गर्ग संहिता — पृष्ठ 311–320

गर्ग संहिता · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 311–320

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अध्याय १२ ] उशीनर आदि देशोंपर प्रद्युम्नकी विजय ३०५ पड़ता है ॥२४–३० ॥ राजन्! जैसे हाथसे घुमाया जाता हुआ अलात-चक्र मण्डलाकार घूमता जान पड़ता है, उसी प्रकार गुणोंद्वारा भ्रान्त मनके द्वारा अज्ञानविमोहित जीव ऐसा कहने और मानने लगता है कि ' मैं करूँगा, मैं कर्ता हूँ, यह मेरा है, वह तुम्हारा है, यह तुम हो, यह मैं हूँ, मैं सुखी हूँ और मैं दुःखी हूँ ' इत्यादि । सत्त्व, रज और तम – ये तीनों प्रकृतिके गुण हैं, आत्माके नहीं । उन द्वारा यह सारा जगत् उसी तरह व्याप्त है, जैसे सूतसे वस्त्र ओत - प्रोत होता है । सत्त्वगुणमें स्थित जीव ऊपरको जाते हैं, रजोगुणी जीव मध्यवर्ती लोकमें रहते हैं तथा तमोगुणकी वृत्तिमें स्थित तामसजन नीचे ( नरकादिमें ) जाते हैं । श्रीकृष्णकुमार! जैसे अँधेरेमें रखी हुई रस्सीमें सर्पबुद्धि होती है, दूरसे मरीचिका ( सूर्यकिरण ) में जलकी भ्रान्ति होती है, उसी प्रकार अज्ञानमोहित जीव परब्रह्ममें इस जगत्‌की भ्रान्त धारणा बना लेता है । सुखको उसी तरह आने - जानेवाला समझो, जैसे मण्डलवर्ती राजाओंका राज्य । मनुष्योंका दुःख भी उसी प्रकार है, जैसे नरकवासियोंका । घन -माला, देहके गुण तथा दिन और रात जैसे स्थिर नहीं होते, उसी तरह सुख - दुःख भी स्थिर नहीं है । जैसे तीर्थयात्रियों या व्यापारियोंका समुदाय सदा साथ नहीं रहता, उसी तरह यह दृश्य - प्रपञ्च भी शाश्वत नहीं है । कोई भी वस्तु सदा नहीं रहती । जैसे पंख निकल आनेपर पक्षीको घोंसलेसे और नदीके पार चले जानेपर पथिकको नावसे कोई प्रयोजन नहीं रहता, उसी प्रकार ज्ञान प्राप्त हो जानेपर अभिमान उत्पन्न करनेवाले लोकसे क्या प्रयोजन रह जाता है । समदर्शी मुनि इसी प्रकार अपने मार्गका शीघ्र निश्चय करके असङ्गभावसे विचरे । जैसे अनेक जलपात्रोंमें एक ही चन्द्रमा प्रतिबिम्बित होता है और जैसे काष्ठसमूहमें एक अग्नि व्याप्त है, उसी प्रकार एक ही साक्षात् भगवान् परमात्मा सर्वत्र विद्यमान है । जैसे महान् आकाश घट और मठके बाहर तथा भीतर भी अलिप्तभावसे विद्यमान है, उसी प्रकार परमात्मा अपने ही द्वारा उद्भावित देहधारियोंके बाहर भीतर निर्लिप्तरूपसे विराजमान है । जो भगवान् श्रीकृष्णका शान्तचित्त, ज्ञाननिष्ठ एवं वैराग्यवान् भक्त है, उसे गुण उसी प्रकार नहीं छूते, जैसे जल कमलदलको स्पर्श नहीं करता । ज्ञानी पुरुष सदा आनन्दमग्न हो बालककी भाँति विचरता है । वह अपने शरीरकी ओर उसी प्रकार दृष्टि नहीं रखता, जैसे मदिरा पीकर मतवाला हुआ मनुष्य अपने पहिने हुए वस्त्रकी सँभाल नहीं रखता ॥ ३१–४१ ॥ राजन्! जैसे सूर्योदय होनेपर घरकी वस्तु दिखायी देने लगती है, उसी प्रकार अज्ञानको दूर करके ज्ञानवान् पुरुष ब्रह्मतत्त्वका साक्षात्कार कर लेता है । जैसे पृथक् - पृथक् द्वारवाली इन्द्रियोंसे एक ही विषय अनेक गुणोंका आश्रय प्रतीत होता है, उसी प्रकार एक ही ब्रह्म उसके प्रतिपादक शास्त्रमार्गोंसे अनेक - सा जान पड़ता है । नरेश्वर! इस ब्रह्मको कोई परमपद कहते हैं, कोई वैष्णवधाम बताते हैं, कोई व्यापक वैकुण्ठ, कोई शान्त, कोई परम कैवल्य तथा कोई अविनाशी परम-धाम कहते हैं । किन्हींके मतमें वह अक्षरपद है, कोई उसे पराकाष्ठा कहते हैं, कोई प्रकृति से परे गोलोकधाम बताते हैं और कोई पुराणवेत्ता उसको विशद निकुञ्ज कहते हैं । इस लोकमें रहनेवाला मानव उस पदको ज्ञान, वैराग्य और भक्तिसे प्राप्त करता है, दूसरे किसी साधनसे नहीं । परमपुरुष कैवल्यनाथ परात्पर पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रके पदको मनुष्य उपर्युक्त साधनोंद्वारा उन्हींकी कृपासे प्राप्त करता है और उसे प्राप्त करके भक्त पुरुष कभी वहाँसे लौटता नहीं ॥ ४२ – ४७ ॥ श्रीनारदजी कहते हैं— राजन्! यह भागवत ज्ञान सुनकर श्रीकृष्णकुमार प्रद्युम्नने दोनों हाथ जोड़, भक्ति-भावसे नमस्कार करके महामुनि अगस्त्यजीका पूजन किया ॥ ४८ ॥

इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें विश्वजित्खण्डके अन्तर्गत नारद - बहुलाश्व - संवादमें ' उशीनर, विदर्भ, कुन्त, दरद आदि देशोंपर विजयके प्रसङ्गमें अगस्त्य और प्रद्युम्नकी ज्ञानचर्चा ' नामक बारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२ ॥

