गर्ग संहिता — पृष्ठ 371–380
गर्ग संहिता · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 371–380
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अध्याय ४० ] शकुनिके जीवस्वरूप शुकका निधन ३६५ महलमें होते हुए शकुनिके भवनमें जा पहुँचे । दैत्यके जीवस्वरूप शुककी खोज करते हुए गरुडजी क्षणभर वहाँ खड़े रहे । उस समय दैत्यराज शकुनि वहाँ युद्धके लिये कवच धारण किये भाँति - भाँतिके अस्त्र - शस्त्र ले रहा था । उस वीरका हृदय क्रोधसे भरा हुआ था । राजन्! उसकी स्त्री मदालसा उसकी कमरमें दोनों हाथ डालकर बोली ॥ १२ - १५ ॥ मदालसाने कहा – राजन्! प्राणनाथ! तुम्हारे सारे सुहृद्, अनुकूल चलनेवाले भाई तथा उद्भट दैत्यप्रवर युद्धमें मारे गये । यादवोंके साथ युद्ध करनेके लिये न जाओ; क्योंकि उनके पक्षमें साक्षात् भगवान् श्रीहरि आ गये हैं । उन्हें तत्काल भेंट अर्पित करो, जिससे कल्याणकी प्राप्ति हो ॥ १६ - १७ ॥ शकुनि बोला – प्रिये! यादवोंने बलपूर्वक मेरे भाइयोंका वध किया है, अतः मैं अपनी सेनाओंद्वारा उन्हें अवश्य मारूँगा । भगवान् शिवके वरदानसे भूतलपर मेरी मृत्यु नहीं होगी । प्रिये! चन्द्रनामक उपद्वीपमें सुन्दर पतंग पर्वतपर इस समय मेरा जीवरूपी शुक विद्यमान है । शङ्खचूड़ नामक सर्प दिन - रात
उसकी रक्षा करता है । इस बातको कोई नहीं जानता ।
फिर मेरी मृत्यु कैसे हो सकती है ॥ १८- २० ॥
नारदजी कहते हैं- राजन्! शुकविषयक वृत्तान्त सुनकर दिव्यवाहन गरुडने वहाँसे चन्द्रनामक उपद्वीपमें जानेका विचार किया । वेगसे उड़ते हुए गरुड समुद्रके तटपर जा पहुँचे और चन्द्रद्वीपकी खोज करते हुए आकाशमें विचरने लगे । शतयोजन विस्तृत एवं भयंकर गर्जना करनेवाले समुद्रपर दृष्टिपात करते हुए पक्षिराज गरुड लतावृन्दसे मनोरम सिंहलद्वीपमें पहुँच गये । वहाँके लोगोंसे गरुडने पूछा - ' इस स्थानका क्या नाम है? ' उत्तर मिला - ' सिंहलद्वीप । ' तब वहाँसे उड़ते हुए गरुड बड़े वेगसे त्रिकूटपर्वतके शिखरपर बसी हुई लङ्कामें जा पहुँचे । लङ्का जाकर वहाँसे भी उड़े और पाञ्चजन्यद्वीपमें चले गये । पाञ्चजन्यसागरके निकट पहुँचनेपर बलवान् पक्षिराज गरुडको बड़ी भूख लगी । इन्होंने हठात् तीखी चोंच -द्वारा बहुत - से मत्स्य पकड़ लिये । उन्हीं मत्स्योंमें एक बड़ा भारी मगर भी आ गया, जो दो योजन लंबा था । उसने गरुडका एक पैर पकड़ लिया और पानीके भीतर खींचने लगा । गरुड अपना बल लगाकर उसे किनारेकी ओर खींचने लगे । राजन्! उस समय दो घड़ीतक उन दोनोंमें खींचातानी चलती रही । गरुडका वेग बड़ा प्रचण्ड था । उन्होंने अपनी तीखी चोंचसे उस मगरकी पीठपर इस प्रकार चोट की, मानो यमराजने यमदण्डसे प्रहार किया हो । उसी समय वह मगरका रूप छोड़कर तत्काल एक महान् विद्याधर हो गया । उसने साक्षात् गरुडको मस्तक झुकाया और हँसते हुए कहा ॥ २१–३० ॥ विद्याधर बोला- मैं पूर्वकालमें हेमकुण्डल नामक प्रसिद्ध विद्याधर था । एक दिन देवमण्डलमें सम्मिलित हो मैं आकाशगङ्गामें स्नान करनेके लिये गया । वहाँ मुनिश्रेष्ठ ककुत्स्थ पहलेसे स्नान कर रहे थे । हँसी - हँसीमें उनका पैर पकड़कर मैं उन्हें जलके भीतर खींच ले गया । तब ककुत्स्थने मुझे शाप देते हुए कहा - ' दुर्बुद्धे! तू मगर हो जा । ' तब मैंने उन्हें अनुनय - विनयसे प्रसन्न किया । वे शीघ्र ही प्रसन्न हो गये और वर देते हुए बोले- ' गरुडकी चोंचका प्रहार होनेपर तुम मगरकी योनिसे छूट जाओगे । ' सुव्रत! आज आपकी कृपासे मैं ककुत्स्थ मुनिके शापसे छुटकारा पा गया॥३१–३४ ॥ नारदजी कहते हैं - यों कहकर जब हेमकुण्डल नामक विद्याधर स्वर्गलोकको चला गया, तब गरुड दोनों पाँखोंसे उड़कर वहाँसे व्योममण्डलमें पहुँच गये । वहाँसे वेगपूर्वक उड़ते हुए वे हरिण नामक उपद्वीपमें गये । वहाँ अपान्तरतमा नामक मुनि बड़ी भारी तपस्या करते थे । उनके आश्रममें जानेपर पक्षिराज गरुडकी एक पाँख टूटकर गिर गयी । उसे देखकर अपान्तरतमा नामक मुनि गरुडसे बोले-' पक्षिन्! मेरे मस्तकपर अपनी पाँख रखकर तुम सुखपूर्वक चले जाओ । ' तब गरुड उनके मस्तकपर पाँख रखकर आगे बढ़ गये । अपने ही समान अनेकानेक चन्द्रोपम पंख गरुडने उनके सिरपर देखे । इससे उन्हें बड़ा विस्मय हुआ । तब अपान्तरतमा मुनि गरुडसे बोले – ' पक्षिराज! जब - जब श्रीकृष्णका अवतार होता है, तब - तब सदा गरुडकी एक पाँख यहाँ
