गर्ग संहिता — पृष्ठ 361–370

गर्ग संहिता · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 361–370

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अध्याय ३४ ] अनिरुद्धके हाथसे आकाशमें उन वीरोंको पतिरूपमें चुनते समय वे सुन्दरियाँ परस्पर कलह कर बैठती थीं । कोई कहतीं -' ये मेरे योग्य हैं, तुमलोगोंके योग्य नहीं । ' इस तरह वे विह्वल - चित्त हो विवाद कर रही थीं । कुछ वीर धर्ममें तत्पर रहकर समरकी रङ्गभूमिसे तनिक भी विचलित नहीं हुए, इसलिये वे सूर्यमण्डलका भेदन करके दिव्य विष्णुपदको जा पहुँचे । कुछ दैत्य अनिरुद्धको अपने शत्रुके रूपमें देखकर भाग खड़े हुए । कुछ असुर अपना - अपना युद्ध छोड़कर दसों दिशाओंमें पलायन कर गये ॥ ११ - २१३ ॥ उसी समय गधेपर चढ़ा हुआ भयंकर महादैत्य वृक गर्जना करता तथा बार - बार धनुष टंकारता हुआ युद्ध करने आया । उस रणदुर्मद दैत्यने भी दस बाण मारकर अनिरुद्धके प्रत्यञ्चासहित धनुषको काट दिया । धनुष कट जानेपर महाबली अनिरुद्धने दूसरा धनुष हाथ लिया और दस बाण मारकर वृकके कोदण्डको भी खण्डित कर दिया । इसपर वृकके होठ रोषसे फड़क उठे । उसने त्रिशूल उठाकर जीभ लपलपाते हुए धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ अनिरुद्धसे कहा ॥ २२ - २५३ ॥ दैत्य बोला – तू पराक्रमी क्षत्रिय है और तूने आज मेरी सेनाका विनाश किया है, इसलिये मैं अभी तुझे मारे डालता हूँ । तू मेरा अद्भुत पराक्रम देख ले ॥२६ ॥

अनिरुद्धने कहा — दैत्य! जो लोग मुँहसे बढ़-बढ़कर बातें बनाते हैं, वे यहाँ कुछ नहीं कर पाते । मैं अभी तुम्हें मार डालूँगा । तुम मेरा उत्तम पराक्रम देखो । यदि मैं युद्धमें तुम्हें नहीं मार सकूँ तो मेरी शपथ सुन लो - मुझे ब्राह्मण, गौ, गर्भस्थ शिशु और बालकोंकी हत्याका सदा ही पाप लगे ॥ २७-२८ ॥ नारदजी कहते हैं- राजन्! गधेपर बैठे हुए महादुष्ट वृकने भी शपथ खाकर धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ अनिरुद्धपर त्रिशूलसे प्रहार किया । परंतु राजन्! प्रद्युम्ननन्दन अनिरुद्धने उस त्रिशूलको बायें हाथसे पकड़ लिया और सहसा उसीसे महाबली दैत्य वृकको घायल कर दिया । तब तो वह असुर क्रोधसे भर गया । उसने एक भारी गदा चलाकर सहसा अनिरुद्धके रथको वृक दैत्यका वध ३५५ बलपूर्वक चूर - चूर कर डाला । तब प्रद्युम्रकुमारने तीखी धारवाली तलवारसे शत्रुकी दोनों भुजाएँ उसी तरह काट डालीं, जैसे इन्द्रने वज्रसे शीघ्र ही पर्वतोंकी दोनों पाँखें काट दी थीं । तब वह बाहुविहीन दैत्य पैरोंसे पृथ्वीको कँपाता हुआ लपलपाती जीभसे युक्त भयंकर मुँह फैलाकर ऐसा दिखायी देने लगा, मानो वह सारे आकाशको ही पी जायगा । फिर विकराल दाढ़ोंवाले उस दैत्यराजने, जैसे मगरमच्छ किसी बड़े मत्स्यको निगल जाय, उसी प्रकार प्रद्युम्नकुमार अनिरुद्धको अपना ग्रास बना लिया ॥ २ ९ –३४३ ॥ महाराज! वे श्रीकृष्णके पौत्र थे, इसलिये दैत्यके पेटमें जानेपर भी श्रीकृष्णकी कृपासे मरे नहीं, मछलीके पेटमें पड़े हुए प्रद्युम्रकी भाँति बच गये । जैसे अघासुरके पेटमें जाकर भी श्रीकृष्ण और ग्वाल - बाल बच गये थे, जैसे वकासुरके उदरमें स्वयं श्रीकृष्ण नहीं मरे थे और जैसे वृत्रासुरके उदरमें जाकर भी इन्द्र बच गये थे, उसी प्रकार वृकासुरके पेटमें अनिरुद्धकी प्राण - रक्षा हो गयी ॥ ३५-३६३ ॥ विदेहराज! उस समय यादवोंकी सेनामें हाहाकार मच गया । तब बलदेवके छोटे भाई बलवान् गदने गदा लेकर उसे महाबली वृक दैत्यके मस्तकपर मारा । दैत्यका सिर फट गया और उससे रक्तकी बूँदें टपकने लगीं । रक्तकी धारासे उस विशालकाय दैत्यकी उसी तरह शोभा हुई, जैसे गेरुमिश्रित जलकी धारासे विन्ध्याचल सुशोभित होता है ॥ ३७ - ३ ९ ॥ तदनन्तर अर्जुनने अपनी तलवार लेकर अनायास ही उसके दोनों पैर काट डाले । पैर कट जानेपर वह पंख - कटे पर्वतकी भाँति धरतीपर गिर पड़ा । अनिरुद्ध अपनी तलवारसे उसका पेट फाड़कर बाहर निकल आये । जैसे इन्द्रने वज्रसे वृत्रासुरको मारा था, उसी प्रकार अनिरुद्धने अपनी तलवारसे उसका मस्तक काट डाला । उस समय यादव - सेनामें जय - जयकार होने लगी तथा देवताओं और मनुष्योंकी दुन्दुभियाँ बज उठीं । देवतालोग अनिरुद्धके ऊपर फूलोंकी वर्षा करने लगे । राजन्! यह अद्भुत वृत्तान्त मैंने तुमसे कह सुनाया; अब और क्या सुनना चाहते हो? ॥ ४०–४३ ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें विश्वजित्खण्डके अन्तर्गत नारद - बहुलाश्व - संवादमें ' वृक दैत्यका वध ' नामक चौंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३४ ॥

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पैंतीसवाँ अध्याय साम्बद्वारा कालनाभ दैत्यका वध बहुलाश्व बोले- मुने! आश्चर्य है, प्रद्युम्रकुमारने बड़ा अद्भुत युद्ध किया । महादैत्य वृकके मारे जानेपर फिर उस समराङ्गणमें क्या हुआ? ॥ १ ॥

