गर्ग संहिता — पृष्ठ 301–310
गर्ग संहिता · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 301–310
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अध्याय ७ ] गुजरात - नरेश ऋष्यपर विजय प्राप्त करके यादव सेनाका दमघोषके यहाँ जाना २ ९ ५ राजसूययज्ञ करेंगे ॥६ ॥
श्रीनारदजी कहते हैं— मिथिलेश्वर! उद्धवजी-का यह वचन सुनकर दमघोषके दुष्ट पुत्र शिशुपालके ओष्ठ फड़कने लगे । वह अत्यन्त कुपित हो राजसभामें तुरंत इस प्रकार बोला ॥७ ॥
शिशुपालने कहा – अहो! कालकी गति दुर्लङ्घ्य है । यह संसार कैसा विचित्र है! कालात्मा विधाताके प्राजापत्यपर भी कलह या विवाद खड़ा हो गया है ( अर्थात् लोक विधाता ब्रह्मा और घट - निर्माता कुम्भकारमें झगड़ा हो रहा है कि प्रजापति कौन हैं ) । कहाँ राजहंस और कहाँ कौआ! कहाँ पण्डित तथा कहाँ मूर्ख! जो सेवक हैं, वे चक्रवर्ती राजाको - अपने स्वामीको जीतनेकी इच्छा रखते हैं । राजा ययातिके शापसे यदुवंशी राज्य - पदसे भ्रष्ट हो चुके हैं; किंतु वे छोटा - सा राज्य पाकर उसी तरह इतरा उठे हैं, जैसे छोटी नदियाँ थोड़ा-सा जल पाकर उमँड़ने लगती हैं- उच्छलित होने लगती हैं । जो हीनवंशका होकर राजा हो जाता है, जो मूर्खका बेटा होकर पण्डित हो जाता है, अथवा जो सदाका निर्धन कभी धन पा जाता है, वह घमंडसे भरकर सारे जगत्को तृणवत् मानने लगता है । उग्रसेन कितने दिनोंसे राजपदवीको प्राप्त हुआ है? वासुदेव मन्त्री बना है और उग्रसेन उसीके बलसे और केवल उसीसे पूजित होकर राजा बन बैठा है । उसके मन्त्री वासुदेवने जरासंधके भयसे भागकर अपनी पुरी मथुराको छोड़कर समुद्रकी शरण ली है । वह पहले ' नन्द ' नामक अहीरका भी बेटा कहा जाता था । उसीको वसुदेव लाजहया छोड़कर अपना पुत्र मानने लगे हैं । वसुदेव तो गोरे रंगके हैं, उनसे उत्पन्न हुआ यह कृष्ण श्यामवर्णका कैसे हो गया? केवल पिता ही नहीं, पितामह भी गोरे हैं । उनके कुलकी संततिमें इस वासुदेवकी गणना हो, यह बड़े दुःख और हँसीकी बात है । मैं उसके पुत्र प्रद्युम्नको यादवों तथा सेनासहित जीतकर भूमण्डलको यादवोंसे शून्य कर देनेके लिये कुशस्थलीपर चढ़ाई करूँगा ॥ ८–१६ ॥ श्रीनारदजी कहते हैं- राजन्! यों कहकर धनुष और अक्षय बाणोंसे भरे दो तरकस लेकर शिशुपालको युद्धके लिये जानेको उद्यत देख चेदिराजने उससे कहा ॥ १७ ॥
दमघोष बोले- बेटा! मैं जो कहता हूँ, उसे सुनो । क्रोध न करो, न करो । जो सहसा कोई कार्य करता है, उसे सिद्धि नहीं प्राप्त होती । क्षमाके समान धर्म, अर्थ, काम और मोक्षका साधन दूसरा कोई नहीं है । इसलिये सामनीतिसे काम लेना चाहिये । सामके तुल्य दूसरा कोई सुखद उपाय नहीं है । दानसे सामकी शोभा होती है और सामकी सत्कारसे । सत्कारकी भी तभी शोभा होती है, जब वह यथायोग्य गुण देखकर किया जाय । यादव और चेदिप सगेसम्बन्धी माने गये हैं; अतः मैं वास्तवमें यही चाहता हूँ कि यादवों तथा चेदिपोंमें कलह न हो ॥ १८-२१ ॥ श्रीनारदजी कहते हैं - बुद्धिमान् दमघोषके समझानेपर भी शिशुपाल अनमना हो गया, कुछ बोला नहीं । वह महाखल चुपचाप बैठा रहा । राजन्! चेदिराजकी रानी श्रुतिश्रवा शूरनन्दन वसुदेवकी बहिन थीं । वे अपने पुत्र शिशुपालके पास आकर अच्छी तरह विनययुक्त होकर बोलीं ॥२२-२३ ॥ श्रुतिश्रवाने कहा- बेटा! खेद न करो । यादवों तथा चेदिपोंमें कभी कलह नहीं होना चाहिये । शूरनन्दन वसुदेव तुम्हारे मामा हैं और उनके पुत्र श्रीकृष्ण भी तुम्हारे भाई ही हैं । उनके जो प्रद्युम्न आदि सैकड़ों महावीर पुत्र आये हैं, वे सब मेरे और तुम्हारे द्वारा लाड़ - प्यार पानेके योग्य तथा समादरणीय हैं । उनके साथ युद्ध करना उचित नहीं होगा । तात! मैं तुम्हारे साथ स्वयं स्नेहार्द्रचित्त होकर उन समागत यादवोंको लेनेके लिये चलूँगी । चिरकालसे मेरे मनमें उन सबको देखनेकी उत्कण्ठा है । मैं बड़े उत्सव एवं उत्साहके साथ उनको घर लाऊँगी । ऐसा अवसर फिर कभी नहीं आयेगा ॥ २४-२६ ॥ शिशुपाल बोला - बलराम, कृष्ण तथा समस्त यादव मेरे शत्रु हैं । जिन्होंने मेरा तिरस्कार किया है, उन सबको मैं भी अपने सैनिकोंद्वारा मरवा डालूँगा । पूर्व-कालमें कुण्डिनपुरमें राम तथा कृष्ण, इन दोनों भाइयोंने मेरी अवहेलना की, मेरा विवाह रोक दिया; अतः वे मेरे भाई नहीं, शत्रु हैं । यदि तुम दोनों ( मेरे माता - पिता होकर ) यादवोंका समर्थन करोगे तो मैं तुम दोनों
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२ ९ ६ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ विश्वजित्खण्ड माता - पिताको मजबूत बेड़ियोंसे बाँधकर उसी तरह कारागारमें डाल दूँगा, जैसे कंसने अपने माँ- बापको कैद कर लिया था । अन्यथा तुम दोनोंका वध भी कर डालूँगा, मेरी शपथ या प्रतिज्ञा बड़ी कठोर होती है ( इसे टालना कठिन है ) ॥२७–३० ॥ श्रीनारदजी कहते हैं— शिशुपालकी कड़ी बातें सुनकर चेदिराज चुप हो गये । उद्धवजी अपनी सेनामें लौट आये और जो कुछ शिशुपालने कहा था, वह सब उन्होंने वहाँ कह सुनाया । तदनन्तर वाहिनी, ध्वजिनी, पृतना और अक्षौहिणी – ये चार प्रकारकी शिशुपालकी सेनाएँ सुसज्जित हुईं ॥ ३१-३२ ॥ बहुलाश्वने पूछा — प्रभो! वाहिनी आदि सेनाकी संख्या मुझे बताइये; क्योंकि ऋषिलोग भूत, वर्तमान और भविष्य - तीनों कालोंकी बातें जानते हैं ॥ ३३ ॥