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३६६ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ विश्वजित्खण्ड गिरती है । कल्प - कल्पमें श्रीकृष्णचन्द्रका अवतार होता है और तब - तब मेरे मस्तकपर गरुडका पंख गिरता है । इस प्रकार यहाँ अनन्त पंख पड़े हैं । जो सबके आदि-अन्त बताये जाते हैं, उन भगवान् श्रीकृष्णको मैं मस्तक झुकाकर प्रणाम करता हूँ ॥ ३५-४१ ॥ नारदजी कहते हैं— यह सुनकर गरुड आश्चर्य-चकित हो उठे । उन्होंने उन मुनिवरको प्रणाम करके फिर अपनी उड़ान भरी और आकाशमण्डलमें होते हुए वे रमणकद्वीपमें चले गये । वहाँ सर्पोंसे बलि लेकर वे आवर्तकद्वीपमें गये और वहाँके सुधाकुण्डमें सुधाका पान करके बलवान् पक्षिराज शुकूद्वीपमें जा पहुँचे । वहाँ उन्होंने मुझसे चन्द्रद्वीपका पता पूछा । फिर मेरे कहने से पक्षी गरुड उत्तर दिशाकी ओर गये । इस तरह वे खगेश्वर चन्द्रद्वीपके पर्वतपर जा पहुँचे । वहाँ विनतानन्दनने जलदुर्ग और अग्निदुर्ग देखा । मिथिलेश्वर! बलवान् पक्षिराजने सारे जलदुर्गको अपनी चोंचमें लेकर उसीसे अग्निदुर्गको बुझा दिया । वहाँ पर्वतीय कन्दराके द्वारपर जो लाखों दैत्य सोये थे, वे उठ खड़े हुए । उनके साथ दो घड़ीतक गरुडका युद्ध चलता रहा । पक्षिराजने युद्धमें अपने पंजोंसे कितने ही राक्षसोंको विदीर्ण कर डाला, किन्हींको पाँखोंसे मारकर धराशायी कर दिया । कुछ दैत्योंको चोंचसे पकड़कर बलवान् पक्षिराजने पर्वतके पृष्ठभागपर पटक दिया और फिर उठाकर बलपूर्वक आकाशमें फेंक दिया । कुछ मर गये और शेष दैत्य दसों दिशाओंमें भाग गये । इस तरह दैत्योंका संहार करके पक्षिराज गुफामें घुस गये ॥ ४२ - ५० ॥ वहाँ शङ्खचूड़ नामक सर्पके मस्तकपर उन्होंने अपने चमकीले पैरसे आघात किया । शङ्खचूड़ गरुडको देखकर अत्यन्त तिरस्कृत हो पिंजरेके तोतेको पानीमें फेंककर शीघ्र ही वहाँसे पलायन कर गया । राजन्! गरुडने पिंजरेसहित शुकको तत्काल अपनी चोंचमें लेकर आकाशमें उड़ते हुए युद्धस्थलमें जानेका विचार किया । तबतकभागे हुए दैत्योंका महान् कोलाहल आरम्भ हुआ । नरेश्वर! ' तोता ले गया, तोता ले गया'-इस प्रकार चिल्लाते हुए उन असुरोंकी आवाज आकाशमें और सम्पूर्ण दिशाओंमें फैल गयी और दैत्यकी सेनाओंके लोगोंने भी इस बातको सुना ॥ ५१–५४ ॥ स्वर्ग, भूतल एवं समस्त ब्रह्माण्डमें ' तोता ले गया, तोता ले गया ' की आवाज गूँज उठी । उसे सुनकर असुरोंसहित शकुनि सशङ्क हो गया । वह शूल लेकर तत्काल चन्द्रावतीपुरीसे उठा और ' गरुड तोतेको ले गये हैं ' – यह सुनकर रोषपूर्वक उनका पीछा करने लगा । उसने गरुडको अपने शूलसे मारा, तो भी उन्होंने मुखसे तोतेको नहीं छोड़ा । वे सातों समुद्र और सातों द्वीपोंका निरीक्षण करते हुए आगे बढ़ते गये । दैत्यराज शकुनिने प्रत्येक दिशामें और आकाशके भीतर भी उनका पीछा किया । राजन्! नागान्तक गरुड आकाशमें भ्रमण करते हुए कोटि योजनतक चले गये । दैत्यके त्रिशूलकी मारसे वे क्षत - विक्षत हो गये, तथापि मुखसे तोतेको छोड़ नहीं सके ॥ ५५–५८३ ॥ राजन्! लाख योजन ऊँचे आकाशमें जानेपर पिंजरे सहित शुक पत्थरकी भाँति सुमेरुपर्वतके शिखरपर बड़े वेगसे गिरा । पिंजरा टूट गया और तोतेके प्राण - पखेरू उड़ गये । तदनन्तर गरुड उस महायुद्ध में श्रीकृष्णके पास चले गये । राजन्! दैत्य शकुनि खिन्न-चित्त हो चन्द्रावतीपुरीमें लौट गया ॥ ५ ९ –६१ ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें विश्वजित्खण्डके अन्तर्गत नारद - बहुलाश्व - संवादमें ' गरुडका आगमन ' नामक चालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४० ॥
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इकतालीसवाँ अध्याय शकुनिका घोर युद्ध, सात बार मारे जानेपर भी उसका भूमिके स्पर्शसे पुनः जी उठना; अन्तमें भगवान् श्रीकृष्णद्वारा युक्तिपूर्वक उसका वध नारदजी कहते हैं— राजन्! शेष दैत्योंको लेकर नाना प्रकारके अस्त्र - शस्त्र धारण किये बलवान् वीर शकुनि, दिव्य मनोहर अश्व उच्चैःश्रवापर आरूढ़ हो, क्रोधसे अचेत - सा होकर, धनुषकी टंकार करता हुआ भगवान् श्रीकृष्णके भी सम्मुख युद्ध करनेके लिये आ गया ॥ १-२ ॥ रणदुर्मद दैत्य शकुनि तथा उसकी सेनाका पुनः आगमन देख समस्त वृष्णिवंशियोंने अपने - अपने आयुध उठा लिये । उस समय दैत्योंका यादवोंके साथ घोर युद्ध हुआ । वीरोंके साथ वीर इस तरह जूझने लगे, जैसे सिंहोंके साथ सिंह लड़ रहे हों । राजन्! मेघकी गर्जनाके समान बारंबार कोदण्डकी टंकार करता हुआ शकुनि सबके आगे था । उसने नाराचोंद्वारा दुर्दिन उपस्थित कर दिया । बाणोंका अन्धकार छा जानेपर शार्ङ्गधनुष धारण करनेवाले भगवान् गरुडध्वज अपने उस धनुषसे उसी प्रकार सुशोभित हुए, जैसे इन्द्रधनुषसे मेघकी शोभा होती है । साक्षात् भगवान् श्रीकृष्णने अपने एक ही बाणसे लीलापूर्वक असुर शकुनिके बाण - समूहों को काट डाला ॥ ३–७ ॥ मिथिलेश्वर! युद्धमें अपने कोदण्डको कानतक खींचकर शकुनिने भगवान् श्रीकृष्णके हृदयमें दस बाण मारे । तब प्रलय - समुद्रके महान् आवर्तीके भीषण संघर्षके समान गम्भीर नाद करनेवाली शकुनिके धनुषकी प्रत्यञ्चाको श्रीकृष्णने दस बाणोंसे काट डाला । नरेश्वर! मायावी दैत्य शकुनि सबके देखते -देखते सौ रूप धारण करके श्रीहरिके साथ युद्ध करने लगा । तब साक्षात् भगवान् श्रीकृष्ण एक सहस्र रूप धारण करके उस दैत्यके साथ युद्ध करने लगे, वह अद्भुत - सी बात हुई । बलवान् दैत्यराज शकुनिने मयासुरके बनाये हुए अग्नितुल्य तेजस्वी त्रिशूलको घुमाकर उसे श्रीहरिके ऊपर चला दिया । तब कुपित हुए परिपूर्णतम महाबाहु श्रीहरिने उस त्रिशूलको वैसे ही काट दिया, जैसे तीखी चोंचवाला गरुड किसी सर्पको टूक - टूक कर डाले ॥