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तेरहवाँ अध्याय शाल्व आदि देशों तथा द्विविद वानरपर प्रद्युम्नकी विजय; लङ्कासे विभीषणका आना और उन्हें भेंट समर्पित करना श्रीनारदजी कहते हैं- राजन्! कृतमाला और ताम्रपर्णी नदियोंमें स्नान करके श्रीयादवेश्वर प्रद्युम्न अपने यादव सैनिकोंके साथ राजपुरको गये । राजपुर -का स्वामी राजा शाल्व था । वह मेरे मुँहसे यादवोंका आगमन सुनकर शीघ्र ही वानरराज द्विविदके पास गया । वीर द्विविद मित्रकी सहायता करनेके लिये उद्यत हो यादवोंके प्रति मनमें अत्यन्त क्रोध लेकर प्रद्युम्नकी सेनाका सामना करनेके लिये गया । वह अपने पैरोंकी धमकसे पृथ्वीको हिला देता था । द्विविदने अपने नखों और दाँतोंद्वारा पताका और ध्वजपट्टोंको चीर डाला । वे ध्वज कश्मीरी शालोंसे आवृत, मुद्राङ्कित तथा स्वर्णभूषित थे । उसने रथोंको ऊपर उछाल दिया, हाथियोंपर वेगपूर्वक चढ़कर घोड़ोंको भगाया और वह वानरोचित किलकारियोंके साथ भौंहें नचाकर सबको भयभीत करने लगा । इस प्रकार कोलाहल मच जानेपर धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ प्रद्युम्न बारंबार धनुषकी टंकार करते हुए रथपर आरूढ़ हो उसके पास आ गये । मदमत्त द्विविद उस रथके आस-पास उछलने लगा और अपनी पूँछसे घोड़ोंसहित रथ, ध्वज और छत्रको कम्पित करने लगा । प्रद्युम्नने अपने धनुषकी कोटिसे उसका गला पकड़कर खींचा । तब अत्यन्त कुपित हुए उस वानरने उनके ऊपर मुक्केसे प्रहार किया । तदनन्तर प्रद्युम्नने विधिपूर्वक धनुषपर प्रत्यचा चढ़ायी और कानतक खींचकर छोड़े गये एक बाणसे द्विविदको बींध दिया । राजेन्द्र! उस बाणने आकाशमें आधे पहरतक द्विविदको घुमाकर सौ योजन दूर लङ्कामें गिरा दिया । वहाँ दो घड़ीतक राक्षसोंके साथ उसका युद्ध हुआ और उसने राक्षसोंको मार गिराया । राजन्! इधर यदुकुल - तिलक प्रद्युम्नने दुन्दुभिनाद कराते हुए विजय प्राप्त करके शाल्वसे भेंट और दक्षिण - मथुरा ( मदुर ) का दर्शन करके वे त्रिकूट पर्वतपर जा चढ़े । उधर वानरराज द्विविद त्रिकूटसे मैनाकके शिखरपर गया, मैनाकसे सिंहल जाकर वह पुनः भारतवर्षमें आया । धीरे - धीरे वानरेन्द्र द्विविद हिमालयपर गया और हिमालयके शिखरसे प्राग्ज्योतिषपुरको जा पहुँचा ॥ १ - १४ ॥ यादवेश्वर प्रद्युम्न मल्लारदेशके अधिपति रामकृष्णपर विजय पाकर महाक्षेत्र सेतुबन्ध तीर्थमें गये । महावीर श्रीकृष्णकुमार प्रद्युम्न शतयोजनविस्तृत मकरालय समुद्रका दर्शन करके उसके तटपर जाकर ठहर गये । वहाँ साम्ब आदि भाइयों और अक्रूर आदि अपने यादवोंको बुलाकर योगेश्वरेश्वर प्रद्युम्नने सभामें उद्धवसे कहा ॥१५–१७ ॥ प्रद्युम्न बोले – भोजकुलतिलक मन्त्रिवर उद्धवजी! परम तेजस्वी लङ्कापति विभीषण इस द्वीप-का राजा तथा राक्षस - समूहोंका सरदार है । यदि वह शीघ्र भेंट न दे तो बताइये, यहाँ हमें क्या करना चाहिये? ॥ १८ ॥

उद्धवजीने कहा - प्रभो! आप देवाधिदेव पुरुषोत्तमोत्तम हैं । आप ही परमात्मा श्रीकृष्णचन्द्र हैं, तथापि आप साधारण लोगोंकी भाँति मुझसे पूछते हैं! बड़े - बड़े योगीश्वर भी आपकी मायाका पार नहीं पाते । भूमन्! ब्रह्मा आदि देवता भी सदा पराजित होकर जिनके उत्तम अनुशासनका भार सदा अपने मस्तक-पर ढोते हैं, वही साक्षात् पुरुषोत्तम आप हैं । मैं तो आपका दासानुदास हूँ, फिर मैं आपको क्या सलाह दूँगा? ॥ १ ९ -२० ॥ श्रीनारदजी कहते हैं— मैथिलेश्वर! उद्धवके यों कहनेपर श्रीहरिस्वरूप भगवान् प्रद्युम्रने एक ताड़पत्र लेकर उसपर अपना संदेश लिखा- ' राक्षसराज! तुम भोजराज उग्रसेनके लिये भेंट दो; यदि बलाभिमानवश तुम मेरी बात नहीं सुनोगे तो मैं धनुषसे छोड़े गये बाणोंद्वारा समुद्रपर सेतु बाँधकर सैन्यसमूहके साथ लङ्कापर चढ़ाई करूँगा । ' यह