श्रीनारदजीने कहा — राजन्! सौ हाथी, ग्यारह सौ रथी, दस हजार घोड़े और एक लाख पैदल-यह ' सेना ' का लक्षण है । इससे दुगुनी सेनाको इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें विश्वजित्खण्डके ' चतुरङ्गिणी ' कहते हैं । चार सौ हाथी, दस हजार रथ, चार लाख घोड़े तथा एक करोड़ पैदल – इतने सैनिक लोहेका कवच पहने और शक्तिशाली वल वाहनोंसे सम्पन्न, अस्त्र - शस्त्रोंके ज्ञाता शूरवीर जिस सेनामें विद्यमान हों, उसे विद्वानोंने ' वाहिनी ' कहा है । वाहिनीसे दुगुनी सेनाको ' ध्वजिनी ' नाम दिया गया है । ध्वजिनीसे दुगुनी सेनाको पूर्वकालके विद्वानोंने ' पृतना ' माना है । पृतनासे दुगुनी सेना ' अक्षौहिणी ' कही गयी है । जो साहसी वीर है, उसे ' शूर ' कहा गया है । जो सौ शूरवीरोंकी रक्षा करता है, उसे ' सामन्त ' कहते हैं । जो युद्धमें सौ सामन्तोंकी रक्षा करता है, उसे ' गजी ' ( या गजारोही ) योद्धा कहते हैं । जो समराङ्गणमें सारथि और अश्वोंसहित रथकी रक्षा कर सकता है, वह ' रथी ' कहा गया है । जो अपने बाणोंसे सेनाकी रक्षा करता है, उसे ' महारथी ' कहते हैं । जो अपनी सेनाकी रक्षा और शत्रुओंका संहार करते हुए रणक्षेत्रमें अक्षौहिणी सेनाके साथ युद्ध कर सके, उसे सदा ' अतिरथी ' माना गया है ॥ ३४ - ४१ ॥ अन्तर्गत नारद - बहुलाश्व - संवादमें ' गुर्जर और चेदिदेशमें गमन ' नामक सातवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७ ॥
आठवाँ अध्याय शिशुपालके मित्र द्युमान् तथा शक्तका वध श्रीनारदजी कहते हैं - राजन्! शिशुपाल अपनी सेनाको साथ ले माता - पिताका तिरस्कार करके चन्द्रिकापुरसे बाहर निकला । दुष्टोंका ऐसा स्वभाव ही होता है । उसके सात ' वाहिनी ' और ' ध्वजिनी ' सेनाओंसे युक्त द्युमान् और शक्त निकले । शिशुपालके दो मन्त्रियोंके नाम थे, रङ्ग और पिङ्ग । वे दोनों क्रमश: ' पृतना ' और ' अक्षौहिणी सेना लिये युद्धके लिये नगरसे बाहर आये ॥१-२ ॥ नरेश्वर! शिशुपालकी महासेना प्रलयकालके महासागरके समान उमड़ती आ रही थी । उसे देखकर यदुवंशी वीर भगवान् श्रीकृष्णको ही जहाज बनाये, उस सैन्य सागरसे पार होनेके लिये सामने आये । महाबली द्युमान् शिशुपालसे प्रेरित हो ' वाहिनी ' सेनासहित आगे बढ़कर यादव योद्धाओंके साथ युद्ध करने लगा । समराङ्गणमें दोनों सेनाओंकी बाण - वर्षासे अन्धकार छा गया । घोड़ोंकी टापोंसे इतनी धूल उड़ी कि आकाश आच्छादित हो गया । नरेश्वर! दौड़ते हुए घोड़े उछलकर हाथियोंके मस्तकपर पाँव रख देते थे और घायल हुए हाथी युद्धभूमिमें पैरोंसे शत्रुओंको गिराते और सूँड़की फुफकारोंसे इधर - उधर फेंकते-कुचलते आगे बढ़ रहे थे । उनके मस्तकपर कस्तूरी और सिन्दूरसे पत्र - रचना की गयी थी और पीठपर लाल रंगकी झूल उनकी शोभा बढ़ाती थी । पैदल सैनिक बाणों, गदाओं, परिघों, तलवारों, शूलों
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अध्याय ८ ] शिशुपालके मित्र द्युमान् तथा शक्तका वध २ ९ ७ और शक्तियोंकी मारसे अङ्ग अङ्ग कट जानेके कारण धराशायी हो रहे थे । उनके पैर, घुटने और बाहुदण्ड छिन्न - भिन्न हो गये । राजन्! कोई अपनी तीखी तलवारसे युद्धमें घोड़ोंके दो टुकड़े कर देता था । कितने ही वीर हाथियोंके दाँत पकड़कर उनके मस्तकोंपर चढ़ जाते थे और सिंहकी भाँति महावतों तथा हाथी - सवारोंको चीर - फाड़ डालते थे । बहुत से महाबली घुड़सवार योद्धा हाथियोंके समूहको फाँदकर शत्रु - सैनिकोंपर खड्गका प्रहार करते और उन्हें विदीर्ण कर डालते थे । ऐसा दिखायी देता था कि घोड़ोंकी पीठसे उनका स्पर्श ही नहीं होता है । वे नटोंकी तरह विद्युत् - वेगसे घोड़ोंपर चढ़ते - उतरते रहते थे ॥ ३ - ११ ॥ शत्रुओंकी सेनाका वेगपूर्वक आक्रमण होता देख अक्रूर सामने आये । उन्होंने बाणोंकी वर्षासे दुर्दिन ( बरसात ) का दृश्य उपस्थित कर दिया । द्युमान्ने भी अपने धनुषसे छूटे हुए बाण - समूहोंकी बौछारसे अक्रूरको आच्छादित कर दिया- ठीक उसी तरह, जैसे बादल वर्षाकालके सूर्यको ढक देता है । गान्दिनी -पुत्र अक्रूरने क्रोधसे मुच्छित हो द्युमान्के बाण-समूहोंपर विजय पाकर उस वीरके ऊपर शक्तिसे प्रहार किया । उस प्रहारसे घुमान्का अङ्ग विदीर्ण हो गया । वह दो घड़ीके लिये अपनी चेतना खो बैठा । परंतु शिशुपालके उस बलवान् मित्रने फिर शीघ्र ही उठकर युद्ध आरम्भ कर दिया । घुमान्ने लाख भार लोहेकी बनी हुई एक भारी गदा हाथमें ली और उसके द्वारा अक्रूरकी छातीपर चोट करके मेघके समान गर्जना की । उसके प्रहारसे अक्रूर मन - ही - मन किंचित् व्याकुल हो उठे । तब बार - बार अपने धनुषकी टंकार करते हुए युयुधान ( सात्यकि ) सामने आये । उन्होंने खेल - खेलमें एक ही बाण मारकर तुरंत द्युमान्का मस्तक काट डाला । द्युमानके गिर जानेपर उसके वीर सैनिक युद्धका मैदान छोड़कर भाग चले॥