नारदजीने कहा- राजन्! वृकको मारा गया देख महान् असुर कालनाभ बार - बार धनुष टंकारता हुआ सूअरपर चढ़कर रणभूमिमें आया । उस असुरने समराङ्गणमें अक्रूरको बीस, गदको दस, अर्जुनको दस, सात्यकिको पाँच, कृतवर्माको दस, प्रद्युम्नको सौ, अनिरुद्धको बीस, दीप्तिमान्‌को पाँच और साम्बको सौ बाण मारकर उन सबको घायल कर दिया । उसके बाणोंकी चोटसे दो घड़ीके लिये वे सभी वीर व्याकुल हो गये । उन सबके घोड़े भी मारे गये तथा रथ रणभूमिमें चूर - चूर हो गये । उसके हाथकी फुर्ती देखकर रुक्मिणीनन्दन प्रसन्न हो गये । उन्होंने कालनाभको समराङ्गणमें साधुवाद देकर उसकी भूरि - भूरि प्रशंसा की ॥२-६ ॥ तत्पश्चात् प्रद्युम्रने अपना धनुष लेकर उसपर एक बाण रखा । कोदण्डसे छूटे हुए उस बाणने उस दैत्यके विशालकाय सूअरको ऊपर उठाकर लाख योजन दूर स्वर्गलोककी सीमातक ले जाकर घुमाते हुए आकाशसे भयंकर गर्जना करनेवाले समुद्रमें गिरा दिया । तत्पश्चात् साक्षात् भगवान् प्रद्युम्नने दूसरे बाणका संधान किया । उस बाणने भी महाबली वज्र- सदृश गदासे हाथी, रथ, घोड़े और पैदल वीरोंको वह बड़े वेगसे उसी प्रकार धराशायी करने लगा, जैसे आँधी वृक्षोंको गिरा देती है; किन्हींको दोनों हाथोंसे उठाकर वह बलपूर्वक आकाशमें फेंक देता था । राजन्! वे आकाशसे पृथ्वीपर वर्षाके ओलोंकी भाँति गिरते थे । तब जाम्बवतीकुमार साम्बने गदा लेकर महान् असुर कालनाभ मस्तकपर गहरी चोट पहुँचायी । रणमण्डलके भीतर गदाओंद्वारा उन दोनों वीरोंमें घोर युद्ध होने लगा । वे दोनों ही गदाएँ आगकी चिनगारियाँ छोड़ती हुई परस्पर टकराकर चूर - चूर हो गयीं । फिर वे दोनों वीर दूसरी गदाएँ लेकर युद्धके लिये खड़े हुए । उस समय कालनाभने जाम्बवतीकुमार साम्बसे कहा— ' मैं एक प्रहारसे ही तुम्हारा काम तमाम कर सकता हूँ, इसमें संशय नहीं है । ' तब उस रणभूमिमें साम्ब बोले - ' पहले तुम मेरे ऊपर प्रहार करो । ' तब कालनाभने साम्बके मस्तकपर गदासे चोट की, किंतु जाम्बवतीनन्दन साम्बने गदाके ऊपर गदा रोक ली और अपनी गदासे कालनाभ दैत्यकी छातीमें आघात किया । उस गदाकी चोटसे दैत्यकी छाती फट गयी और वह मुँहसे रक्त वमन करता हुआ प्राणशून्य हो वज्रके मारे हुए पर्वतकी भाँति पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ १२–२० ॥ कालनाभको ऊपर ले जाकर घुमाते हुए बलपूर्वक नरेश्वर! तब तो जय जयकार होने लगी और चन्द्रावतीपुरीमें पटक दिया । वहाँ गिरनेपर सत्पुरुष साम्बको साधुवाद देने लगे । देवताओं और कालनाभके मनमें कुछ घबराहट हुई । वह दैत्यराज मनुष्योंकी दुन्दुभियाँ एक साथ ही बज उठीं । लाख भारकी बनी हुई भारी गदा हाथमें लेकर पुनः देवतालोग साम्बकी सेनाके ऊपर फूल बरसाने लगे, रणभूमिमें आ पहुँचा और यादव - सेनाका विनाश विद्याधरियाँ नाचने लगीं और गन्धर्वगण सानन्द करने लगा॥७–११३ ॥ गीत गाने लगे ॥ २१-२२ ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें विश्वजित्खण्डके अन्तर्गत नारद- बहुलाश्व - संवादमें ' कालनाभ दैत्यका ' वध ' नामक पैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३५ ॥

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छत्तीसवाँ अध्याय दीप्तिमान्द्वारा महानाभका वध नारदजी कहते हैं— राजन्! कालनाभ दैत्यके गिर जानेपर दैत्यसेनामें बड़ा भारी कोलाहल मचा । तब महानाभ नामक दैत्य ऊँटपर चढ़कर समराङ्गणमें आया । वह मायावी दैत्यराज मुँहसे आग उगलने लगा । उस आगसे दसों दिशाएँ प्रज्वलित हो उठीं और धरतीके वृक्ष जलने लगे । महाराज! वीरोंके कवच, पगड़ी, कटिबन्ध और अँगरखा आदि मूँजके फूल ( भुआड़ी ) तथा रूईके समान जल उठे । राजन्! समुद्रतटवर्ती नगरोंके बने हुए पीले, लाल, सफेद, काले, चितकबरे और सूक्ष्म झूलों तथा हेम - रत्नखचित कश्मीरी कालीनोंसहित बहुत - से हाथी उस समराङ्गण-में दावानलसे दग्ध होनेवाले वृक्षोंसहित पर्वतोंकी भाँति जल रहे थे । मस्तकपर धारण कराये गये रत्नों, चामरों, हारों और सुनहरे साज - बाजोंके साथ जलते हुए घोड़े उस युद्धभूमिमें दावाग्निसे दग्ध होनेवाले हरिणोंकी भाँति उछलते और चौकड़ी भरते थे ॥ १-६ ॥ अपनी सेनाको भयसे व्याकुल देख श्रीकृष्णकुमार दीप्तिमान्ने उस मायामयी आगको बुझानेके लिये पार्जन्यास्त्रका संधान किया । फिर तो उस बाणसे प्रलयकालके मेघोंकी भाँति नील जलधर प्रकट हुए और भयंकर गर्जना करते हुए जलकी धाराएँ बरसाने लगे । महाराज! उस धारा - सम्पातसे भूतलपर पावस ऋतु प्रकट हो गयी । नर कोकिल, मादा कोकिल, मोर और सारस आदि पक्षी अपनी मधुर बोलियाँ बोलने लगे । मेढक भी टर - टर करने लगे । इन्द्रगोप ( वीरबहूटी ) नामक लाल रंगके झुंड के झुंड कीट जहाँ - तहाँ शोभित होने लगे । मैथिलेन्द्र! इन्द्रधनुष और विद्युन्मालासे आकाश उद्दीप्त दिखायी देने लगा ॥ ७-१० ॥ इस प्रकार उस आग बुझ जानेपर महान् असुर इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें विश्वजित्खण्डके महानाभने दीप्तिमान्‌के ऊपर बड़े रोषसे अपना तीखा त्रिशूल चलाया । सर्पकी भाँति अपनी ओर आते हुए उस त्रिशूलको रोहिणीपुत्र दीप्तिमान्‌ने युद्धभूमिमें तलवारसे उसी प्रकार काट डाला, जैसे गरुडने अपनी चोंचसे किसी नागके दो टुकड़े कर दिये हों । महानाभका वाहन उद्भट ऊँट उन्हें दाँतसे काटने के लिये आगे बढ़ा । तब दीप्तिमान्‌ने समराङ्गणमें उसके ऊपर अपनी तलवारसे चोट की । खड्गसे उसकी गर्दन कट गयी और वह दो टूक हो पृथ्वीपर गिर पड़ा । महानाभके देखते - देखते उस ऊँटके प्राण - पखेरू उड़ गये । तब दैत्य महानाभ बड़े वेगसे हाथीपर जा चढ़ा और हाथमें शूल लेकर व्योममण्डलको अपनी गर्जना-से गुँजाता हुआ फिर युद्धके लिये आ गया । श्रीकृष्ण-नन्दन दीप्तिमान् चञ्चल और काले रंगके सिंधी घोड़ेपर चढ़कर विद्युत् के समान कान्तिमान् खड्गसे अद्भुत शोभा पाने लगे । उन्होंने घोड़ेके पेटमें एड़ लगायी और वह भूतलसे उछलकर हाथीके कुम्भस्थलपर इस प्रकार जा चढ़ा, मानो कोई सिंह पर्वतके शिखरपर बड़े वेगसे चढ़ गया हो ॥ ११ - १७ ॥ फिर श्रीकृष्णकुमार दीप्तिमान्ने तीखी धारवाले खड्गसे महानाभके मस्तकको सहसा धड़से अलग कर दिया । बाणवर्षा करती हुई उस दुरात्माकी सेनाका दीप्तिमान्ने अपनी तलवारसे उसी तरह संहार कर डाला, जैसे सिंह हाथियोंके झुंडको रौंद डालता है । कुछ दैत्य खड्गसे मारे गये, शेष रणभूमिसे पलायन कर गये । देवता दीप्तिमान्‌के मस्तकपर फूलोंकी वर्षा करने लगे, किंनर और गन्धर्व गाने लगे तथा अप्सराओंके समुदाय नृत्य करने लगे । ऋषियों, मुनियों और देवताओंने श्रीहरिके पुत्रका स्तवन किया ॥ १८ - २१ ॥ अन्तर्गत नारद - बहुलाश्व - संवादमें ' महानाभका ' वध ' नामक छत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३६ ॥