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अध्याय १३ ] शाल्व आदि देशों तथा द्विविद वानरपर प्रद्युम्नकी विजय ३०७ लिखकर प्रचण्ड - पराक्रमी प्रद्युम्नने कोदण्ड हाथमें लिया और अपने पत्रको बाणमें लगाकर उस बाणको कानतक खींचा और छोड़ दिया । उस धनुषकी प्रत्यञ्चाको खींचनेसे बिजलीकी गड़गड़ाहटके समान टंकारध्वनि प्रकट हुई । उस नादसे पातालों तथा सातों लोकोंसहित सारा ब्रह्माण्ड गूँज उठा । प्रद्युम्नके धनुषसे छूटा हुआ बाण सम्पूर्ण दिशाओंको प्रकाशित करता हुआ विद्युत् समान तड़तड़ाकर विभीषणकी सभामें गिरा । उसके गिरते ही सब राक्षस चकित - से होकर उठकर खड़े हो गये । उन दुष्टोंने बड़े वेगसे अपने कवच और शस्त्र ग्रहण कर लिये । महाबली राक्षसराज विभीषण बाणसे पत्रको खींचकर पढ़ गये । सभामें वह पत्र पढ़कर उन्हें बड़ा विस्मय हुआ । उसी समय उस राजसभामें शुक्राचार्य आ पहुँचे । विभीषणने पाद्य आदि उपचारोंद्वारा उनका पूजन किया और हाथ जोड़, प्रणाम करके कहा ॥ २१–२८ ॥ विभीषण बोले- भगवन्! यह किसका बाण है? भूतलपर भोजराज कौन हैं और उनका बल क्या है, यह मुझे बताइये; क्योंकि आप साक्षात् दिव्य-दृष्टिवाले हैं ॥ २ ९ ॥ श्रीशुक्रने कहा - राक्षसराज! इस विषयमें पुराणवेत्ता विद्वान् इस प्राचीन इतिहासका वर्णन किया करते हैं, जिसके सुननेमात्रसे पापोंका नाश हो जाता है । पूर्वकालमें ब्रह्माजीके पुत्र सनक आदि चार मुनि तीनों लोकोंमें भ्रमण करते हुए भगवान् विष्णुके दिव्यलोकमें गये । वे नंगे बालकके रूपमें थे । उन्हें शिशु जानकर जय और विजय नामक द्वारपालोंने, जो अन्तः पुरमें पहरेदार थे, बेंतकी छड़ीसे रोक दिया । वे श्रीहरिके दर्शनकी लालसा लेकर आये थे । रोके जानेपर उन्हें क्रोध हुआ और उन्होंने उन दोनों द्वारपालोंको शाप देते हुए कहा – ' तुम दोनों दुष्ट हो; इसलिये असुर हो जाओ । तीन जन्मोंके पश्चात् शुद्ध होओगे । ' इस प्रकार शाप प्राप्त करके वे दोनों अपने भवनसे गिरे और भूमण्डलमें आकर दैत्यों तथा दानवोंसे पूजित दिति-पुत्र हुए । उनमेंसे ज्येष्ठका नाम हिरण्यकशिपु था और छोटेका नाम हिरण्याक्ष । प्रलयके जलसे पृथ्वीका उद्धार करनेके लिये भगवान् श्रीहरि यज्ञ - वाराहके रूपमें प्रकट हुए । उन्होंने महाबली हिरण्याक्ष नामक दैत्यको मुक्केसे मार डाला और साक्षात् चण्ड - पराक्रमी नृसिंह होकर कयाधू - कुमार प्रह्लादकी सहायता करते हुए हिरण्यकशिपुका उदर विदीर्ण कर दिया । वे ही दोनों भाई फिर केशिनीके गर्भसे विश्रवाके पुत्र होकर उत्पन्न हुए, जो सम्पूर्ण लोकोंको एक मात्र ताप देनेवाले रावण और कुम्भकरण कहलाये । श्रीरामचन्द्रजीके सायकोंसे घायल होकर वे दोनों युद्धभूमिमें सदाके लिये सो गये । वे महान् वेगशाली राक्षसराज रावण और कुम्भकर्ण तुम्हारी आँखोंके सामने मारे गये थे । अब उनका तीसरा जन्म हुआ । इस जन्ममें वे क्षत्रिय-कुलमें उत्पन्न हुए हैं । उनका नाम शिशुपाल और दन्तवक्र है । वे इस युगमें भी बड़े बलवान् हैं । उन दोनोंके वधके लिये साक्षात् परिपूर्णतम भगवान् असंख्य - ब्रह्माण्डपति परात्पर गोलोकनाथ श्रीकृष्ण यदुकुलमें अवतीर्ण हुए हैं । वे यादवेन्द्र बहुत - सी लीलाएँ करते हुए इस समय द्वारकामें विराजमान हैं । युधिष्ठिरके महायज्ञमें शाल्वके साथ होनेवाले युद्धमें माधव शिशुपाल और दन्तवक्रका वध कर डालेंगे, इसमें संशय नहीं है । उन्हींके पुत्र शम्बरसूदन प्रद्युम्न दिग्विजयके लिये निकले हैं । वे जम्बूद्वीप समस्त राजाओंपर विजय प्राप्त करेंगे । उन सबके जीत लिये जानेपर यदुकुल - तिलक भोजराज उग्रसेन द्वारकामें राजसूय यज्ञ करेंगे । उन्हींके धनुषसे बलपूर्वक छूटा हुआ यह प्रचण्ड वेगशाली बाण यहाँ आया है । इसपर उनके नामका चिह्न है । यह विद्युत्की गड़गड़ाहटसे भी अधिक आवाज करनेवाला है । राक्षसराज! यह बाण समस्त दिङ्मण्डलको उद्भासित करता हुआ यहाँतक आ पहुँचा है ॥ ३०-४५ ॥ नारदजी कहते हैं— नरेश्वर! राक्षसोंके सरदार श्रीरामभक्त विभीषणने यह जानकर कि भगवान् श्रीकृष्ण साक्षात् श्रीरामचन्द्रजी ही हैं, भेंट - सामग्री लेकर प्रद्युम्रकी सेनाके पास गये । उस समय शीघ्र ही आकाशसे उतरकर मेघके समान श्यामकान्तिसे प्रकाशित होनेवाले विशालकाय विजयदर्शी विभीषण श्रीकृष्णकुमार प्रद्युम्नकी परिक्रमा करके हाथ जोड़ उनके सामने खड़े हो गये ॥४६-४७ ॥

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३०८ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ विश्वजित्खण्ड विभीषण बोले- प्रभो! आप साक्षात् भगवान् वासुदेव तथा सबके स्रष्टा हैं, आपको नमस्कार है । आप ही संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध हैं; आपको प्रणाम है । मत्स्य, कूर्म और वराहावतार धारण करनेवाले आप परमेश्वरको बारंबार नमस्कार है । श्रीरामचन्द्रको नमस्कार है । भृगुकुलभूषण परशु रामजीको बारंबार नमस्कार है । आप भगवान् वामनको नमस्कार है । आप ही साक्षात् नरसिंह हैं, आपको बारंबार नमस्कार है । आप शुद्ध - बुद्धदेवको नमस्कार है । सबकी पीड़ा हर लेनेवाले कल्किरूप आप भगवान्‌को मेरा नमस्कार है * ॥ ४८–५० ॥ श्रीनारदजी कहते हैं- राजन्! यों कहकर दूसरोंको मान देनेवाले विभीषणने श्रीहरिके पुत्र प्रद्युम्नका बड़े भक्तिभावसे सोलह उपचारों द्वारा पूजन किया । उस समय उनकी वाणी गद्गद हो रही थी । फिर परम संतुष्ट हुए प्रद्युम्रने उनको वैराग्यपूर्ण ज्ञान, तथा प्रेमलक्षणा परानुरक्ति प्रदान की । दी हुई परम दिव्य पद्मरागनिर्मित पुलस्त्यपौत्र कुबेरद्वारा पूर्वकालमें दीप्तिमती माला प्रदान की । फिर चन्द्रकान्तमणि तथा उत्तम पीताम्बर उन्हें अर्पित किये । तदनन्तर महाबली प्रद्युम्नको प्रणाम करके उन्हें भेंट देकर शान्तिदायिनी भक्ति साथ ही ब्रह्माजीकी मस्तकमणि तथा दी हुई रनोंकी चन्द्रमाकी दी हुई परम प्रभु प्रद्युम्रने राक्षसराज विभीषण अपने पार्षदगणोंके साथ लङ्कापुरीको लौट गये ॥ ५१-५५ ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें विश्वजित्खण्डके अन्तर्गत नारद - बहुलाश्व - संवादमें ‘ शाल्व, मल्लार एवं लङ्कापर विजय ' नामक तेरहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३ ॥

चौदहवाँ अध्याय सह्यपर्वतके निकट दत्तात्रेयका दर्शन और उपदेश तथा महेन्द्रपर्वतपर परशुरामजीके द्वा यादवसेनाका सत्कार और श्रेष्ठ भक्तके स्वरूपका निरूपण श्रीनारदजी कहते हैं - राजन्! तदनन्तर श्रीकृष्णकुमार कामदेवस्वरूप प्रद्युम्न ऋषभ पर्वता दर्शन करके श्रीरङ्गक्षेत्रमें गये । फिर काञ्जीपुरी एवं सरिताओंमें श्रेष्ठ प्राचीका दर्शन करके, काबेरी नदीके पार जाकर सह्यगिरिके समीपवर्ती देशोंमें गये । भगवान् प्रद्युम्न हरिके साथ यादवोंकी विशाल सेना भी थी । मैथिलेश्वर! उन्होंने देखा कि उनके सैन्य शिविरकी ओर एक खुले केशवाला दिगम्बर अवधूत भागता चला आ रहा है । उसका शरीर हृष्ट - पुष्ट है और उसपर धूल पड़ी हुई है । बालक उसके पीछे दौड़ रहे हैं और इधर - उधरसे तालियाँ पीट रहे हैं, कोलाहल करते हैं और हँसते हैं । उस अवधूतको देखकर बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ श्रीकृष्णकुमार प्रद्युम्न उद्धवसे बोले ॥ १-४३ ॥ प्रद्युम्न ने कहा- यह हृष्ट - पुष्ट शरीरवाला कौन पुरुष बालक, उन्मत्त और पिशाचकी भाँति भागा आ रहा है? यह लोगोंसे तिरस्कृत होनेपर भी हँसता है और अत्यन्त आनन्दित होता है ॥५-६ ॥ उद्धव बोले- ये परमहंस अवधूत श्रीहरिके कलावतार साक्षात् महामुनि दत्तात्रेय हैं, जो सदा आनन्दमय देखे जाते हैं । इन्हींके प्रसादसे पूर्ववर्ती उत्कृष्ट नरेश सहस्रार्जुन आदि तथा यदु एवं प्रह्लाद आदिने परम सिद्धि प्राप्त की है॥७-८ ॥ श्रीनारदजी कहते हैं- राजन्! यह सुनकर यदु-कुल - तिलक प्रद्युम्नने मुनिकी पूजा और वन्दना करके