१२–१७ ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें विश्वजित्खण्डके उसी समय अपनी सेनाको भागती देख शक्त वहाँ आ पहुँचा । उसने बुद्धिमान् युयुधानपर सहसा शूल चलाया । युयुधानने अपने बाण - समूहोंसे उस शूलके सौ टुकड़े कर दिये । तब शक्तने परिघ उठाकर युयुधानपर दे मारा । अर्जुनके सखा युयुधान क्षणभरके लिये मूर्च्छित हो गये । इतनेमें ही महाबली वीर कृतवर्मा वहाँ आ पहुँचा । उसने बाण मारकर अश्वसहित शक्तके भी रथको चूर - चूर कर दिया । तब शक्तने भी गदाकी चोटसे कृतवर्माके उत्तम रथको चकनाचूर कर डाला । राजन्! कृतवर्माने रथ छोड़कर शक्तको रोषपूर्वक पकड़ लिया और उसे गिराकर दोनों भुजाओंसे उछालकर एक योजन दूर फेंक दिया । उस युद्धभूमिमें शक्तके गिर जानेपर शिशुपालकी आज्ञासे उसके दोनों मन्त्री रङ्ग और पिङ्ग क्रमशः ' पृतना ' और ' अक्षौहिणी ' सेनाओंके साथ बाण - वर्षा करते और युद्धमें शत्रुओंको कुचलते हुए आये । मैथिलेश्वर! ऐसा जान पड़ता था, मानो अग्नि और वायु देवता एक साथ आ पहुँचे हैं । उन दोनोंकी उद्भट सेनाको देख पिताके समान पराक्रमी यादवेन्द्रप्रद्युम्न धनुष हाथमें लेकर भरी सभा में इस प्रकार बोले ॥ १८ - २५ ॥ प्रद्युम्न ने कहा - योद्धाओ! रङ्ग और पिङ्गके साथ होनेवाले युद्धमें मैं अग्रगामी होकर जाऊँगा; क्योंकि रङ्ग और पिङ्ग महान् बल- पराक्रमसे सम्पन्न दिखायी देते हैं ॥ २६ ॥
श्रीनारदजी कहते हैं- प्रद्युम्नकी यह बात सुन-कर श्रीकृष्णके बलवान् पुत्र नीतिवेत्ता महाबाहु भानु सबसे आगे होकर अपने बड़े भाईसे बोले ॥२७ ॥
भानुने कहा – प्रभो! जब तीनों लोक एक साथ युद्धके लिये आपके सम्मुख उपस्थित दिखायी तब आपके धनुषकी टंकार होगी, इसमें संशय नहीं है । मैं केवल तलवारसे ही रङ्ग और पिङ्गके मस्तक काटकर तरबूजके दो टुकड़ोंकी भाँति हाथमें लिये यहाँ प्रवेश करूँगा ॥ २८-२९ ॥ अन्तर्गत श्रीनारद - बहुलाश्व - संवादमें ' घुमान् और शक्तका वध ' नामक आठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८ ॥
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नवाँ अध्याय भानुके द्वारा रङ्ग - पिङ्गका वध; प्रद्युम्न और शिशुपालका भयंकर युद्ध तथा चेदिदेशपर प्रद्युम्नकी विजय श्रीनारदजी कहते हैं— राजन्! यों कहकर शत्रु-सूदन भानु ढाल - तलवार लेकर पैदल ही शत्रुसेनामें उसी प्रकार घुस गये, जैसे जंगली हाथी जंगलमें प्रवेश करता है । भानुने अपने खड्गसे शत्रु - योद्धाओंकी भुजाएँ काट डालीं । हाथी और घोड़े भी जब सामने या आस - पास मिल जाते थे, तब वे अपनी तलवारसे उनके दो टुकड़े कर डालते थे । वे उस समराङ्गणमें शत्रुओंका छेदन करते हुए अकेले ही विचरने और शोभा पाने लगे । उनका दूसरा साथी केवल खड्ग था । जैसे कुहासे और बादलोंसे आच्छादित होनेपर भी सूर्यदेव अपने तेजसे उद्भासित होते हैं, उसी प्रकार शत्रुओंसे आवृत होनेपर भी वीरवर भानु अपने विशिष्ट तेजका परिचय दे रहे थे ॥ १-७ ॥ मिथिलेश्वर! भानुके खड्गसे जिनके कुम्भस्थल कट गये थे, उन हाथियोंके मस्तकोंमेंसे मोती रणभूमिमें उसी प्रकार गिरते थे, जैसे पुण्यकर्मोंके क्षीण हो जानेपर स्वर्गवासी जनोंके तारे ( ज्योतिर्मय रूप ) लोकसे भूमिपर गिर पड़ते हैं । उस समराङ्गणमें दृष्टिमात्रसे ( पलक मारते ) शत्रुसेनाको धराशायिनी करके महाबली वीर भानु रङ्ग और पिङ्गके ऊपर जा चढ़े । भगवान् श्रीकृष्णके दिये हुए खड्गसे रङ्ग और पिङ्गके रथोंको नष्ट करके भानुने सारथियोंके सहित उनके घोड़ोंके दो - दो टुकड़े कर डाले । तब महा उद्भट वीर रङ्ग और पिङ्गने भी खड्ग लेकर भानुपर प्रहार किया । परंतु भानुकी ढालतक पहुँचते ही वे दोनों खड्ग टूक - टूक हो गये । भानुकी तलवारकी चोटसे रङ्ग और पिङ्गके मस्तक एक साथ ही युद्धभूमिमें जा गिरे । यह अद्भुत - सी बात हुई । विजयी वीर भानु सेनापतियोंसे प्रशंसित हो रङ्ग और पिङ्गके मस्तक लेकर प्रद्युम्न के सामने आये । उस समय मानवीय दुन्दुभियोंके साथ देव - दुन्दुभियाँ भी बज ठठीं । सब ओर जय - जयकार होने लगा । देवताओंने फूल बरसाये । रङ्ग और पिङ्गके मारे जानेका समाचार सुनकर शिशुपालके रोषकी सीमा न रही । वह विजयशील रथपर आरूढ़ हो यादवोंके सामने गया । उसके साथ मदकी धारा बहानेवाले, सोनेके हौदेसे युक्त और रत्नजटित कम्बल ( कालीन या झूल ) से अलंकृत बहुत - से विशालकाय गजराज चले, जिनके हिलते हुए घंटोंकी घनघनाहट दूर - दूरतक फैल रही थी । देवताओंके विमानोंकी भाँति शोभा पानेवाले रथों, वायुके तुल्य वेगशाली तुरंगमों तथा विद्याधरोंके सदृश पराक्रमी वीरोंके द्वारा वह पृथ्वीतलको निनादित करता हुआ चल रहा था ॥ ८- १३ ॥ नरेश्वर! शिशुपालकी सेनाको आती देख धनुर्धारियोंमें श्रेष्ठ श्रीकृष्णकुमार प्रद्युम्न इन्द्रके दिये हुए रथपर आरूढ़ हो सबके आगे होकर उसका सामना करनेके लिये चले । उन्होंने सम्पूर्ण दिशाओं और आकाशको गुँजाते हुए अपना शङ्ख बजाया । दूसरोंको मान देनेवाले नरेश! उस शङ्खनादसे शत्रुओंके हृदयमें कँपकँपी होने लगी । शिशुपालकी विशाल सेना राज-प्रासाद या राजकीय दुर्गकी भाँति दुर्गम थी । उसमें प्रवेश करनेके लिये रुक्मिणीनन्दन प्रद्युम्नने सहसा बाणोंका सोपान बनाया । दमघोषनन्दन बुद्धिमान् शिशुपालने बारंबार धनुषकी टंकार करते हुए ब्रह्मास्त्रका संधान किया, जिसको उसने दत्तात्रेयजीसे सीखा था । उसके प्रचण्ड तेजको सब ओर फैलता देख युद्ध - भूमिमें रुक्मिणीनन्दन प्रद्युम्रने भी ब्रह्मास्त्रका ही प्रयोग करके लीलापूर्वक शत्रुके उस अस्त्रका संहार कर दिया । नरेश्वर! तब महाबुद्धिमान् शिशुपालने अङ्गारास्त्रका प्रयोग किया, जिसे जमदग्रिनन्दन परशुरामने महेन्द्र पर्वतपर उसको दिया था । उस अस्त्रके द्वारा अङ्गारोंकी वर्षा होनेसे प्रद्युम्नकी सेना अत्यन्त व्याकुल हो उठी । तब श्रीकृष्णकुमारने महादिव्य पर्जन्यास्त्रका प्रयोग किया । उससे मेघद्वारा जलकी मोटी धाराएँ गिरायी जाने लगीं, अतः सारे अङ्गार बुझ गये । तब शिशुपालने कुपित होकर गजास्त्रका संधान किया, जिसकी शिक्षा उसे अगस्त्य मुनिने मलयाचलपर दी थी । उस अस्त्रसे अत्यन्त उद्भट करोड़ों विशालकाय गजराज प्रकट होने
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अध्याय १० ] यादव - सेनाका कोङ्कण, कुटक, त्रिगर्त, केरल आदि देशोंपर विजय २ ९९ लगे । उन्होंने महात्मा प्रद्युम्नकी सेनाको रणभूमिमें गिराना आरम्भ किया । इससे यादवोंकी सेनाओंमें महान् हाहाकार मच गया । यह देख युद्धमें होड़ लगाकर आगे बढ़नेवाले प्रद्युम्नने नृसिंहास्त्रका संधान किया । उससे नृसिंहका प्राकय हुआ, जो अपनी गर्जनासे भूतलको प्रतिध्वनित कर रहे थे । उनके अयाल चमक रहे थे । उनकी गर्दन और पूँछके बाल बड़े - बड़े थे । पंजोंके नख हलकी फालके समान बड़े - बड़े होनेके कारण उनके स्वरूपकी भयंकरताको बढ़ा रहे थे । नृसिंह उस समराङ्गणमें उन हाथियोंका भक्षण करते हुए हुंकारके साथ सिंहनाद करने लगे । उन हाथियोंके कुम्भस्थलोंको विदीर्ण करके उछलते हुए भगवान् नृसिंह समस्त गजसमूहोंका मर्दन करके वहीं अन्तर्धान हो गये । तब महाबली शिशुपालने रोषपूर्वक परिघ चलाया । परंतु माधव प्रद्युम्नने यमदण्डसे मारकर उसके दो टुकड़े कर दिये । फिर तो चेदिराज शिशुपालके रोषकी सीमा न रही । उसने ढाल और तलवार लेकर प्रद्युम्नपर इस प्रकार धावा किया, जैसे पतंग प्रज्वलित अग्निकी ओर टूटता है । श्रीकृष्ण कुमारने वेगपूर्वक उसके खड्गपर यमदण्डसे प्रहार किया, जिससे ढालसहित उसकी वह तलवार चूर - चूर हो गयी । फिर यादवेश्वर प्रद्युम्नने सहसा वरुणके दिये हुए पाशसे दमघोषपुत्र शिशुपालको बाँधकर समराङ्गणमें घसीटना आरम्भ किया । अब उन्होंने बढ़कर उनके दोनों हाथ पकड़ लिये ॥ १४- ३१ ॥ गद बोले- रुक्मिणीनन्दन! परिपूर्णतम महात्मा श्रीकृष्णके हाथसे इसका वध होनेवाला है; इसलिये तुम इसे मारकर देवताओंकी बात झूठी न करो ॥ ३२ ॥
नारदजी कहते हैं— राजन्! शिशुपालके बाँध लिये जानेपर बड़ा भारी कोलाहल मचा । उस समय चेदिराज दमघोष भेंट लेकर प्रद्युम्नके सामने आये । उन्हें आया देख शीघ्र ही अपने अस्त्र - शस्त्र फेंककर प्रद्युम्न आगे बढ़े । उन्होंने चेदिराजके चरणोंमें मस्तक रखकर उन्हें प्रणाम किया । महाराज दमघोष महात्मा प्रद्युम्नसे मिलकर उन्हें आशीर्वाद देते हुए गद्गद वाणीमें बोले ॥ ३३–३५ ॥ दमघोषने कहा - यादव - शिरोमणे प्रद्युम्न! तुम धन्य हो । दयानिधे! मेरे पुत्रने जो अपराध किया है, उसे क्षमा कर दो ॥३६ ॥
श्रीप्रद्युम्न बोले- प्रभो! इसमें न मेरा दोष है, न आपका और न आपके पुत्रका ही दोष है । जो कुछ भी प्रिय अथवा अप्रिय होता है, वह सब मैं कालका किया हुआ ही मानता हूँ ॥ ३७ ॥
नारदजी कहते हैं - राजन्! प्रद्युम्रके यों कहनेपर राजा दमघोष उनके द्वारा बाँधे गये शिशुपाल-को छुड़ाकर उसे साथ ले चन्द्रिकापुरीमें गये । साक्षात् श्रीकृष्णके समान तेजस्वी प्रद्युम्रके बल - पराक्रमका समाचार सुनकर प्रायः कोई राजा उनके साथ युद्ध शिशुपालका काम तमाम करनेके लिये रोषपूर्वक करनेको उद्यत नहीं हुए । सबने चुपचाप उनकी सेवामें तलवार हाथमें ली । इतनेमें ही गदने वेगसे आगे भेंट अर्पित कर दी ॥ ३८-३९ ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें विश्वजित्खण्डके अन्तर्गत नारद - बहुलाश्व - संवादमें ' रङ्ग - पिङ्गका वध, शिशुपालका युद्ध और चेदिदेशपर विजय ' नामक नवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९ ॥
दसवाँ अध्याय यादव - सेनाका कोङ्कण, कुटक, त्रिगर्त, केरल, तैलंग, महाराष्ट्र और कर्नाटक आदि देशोंपर विजय प्राप्तकर करूष देशमें जाना तथा वहाँ दन्तवक्रका घोर युद्ध नारदजी कहते हैं - मिथिलेश्वर! तदनन्तर देशका राजा मेधावी गदायुद्धमें अत्यन्त कुशल था । मनुतीर्थमें स्नान करके प्रद्युम्र बारंबार दुन्दुभि बजवाते वह मल्लयुद्धके द्वारा विपक्षीके बलकी परीक्षा करनेके हुए यादव सेनाके साथ कोङ्कण देशमें गये । कोङ्कण लिये अकेला ही आया । उसने सेनासहित प्रद्युम्नसे
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३०० गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ विश्वजित्खण्ड
कहा — ' यादवेश्वर! मुझे गदायुद्ध प्रदान करो ।
प्रभो! मेरे बलका नाश करो ' ॥ १-३ ॥