पृष्ठ 364

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सैंतीसवाँ अध्याय श्रीकृष्ण - पुत्र भानुके हाथसे हरिश्मश्रु दैत्यका वध नारदजी कहते हैं— राजन्! महानाभ मारा गया, यह सुनकर तथा दैत्यसेना पलायन कर गयी - यह देखकर, मगरमच्छपर चढ़ा हुआ दैत्य हरिश्मश्रु समरभूमिमें आया । उस समय हरिश्मश्रु दैत्यके ओठ फड़क रहे थे, उसने यादवोंके सुनते हुए अत्यन्त कठोर वचन कहा ॥१-२ ॥ हरिश्मश्रु बोला – अरे! तुम सब लोग मेरे शक्तिके सामने क्या हो? स्वल्प- पराक्रमी मनुष्य ही तो हो । दीनहीन होनेपर भी केवल अस्त्र - शस्त्रोंके बलपर जीतते हो । तुम जैसे लोगोंमें पुरुषार्थ ही क्या है? यदि तुम्हारे दलमें कोई भी बलवान् हो तो मेरे साथ बिना अस्त्र - शस्त्र के मल्लयुद्ध करे, जिससे तुम्हारे पौरुषका पता लगे ॥३-४ ॥ नारदजी कहते हैं - दैत्यकी ऐसी बात सुनकर और उसके अत्यन्त उद्भट शरीरको देखकर सब लोग परस्पर उसकी प्रशंसा करते हुए मौन रह गये - उसे कोई उत्तर न दे सके । तब सत्यभामाके बलवान् पुत्र भानु मन - ही - मन भगवान् श्रीकृष्णका स्मरण करते हुए रणभूमिमें अस्त्र - शस्त्र त्यागकर सहसा उसके सामने खड़े हो गये । राजन्! महाबली हरिश्मश्रु तिमिंगिल ( मगरमच्छ ) की पीठसे उतरकर भुजाओंपर ताल ठोंकता हुआ सयत्र होकर सामने खड़ा हो गया । जैसे दो हाथी वनमें दाँतोंद्वारा परस्पर प्रहार करते हों, उसी प्रकार वे दोनों वीर बाँहोंसे बाँह मिलाकर एक दूसरेको बलपूर्वक ढकेलने लगे॥५–८ ॥ राजराजेन्द्र! उस दैत्यने भानुको अपनी भुजाओंसे सौ योजन पीछे उसी प्रकार ढकेल दिया, जैसे एक सिंह दूसरे सिंहको बलपूर्वक पछाड़ देता है । तब पुनः श्रीकृष्णकुमारने महान् असुर हरिश्मश्रुको बलपूर्वक सहसा सहस्र योजन पीछे ढकेल दिया । तत्पश्चात् दैत्यराज हरिश्मश्रुने अपनी बाँहको भानुके कंधेमें फँसाकर उन्हें अपनी कमरपर ले लिया और फिर घुटना पकड़कर उन्हें पृथ्वीपर पटक दिया । तब भानुने अपने बाहुबलसे उसे पीठपर ले लिया और उसकी जाँघें पकड़कर उस दैत्यको धरतीपर दे मारा । तदनन्तर वे दोनों पुनः उठकर भुजाओंपर ताल ठोंकते हुए खड़े हो गये । राजन्! वे दोनों फुर्ती दिखाते हुए गरुड और सर्पकी भाँति एक - दूसरेसे लड़ने लगे । दैत्यने अपने बाहुबलसे श्रीकृष्णनन्दन भानुके पैर पकड़कर उन्हें आकाशमें लाख योजन दूर फेंक दिया । आकाशसे गिरनेपर भानुको मन - ही - मन कुछ व्याकुलता हुई; किंतु जैसे शैल - शिखरसे गिरकर प्रह्लाद बच गये थे, उसी प्रकार श्रीहरिकी कृपासे भानुकी भी रक्षा हो गयी । तब श्रीकृष्णकुमारने हरिश्मश्रुकी लंबी दाढ़ी पकड़कर उसे घुमाया और आकाशमें लाख योजन दूर फेंक दिया । आकाशसे गिरनेपर उसके मनमें भी कुछ व्याकुलता हुई । फिर उसने दाढ़ीको अपने मुँहपर सँभालकर भानुको एक मुक्का मारा॥९ –१७ ॥ राजन्! फिर दो घड़ीतक उन दोनोंमें मुक्का-मुक्कीका युद्ध चलता रहा । हरिश्मश्रुका अङ्ग अङ्ग पिस उठा । तब उसने भानुके मस्तकपर बड़े वेगसे पत्थर मारा । तब तो भानुके क्रोधकी सीमा न रही । उन्होंने लाल आँखें करके एक वृक्ष उखाड़ा और उसे दैत्यके मस्तकपर दे मारा । हरिश्मश्रुने भी एक वृक्ष लेकर उसे भानुके मस्तकपर चलाया । उस समय उस महा-दैत्यके नेत्र लाल हो गये थे और वह क्रोधसे मूर्च्छित होकर अपना विवेक खो बैठा था । उसने एक हाथीकी सूँड़ पकड़कर उस हाथीके द्वारा ही भानुपर प्रहार किया । भानुने एक दूसरा हाथी लेकर उसके चलाये हुए हाथीको हाथमें पकड़ लिया और महादैत्य हरिश्मश्रु पर दृढ़तापूर्वक हाथीसे ही प्रहार किया । वह हाथी चीत्कार कर उठा । दैत्यने उस हाथीको लेकर धरतीपर पटक दिया और उसके दोनों दाँत उखाड़कर उन्हींसे भानुको चोट पहुँचायी । इसी समय भानुको सम्बोधित करके आकाशवाणी हुई- ' इस दैत्यकी मृत्यु इसकी दाढ़ीमें ही है । यह महान् असुर

