गर्ग संहिता — पृष्ठ 401–410

गर्ग संहिता · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 401–410

पृष्ठ 401

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अध्याय ६ ] प्राविपाक मुनिके द्वारा श्रीराम - कृष्णकी व्रजलीलाका वर्णन ३ ९ ५ लौट आये । इसके बाद कारागारमें बालककी रुदन-ध्वनि सुनायी पड़ी । शत्रुके भयसे डरा हुआ कंस तुरंत आ पहुँचा और उसने तत्काल उत्पन्न हुई उस कन्याको उठा लिया एवं उसे एक शिलापर पटक दिया । ठीक उसी समय कंसके हाथसे छूटकर कन्या बड़े जोरसे उछली और ऊपर आकाशमें जाकर योगमायाके रूपमें परिणत हो गयी । सिद्ध, चारण, गन्धर्व और मुनिगण उनका स्तवन कर रहे थे । योगमायाने कंससे कहा – ' रे दुष्ट! तेरा पूर्वका शत्रु कहीं उत्पन्न हो चुका है । तू इन बेचारे दीन वसुदेव - देवकीको व्यर्थ ही क्यों कष्ट दे रहा है? ' इस प्रकार कहकर वे योगमाया विन्ध्याचलको चली गयीं । देवीके इन वचनोंसे कंस बड़े आश्चर्यमें पड़ गया । फिर उसने देवकी और वसुदेवको तो छोड़ दिया और पूतना आदि दैत्योंको बुलाकर आज्ञा दी कि ' दस दिनके अंदर पैदा हुए जितने भी बालक हों, सबको मार डालो । ' कंसकी आज्ञा पाकर दैत्यगण बालकोंका वध करने लगे । इधर नन्दने भी पुत्र - जन्म सुनकर महान् उत्सव मनानेकी योजना की । हे कुरुराज! इस प्रकार कंसके भयके बहाने भगवान् बलराम और श्रीकृष्ण व्रजमें पधारे । वे अपनी मायासे ही वहाँ गुप्तरूपमें रहे और व्रजवासियोंपर कृपा करनेके लिये व्रजमें प्रकट होते ही विविध प्रकारकी अद्भुत बाल- लीला करने लगे । अब तुम क्या सुनना चाहते हो? ॥ १२–१६ ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें श्रीबलभद्रखण्डके अन्तर्गत श्रीप्राविपाक मुनि और दुर्योधनके संवादमें ' श्रीबलराम और श्रीकृष्णका प्राकट्य ' नामक पाँचवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५ ॥

छठा अध्याय प्राविपाक मुनिके द्वारा श्रीराम - कृष्णकी व्रजलीलाका वर्णन दुर्योधनने पूछा – मुनिराज! भगवान् अनन्त श्रीबलरामजी और अनन्त - लीलाकारी भगवान् श्रीकृष्णने भूमण्डलपर अवतार लेकर विचरण किया । अब संक्षेपमें यह बतानेकी कृपा कीजिये कि व्रजमें, मथुरामें, द्वारकामें और अन्यत्र उन्होंने क्या - क्या लीलाएँ कीं? ॥ १ ॥

प्राड्विपाक मुनिने उत्तर दिया – दुर्योधन! भगवान् श्रीकृष्णने प्रकट होते ही अद्भुत लीला आरम्भ कर दी । उन्होंने पूतनाको मोक्ष प्रदान किया, शकटासुर और तृणावर्तका उद्धार किया, ( माताको ) विश्वरूप दिखलाया, दधिकी चोरी की, अपने श्रीमुखमें ब्रह्माण्डके दर्शन करवाये, यमलार्जुन वृक्षोंको उखाड़ा और दुर्वासाजीको मायाका प्रभाव दिखलाया । श्रीमद्गर्गाचार्यजीके द्वारा राधाकृष्ण नामकी सुन्दरता और महिमाका वर्णन कराया । ब्रह्माजीने वृषभानु-राजनन्दिनी राधिकाके साथ भाण्डीर - वनके रास-मण्डलमें श्रीकृष्णका विवाह करवाया । तत्पश्चात् श्रीकृष्ण, बलराम दोनोंने वृन्दावन जाकर वत्सासुर और वकासुर आदि दानवोंका संहार किया, गोपालोंके साथ गायें चराते हुए वृन्दावनमें विचरण किया । फिर तालवनमें गधेके समान रेंकनेवाला जो धेनुकासुर दैत्य रहता था, उसने अपनी दुलत्ती चलाकर बलरामजीको चोट पहुँचानेकी चेष्टा की । तब शक्तिशाली बलदेवजी-ने दोनों हाथोंसे उसे पकड़कर ताड़के वृक्षपर दे मारा । वह फिर उठकर सामने आया तो बलरामजीने उसे पुनः जमीनपर दे पटका । फलतः उसका सिर फूट गया और वह मूर्च्छित हो गया । तब बलरामजीने शीघ्र ही उसके एक मुक्का मारा, जिससे उसके प्राण - पखेरू उड़ गये । तदनन्तर श्रीकृष्णने कालियनागका दमन, दावाग्नि - पान आदि लीलाएँ कीं, फिर श्रीराधिकाजीके प्रति प्रेमप्रकाश करके उनके प्रेमकी परीक्षा ली, वृन्दावनमें विहार किया, हाव - भावयुक्त दानलीला

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३ ९ ६ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ श्रीबलभद्रखण्ड और मानलीला, शङ्खचूडादिका वध और शिवासुरि-उपाख्यान इत्यादिके प्रवचनकी बहुत - सी लीलाएँ कीं । तदनन्तर एक समय गोवर्धन पूजा की गयी । इन्द्रने यज्ञ - भागसे वञ्चित होनेपर कुपित होकर सांवर्तक आदि मेघोंके द्वारा व्रजमण्डलपर घोर वर्षा आरम्भ कर दी । सारे व्रजवासी भयसे व्याकुल हो गये । भगवान् श्रीकृष्णने उनको आतुर देखकर -' डरो मत ' यों कहकर अभय दान दिया । फिर उन्होंने गिरिराज गोवर्धनको उखाड़कर, जैसे बालक छत्रक ( कुकुरमुत्ता ) को उठा लेता है, ठीक वैसे ही गोवर्धनको अपने एक हाथपर रख लिया । सात वर्षकी अवस्थावाले श्रीकृष्ण पूरे सात दिनोंतक पर्वतको हाथपर उठाये बिना हिले - डुले अविचल खड़े रहे । तब तो सम्पूर्ण देवताओंके साथ इन्द्र भयभीत हो गये और उन्होंने अत्यन्त नम्रताके साथ मुकुट झुकाकर भगवान् श्रीकृष्णके मङ्गलमय युगल चरणोंमें प्रणाम किया, उनकी स्तुति की और अभिषेक किया । तदनन्तर कामधेनु सुरभि और देवता तथा मुनियोंके साथ वे स्वर्गको चले गये । गोवर्धन - धारणकी इस अद्भुत लीलाको देखकर सभी गोप अत्यन्त विस्मित हो गये । फिर श्रीकृष्णने खेतमें मोती आदिके बीज बोकर मोती उपजानेका चमत्कारमय ऐश्वर्य गोपोंको दिखलाया ॥ २८ ॥

