गर्ग संहिता — पृष्ठ 381–390

गर्ग संहिता · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 381–390

पृष्ठ 381

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पैंतालीसवाँ अध्याय रागिनियों तथा राग - पुत्रोंद्वारा भगवान् श्रीकृष्णका स्तवन और उनका द्वारकापुरीके लिये प्रस्थान श्रीनारदजी कहते हैं - राजन्! तदनन्तर भैरव आदि रागगण भगवान् श्रीहरिके सामने उपस्थित हुए और रूपके अनुरूप उनके प्रत्येक अवयवका दर्शन करके अत्यन्त हर्षित हुए । श्रीहरिके विग्रहमें जिस-जिस अङ्गपर उनकी दृष्टि पड़ती थी, वहीं - वहीं वह ठहर जाती थी । लावण्य - विशेषका अनुभव करके वह वहाँसे हटनेमें समर्थ नहीं होती थी । भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र-के उस अत्यन्त अद्भुत रूपका दर्शन करके वे भी पृथक् - पृथक् उसका गुणगान करने लगे ॥ १–३ ॥ भैरव बोला — श्रीहरिके दोनों घुटनोंका चिन्तन करो, जिन्हें सदा अङ्कमें लेकर कमला अपने कमलोपम करोंसे उनकी सेवा करती हैं ॥ ४ ॥

मेघमल्लारने कहा - सर्वव्यापी भगवान् श्रीकृष्णकी दोनों जाँघें, मानो कदलीखण्ड हैं, सोनेके खंभे हैं, तेजसे पूर्ण हैं, अनुपम शोभासे सम्पन्न हैं तथा पीताम्बरसे ढकी हुई हैं । उन दोनों वन्दनीय ऊरु युगलका मैं ध्यान करता हूँ ॥५ ॥

दीपक रागने कहा - भगवान्‌के कटिभागसे नीचे जो सम्पूर्ण चरण हैं, वे समस्त सुखोंको देनेवाले हैं तथा सुवर्णकी - सी कान्ति धारण करते हैं, उन सुप्रसिद्ध चरणोंका भजन करो ॥६ ॥

मालकोश बोला- भगवान् श्रीहरिकी जो कमर है, वह केशके समान अत्यन्त पतली है और वह मनुष्योंकी दृष्टिका मान हर लेती है, अर्थात् उस कटिको देखनेमें दृष्टि समर्थ नहीं हो पाती; वह मन्द-मन्द समीरके चलनेपर भी अत्यन्त कम्पित होने या लचकने लगती है । इस प्रकार वह सबके चित्तको हर लेनेवाली है । मैं विनम्र मस्तक से उसकी वन्दना करता हूँ ॥७ ॥

श्रीराग बोला - राधिकावल्लभका जो नाभि-सरोवर है, उसका मैं अपने हृदयमें प्रतिदिन ध्यान करता हूँ । वह पुष्करकुण्डके समान शोभा पाता है । त्रिवलीरूप लहरोंसे उसकी मनोहरता बढ़ गयी है और वहाँकी रोमावलीने कामदेवके क्रीडा - काननको तिरस्कृत कर दिया है ॥८ ॥

हिन्दोल रागने कहा- उदरमें जो त्रिवलीकी पंक्ति है, वह क्या अक्षरोंकी पंक्ति ( वर्णमाला ) है? अथवा पीपलके पत्तेपर मोहन - माला दिखायी देती है? क्या कमलदलपर कोई श्याम रेखा है या उदरमें यह रोमावलि फैली हुई है? ॥ ९ ॥

भैरवरागकी रागिनियाँ बोलीं- - श्रीकृष्ण हरिका जो पीताम्बर है, वह दीप्तिमान् इन्द्रधनुष तो नहीं है? सोनेके तारोंकी शिल्पकलाद्वारा वह मनोहर ढंगसे टँका हुआ है । उसका ही भजन करो, वह मनुष्योंका दुःख हर लेनेवाला है ॥१० ॥

भैरवके पुत्रोंने कहा - भगवन्! आपकी चारों भुजाएँ चारों समुद्रोंके समान सम्पूर्ण विश्वको परिपूर्ण करनेवाली हैं, चार पदार्थोंके समान आनन्ददायिनी हैं, लोकरूपी चंदोवाके वितानमें दण्डका काम देती हैं तथा भूमिको धारण करनेमें दिग्गजोंके समान प्रतीत होती हैं ॥११ ॥

मेघमल्लारकी रागिनियाँ बोलीं- सर्ववल्लभ भूमिपति भगवान् श्रीहरिके मधुर अधरका, हे मन! तू सदा चिन्तन कर । वह लाल रंगके बिम्बफलकी - सी कान्तिसे मण्डित है तथा नूतन जपाकुसुमके लाल दलोंकी भाँति उसका सुन्दर स्वरूप है ॥ १२ ॥

मेघमल्लारके बेटे बोले- परमेश्वर! श्रीकृष्णकी जो निर्मल दन्त- पङ्क्ति है, उसका सदा ध्यान करो । उसने कपूर, केवड़ेके फूल, मोती, हीरे, श्रीखण्ड चन्दन, चन्द्रमा, चपला, अमृत तथा मल्लिका पुष्पोंकी कान्तिको पहलेसे ही तिरस्कृत कर दिया है ॥ १३ ॥

दीपक रागकी रागिनियोंने कहा- भगवन्! निजजनोंकी रक्षा करनेमें समर्थ तथा अभीष्ट वस्तु देनेमें दक्ष जो आपके युगल नयनोंका कृपाकटाक्ष है, वह रात - दिन हमारी रक्षा करे । वह कटाक्ष कामदेवके बाणोंका परीक्षक है - उससे भी तीव्र शक्तिवाला है । उसने सम्पूर्ण लावण्यकी दीक्षा ले ली है, अर्थात् वह समस्त लावण्यकी राशि है । उसने अपनी उदारता के

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३७६ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ विश्वजित्खण्ड सामने कल्पवृक्षको भी तिरस्कृत कर दिया है तथा उसके एक - दो नहीं, करोड़ों लक्ष्य हैं ॥ १४ ॥

दीपके पुत्र ' बोले- क्या ये नूतन कमलके बीच दो कुलिङ्ग ( गौरैया ) पक्षी बैठे हैं या तीनों लोकोंके दुःखोंका नाश करनेके लिये दो तीखी तलवारें हैं या कामदेवके दो विजयशील धनुष हैं, अथवा परमात्मा श्रीकृष्णके मुखचन्द्रमें युगल धूमण्डल शोभा पा रहे हैं ॥१५ ॥

मालकोशकी रागिनियोंने कहा - सुन्दर कपोलमण्डलपर दो चञ्चल कुण्डल नृत्य कर रहे हैं, मानो चन्द्रमण्डलमें दो नागिनें नाच रही हों, अथवा मकरन्दसे परिपूर्ण कमलपर भ्रमरावली मँडरा रही हो ॥ १६ ॥

मालकोशके पुत्र बोले- आकाश - मण्डलमें सूर्यदेव उदित हुए हैं या मेघमालामें बिजली चमक रही है अथवा यदुपति भगवान् श्रीकृष्णके गण्डमण्डल ( कपोलद्वय ) पर ज्योतिके खण्ड - सा कनक - निर्मित कुण्डल झलमला रहा है ॥ १७ ॥