* नमो भगवते तुभ्यं वासुदेवाय वेधसे । प्रद्युम्नायानिरुद्धाय नमः संकर्षणाय च ॥

नमो मत्स्याय कूर्माय वराहाय नमो नमः । नमः श्रीरामचन्द्राय भार्गवाय नमो नमः ॥

वामनाय नमस्तुभ्यं नृसिंहाय नमो नमः । नमो बुद्धाय शुद्धाय कल्कये चार्तिहारिणे ॥

( गर्ग ०, विश्वजित् ० १३ । ४८–५० )

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अध्याय १४ ] सह्यपर्वतके निकट दत्तात्रेयका दर्शन और उपदेश ३० ९ दिव्य आसनपर बिठाकर उनसे प्रश्न किया ॥ ९ ॥

प्रद्युम्न बोले – भगवन्! मेरे हृदयमें एक संदेह है, प्रभो! उसका नाश कीजिये । जगत्‌का स्वरूप क्या है, ब्रह्मके मार्ग कौन हैं तथा तत्त्व क्या है? यह सब ठीक - ठीक बताइये ॥ १० ॥

दत्तात्रेयने कहा- जबतक अन्धकारके कारण वस्तु दिखायी नहीं देती, तभीतक उल्का या मशालकी आवश्यकता होती है । जब महानन्द वशमें हो जाय, तब उल्काका क्या प्रयोजन है । साधो! जगत् तभीतक टिका रहता है, जबतक तत्त्वका ज्ञान नहीं होता । परब्रह्म परमात्माके ज्ञात या प्राप्त हो जानेपर जगत्का क्या प्रयोजन है | जैसे मुखका प्रतिबिम्ब दर्पणमें दिखायी देता है, परंतु वास्तविक शरीर उससे भिन्न है, उसी प्रकार प्रधान अर्थात् प्रकृतिमें प्रतिबिम्बित चैतन्य जीव है, परंतु ज्ञानके आलोकमें वह परात्पर परमात्मा सिद्ध होता है । जैसे सूर्योदय होनेपर सारी वस्तुएँ नेत्रसे दिखायी देती हैं, उसी

प्रकार ज्ञानोदय होनेपर ब्रह्मतत्त्वका साक्षात्कार होता है ।

फिर जीव कहीं नहीं दृष्टिगोचर होता है ॥ ११ – १४ ॥

नारदजी कहते हैं — राजन्! इस प्रकार उपदेश सुनकर यादवराज प्रद्युम्नने उनको नमस्कार किया और सेनाके साथ वे द्रविड़ देशमें वैकुण्ठाचल ( वेङ्कटाचल ) के पास गये । द्रविड़ देशके स्वामी धर्मतत्त्वज्ञ राजर्षि सत्यवाक्ने बड़ी भक्तिसे प्रद्युम्नका आदर - सत्कार किया । फिर श्रीशैलका दर्शन करके वहाँके अद्भुत शिवालय तथा स्कन्दस्वामीका दर्शन प्राप्तकर वे पम्पा - सरोवरपर गये । तदनन्तर श्रीद्वारका -नाथ प्रद्युम्न गोदावरी और भीमरथी आदि भगवत्-तीर्थोंका दर्शन करते हुए महेन्द्राचलपर गये । उस पर्वतपर क्षत्रियोंका अन्त करनेवाले भृगुवंशी परशुरामजी विराजमान थे । उन्हें नमस्कार और उनकी परिक्रमा करके श्रीकृष्णनन्दन वहाँ खड़े हो गये । राजेन्द्र! परशुरामजीने उन्हें आशीर्वाद देकर यादवोंकी चतुरङ्गिणी सेनाका योगशक्तिसे सत्कार किया । दाल, भात, चटनी, दहीमें भिगोयी हुई भाजीकी पकौड़ियाँ, सिखरन, अवलेह ( सिरका या अचार ), पालकका साग, इक्षुभिक्षिका ( राब और चीनीका बना हुआ भोज्य पदार्थ - विशेष ), शक्करके मेलसे बना हुआ त्रिकोणाकार मिष्टान्न ( गुझिया, समोसा आदि ), बड़ा, मधुशीर्षक ( मधुपर्क या घेवर आदि मिष्टान्न - विशेष ), फेणिका ( फेनी ), उपरिष्ट ( पूड़ी या पूआ आदि ), छिद्रयुक्त शतपत्र ( एक प्रकारकी मिठाई ), चक्राभचिह्निका ( चक्राकार चिह्नवाली मिठाई, इमिरती आदि ), सुधाकुण्डलिका ( जलेबी ), घृतपूर ( घीकी बनी हुई पूड़ी ), वायुपूर ( मालपूआ ), चन्द्रकला, दधिस्थूली ( दहीमें भीगकर फूली हुई बड़ी ), कपूरसे वासित खाँडकी बनी मिठाई, गोधूमपरिखा ( खाजा ), इनके साथ सुन्दर - सुन्दर फल, उत्तम दधि, मोदक ( लड्डू आदि ), शाक सौधान ( विविध शाकोंके समुदाय ), मण्ड ( दूधकी मलाई या झाग ), खीर, दही, गायका घी, ताजा मक्खन, मण्डूरी ( सागका रसा ), कुम्हड़ा, पापड़, शक्तिका ( शक्तिवर्धक पेय, द्राक्षासव आदि ), लस्सी, सुवीराम्ल ( खट्टी काँजी ), सुधारस ( शहद या मीठा शर्बत ), उत्तमोत्तम फल, मिश्री, नाना प्रकारके फल, मोहनभोग, ( हलुआ ), नमकीन पदार्थ, कसैले, मीठे, तीते, कड़वे और खट्टे अनेक प्रकारके भोज्य पदार्थ— इन सबको छप्पन भोग कहा गया है । भृगुकुल - भूषण परशुरामजीने अपने योगबलसे इन सब पदार्थोके पर्वत-जैसे ढेर लगा दिये । सारी सेना भोजन कर चुकी, तब भी वहाँ वे खाद्य पदार्थोंके पर्वत हाथभर भी छोटे नहीं हुए । परशुरामजीका यह वैभव देखकर सब लोग अत्यन्त आश्चर्यचकित हो गये । राजन्! यादवोंसहित श्रीकृष्णकुमार प्रद्युम्नने उस समय परशुरामजीको नमस्कार करके सबके सामने इस प्रकार पूछा॥१५–३०३ ॥ प्रद्युम्न बोले- भगवन्! आपने हम सब लोगोंको अत्यन्त उत्तम भोजन प्रदान किया । प्रभो! सारी समृद्धियाँ और सिद्धियाँ आपके चरणोंमें लोटती हैं । अब मैं यह जानना चाहता हूँ कि समस्त हरिभक्तोंमें श्रीहरिका प्रिय भक्त कौन है? विप्रेन्द्र! यह मुझे बताइये; क्योंकि आप परावरवेत्ताओंमें सबसे श्रेष्ठ हैं ॥ ३१-३२ ॥ परशुरामजीने कहा - प्रभो! आप क्या नहीं जानते, तो भी साधारण लोगोंकी भाँति पूछते हैं । लोगोंको शिक्षा देनेके लिये ही आप इस तरह सत्सङ्ग करते हुए भूतलपर विचरते हैं । जो अकिंचन है—