तदनन्तर भगवान् श्रीकृष्णने श्रुतिरूपा, ऋषिरूपा, मैथिली, कोसलदेशनिवासिनी, अयोध्यावासिनी, यज्ञसीता, पुलिन्दका, रमावैकुण्ठवासिनी तथा श्वेत-द्वीपनिवासिनी, ऊर्ध्ववैकुण्ठवासिनी अजितपद -वासिनी, श्रीलोकाचलनिवासिनी, दिव्या, अदिव्या, त्रिगुणावृत्ति, भूमि, गोपी, देवश्री, जालंधरी, बार्हिष्मती, पुरन्ध्री, अप्सरा, सुतलवासिनी और नागेन्द्रकन्या आदि गोपीयूथोंके साथ पृथक् - पृथक् रास- मण्डलकी रचना की ॥ ९ ॥

एक समय श्रीबलरामजीके साथ श्रीकृष्णचन्द्र भाण्डीरवनमें गोपबालकोंके साथ गौएँ चराने गये । वहाँ जाकर एक - दूसरेको ढोने और ढोवानेका खेल करने लगे । उस समय वहाँ प्रलम्बासुर नामक एक दैत्य गोप - बालकका वेश धारणकर खेलमें शामिल हो गया, बलरामजी उसपर विजयी हुए । अतः उन्हें पीठपर चढ़ाकर वह चलने लगा । वह गिरिराजके समान विशाल देहवाला असुर मथुराकी ओर जाना चाहता था कि उस असुरकी पीठपर सवार अमित-पराक्रमी श्रीबलदेवजीने, रोषमें भरकर जैसे इन्द्र किसी पर्वतपर प्रहार करे, वैसे ही उसके मस्तकपर मुष्टि - प्रहार किया । उस प्रहारसे वज्रकी चोट खाये हुए पहाड़की तरह असुरका सिर टूक - टूक हो गया और उसी क्षण वह भूमिपर गिर पड़ा ॥ १०-११ ॥ एक समय गरमीके दिनोंमें सभी गौएँ और गोपाल किसी मूँजके वनमें जा पहुँचे । इतनेमें ही वहाँ बड़े जोरकी प्रलयाग्निके समान दावाग्नि जल उठी और वह चारों तरफ फैल गयी । तब गोपालगण ' हे राम! हे कृष्ण! हम शरणागत गोपालोंकी रक्षा करो, रक्षा करो । ' यों पुकार उठे । भगवान्ने तुरंत कहा – ' डरो मत । तुम सब अपनी - अपनी आँखें मूँद लो । ' यों कहकर भगवान् उस भीषण दावाग्निको पी गये । तदनन्तर गोपाल और गायोंके साथ भगवान् श्रीकृष्ण भाण्डीरवनसे यमुनाके तटपर पधारे और अशोकवनमें यज्ञदीक्षित द्विजोंकी पत्नियोंके द्वारा लाया हुआ भोजन ग्रहण किया । इसके बाद एक दिन व्रजमें नन्दबाबाको वरुण देवताने अपहरण कर लिया, तब भगवान्ने वरुणका मान- भङ्ग करके नन्द आदि गोपोंको सम्पूर्ण लोकोंके द्वारा नमस्कृत वैकुण्ठके दर्शन कराये । इसके अनन्तर एक दिन अम्बिका - काननमें सरस्वती नदीके तटपर सुदर्शन नामक सर्प नन्दजीको निगलने लगा । तब भगवान् श्रीकृष्णने अखिल लोकपालोंके द्वारा वन्दनीय अपने चरणकमलका उससे स्पर्श कराया । चरण - स्पर्श प्राप्त होते ही वह सर्प - शरीरसे मुक्त हो गया । एक समय श्रीकृष्ण बलरामजीके साथ गोप - बालकोंको लिये आँखमिचौनी और चोर साहुकारका खेल खेल रहे थे । उसी समय कंसका सखा व्योमासुर चोरके रूपमें वहाँ आया । भगवान् श्रीकृष्णने अपनी प्रचण्ड दोनों भुजाओंसे उसे पकड़कर दसों दिशाओंमें घुमाते हुए पृथ्वीपर पटक दिया । इसी प्रकार कंसका भेजा हुआ अरिष्टासुर बैलके रूपमें आया । भगवान्ने उसके दोनों सींग पकड़कर उसे भी धराशायी कर

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अध्याय ७ ] श्रीराम - कृष्णकी मथुरा - लीलाका वर्णन ३ ९ ७ दिया । तब नारदजीने जाकर कंसको श्रीकृष्णकी ये कराकर उसके मर्मको भेद डाला । श्रीकृष्णने इस सारी लीलाएँ सुनायीं । सुनकर कंसने केशीको भेजा, प्रकार बलरामजीके साथ व्रज - मण्डलमें अनेक भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रने उसके मुँहमें अपनी भुजा प्रवेश अद्भुत लीलाओंकी रचना की ॥ १२–१७ ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें श्रीबलभद्रखण्डके अन्तर्गत श्रीप्राविपाक मुनि और दुर्योधनके संवादमें ' श्रीरामकृष्णकी व्रजलीलाका वर्णन ' नामक छठा अध्याय पूरा हुआ ॥ ६ ॥