श्रीरागकी रागिनियाँ बोलीं- दो कुलिङ्ग किंवा दो खञ्जन पक्षियोंकी पंक्तियोंका परस्पर युद्ध हुआ । उनके मध्यमें बीच - बचाव करनेके लिये प्रफुल्ल कमलपर एक तोता निकट आ गया है, जो अरुण बिम्बफलको प्राप्त करनेकी इच्छासे वहाँ बैठा शोभा पाता है ( यहाँ कुलिङ्ग या खञ्जन पक्षी भगवान्‌के दोनों नेत्र हैं, उनके बीचमें बैठा हुआ तोता नासिका है, प्रफुल्ल कमल मुख है और अरुण बिम्बफल अधर है ) ॥ १८ ॥

श्रीरागके पुत्र बोले- जिन्होंने अपनी कमरमें पीताम्बर बाँध रखा है, मस्तकपर मोर मुकुट धारण किया है और ग्रीवाको एक ओर झुका दिया है, जो हाथमें लकुटी और वंशी लिये हैं तथा जिनके कानोंमें कुण्डल हिल रहे हैं, उन पटुतर नटवर - वेषधारी श्रीहरिका मैं भजन करता हूँ? ॥१ ९ ॥ हिन्दोलरागकी रागिनियाँ बोलीं- जिनकी श्याम कान्तिकी अलसीके फूलसे उपमा दी जाती है, जो यमुनाके तटपर कदम्ब काननके मध्यभागमें विराजमान हैं तथा नयी अवस्थाकी गोपसुन्दरियोंके साथ विहार करते हुए शोभा पाते हैं, वे वनमाली हम सबके मङ्गलका विस्तार करें २ ॥२० ॥

हिन्दोलरागके पुत्रोंने कहा- हरे! भूतलपर मेरे समान पातकी नहीं है और आपके समान कोई पापाहारी भी नहीं है । इसलिये आपको जगन्नाथदेव मानकर मैं शरणमें आया हूँ । आपकी जैसी इच्छा हो, वैसा मेरे प्रति कीजिये ॥ २१ ॥

नारदजीने कहा- राजन्! रागोंद्वारा किये गये उपर्युक्त ध्यानको जो सदा सुनता अथवा पढ़ता है, भक्तवत्सल भगवान् श्रीकृष्ण उसके नेत्रोंके समक्ष प्रकट हो जाते हैं । इस प्रकार वेद आदिको अपने स्वरूपका दर्शन कराके साक्षात् श्रीहरि उन सबके देखते - देखते चतुर्भुज शार्ङ्गपाणि बन गये ॥२२-२३ ॥ इस प्रकार श्रीकृष्णका दर्शन करके जब देवता-लोग अपने गणोंके साथ चले गये, तब सेनामें अपने पुत्र यदुकुलतिलक शम्बर- शत्रु प्रद्युम्नको स्थापित करके परात्पर भगवान् श्रीहरिने अपनी द्वारकापुरीमें जानेका विचार किया । मिथिलेश्वर! उनके रथपर मञ्जीर, घंटा और किङ्किणीकी मधुर ध्वनि होने लगी । सुन्दर कांस्यपात्र ( झाँझ ) की आवाज भी उसमें मिल गयी । दारुकने उस रथमें सुग्रीव आदि चञ्चल घोड़े जोत दिये । वह उत्तम रत्नयुक्त आभूषणोंसे सजाया गया था, उसके आगे वेद- मन्त्रोंका घोष भी होता था और उसके ऊपरका गरुडध्वज प्रभञ्जनके वेगसे फहरा रहा था । ऐसे रथके द्वारा वेदपुरीको छोड़कर परमात्मा श्रीहरि यादववृन्दसे मण्डित द्वारकापुरीको चले गये॥२४-२७ ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें विश्वजित्खण्डके अन्तर्गत नारद - बहुलाश्व - संवादमें ' श्रीकृष्णके ध्यानका वर्णन ' नामक पैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४५ ॥

१. परिकरीकृतपीतपटं हरिं शिखिकिरीटनटीकृतकन्धरम् । लगुडवेणुकरं चलकुण्डलं पटुतरं नटवेषधरं भजे ॥ ( गर्ग ०, विश्वजित् ० ४५ । १ ९ ) २. अतसीकुसुमोपमेयकान्तिर्यमुनाकूलकदम्बमध्यवर्ती । नवगोपवधूविहारशाली वनमाली वितनोतु मङ्गलानि ॥ ( गर्ग ०, विश्वजित् ० ४५/२० )