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३१० गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ विश्वजित्खण्ड जिसके पास कोई संग्रह - परिग्रह नहीं है, जो केवल श्रीहरिके चरणारविन्दोंके परागपर ही लुब्ध है, श्रीहरिकी सुन्दर कथाके श्रवणकीर्तनमें ही तत्पर रहता है तथा जिसका चित्त भगवान्‌के रूपसिन्धुकी लहरोंमें ही डूबा रहता है, वही श्रीकृष्णचन्द्रका प्रिय भक्त कहा गया है । परमेश्वर! जिस महापुरुषने अपने मन और इन्द्रियोंको वशमें कर रखा है, जो समस्त जंगम प्राणियोंके प्रति स्नेह एवं दयाका भाव रखता है, जो शान्त, सहनशील, अत्यन्त कारुणिक, सबका सुहृद एवं सत्पुरुष है, वही भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रका प्रिय भक्त कहा गया है । वह अपने चरणोंकी धूलिसे सम्पूर्ण जगत्को पवित्र करता है । जो निरन्तर परमेश्वर श्रीहरिके चरणोंकी धूलिका आश्रय ले सम्पूर्ण ब्रह्म-पद, इन्द्रपद, चक्रवर्ती सम्राट्के पद, रसातलके आधिपत्य, योगसिद्धि और मोक्षकी भी कभी इच्छा नहीं करता, वही भगवान्‌का श्रेष्ठ भक्त है । जो अकिंचन हैं, जिनको अपने किये हुए कर्मोंके फलसे विरक्ति है तथा जो श्रीहरिकी चरणरजमें ही आसक्त हैं, वे महामुनि भगवदीय भक्तजन ही भगवान्‌के उस परमपदका सेवन करते हैं; अन्य लोग उस नैरपेक्ष्य सुखका अनुभव नहीं कर पाते । भगवान् पुरुषोत्तमको अपने भक्तसे बढ़कर प्रिय कोई नहीं जान पड़ता । न शिव, न ब्रह्मा, न लक्ष्मी और न रोहिणीनन्दन बलराम-जी ही उन्हें भक्तसे अधिक प्रिय हैं । भक्तोंने उनके मनको बाँध रखा है, अतः सकल लोकजनोंके चूड़ामणि भगवान् श्रीकृष्ण सदा भक्तोंके पीछे - पीछे चलते हैं । अपने भक्तजनोंके पीछे चलते हुए भगवान् परमात्मा श्रीकृष्ण उनके प्रति अपनी रुचि - अपना अनुराग सूचित करते हैं और समस्त लोकोंको पवित्र करते हैं । इसीलिये भगवान् मुकुन्द अतिशय भजन करनेवाले लोगोंको मोक्ष तो दे देते हैं, परंतु उत्तम भक्तियोग कदापि नहीं देते * ॥३३–३९ ॥ श्रीनारदजी कहते हैं— राजन्! यह उपदेश सुन-कर यादवेन्द्र प्रद्युम्नने श्रीभार्गवकुलभूषण परशुरामजी -को नमस्कार किया और वहाँसे पूर्व दिशामें विद्यमान गङ्गासागर संगमकी ओर प्रस्थान किया ॥ ४० ॥

इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें विश्वजित्खण्डके अन्तर्गत नारद - बहुलाश्व - संवादमें ' द्रविड़ देशपर विजय ' नामक चौदहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १४ ॥

* निष्किचनो हरिपदाब्जपरागलुब्धः श्रीमत्कथाश्रवणकीर्तनतत्परो यः ।

तद्रूपसिन्धुलहरीविनिमग्न चित्तः श्रीकृष्णचन्द्रदयितः कथितः स भक्तः ॥

दान्तो महानखिलजंगमवत्सलोऽयं शान्तस्तितिक्षुरतिकारुणिकः सुहृत्सत् ।

लोकं पुनाति निजपादरजोभिरारात् श्रीकृष्णचन्द्रदयितः कथितः परेशः ॥

यः पारमेष्ठयमखिलं न महेन्द्रधिष्ण्यं नो सार्वभौममनिशं न रसाधिपत्यम् ।

नो योगसिद्धिमपि नो नपुनर्भवं वा वाञ्छत्यलं परमपादरजः स भक्तः ॥

निष्किंचनाः स्वकृतकर्मफलैर्विरागा यत्तत्पदं हरिजना मुनयो महान्तः ।

भक्ता जुषन्ति हरिपादरजः प्रसक्ता अन्ये विदन्ति न सुखं किल नैरपेक्ष्यम् ॥

भक्तात्प्रियो न विदितः पुरुषोत्तमस्य शम्भुर्विधिर्न च रमा न च रौहिणेयः ।

भक्ताननुव्रजति भक्तनिवद्धचित्तचूडामणिः सकललोकजनस्य कृष्णः ॥

गच्छन्निजं जनमनु प्रपुनाति लोकानावेदयन् हरिजने स्वरुचिं महात्मा ।

तस्मादतीव भजतां भगवान् मुकुन्दो मुक्तिं ददाति न कदापि सुभक्तियोगम् ॥

( गर्ग ०, विश्वजित् ० १४ । ३४–३९ )