सातवाँ अध्याय श्रीराम - कृष्णकी मथुरा - लीलाका वर्णन प्राविपाक मुनि बोले – युवराज दुर्योधन! भगवान् बलरामजी और श्रीकृष्णचन्द्रने मथुरामें जो - जो लीलाएँ कीं, उनका संक्षेपमें वर्णन कर रहा हूँ; सुनो । कुछ समयके पश्चात् कालनेमिकुमार कंसने बलराम और श्रीकृष्णको बुलानेके लिये अक्रूरजीको भेजा । अक्रूरजी व्रजमें पधारे । श्रीकृष्णको मथुरा जानेके लिये प्रस्तुत देखकर गोपियाँ विरहसे आतुर हो गयीं । भगवान्ने उन सबको अलग - अलग बुलाकर आश्वासन दिया । फिर बलरामजीसहित स्वयं रथपर सवार होकर अक्रूरजीके साथ मथुराकी ओर चले । जाते समय रास्तेमें यमुनाजी पड़ीं । उसके जलमें भगवान्ने अक्रूरको अपने तेज या धामके दर्शन कराये । तदनन्तर पूर्वाह्नके समय वे मथुरामें जा पहुँचे और अपराह्नकालतक मथुरापुरीको सब ओरसे देखते रहे । लीलारूपमें मनुष्यका वेष धारण किये हुए श्रीराम - कृष्ण साक्षात् पुराण- पुरुष हैं । मथुरा नगरीके सभी नर - नारियोंके मनमें उनके दर्शनका आनन्द प्राप्त करनेकी अभिलाषा उत्पन्न हो गयी और वे अपना सारा काम - धाम छोड़कर, जैसे नदियाँ समुद्रकी ओर दौड़ती हैं, वैसे ही उनकी ओर दौड़ पड़े । कोटि - कोटि कामदेवोंका दर्प चूर्ण करनेवाले भगवान् राम - कृष्णने अपना सौन्दर्य सबको दिखलाया और उन सबका मन हरण करते हुए वे स्वेच्छासे विचरण करने लगे ॥१-३ ॥ तदनन्तर राजमार्गमें भगवान्ने धोबी और रँगरेजसे कपड़ोंकी याचना की; परंतु उन्होंने जब वस्त्र नहीं दिये, तब सबके देखते - देखते ही हाथोंसे प्रहार करके धोबी और रँगरेज दोनोंको उस जीवनसे मुक्त कर दिया । तदनन्तर भगवान्‌को एक दर्जी मिला । उसने वस्त्रोंके द्वारा उनको सजाया और भगवान्ने उसे अपना सारूप्य प्रदान कर दिया । फिर कुब्जा सैरन्ध्री मिली । वह तीन जगहसे टेढ़ी थी । चन्दन- ग्रहण करनेके बहाने भगवान्ने उसको सीधी कर दिया । वह तीनों लोकोंमें सुन्दरी बन गयी । तत्पश्चात् वहाँके वैश्य व्यापारियोंसे बातचीत की और कुछ बच्चोंको साथ लेकर, जहाँ कंसका धनुष रखा था, उस स्थानपर वे जा पहुँचे । वह धनुष स्वर्णसे मण्डित था और सात ताड़ वृक्षोंके बराबर उसकी लंबाई थी । हजारों पुरुषोंके द्वारा भी वह उठाया नहीं जा सकता था । वह धनुष अष्टधातुसे बना हुआ था, अत्यन्त भारी था और उसका बोझ लाख भारके समान था । कंसने वह धनुष परशुरामजी -से प्राप्त किया था । वह वैष्णव ( भगवान् विष्णुसे सम्बन्ध रखनेवाला ) धनुष साक्षात् भगवान् शेषके समान कुण्डलाकार था । भगवान् श्रीकृष्णने उसे देखा और बलपूर्वक उठा लिया; फिर सब लोगोंके देखते-देखते ही लीलापूर्वक उस धनुषको चढ़ाया और कानतक तानकर ले गये । तदनन्तर दोनों भुजाओंका सहारा लगाकर उसको बीचसे उसी प्रकार तोड़ डाला, जैसे हाथी अपनी सूँड़से गन्नेको तोड़ देता है । धनुषके टूटनेकी भयानक ध्वनिसे पातालसहित सप्तलोकमय सारा ब्रह्माण्ड गूँज उठा । तारे और दिग्गजगण अपने स्थानसे विचलित हो चले । इतना ही नहीं, सारा भूमण्डल दो घड़ीतक थालीकी तरह काँपता रह गया ॥ ४–७ ॥

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३ ९ ८ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ श्रीबलभद्रखण्ड अपराह्णके समय रङ्गशालाके द्वारपर कुवलयापीड़ हाथी दिखायी दिया । भगवान्ने उसके समीप आकर बाललीलाके रूपमें क्षणभर उसके साथ युद्ध किया, तदनन्तर उसकी सूँड़को पकड़कर उसे इधर - उधर घुमाया और फिर वैसे ही जमीनपर पटक दिया, जैसे बालक कमण्डलुको पटक दे । कुवलयापीड़ हाथीका इस प्रकार वध करके श्रीबलराम और कृष्णचन्द्र कंस - रचित रङ्गभूमिमें पहुँचे और उन्होंने वहाँपर बैठे हुए सभी लोगोंको उनके अपने - अपने भावके अनुसार यथायोग्य दर्शन दिये । फिर अखाड़ेमें पहुँचकर मल्लयुद्धके लिये जा डटे और कंसके सामने सब लोगोंके देखते - देखते ही भगवान् बलराम और कृष्णचन्द्रने चाणूर, मुष्टिक, कूट, शल और तोशलको धराशायी कर दिया । श्रीकृष्णके इन कार्योंको देखकर कंस दुर्वचनोंके द्वारा उनका तिरस्कार करने लगा । इसी बीच भगवान् श्रीकृष्ण कूदकर उस कटुभाषी कंसके अत्यन्त ऊँचे मञ्चपर चढ़ गये । तुरंत मृत्युके समान श्रीकृष्णको सामने आया देखकर कंस मञ्चसे उठा और भगवान्‌की भर्त्सना करते हुए उसने उसी क्षण ढाल और तलवारको हाथमें उठा लिया । श्रीकृष्णने तुरंत ढाल - तलवार लिये हुए कंसको, जैसे गरुड अपनी चोंचसे विषधर सर्पको पकड़ ले, वैसे ही बलपूर्वक अपनी प्रचण्ड भुजाओंसे पकड़ लिया । पर गरुडकी चोंचसे जिस प्रकार सर्प छूटकर निकल भागे, उसी प्रकार कंस भगवान्‌के भुज - बन्धनसे निकल गया और ढाल - तलवार लेकर फिर लड़नेके लिये तैयार हो गया । भगवान् श्रीकृष्ण और कंस - दोनों मञ्चपर आ गये और वेगपूर्वक एक - दूसरेपर आक्रमण करते हुए वैसे ही सुशोभित हुए, जैसे पर्वतपर दो सिंह लड़ते हुए शोभित हों । तदनन्तर कंस उछलकर सौ हाथ ऊपर आकाशमें चला गया, तब भगवान् श्रीकृष्णने भी वैसे ही उछलकर बाजकी तरह उसे पकड़ लिया । कंस पुनः श्रीकृष्णके हाथोंसे छूटकर निकल भागा, तब त्रिलोकको धारण करनेवाले श्रीकृष्णने फिर अपने प्रचण्ड भुजदण्डों से उसको पकड़ लिया और इधर-उधर घुमाते हुए महाकाशसे उसे मञ्चपर पटक दिया । जैसे बिजली गिरनेसे वृक्ष टूट जाता है, उसी प्रकार कंसके गिरते ही मञ्चके खंभे टूट गये । वज्रके समान कठोर शरीरवाला वह कंस नीचे गिर पड़ा । एक बार उसे कुछ व्याकुलता हुई; परंतु वह फिर सहसा उठा और महात्मा श्रीकृष्णके साथ जूझने लगा । भगवान् श्रीकृष्णने अपनी भुजाओंसे पकड़कर उसे मञ्चपर पटक दिया और वे उसकी छातीपर चढ़ बैठे । तव उन्होंने उसके सिरको पकड़कर केश खींचते हुए, जैसे पर्वतसे कोई चट्टानको गिराये, वैसे ही उसे मञ्चसे नीचे अखाड़ेमें गिरा दिया । तदनन्तर सबके आधार - स्वरूप अनन्त - पराक्रमशाली सनातन पुरुष भगवान् स्वयं वेगपूर्वक मञ्चसे कूदकर कंसके ऊपर जा पड़े । इस प्रकार दोनोंके गिरनेसे पृथ्वी कुछ नीचे धँस गयी और सारा भूमण्डल तीन घड़ीतक थालीकी तरह काँपता रह गया । कंसके प्राण निकल गये । सबके देखते - देखते ही जैसे भूमिपर पड़े हुए गजराजको सिंह खींच रहा हो, वैसे ही वे कंसके शरीरको घसीटने लगे । राजाओं में हाहाकार मच गया । लोग कहने लगे – ' अहो! कैसे आश्चर्यकी बात है कि वैरभावसे स्मरण करनेवाला कंस भी उन प्रभुके सारूप्यको वैसे ही प्राप्त हो गया, जैसे कीड़ा भृङ्गीके रूपमें परिणत हो जाता है ॥ ८–१५ ॥ कंसकी मृत्यु देखकर उसके छोटे भाई तत्काल ढाल - तलवार लेकर वहाँ आ डटे । उनपर बलभद्रजी-की दृष्टि पड़ी और उन्होंने मुद्गर उठाकर सब ओरसे प्रहार करते हुए सबको धराशायी कर दिया । तब देवताओंकी दुन्दुभियाँ बज उठीं । सर्वत्र जय-जयकारकी ध्वनि होने लगी । देवताओंने पुष्पोंकी वर्षा की । विद्याधरियाँ नृत्य करने लगीं और विद्याधर, गन्धर्व तथा किंनर भगवान्‌का यशोगान करने लगे । तदनन्तर भगवान् श्रीकृष्णने सबको आश्वासन देकर माता - पिताको बन्धनमुक्त किया और उग्रसेनको राज्य सौंप दिया । फिर यज्ञोपवीत - संस्कार सम्पन्न होनेपर सांदीपनि मुनिके समीप जाकर समस्त विद्याओंका अध्ययन किया । दक्षिणारूपमें मरे हुए गुरुपुत्रोंको लाकर प्रदान किया, शङ्खासुरका वध किया । फिर वे मथुरामें आकर निवास करने लगे । व्रजकी व्यथाको दूर करनेके लिये भगवान्ने उद्धवको वहाँ भेजा ।