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छियालीसवाँ अध्याय यादवों और गन्धर्वोंका युद्ध, बलभद्रजीका प्राकट्य, उनके द्वारा गन्धर्वसेनाका संहार, गन्धर्वराजकी पराजय, वसन्तमालती नगरीका हलद्वारा कर्षण; गन्धर्वराजका भेंट लेकर शरणमें आना और उनपर बलरामजीकी कृपा नारदजी कहते हैं - राजन्! भगवान् श्रीकृष्णके द्वारकापुरीको चले जानेपर प्रद्युम्न अपने सैनिकोंके साथ कामदुघनदके समीप गये । वहाँ गन्धर्वोंकी मनोहारिणी हेमरत्नमयी वसन्तमालती नामकी नगरी है, जिसका विस्तार सौ योजनका है । लवङ्ग - लताओंके समूह, इलायची, केसर, जायफल, जावित्री, श्रीखण्ड चन्दन और पारिजातके वृक्ष उस पुरीकी शोभा बढ़ाते थे । मतवाले भ्रमरोंके गुञ्जारवसे निनादित, विचित्र पक्षियोंके कलरवसे मुखरित तथा गन्धर्वोंसे सुशोभित वह नगरी नागोंसे युक्त भोगवतीपुरीके समान शोभा पाती थी॥१–४ ॥ वहीं पतंग नामसे प्रसिद्ध महाबली गन्धर्वराज राज्य करते थे, जो बड़े पुण्यात्मा थे और जिनका बल - पौरुष देवराज इन्द्रके समान था । उन्होंने सुना कि दिग्विजयके लिये निकले हुए प्रद्युम्न आ रहे हैं, तब उन गन्धर्वराजने उद्भट गन्धर्वोंसे युक्त होकर युद्ध करनेका निश्चय किया । रथ, घोड़े, हाथी और पैदल दस करोड़ गन्धर्वोंके साथ राजा पतंग प्रद्युम्नके सामने युद्धके लिये आये । गन्धर्वों और यादवोंमें बड़ा भयंकर युद्ध हुआ । भालों, गदाओं, परिघों, मुद्गरों, तोमरों तथा ऋष्टियों की मार होने लगी । बाणोंसे अन्धकार फैल जानेपर अतिरथी बलवान् वीर पतंग धनुषको टंकारते हुए आगे बढ़े और मेघके समान गर्जना करने लगे । बलदेवजीके बलवान् अनुज गदने गदा लेकर गन्धर्वोकी सेनाको वैसे ही धराशायी करना आरम्भ किया, जैसे देवराज इन्द्र वज्रसे पर्वतोंको ढहा देते हैं॥५–१० ॥ गदकी गदाके प्रहारसे कितने ही गन्धर्व युद्धभूमिमें गिर गये, उनके रथ चूर - चूर हो गये और समस्त हाथियोंके कुम्भस्थल फट गये । कितने ही घुड़सवार वीर भी युद्धके मुहाने पर प्राणशून्य होकर पड़ गये । भुजाएँ कट जानेसे कितने ही गन्धर्व उत्तानमुख और औंधेमुख पड़े दिखायी देते थे । क्षणमात्रमें गन्धर्वोकी सेनामें खूनकी नदी बह चली । प्रमथगण भगवान् रुद्रकी मुण्डमाला बनानेके लिये युद्धभूमिमें नरमुण्डोंका संग्रह करने लगे । सिंहपर चढ़ी हुई भद्रकाली सैकड़ों डाकिनियोंके साथ युद्धभूमिमें आकर खप्परमें खून भर - भरकर पीती दिखायी देने लगीं ॥११–१४ ॥ इस तरह गदके द्वारा किये गये युद्धमें जब गन्धर्वगण पलायन करने लगे, तब गन्धर्वोके राजा पतंग एक लाख गजसेनाके साथ वहाँ आ पहुँचे । मिथिलेश्वर! पतंगने आते ही गदकी छातीमें गदा मारी । गदने भी अपनी गदासे पतंगके वक्षपर बलपूर्वक चोट पहुँचायी । उन दोनोंमें दो घड़ीतक गदायुद्ध चलता रहा । उनकी दोनों गदाएँ आगकी चिनगारियाँ बिखेरती हुई चूर - चूर हो गयीं । रणदुर्मद पतंगने लाख भारकी भारी गदा लेकर तुरंत ही गदके मस्तकपर मारी । गदाके उस प्रहारसे गद क्षणभरके लिये मूच्छित हो गये । इस प्रकार महामना पतंगने जब घोर युद्ध किया, तब उसी समय द्वारकापुरीसे एक तेजपुञ्ज आ पहुँचा ॥ १५ – १ ९ ३ ॥ समस्त यादवोंने करोड़ों सूर्योके तुल्य तेजस्वी उस तेजपुञ्जको देखा । उसके भीतरसे गोरे अङ्गवाले महाबली भक्तवत्सल भगवान् बलदेव सहसा प्रकट हो गये । नीलाम्बरधारी बलशाली बलरामने कुपित हो गन्धर्वोंकी सारी सेनाको हलसे खींचकर मुसलसे मारना आरम्भ किया । बहुत - से रथों, हाथियों और घोड़ोंको उन्होंने कालके गालमें पहुँचा दिया । शस्त्र-धारियोंमें श्रेष्ठ वीर सब - के - सब चूर - चूर हुए पत्थरोंकी भाँति एक साथ ही भूतलपर बिखर गये । पतंग भी रथहीन हो भारी भयके कारण वहाँसे वसन्तमालती पुरीमें चले गये और पुनः यादवोंसे युद्ध करनेके लिये सेनाका व्यूह बनाने लगे ॥२० - २४ ॥

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३७८ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ विश्वजित्खण्ड नरेश्वर! सौ योजन विस्तृत गन्धर्वोंकी सम्पूर्ण वसन्तमालती नामकी महापुरीको हलसे उपाटकर कुपित हुए बलदेवजीने कामदुघनदमें गिरानेके लिये खींचा । उस नगरीके भवन धड़ाधड़ धराशायी होने लगे । फिर तो तत्काल वहाँ हाहाकार मच गया । अपनी नगरीको टेढ़ी या करवट लेती हुई नौकाकी भाँति डगमगाती देख पतंग सर्वथा पराभूत हो, तत्काल समस्त गन्धर्वोंके साथ हाथ जोड़, भेंट - सामग्री के साथ वहाँ आ पहुँचा ॥ २५–२७ ॥ उसने दो लाख ऐसे विमान बलदेवजीको भेंट किये, जो सुवर्णके समान कान्तिवाले तथा विविध रत्नोंसे जटित थे । मोतीकी बंदनवारें उनकी शोभा बढ़ाती थीं । विश्वकर्माने उन विमानोंको दस - दस योजन विस्तृत बनाया था । वे सभी विमान इच्छानुसार चलनेवाले तथा कोटि - कोटि कलशों एवं पताकाओंसे सुशोभित थे । उनसे सहस्रों सूर्योंके समान प्रकाश फैल रहा था । चार लाख गौएँ, दस अरब घोड़े, इलाइची, लवङ्ग, केसर और जायफलोंके साथ दिव्य अमृतफलोंसे भरे करोड़ों पात्र उपहारके रूपमें लाकर उन्होंने दिये । फिर वे नमस्कार करके तिरस्कृतकी भाँति हाथ जोड़कर बलरामजीसे बोले, उन्हें बलभद्रजीके प्रभावका पूरा परिचय मिल गया था॥२८–३१३ ॥ पतंगने कहा- राम! महापराक्रमी बलराम! मैंने आपके पराक्रमको पहले नहीं जाना था, इसलिये अपराध कर बैठा । जिनके एक फनपर सारा भूमण्डल तिलके समान दिखायी देता है, उनके सामने कौन ठहर सकता है । भगवन्! कामपाल! देवाधिदेव! आपको नमस्कार है । साक्षात् अनन्त एवं शेषस्वरूप आप बलरामको बारंबार प्रणाम है । अच्युत देव! आपकी जय हो, जय हो । परात्पर! साक्षात् अनन्त! आपकी कीर्ति दिगन्ततक फैली हुई है । आप समस्त देवताओं, मुनीन्द्रों और फणीन्द्रोंसे श्रेष्ठ हैं । मुसलधारी! आप बलवान् हलधरको नमस्कार है * ॥ ३२–३४ ॥ नारदजी कहते हैं- राजन्! पतंगके इस प्रकार स्तुति करनेपर महाबली बलभद्रजीका चित्त प्रसन्न हो गया । उन्होंने गन्धर्वको ' अब तुम मत डरो ' – यों कहकर अभयदान दिया । तदनन्तर यादवेश्वर बलदेव अपने चरणों में पड़े हुए प्रद्युम्नको सेनाके संचालक - पदपर स्थापित करके, यादवोंसे प्रशंसित हो शीघ्र ही द्वारकापुरीको चले गये ॥ ३५-३६ ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें विश्वजित्खण्डके अन्तर्गत नारद - बहुलाश्व - संवादमें ' वसन्तमालती नगरीका कर्षण ' नामक छियालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४६ ॥

