गर्ग संहिता — पृष्ठ 411–420
गर्ग संहिता · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 411–420
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ग्यारहवाँ अध्याय श्रीबलराम - स्तोत्र दुर्योधनने कहा – महामुनि प्राड्विपाकजी! अब भगवान् श्रीबलरामजीका वह स्तोत्र, जो साक्षात् समस्त सिद्धियोंको प्रदान करनेवाला है, कृपापूर्वक मुझसे कहिये ॥ १ ॥
प्राविपाक मुनि बोले- राजन्! बलरामजीका स्तोत्र श्रीवेदव्यासजीके द्वारा प्रणीत है, यह मनुष्योंको समस्त सिद्धियाँ और मोक्ष भी प्रदान करनेवाला है । इस शुभ स्तवराजको तुम सुनो ॥ २ ॥
" देवादिदेव! भगवन्! कामपाल! आपको नमस्कार । हे बलरामजी! आप साक्षात् अनन्त और शेषजी हैं, आपको नमस्कार । आप पृथ्वीको धारण करनेवाले, परिपूर्ण ब्रह्म, स्वयं प्रकाशमान, हाथमें हल लिये हुए, हजार मस्तकोंसे युक्त संकर्षण हैं । आपको नित्य मेरे नमस्कार हैं । पुरुष श्रेष्ठ बलरामजी! आप भगवान् अच्युतके बड़े भाई हैं, रेवती स्वामी हैं, हल आपका शस्त्र है और आप प्रलम्बासुरका संहार करनेवाले हैं । आप मेरी रक्षा करें । भगवान् बलराम, बलभद्र और तालध्वजको मेरे बार - बार नमस्कार हैं । आप गौरवर्ण हैं, नीलाम्बर धारण किये हुए हैं, रोहिणीके कुमार हैं; आपको नमस्कार । आप धेनुकासुर, मुष्टिकासुर, कूट, बल्वल, रुक्मी, कूपकर्ण और कुम्भाण्डके शत्रु और उनके संहारक हैं । आप कालिन्दीका भेदन करनेवाले, हस्तिनापुरका आकर्षण करनेवाले, द्विविद वानरका वध करनेवाले, यादवोंके राजा और व्रज - मण्डलको सुशोभित करनेवाले हैं । आपने कंसके भाइयोंका वध किया है, आप सबके स्वामी और तीर्थोंमें भ्रमण करनेवाले हैं । आप दुर्योधनके साक्षात् गुरु हैं । प्रभो! मेरी रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये । हे अच्युत! आपकी जय हो, जय हो । हे परात्पर देव! आप स्वयं अनन्त एवं दिशा - विदिशाओंमें कीर्तित हैं । आप देवता, मुनि और सर्पोंके स्वामियोंमें श्रेष्ठ हैं । हल तथा मुसलको धारण करनेवाले भगवान् बलरामजीको मेरे नमस्कार हैं । जो मनुष्य इस स्तवराजका निरन्तर पाठ करता है, वह श्रीहरिके परमपदको प्राप्त होता है । जगत्में वह शत्रुका शमन करनेवाले सम्पूर्ण बलोंसे सम्पन्न हो जाता है और उसे धन तथा स्वजन प्रचुररूपसे प्राप्त रहते हैं ॥३–११ ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें श्रीबलभद्रखण्डके अन्तर्गत श्रीप्राविपाक मुनि और दुर्योधनके संवादमें ' श्रीबलरामस्तोत्र ' नामक ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११ ॥
* दुर्योधन स्तोत्रं श्रीबलदेवस्य प्राड्विपाक महामुने प्राविपाक स्तवराजं तु रामस्य वेदव्यासकृतं शुभम् देवादिदेव भगवन् कामपाल नमोऽस्तु ते । धराधराय पूर्णाय स्वधाम्ने सीरपाणये रेवतीरमण त्वं वै बलदेवो ऽच्युताग्रज बलाय बलभद्राय तालाङ्काय नमो नमः । धेनुकारिर्मुष्टिकारिः कूटारिर्बल्वलान्तकः । कालिन्दीभेदनोऽसि त्वं हस्तिनापुरकर्षकः । कंसभ्रातृप्रहन्तासि तीर्थयात्राकरः प्रभुः । जय जयाच्युत देव परात्पर स्वयमनन्त दिगन्तगतश्रुत ।
यः पठेत् सततं स्तवनं नरः स तु हरेः परमं पदमाव्रजेत् ।
उवाच-। वद मां कृपया साक्षात् सर्वसिद्धिप्रदायकम् ॥