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अध्याय ८ ] श्रीराम - कृष्णकी द्वारका - लीलाका वर्णन ३ ९९ फिर स्वयं वहाँ जाकर रासमण्डलमें श्रीराधा और कोलासुरका वध करके मथुरापुरीमें शुभागमन गोपियोंको अपने दर्शन कराये । रासमें ऋभु ऋषिको किया । इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामकी मुक्ति दी, फिर मथुरामें मथुरानरेशके सदृश कार्य हजारों - हजारों पवित्र और विचित्र लीलाएँ मथुरामें

करते हुए विराजमान हुए । बलरामजी ने भी सम्पन्न हुईं ॥ १६ - १७ ॥

इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें श्रीबलभद्रखण्डके अन्तर्गत श्रीप्राविपाक मुनि और दुर्योधनके संवादमें ' श्रीराम- कृष्णकी मथुरा- लीलाका वर्णन ' नामक सातवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७ ॥

आठवाँ अध्याय श्रीराम - कृष्णकी द्वारका - लीलाका वर्णन प्राड्विपाक मुनिने कहा – युवराज दुर्योधन! अब भगवान् श्रीबलराम और श्रीकृष्णकी द्वारका-लीलाओंको संक्षेपमें सुनो । धृतराष्ट्र - तनय! जब कंसका देहावसान हो गया, तव उसके न रहनेपर भी उसके साथ अन्तरङ्ग मैत्रीका निर्वाह करनेके लिये जरासंध आया । भगवान्ने उसपर विजय प्राप्त की । तदनन्तर समुद्रके बीचमें द्वारका - दुर्गका निर्माण किया । फिर एक ही रात्रिमें अपने सारे बन्धु-बान्धवोंको वहाँ भेजकर उनके रहनेकी व्यवस्था की । कालयवनके आनेपर मुचुकुन्दद्वारा उसका वध करवाया । तदनन्तर बलरामजी और श्रीकृष्ण दोनों प्रवर्षण पर्वतपर गये और वहाँसे द्वारकाको प्रस्थान किया ॥ १ ॥

ब्रह्मलोकसे लौटे हुए राजा रेवतने रत्न आदि आभूषणोंसे अलंकृत कन्या रेवतीको लेकर आगमन किया और प्रतापी बलरामजीके हाथोंमें उसे सविधि समर्पण कर दिया । फिर राजा रेवत तप करनेके लिये बदरिकाश्रमको चले गये । उसके बाद श्रीकृष्णने कुण्डिनपुर जाकर शत्रुओंके देखते - देखते रुक्मिणीजीका हरण किया एवं जाम्बवती, सत्यभामा, कालिन्दी, मित्रविन्दा, नानजिती, भद्रा और लक्ष्मणाका एवं भौमासुरका वध करके सोलह हजार एक सौ राजकन्याओंका पाणिग्रहण किया । राजन्! भीष्मककुमारी रुक्मिणीके गर्भसे भगवान् श्रीकृष्णके प्रथम पुत्र प्रद्युम्न हुए । ये कामदेवके अवतार अपने पिता श्रीकृष्णके समान ही सुन्दर थे । इनसे अनिरुद्धका जन्म हुआ, जो ब्रह्माके अवतार हैं॥२-४ ॥ तत्पश्चात् एक समय राजा उग्रसेनके यहाँ राजसूय यज्ञका प्रस्ताव हुआ और दिग्विजयके लिये प्रद्युम्नजीने बीड़ा उठा लिया । यादवों तथा अपने भाइयोंके साथ उन्होंने विजययात्रा आरम्भ की और जम्बूद्वीपके नौ खण्डोंपर विजय प्राप्त करके कामदुघ नदके समीप पहुँचे । वहाँ वसन्तमालती नामक नगरीके स्वामी गन्धर्वराज पतंगके साथ उनका युद्ध हुआ । गदा - युद्ध आरम्भ होनेपर बलदेवजीके छोटे भाई गदने गदाके द्वारा गदाधारी पतंगपर प्रहार किया । पतंगने भी गदाके द्वारा बड़े वेगसे गदके हृदयपर आघात किया । इस प्रकार दो घड़ीतक दोनोंका युद्ध होनेके पश्चात् पतंगकी गदाके प्रहारसे क्षणभरके लिये गदको मूर्च्छा आ गयी । उस समय हाहाकार मच गया और इसी बीच करोड़ों सूर्योंके समान तेजस्वी बलभद्रजी वहाँ प्रकट हो गये । उन्होंने गन्धर्वोंकी सारी सेनाको हलकी नोकके द्वारा खींच लिया और उसके ऊपर कठोर मुसलका प्रहार करना आरम्भ कर दिया । इससे पतंगकी सारी सेना - शूरवीर योद्धा, हाथी और रथ सभी चूर - चूर हो गये । तब तो रथहीन पतंग भयभीत होकर अपने नगरको चला गया और यादवोंसे युद्ध करनेके लिये फिरसे व्यूहाकार सेना सजाने लगा । बलभद्रजीको जब इसका पता लगा, तब वे अत्यन्त क्रुद्ध होकर गन्धर्वोंकी वसन्तमालती नामकी उस विशाल नगरीको, जिसका विस्तार सौ योजनमें था, हलके द्वारा उखाड़ लिया और कामदुघ नदमें डुबा