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अध्याय ३८ ] प्रद्युम्न और शकुनिके भगवान् शिवके दिये हुए वरदानसे अत्यन्त प्रबल हो गया है'॥१८–२३३ १ ॥ महाराज! आकाशवाणीका यह कथन सुनकर भानु क्रोधसे भरकर दौड़े । उन्होंने दोनों हाथोंसे दैत्यके पाँव पकड़कर बारंबार गर्जना करते हुए उसे घुमाया और सबके देखते - देखते भूपृष्ठपर उसी तरह पटक दिया, जैसे बालक कमण्डलुको गिरा देता है॥२४-२५३ ॥ फिर हाथोंसे बल लगाकर उसके मुँहसे दाढ़ी उखाड़ ली और महान् असुरके मस्तकपर एक मुक्का इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें विश्वजित्खण्डके घोर युद्धका वर्णन ३५ ९ मारा । नृपेश्वर! फिर तो दैत्य हरिश्मश्रुकी तत्काल मृत्यु हो गयी और मनुष्यों तथा देवताओंके विजय-सूचक नगारे एक साथ ही बजने लगे । जय - जयकार -की ध्वनि सब ओर व्याप्त हो उठी और देवनायक नाचने लगे ॥ २६–२८ ॥ राजन्! देवता प्रसन्न हो पुष्पवर्षा करने लगे । इस प्रकार मैंने तुमसे श्रीकृष्णके पुत्रोंके परम अद्भुत पराक्रमका वर्णन किया है । अब और क्या सुनना चाहते हो? ॥ २ ९ -३० ॥ अन्तर्गत नारद - बहुलाश्व - संवादमें ' हरिश्मश्रु दैत्यका वध ' नामक सैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३७ ॥

अड़तीसवाँ अध्याय प्रद्युम्न और शकुनिके बहुलाश्वने पूछा — मुनिश्रेष्ठ! हरिश्मश्रु आदि भाइयोंको मारा गया जानकर महान् असुर शकुनिने आगे क्या किया? ॥ १ ॥

नारदजीने कहा- राजन्! जानेपर शकुनि क्रोधसे अचेत - सा की मृत्युसे उत्पन्न हुए शोकमें दैत्योंको सम्बोधित करके उसने शकुनि बोला- हे पौलोम तुम सब लोग मेरी बात सुनो । अद्भुत है, उसके कारण क्या सकता? मेरे भाई कालनाभने हरिश्मश्रुके मारे हो गया । भ्राताओं डूबकर समराङ्गणमें कहा ॥ २ ॥

और कालकेयगण! अहो! दैवका बल उलट - फेर नहीं हो पूर्वकालमें समुद्र-मन्थनके अवसरपर यमराजको जीत लिया था, परंतु दैववश वह भी यहाँ मनुष्योंके हाथसे मारा गया । शम्बरने साक्षात् सूर्यदेवको परास्त किया था, किंतु वह बालक श्रीकृष्णकुमारके हाथसे पराजित हुआ । उत्कच महाबलियोंमें भी महाबली था और इन्द्रपर भी विजय पा चुका था, परंतु वह भी बालकृष्णके हाथों मारा गया, यह बात मैंने नारदजीके मुखसे सुनी थी । पहले समुद्र मन्थनके समय जिसने समस्त असुरोंके समक्ष अग्निदेवको पराजित किया था, वह मेरा भाई हृष्ट भी एक मनुष्यद्वारा मार गिराया गया । जिसके घोर युद्धका वर्णन सामनेसे पूर्वकालमें वरुण देवता भी भयभीत हो युद्धसे पीठ दिखाकर भाग गये थे, उस भूत - संतापनको भी तुच्छ पराक्रमवाले मनुष्योंने मार डाला । जिसने पहले महायुद्धमें अपने पराक्रमद्वारा भगवान् शिवको संतुष्ट किया था, उस वृकको यहाँ युद्धमें तुच्छ वृष्णिवंशियोंने मार गिराया । मेरे भाई महानाभने देवलोकमें वायुको भी परास्त किया था, किंतु यहाँ इस समय उसको भी यदुकुलके मनुष्योंने मारा डाला । हा दैव! जिसने स्वर्गलोकमें बलवान् इन्द्रपुत्रको परास्त किया था, उस हरिश्मश्रुको भी यहाँ मानवोंने मार गिराया । इसलिये मैं शपथ खाकर कहता हूँ कि इस पृथ्वीको मैं यादवोंसे शून्य कर दूँगा ॥ ३-११ ॥ जरासंध, शाल्व, बुद्धिमान् दन्तवक्र तथा शिशुपाल - ये मेरे मित्र हैं । सुतल लोकसे प्रचण्ड-पराक्रमी दानवोंको बुलाकर इन मित्रों तथा आप -लोगोंके साथ मैं देवताओंको जीतनेके लिये जाऊँगा और उस युद्धमें बाणासुर भी हमारे साथ होगा । प्रद्युम्न आदि जो उद्भट यादव हैं, उन दुरात्माओंको जीतकर और स्त्रियोंसहित देवताओंको बाँधकर मैं मेरुपर्वतकी गुफाके मुँहमें डाल दूँगा । गौ, ब्राह्मण, देवता, साधु, वेद, तपस्वी, यज्ञ, श्राद्ध, तितिक्षु तथा

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३६० गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ विश्वजित्खण्ड नाना तीर्थोंका सेवन करनेवाले धर्मात्माओंको भी मैं निस्संदेह मार डालूँगा । फिर सुखपूर्वक विचरूँगा । देवताओं पर विजय पानेवाला महाबली पराक्रमी राजा कंस धन्य था । वह मेरा मित्र और परम सुहृद् था । खेदकी बात है कि आज वह इस भूतलपर विद्यमान नहीं है॥१२–१६३ ॥ नारदजी कहते हैं - राजन्! यों कहकर महाबली दानवराज दैत्य शकुनि युद्धमें सहसा प्रद्युम्रके सामने आ गया । लाख भार लोहेके समान सुदृढ़ एवं विशाल धनुष लेकर उसने उसकी प्रत्यञ्चाको टंकारित किया । उसका वह धनुष मयासुरका बनाया हुआ था । उस धनुषकी टंकार - ध्वनिसे दिग्गजोंके कान बहरे हो गये, अनेक पर्वत ढह गये और समुद्र अपनी मर्यादासे विचलित हो उठे । नरेश्वर! सारा ब्रह्माण्ड गूँज उठा और भूमण्डल काँपने लगा । उसकी प्रत्यञ्चाके घोर