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पंद्रहवाँ अध्याय उड्डीश- डामर देशके राजा, वङ्गदेशके अधिपति वीरधन्वा तथा असम नरेश पुण्ड्रपर यादव - सेनाकी विजय श्रीनारदजी कहते हैं - राजन्! दिग्विजयके बहाने भूभार- हरण करनेवाले साक्षात् भगवान् प्रद्युम्न अङ्गदेशको गये । अङ्गदेशका स्वामी केवल अन्तःपुर-का अधिपति होकर वनमें विहार करता था । वहाँ यादवोंने उसे जा पकड़ा, तब उसने महात्मा प्रद्युम्नको पर्याप्त भेंट दी ॥ १-२ ॥ उड्डीश- डामर ( उड़ीसा ) देशके राजा महाबली बृहद्बाहुने प्रद्युम्नको भेंट नहीं दी । वह अपने बलके अभिमानसे मत्त रहता था । प्रद्युम्नने जाम्बवती - कुमार वीरवर साम्बको उसे वशमें करनेके लिये भेजा । साम्ब सूर्यतुल्य तेजस्वी रथपर आरूढ़ हो, धनुष हाथमें ले अकेले ही गये । नरेश्वर! उन्होंने बाण - समूहोंसे डामर नगरको उसी प्रकार आच्छादित कर दिया, जैसे मेघ तुषाराशिसे किसी पर्वतको चारों ओरसे ढक देता है । इस प्रकार धर्षित एवं पराजित होकर डामराधीशने तत्काल हाथ जोड़ लिये और महात्मा प्रद्युम्नको नमस्कार करके भेंट अर्पित की ॥ ३-६ ॥ तत्पश्चात् वङ्गदेशके अधिपति मदमत्त एवं वीर राजा वीरधन्वा एक अक्षौहिणी सेनाके साथ युद्धके लिये यादव - सेनाके सम्मुख आये । वे बड़े बलवान् थे । यादवोंकी ओरसे श्रीहरिके पुत्र चन्द्रभानुने प्रद्युम्नके देखते - देखते वीरधन्वाकी उस सेनाको बाणोंद्वारा उसी प्रकार विदीर्ण कर दिया, जैसे कोई कटु वचनोंद्वारा मित्रताका भेदन कर दे । उनके बाणोंसे विदीर्ण हुए हाथियोंके मस्तकसे चमकते हुए मोती भूमिपर इस प्रकार गिरने लगे, मानो रातमें आकाशसे तारे बिखर रहे हों अनेक रथी वीर धराशायी हो गये । हाथी - घोड़े और पैदल सैनिक उनके बाणोंसे मस्तक कट जानेके कारण कुम्हड़ेके टुकड़ों - जैसे इधर - उधर गिरे दिखायी देते थे । क्षणभर वीरधन्वाकी सेना रक्तकी नदीके रूपमें परिणत हो गयी, जो मनस्वी वीरोंका हर्ष बढ़ाती और डरपोकोंको भयभीत करती थी ॥ ७-११ ॥ कटे हुए मस्तक और धड़ किरीट, कुण्डल, केयूर, कंगन और अस्त्र - शस्त्रोंसहित दौड़ रहे थे । उनके कारण वहाँकी भूमि महामारी - सी प्रतीत होती थी । कूष्माण्ड, उन्माद, वेताल, भैरव तथा ब्रह्मराक्षस बड़े वेगसे आकर शंकरजीके गलेकी मुण्डमाला बनानेके लिये वहाँपर गिरे हुए मस्तकोंको उठा लेते थे । इस तरह जब सारी सेना मार गिरायी गयी, तब वीरधन्वा सामने आये, उन्होंने तुरंत ही वज्र - सरीखी गदासे चन्द्रभानुपर चोट की । उस गदाके भारी प्रहारसे श्रीकृष्णकुमार चन्द्रभानु विचलित नहीं हुए; उन्होंने गदा लेकर तत्काल वीरधन्वाकी छातीपर दे मारी । उस गदाके प्रहारसे पीड़ित एवं मूच्छित हो मुँहसे रक्त वमन करते हुए वीरधन्वा कटे हुए वृक्षकी भाँति भूतलपर गिर पड़े । दो घड़ीमें उनको फिर चेतना हुई, तब उन वङ्गदेशके नरेशने महात्मा प्रद्युम्नकी शरण ली ॥ १२ – १७ ॥ राजन्! जब भेंट देकर वीरधन्वा अपने नगरको चले गये, तब अमित - पराक्रमी प्रद्युम्न ब्रह्मपुत्र नद पार करके असम देशमें गये । वहाँके राजा बिम्बको पकड़-कर यादवेश्वर प्रद्युम्नने भेंट ली और यादवोंके साथ कामरूप देशमें गये । कामरूप देशके राजा पुण्ड्र इन्द्रजालकी विद्या ( जादू ) में बड़े निपुण थे । वे अपनी सेनाके साथ प्रद्युम्नके सामने युद्धके लिये निकले । उस समय असमियों और यादवोंमें घोर युद्ध हुआ । बाण, कुठार, परिघ, शूल, खड्ग, ऋष्टि तथा शक्तियोंसे प्रहार किया गया । मैथिलेश्वर! तदनन्तर राजा पुण्ड्रने पिशाच, नाग तथा राक्षसोंकी माया प्रकट की; फिर तो सब ओर गुह्यक, गन्धर्व तथा कच्चे मांस चबानेवाले पिशाच रणभूमिमें दौड़ने तथा बारंबार कोटि - कोटि अङ्गारोंकी वृष्टि करने लगे । एक ही क्षणमें यादवोंकी सेनापर मुँहसे विष वमन करते और फुंकारते हुए सर्प टूट पड़े । गधेपर बैठे हुए टेढ़े - मेढ़े दाँत और लपलपाती हुई जीभवाले भयंकर राक्षस युद्धमें मनुष्योंको चबाते तथा भागते दिखायी देने लगे । सिंहके समान मुखवाले यक्ष तथा अश्वमुख किंनर हाथोंमें शूल लिये ' मारो - काटो ' कहते हुए इधर - उधर

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३१२ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ विश्वजित्खण्ड विचरने लगे । क्षणभरमें सारा आकाश मेघोंकी घटासे आच्छादित हो गया । राजन्! वायुके वेगसे उड़ी हुई धूलके कारण सब ओर अन्धकार छा गया । भोज, वृष्णि, अन्धक, मधु, शूरसेन तथा दशार्ह वंशके योद्धा उस महायुद्धमें भयभीत हो गये । यदुश्रेष्ठ! वीरोंने अपने अस्त्र - शस्त्र नीचे डाल दिये ॥ १८ - २८ ॥ मैथिल! तब इस भयके निवारणका उपाय जानने-वाले श्रीकृष्णकुमार प्रद्युम्नने पिताके दिये हुए धनुषको हाथमें लेकर बाणोंद्वारा सात्त्विक महाविद्याका प्रयोग किया । फिर जैसे सूर्य अपनी किरणोंसे कुहासे तथा बादलोंको छिन्न - भिन्न कर डालते हैं, उसी प्रकार प्रद्युम्नने बाणोंद्वारा पिशाचों, नागों, यक्षों, राक्षसों तथा गन्धर्वोके घने अन्धकारको नष्ट कर दिया । जैसे हवा कमलको उड़ाकर पृथ्वीपर फेंक देती हैं, उसी प्रकार प्रद्युम्नने बाणोंद्वारा रथ और वाहनसहित शत्रु राजा पुण्ड्रको दो घड़ीतक आकाशमें घुमाकर रणभूमिमें पटक दिया । राजाकी मूर्च्छा दूर होनेपर वे पराजित हो प्रद्युम्नकी शरणमें गये और तत्काल भेंटके रूपमें एक लाख घोड़े और दस हजार हाथी देकर उन्होंने श्रीकृष्णकुमारको प्रणाम किया । वहाँसे अपनी सेनाद्वारा शोणनद और विपाशा ( व्यास ) नदी पार करते हुए यदुकुलनन्दन धनुर्धर वीर प्रद्युम्न केकय देशमें आ पहुँचे । केकय देशके राजा महाबली धृतकेतु वसुदेवकी बहिन साक्षात् श्रुतकीर्तिके महान् पति थे । उन्होंने यादवोंसहित प्रद्युम्नका बड़े भक्ति भावसे पूजन किया । राजन्! वे श्रीकृष्णके प्रभावको जानते थे ॥ २ ९ -३५ ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें विश्वजितखण्डके अन्तर्गत नारद - बहुलाश्व - संवादमें ' केकय देशपर विजय ' नामक पंद्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५ ॥

