे इधर - उधर मोर, तीतर, क्रौञ्च ( सारस ), हंस और खञ्जरीटकी गतिका अनुकरण करते हुए पृथ्वीपर नाचते चलते थे । कई अश्व पाँखवाले थे । उनके शरीर दिव्य थे, कान श्यामवर्णके थे, आकृति मनोहर थी । पूँछके बाल पीले रंगके थे और शरीरकी कान्ति चन्द्रमाके समान श्वेत थी । वे भी श्रीकृष्णकी अश्वशालासे निकले थे । कुछ घोड़े उच्चैः श्रवाके कुलमें उत्पन्न हुए थे, कुछ सूर्यदेवके घोड़ोंसे पैदा हुए थे । कितने ही अश्व अश्विनीकुमारोंकी पढ़ायी हुई विद्या ( चलनेकी कला ) से सम्पन्न थे । कितनोंको वरुण देवताने अच्छी चालकी शिक्षा दी थी । किन्हींकी कान्ति मन्दार - पुष्पके समान थी । कुछ मनोहर अश्व चितकबरे थे । कितनोंके रंग अश्विनी-पुष्प ( कनेर ) के समान पीले थे । बहुत से अश्व सुनहरी तथा हरी कान्तिसे उद्भासित थे । कितने ही अश्व पद्मराग - मणिकी - सी कान्तिवाले थे । वे सभी समस्त शुभ लक्षणोंसे युक्त दिखायी देते थे । राजन्! इनके सिवा और भी कोटि - कोटि अश्व कुशस्थली पुरीसे बाहर निकले ॥ २१–३२ ॥ सेनाके धनुर्धर वीर ऐसे थे, जिन्हें कई युद्धों में अपने शौर्यके लिये कीर्ति प्राप्त हो चुकी थी । उन सबने शक्ति, त्रिशूल, तलवार, गदा, कवच और पाश धारण कर रखे थे । नरेश्वर! वे शस्त्र - धाराओंकी वर्षा करते हुए प्रलयकालके महासागरके समान प्रतीत होते थे । रणभूमिमें दिग्गजोंकी भाँति शत्रुओंको रौंदते और कुचलते दिखायी देते थे । राजन्! इस प्रकार यादवोंकी वह विशाल सेना निकली, जो अत्यन्त अद्भुत थी । उसे देखकर देवता और असुर — सभी विस्मित हो उठे ॥ ३३-३५ ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें विश्वजित्खण्डके अन्तर्गत नारद - बहुलाश्व - संवादमें ' यादवसेनाका प्रयाण ' नामक तीसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ ३ ॥

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चौथा अध्याय सेनासहित यादव - वीरोंकी दिग्विजयके लिये यात्रा नारदजी कहते हैं - राजन्! इस प्रकार सेनासे घिरे हुए धनुर्धारियोंमें श्रेष्ठ वीर प्रद्युम्नसे श्रीकृष्ण-बलदेवसहित उग्रसेनने कहा ॥ १ ॥

उग्रसेन बोले – हे महाप्राज्ञ प्रद्युम्न! तुम श्रीकृष्णकी कृपासे समस्त राजाओंपर विजय प्राप्त करके शीघ्र ही द्वारकामें लौट आओगे । इस बातको ध्यानमें रखो कि धर्मज्ञ पुरुष मतवाले, असावधान, उन्मत्त ( पागल ), सोये हुए, बालक, जड, नारी, शरणागत, रथहीन और भयभीत शत्रुको नहीं मारते । संकटमें पड़े हुए प्राणियोंकी पीड़ाका निवारण तथा कुमार्गमें चलनेवालोंका वध राजाके लिये परम धर्म है । इस प्रकार जो आततायी है ( अर्थात् दूसरोंको विष देनेवाला, पराये घरोंमें आग लगानेवाला, क्षेत्र और नारीका अपहरण करनेवाला है ), वह अवश्य वधके योग्य है । स्त्री, पुरुष या नपुंसक कोई भी क्यों न हो, जो अपने - आपको ही महत्त्व देनेवाले, अधम तथा समस्त प्राणियोंके प्रति निर्दय हैं, ऐसे लोगोंका वध करना राजाओंके लिये वध न करनेके ही बराबर है । अर्थात् दुष्टोंके वधसे राजाओंको दोष नहीं लगता । धर्मयुद्धमें शत्रुओंका वध करना प्रजापालक राजाके लिये पाप नहीं है । आदिराजा स्वायम्भुव मनुने पूर्वकालमें राजाओंसे कहा था कि ' जो रणमें निर्भय होकर आगे पाँव बढ़ाते हुए प्राण त्याग देता है, वह सूर्य मण्डलका भेदन करके परमधाममें जाता है । जो योद्धा क्षत्रिय होकर भी भयके कारण युद्धसे पीठ दिखाकर रणभूमिमें स्वामीको अकेला छोड़कर पलायन कर जाता है, वह महारौरव नरकमें पड़ता है । राजाका कर्तव्य है कि वह सेनाकी रक्षा करे और सेनाका कर्तव्य है कि वह राजाकी ही रक्षा करे । सूतको चाहिये कि वह संकटमें पड़े हुए रथीका प्राण बचाये और रथी सारथिकी रक्षा करे । तुम समस्त यादव सामर्थ्यशाली सेना और वाहनसे सम्पन्न हो; अतः तुम सब मिलकर प्रद्युम्नकी ही रक्षा करना और प्रद्युम्न तुमलोगोंकी रक्षा करें । गौ, ब्राह्मण, देवता, धर्म, वेद और साधुपुरुष-इस भूतलपर मोक्षकी अभिलाषा रखनेवाले सभी मनुष्योंके लिये सदा पूजनीय हैं । वेद भगवान् विष्णुकी वाणी हैं, ब्राह्मण उनका मुख हैं, गौएँ श्रीहरिका शरीर हैं, देवता अङ्ग हैं और साधुपुरुष साक्षात् उनके प्राण माने गये हैं । ये साक्षात् परिपूर्णतम भगवान् श्रीकृष्ण हरि भक्तिके वशीभूत हो जिनके चित्तमें निवास करते हैं, उन वीरोंकी सदा विजय होती है * ॥२–१३ ॥ श्रीनारदजी कहते हैं— नरेश्वर! समस्त यादवोंने राजा उग्रसेनके इस आदेशको सिर झुकाकर स्वीकार किया और हाथ जोड़कर प्रणाम किया । तत्पश्चात् प्रद्युम्नने मस्तक झुकाकर राजा उग्रसेन, शूर, वसुदेव, बलभद्र, श्रीकृष्ण तथा महामुनि गर्गाचार्यको प्रणाम किया । नृपेश्वर! तदनन्तर श्रीकृष्ण और बलदेवके साथ राजा उग्रसेन यदुपुरीमें चले गये और दिग्विजयकी इच्छावाले श्रीकृष्णपुत्र प्रद्युम्नने यादव - सेनाके साथ आगेके लिये प्रस्थान किया॥१४–१६ ॥ मैथिलेश्वर! उस सेनाके समस्त सुवर्णमय शिविरोंसे चार योजन लम्बा राजमार्ग भी आच्छादित एवं सुशोभित होता था । सेनाके आगे विशाल वाहिनीसे युक्त महाबली कृतवर्मा थे और उनके पीछे धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ अक्रूर अपने सैन्यदलके साथ चल रहे थे । तत्पश्चात् मन्त्री उद्धव पाँच प्रतिमाओंके साथ जा रहे थे । राजन्! उनके पीछे अठारह महारथी सौ अक्षौहिणी सेनाके साथ यात्रा कर रहे थे । उनके नाम इस प्रकार हैं- प्रद्युम्न, अनिरुद्ध, दीप्तिमान्, भानु, साम्ब, मधु, बृहद्भानु, चित्रभानु, वृक, अरुण, * गावो विप्राः सुरा धर्मश्छन्दांसि भुवि साधवः । पूजनीयाः सदा सर्वैर्मनुष्यैर्मोक्षकाङ्क्षिभः ॥ वेदा विष्णुवचो विप्रा मुखं गावस्तनुहरेः । अङ्गानि देवताः साक्षात् साधवो ह्यसवः स्मृताः ॥ श्रीकृष्णोऽयं हरिः साक्षात् परिपूर्णतमः प्रभुः । येषां चित्ते स्थितो भक्त्या तेषां तु विजयः सदा ॥ ( गर्ग ०, विश्व ० ४। ११–१३ ) 517 Srigraga - sanghita_Section_10_1_Back