उवाच-। सर्वसिद्धिप्रदं राजञ्शृणु कैवल्यदं नृणाम् नमोऽनन्ताय शेषाय साक्षाद्रामाय ते नमः । सहस्रशिरसे नित्यं नमः संकर्षणाय ते | हलायुध प्रलम्बन पाहि मां पुरुषोत्तम नीलाम्बराय गौराय रौहिणेयाय ते नमः रुक्म्यरिः कूपकर्णारिः कुम्भाण्डारिस्त्वमेव हि द्विविदारिर्यादवेन्द्रो व्रजमण्डलमण्डनः दुर्योधनगुरुः साक्षात् पाहि पाहि प्रभो त्वतः सुरमुनीन्द्रफणीन्द्रवराय ते मुसलिने बलिने जगति सर्वबलं त्वरिमर्दनं भवति तस्य धनं ॥ ॥ ॥ ॥ ॥ ॥ ॥ ॥ हलिने नमः ॥ स्वजनं धनम् ॥ ( गर्ग ०, बलभद्र ० ११।१ – ११ )
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बारहवाँ अध्याय श्रीबलराम - कवच दुर्योधनने कहा – महामुने! धीमान् गर्गाचार्यने गोपियोंको जो सब तरहसे रक्षा करनेवाला दिव्य कवच दिया था, आप उसे मुझको प्रदान कीजिये ॥ १ ॥
प्राविपाक मुनि बोले- मनुष्य जलमें स्नान करके रेशमी वस्त्र धारण करे, कुशासनपर बैठे और हाथमें कुशकी पवित्री पहनकर मन्त्रका शोधन करे । तदनन्तर अच्युताग्रज भगवान् बलरामजीका स्मरण करके उन्हें प्रणाम करे । फिर मनको एकाग्र करके मन्त्ररूपी कवचको धारण करे ॥ २ ॥
जो भगवान् गोलोकधामके अधिपति हैं, जिनका कीर्तन परम पवित्र है, वे परमेश्वर शत्रुओंसे मेरी रक्षा करें । जिनके मस्तकपर भूमण्डल सरसोंकी तरह प्रतीत होता है, वे भगवान् भूमण्डलमें मेरी रक्षा करें । हलधरभगवान् सेनामें और युद्धमें सदा मेरी रक्षा करें । मुसलधारी भगवान् दुर्गमें और आदिदेव भगवान् संकर्षण वनमें मेरी रक्षा करें । यमुनाके प्रवाहको रोकनेवाले भगवान् जलमें और नीलाम्बरधारी भगवान् अग्निमें निरन्तर मेरी रक्षा करें । भगवान् राम वायु ( आँधी ) में मेरी रक्षा करें । शून्य ( आकाश ) में भगवान् बलदेव और महान् समुद्रमें अनन्तवपु भगवान् मेरी सदा रक्षा करें । पर्वतोंपर भगवान् वासुदेव मेरी रक्षा करें । घोर विवादमें हजार मस्तकवाले प्रभु रोगमें श्रीरोहिणीनन्दन तथा विपत्तिमें भगवान् कामपाल मेरी रक्षा करें । धेनुकासुरके शत्रु भगवान् काम ( कामना ) से मेरी सदा रक्षा करें । द्विविदपर प्रहार करनेवाले भगवान् क्रोधसे, बल्वलके शत्रु भगवान् लोभसे और जरासंधके शत्रु भगवान् मोहसे सदा मेरी रक्षा करें । भगवान् वृष्णिधुर्य प्रातःकालके समय, भगवान् मथुरापुरी - नरेश पूर्वाह्न ( प्रहर दिन चढ़े ), गोपसखा मध्याह्नमें और स्वराट् भगवान् पराह्न ( दिनके पिछले पहर ) में सदा मेरी रक्षा करें । भगवान् फणीन्द्र सायंकालमें तथा परात्पर प्रदोषके समय मेरी सदा रक्षा करें । मध्यरात्रि और प्रत्यूषकालके समय भगवान् दुरन्तवीर्य मेरी सदा रक्षा करें । कोनोंमें रेवतीपति, दिशाओंमें प्रलम्बासुरके शत्रु, नीचे यदूद्वह, ऊपर बलभद्र और दूर अथवा पास सब दिशाओंमें भगवान् बलदेवजी मेरी सदा रक्षा करें । भीतरसे पुरुषोत्तम और बाहरसे महाबल नागेन्द्रलील मेरी सदा रक्षा करें और पूर्ण परमेश्वर महान् हरि स्वयं सदा-सर्वदा मेरे हृदयमें निवास करते हुए उत्कृष्ट रूपमें सदा मेरी रक्षा करें ॥ ३-११ ॥ श्रीबलभद्रजीके इस उत्तम कवचको देव तथा असुरोंके भयका नाश करनेवाला, पापरूप ईंधनको जलानेके लिये साक्षात् अग्निरूप और विघ्नोंके घटका विनाश करनेवाला सिद्धासनरूप समझे * ॥१२ ॥
इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें श्रीबलभद्रखण्डके अन्तर्गत श्रीप्राविपाक मुनि और दुर्योधनके संवादमें ' श्रीबलरामकवच ' नामक बारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२ ॥