सोलहवाँ अध्याय मिथिलाके राजा धृतिद्वारा ब्रह्मचारीके रूपमें पधारे हुए प्रद्युम्नका पूजन; उन दोनोंका शुभ संवाद; प्रद्युम्नका राजाको प्रत्यक्ष दर्शन दे, उनसे पूजित हो शिविरमें जाना श्रीनारदजी कहते हैं- राजन्! वहाँसे विजय-दुन्दुभि बजवाते हुए यदुनन्दन प्रद्युम्न तुम्हारे सुख-सम्पन्न मिथिला देशमें आये । कलश - शोभित अत्यन्त ऊँचे स्वर्णमय सौधशिखरोंसे युक्त मिथिलापुरीको दूरसे देखकर प्रद्युम्रने उद्धवसे पूछा॥१-२ ॥ प्रद्युम्न बोले- मन्त्रिप्रवर! इस समय यह किसकी राजधानी मेरी दृष्टिमें आ रही है, जो बहु-संख्यक महलोंसे भोगवती पुरीकी भाँति शोभा पाती है? ॥ ३ ॥

उद्धवने कहा – मानद! यह राजा जनककी पुरी मिथिला है । इस समय यहाँ मिथिलानरेश महा-भागवत विद्वान् धृति रहते हैं । वे समस्त धर्मात्माओं-में श्रेष्ठ हैं । श्रीकृष्ण उनके इष्टदेव हैं और वे स्वयं भी श्रीहरिको बहुत प्रिय हैं । उनके पुत्रका नाम बहुलाश्व है, जो बचपनसे ही भगवान्‌की भक्ति करनेवाला है । उसे दर्शन देनेके लिये साक्षात् भगवान् श्रीकृष्ण यहाँ पधारेंगे । राजकुमार बहुलाश्व तथा ब्राह्मण श्रुतदेवको द्वारकामें भगवान् श्रीकृष्ण बहुत ही याद किया करते हैं । प्रभो! इन्हें देवेन्द्र भी नहीं जीत सकते, फिर मनुष्योंकी तो बात ही क्या; क्योंकि धृतिने अपनी परा-भक्तिसे श्रीकृष्णको वशमें कर लिया है ॥ ४ – ७३ ॥ श्रीनारदजी कहते हैं- राजन्! यह सुनकर भगवान् श्रीकृष्णकुमार प्रद्युम्न उद्धवजीको अपना शिष्य बनाकर उनके साथ राजा धृतिका दर्शन करनेके लिये आये । उद्धवसहित प्रद्युम्नने राजाकी भक्तिकी परीक्षा करनेके लिये ही मिथिलापुरीको देखा । वहाँके सभी वीर कवच और शस्त्र धारण करके माला और तिलकसे सुशोभित थे । वे सब - के - सब मालाद्वारा श्रीकृष्ण - नामका जप करते थे । मिथिलाके लोगोंके द्वार - द्वारपर श्रीहरिके नाम लिखे थे और श्रीकृष्णके सुन्दर - सुन्दर चित्र अङ्कित थे । मानद! वहाँ घरोंकी प्रत्येक दीवारपर गदा, पद्म, दसों अवतारके चित्र

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अध्याय १६ ] मिथिलाके राजा धृतिद्वारा ब्रह्मचारीके रूपमें पधारे हुए प्रद्युम्नका पूजन ३१३ और शङ्ख, चक्र अङ्कित थे । घर - घरके आँगनमें तुलसीके मन्दिर दिखायी देते थे ॥ ८- १२ ॥ इस तरह मिथिलाके महलोंको देखते हुए उन्होंने वहाँके लोगोंपर भी दृष्टिपात किया, जो सब - के - सब माला - तिलकधारी भगवद्भक्त थे । उन्होंने केसर अथवा कुङ्कुमके बारह - बारह तिलक लगा रखे थे । वहाँके ब्राह्मण गोपीचन्दनकी मुद्राओंसे चर्चित, शान्तस्वरूप तथा ऊर्ध्वपुण्ड्रधारी थे । उनके अङ्गोंपर हरिमन्दिरके चित्र अङ्कित थे । ललाटमें गदाकी मुद्रा, सिरपर हरिनाम और दोनों भुजाओंमें चक्र, शङ्ख, पद्म, कूर्म और मत्स्य अङ्कित थे । कितने ही लोगोंने मस्तकपर धनुष और बाणके चित्र तथा हृदयमें नन्दक नामक खड्ग, मुसल और हलके चिह्न धारण कर रखे थे ॥ १३–१७ ॥ राजन्! तदनन्तर प्रद्युम्नने देखा - वहाँकी गली-गली में कुछ मनुष्य भागवत सुन रहे हैं । दूसरे लोग हरिवंश और महाभारत नामक इतिहास श्रवण कर रहे हैं । कुछ लोग सनत्कुमारसंहिता, वासिष्ठसंहिता, याज्ञवल्क्यसंहिता, पराशरसंहिता, गर्गसंहिता, पौलस्त्यसंहिता और धर्मसंहिता आदिका पाठ कर रहे हैं । ब्रह्मपुराण, पद्मपुराण, विष्णुपुराण, शिवपुराण, लिङ्गपुराण, गरुडपुराण, नारदीयपुराण, भागवतपुराण, अग्निपुराण, स्कन्दपुराण, भविष्णपुराण, ब्रह्मवैवर्त -पुराण, वामनपुराण, मार्कण्डेयपुराण, वाराहपुराण, मत्स्यपुराण, कूर्मपुराण तथा ब्रह्माण्डपुराण - इन सब पुराणोंको गली - गलीमें, घर - घरमें वहाँके सब लोग सुनते थे । कुछ लोग श्रीरामचरणामृतसे पूर्ण वाल्मीकिके महाकाव्य रामायणका पाठ करते थे । कुछ लोग स्मृतियोंके और कुछ ब्राह्मण वेदत्रयीके स्वाध्यायमें लगे थे । कुछ लोग मङ्गलधाम वैष्णव यज्ञका अनुष्ठान करते थे । कितने ही मनुष्य राधाकृष्ण, कृष्ण - कृष्ण आदि नामोंका बारंबार कीर्तन करते थे । कुछ लोग हरिकीर्तनमें तत्पर रहकर नाचते और गाते थे । वहाँके प्रत्येक मन्दिरमें मृदङ्ग, ताल, झाँझ और वीणा आदि मनोहर वाद्योंके साथ लोगोंद्वारा किया जानेवाला हरिकीर्तन सुनायी पड़ता था । राजन्! मिथिलाके घर - घरमें वहाँके निवासी प्रेमलक्षणा नवधाभक्ति करते थे ॥ १८–२६ ॥ इस प्रकार नगरीका दर्शन करके भगवान् प्रद्युम्न हरिने राजद्वारपर पहुँचकर शीघ्र ही मैथिलनरेशका दर्शन किया । मैथिलेशकी सभामें वेदव्यास, शुकमुनि, याज्ञवल्क्य, वसिष्ठ, गौतम, मैं और बृहस्पति बैठे थे । दूसरे भी धर्मके वक्ता तथा हरिनिष्ठ मुनि वहाँ मूर्तिमान् वेदकी भाँति इधर - उधर बैठे दिखायी देते थे । नरेश्वर मैथिलेन्द्र धृति वहाँ भक्तिभावसे नतमस्तक होकर बलदेवजीकी चरणपादुकाकी विधिवत् पूजा कर रहे थे । वे श्रीकृष्ण और बलदेवके मुक्तिदायक नामोंका जप भी करते जाते थे । शिष्यसहित ब्रह्मचारीको आया देख राजाने उठकर नमस्कार किया । उनकी पाद्य आदि उपचारोंसे विधिवत् पूजा करके मैथिलेश्वर राजा धृति दोनों हाथ जोड़कर उनके आगे खड़े हो गये ॥ २७ –३२ ॥ जनकने कहा – भगवन्! आपके पदार्पणसे आज मेरा जन्म सफल हो गया, मेरा राजभवन शुद्ध एवं परमोज्ज्वल हो गया, देवता, ऋषि और पितर-सब संतुष्ट हो गये । भगवन्! आप जैसे निभ्रान्त और समदर्शी साधु भूतलपर दीनजनोंका कल्याण करनेके लिये ही विचरते हैं॥३३-३४ ॥ ब्रह्मचारी बोले – राजसिंह! आप धन्य हैं, आपकी यह मिथिलापुरी धन्य है तथा विष्णु - भक्तिसे भरपूर आपकी सारी प्रजा भी धन्य है ॥ ३५ ॥