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अध्याय ५ ] यादव - सेनाकी कच्छ और कलिङ्गदेशपर विजय २ ९ १ पुष्कर, देवबाहु, श्रुतदेव, सुनन्दन, चित्रभानु, विरूप, कवि और न्यग्रोध । तत्पश्चात् श्रीकृष्णप्रेरित गद आदि समस्त वीर चल रहे थे । भोज, वृष्णि, अन्धक, मधु, शूरसेन तथा दशार्हके वंशज वीर उस सेनामें सम्मिलित थे । समस्त यादवोंकी संख्या छप्पन कोटि बतायी जाती है । नरेश्वर! उस यादव - सेनाकी गणना भला, इस भूतलपर कौन करेगा ॥ १७–२१ ॥ इस प्रकार विशाल सेनाको साथ लिये जाते हुए यादव नरेशोंके धनुषके टंकारके साथ पीटे जाते हुए नगारोंका महान् घोष भूमण्डलमें व्याप्त हो रहा था । गजेन्द्रोंका चीत्कार, हयेन्द्रोंकी हिनहिनाहट, दगती हुई भुशुण्डी ( तोप ) की आवाज, दृढ़ता रखनेवाले वीरोंकी गर्जना और डंकोंकी गम्भीर ध्वनियोंसे वे यादव - वीर बिजलीकी गड़गड़ाहटसे युक्त प्रचण्ड मेघोंका - सा दृश्य उपस्थित करते थे । सारा भूमण्डल ही उस इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें विश्वजित्खण्डके सेनासे शोभित हो रहा था । पृथ्वीपर चलते हुए उन महात्मा वीरोंके तुमुलनादसे दिग्गजोंके कान भी बहरे से हो गये थे तथा शत्रुगण साहस छोड़कर तत्काल अपने दुर्गकी ओर भागने लगे थे । पानीमें रहनेवाले कच्छप ' पृथ्वीपर यह क्या हो रहा है? ' – यों कहते तथा ' हम कहाँसे कहाँ जायँ! ' यों बोलते हुए भागने लगे । वे मन - ही - मन सोचते थे – ' हे विधाता! यह उपद्रव कहाँ जा रहा है, जिससे समस्त लोकोंसहित यह अचला पृथ्वी भी विचलित हो गयी है? ' ॥ २२ -२७ ॥ विदेहराज! यज्ञ तो एक बहाना था । उसकी आड़ लेकर परमेश्वर श्रीहरि भूतलका भार उतार रहे थे । जो यदुकुलमें चतुर्व्यूहरूप धारण करके विराजमान हैं, उन अनन्त - गुणशाली पृथ्वीपालक भगवान्‌को नमस्कार है ॥ २८ ॥

अन्तर्गत नारद - बहुलाश्व - संवादमें ' प्रद्युम्नकी दिग्विजयार्थ यात्रा ' नामक चौथा अध्याय पूरा हुआ ॥ ४ ॥

पाँचवाँ अध्याय यादव- सेनाकी कच्छ और कलिङ्गदेशपर विजय श्री बहुलाश्वने पूछा- देवर्षिशिरोमणे! श्रीहरि -के पुत्र प्रद्युम्न क्रमशः किन - किन देशोंको जीतनेके लिये गये, उनके उदार कर्मोंका मेरे समक्ष वर्णन कीजिये । अहो! भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रकी अपने भक्तोंपर ऐसी कृपा है, जो श्रवण और चिन्तन किये जानेपर पापीजनोंको उनके कुलसहित पवित्र कर देती है ॥ १-२ ॥ श्रीनारदजीने कहा- राजन्! तुमने बहुत अच्छी बात पूछी है । तुम्हारी विमल बुद्धिको साधुवाद! श्रीकृष्णके भक्तोंका चरित्र तीनों लोकोंको पवित्र कर देता है । राजन्! वर्षाकालमें बादलोंसे बरसती हुई जलधाराओंको तथा भूमिके समस्त धूलिकणोंको कोई विद्वान् पुरुष भले ही गिन डाले, किंतु महान् श्रीहरिके गुणोंको कोई नहीं गिन सकता । रुक्मिणीनन्दन प्रद्युम्न उस श्वेत छत्रसे सुशोभित थे, जिसकी छाया चार योजनतक दिखायी देती थी । वे इन्द्रके दिये हुए रथपर आरूढ़ हो अपनी सेनाके साथ पहले कच्छ देशोंको जीतनेके लिये उसी प्रकार गये, जैसे पूर्वकालमें भगवान् शंकरने त्रिपुरोंको जीतनेके लिये रथसे यात्रा की थी । कच्छ देशका राजा शुभ्र शिकार खेलनेके लिये निकला था । वह यादवोंकी सेनाको आयी हुई जान अपनी राजधानी हालापुरीको लौट गया ॥ ३-७ ॥ प्रद्युम्नकी आयी हुई सेना हाथियोंके पदाघातसे वृक्षोंको चूर - चूर करती और विभिन्न देशोंके भवनोंको गिराती हुई चल रही थी । उससे उठे हुए धूलिसमूहोंसे आकाश अन्धकाराच्छन्न हो गया और कच्छ देशके सभी निवासी भयभीत हो गये । उस समय राजा शुभ्र अत्यन्त हर्षित हो तत्काल सोनेकी मालाओंसे अलंकृत पाँच सौ हाथी, दस हजार घोड़े और बीस भार सुवर्ण