शब्दसे विह्वल हो योद्धाओंके ऊपर योद्धा गिर पड़े ।

हाथी रणभूमि छोड़कर भागने लगे और घोड़े युद्ध -भूमिमें उछलने - कूदने लगे ॥१७–२१ ॥

इस प्रकार सब लोग अचानक भयसे घबराकर भागने लगे । तब महान् बल - पराक्रमसे युक्त गद आदि वीर रथपर बैठकर धनुषकी टंकार करते हुए वहाँ आये । शकुनिने संग्रामभूमिमें अर्जुनको दस बाण मारे । इससे रथसहित गाण्डीवधारी अर्जुन चार कोस दूर जाकर गिरे । रणदुर्मद शकुनिने गदके ऊपर बीस बाणोंसे प्रहार किया । राजन्! उसने गदको रथसहित व्योममण्डलमें फेंक दिया और जोर - जोरसे गर्जना करने लगा । राजन्! उस वीरने रथसहित धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ अनिरुद्धको चालीस बाणोंसे बींध डाला और अपने सिंहनादसे आकाश - मण्डलको निनादित कर दिया । अनिरुद्धका घोड़ोंसहित रथ सोलह कोस दूर जा गिरा । विदेहराज! शकुनिने समराङ्गणमें साम्बको सौ बाण मारे । राजन्! साम्ब भी रथसहित आकाशमें जा समरभूमिसे बत्तीस योजन दूर मार्गपर जा गिरे ॥२२ – २७३ ॥ तत्पश्चात् प्रद्युम्नको सामने आया देख शकुनि क्रोधसे भर गया तथा उसने रणक्षेत्रमें सहसा बाण -समूहोंसे उन्हें घायल कर दिया । राजन्! प्रद्युम्नका रथ दो घड़ीतक चक्कर काटता हुआ सौ कोस दूर पृथ्वीपर इस प्रकार जा गिरा, मानो किसीके द्वारा कमण्डलु फेंक दिया गया हो । शकुनिका बल देखकर समस्त यादव चकित हो उठे । जैसे हाथी पहाड़से सिर टकराते हैं, उसी प्रकार समस्त यादव नाना प्रकारके अस्त्र - शस्त्रों-द्वारा उस दैत्यको घायल करने लगे । गद, अर्जुन, अनिरुद्ध एवं जाम्बवतीकुमार साम्ब अपने धनुषकी टंकार करते हुए पुनः युद्धभूमिमें आ गये । राजन्! तदनन्तर महाबाहु प्रद्युम्न वायुके समान वेगशाली रथपर बैठकर धनुषकी टंकार करते हुए युद्ध - मण्डलमें आ पहुँचे । शकुनिके धनुषकी प्रत्यञ्चा प्रलयकालके समुद्रोंके टकरानेके शब्द जैसी भयंकर टंकार करती थी । श्रीकृष्णकुमारने दस बाण मारकर उसे काट दिया । फिर सहस्र बाणसे उसके सहस्र घोड़ोंको, सौ विशिखाँद्वारा उसके रथको और बीस बाण मारकर उसके सारथिको पृथ्वीपर गिरा दिया । तब उसने रथको उठाकर उसमें दूसरे घोड़े जोते और दूसरा सारथि बैठाकर वह दैत्यराज पुनः रथपर आरूढ़ हुआ । राजन्! तत्पश्चात् उसने प्रचण्ड पराक्रमसे युक्त कोदण्डपर प्रत्यञ्चा चढ़ायी । इसके बाद पीठपर पड़े हुए तरकससे सौ बाण खींचकर उसने धनुषपर रखे और कानतक खींचकर प्रद्युम्नसे कहा ॥ २८–३७ ॥ शकुनि बोला- तुम सब लोगोंमें मेरे मुख्य शत्रु तथा मदमत्त योद्धा हो, अतः पहले तुम्हारा ही वध करूँगा । तत्पश्चात् स्वस्थ तेजवाले यादवोंकी सारी सेनाका संहार कर डालूँगा ॥३८ ॥

प्रद्युम्नने कहा - असुर! प्राणियोंकी आयु सदा कालके बलसे नष्ट होती या बीतती है । वह बारंबार छायाकी तरह आती - जाती है । जैसे बादलोंकी पङ्कि आकाशमें वायुकी शक्तिसे आती - जाती है, उसी तरह सुख - दुःख भी कालकी प्रेरणासे आता - जाता रहता है । जैसे किसान बोयी हुई खेतीको सींचता है और जब वह पक जाती है, तब स्वयं उसे हँसुएसे सब ओरसे काट लेता है, उसकी प्रकार दुर्जय काल अपनी ही रची हुई देहधारियोंकी श्रेणीको अपने गुणोंद्वारा पालता है और फिर समय आनेपर उसका संहार कर डालता है । जीव तो अहंकारसे मोहित होकर ही ऐसा मानता है कि

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अध्याय ३ ९ ] शकुनिके मायामय अस्त्रोंका प्रद्युम्नद्वारा निवारण ३६१ ' मैं यह करूँगा, मैं यह करता हूँ; यह मेरा है और वह तेरा है; मैं सुखी हूँ, दुःखी हूँ और ये मेरे सुहृद् हैं ' इत्यादि ॥ ३ ९ -४१ ॥ शकुनि बोला— नृपश्रेष्ठ! तुम धन्य हो, जो अपनी वाणीद्वारा ऋषि - मुनियोंका अनुकरण करते हो । तीन गुणोंके अनुसार पृथक् - पृथक् जो प्राणियोंका स्वभाव है, उसका उनके लिये त्याग करना कठिन होता है ॥ ४२ ॥