८-१३ ॥ तदनन्तर क्रोधसे भरे हुए महाबाहु श्रीहरिने शकुनि -के मस्तकपर अपनी गदा चलायी तथा उस वज्रतुल्य गदाकी चोटसे उस दैत्यको घोड़ेसे नीचे गिरा दिया । गदाकी चोटसे पीड़ित हुआ दैत्य क्षणभरके लिये मूच्छित हो गया । फिर युद्धस्थलमें अपनी गदा लेकर वह माधवके साथ युद्ध करने लगा ॥ १४-१५ ॥ उस समय रणमण्डलमें गदाओंद्वारा उन दोनों के बीच घोर युद्ध हुआ । गदाओंके टकरानेका चट - चट शब्द वज्रके टकरानेकी भाँति सुनायी पड़ता था । श्रीकृष्णकी गदासे चूर - चूर होकर शकुनिकी गदा पृथ्वीपर गिर पड़ी । वह युद्धमें सबके देखते - देखते अङ्गारकी भाँति दहकने लगी । जैसे पर्वतकी कन्दरामें दो सिंह लड़ते हों, जैसे वनमें दो मतवाले हाथी जूझते हों, उसी प्रकार समराङ्गणमें वे दोनों - श्रीकृष्ण और शकुनि परस्पर युद्ध करने लगे । शकुनिने श्रीकृष्णको सौ योजन पीछे कर दिया और श्रीकृष्णने उसे भूतलपर सहस्र योजन पीछे ढकेल दिया । तब त्रिभुवननाथ श्रीहरिने उसे दोनों भुजाओंमें पकड़कर जाँघोंके धक्केसे जमीनपर वैसे ही पटक दिया, जैसे किसी बालकने कमण्डलु फेंक दिया हो । इससे उस दैत्यको कुछ व्यथा हुई । फिर उस युद्धदुर्मद दुराचारी शकुनिने जारुधि पर्वतको पकड़कर उसे श्रीकृष्णपर चला दिया । पर्वतको अपने ऊपर आता देख कमलनयन भगवान् श्रीकृष्णने पुनः उसे उसीकी ओर लौटा दिया । इस प्रकार जयशब्दका उच्चारण करते हुए वे दोनों एक - दूसरेपर उसी पर्वतके द्वारा प्रहार करते रहे । राजन्! उस पर्वतके आघातसे उन दोनोंने चन्द्रावती-पुरीको भी चूर्ण कर दिया ॥ १६ - २२३ ॥ उस समय दैत्य शकुनिने अत्यन्त कुपित हो ढाल - तलवार उठा ली और महात्मा श्रीकृष्णके सामने
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३६८ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ विश्वजित्खण्ड वह युद्धके लिये आ गया । तब भगवान् शार्ङ्गधरने अपना शार्ङ्गधनुष लेकर उसके ऊपर सहसा अर्धचन्द्र-मुख बाणका संधान किया, जो युद्धस्थलमें ग्रीष्मऋतुके सूर्यके समान उद्भासित हो उठा । शार्ङ्गधनुषसे छूटा हुआ वह दिव्य बाण दिङ्मण्डलको विद्योतित करता हुआ शकुनिका मस्तक काटकर भूमिका भेदन करके तललोकमें चला गया । उस समय दैत्य शकुनि प्राण-शून्य होकर युद्धस्थलमें गिर पड़ा । मिथिलेश्वर! भूमिका स्पर्श होते ही वह क्षणभरमें पुनः जीवित हो उठा । अपने कटे हुए मस्तकको अपने ही हाथसे धड़पर रखकर वह युद्ध करनेके लिये पुनः उठ खड़ा हुआ, वह अद्भुत - सी घटना हुई ॥ २३ - २७३ ॥ इस प्रकार श्रीकृष्णके हाथसे सात बार मारे जाने-पर भी वह महान् असुर भूमिके स्पर्शसे जी उठा तथा राहुकी भाँति फिर उठ खड़ा हुआ । अब वह अकेले ही यादव - कुलका संहार करनेके लिये उद्यत हुआ । वनमें दावानलकी भाँति उस शक्तिशाली महादैत्यने तत्काल यादव- सेनामें प्रवेश किया । उसने घोड़ों और अस्त्र - शस्त्रोंसहित महावीर घुड़सवारोंको तथा मदमत्त हाथियोंको भुजाओंसे पकड़कर आकाशमें लाख योजन दूर फेंक दिया । किन्हीं हाथियोंका मुँह, किन्हींके दोनों कंधे तथा किन्हींके दोनों कक्ष पकड़कर फेंकता हुआ वह दैत्य कालाग्नि रुद्रके समान जान पड़ता था ॥ २८-३१३ ॥ उस दैत्यके दोनों पैरों और हाथोंने उस महासमरमें जब भारी आतङ्क उत्पन्न कर दिया और महात्मा श्रीकृष्णकी सेनामें जोरसे हाहाकार होने लगा, तब विश्वरक्षक साक्षात् भगवान् श्रीकृष्णने साधुपुरुषोंकी रक्षा के लिये अपने अस्त्र सुदर्शनचक्रका प्रयोग किया । उनके हाथसे छूटा हुआ तीखा सुदर्शनचक्र प्रलय-कालके कोटि सूर्योकी दीप्तिमती प्रभासे प्रज्वलित हो उठा । उसने उस महायुद्धमें शकुनिके सुदृढ़ मस्तकको उसी तरह काट लिया, जैसे वज्रने वृत्रासुरका मस्तक काटा था । तबतक भगवान् श्रीकृष्णने महासमरमें मरे हुए शकुनिको बलपूर्वक आकाशमें फेंक दिया । फिर श्रीपतिने यादवोंसे कहा - ' तुमलोग इसके शरीरको बाणोंसे ऊपर - ही - ऊपर फेंकते रहो ॥३२–३५ ॥ नारदजी कहते हैं— राजन्! श्रीहरिकी ऐसी बात सुनकर समस्त यादवश्रेष्ठ वीर आकाशसे गिरते हुए उस दैत्यको चमकीले बाणोंसे ताड़ित करने लगे । राजन्! दीप्तिमान्के बाणोंसे आहत हो वह दैत्य लोगोंके देखते - देखते गेंदकी भाँति सौ योजन ऊपर चला गया । फिर साम्बके बाणका धक्का पाकर वह एक सहस्र योजन ऊपर चला गया । जब वह पुनः आकाशसे नीचे गिरने लगा, तब अर्जुनने अपने बाणसे उसपर चोट की । उस बाणसे वह दैत्यराज दस हजार योजन ऊपर चला गया । तदनन्तर जब वह नीचे आने लगा, तब अनिरुद्धके बाणने उसे लाख योजन ऊपर उछाल दिया । इसके बाद प्रद्युम्नके बाणसे वह दस लाख योजन ऊपर उठ गया । तत्पश्चात् उसे पुनः आकाशसे नीचे गिरते देख योगेश्वरेश्वर भगवान् श्रीकृष्णने उसपर बाण मारा, जिससे वह कोटि योजन ऊपर चला गया । इस प्रकार दो पहरतक वह दैत्य आकाशमें ही स्थित रह गया, उसे नीचे नहीं गिरने दिया ॥ ३६-४१ ॥ तदनन्तर साक्षात् श्रीहरिने उसके ऊपर दूसरा बाण मारा । उस बाणने सम्पूर्ण दिशाओंमें उसको कोटि योजनतक घुमाकर समुद्रमें वैसे ही ला पटका, जैसे हवाने कमलके फूलको उड़ाकर नीचे डाल दिया हो । राजन्! इस प्रकार जब उस दैत्यकी मृत्यु हो गयी, तब उसके शरीरसे एक प्रकाशमान ज्योति निकली और वह चारों ओरसे परिक्रमा देकर भगवान् श्रीकृष्णमें विलीन हो गयी । उस समय भूतल और आकाशमें जय - जयकार होने लगी । विद्याधरियाँ और गन्धर्वकन्याएँ आनन्दमग्न हो आकाशमें नृत्य करने लगीं, किंनर और गन्धर्व यश गाने लगे तथा सिद्ध और चारण स्तुति सुनाने लगे । समस्त ऋषियों और मुनियोंने श्रीहरिकी भूरि - भूरि प्रशंसा की । ब्रह्मा, रुद्र, इन्द्र और सूर्य आदि सब देवता वहाँ आ गये और श्रीकृष्णके ऊपर फूलोंकी वर्षा करने लगे ॥४२–४७ ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें विश्वजित्खण्डके अन्तर्गत नारद - बहुलाश्व - संवादमें ' शकुनि दैत्यका वध ' नामक इकतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४१ ॥
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बयालीसवाँ अध्याय श्रीकृष्णका यादवोंके साथ चन्द्रावतीपुरीमें जाकर शकुनि - पुत्रको वहाँका राज्य देना तथा शकुनि आदिके पूर्व जन्मोंका परिचय नारदजी कहते हैं- राजन्! बचे हुए दैत्य रणभूमिसे भाग गये । यादवेन्द्र भगवान् श्रीहरि वीणा, वेणु, मृदङ्ग और दुन्दुभि आदि बाजे बजवाते और सूत, मागध एवं वन्दीजनोंके मुखसे अपने यशका गान सुनते हुए, पुत्रों तथा अन्य यादवोंके साथ सेनासे घिरकर शङ्ख, चक्र, गदा, कमल और शार्ङ्गधनुषसे सुशोभित हो, देवताओंसहित चन्द्रावतीपुरीमें गये । वहाँ अपने पतिके मारे जानेके कारण रानी मदालसा शकुनिके पुत्रको गोदमें लिये दुःखसे आतुर हो अत्यन्त करुणाजनक विलाप कर रही थी । उसके मुखपर अश्रुधारा बह रही थी और वह अत्यन्त दीन हो गयी थी । उसने तुरंत ही हाथ जोड़कर अपने बच्चेको श्रीकृष्णके चरणोंमें डाल दिया और भगवान्को नमस्कार करके कहा ॥ १-५ ॥ मदालसा बोली - प्रभो! आदिदेव! आप भूतलका भार उतारनेके लिये यदुकुलमें अवतीर्ण हुए हैं । आप ही संसारके स्रष्टा हैं और प्रलयकाल आनेपर आप ही इसका संहार करेंगे; किंतु कभी आप गुणोंसे लिप्त नहीं होते । मैं आपकी अनुकूलता प्राप्त करनेके लिये आपके चरणोंमें प्रणाम करती हूँ । मेरा बेटा बहुत डरा हुआ है । आप इसकी रक्षा कीजिये । देव! इसके मस्तकपर अपना वरद हस्त रखिये । देवेश! जगन्निवास! मेरे पतिने आपका जो अपराध किया है, उसे क्षमा कीजिये ॥ ६-७ ॥ नारदजी कहते हैं — राजन्! मदालसाके यों कहनेपर महामति भगवान् श्रीकृष्णने उस बालकके मस्तकपर अपने दोनों हाथ रखकर चन्द्रावतीका सारा राज्य उसे दे दिया । फिर कल्पपर्यन्तकी लंबी आयु देकर वैराग्यपूर्ण ज्ञान एवं अपनी भक्ति प्रदान की । तदनन्तर उस शकुनिकुमारको श्रीकृष्णने अपने गलेकी सुन्दर माला उतारकर दे दी । शकुनिने पहले युद्धमें इन्द्रसे जो उच्चैःश्रवा घोड़ा, चिन्तामणि रत्न, कामधेनु और कल्पवृक्ष छीन लिये थे, वे सब श्रीजनार्दनने प्रयत्नपूर्वक देवेन्द्रको लौटा दिये; क्योंकि भगवान् स्वयं ही गौओं, ब्राह्मणों, देवताओं, साधुओं तथा वेदोंके प्रतिपालक हैं ॥ ८–११ ॥ बहुलाश्वने पूछा- देवर्षे! पूर्वकालमें ये महाबली शकुनि आदि दैत्य कौन थे और मोक्षकी प्राप्ति हुई? इस बातको लेकर मेरे आश्चर्य हो रहा है ॥ १२ ॥
नारदजी कहते हैं- राजन्! ब्रह्मकल्पकी बात है, परावसु गन्धर्वोंका राजा बड़े सुन्दर नौ औरस पुत्र हुए । वे सभी समान रूप - सौन्दर्यशाली, दिव्य भूषणोंसे कैसे इन्हें मनमें बड़ा पूर्वकाल था । उसके कामदेवके विभूषित और गीत - वाद्य - विशारद थे तथा प्रतिदिन ब्रह्मलोकमें गान किया करते थे । उनके नाम थे- मन्दार, मन्दर, मन्द, मन्दहास, महाबल, सुदेव, सुघन, सौध और श्रीभानु । एक समय ब्रह्माजीने अपनी पुत्री वाग्देवता सरस्वतीको मोहपूर्वक देखा । विधाताके इस व्यवहार-को लक्ष्य करके परावसुके पुत्र मन - ही - मन हँसने लगे । सुरश्रेष्ठ ब्रह्माके प्रति अपराध करनेके कारण उन्हें तामसी योनिमें जाना पड़ा । श्वेतवाराहकल्प आनेपर वे नवों गन्धर्व हिरण्याक्षकी पत्नीके गर्भसे उत्पन्न हुए । उस समय उनके नाम इस प्रकार हुए-शकुनि, शम्बर, हृष्ट, भूत- संतापन, वृक, कालनाभ, महानाभ, हरिश्मश्रु तथा उत्कच । एक दिनकी बात है, अपने घरपर आये हुए अपान्तरतमा मुनिको नमस्कार करके उनकी विधिवत् पूजा करनेके पश्चात् उन सबने आदरपूर्वक इस प्रकार पूछा ॥ १३ – १ ९ ॥ दैत्य बोले- ब्रह्मन्! सुनिये । आप अपने मुँहसे कहते हैं कि कैवल्यके स्वामी साक्षात् भगवान् श्रीहरि हैं, वे भक्तवत्सल भगवान् भक्तोंको मोक्ष प्रदान करते हैं; परंतु हमलोग आसुरी - योनिमें पड़कर सदा कुसङ्गमें तत्पर रहनेवाले और दुष्ट हैं, हमने कभी भगवान्की