* दुर्योधन उवाच -गोपीभ्यः कवचं दत्तं गर्गाचार्येण धीमता । सर्वरक्षाकरं दिव्यं देहि मह्यं महामुने ॥
प्राविपाक उवाच -स्नात्वा जले क्षौमधरः कुशासनः पवित्रपाणिः कृतमन्त्रमार्जनः ।
स्मृत्वाथ नत्वा बलमच्युताग्रजं संधारयेद् वर्म समाहितो भवेत् ॥
गोलोकधामाधिपतिः परेश्वरः परेषु मां प पवित्रकीर्तनः ।
भूमण्डलं सर्षपवद् विलक्ष्यते यन्मूर्ध्नि मां पातु स भूमिमण्डले ॥
सेनासु मां रक्षतु सीरपाणिर्युद्धे सदा रक्षतु मां हली च ।
दुर्गेषु चाव्यामुसली सदा मां वनेषु संकर्षण आदिदेवः ॥
कलिन्दजावेगहरो नीलाम्ब रक्षतु मां सदानौ ।
वायौ च रामोऽवतु खे बलश्च महार्णवे ऽनन्तवपुः सदा माम् ॥
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तेरहवाँ अध्याय बलभद्र - सहस्रनाम दुर्योधन ने कहा – महामुने प्राड्विपाकजी! भगवान् बलभद्रके सहस्रनामको, जो देवताओंके लिये भी गोपनीय - अज्ञात है, मुझसे कहिये ॥ १ ॥
प्राड्विपाक मुनि बोले- साधु, साधु! महाराज! तुम्हारा यश सर्वथा निर्मल है । तुमने जिसके लिये प्रश्न किया है, वह परम देवदुर्लभ सहस्रनाम गर्गजीके द्वारा कथित है । उन दिव्य सहस्रनामोंका वर्णन मैं तुम्हारे सामने कर रहा हूँ । गर्गाचार्यजीने यमुनाजीके मङ्गलमय तटपर यह सहस्रनाम गोपियोंको प्रदान किया था ॥ २ ॥
विनियोग ' ॐ अस्य श्रीबलभद्रसहस्त्रनामस्तोत्रमन्त्रस्य गर्गाचार्यऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, संकर्षणः परमात्मा देवता, बलभद्र इति बीजम्, रेवतीरमण इति शक्तिः, अनन्त इति कीलकम्, बलभद्रप्रीत्यर्थे जपे विनियोगः ' ॥ ३ ॥
( इस बलभद्रसहस्रनामस्तोत्ररूपी मन्त्र गर्गाचार्य ऋषि हैं, अनुष्टुप् छन्द है, परमात्मा संकर्षण देवता हैं, बलभद्र बीज है, रेवतीरमण शक्ति है, अनन्त कीलक है, श्रीबलभद्रकी प्रीतिके लिये इसका विनियोग है ॥ ३ ॥ )
इसको पढ़कर सहस्रनाम पाठके लिये विनियोगका जल छोड़ दे । तत्पश्चात् इस प्रकार ध्यान करे-ध्यान स्फुरदमलकिरीटं किङ्किणीकङ्कणार्ह चलदलककपोलं कुण्डल श्रीमुखाब्जम् । तुहिनगिरिमनोज्ञं नीलमेघाम्बराढयं हलमुसलविशालं कामपालं जिनका निर्मल किरीट दमक रहा तथा कङ्कणोंसे अलंकृत हैं, चञ्चल जिनके कपोल सुशोभित हैं, जिनका कुण्डलोंसे देदीप्यमान है, जो हिमाचल मनोहर उज्ज्वल तथा नीलाम्बर धारण विशाल हल - मुसल धारण करनेवाले कामपाल बलभद्रजीका मैं स्तवन करता सहस्त्रनाम आरम्भ १. ॐ बलभद्र, २. रामभद्र, समीडे ॥४ ॥
, जो करधनी अलकावलीसे मुख - कमल गिरिके समान किये हुए हैं । उन भगवान् हूँ ॥४ ॥
३. राम, ४. संकर्षण, ५. अच्युत, ६. रेवतीरमण, ७. देव, ८. कामपाल, ९. हलायुध ॥५ ॥
१०. नीलाम्बर, १ ९. श्वेतवर्ण, १२. बलदेव, १३. अच्युताग्रज, १४. प्रलम्बघ्न, १५. महावीर, १६. रौहिणेय, १७. प्रतापवान् ॥ ६ ॥
श्रीवासुदेवोऽवतु पर्वतेषु सहस्रशीर्षा च महाविवादे । रोगेषु मां रक्षतु रौहिणेयो मां कामपालोऽवतु वा कामात् सदा रक्षतु धेनुकारिः क्रोधात् सदा मां द्विविदप्रहारी । लोभात् सदा रक्षतु बल्वलारिर्मोहात् सदा मां किल प्रातः सदा रक्षतु वृष्णिधुर्यः प्राह्णे सदा मां मथुरापुरेन्द्रः । मध्यंदि गोपसखः प्रपातु स्वराट् पराह्नेऽवतु मां सायं फणीन्द्रोऽवतु मां सदैव परात्परो रक्षतु मां प्रदोषे । पूर्णे निशीथे च दुरन्तवीर्यः प्रत्यूषकालेऽवतु मां विदिक्षु मां रक्षतु रेवतीपतिर्दिक्षु प्रलम्बारिरधो यदूद्वहः । ऊर्ध्वं सदा मां बलभद्र आरात् तथा समन्ताद् बलदेव