सैंतालीसवाँ अध्याय यादव - सेनाके साथ शक्रसखका युद्ध और उसकी पराजय नारदजी कहते हैं- राजन्! तदनन्तर महावीर प्रद्युम्न अपनी विजय- दुन्दुभि बजवाते हुए यादव -सैनिकोंके साथ मधुधारा नदीके तटपर गये । सुवर्ण-गिरिके किनारे कुबेरके सुन्दर वनमें, जो सुनहरे हंसों और काञ्चनी लतिकाओंसे सम्पन्न है, पहुँचे । मिथिलेश्वर! हिमालयकी गुफाएँ देवताओंके लिये दुर्गका काम देती हैं । वहाँ दानवोंकी पहुँच नहीं हो पाती । वहाँ गङ्गातटवर्ती बेंतकी झाड़ियाँ छायी रहती * जय जयाच्युत देव परात्पर स्वयमनन्त दिगन्तगतश्रुते । हैं । कभी - कभी दानवोंसे डरकर स्वर्गसे भागे हुए आठों लोकपालोंकी निधियाँ वहाँ निवास करती हैं ॥१-४ ॥ शक्रसख नामक देव - शिरोमणि उस प्रान्तके अधिपति हैं । प्रद्युम्नका आगमन सुनकर उन्होंने उनके साथ युद्ध करनेका विचार किया । प्रद्युम्रके भेजे हुए बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ साक्षात् उद्धव मार्गदर्शी लोगोंसे रास्ता पूछते हुए शक्रसखकी नगरीमें गये । सभामें पहुँचकर मन्त्रिप्रवर प्रभु उद्धवने राजा इन्द्रसखको नमस्कार सुरमुनीन्द्रफणीन्द्रवराय ते मुसलिने बलिने हलिने नमः ॥ ( गर्ग ०, विश्वजित् ० ४६ । ३४ )

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अध्याय ४७ ] यादव - सेनाके साथ शक्रसखका युद्ध और उसकी पराजय ३७ ९ करके प्रद्युम्रकी कही हुई बातें विस्तारके साथ कह सुनायीं ॥ ५-७ ॥ उद्धव बोले- यादवोंके इन्द्र, द्वारकापुरीके स्वामी राजाधिराज उग्रसेन जम्बूद्वीपके नरेशोंको जीतकर राजसूय यज्ञ करेंगे । उनके द्वारा दिग्विजयके लिये भेजे गये बलवान् रुक्मिणीनन्दन प्रद्युम्र अपने तेजसे भारत आदि वर्षोंको जीतकर आज ही इलावृतवर्षपर विजय पानेके लिये आये हैं । उन श्रीकृष्णकुमारका बल महान् है । यदि आप अपने कुलकी कुशल चाहते हों तो शीघ्र ही उन्हें भेंट दीजिये । सर्वज्ञोंमें श्रेष्ठ नरेश! यदि आप भेंट नहीं देंगे तो आपके साथ युद्ध अनिवार्य होगा ॥८–१०३ ॥ शक्रसख बोले – दूत! सुनो । देवतालोग भी सदा मेरी पूजा करते हैं फिर मनुष्योंकी तो बात ही क्या है । मैं सिद्ध हूँ, महावीर हूँ और एक लाख हाथियोंके समान बलवान् हूँ । आठों लोकपालोंके आधिपत्यका रक्षक हूँ । कुबेरके समान कोशसे सम्पन्न तथा इन्द्रके समान उद्भट शक्तिशाली हूँ । उग्रसेनको ही मुझे उत्तम उपायन भेंट करना चाहिये । मैंने पहले कभी किसीको भेंट नहीं दी है, इसलिये मैं तुम्हारे यदुराजको भी भेंट नहीं दूँगा ॥११–१३ ॥ उद्धव बोले- यादवोंके तेजसे जैसे कुबेरको तिरस्कार प्राप्त हुआ है और उन्हें भेंट देनी पड़ी है; जैसे चैत्रदेशके बलवान् राजा शृङ्गारतिलकने भेंट दी है; हरिवर्षके राजा शुभाङ्ग, उत्तराखण्डके स्वामी गुणाकर, दैत्योंके सखा राक्षसराज लङ्कापति संवत्सर, केतुमाल और शकुनि आदि बड़े - बड़े असुरोंने जैसे भेंट दी है, राजन्! उसी तरह उन्हींकी - सी दुर्दशामें पड़नेपर आप भी प्रद्युम्नको भेंट देंगे ॥१४–१६ ॥ नारदजी कहते हैं - राजन्! उद्धवकी उपर्युक्त बात सुनकर बलवान् शक्रसखने कुपित हो उद्धवको इस प्रकार उत्तर दिया— ' भगवद्भक्त - शिरोमणे! सुनो । जबतक मैं भेंट दूँ, तबतक तुम यहीं ठहरो । अन्यथा तुम जाने नहीं पाओगे । महामते! मेरी यह बात सत्य है, सत्य है ॥ १७-१८ ॥ उद्धव बोले- हम मन्त्रियोंमें श्रेष्ठ और श्रेष्ठ ज्ञान प्रदान करनेवाले हैं । जो हमारी शिक्षा नहीं मानते उनका मङ्गल नहीं होता ॥ १ ९ ॥ नारदजी कहते हैं- राजन्! इस प्रकार शक्रसखने उद्धवको वहाँ नजरबंद कर लिया । उद्धवके नहीं लौटनेसे यदुवंशी लोग चिन्तित हो गये । उन्हें देखे बिना उन सबके कई दिन बीत गये । तब मेरे मुखसे उद्धवजीके अवरोधका समाचार सुनकर भगवान् प्रद्युम्न हरि त्रिपुरासुरको जीतनेके लिये यात्रा करनेवाले महादेवजीके समान शक्रसखपर विजय पानेके लिये चले । उनके साथ समस्त यादव - बन्धु और सारी सेना थी । प्रद्युम्रजी सुवर्णादिकी गुफाके द्वारपर जा पहुँचे । दुन्दुभियोंकी ध्वनिसे मिश्रित वीर योद्धाओंके कोदण्डोंकी टंकारों, घोड़ोंके हिनहिनाहटंकी आवाजों तथा हाथियोंकी चिग्घाड़ोंसे दसों दिशाएँ गूँज उठीं । सैनिकोंके पैरोंसे उड़ी हुई धूल भी सब ओर व्याप्त हो गयी । शक्रसखकी सेना यादवोंसे युद्ध करने लगी । भयंकर युद्ध होने लगा, व्योममण्डल अस्त्र - शस्त्रोंसे आच्छादित हो गया । नृपेश्वर! यह सब देखकर मेरुपर्वतके निवासी समस्त देवता भयभीत हो उठे ॥ २० - २४ ॥ इसी समय क्रोधसे भरा और रथपर चढ़ा महाबली शक्रसख दस अक्षौहिणी सेनाके साथ आगे बढ़कर यादवोंके साथ युद्ध करने लगा । देवताओंका यादवोंके साथ तुमुल युद्ध छिड़ गया । राजन्! प्राकृत प्रलयके समय चारों समुद्रोंके टकरानेसे जैसी भीषण ध्वनि होती है, वैसा ही महान् कोलाहल वहाँ होने लगा । अस्त्र - शस्त्रोंसे वहाँ अन्धकार - सा छा गया । उस समय बलदेवके छोटे भाई रोहिणीनन्दन वीर सारण कवच धारण किये, हाथीपर बैठकर, बारंबार धनुषकी टंकार करते हुए सबसे आगे आ गये और अपने कोदण्डसे छूटे हुए बाणद्वारा शक्रसखकी सेनाका संहार करने लगे । सारणके बाणसमूहोंसे कितने ही वीरोंके दो - दो टुकड़े हो गये । युद्धभूमिमें बहुत - से रथ करवट लेकर वृक्षोंके समान धराशायी हो गये । उस समय जिनके कुम्भस्थल फट गये थे, उन हाथियोंके मोती इधर - उधर गिर रहे थे, बाणोंके अन्धकारमें वे बिखरे हुए मोती रात्रिकालमें तारागणोंके समान चमकने लगे । कटते हुए घोड़ों, पैदल योद्धाओं तथा हाथियोंसे वह