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४०० गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ श्रीबलभद्रखण्ड देनेके लिये उसे खींचने लगे । नगरीके महलों और घरोंका गिरना- ढहना आरम्भ हो गया । चारों ओर हाहाकार मच उठा । सारी नगरी समुद्रमें चक्कर खाती हुई टेढ़ी नावकी तरह घूमने लगी । यह देखकर गन्धर्व -राज पतंग भयभीत हो गये और अपने गन्धर्व भाई -बन्धुओंके साथ हाथ जोड़कर बलभद्रजीके समीप उपस्थित हुए । उन्होंने विश्वकर्माके द्वारा निर्मित दो लाख विमान, चार लाख हाथी, एक करोड़ घोड़े और दस करोड़ स्वर्ण तथा दिव्य रत्नोंका भार बलदेवजीकी सेवामें समर्पण किया और प्रदक्षिणा करके उनको प्रणाम किया ॥ ५ – ९ ॥ फिर साम्बको छुड़ानेके लिये बलरामजी यहाँ तुम्हारे हस्तिनापुरमें पधारे और तुम सबके सामने ही उन्होंने हलकी नोकसे तुम्हारे नगरको उखाड़ लिया और गङ्गामें डुबोनेके लिये खींचने लगे । फिर नाग- कन्या गोपियोंके साथ रास - मण्डलमें यमुनाजीको भी उन्होंने अपने हलकी नोकसे खींचा । तदनन्तर, एक समयकी बात है, नारदजीकी प्रेरणासे भौमासुरका सखा और सुग्रीवका मन्त्री द्विविद नामक बंदर युद्ध करनेके लिये आया । रैवतक पर्वतपर बलरामजीके साथ चार घड़ीतक उसका युद्ध हुआ । वह वृक्ष और शिलाओंके द्वारा बलरामजीपर प्रहार कर रहा था । उसी स्थितिमें बलरामजीने मुसलके द्वारा उसके मस्तकपर चोट पहुँचायी; पर वह मरा नहीं और फिरसे बलरामजीको मुक्का मारकर दौड़ा । भगवान् अच्युतके बड़े भाई बलरामजीने अपने दोनों हाथोंसे उसे पकड़ लिया और रैवतक पर्वतपर दे मारा, फिर उसके हृदयमें बड़े जोरसे मुष्टि - प्रहार किया । तब बंदर नीचे गिर गया । उसके गिरनेसे वृक्षसहित सारा पर्वत कमण्डलुकी तरह काँपने लगा ॥ १०-११ ॥ प्रिय दुर्योधन! तदनन्तर पाण्डवोंके साथ तुम-लोगोंके युद्धका उद्योग सुनकर बलरामजी तीर्थयात्राके बहाने नागरिकों और ब्राह्मणोंको साथ लेकर द्वारकाकी प्रदक्षिणा करके पुरीसे बाहर निकले । फिर उन्होंने सिद्धाश्रम और प्रभासमें स्नान किया । पश्चिम दिशामें स्थित सरस्वती, प्रतिस्रोता, सैन्धवारण्य, जम्बूमार्ग, उत्पलावर्त, अर्बुद ( आबू ), हेमवन्त और सिन्धुनदमें पृथक् - पृथक् स्नान किया । तदनन्तर बिन्दुसर त्रितकूप, सुदर्शन, अत्रितीर्थ, औशनस, आग्नेय, वायव, सौदास, गुहतीर्थ और श्राद्धदेव आदि तीर्थोंमें स्नान किया । तदनन्तर उत्तर दिशामें जाकर कैलास, करवीर, महायोग, गणेश, कौबेर, प्राग्ज्योतिष, रङ्गवल्ली, सीताराम आदि क्षेत्र, चैत्रदेश, वसन्ततिलक, दशार्ण, भद्र, कूर्मतीर्थ, पुष्पमाला, चित्रवण, चन्द्रकान्त, नैश्रेयस, मनु पर्वत, चक्षु, कामशालिनी, कामवन, वेदक्षेत्र सीता, पृथुतीर्थ, तपोभूमि, लीलावती, वेदनगर, गान्धर्व, शक्र, भीमरथी, श्रीजाह्नवी, कालिन्दी, हरिद्वार, कुरुक्षेत्र, मथुरा और पुष्कर आदि तीर्थोंमें स्नान किया । फिर वहाँसे संभलग्राम और सूकरक्षेत्र ( सौरौं ) में गये । इस प्रकार तीर्थोंकी यात्रा करते हुए साक्षात् संकर्षण श्रीबलरामजी नैमिषारण्यमें पहुँचे ॥१२-१३ ॥ बलरामजीको आया देखकर शौनकादि मुनियोंने खड़े होकर उनको प्रणाम किया और उनकी अर्चा की । वहाँ वेदव्यासजीके शिष्य रोमहर्षणजी विराजमान थे । वे खड़े नहीं हुए । बलरामजीने यह देखकर हाथमें जो कुशा लिये हुए थे, उसीकी नोकसे मुनिको निहत कर दिया । यह देखकर सब मुनि हाहाकार करने लगे । बलरामजीने यह सब देखा । समस्त लोकोंको पवित्र करनेवाले होनेपर भी उन्होंने लोक - संग्रहके लिये अपनी शुद्धिकी कामनासे बारह महीनेतक तीर्थ - स्नान करनेका व्रत ले लिया । वहाँ इल्वलका पुत्र बल्वल नामक दैत्य रहता था । वह नैमिषारण्यमें पर्वोंके अवसरपर भयानक आँधीके साथ - साथ धूलकी तथा दुर्गन्धपूर्ण पीब, रुधिर, विष्ठा, मूत्र, मंदिरा और मांस आदिकी वर्षा करता । उसकी जीभ सदा लपलपाया करती, वज्र के समान दृढ़ उसके अङ्ग थे । कज्जलगिरिके समान उसकी काली आकृति थी और तपाये हुए ताँबेके समान मूँछ - दाढ़ीवाला वह असुर बड़ा ही भयानक दीख पड़ता था । ऋषि - ब्राह्मणोंकी शान्तिके लिये उस भयानक असुरको बलरामजीने आकाशमें खींचकर उसके मस्तकपर मुसलके द्वारा प्रहार किया । मुसलकी चोट लगते ही उसके प्राण निकल गये और वह आकाशसे कमण्डलुकी तरह नीचे गिर पड़ा ।

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अध्याय ९ ] श्रीबलरामजीकी रासलीलाका वर्णन ४०१ तदनन्तर प्रसन्नतासे खिले हुए मुखवाले मुनियोंने बलरामजीका स्तवन किया, उनको बड़े - बड़े आशीर्वाद दिये और जिस प्रकार वृत्रासुरका वध करनेवाले इन्द्रका देवतालोगोंने अभिषेक किया था, उसी प्रकार बलरामजीका अभिषेक किया । तदनन्तर मुनियोंसे आज्ञा लेकर बलरामजीने सरयू, कौशिकी ( कोसी ), मानसरोवर, गण्डकी और गौतमी आदि तीर्थोंमें स्नान किया । फिर अयोध्या, नन्दिग्राम, बर्हिष्मती और ब्रह्मावर्त आदि तीर्थोंमें स्नान करके वे तीर्थराज प्रयागमें पधारे और वहाँ दस हजार हाथियोंका दान किया । तदनन्तर चित्रकूट, विन्ध्याचल, काशी, विपाशा, शोण, मिथिला और गया आदि तीर्थोंमें स्नान करके गङ्गा-सागर - संगमपर गये और वहाँ स्वर्णके सींगोंसे और सुन्दर वस्त्रोंसे सुशोभित सौ करोड़ गौएँ ब्राह्मणोंको दान दीं । प्रत्येक गौपर स्वर्ण और रलोंका भार पृथक् रूपसे लदा हुआ था । तदनन्तर वहाँसे दक्षिण दिशामें जाकर क्रमशः महेन्द्रादि पर्वत, सप्त गोदावरी, वेणी, पम्पा, भीमरथी, स्कन्दक्षेत्र, श्रीशैल, वेङ्कट, काञ्ची, कावेरी, श्रीरङ्ग, ऋषभाद्रि, समुद्रसेतु, कृतमाला, ताम्रपर्णी, मलयाचल, कुलाचल, दक्षिणसिन्धु, फाल्गुनतीर्थ, पंचाप्सर, गोकर्ण, शूर्पारक, तापी, पयोष्णी, निर्विन्ध्या, दण्डक, रेवा, माहिष्मती और अवन्तिका आदि तीर्थोंका स्वयं भगवान् संकर्षणने सेवन किया । तत्पश्चात् तुम्हारी सहायताके लिये विशसन ( कुरुक्षेत्र ) में पधारेंगे । यह मैंने बलभद्रजीका परम पावन तीर्थयात्रा - चरित्र तुम्हारे सामने वर्णन किया । कौरवेन्द्र! यह सम्पूर्ण पापका