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२ ९ २ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ विश्वजित्खण्ड लेकर सामने आया । उसने भेंट देकर पुष्पहारसे अपने दोनों हाथ बाँधकर प्रद्युम्नको प्रणाम किया । इससे प्रसन्न होकर शम्बरारि प्रद्युम्नने राजा शुभ्रको रत्नोंकी बनी हुई एक माला पुरस्कारके रूपमें दी और उसके राज्यपर पुनः उसीको प्रतिष्ठित कर दिया । राजन्! साधुपुरुषोंका ऐसा ही स्वभाव होता है ॥ ८–१२ ॥ तदनन्तर बलवान् रुक्मिणीनन्दन कलिङ्ग देशको जीतने के लिये गये । उनके साथ फहराती पताकाओंसे सुशोभित उत्तम सेनाएँ थीं । उन्हें देखकर ऐसा लगता था, मानो मेघोंकी मण्डलीके साथ देवराज इन्द्र यात्रा कर रहे हों । कलिङ्गराज अपनी सेना तथा शक्तिशाली हाथी - सवारोंके साथ महात्मा प्रद्युम्नके सामने युद्ध करनेके लिये निकला । कलिङ्गको आया देख धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ अनिरुद्ध एकमात्र रथ लेकर यादव -सेनाके आगे खड़े हो उसकी सेनाओंके साथ युद्ध करने लगे । अपने धनुषकी बार - बार टंकार करते हुए वीर अनरुद्धिने सौ बाणोंसे कलिङ्गराजको, दस - दस बाणोंसे उसके रथियों और हाथियोंको घायल कर दिया । यह देख उनके अपने और शत्रुपक्षके सभी योद्धाओंने ' साधु - साधु ' कहकर उन्हें शाबाशी दी । प्रद्युम्न के देखते हुए ही अनिरुद्ध युद्ध करने लगे । नरेश्वर! उनके बाण - समूहोंसे कितने ही वीरोंके दो टुकड़े हो गये, हाथियोंके मस्तक विदीर्ण हो गये और घोड़ों के पैर कट गये । रथोंके पहिये चूर - चूर हो गये, घोड़े और उनके साथ - साथ चलनेवाले कालके गालमें चले गये, रथी और सारथि आँधीके उखाड़े हुए वृक्षोंके समान धराशायी हो गये । मैथिल! शत्रुकी सेना भागने लगी । अपनी सेनाको भागती देख हाथीपर बैठा हुआ कलिङ्गराज बड़े रोषसे आगे बढ़ा । उसका कवच छिन्न - भिन्न हो गया था । उसने तुरंत ही बहत्तर भार लोहेकी बनी हुई भारी गदा चलायी और अपने हाथीके द्वारा बड़े - बड़े वीरोंको गिराता हुआ बलवान् कलिङ्गराज मेघके समान गर्जना करने लगा । उस गदाके प्रहारसे किंचित् व्याकुलचित्त होकर अनिरुद्ध युद्धस्थलमें ही रथपर गिर पड़े । यह देख यादवोंके क्रोधकी सीमा न रही । उन्होंने तत्काल तीखे और चमकीले बाणोंद्वारा कलिङ्गराजको उसी प्रकार चोट पहुँचाना आरम्भ किया, जैसे मांसयुक्त बाजको कुरर पक्षी अपनी चोंचोंसे पीड़ा देते हों । कलिङ्गराजने भी उस समय कुपित हो अपने धनुषपर प्रत्यञ्चा चढ़ायी और बार- बार उसकी टंकार करते हुए अपने बाणोंसे शत्रुओंके बाणोंको चूर - चूर कर दिया ॥ १३–२४ ॥ मैथिलेश्वर! तब बलदेवके छोटे भाई बलवान् गदने गदा लेकर बायें हाथसे उसके हाथीपर प्रहार किया, फिर अर्धचन्द्राकार बाणसे उसको चोट पहुँचायी । नरेश्वर! उस प्रहारसे वह हाथी छिन्न - भिन्न होकर इस प्रकार बिखर गया, मानो इन्द्रके वज्रकी चोटसे कोई शैलखण्ड बिखर गया हो । कलिङ्गराज हाथीसे गिर पड़ा और विशाल गदा लेकर उसने गदको मारा और गदने भी तत्काल कलिङ्गराजपर गदासे आघात किया । कलिङ्गराज और गदमें वहाँ घोर युद्ध होने लगा । उनकी दोनों गदाएँ आगकी चिनगारियाँ बिखेरती हुई चूर - चूर हो गयीं । तत्पश्चात् गदने कलिङ्गराजको पकड़कर समरभूमिमें दे मारा । जैसे गरुड़ किसी साँपको पटककर खींचता हो, उसी प्रकार गद तुरंत ही अपने हाथसे कलिङ्गराजको घसीटने लगे । गदाके प्रहारसे पीड़ित कलिङ्गराजकी हड्डियाँ चूर - चूर हो रही थीं । वह महात्मा प्रद्युम्नकी शरणमें आ गया । उसने भेंट देकर कहा - ' आप देवताओंके भी देवता परमेश्वर हैं । कुपित हुए दण्डधर यमराजकी भाँति आपके आक्रमणको पृथ्वीपर कौन सह सकता है? आपको नमस्कार है ॥२५–३१ ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें विश्वजित्खण्डके अन्तर्गत नारद - बहुलाश्व - संवादमें ' कच्छ और कलिङ्गदेशपर ' विजय ' नामक पाँचवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५ ॥

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छठा अध्याय प्रद्युम्नका मरुधन्व देशके राजा गयको हराकर मालवनरेश तथा माहिष्मती पुरीके राजासे बिना युद्ध श्रीनारदजी कहते हैं - राजन्! इस प्रकार कलिङ्गराजपर विजय पाकर यादवेश्वर प्रद्युम्न मरुधन्व ( मारवाड़ ) देशमें इस प्रकार गये, मानो अग्रिने जलपर आक्रमण किया हो । धन्वदेशका राजा गय पर्वतीय दुर्गमें रहता था । उसकी स्थिति जानकर यादवेश्वरने उसके पास उद्धवको भेजा । बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ उद्धव गिरिदुर्गमें गये और राजसभामें प्रवेश करके गयसे बोले - ' महामते नरेश! मेरी बात सुनिये । यादवोंके स्वामी महान् राज - राजेश्वर उग्रसेन जम्बूद्वीपके राजाओंको जीतकर राजसूययज्ञ करेंगे । साक्षात् परिपूर्णतम भगवान् श्रीकृष्ण जो असंख्य ब्रह्माण्डोंके अधिपति हैं, उन महाराजके मन्त्री हुए हैं । उन्होंने ही धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ साक्षात् प्रद्युम्नको यहाँ भेजा है । आप यदि अपने कुलका कुशल - क्षेम चाहें तो शीघ्र भेंट लेकर उनके पास चलें ॥१-६ ॥ श्रीनारदजी कहते हैं— राजन्! यह सुनकर शौर्य और पराक्रमके मदसे उन्मत्त रहनेवाले महाबली राजा गयने कुछ कुपित होकर उद्धवसे कहा ॥७ ॥

गय बोले - महामते! मैं युद्ध किये बिना उनके लिये भेंट नहीं दूँगा । आप जैसे यावदलोग अभी थोड़े ही दिनोंसे वृद्धिको प्राप्त हुए हैं- नये धनी हैं ॥ ८ ॥