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३८० गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ विश्वजित्खण्ड समराङ्गण भूतगणोंसे युक्त भूतनाथके क्रीड़ास्थल महाश्मशान - सा जान पड़ता था । सारणका बल देखकर सब देवता भाग चले । उनके कोदण्ड छिन्न - भिन्न हो गये, कवच चारों ओरसे फट गये ॥ २५–३३ ॥ अपनी सेनाको पलायन करती देख बलवान् शक्रसख धनुष टंकारता हुआ वहाँ आ पहुँचा और बड़े जोरसे मेघकी भाँति गर्जना करने लगा । वीर धनुर्धर बलवान् शक्रसखने समराङ्गणमें अर्जुनको दस, साम्ब और अनिरुद्धको सौ - सौ गदको दो सौ तथा सारणको एक सहस्र बाण मारे । उसके बाणोंकी मारसे रथी वीर दो - दो घड़ीतक उसी प्रकार चक्कर काटने लगे, जैसे कुम्हारके चाक घूम रहे हों । वह अद्भुत -सी बात हुई । उस तरह चक्कर काटनेसे घोड़े मृत्युके ग्रास बन गये, रथोंके बन्धन ढीले पड़ गये, रथियोंके मनमें खेद होने लगा और सारथि भी युद्धमें मूच्छित हो गये ॥ ३४–३८ ॥ राजेन्द्र! उस समय जाम्बवतीनन्दन साम्ब दूसरे रथपर आरूढ़ हो बलपूर्वक धनुष टंकारते हुए आये । उन्होंने शक्रसखके धनुषको दस बाणोंसे छिन्न - भिन्न कर डाला । दो बाणोंसे उसके सारथिको और सौ बाणोंसे घोड़ोंको यमलोक भेजकर सहस्र बाणोंद्वारा उसके रथको भी चूर - चूर कर दिया । धनुषके कट जाने तथा घोड़ों और सारथिके मारे जानेपर रथहीन हुए शक्रसखने मतवाले गजराजपर आरूढ़ हो रोषपूर्वक शूल हाथमें ले लिया । बलवान् शक्रसखने उस शूलसे साम्बकी छातीमें चोट की । उस आघातसे साम्बका मन कुछ व्याकुल हो गया ॥ ३ ९ –४२ ॥ शक्रसखका हाथी एक - एक योजनका डग भरता था । उसका रंग कज्जलगिरिके समान काला था । इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें विश्वजित्खण्डके युद्ध ' नामक सैंतालीसवाँ उसकी ऊँचाई चार योजनकी थी । उसकी दो दाँत आधे योजनतक आगे निकले हुए थे । वह बड़े जोरसे चिग्घाड़ता था । उसके चार चार योजन विस्तृत तीन सूँड़ें थीं । उनके द्वारा वह साँकलोंको गिराता, हाथियों और वीरोंको कुचलता तथा रथों और घोड़ोंको इधर - उधर दाँतों और पैरोंसे विनष्ट करता हुआ काल, अन्तक और यमके समान दिखायी देता था । शत्रुसे प्रेरित उस महान् गजराजको आते और विचरते हुए देख यादव - सैनिक भयभीत हो युद्धसे भाग चले ॥ ४३–४६ ॥ उस समय बलदेवजीके छोटे भाई बलवान् गदने गदा लेकर उस वज्र - सरीखी गदासे उक्त गजराजके कुम्भस्थलपर बड़े जोरसे आघात किया । उस आघातसे उसका कुम्भस्थल फट गया और वह हाथी युद्धस्थलमें पंख कटे हुए पर्वतके समान ढह गया । वह अद्भुत - सी बात हुई ॥ ४७-४८ ॥ तदनन्तर शक्रसखने ज्यों ही रोषपूर्वक गदा उठानेकी चेष्टा की, त्यों ही गदने अपनी गदासे उसकी छातीमें चोट पहुँचायी । उस आघातसे वह हाथीसहित गिर पड़ा और मूर्च्छित हो गया । फिर उठकर उसने युद्धस्थलमें दोनों हाथोंसे गदा उठायी । गद और शक्रसख दोनों इस प्रकार परस्पर गदायुद्ध करने लगे, जैसे रङ्गशालामें दो मल्ल और जंगलमें दो हाथी लड़ रहे हों । तब बलदेवके छोटे भाई बलवान् गदने अपनी दोनों भुजाओंसे उस वीरको उठा लिया और बलपूर्वक उसे सौ योजन ऊपर उसके नगरमें फेंक दिया । उस समय यादव - सेनामें जय - जयकार होने लगी, विजय-की दुन्दुभियाँ बज उठीं और सब लोग बारंबार गदकी प्रशंसा करने लगे ॥ ४ ९ -५३ ॥ अन्तर्गत नारद - बहुलाश्व - संवादमें ' शक्रसखका अध्याय पूरा हुआ ॥ ४७ ॥

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अड़तालीसवाँ अध्याय शक्रसखका प्रद्युम्नको भेंट अर्पण, प्रद्युम्नका लीलावतीपुरीके स्वयंवरमें सुन्दरीको प्राप्त करना तथा इलावृतवर्षसे लौटकर भारत एवं द्वारकापुरी में आना श्रीनारदजी कहते हैं - राजन्! अपने नगरमें गिरकर शक्रसख अत्यन्त मूच्छित हो गया । फिर उस मूर्च्छासे वह उठा । उठनेपर भी एक क्षणतक उसे बड़ी घबराहट रही ॥ १ ॥