नाश करनेवाला, सर्वकल्याणकारी पवित्र प्रसङ्ग है ।

अब तुम और क्या सुनना चाहते हो? ॥ १४–१८ ॥

इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें श्रीबलभद्रखण्डके अन्तर्गत श्रीप्राविपाक मुनि और दुर्योधनके संवादमें ' श्रीराम - कृष्णकी द्वारका - लीलाका वर्णन ' नामक आठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८ ॥

नवाँ अध्याय श्रीबलरामजीकी रासलीलाका वर्णन दुर्योधनने पूछा – भगवन् मुनिसत्तम! भगवान् बलभद्रजीने नागकन्या गोपियोंके साथ यमुनाजीके तटपर कब विहार किया था? ॥१ ॥

प्राड्विपाक मुनि बोले - एक समयकी बात है, व्रजके सुहृद् - बन्धुओंको देखनेकी बलरामजीके मनमें बड़ी उत्कण्ठा पैदा हो गयी । तब वे अपने तालध्वजसे युक्त रथपर सवार होकर द्वारकासे निकले और गौओं, गोपालों तथा गोपियोंसे भरे गोकुलमें जा पहुँचे । नन्दराज और यशोदाजी भी बहुत दिनोंसे उन्हें देखनेके लिये उत्कण्ठित थे, अतएव उन्होंने उनको हृदयसे लगा लिया । फिर बलभद्रजी गौओं, गोपियों और गोपालोंसे मिले और पूरे वसन्तके दो महीने उन्होंने वहाँ निवास किया । पहले जिन नागकन्याओंके गोपी होनेका वर्णन आ चुका है, उन्होंने गर्गाचार्यजीसे बलभद्रजीका पञ्चाङ्ग प्राप्त करके उसे सिद्ध किया * जिसमें पद्धति, पटल, स्तोत्र, कवच और सहस्रनाम -था । उसीके प्रभावसे बलभद्रजीने प्रसन्न होकर कालिन्दीके तटपर उनके साथ रासमण्डलमें रास-क्रीड़ा की । उस दिन चैत्रकी पूर्णिमा थी । अरुण वर्णके पूर्ण चन्द्र उदित होकर सारे वनको अपनी रंग - विरंगी किरणोंसे रञ्जित कर रहे थे । शीतल पवन कमलके मकरन्द और परागको लिये सर्वत्र मन्द गतिसे प्रवाहित हो रहा था । आनन्ददायिनी यमुना अपनी चञ्चल लहरियोंसे निर्मल पुलिनभूमिको व्याप्त कर रही थी । कुओंकी प्राङ्गण - भूमि विविध निकुञ्ज -पुझसे सुशोभित तथा चमचमाते हुए सुन्दर पल्लवों और पुष्पोंके परागसे आवृत थी । मोर और कोयल मधुर स्वरमें कूँज रहे थे और मधुपान - मत्त मधुकरोंकी मधुर ध्वनिसे मुखरित व्रज - भूमि अत्यन्त शोभाको प्राप्त हो रही थी । बलरामजीके पैरोंमें नूपुरकी मधुर ध्वनि हो रही थी । चमकती हुई मणियोंके कड़े, करधनी, केयूर, साधनके ये पाँच अङ्ग होते हैं, उसे ' पञ्चाङ्ग ' कहते हैं ।

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४०२ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ श्रीबलभद्रखण्ड हार, किरीट और कुण्डलोंसे वे अलंकृत थे । उनके वदनपर कमल - दलकी छटा छा रही थी । वे नीलाम्बर धारण किये हुए थे । उनके विमल कमल - दलके समान नेत्र थे । ऐसे श्रीबलदेवजी यक्षिणियोंके साथ यक्षराजकी भाँति रासमण्डलमें गोपियोंके द्वारा घिरे हुए विराजित थे ॥ २-५ ॥ तदनन्तर वरुणके द्वारा प्रेरित वारुणी देवी वृक्षोंके कोटरोंसे प्रकट होकर बहने लगीं । उस पुष्पासवकी सुगन्धसे सारा वन सुगन्धमय हो गया । मधुके लोभसे मधुकर - पुञ्ज मधुर गुञ्जार करने लगा । वारुणि- पानसे मद - विह्वल, कमल - दलके समान विशाल और अरुण नेत्रवाले बलदेवजीके अङ्ग प्रेमावेशसे चञ्चल हो उठे । तदनन्तर लीला - विहारजन्य श्रमके कारण जलकणकी भाँति पसीनेकी बूँदें उनके मुखपर प्रकट हो गयीं और उन्होंने कपोलोंपर रचित चित्रकारीको धो दिया । तदनन्तर गजराजकी - सी चालवाले और गजेन्द्र ऐरावतकी सूँड़के समान विशाल भुजाओंवाले बलदेवजी गोपियोंके साथ वैसे ही क्रीड़ा करने लगे, जैसे उन्मत्त मातङ्ग हथिनियोंके साथ करता है । उनके सिंहस्कन्धतुल्य कंधेपर हल और हाथमें मुसल सुशोभित था । करोड़ों - करोड़ों पूर्ण चन्द्रमाओंकी प्रभाके समान उनका तेज छिटक रहा था । देदीप्यमान रत्नोंके मञ्जीर, चञ्चल नूपुर, मधुर शब्द करती हुई स्वर्णमयी किङ्किणी, कड़े, ताटङ्क, हार, श्रीकण्ठ, अंगूठियाँ और सिरपर दिव्य मणिभूषण सुशोभित थे । काली नागिनको लजानेवाली कृष्ण अलकावलीकी वेणीसे युक्त और कपोलोंपर चित्रित मनोहर पत्रावलियोंसे सुशोभित गोप- सुन्दरियोंके साथ अखिल भुवनपति भगवान् बलरामजी वहाँ विराजित होकर रास - विहार करने लगे ॥ ६ ॥