नारदजी कहते हैं— मैथिलेन्द्र! युद्धस्थलमें इस प्रकार परस्पर सत्सङ्गकी बातें करते हुए प्रद्युम्न और शकुनि इन्द्र और वृत्रासुरकी भाँति युद्ध करने लगे । शकुनिके धनुषसे छूटे हुए विशिख सूर्यकी किरणोंके समान चमक उठे, परंतु श्रीकृष्णकुमारने एक ही बाणसे उन सबको काट दिया- ठीक उसी तरह, जैसे एक ही कटुवचनसे मनुष्य पुरानी मित्रताको भी खण्डित कर देता है । तब रण- दुर्मद शकुनिने लाख भारकी बनी भारी और विशाल गदा हाथमें लेकर प्रद्युम्नके मस्तक -पर दे मारी । साक्षात् भगवान् प्रद्युम्नने अपनी वज्र-सरीखी गदासे उसकी गदाके सौ टुकड़े कर दिये-उसी प्रकार जैसे कोई डंडा मारकर काँचके बर्तन टूक टूक कर दे । तब रोषके आवेशसे युक्त हुए उस दैत्यने एक चमचमाता हुआ त्रिशूल हाथमें लिया और उच्च-स्वरसे गर्जना करते हुए उसके द्वारा प्रद्युम्नके मस्तकपर प्रहार किया । श्रीकृष्णकुमार प्रद्युम्नने भी त्रिशूल मारकर दैत्यके त्रिशूलके सौ टुकड़े कर डाले । इसके बाद रुक्मिणीनन्दनने एक तीखी बरछी लेकर शकुनिके ऊपर चलायी ॥ ४३–४८ ॥ बरछीसे उसकी छाती छिद गयी । इससे उसके मनमें कुछ घबराहट हुई, तथापि उसने समराङ्गणमें प्रद्युम्रको परिघसे पीट दिया । तब बलवान् रुक्मिणी- कुमारने यमदण्ड लेकर दैत्यके उस अद्भुत परिघको उसके द्वारा चूर - चूर कर डाला । इतना ही नहीं, वेगपूर्वक चलाये हुए उस यमदण्डसे सहसा उसके घोड़ोंको, सारथिको और उस दिव्य रथको भी धराशायी कर दिया । नरेश्वर! सारथिके मर जानेपर और घोड़े - सहित रथ एवं परिघके भी चूर - चूर हो जानेपर उस महादैत्यने रोषपूर्वक खड्ग हाथमें लिया । मैथिल! जैसे गरुड किसी सर्पके दो टुकड़े कर दे, उसी प्रकार महावीर प्रद्युम्नने यमदण्डके द्वारा उसके खड्गके दो टुकड़े कर डाले । इसके बाद श्रीकृष्णकुमारने उसी यमदण्डसे दैत्यके कंधेपर प्रहार किया । उसके आघातसे शकुनिको तत्काल मूर्च्छा आ गयी । तदनन्तर क्रोधसे भरे हुए प्रद्युम्नने तत्काल दैत्य- सेनाके भीतर प्रवेश किया । जैसे दावानल जंगलको जलाता है, उसी प्रकार वे उस सेनाके बड़े - बड़े वीरोंको धराशायी करने लगे । माधव प्रद्युम्नने उस यमदण्डके द्वारा यमराजकी भाँति हाथियों, घोड़ों, रथों और उन आततायी दैत्योंको मार गिराया । दैत्योंके पैर, मुख, अङ्ग और भुजाएँ छिन्न - भिन्न हो गयीं । वे समस्त दैत्य और दानव कालके गालमें चले गये । भीम पराक्रमी प्रद्युम्नको यमराजका रूप धारण किये देख कितने ही दैत्य युद्धभूमिसे अपना - अपना स्थान छोड़कर दसों दिशाओंमें भाग गये ॥ ४ ९ –५८ ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें विश्वजित्खण्डके अन्तर्गत नारद - बहुलाश्व - संवादमें ' शकुनि और प्रद्युम्नके युद्धका वर्णन ' नामक अड़तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३८ ॥

उनतालीसवाँ अध्याय शकुनिके मायामय अस्त्रोंका प्रद्युम्नद्वारा निवारण तथा उनके चलाये हुए श्रीकृष्णास्त्रसे युद्धस्थलमें भगवान् श्रीकृष्णका प्रादुर्भाव नारदजी कहते हैं- महाराज! शकुनिने फिर राजन्! उस प्रचण्डविक्रमशाली कोदण्डपर तीखा उठकर जब अपनी सेनाका विनाश हुआ देखा, तब बाण रखकर बलवान् दैत्यराज शकुनिने रणभूमिमें

उसने लाख भारके समान भारी धनुष हाथमें लिया । प्रद्युम्नसे कहा ॥ १-२ ॥

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३६२ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ विश्वजित्खण्ड शकुनि बोला - राजन्! इस भूतलपर कर्म ही प्रधान है । महत् कर्म ही साक्षात् गुरु तथा सामर्थ्य -शाली ईश्वर है । यहाँ कर्मसे ही उच्चता और नीचता प्रकट होती है तथा उस कर्मसे ही विजय और पराजय होती है । जैसे सहस्त्रों गौओंके बीचमें छोड़ा हुआ बछड़ा सत्पुरुषोंके देखते - देखते अपनी माताको ढूँढ़ लेता है, वैसे ही जिसने भी शुभाशुभ कर्म किया है, उसके द्वारा किया हुआ कर्म सहस्रों मनुष्योंके होनेपर भी उस कर्ताको ही प्राप्त होता है । इसके अनुसार मैं सुदृढ़ कर्म करके उसके द्वारा अपने शत्रुस्वरूप तुमको अवश्य जीत लूँगा । इसके लिये मैंने शपथ खायी है । तुम भी शीघ्र ही इसका प्रतीकार करो, जिससे इस भूमिपर तुम्हारी पराजय न हो॥३–५ ॥ प्रद्युम्न ने कहा- दैत्यराज! यदि तुम कर्मको प्रधान मानते हो तो यह भी जान लो कि कालके बिना उसका कोई फल नहीं होता । कर्म करनेपर भी उसके पाकया परिणाममें कभी - कभी विघ्न उपस्थित हो जाता है, अतः श्रेष्ठ विद्वान् पुरुषोंने सदा काल या समयको ही बलिष्ठ माना है । दैत्यराज! सुनो, कर्मके परिपाकका अवसर आनेपर भी कर्ताके बिना उसका फल कदापि नहीं प्राप्त होता । इसलिये श्रेष्ठ पुरुष कर्ताको ही प्रधान मानते हैं, कर्म और कालको नहीं । कुछ लोग योग ( उपाय ) को ही प्रधान मानते हैं; क्योंकि उसके बिना भूतलपर कोई भी कर्म और उसके फलकी सिद्धि नहीं हो सकती । काल, कर्म और कर्ताके रहते हुए भी योगके बिना सब व्यर्थ हो जाता है । योग, कर्म, कर्ता और कालके होते हुए भी विधिज्ञानके बिना सब व्यर्थ हो जाता है, जैसे परिणामके प्रकार आदिका विचार किये बिना फलका यथावत् साधन नहीं होता । योग, कर्म, कर्ता, काल और विधिज्ञानके होनेपर भी ब्रह्म-पुरुषके बिना कुछ भी नहीं होता । इसलिये मैं उन परिपूर्णतम भगवान्‌को नमस्कार करता हूँ, जिनसे अखिल विश्वका ज्ञान होता है ॥६- १० ॥ शकुनि बोला- हे महाबाहु प्रद्युम्न! तुम तो साक्षात् ज्ञानके निधि हो, तुम्हारे दर्शनमात्रसे मनुष्य कृतार्थ हो जाता है । जो तुम्हारा सङ्ग पाकर प्रतिदिन तुमसे वार्तालाप करते हैं, उनकी महिमाका वर्णन करनेमें तो चार मुखवाले ब्रह्माजी भी समर्थ नहीं हैं ॥ ११ - १२ ॥ नारदजी कहते हैं — राजन्! यों कहकर मायावी और बलवान् दैत्यराज शकुनिने मयासुरसे सीखे हुए रौरवास्त्रका संधान किया । राजन्! उस अस्त्रसे बड़े-बड़े नाग, दंदशूक और विषैले बिच्छू करोड़ोंकी संख्यामें निकले । वे सब - के - सब बड़े विकराल और रौद्ररूपधारी थे । उनके द्वारा डसी हुई सारी सेना उनके फुफकारोंसे मतवाली हो गयी । यह देख परम बुद्धिमान् प्रद्युम्नने गरुडास्त्रका संधान किया । उस अस्त्रसे कोटि-कोटि गरुड, नीलकण्ठ, मोर तथा अन्य भयानक पक्षी उस दैत्यके देखते - देखते प्रकट हुए । उन पक्षियोंने उस युद्धमें नागों, दंदशूकों तथा बिच्छुओंको निगल लिया । फिर वे तीखी चोंच और बड़ी पाँखवाले पक्षी क्षणभरमें अदृश्य हो गये ॥ १३ – १७ ॥ राजन्! तब उस रणदुर्मद दैत्य शकुनिने भी राक्षसी, गान्धर्वी, गौह्यकी और पैशाची मायाका संधान किया । उन बाणोंसे निकले हुए विकराल और काले रूपवाले करोड़ों भूत और प्रेत वहाँ अङ्गारोंकी वर्षा करने लगे । उस तामसी और पैशाची मायाको जानकर युद्धाभिलाषी श्रीकृष्णकुमार मीनध्वज प्रद्युम्नने सत्त्वास्त्रका संधान किया । राजन्! उस बाणसे करोड़ों विष्णुपार्षद प्रकट हुए, जिन्होंने उस पैशाची मायाको वैसे ही नष्ट कर दिया, जैसे गरुड नागिनको नष्ट कर दे । तब उस मायावी दैत्यने पुनः गौह्यकी मायाका संधान किया, जिससे गर्जन- तर्जन करते हुए करोड़ों भयानक मेघ प्रकट हुए । ये मल, मूत्र, रक्त, मेदा, मज्जा और हड्डीकी वर्षा करने लगे । महाराज! उस गौह्यकी मायाको जानकर भगवान् प्रद्युम्न हरिने उसके विनाशके लिये बाणपर शूकरास्त्रका संधान किया । उस बाणसे घर्घर ध्वनि करनेवाले भगवान् यज्ञवाराहका प्राकट्य हुआ । वे वेगसे अपनी सटाएँ ( गर्दनके बाल ) हिलाकर तीखी दाढ़से बादलोंको विदीर्ण करते हुए उसी प्रकार शोभा पाने लगे, जैसे मत्त गजराज बाँसके वृक्षोंको तोड़ता - फोड़ता शोभा पाता है ॥ १८-२५ ॥ तदनन्तर उस दैत्यने रणमण्डलमें गान्धर्वी माया