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३७० गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ विश्वजित्खण्ड भक्ति नहीं की । अतः इस जन्ममें हमारा मोक्ष कैसे होगा । ब्रह्मन्! हमें परम कल्याणका उपाय बताइये; क्योंकि प्रभो! आप दीनजनोंके कल्याणके लिये ही जगत्में विचरते रहते हैं ॥२०–२२ ॥ अपान्तरतमाने कहा- दैत्यकुमारो! गुण पृथक् - पृथक् नहीं रहते, वे सब मिले - जुले होते हैं । अथवा जिसके जो गुण हैं, वे उससे विलग नहीं होते । अतः उन्हीं गुणोंके द्वारा जो गुणातीत मोक्षाधीश्वर परमात्मा श्रीहरिका भजन करते रहे हैं, वे दैत्य उन परमात्माको प्राप्त हो चुके हैं । ऐक्यसम्बन्ध, सौहार्द, स्नेह, भय, क्रोध तथा स्मय ( अभिमान ) – इन भावों या गुणोंको सदा श्रीकृष्णके प्रति प्रयुक्त करके वे दैत्यगण उन्हींमें लीन हो गये । उदाहरणतः भगवान् पृश्निगर्भके साथ एकता ( एक कुल, कुटुम्ब या गोत्र ) का सम्बन्ध माननेके कारण प्रजापतिगण मुक्त हो गये । भगवान् के प्रति सौहार्द स्थापित करनेसे कयाधूपुत्र प्रह्लादने भगवान्को पा लिया । श्रीहरिके प्रति स्नेहसे सुतपा मुनि, भयसे हिरण्यकशिपु, क्रोधसे तुम्हारे पिता हिरण्याक्ष तथा स्मय ( अभिमान ) से श्रुतियोंने योगीजनोंके लिये भी परम दुर्लभ पदको प्राप्त कर लिया । जिस किसी भावसे सम्भव हो, श्रीकृष्णमें मनको लगाये । ये देवतालोग भक्तियोगके द्वारा ही भगवान्में मन लगाकर उनका धाम प्राप्त करते हैं ॥२३–२७ ॥ नारदजी कहते हैं- राजन्! यों कहकर अपान्तरतमा मुनि अन्तर्धान हो गये । तबसे शकुनि आदिने परिपूर्णतम श्रीहरिमें वैरभाव स्थापित किया । उन्होंने वैरभावसे ही परमेश्वर श्रीकृष्णको पा लिया । राजेन्द्र! इसमें कोई आश्चर्य न मानो । जैसे कीड़ा भ्रमरका चिन्तन करनेसे तद्रूप हो जाता है, उसी प्रकार भगवच्चिन्तन करनेवाला जीव भगवान्का सारूप्य प्राप्त कर लेता है॥२८-२९ ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें विश्वजित्खण्डके अन्तर्गत नारद - बहुलाश्व - संवादमें ' शकुनि - पुत्रपर कृपा ' नामक बयालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४२ ॥
तैंतालीसवाँ अध्याय इलावृतवर्षमें राजा शोभनसे भेंटकी प्राप्ति; स्वायम्भुव मनुकी तपोभूमिमें मूर्तिमती सिद्धियोंका निवास; लीलावतीपुरीमें अग्निदेवसे उपायनकी उपलब्धि; वेदनगरमें मूर्तिमान् वेद, राग, ताल, स्वर, श्रीनारदजी कहते हैं- राजन्! इस प्रकार भद्राश्ववर्षपर विजय पाकर श्रीयादवेश्वर हरि यादव-सैनिकोके साथ इलावृतवर्षको गये ॥ १ ॥
मिथिलेश्वर! इलावृतवर्षमें ही रत्नमय शिखरोंसे सुशोभित, देवताओंका निवासस्थान, दीप्तिमान् स्वर्णमय पर्वत गिरिराजाधिराज ' सुमेरु ' है, जो भूमण्डलरूपी कमलकी कर्णिकाके समान शोभा पाता है । उसके चारों ओर मन्दर, मेरु- मन्दर, सुपार्श्व तथा कुमुद – ये चार पर्वत शोभा पाते हैं । इन चारोंसे घिरा हुआ वह एक गिरिराज सुमेरु धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष - इन चार पदार्थोंसे युक्त मनोरथकी भाँति शोभा पाता है ॥२-३ ॥ ग्राम और नृत्यके भेदोंका वर्णन उस इलावृतवर्षमें जम्बूफलके रससे उत्पन्न होने-वाला जाम्बूनद नामक स्वत: सिद्ध स्वर्ण उपलब्ध होता है । वहाँ जम्बूरससे ' अरुणोदा ' नामकी नदी प्रकट हुई है, जिसका जल पीनेसे इस भूतलपर कोई रोग नहीं होता । राजन्! वहाँ कदम्बवृक्षसे उत्पन्न ' कादम्ब ' नामक मधुकी पाँच धाराएँ प्रवाहित होती हैं, जिनके पीनेसे मनुष्योंको कभी सर्दी गरमी, विवर्णता ( कान्तिका फीका पड़ना ), थकावट तथा दुर्गन्ध आदि दोष नहीं प्राप्त होते । उन मधु - धाराओंसे कामपूरक नद प्रकट हुए हैं, जो मनुष्योंकी इच्छाके अनुसार रत्न, अन्न, वस्त्र, सुन्दर आभूषण, शय्या तथा आसन आदि जो - जो दिव्य फल हैं, उन सबको
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अध्याय ४३ ] इलावृतवर्षमें राजा शोभनसे भेंटकी प्राप्ति ३७१ अर्पित करते हैं । इसी प्रकार वहाँ सुप्रसिद्ध ' ऊर्ध्ववन ' हैं, जहाँ भगवान् संकर्षण विराजते हैं, जिस वनमें भगवन् शिव स्वतः अपनी प्रेयसी ज्योतियोंके साथ रमण करते हैं तथा जिसमें गये हुए पुरुष तत्काल स्त्रीरूपमें परिणत हो जाते हैं । स्वर्णमय कमल, शीतल वसन्त वायु, केसरके वृक्ष, लवङ्ग - लताओंके समूह तथा देववृक्षोंकी सुगन्धके सेवनसे मदान्ध भ्रमर — ये सब इलावृतवर्षकी अत्यन्त शोभा बढ़ाते हैं । वैदूर्यमणिके अङ्कुरोंसे विचित्र लगनेवाली वहाँकी मनोहर स्वर्णमयी भूमिको देखते हुए भगवान् श्रीहरिने अलंकारमण्डित देवताओंसे पूर्ण इलावृतवर्षको जीतकर वहाँसे भेंट ग्रहण की ॥ ४ – ९ ॥ पूर्वकालके सत्ययुगमें राजा मुचुकुन्दके जामाता शोभनने भारतवर्षमें एकादशीका व्रत करके जो पुण्य अर्जन किया, उसके फलस्वरूप देवताओंने उन्हें मन्दराचलपर निवास दे दिया । आज भी वह राजकुमार कुबरेकी भाँति रानी चन्द्राभागाके साथ वहाँ राज्य करता है । मिथिलेश्वर! वह परम सुन्दर शोभन भेंट लेकर देवप्रवर भगवान् श्रीकृष्णके सामने आया । यदुकुलतिलक श्रीहरिकी परिक्रमा करके शोभन उनके चरणारविन्दोंमें पड़ गया और भक्तिपूर्वक प्रणाम करके, उन परमात्माको शीघ्र ही भेंट देकर पुनः मन्दराचलको चला गया ॥ १०-१२ ॥ बहुलाश्वने पूछा— देवर्षिप्रवर! राजा शोभनके चले जानेपर भगवान् मधुसूदनने आगे कौन - सा कार्य किया, यह बतलाइये ॥ १३ ॥