जनकने कहा - प्रभो! न तो यह नगरी मेरी है, न प्रजा मेरी है और न गृह तथा धन - धान्य मेरे हैं । स्त्री, पुत्र और पौत्रादि मेरे पास जो कुछ है, वह सब भगवान् श्रीकृष्णका ही है । साक्षात् परिपूर्णतम भगवान् श्रीकृष्ण स्वयं असंख्य ब्रह्माण्डोंके अधिपति होकर गोलोक-धाममें विराजते हैं । वे पुरुषोत्तम एक होकर भी स्वयं ही वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध – इन चार व्यूहोंके रूपमें भूतलपर प्रकट हुए हैं । महामुने ब्रह्मन्! शरीर, मन, वाणी, बुद्धि अथवा समस्त इन्द्रियोंद्वारा मैंने जो भी पुण्यकर्म किया है, वह सब भगवान् श्रीकृष्णको समर्पित है ॥ ३६-३९ ॥ ब्रह्मचारीने कहा— महाभाग, विष्णुभक्त-शिरोमणे, विदेहराज! तुम्हारी भक्तिसे संतुष्ट

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३१४ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ विश्वजित्खण्ड हो भगवान् श्रीकृष्ण तुम्हें सायुज्य मोक्ष प्रदान करेंगे ॥ ४० ॥

जनक बोले- ब्रह्मन्! मैं आप जैसे श्रीकृष्ण-भक्त महात्माओंका दास हूँ । मैंने अपने मनमें किसी हेतु अथवा कामनाको स्थान नहीं दिया है; अतः मैं एकत्व या सायुज्यरूपा मुक्ति नहीं पाना चाहता ॥ ४१ ॥

ब्रह्मचारीने कहा- राजन्! तुम हेतुरहित होकर अहैतुकी भक्ति करते हो, अतः निर्गुण भक्ति - भावके कारण तुम प्रेमके लक्षणोंसे सम्पन्न हो । साक्षात् भगवान् प्रद्युम्न दिग्विजयके लिये निकले हैं । वे आपके घरपर क्यों नहीं आये - इस बातको लेकर मेरे मनमें महान् संदेह हो गया है॥४२-४३ ॥ जनक बोले — भगवान् प्रद्युम्न साक्षात् अन्तर्यामी

स्वयं श्रीहरि हैं । वे सदा, सर्वज्ञ और सर्वव्यापी हैं ।

फिर बताइये तो सही, क्या वे यहाँ नहीं हैं? ॥ ४४ ॥

ब्रह्मचारीने कहा — यदि ज्ञानदृष्टिसे भी तुम श्री कृष्णकुमार प्रद्युम्नको यहाँ निरन्तर स्थित मानते हो तो दिव्यदृष्टिवाले प्रह्लादकी भाँति तुम उनका यहाँ प्रत्यक्ष दर्शन कराओ ॥ ४५ ॥

श्रीनारदजी कहते हैं - बहुलाश्व! यह सुनकर महाभागवत राजा धृतिने अपने मुखपर अश्रुधारा बहाते हुए गद्गद वाणीमें कहा ॥ ४६ ॥

जनक बोले- यदि मेरेद्वारा भगवान् श्रीहरिकी इस भूतलपर अहैतुकी भक्ति की गयी है तो श्रीहरिके पुत्र प्रद्युम्न मेरे सामने प्रकट हो जायँ । यदि मैं श्रीकृष्णभक्तोंका दास होऊँ, यदि मुझपर उनकी कृपा हो और यदि सर्वत्र मेरी श्रीकृष्णबुद्धि हो तो मेरा यह मनोरथ पूर्ण हो जाय ॥ ४७-४८ ॥ नारदजी कहते हैं - बहुलाश्व! उनके इतना कहते ही श्रीकृष्णकुमार प्रद्युम्न तत्काल ब्रह्मचारीका रूप छोड़कर सबके देखते - देखते अपने साक्षात् स्वरूपसे प्रकट हो गये । हरिभक्तिनिष्ठ शिष्य उद्धव भी गद्गद हो गये । मेघोंके समान श्याम कान्ति, प्रफुल्ल कमलदलके समान विशाल नेत्र, लंबी - लंबी भुजाएँ, जगत् के लोगोंका मन हर लेनेवाला रूप सबके सामने प्रकट हो गया । उनके श्रीअङ्गोंपर पीताम्बर शोभा दे रहा था । उनका शोभासम्पन्न मुखारविन्दमण्डल नीली घुँघराली अलकावलियोंसे अलंकृत था । शिशिर ऋतुके बालरविके समान कान्तिमान् किरीट, दिव्य कुण्डल, करधनी और बाजूबंद आदिसे उनका दिव्य विग्रह उद्भासित हो रहा था । श्रीकृष्णकुमार प्रद्युम्नको इस प्रकार देखकर राजा धृतिने उनको हाथ जोड़कर साष्टाङ्ग प्रणाम किया ॥ ४ ९ –५१ ॥ जनक बोले- भूमन्! मेरा सौभाग्य महान् एवं अत्यन्त धन्य है । अहो! आज आपने मुझे अपने स्वरूपका साक्षात् दर्शन कराया । आज मेरी महिमा कयाधूकुमार प्रह्लादके समान बढ़ गयी । आज मैं अपने कुलसहित कृतार्थ हो गया ॥ ५२ ॥

श्रीप्रद्युम्नने कहा - नृपश्रेष्ठ! तुम धन्य हो, मेरे प्रभावको जाननेवाले भक्त हो । मैं इस समय तुम्हारे भक्तिभावकी परीक्षाके लिये ही यहाँ आया था । मैथिलेश्वर! आज ही तुम्हें मेरा सारूप्य प्राप्त हो जाय और इस लोकमें तुम्हारे बल, आयु और कीर्तिका अत्यन्त विस्तार हो॥५३-५४ ॥ नारदजी कहते हैं- राजन्! तुम्हारे पिता धृतिसे पूजित हो भक्तवत्सल भगवान् प्रद्युम्न आये हुए संतोंके सामने ही अपने शिविरकी ओर चले गये ॥ ५५ ॥

इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें विश्वजित्खण्डके अन्तर्गत नारद - बहुलाश्व - संवादमें ' जनकका उपाख्यान ' नामक सोलहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १६ ॥