अन्तः सदाव्यात् पुरुषोत्तमो बहिर्नागेन्द्रलीलोऽवतु मां महाबलः ।
विपत्सु ॥
मागधारिः ॥
सदैव ॥
सदैव ॥
एव हि ॥
सदान्तरात्मा च वसन् हरिः स्वयं प्रपातु पूर्णः परमेश्वरो महान् ॥
देवासुराणां भयनाशनं च हुताशनं पापचयैन्धनानाम् ।
विनाशनं विघटस्य विद्धि सिद्धासनं वर्मवरं बलस्य ॥
( गर्ग ०, बलभद्र ० १२ । १-१२ )
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४०८ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ श्रीबलभद्रखण्ड १८. तालाङ्क ९९. मुसली, २०. हली, २१. हरि, २२. यदुवर, २३. बली, २४. सीरपाणि, २५. पद्मपाणि, २६. लगुडी, २७. वेणुवादन ॥ ७ ॥
२८. कालिन्दीभेदन, २ ९. वीर, ३०. बल, ३१. प्रबल, ३२. ऊर्ध्वग, ३३. वासुदेवकला ३४. अनन्त, ३५. सहस्त्रवदन, ३६. स्वराट् ॥ ८ ॥
३७. वसु ३८. वसुमती ३ ९. भर्ता, ४०. वासुदेव, ४१. वसूत्तम ४२. यदूत्तम ४३. यादवेन्द्र ४४. माधव, ४५. वृष्णिवल्लभ ॥ ९ ॥
४६. द्वारकेश, ४७. माथुरेश, ४८. दानी, ४ ९. मानी, ५०. महामना, ५१. पूर्ण, ५२. पुराण, ५३. पुरुष, ५४. परेश, ५५. परमेश्वर ॥ १० ॥
५६. परिपूर्णतम, ५७. साक्षात् परम, ५८. पुरुषोत्तम, ५ ९. अनन्त, ६० शाश्वत, ६१. शेष, ६२. भगवान् ६३. प्रकृतेः परः ॥ ११ ॥
६४. जीवात्मा, ६५. परमात्मा, ६६. अन्तरात्मा, ६७ ध्रुव, ६८, अव्यय, ६ ९. चतुर्व्यूह, ७०. चतुर्वेद, ७१. चतुर्मूर्ति, ७२. चतुष्पद ॥ १२ ॥
७३. प्रधान, ७४. प्रकृति, ७५. साक्षी, ७६. संघात, ७७. संघवान् ७८. सखी, ७ ९. महामना, ८०. बुद्धिसख, ८१. चेत, ८२. अहंकार, ८३. आवृत ॥ १३ ॥
८४. इन्द्रियेश ८५. देवता, ८६, आत्मा, ८७. ज्ञान, ८८. कर्म, ८ ९. शर्म, ९ ०. अद्वितीय, ९ १. द्वितीय, ९ २. निराकार, ९ ३. निरञ्जन ॥ १४ ॥
९ ४. विराट् ९ ५. सम्राट् ९ ६. महौघ, ९ ७. आधार, ९ ८. स्थास्नु, ९९. चरिष्णुमान्, १०० फणीन्द्र, १०१. फणिराज १०२. सहस्र फणमण्डित ॥ १५ ॥
१०३. फणीश्वर, १०४. फणी, १०५. स्फूर्ति, १०६. फूत्कारी, १०७. चीत्कर, १०८. प्रभु १० ९. मणिहार, ११०. मणिधर, ११ ९. वितली ११२. सुतली, ११३. तली ॥। १६ ॥ ११४. अतली, ११५. सुतलेश, ११६. पाताल, ११७. तलातल, ११८. रसातल, ११ ९. भोगितल, १२०. स्फूरद्दन्त, १२१. महातल ॥ १७ ॥
१२२. वासुकि, १२३. शङ्खचूडाभ, १२४. देवदत्त, १२५. धनंजय, १२६. कम्बलाश्व, १२७. वेगतर, १२८. धृतराष्ट्र १२ ९. महाभुज ॥ १८ ॥
१३०. वारुणीमदमत्ताङ्ग, १३१. मदघूर्णित-लोचन, १३२. पद्माक्ष, १३३. पद्ममाली, १३४. वनमाली, १३५. मधुश्रवा ॥ १ ९ ॥ १३६. कोटिकंदर्पलावण्य, १३७. नागकन्या-समर्चित, १३८. नूपुरी, १३ ९. कटिसूत्री, १४०. कटकी, १४१. कनकाङ्गदी ॥ २० ॥
१४२. मुकुटी, १४३. कुण्डली, १४४. दण्डी, १४५. शिखण्डी, १४६. खण्डमण्डली, १४७. कलि, १४८. कलिप्रिय, १४ ९. काल, १५०. निवातकवचेश्वर ॥ २१ । १५१. सहारकृत्, १५२. रुद्रवपु, १५३० कालाग्नि, १५४. प्रलय, १५५. लय, १५६. महाहि, १५७. पाणिनि, १५८. शास्त्रकार, १५ ९. भाष्य-कार, १६०. पतञ्जलि ॥ २२ ॥
१६१. कात्यायन, १६२. फक्किकाभू, १६३. स्फोटायन, १६४. उरंगम, १६५. वैकुण्ठ, १६६. याज्ञिक, १६७. यज्ञ, १६८. वामन, १६ ९. हरिण, १७०. हरि ॥ २३ ॥
१७१. कृष्ण, १७२. विष्णु, १७३. महाविष्णु, १७४. प्रभविष्णु, १७५. विशेषवित् १७६. हंस, १७७. योगेश्वर, १७८. कूर्म १७ ९. नारद, १८१. मुनि ॥२४ ॥