फिर यमुनाके किनारे वनमें विचरण और क्रीड़ा करते हुए बलदेवजीके मुख- कमलपर पसीनेकी बूँदें दिखायी देने लगीं । तब उन्होंने स्नान तथा जल - क्रीड़ा करनेके लिये दूरसे ही यमुनाजीको पुकारा, परंतु यमुना नहीं आयीं । फिर तो बलदेवजीने क्रोधमें भरकर हलकी नोकसे यमुनाजीको खींच लिया और कहा-' आज मैंने तुमको बुलाया, किंतु तुम मेरा अपमान करके नहीं आयी । तुम मनमाना बर्ताव करनेवाली हो । अच्छा, अभी इस मुसलके द्वारा मैं तुम्हारे सौ टुकड़े कर देता हूँ । ' यमुनाजीको जब बलरामजीने इस प्रकार डाँटा, तब वे अत्यन्त भयभीत होकर उनके चरणकमलों पर गिर पड़ीं और बोलीं- ' हे लोकाभिराम राम! हे संकर्षण! बलभद्र! हे महाबाहो!! मैं आपके असीम बल पराक्रमको नहीं जानती थी । आपके एक ही मस्तकपर सारा भूखण्ड-मण्डल सरसोंके समान पड़ा रहता है । मैं आपके परम प्रभावसे अनभिज्ञ हूँ और आपकी शरणमें आयी हूँ । आप भक्तवत्सल हैं । मुझे छोड़ दीजिये । ' इस प्रकार प्रार्थना करनेपर गोपराज बलभद्रजीने यमुनाको छोड़ दिया और हथिनियोंके साथ गजराजकी भाँति वे गोपियोंके साथ जलक्रीड़ा करने लगे । तदनन्तर उनके यमुनासे बाहर निकलनेपर यमुनाजीने आकर उन्हें बहुत - से नील वस्त्र और स्वर्ण तथा रत्नोंके आभूषण भेंट किये । दुर्योधन! बलरामजीने उन सब वस्त्राभूषणोंको पृथक् - पृथक् गोपियोंमें बाँट दिया और स्वयं नीलाम्बर तथा नवीन रत्नोंसे निर्मित स्वर्णमालाको धारण करके ऐरावतकी भाँति विराजमान हो गये । कौरवेन्द्र! इस प्रकार क्रीड़ारत यादवश्रेष्ठ बलरामजीने वसन्त ऋतुकी रात्रिको व्यतीत किया । जिस प्रकार हस्तिनापुरको देखनेपर भगवान् बलरामजीके पराक्रमका दर्शन होता है, उसी प्रकार आजतक यमुनाजी टेढ़े मार्गसे प्रवाहित होती हुई उनकी शक्तिको सूचित कर रही हैं । । भगवान् बलरामजीके इस रासलीलाके प्रसङ्गको जो मनुष्य सुनता अथवा सुनाता है, वह सारे पापोंसे मुक्त होकर परमानन्द- पदको प्राप्त होता है । युवराज! अब क्या सुनना चाहते हो? ॥ ७–११ ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें श्रीबलभद्रखण्डके अन्तर्गत श्रीप्राविपाक मुनि और दुर्योधनके संवादमें ' श्रीबलरामजीकी रासलीलाका वर्णन ' नामक नवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९ ॥

पृष्ठ 409

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दसवाँ अध्याय श्रीबलभद्रजीकी पूजा - पद्धति और पटल दुर्योधनने कहा- भगवन्! आप सर्वज्ञ हैं । यह बतानेकी कृपा कीजिये कि गोपियोंके यूथको श्रीगर्गाचार्यजीने बलभद्र - पञ्चाङ्ग किस प्रकार प्रदान किया था ॥ १ ॥

प्राविपाक मुनि बोले – कुरुराज! एक बार गर्गजी यमुना - स्नान करनेके लिये गर्गाचलसे चलकर व्रजपुरमें पधारे । यमुनाजीकी तटकी ललित लताएँ पवनके प्रवाहसे हिल रही थीं । पुष्पोंके सौरभसे मत्त हुए भ्रमरोंके समूह गुंजार कर रहे थे । इस प्रकारके यमुना - तटपर एक निकुञ्जके नीचे एकान्तमें श्रीगर्गाचार्य भगवान् बलराम और श्रीकृष्णका ध्यान करने लगे । उस समय गोपियोंने आकर उनको प्रणाम किया । उनको स्मरण हो आया कि हम पूर्वजन्मकी नागेन्द्र कन्याएँ हैं । तब उन्होंने बलभद्रजीको प्राप्त करनेके लिये गर्गजीसे सेवाका साधन पूछा । कन्याओंकी इस अनुपम भक्तिको देखकर उनके उद्देश्यकी सिद्धिके लिये गर्गजीने उनको पद्धति, पटल, स्तोत्र, कवच और सहस्रनाम — यह पञ्चाङ्ग साधन प्रदान किया । अब बताओ, तुम और क्या सुनना चाहते हो? ॥ २ ॥

दुर्योधनने कहा – ब्रह्मन् गुरुदेव! आप भक्तवत्सल हैं, मैं आपको नमस्कार करता हूँ । आप कृपया बलरामजीकी ‘ पद्धति ' का वर्णन कीजिये, जिसे जानकर मैं सिद्धि प्राप्त कर सकूँ ॥३ ॥

प्राविपाक मुनि बोले- राजसत्तम! जिससे महाप्रभु बलरामजी प्रसन्न हो जाते हैं, उस बलभद्र-पद्धतिके नियम सुनो । वे भगवान् बलरामजी सहस्र-मुखवाले हैं । समस्त भुवनोंके अधीश्वर हैं । बहुत - से दान और तीर्थ सेवनसे उनकी प्राप्ति नहीं हो सकती । वे तो केवल ' अनन्य भक्ति ' से प्राप्त होते हैं । श्रीहरिके बड़े भाई उन बलरामजीकी भक्ति सत्सङ्गके द्वारा शीघ्र प्राप्त हो सकती है । जिनमें प्रेमलक्षणा - भक्तिका उदय हो जाता है, वे ही सिद्ध पुरुष हैं । ब्राह्ममुहूर्तमें उठते ही भगवान् राम - कृष्णके नामोंका उच्चारण करे, फिर गुरुदेवको और पृथ्वीको ( मनसे ) प्रणाम करके पृथ्वी-पर पैर रखे । तदनन्तर स्नान - आचमन करके निर्जनमें कुशासनपर बैठ जाय, दोनों हाथ गोदमें रख ले और अपनी नासिकाके अग्रभागपर दृष्टि जमाकर परमदेव सनातन हरि भगवान् श्रीबलरामजीका ध्यान करे । उनका गौरवर्ण है । उन्होंने नीलाम्बर धारण कर रखा है । वे वनमालासे विभूषित हैं । बड़ी मनमोहन मूर्ति है । ऐसे हलधर भगवान् बलरामजीको प्रसन्न करनेके लिये नित्य उनका ध्यान करना चाहिये । साधकको चाहिये कि वह बाहर - भीतरसे पवित्र हो, मौन धारण करे और क्रोधका त्याग करके तीनों कालमें संध्या-वन्दन करे । मनमें कोई कामना, लोभ और मोह न रहे । सत्यभाषण करे । जितेन्द्रिय होकर एक बार मात्र पायसका भोजन करे । दो बार जलपान करे । पवित्र रेशमी वस्त्र पहने और जमीनपर शयन करे । इस प्रकार छः शत्रुओंपर विजय प्राप्त कर एकाग्र मनसे भजन करनेपर सम्पूर्ण कारणोंके कारण परिपूर्णतम साक्षात् भगवान् श्रीसंकर्षणजी सदाके लिये प्रसन्न हो जाते हैं । महाबाहु कौरवराज! इस प्रकार मैंने महात्मा बलभद्रजीकी ' पद्धति ' का वर्णन किया, अब तुम और क्या सुनना चाहते हो? ॥४–१४ ॥ दुर्योधनने कहा – मुनिराज! अब देवदेव बलरामजीका ' पटल ' सुनाइये, जिसका साधन करके मैं सदा उनके चरण - कमलोंकी सेवा कर सकूँ ॥१५ ॥