प्रद्युम्न बोले – हे मल्ल! इस भूतलपर एक - से - एक बढ़कर बलवान् वीर हैं; अतः तुम अपने बलपर घमंड न करो । भगवान् विष्णुकी माया बड़ी दुर्गम है । हमलोग बहुत से वीर यहाँ एकत्र हैं और तुम अकेले ही हमसे युद्ध करनेके लिये आये हो । महामल्ल! यह अधर्म दिखायी देता है, अतः इस समय लौट जाओ ॥ ४-५ ॥ मल्ल बोला – जब आपलोग बलशाली वीर होकर भी युद्ध नहीं कर रहे हैं, तो मेरे पैरोंके नीचेसे होकर निकल जाइये; तभी अब यहाँसे लौटूंगा ॥ ६ ॥
श्रीनारदजी कहते हैं— मैथिल! उस मल्लके यों कहनेपर समस्त यादव- पुंगव वीर क्रोधसे भर गये । तब उसके देखते - देखते बलदेवजीके छोटे भाई बलवान् वीर गद गदा लेकर सामने खड़े हो गये । फिर वह भी सबके सम्मुख गदा उठाकर खड़ा हो गया । उस महाबली मल्लने गदके ऊपर एक बड़ी भारी गदा फेंकी । गदने उसकी गदाको हाथमें थाम लिया और अपनी गदा उसके ऊपर दे मारी । गदकी गदासे आहत होकर वह पृथ्वीपर गिर पड़ा और मुखसे रक्त वमन करने लगा । अब उसने युद्धकी इच्छा त्याग दी । तदनन्तर कोङ्कणवासी मेधावीने श्रीहरिके पुत्र प्रद्युम्नको प्रणाम करके कहा- ' मैंने आपलोगोंकी परीक्षाके लिये यह कार्य किया था । आप तो साक्षात् भगवान् ही हैं । कहाँ आप और कहाँ मुझ - जैसा प्राकृतमनुष्य! मेरा अपराध क्षमा कीजिये । मैं आपकी शरणमें आया हूँ ' ॥ ७ – १२ ॥ श्रीनारदजी कहते हैं- राजन्! यों कहकर, भेंट देकर और श्रीहरिके पुत्रको नमस्कार करके कोङ्कण देशका राजा क्षत्रिय - शिरोमणि मेधावी अपनी पुरीको चला गया । कुटक देशका स्वामी मौलि शिकार खेलनेके लिये नगरसे बाहर निकला था । उसे जाम्बवतीकुमार महाबाहु साम्बने जा पकड़ा । उससे भेंट लेकर प्रद्युम्न दण्डकारण्यको गये । वहाँ मुनियोंके आश्रम देखते हुए सेनासहित श्रीकृष्णकुमार क्रमशः निर्विन्ध्या, पयोष्णी तथा तापी नदीमें स्नान करके महाक्षेत्र शूर्पारकमें गये । वहाँसे आर्या द्वैपायनी देवीका दर्शन करके ऋष्यमूककी शोभा देखते हुए प्रवर्षण गिरिपर गये, जहाँ साक्षात् भगवान् पर्जन्य ( इन्द्र ) नित्य वर्षा करते हैं । वहाँसे गोकर्ण नामक शिवक्षेत्रका दर्शन करते हुए महाबली श्रीकृष्णकुमार अपने सैनिकोंके साथ त्रिगर्त और केरल देशोंपर विजय पानेके लिये गये । केरलके राजा अम्बष्ठने मेरे मुखसे महात्मा प्रद्युम्रके शुभागमनकी बात सुनकर शीघ्र ही उन्हें भेंट अर्पित कर दी । तब वे कृष्णावेणी नदीको पार करके अपने सैनिकोंकी पद- धूलिराशिसे आकाशमें अन्धकार - सा फैलाते हुए तैलंग देशमें गये । तैलंग देशके राजाका नाम विशालाक्ष था । वे अपने नगरके उपवनमें सुन्दरियोंके साथ विहार करते थे । मधुर ध्वनियोंसे व्याप्त मृदङ्ग आदि बाजे बज रहे थे तथा अप्सराएँ उत्कृष्ट रागोंद्वारा देवेन्द्रके समान उस राजाके सुयशका गान कर रही थीं । उस समय सुन्दरी रमणी रानी मन्दारमालिनीने धूलसे व्याप्त आकाशकी ओर देखकर राजासे कहा । रानीके बिम्बोपम अरुण ओष्ठ सूख गये थे॥१३–२३ ॥ मन्दारमालिनी बोली- राजन्! आप सदा विहारमें ही रत रहनेके कारण दूसरी किसी बातको नहीं जानते हैं, दिन - रात अत्यन्त कामावेशके कारण चञ्चल बने रहते हैं । और मैं भी आपके मुखपर छिटकी हुई अलकोंकी सुगन्धपर लुभायी भ्रमरी होकर कभी यह न जान सकी कि दुःख क्या होता है । परंतु आज द्वारका राजा उग्रसेनके राजसूय यज्ञका बीड़ा उठाकर दिग्विजयके लिये निकले हुए वे यदुराजराज प्रद्युम्र चेदिराज आदि समस्त नरेशोंको जीतकर यहाँ आ पहुँचे हैं । दुन्दुभियोंकी धुंकार - ध्वनि सुनिये । उसके साथ हाथियोंके चीत्कार और फूत्कारकी ध्वनि भी मिली हुई है । शत्रुओंके कोदण्डकी टंकार प्रलयकालके गर्जन - तर्जनका कोलाहल प्रस्तुत कर रही है । शम्बर- शत्रु प्रद्युम्नके पास तुरंत भेंट भेज दीजिये । इन भागती हुई भूपसुन्दरियोंकी ओर देखिये, इनके बँधे हुए केशपाशोंसे फूल झड़ गये हैं । ये श्रमजल ( पसीने ) की वर्षा कर रही हैं और वनमें प्रवेश करनेके कारण इनके केशोंके शृङ्गार बिगड़ गये हैं—
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अध्याय १० ] यादव - सेनाका कोङ्कण, कुटक, स्पष्ट प्रतीत नहीं हो रहे हैं ॥ २४ - २७ ॥ पत्नीकी बात सुनकर राजा विशालाक्ष अत्यन्त प्रसन्न हो, भेंट - सामग्री लेकर प्रद्युम्नके सामने आये । उनके द्वारा पूजित और सम्मानित हो धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ साक्षात् प्रद्युम्न पम्पा सरोवर तीर्थमें स्नान करके वहाँसे महाराष्ट्रकी ओर चल दिये । महाराष्ट्रके राजा विमल विष्णुभक्त थे । उन्होंने बड़े भक्तिभावसे श्रीकृष्णकुमार प्रद्युम्नका सब प्रकारसे पूजन किया । इसी प्रकार कर्नाटकके राजा सहस्त्रजित् स्वयं ही बहुत - सी भेंट-सामग्री लेकर आये और महात्मा प्रद्युम्नको अर्पित करके उन्होंने कल्याणके लिये उन परम प्रभु जगदीश्वर शम्बरारिका पूजन किया ॥ २८-३१ ॥ मिथिलेश्वर! जैसे योगी देहसे होनेवाले विषय-भोगोंपर विजय पानेकी चेष्टा करता है, उसी प्रकार साक्षात् भगवान् प्रद्युम्न यादवोंके साथ करूष देशको जीतनेके लिये गये । नरेश्वर! वहाँ महारङ्गपुरमें परम बुद्धिमान् राजा वृद्धशर्मा रहते थे, जो वसुदेवकी बहिन श्रुतदेवाके पति थे । उनका पुत्र दन्तवक्र श्रीकृष्णका शत्रु कहा गया है । उसने भी शिशुपालकी भाँति कुपित हो यादवोंके साथ स्वयं युद्ध करनेका विचार किया । यद्यपि माता - पिताने उसे मना किया, तथापि दैत्योंके प्रति अनुराग रखनेवाले उस दैत्यने ‘ मैं यादवोंको मार डालूँगा ' – इस प्रकार अपना क्रोध प्रकट किया । वह लाख भारकी बनी हुई भारी गदा लेकर प्रद्युम्नकी सेनाके सामने अकेला ही युद्ध करनेके लिये गया । दन्तवक्रके शरीरका रंग काला था । वह कोयलेके पहाड़ - सा जान पड़ता था । उसकी जीभ लपलपाती रहती थी और रूप बड़ा भयंकर था । वह दस ताड़के बराबर ऊँचा था । मस्तकपर किरीट, कानोंमें कुण्डल तथा वक्षपर सोनेके कवचसे विभूषित वह करूष - राजकुमार करधनीकी लड़ें पहिने हुए था । उसके चञ्चल चरणोंमें नूपुर बज रहे थे । वह अपने वेगसे पृथ्वीको कँपाता, पर्वतों तथा वृक्षोंको गिराता और अपनी गदाके प्रहारसे शत्रुओंको त्रिगर्त, केरल आदि देशोंपर विजय ३०१ कालके गाल में भेजता हुआ यमराजके समान दुर्जय प्रतीत होता था । समराङ्गणमें दन्तवक्रको उपस्थित देख समस्त यादव भयसे थर्रा उठे । उसके आते ही महान् कोलाहल मच गया । प्रद्युम्नने उसके ऊपर बारंबार धनुषकी टंकार करती हुई अठारह अक्षौहिणी विशाल सेना भेजी ॥ ३२–४१ ॥ राजन्! जैसे हाथी किसी पर्वतपर चारों ओरसे टक्कर मारते हों, उसी प्रकार समस्त यादवोंने बाणों, फरसों, शतघ्रियों तथा भुशुण्डियोंसे दन्तवक्रपर प्रहार करना आरम्भ किया । राजेन्द्र! दन्तवक्रने अपनी गदासे रणभूमिमें बहुत - से उत्कट गजराजोंके कुम्भ-स्थल विदीर्ण करके उन्हें मार गिराया । किन्हीं हाथियोंको, जो किङ्किणी- जालसे निनादित, साँकलोंसे सुशोभित, हौदोंसे अलंकृत और चञ्चल घंटोंके रणत्कारसे युक्त थे, उसने पाँव पकड़कर उठा लिया और जैसे हवा रूईको दूर उड़ा ले जाती है, उसी प्रकार आकाशमें सौ योजन दूर फेंक दिया । वह दैत्यराज किन्हीं - किन्हीं हाथियोंकी सूँड पकड़कर आकाशमें घुमाता और उन चिग्घाड़ते हुए गजराजोंको विभिन्न दिशाओंमें फेंक देता था । किन्हीं हाथियोंकी पीठकी हड्डियोंपर, किन्हींकी काँखोंमें - उभय पार्श्वोमें पैरोंसे आक्रमण करके वह दैत्य कालाग्निरुद्रकी भाँति शोभा पाता था । वह वीर सारथि, घोड़े, ध्वजा और महारथियोंसहित रथोंको आकाशमें उसी तरह उछाल देता था, जैसे आँधी कमलोंको उड़ा ले जाती है । उसने घोड़ों और पैदल सैनिकोंको भी बलपूर्वक उठा - उठाकर आकाशमें फेंक दिया । बहुत - से महाबली राजकुमार ऊपर या नीचे मुँह किये शस्त्रों तथा रत्नमय केयुरोंसहित आकाशसे गिरते हुए तारोंके समान प्रतीत होते थे और मुँहसे रक्त वमन कर रहे थे । मैथिल! उस दैत्यपुंगवने अपनी गदासे यादव - सेनाको उसी प्रकार मथ डाला, जैसे भगवान् श्रीवराहने प्रलयकालके समुद्रको अपनी दंष्ट्रासे विक्षुब्ध कर दिया था ॥ ४२ - ५० ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें विश्वजित्खण्डके अन्तर्गत नारद - बहुलाश्व - संवादमें ' कोङ्कण, कुटक, त्रिगर्त, केरल, तैलंग, महाराष्ट्र और कर्नाटकपर विजय पाकर यादव- सेनाका करूष देशमें गमन ' नामक दसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १० ॥
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ग्यारहवाँ दन्तवक्रकी पराजय तथा करूष श्रीनारदजी कहते हैं— तब श्रीकृष्णके अठारह महारथी पुत्रोंने मिलकर महाबली दन्तवक्रको क्षत-विक्षत कर दिया । घायल हुआ दन्तवक्र रक्तधारासे रञ्जित हो उसी प्रकार अत्यन्त शोभा पाने लगा, जैसे महावरके रंगसे रँगा हुआ कोई ऊँचा महल सुशोभित हो रहा हो । उसने शत्रुओंके प्रहारको कुछ भी नहीं गिना । कृतवर्माने समराङ्गणमें उसे बाण - समूहोंद्वारा घायल किया, सात्यकिने तलवारसे चोट पहुँचायी और अक्रूरने उस महाबली वीरपर शक्तिसे प्रहार किया । रोहिणीनन्दन सारणने उसके ऊपर कुठारसे आघात किया । रणदुर्मद दन्तवक्रने भी सात्यकिको गदासे चोट पहुँचायी, कृतवर्माको हाथसे और अक्रूरको लातसे मारा तथा सारणको भुजाओंके वेगसे आहत कर दिया । अक्रूर, वृतवर्मा, सात्यकि और सारण - ये चारों वीर आँधीके उखाड़े हुए वृक्षोंकी भाँति मूच्छित होकर पृथ्वीपर गिर पड़े । तदनन्तर जाम्बवतीकुमार साम्बने उसकी गदा लेकर, गदाके ऊपर अपनी गदा रखकर उससे दन्तवक्रको मारा । दन्तवक्रने गदा फेंक दी और जाम्बवतीकुमार साम्बको पकड़कर दोनों भुजाओंसे रणमण्डलमें गिरा दिया । तब साम्बने भी उठकर उसके दोनों पैर पकड़कर उसे भूपृष्ठपर दे मारा । वह एक अद्भुत - सी बात हुई । दन्तवक्र उठकर उस समय अट्टहास करने लगा । उसकी आवाजसे सात लोकों और पातालोंसहित समूचा ब्रह्माण्ड गूँज उठा । सहस्रों सूर्योंके समान तेजस्वी और सहस्र घोड़ोंसे जुते हुए पताका- मण्डित दिव्य रथपर आरूढ़ होकर आये हुए धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ प्रद्युम्नकी ओर देखकर दन्तवक्रने यह कठोर बात कही ॥ १-११ ॥ दन्तवक्र बोला – तुम समस्त यादव, वृष्णिवंशी और अन्धकवंशी लोग स्वल्पशक्तिवाले, तुच्छ, रणभूमिसे भागे हुए और युद्धभीरु हो । राजा ययातिके शापसे तुम्हारा तेज भ्रष्ट हो गया है । तुम राज्यभ्रष्ट और अध्याय देशपर यादव - सेनाकी विजय निर्लज्ज हो । मैं अकेला हूँ और तुम बहुसंख्यक हो; तथापि अधर्म - मार्गपर चलनेवाले तथा धर्मशास्त्रकी मर्यादाको विलुप्त करनेवाले तुम नराधमोंने मेरे साथ युद्ध किया है । तुम्हारा पिता श्रीकृष्ण पहले नन्दके पशुओंका चरवाहा था । वह ग्वालोंकी जूठन खाता था, किंतु आज वही यादवोंका ईश्वर बना बैठा है । उसने गोपियोंके घरमें माखन, दही, घी, दूध और तक्र आदि गोरसकी चोरी की थी । वह रासमण्डलमें रसिया बनकर नाचता था, किंतु अब जरासंधके भयसे उसने भी समुद्रकी शरण ले ली है । जो कालयवनके सामने डरपोककी तरह भागा था, वही आज ' यदुनाथ ' बना है । उसके दिये हुए थोड़े - से राज्यको पाकर उग्रसेन उस अल्पसारके लिये यज्ञोंमें श्रेष्ठ राजसूय यज्ञ करेगा! कालकी गति दुर्लङ्घय है । अहो! सारा संसार विचित्र हो गया । अत्यन्त दुर्बल सियार, सिंह और व्याघ्रपर शासन करने चला है! ॥१२–१८ ॥ श्रीप्रद्युम्न ने कहा - ओ निन्दक! पहिले कुण्डिन-पुरमें तूने यादवोंके बढ़े - चढ़े बलको शायद नहीं देखा था, किंतु आज यहाँ देख लेना । करूषराज! तुम लोग मेरे सम्बन्धी हो, यह जानकर मैं तुमसे युद्ध नहीं करना चाहता था । किंतु तूने बलपूर्वक युद्ध छेड़ दिया । यह तेरे द्वारा धर्मशास्त्रानुमोदित कार्य ही तो किया गया है । नन्दराज साक्षात् द्रोण नामक वसु हैं, जो गोपकुलमें अवतीर्ण हुए हैं । गोलोकमें जो गोपाल-गण हैं, वे साक्षात् श्रीकृष्णके रोमसे प्रकट हुए हैं और गोपियाँ श्रीराधाके रोमसे उद्भूत हुई हैं । वे सब-की - सब यहाँ व्रजमें उतर आयी हैं । कुछ ऐसी भी गोपाङ्गनाएँ हैं, जो पूर्वकृत पुण्यकर्मों तथा उत्तम वरोंके प्रभावसे श्रीकृष्णको प्राप्त हुई हैं । भगवान् श्रीकृष्ण साक्षात् परिपूर्णतम परमात्मा हैं, असंख्य ब्रह्माण्डोंके अधिपति, गोलोकके स्वामी तथा परात्पर ब्रह्म हैं । जिनके अपने तेजमें सम्पूर्ण तेज विलीन होते हैं, उन्हें ब्रह्मा आदि उत्कृष्ट देवता साक्षात् ' परिपूर्णतम ' कहते
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अध्याय १२ ] उशीनर आदि देशोंपर प्रद्युम्नकी विजय ३०३ हैं, पूर्वकालमें जो चक्रवर्ती राजा मरुत्त थे, वे ही श्रीकृष्णके वरदानसे यादवराज उग्रसेन हुए हैं । तू निरङ्कुश और महामूर्ख है, जो महान् गुणशाली महापुरुषकी निन्दा करता है । जैसे सिंह गीदड़की आवाजपर ध्यान नहीं देता, उसी प्रकार महाराज उग्रसेन अथवा भगवान् श्रीकृष्ण तेरी बकवासपर कोई विचार नहीं करेंगे ॥ १ ९ –२६ ॥ नारदजी कहते हैं - राजन्! प्रद्युम्नकी ऐसी बात सुनकर मदमत्त दन्तवक्र एक भारी गदा लेकर उनके रथपर टूट पड़ा । उसने अपनी गदासे चोट करके उस रथके सहस्र घोड़ोंको गिरा दिया और गर्जना करने लगा । उसका भयंकर रूप देखकर सब घोड़े भाग चले । तब प्रद्युम्नने भी गदा लेकर उसकी छातीमें बड़े जोरसे प्रहार किया । उस प्रहारसे दैत्यराज दन्तवक्र मन-ही - मन कुछ व्याकुल हो उठा । अब उन दोनोंमें गदासे घोर युद्ध होने लगा । गदाओंसे परस्पर प्रहार करते हुए वे दोनों वीर एक - दूसरेको रणभूमिमें रौंदने और गर्जने लगे । राजन्! उन्हें देखकर ऐसा जान पड़ता था, मानो पर्वतपर दो सिंह आपसमें जूझ रहे हों ॥ २७ – ३० ॥ दन्तवक्रने दोनों हाथोंसे श्रीकृष्णकुमारको पकड़कर भूमिपर उसी प्रकार गिरा दिया, जैसे एक सिंहने दूसरे सिंहको बलपूर्वक पटक दिया हो । प्रद्युम्नने भी उठकर बलपूर्वक उसके दोनों हाथ पकड़ लिये और भुजाओं द्वारा घुमाकर उसे पृथ्वीपर दे मारा । प्रद्युम्नके प्रहारसे वह रक्त वमन करता हुआ पृथ्वीपर गिर पड़ा । उसकी हड्डियाँ चूर - चूर हो गयीं; शरीर शिथिल हो गया । उसे मूर्च्छा आ गयी । वह आकृतिसे घबराया हुआ प्रतीत होने लगा । दन्तवक्र इन्द्रके वज्रसे आहत हुए पर्वतकी भाँति भूपृष्ठपर सुशोभित हो रहा था । उसके शरीरके धक्केसे समुद्रसहित पृथ्वी हिलने लगी, दिग्गज विचलित हो उठे, तारे खिसक गये और समुद्र काँपने लगे । राजेन्द्र! उसके गिरनेके धमाकेसे तीनों लोकोंके कान बहरे हो गये । उसी समय करूषराज महात्मा वृद्धशर्मा रानी श्रुतदेवाके साथ महारङ्गपुरसे वहाँ आ पहुँचे । वे यादवोंके साथ सुन्दर ढंगसे संधि करना चाहते थे । मिथिलेश्वर! वे शम्बरशत्रु प्रद्युम्नको भेंट देकर, पुत्रको साथ ले, संधि करके यदुपुंगवोंसे पूजित हो, पुनः महारङ्गपुरको चले गये ॥ ३१–३७ ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें विश्वजित्खण्डके अन्तर्गत नारद - बहुलाश्व - संवादमें ' दन्तवक्रके साथ युद्धमें करूष देशपर विजय ' नामक ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११ ॥
बारहवाँ अध्याय उशीनर आदि देशोंपर प्रद्युम्नकी विजय तथा उनकी जिज्ञासापर मुनिवर अगस्त्यद्वारा तत्त्वज्ञानका प्रतिपादन श्रीनारदजी कहते हैं- राजन्! दक्षिण सागरमें स्नान करके यादवराज प्रद्युम्न वहाँसे सेनासहित उशीनर देशको जीतनेके लिये आये, जहाँ ग्वालोंकी मण्डलीके साथ कोटि - कोटि भव्य मूर्तिवाली गौएँ विचरती और चरती हैं । उशीनर देशके लोग दूध पीते और गोरे रंगके मनोहर रूपवाले होते हैं । वे मक्खनकी भेंट लेकर प्रद्युम्नके सामने गये । उनसे पूजित होकर प्रद्युम्नने प्रसन्नतापूर्वक उन्हें हाथी, घोड़े, रथ, रत्न, वस्त्र और भूषण आदि बहुत धन दिया । उशीनरकी राजधानी चम्पावती नामक पुरी मणि और रत्नोंसे सम्पन्न थी । वह राजाओंसे उसी प्रकार शोभा पाती थी, जैसे सर्पोंसे भोगवतीपुरी । चम्पावतीके स्वामी वीर राजा हेमाङ्गद शीघ्र ही भेंट लेकर आये । उन्होंने श्रीकृष्णकुमार प्रद्युम्नको प्रणाम किया । उनसे संतुष्ट होकर प्रद्युम्नने उन्हें केसरयुक्त कमलोंकी माला दी और सहस्रदलोंकी शोभासे सम्पन्न एक दिव्य कमल भी अर्पित किया ॥१–७ ॥ तदनन्तर महाबाहु प्रद्युम्न धनुष धारण किये तथा बार - बार दुन्दुभि बजवाते हुए अपनी सेनाके साथ विदर्भ देशको गये । कुण्डिनपुरके राजा भीष्मकने वहाँ