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अध्याय ३ ९ ] शकुनिके मायामय अस्त्रोंका प्रद्युम्नद्वारा निवारण ३६३ प्रकट की । युद्ध अदृश्य हो गया और वहाँ सोनेके करोड़ों महल खड़े हो गये । सत्पुरुषोंके देखते - देखते वे स्वर्णमय भवन वस्त्रों और अलंकारोंसे सज गये । वहाँ विद्याधरियाँ और गन्धर्व नाचने - गाने लगे । नरेश्वर! मृदङ्ग, ताल और वाद्योंके मोहक शब्दों तथा रागयुक्त हाव - भाव और कटाक्षोंद्वारा लोगोंको संतुष्ट करती हुई सोलह वर्षकी - सी अवस्थावाली कमलनयनी, मनोमोहिनी, सुन्दरी रमणियाँ वहाँ प्रकट हो गयीं । उनके रूप- लावण्य तथा रागसे जब समस्त वृष्णिवंशी पुरुष मोहित हो गये, तब उस मोहिनी गान्धर्वी मायाको जानकर उसके निवारणके लिये महाबली प्रद्युम्नने रणभूमिमें ज्ञानास्त्रका संधान किया ॥ २६-३० ॥ नृपेश्वर! उस समय ज्ञानोदय होनेपर सबके मोहका नाश हो गया । उस मायाके नष्ट हो जानेपर क्रोधसे भरे हुए मायावी दैत्यराज शकुनिने राक्षसी मायाका संधान किया । राजन्! फिर तो क्षणभरमें सारा आकाश पंखधारी पर्वतोंसे आच्छादित हो गया । पृथ्वीपर घोर अन्धकार छा गया, मानो प्रलयकालमें मेघोंकी घोर घटा घिर आयी हो । आकाशसे चारों ओर जले वृक्ष, प्रस्तर- खण्ड, हड्डियाँ, धड़, रक्त, गदाएँ, परिघ, खड्ग और मुसल आदि बरसने लगे । विदेहराज! पर्वत मेघोंके समान आकाशमें घूमने लगे । हाथियों और घोड़ोंको अपना भक्ष्य बनाते हुए सैकड़ों राक्षस और यातुधान हाथोंमें शूल लिये ' काट डालो, फाड़ डालो ' इत्यादि कहते हुए दृष्टिगोचर होने लगे । रणमण्डलमें बहुत - से सिंह, व्याघ्र और वाराह दिखायी देने लगे, जो अपने नखोंद्वारा हाथियोंको विदीर्ण करते हुए उनके शरीरोंको चबा रहे थे । अपनी सेनाको पलायन करती देख महाबली प्रद्युम्नने उस राक्षसी मायाको जीतनेके लिये नरसिंहास्त्रका संधान किया । इससे साक्षात् रौद्ररूपधारी भगवान् नरसिंह हरि प्रकट हो गये, जिनके अयाल चमक रहे थे । जीभ लपलपा रही थी तथा बड़े - बड़े नख और पूँछ उनकी शोभा बढ़ाते थे । बाल हिल रहे थे, मुँह डरावना दिखायी देता था और वे हुंकारसे अत्यन्त भीषण प्रतीत होते थे । रणमण्डलमें सिंहनाद करते हुए वे खड़े हो गये । उनके उस सिंहनादसे सप्त पाताल और सातों लोकोंसहित सारा ब्रह्माण्ड गूँज उठा, दिग्गज विचलित हो गये, तारे खिसक गये और भूखण्ड - मण्डल काँपने लगा । वे अपने तीखे नखोंसे दैत्योंके देखते - देखते वृक्षोंसहित पर्वतोंको आकाशमें उठाकर उनकी सेनाके बीच भू-पृष्ठपर पटक देते थे । राक्षसोंको पकड़कर बड़े वेगसे फाड़ डालते थे । उन नरहरिने युद्धस्थलमें यातुधानोंको अपने पैरोंसे मसल डाला । सिंहों, व्याघ्रों और वाराहोंको तीखे नखोंसे विदीर्ण करके आकाशमें फेंक दिया । फिर वे भगवान् विष्णु वहीं अन्तर्धान हो गये ॥ ३१–४३ ॥ इस प्रकार राक्षसी मायाके नष्ट हो जानेपर रुक्मिणी-नन्दन प्रद्युम्नने समराङ्गणमें विजयदायक मौलेन्द्र नामक शङ्ख बजाया । उस समय दुन्दुभियोंकी ध्वनिसे मिश्रित जय जय घोष होने लगा । प्रद्युम्नके ऊपर देवतालोग फूल बरसाने लगे । अपनी मायाके नष्ट हो जानेपर दैत्यराज शकुनि रथ और सैनिकोंके साथ वहीं अदृश्य हो गया । इसके बाद उसने मय नामक दैत्यद्वारा सिखायी हुई दैतेयी माया प्रकट की । उस समय बिजलीकी कड़कके साथ हाथीकी सूँड़के समान मोटी जलधाराएँ बरसाते हुए सांवर्त्तक मेघगण सत्पुरुषोंके देखते - देखते आकाशमें छा गये । एक ही क्षणमें सारे समुद्र प्रचण्ड आँधीसे कम्पित और क्षुभित हो परस्पर टकराते हुए अपने भँवरोंसे समस्त भूमण्डलको आपवित करने लगे । उसमें यादवोंके आत्मीय जनसहित सारे वृक्ष डूब गये । यह देख समस्त यादव बहुत भयभीत हो गये तथा रामकृष्णके नामोंका कीर्तन करते हुए अपना सारा पराक्रम भूल गये । राजेन्द्र! एक ही क्षणमें वे सब लोग चुपचाप पराजित हो गये । तब महाबाहु प्रद्युम्नने प्रचण्ड पराक्रमके आश्रयभूत कोदण्डपर बाण रखकर उनके ऊपर सहसा श्रीकृष्णास्त्रका संधान किया ॥ ४४–५१ ॥ मिथिलेश्वर! उस समय वहाँ कुशस्थली पुरीके प्रातः कालीन करोड़ों सूर्योके समान कान्तिमान् उत्कृष्ट तेजःपुञ्ज स्वयं इस प्रकार प्रकट हुआ, मानो वह अपने अभीष्ट अर्थका मूर्तिमान् रूप हो । वह तेज दसों दिशाओंका अनुरञ्जन कर रहा था । उस परम तेजके