तदनन्तर श्रीकृष्णकुमार प्रद्युम्नको परब्रह्म जानकर शक्रसख बड़ी उतावलीके साथ अपनी भेंट - सामग्री लेकर यादव- सेनाके समीप गया । ऐरावतकुलमें उत्पन्न हुए तीन सूँड़ और चार दाँतवाले श्वेत रंगके एक हजार मदवर्षी हाथी, सुवर्णगिरिपर उत्पन्न हुए दो योजन विस्तृत शरीरवाले तथा दिग्गजोंके समान उन्मत्त पर्वताकार एक करोड़ हाथी, जिनके मुख दिव्य थे और जिनकी गति भी दिव्य थी, करोड़ोंकी संख्यामें उपस्थित किये गये । राजन्! इन सबके साथ सोनेके बने हुए उत्तम दिव्य रथ भी थे, जिनकी संख्या सौ अरब थी । दस हजार विमान भेंटके लिये लाये गये, जो दो - दो योजन विस्तारसे सुशोभित थे । दस लाख कामधेनु गौएँ और एक हजार पारिजात वृक्ष प्रस्तुत किये गये । तड़ागों में परिपुष्ट हुए सीपके मोती, जो यन्त्रपर चढ़ाकर चमकाये गये थे तथा चमेलीके इत्रसे आर्द्र, शिरीष -कुसुमसे सज्जित तथा दूधके फेनकी तरह सफेद करोड़ों शय्याएँ लायी गयीं, जिनपर सुन्दर तकिये भी रखे गये थे । हाथीके दाँतकी बनी हुई उनकी पाटियाँ रत्नोंसे जटित थीं और उनके पायोंमें भी सुवर्ण तथा रत्न जड़े गये थे । विचित्र वितान ( चंदोवे ) और दीवारों पर लगाये जानेवाले वस्त्र करोड़ोंकी संख्यामें भेंट किये गये । छूनेमें कोमल एवं चितकबरे आसन तथा विश्वकर्माद्वारा रचित बड़े - बड़े तकिये दिये गये, जो मोतियोंके गुच्छों और सुवर्णरत्र आदिके द्वारा खचित थे । वे सब सहस्रोंकी संख्यामें थे । हजारों परदे, करोड़ों पालकियाँ, छत्र, चँवर और दिव्य सिंहासनोंके साथ करोड़ों व्यजन, जो राजलक्ष्मीके भूषण थे, प्रस्तुत किये गये । कोटि द्रोण- अमृत, सुधर्मा सभा, सर्वतोभद्र मण्डल, सहस्रदल कमल, हीरे पन्ने और मोती दिये गये । कोटि भार गोमेद और नीलम दिये गये, सहस्रों भार सूर्यकान्त, चन्द्रकान्त और वैदूर्य मणियोंके थे । कोटि भार स्यमन्तक मणियोंके लाये गये थे । नरेश्वर! पद्मराग मणिके भारोंकी संख्या एक अरब थी । जाम्बूनद सुवर्ण, हाटक सुवर्ण तथा सुवर्णगिरिसे प्राप्त सुवर्णोंके भी कोटि - कोटि भार प्रस्तुत किये गये ॥ २–१६ ॥ मैथिलेश्वर! आठ लोकपालोंके आधिपत्यकी रक्षा करनेवाला शक्रसख अपना राज्य तथा देवताओंकी सम्पूर्ण निधियोंको भेंटके लिये लेकर उद्धवजीके साथ यादव- सेनाके पास गया और कुशलताके लिये वह अद्भुत भेंट अर्पित करके उसने प्रद्युम्नको हाथ जोड़कर प्रणाम किया । शम्बरशत्रु प्रद्युम्रने संतुष्ट होकर उसे रत्नमाला अर्पित की और उस राज्यपर उसीको पुनः स्थापित कर दिया । राजन्! सत्पुरुषोंका ऐसा ही स्वभाव होता है॥१७–१९ ॥ इस प्रकार जिसने प्रद्युम्नको भेंट दी थी, उस शक्रसखको जीतकर वे सेनासहित आगे गये । अब उनके सैनिकोंकी छावनी अरुणोदा नदीके तटपर पड़ी । महामूल्य रत्नोंसे जटित चंदोवे सौ योजनतक तन गये । वहाँ दिव्य पताकाएँ फहराने लगीं और वहाँकी भूमिपर विजय ध्वजकी स्थापना हो गयी । उन ध्वजा - पताकाओंके कारण वह शिविरसमूह उत्ताल तरंगोंसे युक्त महासागरकी भाँति शोभा पाने लगा ॥ २०-२१३ ॥ राजन्! इसी समय आकाशसे ऐरावतपर चढ़े हुए देवराज इन्द्र सहसा सेनासहित वहाँ उतर आये । देवताओंकी दुन्दुभियाँ भी उनके साथ - साथ बजती आयीं । यह देख सम्पूर्ण यादव- वीरोंने बड़े वेग से अपने अस्त्र - शस्त्र उठा लिये । पुनः देवराज इन्द्रको पहचानकर समस्त नरेश बड़े प्रसन्न हुए । उस समय

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३८२ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ विश्वजित्खण्ड इन्द्रने भरी सभामें प्रद्युम्नसे कहा - " महाबाहु नरेश! तुम परावरवेत्ताओंमें श्रेष्ठ हो, अतः मेरी बात सुनो । सुवर्णगिरिके शिखरों पर लीलावती नामसे प्रसिद्ध एक सुन्दर पुरी है । वहाँ विद्याधरोंके राजा सुकृति राज्य करते हैं । उनकी एक सुन्दरी नामवाली कन्या है, जो सौ चन्द्रमाओंके समान रूप- लावण्यसे सुशोभित और परम सुन्दरी है । राजन्! उसके स्वयंवरमें समस्त लोकपाल और देवता दिव्यरूप धारण करके आये हैं; किंतु वह राजकन्या कहती है कि ' जिसको देखकर मैं मूच्छित हो जाऊँगी, वही मेरा पति होगा । ' यह बात कहकर वह सुन्दर वर पानेकी इच्छा रखती है । तुम उस उत्सवमें भी अपने समस्त भाइयोंके साथ सहसा चलो और देववृन्दसे मण्डित उस सुन्दर स्वयंवरको देखो " ॥२२–२९ ॥ नारदजी कहते हैं - राजन्! यह सुनकर भगवान् प्रद्युम्र अपने यदुवंशी भाइयोंसहित देवेन्द्रके साथ सहसा लीलावतीपुरीमें गये । जहाँ स्वयंवर हो रहा था, वहाँका प्राङ्गण बड़ा विशाल था । जड़े गये रत्नोंके कारण उसकी मनोहरता बढ़ गयी थी । उस स्थानपर चन्दन, अगर, कस्तूरी और केसरके द्रवका छिड़काव किया गया था । मोतीकी बंदनवारों, बहुमूल्य वितानों और जाम्बूनद सुवर्णके आसनोंसे वह स्वयंवर - भवन साक्षात् दूसरे इन्द्रलोक - सा शोभा पाता था ॥ ३०-३२ ॥ नरेश्वर! प्रद्युम्र उस स्वयंवरमें गये और सिंह जैसे किसी पर्वतके शिखरपर बैठता है, उसी प्रकार सबके देखते - देखते एक दिव्य आसनपर विराजमान हुए । मैथिल! वहाँ जितने प्रजापति, मुनि, देवता, रुद्रगण, मरुद्गण, आदित्यगण, वसुगण, अग्नि, दोनों अश्विनी -कुमार, यम, वरुण, सोम, कुबेर, इन्द्र, सिद्ध, विद्याधर गन्धर्व, किंनर तथा अन्यान्य सभी समागत एवं रत्नाभरणोंसे विभूषित देव थे, उन्होंने प्रद्युम्नको आया देख अपने विवाहकी आशा छोड़ दी ॥ ३३–३६ ॥ इसी समय सुन्दरी हाथमें रत्नमाला लिये अपने रूपलावण्यसे रति और रम्भाको भी तिरस्कृत करती हुई - सी निकली । वह वराङ्गी अङ्गना सरस्वती, लक्ष्मी तथा रूपवती शचीकी विडम्बना करती हुई - सी जान पड़ती थी । मैथिल! जिसे देखकर सब ओर समस्त सभासद् मोहको प्राप्त हो गये, वह लक्ष्मीके समान राजकुमारी सुन्दरी सब लोगोंके सामने अपने लिये योग्य वरकी इस प्रकार खोज करने लगी, मानो चपला नूतन जलधरको ढूँढ़ रही हो ॥ ३७-३८ ॥ दिव्याम्बरधारी तथा प्रफुल्ल कमलदलके समान विशाल लोचनवाले नरलोकसुन्दर वीर प्रद्युम्नके पास पहुँचकर वह सुन्दरी विद्याधरी मूच्छित हो गयी । फिर थोड़ी ही देरमें उसे चेत हुआ । वह उठी और आनन्द-विभोर होकर प्रद्युम्नके गलेमें सुन्दर माला डालकर खड़ी रह गयी । मिथिलेश्वर! विद्याधरोंके राजा सुकृतिने अपनी पुत्री सुन्दरीको प्रद्युम्नके हाथमें दे दिया । सब ओर माङ्गलिक वाद्य बज उठे, किंतु इस वैवाहिक मङ्गलको देखकर देवतालोग सहन न कर सके । उन लोगोंने उस स्वयंवरको चारों ओरसे उसी प्रकार घेर लिया, जैसे प्रचण्ड मेघोंने सूर्यदेवको आच्छादित कर लिया हो । उन देवताओंको क्रोधके वशीभूत हो धनुष उठाये और युद्धके मदसे उद्धत हुए देख साक्षात् प्रद्युम्न हरिने भगवान् श्रीकृष्णके दिये हुए बाणसहित श्रेष्ठ धनुषको हाथमें लेकर यादवोंके साथ सिंहनाद किया । मिथिलेश्वर! उनके धनुषसे छूटे हुए चमकीले बाणोंद्वारा देवताओंके अस्त्र - शस्त्र छिन्न - भिन्न हो गये, उनके कवचोंकी धज्जियाँ उड़ गयीं । जैसे सूर्यकी किरणोंसे कुहासे के बादल फट जाते हैं, उसी प्रकार वे देवता दसों दिशाओंमें भाग खड़े हुए ॥ ३ ९ - ४३ ॥ इस प्रकार साक्षात् भगवान् प्रद्युम्न स्वयंवर जीतकर और इलावृतखण्डपर विजय पाकर भारतवर्षको जानेके लिये उद्यत हुए । भाइयों, यादवों, सैनिकों तथा समस्त मन्त्रीजनोंके साथ विजय- दुन्दुभि बजवाते हुए वे भारत-खण्डमें आये । अनेक देशोंको देखते हुए जम्बूद्वीप विजयी बलवान् वीर श्रीकृष्णकुमार क्रमशः आनर्त-प्रदेशमें और द्वारकाके देशोंमें आये । प्रद्युम्नके द्वारा भेजे गये बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ साक्षात् उद्धवने राजसभा में पहुँचकर राजा उग्रसेनको तथा भगवान् श्रीकृष्णको प्रणाम किया । प्रत्येक वर्षमें क्या - क्या हुआ और जम्बूद्वीपपर किस तरह विजय मिली, वह सारा वृत्तान्त उद्धवजीने यथोचित रूपसे कह सुनाया ॥ ४४–४८ ॥