१८२. सनक, १८३. कपिल १८५. कमठ, १८६. देवमङ्गल, १८८. पृथु, १८ ९. वृद्ध, १ ९ ०. भार्गवोत्तम ॥ २५ ॥
१ ९ २. धन्वन्तरि, १ ९ ३. नृसिंह, १ ९ ५. नारायण, १ ९ ६. नर, १ ९ ७. वाराह, १८०. , १८४. मत्स्य, १८७. दत्तात्रेय, ऋषभ, १ ९ १. १ ९ ४. कल्कि, रामचन्द्र, १ ९ ८. राघवेन्द्र, १ ९९. कोसलेन्द्र, २००. रघूद्रह ॥ २६ ॥
२०१. काकुत्स्थ, २०२. करुणासिन्धु, २०३. राजेन्द्र, २०४. सर्वलक्षण, २०५. शूर, २०६. दाशरथि, २०७. त्राता, २०८. कौसल्यानन्दवर्द्धन ॥ २७ ॥
२० ९ सौमित्रि २१०. भरत २११. धन्वी, २१२. शत्रुघ्न, २१३. शत्रुतापन, २१४. निषङ्गी,
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अध्याय १३ ] बलभद्र - सहस्त्रनाम ४० ९ २१५. कवची, २१६. खड्गी, २१७. शरी, २१८. ज्याहतकोष्ठक ॥ २८ ॥
२१ ९. बद्धगोधाङ्गुलित्राण, २२०. शम्भु-कोदण्डभञ्जन, २२१. यज्ञत्राता, २२२. यज्ञभर्ता, २२३. मारीचवधकारक ॥ २ ९ ॥ २२४. असुरारि २२५ ताडकारि २२६. विभीषणसहायकृत्, २२७. पितृवाक्यकर, २२८. हर्षी, २२ ९. विराधारि २३०. वनेचर ॥ ३० ॥
२३१. मुनि, २३२. मुनिप्रिय, २३३. चित्र-कूटारण्यनिवासकृत्, २३४. कबन्धहा, २३५. दण्डकेश, २३६. राम, २३७. राजीवलोचन ॥ ३१ ॥
२३८. मतङ्ग, २३ ९. वनसंचारी, २४०. नेता, २४१. पञ्चवटीपति, २४२. सुग्रीव, २४३. सुग्रीवसखा, २४४. हनुमत्प्रीतमानस ॥ ३२ ॥
२४५. सेतुबन्ध, २४६. रावणारि, २४७. लङ्कादहनतत्पर, २४८. रावण्यरि २४ ९. पुष्पकस्थ, २५०. जानकीविरहातुर ॥ ३३ ॥
२५१. अयोध्याधिपति, २५२. श्रीमान्, २५३. लवणारि २५४. सुरार्चित, २५५. सूर्यवंशी, २५६. चन्द्रवंशी, २५७. वंशीवाद्यविशारद ॥ ३४ ॥
२५८. गोपति, २५ ९. गोपवृन्देश, २६०. गोप, २६१. गोपीशतावृत, २६२. गोकुलेश, २६३. गोप-पुत्र, २६४. गोपाल, २६५. गोगणाश्रय ॥। ३५ ॥ २६६. पूतनारि, २६७. वकारि, २६८. तृणावर्त -निपातक, २६ ९. अघारि, २७०. धेनुकारि, २७१. प्रलम्बारि २७२. व्रजेश्वर ॥ ३६ ॥
२७३. अरिष्टहा, २७४. केशिशत्रु, २७५. व्योमासुरविनाशकृत्, २७६. अग्निपान, २७७. दुग्धपान, २७८. वृन्दावनलता, २७ ९. आश्रित ॥ ३७ ॥
२८०. यशोमतीसुत, २८१. भव्य, २८२. रोहिणीलालित, २८३. शिशु, २८४. रासमण्डल-मध्यस्थ, २८५. रासमण्डलमण्डन ॥ ३८ ॥
२८६. गोपिकाशतयूथार्थी, २८७. शङ्खचूड-धोद्यत, २८८. गोवर्द्धनसमुद्धर्ता, २८ ९. शत्रुजित् २ ९ ०. व्रजरक्षक ॥ ३ ९ ॥ २ ९ १. वृषभानुवर, २ ९ २. नन्द, २ ९ ३. आनन्द, २ ९ ४. नन्दवर्द्धन, २ ९ ५. नन्दराजसुत, २ ९ ६. श्रीश, २ ९ ७. कंसारि, २ ९ ८. कालियान्तक ॥ ४० ॥
२ ९९. रजकारि, ३००. मुष्टिकारि, ३०१. कंसकोदण्डभञ्जन, ३०२. चाणूरारि, ३०३. कूट-हन्ता, ३०४. शलारि, ३०५ तोशलान्तक ॥ ४१ ॥
३०६. कंसभ्रातृनिहन्ता, ३०७. मल्लयुद्ध-प्रवर्तक, ३०८. गजहन्ता, ३० ९. कंसहन्ता, ३१०. कालहन्ता, ३११. कलङ्कहा ॥ ४२ ॥
३१२. मागधारि, ३१३. यवनहा, ३१४. पाण्डु-पुत्रसहायकृत्, ३१५. चतुर्भुज, ३१६. श्यामलाङ्ग, ३१७. सौम्य, ३१८. औपगविप्रिय ॥ ४३ ॥
३१ ९. युद्धभृत् ३२०. उद्धवसखा, ३२१. मन्त्री, ३२२. मन्त्रविशारद, ३२३. वीरहा, ३२४. वीरमथन, ३२५. शङ्खधर, ३२६. चक्रधर, ३२७.
गदाधर । ४४ ॥
३२८. रेवतीचित्तहर्ता, ३२ ९. रेवतीहर्ष-वर्द्धन, ३३०. रेवतीप्राणनाथ, ३३१. रेवतीप्रिय-कारक ॥ ४५ ॥
३३२. ज्योति, ३३३. ज्योतिष्मतीभर्ता, ३३४. रैवताद्रिविहारकृत्, ३३५. धृतिनाथ, ३३६. धनाध्यक्ष, ३३७. दानाध्यक्ष, ३३८. धनेश्वर ॥ ४६ ॥