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३०४ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ विश्वजित्खण्ड पधारे हुए रुक्मिणीपुत्रको अपने घर ले आकर बहुत धन दे, सेनासहित उनका पूजन किया । तत्पश्चात् नानाको प्रणाम करके बलवान् यादवेश्वर रुक्मिणीनन्दन कुन्त और दरद देशोंको गये । मार्गमें मलयाचलके चन्दनको स्पर्श करता हुआ समीर उनकी सेवा कर रहा था । श्रीखण्ड और केतकी पुष्पोंकी गन्धसे भरे हुए मलयाचलपर उन्होंने मुनिश्रेष्ठ अगस्त्यका दर्शन किया, जो किसी समय महासागरको पी गये थे । श्रीकृष्ण-कुमार दोनों हाथ जोड़कर उन महामुनिको नमस्कार करके उनकी पर्णशालामें खड़े हो गये । मुनिने शुभा -शीर्वाद देकर उनका अभिनन्दन किया ॥ ८–१२ ॥ तब श्रीप्रद्युम्नने पूछा – मुनिश्रेष्ठ! यह जगत् तो दृश्य - पदार्थ होनेके कारण मिथ्या है, * फिर सत्यकी भाँति कैसे स्थित है? तथा जीव ब्रह्मका अंश होनेके कारण नित्यमुक्त है, ऐसा होनेपर भी यह गुणोंसे कैसे बँध जाता है? यह मेरा प्रश्न है, आप इसका भलीभाँति निरूपण कीजिये; क्योंकि आप सर्वज्ञ, दिव्यदृष्टिसे सम्पन्न तथा समस्त ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ हैं ॥ १३ - १४ ॥ अगस्त्यजीने कहा- रुक्मिणीनन्दन! तुम साक्षात् परिपूर्णतम भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रके पुत्र हो, तथापि मुझसे प्रश्न करते हो! तुम्हारा यह प्रश्न पूछना लीलामात्र है ( क्योंकि तुम सर्वज्ञ हो ) । प्रभो! जैसे भगवान् श्रीहरि लोक - संग्रहके लिये ही कर्म करते हैं, उसी प्रकार तुम भी मनुष्योंका कल्याण करनेके लिये विचर रहे हो । जैसे सत्य सूर्यका जलमें जो प्रतिबिम्ब दिखायी देता है, वह मिथ्या होनेपर भी सत्य - सा प्रतीत होता है, उसी प्रकार प्रकृति और परमात्माका प्रतिबिम्बस्वरूप यह दृश्य - जगत् असत् होनेपर भी सत्य - सा दृष्टिगोचर होता है । जैसे शीशेमें मुख, रस्सीमें सर्प तथा बालुका - राशिमें जलकी सत्यवत् प्रतीति होती है, उसी प्रकार यह सत् परमात्मा देहगत सत्त्वादि गुणोंसे बद्ध जान पड़ता है - अन्तःकरणरूपी दर्पणमें सत्का प्रतिबिम्ब ही जीवरूपमें प्रतीतिगोचर होता है । ( शीशेमें मुख आबद्ध न होनेपर भी बद्ध - सा प्रतीत होता है, उसी प्रकार नित्यमुक्त परमात्मा सत्त्वादि गुणमय अन्तःकरणमें प्रतिबिम्बित होकर बद्ध - सा जान पड़ता है ) ॥ १५–१८ ॥ प्रद्युम्नने पूछा- ब्रह्मज्ञ - शिरोमणे! जिस उपायसे दृढ़ वैराग्य प्राप्त करके देहधारी जीव कथमपि बन्धनमें न पड़े, वह मुझे बताइये ॥१ ९ ॥ अगस्त्यजीने कहा- जो विवेकका आश्रय लेकर जगत्को मनोमय ( मनके संकल्पमात्रसे प्रकट ) मानकर सनातन ब्रह्मका भजन करता है, वह परमपदको प्राप्त होता है । राजन्! उस परमात्माको जन्म, मृत्यु, शोक, मोह, बाल्य, यौवन, जरा, अहंता, मद, व्याधिका डर, सुख, दुःख, क्षुधा, रति, मानसिक चिन्ता और भय कभी नहीं प्राप्त होते; क्योंकि आत्मा निरीह ( चेष्टारहित ), निराकार, सर्वथा अहंकारशून्य, शुद्धस्वरूप, गुणोंका आश्रय, साक्षात् परमेश्वर, निष्कल तथा आत्मद्रष्टा है । जिसको मुनीश्वरोंने सदा पूर्ण एवं ज्ञानमय जाना है, उस परब्रह्म परमात्माको जानकर यह जीव सुखपूर्वक विचरे ॥ २०–२३ ॥ जो पुरुष ( आत्मा ) इस जगत्के सो जानेपर भी जागता है, सबको देखता है, उस द्रष्टाको यह लोक कभी नहीं देखता, कदापि नहीं जानता । जैसे विभिन्न रंगोंसे स्फटिकमणि कभी लिप्त नहीं होती तथा जैसे आकाश कोठेसे, अग्नि काष्ठसे और वायु उड़ी हुई धूलसे लिप्त नहीं होती, उसी प्रकार ब्रह्म गुणोंसे कभी लिप्त नहीं होता । जो लक्षणाओंसे, व्यञ्जनाद्वारा व्यक्त होनेवाली ध्वनि एवं व्यङ्गयार्थोंसे कभी ज्ञानका विषय नहीं होता, वह लौकिक वाक्योंद्वारा कैसे जाना जा सकता है! उस शब्दार्थातीत परब्रह्मको नमस्कार है । कुछ लोग इस परमात्माको ' कर्म ' कहते हैं, दूसरे लोग उसे ' काल ' की संज्ञा देते हैं । अन्य विद्वान् उसे ' कर्ता ' एवं ' योग ' कहते हैं, दूसरे विचारक उसको ' सांख्य ' एवं ' ब्रह्म ' बताते हैं । कोई ' परमात्मा ' और ' वासुदेव ' कहते हैं । प्रत्यक्ष, अनुमान, निगमागम तथा आत्मानुभवसे उस परब्रह्मके स्वरूपका विचार करके इस जगत् में अनासक्तभावसे विचरे । जैसे जलके चञ्चल होनेसे उसमें प्रतिबिम्बित वृक्ष भी चञ्चल-से प्रतीत होते हैं और नेत्रोंके घूमनेसे धरती भी घूमती -सी दिखायी देती है, उसी प्रकार गुणोंके भ्रमणसे मन भ्रान्त होनेपर उसमें स्थित आत्मा भी भ्रान्त - सा जान * * जगत्के मिथ्यात्वका साधक अनुमान प्रमाण इस प्रकार है - जगत् असत्, दृश्यमानत्वात् स्वप्नदृष्टपदार्थवत् ।