प्राड्विपाक मुनि बोले- भगवान् बलरामजीका पटल महान् गोपनीय और सिद्धि प्रदान करनेवाला है । इसे पहले ब्रह्माजीने एकान्त स्थानमें महात्मा नारदजीको दिया था । पहले प्रणव ( ॐ ) लिखकर फिर कामबीज ( कीं ) लिखना चाहिये । तत्पश्चात् ' कालिन्दीभेदन ' और ' संकर्षण ' – इन दो पदोंको चतुर्थ्यन्त लिखकर अन्तमें स्वाहा जोड़ देना चाहिये । यों करनेपर ' ॐ क्लीं कालिन्दीभेदनाय संकर्षणाय स्वाहा ' – यह मन्त्र बन जाता है । यह षोडशाक्षर

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४०४ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ श्रीबलभद्रखण्ड मन्त्रराज ब्रह्माजीके द्वारा कहा गया है । मनुष्यको व्रत लेकर इस मन्त्रका एक लाख सोलह हजार जप करना चाहिये । इस प्रकार करनेपर साधक इस लोक और परलोकमें परम सिद्धिको प्राप्त कर लेता है, इसमें कोई संदेह नहीं । मन्त्र जपके बाद विशेष रूपसे महापूजा करनी चाहिये । ( उसका विधान यह है — ) राजन्! मनोरम स्थण्डिलपर कर्णिकास्थित केसरोंसे उज्ज्वल बत्तीस दलोंवाला एक सुन्दर पाँच रंगका कमल अङ्कित करे । उसपर मङ्गलमय स्वर्ण-सिंहासन रखे । उसके ऊपर बलरामजीकी परम श्रेष्ठ मूर्तिको पधराकर उनकी भलीभाँति पूजा करे । ॐ नमो भगवते पुरुषोत्तमाय वासुदेवाय संकर्षणाय सहस्रवदनाय महानन्ताय स्वाहा ' – इस मन्त्रसे शिखा - बन्धन करे । तत्पश्चात् श्रीबलरामजीको सब दिशाओंमें प्रणाम करके उनके सम्मुख अत्यन्त विनयपूर्वक बैठ जाय । फिर ' ॐ जय जयानन्त बलभद्र कामपाल तालाङ्क कालिन्दीभञ्जन आविराविर्भूय मम सम्मुखो भव । ' इसको पढ़कर

आवाहन करे । १६ – २२ ॥

तदनन्तर ' नमस्तेऽस्तु सीरपाणे हलमुसलधर रौहिणेय नीलाम्बर राम रेवतीरमण नमस्तेऽस्तु । ' इस मन्त्र के द्वारा आसन, पाद्य, अर्घ्य, स्नानीय, यज्ञोपवीत, वस्त्र, भूषण, गन्ध, अक्षत, पुष्प, मधुपर्क, धूप, दीप, नैवेद्य, पुष्पाञ्जलि आदि उपचार प्रदान करे । अनन्तर ' ॐ विष्णवे मधुसूदनाय वामनाय त्रिविक्रमाय श्रीधराय हृषीकेशाय पद्मनाभाय दामोदराय संकर्षणाय वासुदेवाय प्रद्युम्नायानिरुद्धायाधोक्षजाय पुरुषोत्तमाय श्रीकृष्णाय नमः । ' —इस मन्त्रके द्वारा पाद, गुल्फ, जानु, ऊरु, कटि, उदर, पार्श्व, पीठ, भुजा, कंधे, अधर, नेत्र और मस्तक आदि सर्वाङ्गकी पृथक् - पृथक् पूजा करे । इसके बाद शङ्ख, चक्र, गदा, पद्म, असि, धनुष, वेत्र, हल, मुसल, कौस्तुभ, वनमाला, श्रीवत्स, पीताम्बर, नीलाम्बर, वंशी, वेत्र, गरुडाङ्क और तालाङ्क ध्वजसे चिह्नित रथ, दारुक, सुमति, कुमुद, कुमुदाक्ष और श्रीदामा - इन शब्दोंके पहले ॐ और अन्तमें चतुर्थी विभक्ति लगाकर अन्तमें ' नमः ' शब्द जोड़ दे । इससे ' ॐ शङ्खाय नमः ', ' ॐ चक्राय नमः ' - ऐसा रूप बन जायगा । इन मन्त्रोंके द्वारा सबका पूजन करे । इसी प्रकार कमलके सब ओर अपने - अपने स्थानपर विष्वक्सेन, वेदव्यास, दुर्गा, गणेश, दिक्पाल और नवग्रह आदिका भी पृथक् - पृथक् पूजन करना चाहिये । तदनन्तर परिसमूहन आदि स्थालीपाकके विधानसे अग्निदेवकी पूजा करके पूर्वोक्त ' ॐ क्लीं कालिन्दीभेदनाय संकर्षणाय स्वाहा । ' - इस मन्त्रसे पचीस हजार आहुतियाँ दे । फिर इसी प्रकार ‘ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ' – इस द्वादशाक्षर मन्त्रसे आठ हजार और चतुर्व्यूहसंज्ञक ' ॐ नमो भगवते तुभ्यं वासुदेवाय साक्षिणे । प्रद्युम्नायानिरुद्धाय नमः संकर्षणाय च ॥ ' – इस मन्त्रसे आठ हजार आहुतियाँ दे । इसके बाद अग्रिकी प्रदक्षिणा करे और आचार्यको नमस्कार करके उन्हें मूल्यवान् वस्त्र, स्वर्णके आभूषण, ताम्रपात्र, सवत्सा गौ और स्वर्ण आदि दक्षिणा देकर प्रसन्न करे । फिर ब्राह्मणोंका पूजन - सत्कार करके उनको तथा नगरवासी जनोंको भोजन कराये । तत्पश्चात् आचार्यको प्रणाम करे । जो पुरुष इस पटल-पद्धतिके अनुसार श्रीबलरामजीका स्मरणपूजन करता है, वह इस लोक और परलोकमें विविध सिद्धियों और समृद्धियोंके द्वारा सुसम्पन्न होता है । हे राजन्! भगवान् बलरामजीका यह गोपनीय और सर्वसिद्धिप्रद ' पटल ' तुमको सुना दिया, अब और क्या सुनना चाहते हो? ॥ २३–२५ ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें श्रीबलभद्रखण्डके अन्तर्गत श्रीप्राविपाक मुनि और दुर्योधनके संवादमें ' श्रीबलभद्रजीकी पूजा - पद्धति और पटल ' नामक दसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १० ॥