श्रीनारदजीने कहा- राजन्! उस मन्दराचलके शिखरपर एक परम दिव्य सरोवर है, उसमें स्वर्णमय कमल खिलते हैं । यह देखकर किरीटधारी अर्जुनने माधव श्रीकृष्णसे पूछा - ' देवकीनन्दन! सुवर्णमयी लताओं और स्वर्णमय कमलोंसे व्याप्त यह अद्भुत कुण्ड किसका है? मुझे बताइये ॥१४- १५ ॥ श्रीभगवान्ने कहा – स्वायम्भुव मनुके कुलमें उत्पन्न आदि राजाधिराज पृथुने यहाँ दिव्य तप किया था । उन्हींका यह अद्भुत दिव्य कुण्ड है । पार्थ! इसका जल पीकर मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है तथा इसमें स्नान करके नरेतर प्राणी भी मेरे परमधाममें पहुँच जाता है ॥१६-१७ ॥ श्रीनारदजी कहते हैं- राजन्! यहीं साक्षात् भगवान्ने एक तपोभूमिमें पदार्पण किया, जहाँ सदा आठों सिद्धियाँ मूर्तिमती होकर नृत्य करती हैं । उन सिद्धियोंको देखकर उद्धवने सनातन भगवान्से पूछा ॥ १८३ ॥
उद्धव बोले- भगवन्! मन्दराचलके समीप यह किसकी तपोभूमि है? प्रभो! यहाँ कौन - सी स्त्रियाँ मूर्तिमति होकर विराज रही हैं - कृपया यह बतायें ॥१ ९ ॥ श्रीभगवान्ने कहा – उद्धव! यहाँ पूर्वकालमें स्वायम्भुव मनुने तपस्या की थी । उन्हींकी यह सुन्दर तपोभूमि है, जो आज भी परम कल्याणकारिणी है । यहीं नारीरूपधारिणी आठ सिद्धियाँ सदा विद्यमान रहती हैं । यहाँ जो कोई भी आ जाय, उसे भी आठों सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं । यहाँ एक क्षण भी तपस्या करके मानव देवत्व प्राप्त कर लेता है । चतुर्मुख ब्रह्मा भी इस तपोभूमिके माहात्म्यका वर्णन करनेमें समर्थ नहीं हैं ॥ २०–२२ ॥ श्रीनारदजी कहते हैं- राजन्! यों कहकर भगवान् श्रीकृष्ण अपनी सेनासे घिरे हुए और बारंबार दुन्दुभि बजवाते हुए उन अत्यन्त उत्कट प्रदेशोंमें गये, जहाँ पूर्वकालमें हिरण्यकशिपु दैत्यने तपस्या की थी और जहाँ लीलावती नामकी एक स्वर्णमयी नगरी है । उस लीलावतीके स्वामी साक्षात् वीतिहोत्र नामधारी अग्नि हैं, जो उत्तम व्रतका पालन करते हुए नित्य मूर्तिमान् होकर राज्य करते हैं । उन धनंजयदेवने भी परम पुरुष परमात्मा श्रीकृष्णचन्द्रको भेंट देकर उनकी उत्तम स्तुति की ॥ २३ - २६ ॥ इस प्रकार सारे इलावृतवर्षका दर्शन करते हुए देवाधिदेव भगवान् श्रीकृष्ण वेदनगरमें गये, जो जम्बूद्वीपका एक मनोरम स्थान है । उस नगरमें भगवान् निगम ( वेद ) सदा मूर्तिमान् होकर दिखायी देते हैं । उनकी सभामें सदा वीणापुस्तकधारिणी वाग्देवता वाणी ( सरस्वती ) सुन्दर एवं मङ्गलके अधिष्ठानभूत श्रीकृष्ण चरितका गान करती है । नरेश्वर! उर्वशी और विप्रचित्ति आदि अप्सराएँ वहाँ नृत्य करती हैं ।
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३७२ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ विश्वजित्खण्ड और अपने हाव - भाव ताथ कटाक्षोंद्वारा वेदेश्वरको रिझाती रहती हैं । मैं विश्वावसु, तुम्बुरु, सुदर्शन तथा चित्ररथ - ये सब लोग वेणु, वीणा, मृदङ्ग, मुरुयष्टि आदि वाद्योंको खड़ताल एवं दुन्दुभिके साथ विधिवत् बजाया करते हैं । नरेश्वर! वहाँ ह्रस्व, दीर्घ, प्लुत, उदात्त, अनुदात्त, स्वरित तथा सानुनासिक और निरनुनासिक - इस अठारह * भेदोंके साथ स्तुतियाँ गायी जाती हैं । नरेश्वर! वेदपुरमें आठों ताल, सातों स्वर और तीनों ग्राम मूर्तिमान् होकर विराजते हैं ॥ २७–३४ ॥ वेदनगरमें राग - रागिनियाँ भी मूर्तिमती होकर निवास करती हैं । भैरव, मेघमल्लार, दीपक, मालकोश, श्रीराग और हिन्दोल - ये सब राग बताये गये हैं । इनकी पाँच - पाँच स्त्रियाँ - रागिनियाँ हैं और आठ - आठ पुत्र हैं । नरेश्वर! वे सब वहाँ मूर्तिमान् होकर विचरते हैं । ' भैरव ' भूरे रंगका है, ' मालकोश ' का रंग तोते के समान हरा है, ' मेघमल्लार ' की कान्ति मोरके समान है । ' दीपक ' का रंग सुवर्णके समान है और ' श्रीराग ' अरुण रंगका है । मिथिलेश्वर! ' हिन्दोल ' का रंग दिव्य हंसके समान शोभा पाता है ॥ ३५-३८ - ३८३ ॥ बहुलाश्वने पूछा — मुनिश्रेष्ठ! ताल, स्वर, ग्राम और नृत्य - इनके कितने - कितने भेद हैं? इन सबका नामोल्लेखपूर्वक वर्णन कीजिये ॥ ३ ९ ॥ नारदजीने कहा- राजन्! रूपक, चर्चरीक परमठ, विराट, कमठ, मल्लक, झटित् और जुटा – ये आठ ताल हैं । राजन्! निषाद, ऋषभ, गान्धार, षड्ज, मध्यम, धैवत तथा पञ्चम- ये सात स्वर कहे गये हैं । माधुर्य, गान्धार और ध्रौव्य - ये तीन ग्राम माने गये हैं । रास, ताण्डव, नाट्य, गान्धर्व, कैनर, वैद्याधर, गौह्यक और आप्सरस- ये आठ नृत्यके भेद हैं । ये सभी दस - दस हाव - भाव और अनुभावोंसे युक्त हैं । स्वरोंका बोध करानेवाला पद ' सा रे ग म प ध नि'– इस प्रकार हैं । राजन्! यह सब मैंने तुम्हें बताया, अब और क्या सुनना चाहते हो? ॥ ४०–४४ ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें विश्वजित्खण्डके अन्तर्गत नारद - बहुलाश्व - संवादमें ' वेदनगरका वर्णन ' नामक तैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४३ ॥