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३६४ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ विश्वजित्खण्ड भीतर नूतन जलधरके समान श्याम छविसे सुशोभित, सुवर्णमय कमलकी रेणुके सदृश पीत-वसनसे समलंकृत, भ्रमरोंके गुञ्जारवसे निनादित, कुन्तलराशिधारी, वैजयन्तीमाला पहने, श्रीवत्सचिह्न एवं उत्तम कैस्तुभरत्नसे सुशोभित वक्षवाले, प्रफुल्ल पङ्कजके तुल्य विशाललोचन, चार भुजाधारी श्रीकृष्ण दृष्टिगोचर हुए । उनके मस्तकपर सुन्दर किरीट, कण्ठमें मनोहर हार तथा चरणोंमें नवल नूपुर शोभा दे रहे थे । कानोंमें नूतन सूर्यकी - सी कान्तिवाले सोनेके कुण्डल झलमला रहे थे ॥ ५२ - ५४ ॥ इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्णको देखकर यदुवंशी इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें विश्वजित्खण्डके अत्यन्त हर्षसे खिल उठे । उन्होंने दोनों हाथ जोड़कर उन परमेश्वरको प्रणाम किया । मिथिलेश्वर! उस समय देवतालोग सब ओरसे फूल बरसाकर जोर - जोरसे जय - जयकार करने लगे । तत्काल आये हुए शार्ङ्गधनुषधारी भगवान् श्रीकृष्णने अपने शार्ङ्गधनुषसे छूटे हुए एक ही बाणसे लीला-पूर्वक शकुनिके प्रत्यञ्चासहित कोदण्डको रोष-पूर्वक खण्डित कर दिया । धनुष कट जानेपर तिरस्कृत हुआ शकुनि युद्ध छोड़कर अपने अस्त्र-शस्त्रोंका समूह ले आनेके लिये चन्द्रावतीपुरीको चला गया ॥ ५५–५७ ॥ अन्तर्गत नारद - बहुलाश्व - संवादमें ' श्रीकृष्णका आगमन ' नामक उनतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३ ९ ॥ चालीसवाँ अध्याय शकुनिके जीवस्वरूप शुकका निधन नारदजी कहते हैं- राजन्! शकुनिके चले जानेपर कमलनयन भगवान् श्रीकृष्णने प्रद्युम्न आदि समस्त यादवोंको बुलाकर इस प्रकार कहा ॥ १ ॥

श्रीभगवान् बोले – पूर्वकालमें - सुमेरु पर्वत उत्तरभागमें इस शकुनि नामक दैत्यने चार युगोंतक निराहार रहकर तपस्याद्वारा भगवान् शिवको संतुष्ट किया । चार युग व्यतीत हो जानेपर साक्षात् महेश्वर-देवने प्रसन्न होकर दर्शन दिया और कहा - ' वर माँगो । ' दैत्य शकुनिने उनको प्रणाम किया । उसका रोम - रोम खिल उठा और नेत्रोंमें प्रेमके आँसू छलक आये । उसने दोनों हाथ जोड़कर गद्गद वाणीमें धीरेसे कहा - ' प्रभो! यदि मैं मरूँ तो भूतलका स्पर्श होते ही फिर जी जाऊँ और आकाशमें भी हे देव! दो घड़ीतक मेरी मृत्यु न हो । ' दैत्यके इस प्रकार कहनेपर भगवान् हरने उसे दोनों वर दे दिये और पिंजरेमें रखे हुए एक तोतेको देकर उस नतमस्तक दैत्यसे कहा-' निष्पाप दैत्य! यह तोता तुम्हारे जीवके तुल्य है । तुम इसकी सदा रक्षा करना । असुर! इसके मर जानेपर तुम्हें यह जानना चाहिये कि मेरी ही मृत्यु हो गयी है । ' उसे इस प्रकार वर देकर रुद्रदेव अन्तर्धान हो गये । इसलिये दुर्गमें तोतेकी मृत्यु हो जानेपर शकुनिका वध होगा ॥२–८ ॥ नारदजी कहते हैं- यह कहकर वीरोंकी उस सभामें भगवान् देवकीनन्दनने गरुडको शीघ्र बुलाकर हँसते हुए मुखसे कहा॥९॥

श्रीभगवान् बोले- परम बुद्धिमान् गरुड! मेरी बात सुनो, तुम चन्द्रावतीपुरीको जाओ । वह पुरी सौ योजन विस्तृत है और दैत्योंकी सेनासे घिरी हुई है । सुवर्ण और रत्नोंसे मनोहर प्रतीत होनेवाले गगनचुम्बी महलों तथा विचित्र उपवनों एवं उद्यानोंसे सुशोभित है । बड़े - बड़े दैत्य उसकी शोभा बढ़ाते हैं । उसके प्रत्येक दुर्गमें और दरवाजोंपर दैत्यपुंगव उसकी रक्षा करते हैं ( उस पुरीमें जाकर तुम शकुनिके महलके भीतर पिंजरे में सुरक्षित तोतेको मार डालो ) ॥१०-११३ ॥ नारदजी कहते हैं- राजन्! उस पुरीको देखनेके लिये गरुडने सूक्ष्म रूप धारण कर लिया । वे दैत्योंसे अलक्षित रहकर, अट्टालिकाओं तथा तोलिकाओंका निरीक्षण करते हुए, उड़ - उड़कर एक महलसे दूसरे