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अध्याय ४ ९ ] राजसूय यज्ञमें ऋषियों, ब्राह्मणों तब राजा उग्रसेन श्रीकृष्ण - बलदेव एवं सम्पूर्ण वृद्धजनोंके साथ प्रद्युम्नको लानेके लिये निकले । गीतवाद्योंकी ध्वनि तथा वेद- मन्त्रोंके गम्भीर घोषके साथ मोतियों, खीलों और फूलोंकी वर्षापूर्वक मङ्गल-पाठ करते हुए लोग उनकी अगवानीके लिये आये । नरेश्वर! एक गजराजको आगे करके सोनेके कलश, गन्धर्व, अप्सराएँ, शङ्ख, दुन्दुभि, वेणु, गन्ध, अक्षत, सोनेके पात्र, फूल, धूप तथा जौके अङ्कुर साथ लिये राजा उग्रसेन प्रद्युम्न के सम्मुख आये ॥ ४ ९ –५२ ॥ मैथिल! श्रीकृष्णकुमारने यादव - बन्धुओंके साथ तथा सम्बन्धियोंका शुभागमन ३८३ खड्ग ले जाकर महाराज उग्रसेनके सामने रख दिया और हाथ जोड़कर प्रणाम किया । मीन - केतन प्रद्युम्नने श्रीकृष्ण - बलरामको मस्तक झुकाकर समस्त वृद्धजनों-को प्रणाम करनेके अनन्तर शीघ्र जाकर श्रीगर्गाचार्यके चरणोंमें नमस्कार किया । राजा उग्रसेन भूरि - भूरि प्रशंसा करके, वैदिकमन्त्रों तथा ब्राह्मणोंके सहयोगसे विधिवत् पूजन करके, प्रद्युम्नको हाथीपर बिठाकर द्वारकापुरीमें गये । द्वारकामें सर्वत्र - घर - घरमें मङ्गल उत्सव हुआ । नरेश्वर! इस प्रकार मैंने तुम्हारी पूछी हुई सब बातें कहीं, अब और क्या सुनना चाहते हो? ॥ ५३-५६ ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें विश्वजित्खण्डके अन्तर्गत नारद - बहुलाश्व - संवादमें ' प्रद्युम्नका द्वारका - गमन ' नामक अड़तालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४८ ॥

उनचासवाँ अध्याय राजसूय यज्ञमें ऋषियों, ब्राह्मणों, राजाओं, तीर्थों, क्षेत्रों, देवगणों तथा सुहृद् -सम्बन्धियों का शुभागमन बहुलाश्वने पूछा – विप्रवर! आप परावर-वेत्ताओंमें श्रेष्ठ हैं; अतः मुझे यह बताइये कि राजा उग्रसेनने किस प्रकार राजसूय यज्ञका विधिपूर्वक अनुष्ठान किया ॥ १ ॥