चौवालीसवाँ अध्याय रागिनियों तथा रागपुत्रोंके नाम और वेद आदिके द्वारा भगवान्का स्तवन बहुलाश्वने पूछा- देवर्षे! रागिनियों और रागपुत्रोंके नाम मुझे बताइये; क्योंकि परावरवेत्ता विद्वानोंमें आप सबसे श्रेष्ठ हैं ॥ १ ॥
नारदजीने कहा- राजन्! कालभेद, देशभेद और स्वरमिश्रित क्रियाके भेदसे विद्वानोंने गीतके छप्पन करोड़ भेद बताये हैं । नृपेश्वर! इन सबके अन्तर्भेद तो अनन्त हैं । आनन्दस्वरूप जो शब्दब्रह्ममय श्रीहरि हैं, इन्हींको तुम राग समझो । इसलिये भूतलपर इन सबके जो मुख्य - मुख्य भेद हैं, उन्हींका मैं तुम्हारे सामने वर्णन करूँगा॥२-३३ ॥ भैरवी, पिङ्गला, शङ्की, लीलावती और आगरी-* ' अ इ उ ऋ ' – इन स्वरोंमेंसे प्रत्येकके ह्रस्व, ये भैरवरागकी पाँच रागिनियाँ बतलायी गयी हैं । महर्षि, समृद्ध, पिङ्गल, मागध, बिलाबल, वैशाख, ललित और पञ्चम- ये भैरवरागके भिन्न - भिन्न आठ पुत्र बतलाये गये हैं । मिथिलेश्वर! चित्रा, जय-जयवन्ती, विचित्रा, व्रजमल्लारी, अन्धकारी- ये मेघमल्लार रागकी पाँच मनोहारिणी रागिनियाँ कही गयी हैं । श्यामकार, सोरठ, नट, उड्डायन, केदार, व्रजरहस्य, जलधार और विहाग - ये मल्लार रागके आठ पुत्र प्राचीन विद्वानोंने बताये हैं । कचुकी, मञ्जरी, टोडी, गुर्जरी और शाबरी - ये दीपक रागकी पाँच रागिनियाँ विख्यात हैं । विदेहराज! कल्याण, दीर्घ और प्लुत - ये तीन - तीन भेद होते हैं; फिर प्रत्येकके उदात्त, अनुदात्त तथा स्वरित- ये तीन भेद होनेसे नौ भेद हुए । फिर उन सबके सानुनासिक और निरनुनासिक भेद होनेसे अठारह भेद होते हैं ।
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अध्याय ४४ ] रागिनियों तथा रागपुत्रोंके नाम और शुभकाम, गौड़ कल्याण, कामरूप, कान्हरा, राम-संजीवन, सुखनामा और मन्दहास - ये विद्वानोंद्वारा दीपक रागके आठ पुत्र कहे गये हैं । मिथिलेश्वर! गान्धारी, वेदगान्धारी, धनाश्री, स्वर्मणि तथा गुणागरी-ये पाँच रागमण्डलमें मालकोश रागकी रागिनियाँ कही गयी हैं । मेघ, मचल, मारुमाचार, कौशिक, चन्द्रहार, घुंघट विहार तथा नन्द - ये मालकोश रागके आठ पुत्र बतलाये गये हैं॥४–१५३ ॥॥ राजेन्द्र! बैराटी, कर्णाटी, गौरी, गौरावटी तथा चतुश्चन्द्रकाला – ये पुरातन पण्डितोंद्वारा कही गयी श्रीरागकी विख्यात पाँच रागिनियाँ हैं । महाराज! सारङ्ग, सागर, गौर, मरुत, पञ्चशर, गोविन्द, हमीर तथा गीर्भीर- ये श्रीरागके आठ मनोहर पुत्र हैं । वसन्ती, परजा, हेरी, तैलङ्गी और सुन्दरी – ये हिन्दोल रागकी पाँच रागिनियाँ प्रसिद्ध हैं । मैथिलेन्द्र! मङ्गल, वसन्त, विनोद, कुमुद, वीहित, विभास, स्वर तथा मण्डल -विद्वानों द्वारा ये आठ हिन्दोल रागके पुत्र कहे गये हैं॥१६–२१ ॥ बहुलाश्वने पूछा - शब्दब्रह्मरूप श्रीहरिके साक्षात् स्वरूप महात्मा निगम ( वेद ) के, जो राग-मण्डलमें हिन्दोलके नामसे विख्यात हैं, पृथक् - पृथक् अङ्ग इस भूतलपर कौन - कौन से हैं - यह मुझे बताइये ॥ २२-२३ ॥ श्रीनारदजीने कहा— राजन्! वेदस्वरूप श्रीहरिका मुख ' व्याकरण ' कहा गया है, पिङ्गल -कथित ' छन्दःशास्त्र ' उनका पैर बताया जाता है, ' मीमांसाशास्त्र ' ( कर्मकाण्ड ) हाथ है, ' ज्योतिष -' शास्त्र ' को नेत्र बताया गया है । ' आयुर्वेद ' पृष्ठदेश, ' धनुर्वेद ' वक्षःस्थल, ' गान्धर्ववेद ' रसना और ' वैशेषिकशास्त्र ' मन है । सांख्य बुद्धि, न्यायवाद अहंकार और वेदान्त महात्मा वेदका चित्त है । मिथिलेश्वर! रागरूप जो शास्त्र है, उसे वेदराजका
विहारस्थल समझो । राजन्! ये सब बातें तुम्हें बतायीं ।
अब और क्या सुनना चाहते हो? ॥२४ – २७ ॥
बहुलाश्वने पूछा- देवर्षे! उस वेदपुरमें जाकर साक्षात् भगवान् श्रीहरिने क्या किया, यह मुझे बताइये; क्योंकि आप साक्षात् दिव्यदर्शी हैं ॥ २८ ॥
वेद आदिके द्वारा भगवान्का स्तवन ३७३ श्रीनारदजीने कहा- राजन्! यादवेश्वर श्रीकृष्ण जब वेदपुरमें आये, तब निगम ( वेद ) भी सरस्वतीके साथ भेंट लेकर आये । गन्धर्व, अप्सरा, ग्राम, ताल, स्वर तथा भेदोंसहित राग भी उनके साथ थे । उन्होंने हाथ जोड़कर भगवान्को प्रणाम किया । देवताओंके भी देवता साक्षात् भगवान् जनार्दन वेदपर प्रसन्न हो समस्त यादवोंके समक्ष उनसे बोले ॥२ ९ –३१ ॥ श्रीभगवान्ने कहा — निगम! तुम्हारे मनमें जो इच्छा हो, उसके अनुसार कोई वर माँगो । मेरे प्रसन्न होनेपर तीनों लोकोंमें भक्तोंके लिये कौन - सी वस्तु दुर्लभ है! ॥ ३२ ॥