३३ ९. मैथिलार्चितपादाब्ज, ३४०. मानद, ३४१. भक्तवत्सल, ३४२. दुर्योधनगुरु, ३४३. गुर्वी, ३४४. गदाशिक्षाकर, ३४५. क्षमी ॥ ४७ ॥
३४६. मुरारि, ३४७. मदन, ३४८. मन्द, ३४ ९. अनिरुद्ध, ३५०. धन्विनांवर, ३५१. कल्पवृक्ष, ३५२. कल्पवृक्षी, ३५३. कल्पवृक्षवन-प्रभु ॥ ४८ ॥
३५४. स्यमन्तकमणि, ३५५. मान्य, ३५६. गाण्डीवी, ३५७. कौरवेश्वर, ३५८. कूष्माण्ड-खण्डनकर, ३५ ९. कूपकर्णप्रहारकृत् ॥ ४ ९ ॥ ३६०. सेव्य, ३६१. रेवतजामाता, ३६२. मधुसेवित, ३६३. माधवसेवित, ३६४. बलिष्ठ, ३६५. पुष्टसर्वाङ्ग, ३६६. हृष्ट, ३६७. पुष्ट, ३६८. प्रहर्षित ॥ ५० ॥
३६ ९. वाराणसीगत, ३७०. क्रुद्ध, ३७१. सर्व, ३७२. पौण्ड्रकघातक, ३७३. सुनन्दी,
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४१० गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ श्रीबलभद्रखण्ड ३७४. शिखरी, ३७५. शिल्पी, ३७६. द्विविदाङ्ग निषूदन ॥ ५१ ॥
३७७. हस्तिनापुरसंकर्षी ३७८. रथी, ३७ ९. कौरवपूजित, ३८०. विश्वकर्मा " ३८१. विश्वश्वर्मा, ३८२. देवशर्मा, ३८३. दयानिधि ॥ ५२ ॥
३८४. महाराज, ३८५. छत्रधर, ३८६. महा राजोपलक्षण, ३८७. सिद्धगीत ३८ ९. शुक्लचामरवीजित ॥ ५३ ॥
३ ९ ०. ताराक्ष, ३ ९९. बिम्बोष्ठ, ३ ९ ३. सुस्मितच्छवि ३ ९ ५. करदोर्दण्ड, ३ ९ ६. मेघमण्डल ॥ ५४ ॥
३ ९ ८. कपाटवक्षा, ३ ९९. पाद, ४०१. स्फुरद्युति, ४०२. ३८८. सिद्धकथ, कीरनास, ३ ९ २. , ३ ३ ९ ९ ४ ४.. करीन्द्र करीन्द्र, प्रचण्ड, ३ ९ ७. पीनांस, ४००. पद्म-महाविभूति, ४०३. भूतेश, ४०४. बन्धमोक्षी, ४०५. समीक्षण ॥ ५५ ॥
४०६. चैद्यशत्रु, ४०७. शत्रुसंध ४०८. दन्तवक्रनिषूदक, ४० ९. अजातशत्रु, ४१०. पापन, ४११. हरिदाससहायकृत् ॥ ५६ ॥
४१२. शालबाहु, ४१३. शाल्वहन्ता, ४१४. तीर्थयायी, ४१५. जनेश्वर, ४१६. नैमिषारण्य- नैमिषारण्य-यात्रार्थी, ४१७. गोमतीतीरवासकृत् ॥ ५७ ॥
४१८. गण्डकीस्त्रानवान्, ४१ ९. स्त्रग्वी, ४२०. वैजयन्तीविराजित, ४२१. अम्लान, ४२२. पङ्कज-धर, ४२३. विपाशी, ४२४. शोणसंप्लुत ॥ ५८ ॥
४२५. प्रयागतीर्थराज, ४२६. सरयू, ४२७. सेतुबन्धन ४२८. गयाशिर, ४२ ९. धनद, ४३०. पौलस्त्य, ४३१. पुलहाश्रम ॥ ५ ९ ॥ ४३२. गङ्गासागरसङ्गार्थी, ४३३. सप्तगोदावरी-पति, ४३४. वेणी, ४३५. भीमरथी, ४३६. गोदा, ४३७. ताम्रपर्णी, ४३८. वटोदका ॥ ६० ॥
४३ ९. कृतमाला, ४४०. महापुण्या, ४४ ९. कावेरी, ४४२. पयस्विनी, ४४३. प्रतीची, ४४४. सुप्रभा, ४४५. वेणी, ४४६. त्रिवेणी, ४४७. सरयूपमा ॥ ६ ९ ॥ ४४८. कृष्णा, ४४ ९. पम्पा, ४५०. नर्मदा, ४५ ९. गङ्गल, ४५२. भागीरथी ४५३. नदी, ४५४ सिद्धाश्रम, ४५५. प्रभास, ४५६. बिन्दु, ४५७. बिन्दुसरोवर ॥ ॥ ६२ ॥
४५८. पुष्कर, ४५ ९. सैन्धव, ४६० जम्बू, ४६१. नरनारायणाश्रम, ४६२. कुरुक्षेत्रपति, ४६३. राम, ४६४. जामदग्रय, ४६५. महामुनि ॥ ६३ ॥
४६६. इल्वलात्मजहन्ता, ४६७. सुदामा, ४६८. सौख्यदायक ४६ ९. विश्वजित ४७० विश्वनाथ, ४७ ९. त्रिलोकविजयी, ४७२. जयी ॥ ॥ ६४ ॥
४७३. वसन्तमालतीकर्षी ४७४. गद, ४७५. गद्य, ४७६. गदाग्रज, ४७७ गुणार्णव, ४७८. गुण-निधि, ४७ ९. गुणपात्री, ४८० गुणाकर ॥ ६५ ॥
४८१. रङ्गवल्ली, ४८२. जलाकार, ४८३. निर्गुण, ४८४. सगुण, ४८५. बृहत्, ४८६. दृष्ट, ४८७. श्रुत, ४८८. भवत् ४८ ९. भूत, ४ ९ ०. भविष्यत् ४ ९ १. अल्पविग्रह ॥ ॥ ६६ ॥
४ ९ २. अनादि, ४ ९ ३. आदि, ४ ९ ४. आनन्द, ४ ९ ५. प्रत्यग्धामा, ४ ९ ६. निरन्तर, ४ ९ ७. गुणातीत ४ ९ ८. सम, ४ ९९ साम्य, ५००, समदृक्, ५०१. निर्विकल्पक ॥ ६७ ॥