नारदजीने कहा- राजन्! तदनन्तर समस्त धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ राजा उग्रसेनने भगवान् श्रीकृष्णकी सहायतासे क्रतुराज राजसूयका सम्पादन किया । यदुकुलके आचार्य गर्गजीसे यत्नपूर्वक मुहूर्त पूछकर भाई - बन्धुओं तथा सुहृदोंको निमन्त्रण दिया । अत्यन्त भक्ति - भावसे बुलाये जानेपर ऋषि, मुनि तथा ब्राह्मण-सब लोग अपने पुत्रों और शिष्योंके साथ द्वारकामें आये ॥२-४ ॥ राजन्! साक्षात् वेदव्यास, शुकदेव, पराशर, मैत्रेय, पैल, सुमन्तु, दुर्वासा, वैशम्पायन, जैमिनि, भार्गव परशुराम, दत्तात्रेय, असित, अङ्गिरा, वामदेव, अत्रि, वसिष्ठ, कण्व, विश्वामित्र, शतानन्द, भारद्वाज, गौतम, कपिल, सनकादि, विभाण्ड, पतञ्जलि, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, प्राड्विपाक, मुनिश्रेष्ठ शाण्डिल्य तथा दूसरे - दूसरे मुनि वहाँ शिष्योंसहित पधारे । ब्रह्मा, शिव, इन्द्र, देवगण, रुद्रगण, आदित्यगण, मरुद्गण, समस्त वसुगण, अग्नि, दोनों अश्विनीकुमार, यम, वरुण, सोम, कुबेर, गणेश, सिद्ध, विद्याधर, गन्धर्व तथा किंनर आदिका शुभागमन हुआ । गन्धर्व - सुन्दरियाँ, अप्सराएँ और समस्त विद्याधरियाँ वहाँ आयीं । वेताल, दानव, दैत्य, प्रह्लाद, बलि, भीषण राक्षसोंके साथ लङ्कापति विभीषण तथा समस्त वानरोंके साथ वायुनन्दन हनुमान् पधारे । ऋक्षों और दाढ़वाले वन्य पशुओंके साथ बलवान् ऋक्षराज जाम्बवान्‌का आगमन हुआ । समस्त पक्षियोंके साथ बलवान् पक्षिराज गरुड आये । समस्त सर्पगणोंको साथ लिये बलवान् नागराज वासुकि पधारे । सम्पूर्ण कामधेनुओंके साथ गोरूपधारिणी पृथ्वीका आगमन हुआ । समस्त मूर्तिमान् पर्वतोंके साथ मेरु और हिमालय पधारे । गुल्मों, वृक्षों और लताओंके साथ प्रयागके वृक्षराज अक्षयवटका शुभागमन हुआ ॥ ५-१५ ॥ महानदियोंके साथ श्रीगङ्गा और यमुना नदी आयीं । रत्नोंकी भेंटके साथ सातों समुद्र पधारे । ये सब - के - सब उग्रसेनके राजसूय यज्ञमें सहर्ष आये ।

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३८४ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ विश्वजित्खण्ड सात स्वर, तीन ग्राम, नौ अरण्य, महीतलमें नौ ऊसर, विख्यात चौदह गुह्य, तीर्थराज प्रयाग, पुष्कर, बदरिकाश्रम, सिद्धाश्रम, कुण्डों और समस्त सरोवरोंसहित विनशन ( कुरुक्षेत्र ), समस्त उपवनोंके साथ दण्डक आदि वन – ये सब के सब समग्र विमल क्षेत्रोंके साथ वहाँ उपस्थित हुए ॥ १६-१९ ॥ व्रजसे श्रीमान् गिरिराज गोवर्धन, वृन्दावन, दूसरे-दूसरे वन, सरोवर तथा कुण्ड भी पधारे । रानी कीर्तिदा और गोपियोंके साथ गोपिकेश्वरी यशोदा साक्षात् पधारीं । अपने करोड़ों सखी - समूहोंके साथ शिबिकारुढ़ा श्रीराधाका भी शुभागमन हुआ । गोपियोंके सौ यूथ भी द्वारकामें सानन्द पधारे ॥ २०–२२ ॥ जहाँ आजकल गोपी- भूमि है, वहीं उन्हें ठहराया गया । उन्हींके अङ्गरागसे वहाँ गोपीचन्दन प्रकट हुआ । जिसके अङ्गमें गोपीचन्दन लग जाता है, वह मनुष्य नरसे नारायण हो जाता है ॥ २३ ॥

चारों वर्णोंके सभी लोग उस यज्ञमें उपस्थित हुए थे । प्रज्ञाचक्षु धृतराष्ट्र, कलिका अवतार साक्षात् दुर्योधन, शाल्व, भीष्म, कर्ण, कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव, दमघोष, वृद्धशर्मा, महाराज जयसेन, धृष्टकेतु, भीष्मक, कोसलराज नग्नजित्, बृहत्सेन तथा तुम्हारे पितामह, साक्षात् मिथिलेश्वर धृति तथा अन्य राजा, सुहृद् - सम्बन्धी, बन्धु बान्धव अपनी रानियों तथा पुत्र - पौत्रोंके साथ उस यज्ञमें पधारे थे ॥ २४–२८ ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें विश्वजित्खण्डके अन्तर्गत नारद - बहुलाश्व - संवादमें ' स्वजन - शुभागमन ' नामक उनचासवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४ ९ ॥ पचासवाँ अध्याय राजसूय यज्ञका मङ्गलमय उत्सव; देवताओं, ब्राह्मणों तथा अतिथियोंका दान - मानसे सत्कार नारदजी कहते हैं - राजन्! अर्थसिद्धिके द्वारभूत पिण्डारक क्षेत्रमें जो रैवतक पर्वत और समुद्रके बीचमें स्थित है, यज्ञका आरम्भ हुआ । उस यज्ञमें जो कुण्ड बना, उसका विस्तार पाँच योजनका था । ब्रह्मकुण्ड एक योजनका और पाँच कुण्ड दो कोसमें बनाये गये । वे सभी कुण्ड मेखला, गर्त, विस्तार और वेदियोंके साथ सुन्दर ढंगसे निर्मित हुए थे । वहाँका महान् यज्ञस्तम्भ एक हजार हाथ ऊँचा था । सुवर्णमय यज्ञमण्डपका विस्तार पाँच योजन था, जो चंदोवों और बंदनवारोंसे सुशोभित था । केलेके खंभे उसकी शोभा बढ़ाते थे ॥ १-४ ॥ भोज, वृष्णि, अन्धक, मधु शूरसेन तथा दशार्ह वंशके यादवोंसे घिरे हुए राजा उग्रसेन देवताओंसे युक्त इन्द्रकी भाँति उस यज्ञमण्डपमें शोभा पाते थे । जैसे परमात्मा अपनी विभूतियोंसे शोभा पाता है, उसी प्रकार परिपूर्णतम भगवान् यज्ञावतार श्रीकृष्ण उस यज्ञमें अपने पुत्रों और पौत्रोंसे सुशोभित होते थे ॥ ५–६ ॥ महान् सम्भारका संचय करके, गर्गाचार्यको गुरु बनाकर यदुराज उग्रसेनने क्रतुश्रेष्ठ राजसूय यज्ञकी दीक्षा ली । मैथिल! उस यज्ञमें दस लाख होता, दस लाख दीक्षित अध्वर्यु और पाँच लाख उद्गाता थे । अग्निकुण्डमें हाथीकी सूँड़के सामन मोटी घृतकी धारा गिरायी जाती थी, जिसे खा - पीकर अग्निदेवता अजीर्ण-रोगके शिकार हो गये । उन दिनों तीनों लोकोंमें कोई भी जीव भूखे नहीं रह गये । सब देवता सोमपान करके अजीर्णके रोगी हो गये ॥ ७ - १० ॥ अपनी धर्मपत्नी रुचिमतीके साथ बलवान् यादव-राज उग्रसेनने पिण्डार तीर्थमें यज्ञका अवभृथ - स्नान किया । वे व्यास आदि मुनीश्वरोंके साथ वेद - मन्त्रोंके द्वारा विधिपूर्वक नहाये । जैसे दक्षिणासे यज्ञकी शोभा होती है, उसी तरह रानी रुचिमतीके साथ राजा उग्रसेनकी शोभा हुई । देवताओं तथा मनुष्योंकी दुन्दुभियाँ