वेद बोले- देव! परमेश्वर! यदि आप प्रसन्न हैं तो यहाँ मेरे जो ये उत्तम पार्षद हैं, उन सबको अपने दिव्य रूपका दर्शन कराइये । अत्यन्त उद्दीप्त तेजवाले अपने निज धाम गोलोकमें आपका जो स्वरूप है तथा वृन्दावनमें और वहाँके रासमण्डलमें आपका जो रूप प्रकट होता है, उसीका ये सब लोग दर्शन करना चाहते हैं ॥ ३३-३४ ॥ श्रीनारदजी कहते हैं— मैथिलेश्वर! वेदका कथन सुनकर साक्षात् परिपूर्णतम भगवान् श्रीकृष्णने श्रीराधाके साथ अपने परम दिव्य रूपका उन्हें दर्शन कराया । उस अनुपम सुन्दर रूपको देखकर सब लोग मूच्छित हो गये । अपना शरीर तथा सुख भुलाकर वे सभी सात्त्विक भावोंसे पूरित हो गये । राजन्! उस समय अत्यन्त हर्षसे उत्फुल्ल हो वे वाद्योंके मधुर शब्दोंके साथ सत्पुरुषोंके देखते - देखते भगवान्के समक्ष नाचने और गान करने लगे । मैथिलेश्वर! भगवान्का माधुर्यमय अद्भुत रूप जैसा सुना गया था, वैसा ही देखा गया और उसी प्रकार वेद आदिने ( उसका नीचे दिये शब्दोंमें ) वर्णन किया ॥ ३५–३८ ॥ वेदने कहा- देव! आप सत्स्वरूप, ज्ञानमात्र, सत् - असत्से परे, व्यापक, सनातन, प्रशान्तरूप, विभवात्मक, सम, महत्, प्रकाशरूप, परम दुर्गम, परात्पर तथा अपने धाम ( चिन्मय प्रकाश ) द्वारा भ्रम एवं अज्ञानके अन्धकारको निरस्त करनेवाले ' ब्रह्म '
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३७४ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ विश्वजित्खण्ड हैं; आपको मैं प्रणाम करता हूँ ' ॥३ ९ ॥ सरस्वती बोलीं- भगवन्! योगीलोग आपको परम ज्योतिःस्वरूप जानते हैं, वहीं भक्तजन आपको चिन्मय विग्रहसे युक्त बताते हैं । इस समय जो आपके चरणारविन्दयुगल देखे गये हैं, वे समस्त ज्योतियोंके अधीश्वर हैं । वे सदा मेरे लिये कल्याणकारी हों २॥४० ॥
गन्धर्व बोले — प्रभो! श्याम और गौर तेजके रूपमें अपने ही प्रकाशसे प्रकाशित जो आपका तेजोमय स्वरूप है, वह आपने अपनी इच्छासे प्रकट किया है । उन्हीं युगल धामों ( स्वरूपों ) से आप नित्य उसी प्रकार पूर्णतया विराजित रहते हैं, जैसे मेघ श्याम वर्ण तथा बिजलीसे शोभा पाता है ॥ ४१ ॥
अप्सराओंने कहा— जैसे तमाल सुवर्णमयी लतासे, मेघ विद्युन्मालासे तथा जैसे नील गिरिराज सोनेकी खानसे सुशोभित होता है, उसी प्रकार आप आदिपुरुष श्यामसुन्दर अपनी प्रेयसी श्रीराधारानीके नित्य साहचर्यसे शोभा पाते हैं ॥ ४२ ॥
तीनों ग्राम बोले- जिनके चरणारविन्दोंके पावन परागको शिव, रमा ( लक्ष्मी ), ज्ञानीपुरुष तथा देवताओं सहित श्रीराधा अपने चित्तमें धारण करना चाहती हैं, माधवके उन चरण - कमलोंका सदा भजन करो ॥ ४३ ॥
तालोंने कहा- जिनके कारण राजा बलि सत्स्वरूप होकर प्रतिष्ठित हुए, उन्हीं भगवान्को बलि अर्पित करनी चाहिये । अपने संतप्त चित्तरूपी गुफामें श्रीहरिके उस चरणको ही प्रतिष्ठित करके उसकी सेवा करो 1188 । 11 गान ( लय ) बोले- संतजन जिनकी शरण लेकर दुःख - शोकको निकाल फेंकते हैं, श्रीराधा-माधवके उन दिव्य चरण - कमलोंको हम सदा हृदयमें धारण करें ७ ॥ ४५ ॥
स्वर बोले— जो शरद् ऋतुके प्रफुल्ल पङ्कजकी शोभाको अत्यन्त तिरस्कृत कर देते हैं, मुनिरूपी भ्रमर जिनका आस्वादन करते हैं, जो वज्र, कमल और शङ्ख आदिके चिह्नोंसे सुशोभित हैं, जिनपर सोनेके नूपुर चमक रहे हैं तथा जिन्होंने भक्तोंके त्रिविध तापोंका उन्मूलन कर दिया है, श्रीराधावल्लभके उन चञ्चल-द्युतिशाली युगल चरणारविन्दोंको मैं हृदयमें धारण ८ करता ॥ ४६ ॥
इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें विश्वजित्खण्डके अन्तर्गत नारद - बहुलाश्व - संवादमें ' वेदादिके द्वारा की गयी स्तुतिका वर्णन ' नामक चौवालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४४ ॥
१. सज्ज्ञानमात्रं सदसत्परं बृहच्छश्वत् प्रशान्तं विभवं समं महत् ।
त्वां ब्रह्म वन्दे वसु दुर्गमं परं सदा स्वधाम्ना परिभूतकैतवम् ॥
२. महः परं त्वां किल योगिनो विदुः सविग्रहं तत्र वदन्ति सात्त्वताः ।
दृष्टं तु यत्ते पदयोर्द्वयं मे क्षेमाय भूयान्महसामधीश्वरम् ॥
३. श्यामं च गौरं विदितं स्वधाम्ना कृतं त्वया धाम निजेच्छया हि ।
विराजसे नित्यमलं च ताभ्यां घनो यथा मेचकदामिनीभ्याम् ॥
४. यथा तमालः कलधौतवल्लया घनो यथा चञ्चलया चकास्ति ।
नीलोऽद्रिराजो निकपाश्मखन्या श्रीराधेयाऽऽद्यस्तु तथा रमण्या ॥
५. यस्य पदस्य परागं शम्भुरमाकविदेवैः । इच्छति चेतसि राधा तं भज माधवपादम् ॥
६. येन बलिः सद्विहरेत्तद्वलिमेव हरेत । तं भज पादं तु हरेश्चेतसि तप्ते कुहरे ॥
७. उत्क्षिपन्ति बहिर्दुःखं सन्तो यच्छरणं गताः । राधामाधवयोर्दिव्यं दधान पदपङ्कजम् ॥
८. शरद्विकचपङ्कजश्रियमतीव विद्वेषकं मिलिन्दमुनिलेहितं कुलिशकंजचिह्नावृतम् ।
स्फुरत्कनकनूपुरं दलितभक्ततापत्रयं चलद्युति पदद्वयं हृदि दधामि राधापतेः ॥
( गर्ग ०, विश्वजित् ०, ४४।३ ९ —४६ )