५०२. गूढ, ५०३. व्यूढ, ५०४. गुण, ५०५. गौण, ५०६, गुणाभास, ५०७, गुणावृत, ५०८ नित्य, ५० ९. अक्षर, ५१०. निर्विकार, ५११. क्षर, ५१२. अजस्त्रसुख, ५१३. अमृत ॥ ६८ ॥
५१४. सर्वग, ५१५. सर्ववित् ५१६. सार्थ, ५१७. समबुद्धि, ५१८. समप्रभ, ५१ ९. अक्लेद्य, ५२०. अच्छेद्य, ५२१. आपूर्ण, ५२२. अशोष्य, ५२३. अदाह्य, ५२४. अनिवर्तक ॥ ६ ९ ॥ ५२५. ब्रह्म, ५२६. ब्रह्मधर, ५२७. ब्रह्मा, ५२८ ५२८.. ज्ञापक, ५२ ९. व्यापक, ५३०. कवि, ५३१. अध्यात्म, ५३२. अधिभूत, ५३३. अधिदैव, ५३४. स्वाश्रय, ५३५. अश्रय ॥ ७० ॥
५३६. महावायु, ५३७. महावीर, ५३८. चेष्टा, ५३ ९. रूपतनुस्थित, ५४०. प्रेरक, ५४१. बोधक, ५४२. बोधी, ५४३. त्रयोविंशतिकगण ॥ ७१ ॥
५४४. अंशांश, ५४५. नरावेश, ५४६. अवतार, ५४७. भूपरिस्थित, ५४८. मह, ५४ ९. जन, ५५० तप, ५५ ९. सत्य, ५५२. भू. ५५३. भुव, ५५४. स्व ॥ ७२ ॥
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अध्याय १३ ] बलभद्र - सहस्त्रनाम ४११ ५५५. नैमित्तिक, ५५६. प्राकृतिक, ५५७ आत्यन्तिकमय लय, ५५८. सर्ग, ५५ ९. विसर्ग, ५६०. सर्गादि ५६१. निरोध, ५६२. रोध, ५६३. ऊतिमान् ॥ ७३ ॥
५६४. मन्वन्तरावतार, ५६५. मनु, ५६६. मनु-सुत, ५६७. अनघ ५६८. स्वयम्भू, ५६ ९. शाम्भव, ५७०. शंकु, ५७१. स्वायम्भुवसहायकृत् ॥ ७४ ॥
५७२. सुरालय, ५७३. देवगिरि ५७४. मेरु, ५७५. हेम, ५७६. अर्चित, ५७७. गिरि, ५७८. गिरीश, ५७ ९. गणनाथ, ५८०. गौरी, ५८१. ईश, ५८२. गिरिगह्वर ॥ ७५ ॥
५८३. विन्ध्य, ५८४. त्रिकूट, ५८५. मैनाक, ५८६. सुवेल, ५८७. पारिभद्रक, ५८८. पतंग, ५८ ९. शिशिर, ५ ९ ०. कङ्क, ५ ९ १. जारुधि, ५ ९ २. शैलसत्तम ॥ ७६ ॥
५ ९ ३. कालञ्जर, ५ ९ ४. बृहत्सानु, ५ ९ ५. दरीभृत् ५ ९ ६. नन्दिकेश्वर, ५ ९ ७. संतान, ५ ९ ८. तरुराज, ५ ९९. मन्दार, ६०० पारिजातक ॥ ७७ ॥
६०१. जयन्तकृत्, ६०२. जयन्ताङ्ग, ६०३. जयन्ती ६०४. दिग्, ६०५. जयाकुल, ६०६. वृत्रहा, ६०७. देवलोक, ६०८. शशी, ६० ९.
कुमुदबान्धव । ७८ ॥
६१०. नक्षत्रेश, ६११. सुधा, ६१२. सिन्धु ६१३. मृग, ६१४. पुष्य, ६१५. पुनर्वसु, ६१६. हस्त, ६१७. अभिजित् ६१८. श्रवण, ६१ ९. वैधृत, ६२०. भास्करोदय ॥ ७ ९ ॥ ६२१. ऐन्द्र, ६२२. साध्य, ६२३. शुभ, ६२४. शुक्ल, ६२५. व्यतीपात ६२६. ध्रुव, ६२७. सित, ६२८. शिशुमार, ६२ ९. देवमय, ६३०. ब्रह्मलोक, ६३१. विलक्षण ॥ ८० ॥
६३२. राम, ६३३. वैकुण्ठनाथ, ६३४. व्यापी, ६३५. वैकुण्ठनायक, ६३६. श्वेतद्वीप ६३७. अजितपद, ६३८. लोकालोकचलाश्रित ॥ ८१ ॥
६३ ९. भूमि, ६४०. वैकुण्ठदेव, ६४ ९. कोटि-ब्रह्माण्डकारक, ६४२. असंख्यब्रह्माण्डपति, ६४३. गोलोकेश, ६४४. गवां पति ॥ ८२ ॥
६४५. गोलोकधामधिषण, ६४६. गोपिका-कण्ठभूषण, ६४७. हीधर, ६४८. श्रीधर, ६४ ९. लीलाधर, ६५०. गिरिधर, ६५१. धुरी ॥ ८३ ॥
६५२. कुन्तधारी, ६५२. त्रिशूली. ६५४. बीभत्सी, ६५५. घर्घरस्वन, ६५६. शूलार्पितगज, ६५७. सूच्यर्पितगज, ६५८. गजचर्मधर, ६५ ९. गजी ॥ ८४ ॥
६६०. अन्त्रमाली, ६६१. मुण्डमाली, ६६२. व्याली, ६६३. दण्डकमण्डलु, ६६४. वेतालभृत् ६६५. भूतसंघ, ६६६. कूष्माण्डगणसंवृत ॥ ८५ ॥
६६७. प्रमधेश, ६६८. पशुपति, ६६ ९. मृडानी, ६७०. ईश, ६७१. मृड, ६७२. वृष, ६७३. कृतान्त-संघारि ६७४. कालसंघारि ६७५. कूट, ६७६. कल्पान्तभैरव ॥ ८६ ॥
६७७ षडानन, ६७८. वीरभद्र, ६७ ९. दक्षयज्ञ-विघातक, ६८० खर्पराशी, ६८१. विषाशी, ६८२. शक्तिहस्त, ६८३. शिवा, ६८४. अर्थद ॥ ८७ ॥