राजन् उसके यों कहनेपर उद्धवजीने प्रद्युम्रके पास आकर समस्त यादवोंके सामने राजा गयकी कही हुई बात दुहरा दी । फिर तो उसी समय रुक्मिणीपुत्रने गिरिदुर्गपर आक्रमण किया । गयके सैनिकोंका यादवोंके साथ घोर युद्ध हुआ । हाथियोंके पैरोंसे नागरिकों तथा भूमिपर चलनेवाले लोगोंको कुचलता और वृक्षोंको रौंदवाता हुआ राजा गय दो अक्षौहिणी सेनाके साथ युद्धके लिये निकला । रथी रथियोंके साथ, बड़े - बड़े गज गजराजोंके साथ, घुड़सवार घुड़सवारोंके साथ तथा वीर वीरोंके साथ परस्पर युद्ध करने लगे । तीखे बाण - समूहों, ढाल, तलवार, गदा, ऋष्टि, पाश, फरसे, शतघ्नी और भुशुण्डी आदि किये ही भेंट प्राप्त करना अस्त्र - शस्त्रोंकी मारसे भयातुर हो गयके सैनिक यादवोंसे परास्त हो अपना - अपना रथ छोड़कर सब-के सब दसों दिशाओंमें भाग चले ॥ ९ –१४ ॥ अपनी सेनाके पलायन करनेपर महाबली गय बार - बार धनुषकी टंकार करता हुआ अकेला ही युद्धके लिये आगे बढ़ा । तेजस्वी श्रीकृष्णपुत्र दीप्तिमान्‌ने धनुषसे छोड़े हुए बाणोंसे शत्रुके घोड़ोंको मार डाला । एक बाणसे सारथिको नष्ट करके दो बाणोंसे उसकी ऊँची ध्वजा काट डाली । बीस बाणोंसे रथको तोड़ - फोड़कर पाँच बाणोंसे उसके कवचको छिन्न - भिन्न कर दिया । फिर महाबली दीप्तिमान्‌ने सौ बाण मारकर गयके धनुषको भी खण्डित कर दिया । गयने दूसरे धनुषको लेकर बीस बाणोंद्वारा श्रीकृष्णपुत्र दीप्तिमान्‌को घायल कर दिया । फिर वह बलवान् वीर मेघके समान गर्जना करने लगा । समराङ्गणमें उसके प्रहारसे दीप्तिमान्‌के हृदयमें कुछ व्याकुलता हुई, तथापि उन्होंने एक ज्योतिर्मयी सुदृढ़ शक्ति हाथमें ली और उसे घुमाकर महात्मा गयके ऊपर चलाया । उस शक्तिने राजाके हृदयको विदीर्ण करके उसका बहुत रक्त पी लिया । राजन्! गय भी समराङ्गणमें गिरकर मूच्छित हो गया । दीप्तिमान् अपने धनुषकी कोटि शत्रुके गलेमें डालकर उसे घसीटते हुए प्रद्युम्नके सामने उसी प्रकार ले आये, जैसे गरुड़ किसी नागको खींच लाया हो । उस समय मानवों तथा देवताओंकी दुन्दुभियाँ एक साथ ही बज उठीं । देवता आकाशसे और पार्थिव नरेश भूतलसे फूलोंकी वर्षा करने लगे । राजन्! तब गयने भी शम्बरारि श्रीकृष्णपुत्र प्रद्युम्नके चरणोंका पूजन किया ॥ १५ – २२३ ॥ वहाँसे महात्मा प्रद्युम्न अवन्तिकापुरको गये, उसी प्रकार जैसे भ्रमर सुनहरी कर्णिकापर टूट पड़े । उनका आगमन सुनकर मालवनरेश जयसेनने उनकी भली-भाँति पूजा की । मिथिलेश्वर! वे प्रद्युम्रके प्रभावको जानते थे, अतः उनसे अपनी पराजय स्वीकार करके

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२ ९ ४ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ विश्वजित्खण्ड उन्होंने बड़े - बूढ़ोंको बुलवाया और उनके द्वारा महात्मा प्रद्युम्नको उत्तम भेंट - सामग्री अर्पित की । वहाँ अपने पिताकी बुआ राजाधिदेवीको प्रणाम करके महामनस्वी प्रद्युम्नने अपने फुफेरे भाई विन्द और अनुविन्दको गलेसे लगाया और मालवदेशके योद्धाओंसे सादर घिरकर वे बड़ी शोभाको प्राप्त हुए ॥ २३–२५ ॥ वहाँसे धनुर्धारियोंमें श्रेष्ठ प्रद्युम्र माहिष्मती पुरीको गये और यादवों तथा अपने सैनिकोंके साथ वहाँ उन्होंने नर्मदा नदीका दर्शन किया । जलके कल्लोलोंसे सुशोभित नर्मदा मानो शृङ्गार - तिलक धारण किये हुए थी और छपी हुई पगड़ीकी भाँति पुष्पसमूहों को बहा रही थी । बेंत, बाँस तथा अन्य वृक्षोंसे फूले हुए माधव - तरुओंसे घिरी हुई नर्मदा मूर्तिमान् तेजस्वी देवताओंसे घिरी हुई आकाशगङ्गाकी - सी शोभा पाती थी । उसके तटपर छावनी डालकर यादवेश्वर प्रद्युम्न यादवोंके साथ इस प्रकार विराजमान हुए मानो देवताओंके साथ देवराज इन्द्र शोभा पा रहे हों । महाराज! माहिष्मती पुरीके स्वामी इन्द्रनील बड़े ज्ञानी थे, उन्होंने महात्मा प्रद्युम्नके पास अपना दूत भेजा । दूतने प्रद्युम्रराजके शिबिर में आकर हाथ जोड़ प्रणाम किया और सबके सुनते हुए वहाँ यह बात कही ॥ २६-३१ ॥ दूत बोला - प्रभो! हस्तिनापुरके राजा बुद्धिमान् धृतराष्ट्रने इन अत्यन्त बलवान् वीर इन्द्रनीलको माहिष्मती पुरीके राज्यपर स्थापित किया है, अतः ये किसीको बलि या भेंट नहीं देंगे । दुर्योधनको स्वेच्छासे ही ये द्रव्यराशि भेंट करते हैं, बलात् नहीं । आपलोग युद्ध कर सकते हैं, परंतु यहाँ युद्धसे कोई लाभ नहीं होगा ॥३२-३३ ॥ श्रीप्रद्युम्न ने कहा- दूत! जैसे राजा गय और कलिङ्गराजने अपमानित होनेपर भेंट दी, उसी तरह यहाँके राजा भी पराजित होकर भेंट देंगे । माहिष्मतीके राजा बड़े राजाधिराज बने हैं; परंतु ये महाराज उग्रसेन-को नहीं जानते ॥ ३४ ॥

श्रीनारदजी कहते हैं - राजन्! यों कहनेपर दूतने तत्काल जाकर राजसभामें माहिष्मतीपतिसे प्रद्युम्नकी कही हुई बात कह सुनायी । माहिष्मतीके राजाने देखा कि यादवोंकी सेना बड़ी उद्भट है ( अतः उससे युद्ध करना ठीक न होगा ); इसलिये वे पाँच हजार हाथी, एक लाख घोड़े और दस हजार विजय-शील रथ लेकर निकले और महात्मा प्रद्युम्नसे मिलकर वह सब कुछ उन्हें भेंट कर दिया ॥ ३५-३७ ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें विश्वजित्खण्डके अन्तर्गत श्रीनारद - बहुलाश्व - संवादमें ' माहिष्मतीपुरीपर विजय ' नामक छठा अध्याय पूरा हुआ ॥ ६ ॥

सातवाँ अध्याय गुजरात - नरेश ऋष्यपर विजय प्राप्त करके यादव - सेनाका चेदिदेशके स्वामी दमघोषके यहाँ जाना; राजाका यादवोंसे प्रेमपूर्ण बर्ताव करनेका निश्चय, किंतु शिशुपालका माता - पिताके विरुद्ध यादवोंसे युद्धका आग्रह श्रीनारदजी कहते हैं- राजन्! महापराक्रमी प्रद्युम्र माहिष्मतीके राजाको जीतकर अपनी विशाल सेना लिये गुजरातके राजाके यहाँ गये । जैसे पक्षिराज गरुड अपनी चोंचसे सर्पको पकड़ लेते हैं, उसी प्रकार श्रीकृष्ण कुमार प्रद्युम्नने गुर्जरदेशके अधिपति महाबली वीर ऋष्यको सेनाद्वारा जा पकड़ा । उनसे तत्काल भेंट वसूल करके महाबली यादवेन्द्र अपनी विशाल वाहिनी साथ लिये हुए चेदिदेशमें जा पहुँचे । चेदिराज दमघोष वसुदेवजीके बहनोई थे; किंतु उनका पुत्र शिशुपाल श्रीकृष्णका पक्का शत्रु कहा गया है । बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ महाबुद्धिमान् उद्धव महाबली दमघोषके पास गये और उनको प्रणाम करके बोले॥१–५ ॥ उद्धवने कहा- राजन्! महाराज उग्रसेनको बलि ( भेंट ) दीजिये । वे समस्त राजाओंको जीतकर