६८५. पिनाकटंकारकर, ६८६ चलझंकार-नूपुर, ६८७. पण्डित, ६८८. तर्क - विद्वान्, ६८ ९. वेदपाठी, ६ ९ ०. श्रुतीश्वर ॥ ८८ ॥
६ ९ १. वेदान्तकृत् ६ ९ २. सांख्यशास्त्री, ६ ९ ३. मीमांसी, ६ ९ ४. कणनामभाक् ६ ९ ५. काणादि, ६ ९ ६. गोतम, ६ ९ ७. वादी. ६ ९ ८. वाद, ६ ९९. नैयायिक, ७००. नय ॥८ ९ ॥ ७०१. वैशेषिक, ७०२. धर्मशास्त्री, ७०३. सर्व-शास्त्रार्थतत्त्वग, ७०४. वैयाकरणकृत्, ७०५. छन्द ७०६. वैयास, ७०७. प्राकृति, ७०८. वच ॥ ९ ० ॥ ७० ९. पाराशरीसंहितावित्, ७१०. काव्यकृत्, ७११. नाटकप्रद, ७१२. पौराणिक, ७१३, स्मृति-कर, ७१४. वैद्य. ७१५. विद्याविशारद ॥ ९९ ॥
७१६. अलंकार, ७१७. लक्षणार्थ, ७१८. व्यङ्ग्यवित् ७१ ९. ध्वनिवित् ७२० ध्वनि, ७२१. वाक्यस्फोट, ७२२. पदस्फोट, ७२३. स्फोटवृत्ति, ७२४. रसार्थवित् ॥ ९ २ ॥ ७२५. शृङ्गार, ७२६. उज्ज्वल · ७२७. स्वच्छ, ७२८. अद्भुत, ७२ ९. हास्य, ७३० भयानक, ७३१. अश्वत्थ, ७३२. यवभोजी,, ७३३. यवक्रीत, ७३४. यवाशन ॥ ९ ३ ॥
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४१२ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ श्रीबलभद्रखण्ड ७३५. प्रह्लादरक्षक, ७३६. स्निग्ध, ७३७. ऐलवंशविवर्धन, ७३८. गताधि, ७३ ९. अम्बरीषाङ्ग, ७४० विगाधि, ७४१. गाधीनां वर ॥ ९ ४ ॥ ७४२. नानामणिसमाकीर्ण, ७४३. नानारत्न विभूषण, ७४४. नानापुष्पधर, ७४५. पुष्पी, ७४६. पुष्पधन्वा, ७४७. प्रपुष्पित ॥ ९ ५ ॥ ७४८. नानाचन्दनगन्धाढ्य, ७४ ९. नानापुष्प-रसार्चित, ७५०. नानावर्णमय, ७५१. वर्ण, ७५२. सदा नानावस्त्रधर ॥ ९ ६ ॥ ७५३. नानापद्माकर, ७५४. कौशी, ७५५. नानाकौशेयवेषक, ७५६. रत्नकम्बलधारी, ७५७. धौतवस्त्रसमावृत ॥ ९ ७ ॥ ७५८. उत्तरीयधर, ७५ ९. पूर्ण, ७६०. घन-कशुकवान्, ७६१. संघवान्, ७६२. पीतोष्णीष, ७६३. सितोष्णीष, ७६४. रक्तोष्णीष, ७६५. दिगम्बर ॥ ९ ८ ॥ ७६६. दिव्याङ्ग, ७६७. दिव्यरचन, ७६८. दिव्यालोकविलोकित, ७६ ९. सर्वोपम, ७७०. निरुपम, ७७१ गोलोकाङ्गीकृताङ्ग ॥ ९९ ॥
७७२. कृतस्वोत्सङ्गगोलोक, ७७३. कुण्डली, ७७४. भूत, ७७५. आस्थित, ७७६. माथुर, ७७७. मथुरा, ७७८. आदर्शी, ७७ ९. चलत्खञ्जन-लोचन ॥ १०० ॥
७८०. दधिहर्ता, ७८१. दुग्धहर, ७८२. नवनीत सिताशन, ७८३. तक्रभुक्, ७८४. तक्रहारी, ७८५. दधिचीर्यकृतश्रम ॥ १०१ ॥
७८६. प्रभावतीबद्धकर, ७८७. दामी, ७८८. दामोदर, ७८ ९. दमी, ७ ९ ०. सिकताभूमिचारी, ७ ९ १. बालकेलि, ७ ९ २. प्रजार्भक ॥ १०२ ॥
७ ९ ३. धूलिधूसरसर्वाङ्ग, ७ ९ ४. काकपक्षधर, ७ ९ ५. सुधी, ७ ९ ६. मुक्तकेश, ७ ९ ७. वत्सवृन्द, ७ ९ ८. कालिन्दीकूलवीक्षण ॥ १०३ ॥
७ ९९. जलकोलाहली, ८००. कूली, ८०१. पङ्कप्राङ्गणलेपक, ८०२. श्रीवृन्दावनसंचारी, ८०३.
वंशीवटतटस्थित ॥। १०४ ॥
८०४. महावननिवासी " ८०५. लोहार्गलवनाधिप ८०६. साधु ८०७. प्रियतम, ८०८. साध्य, ८० ९. साध्वीश, ८१०. गतसाध्वस ॥ १०५ ॥
८११. रङ्गनाथ, ८१२. विट्ठलेश, ८१३. मुक्तिनाथ, ८१४. अघनाशक, ८१५. सुकीर्ति, ८१६. सुयशा ८१७. स्फीत, ८१८. यशस्वी, ८१ ९. रङ्गरञ्जन ॥१०६ ॥
८२० रागषट्रक, ८२१. रागपुत्र, ८२२. रागिणी, ८२३. रमणोत्सुक, ८२४. दीपक, ८२५. मेघमल्लार, ८२६. श्रीराग, ८२७. मालकोशक ॥ १०७ ॥
८२८. हिन्दोल " ८२ ९. भैरवाख्य, ८३०. स्वर-जातिस्मर, ८३१. मृदु, ८३२. ताल, ८३३. मान, ८३४. प्रमाण, ८३५. स्वरगम्य, ८३६. कलाक्षर ॥ १०८ ॥
८३७. शमी, ८३८. श्यामी, ८३ ९. शतानन्द, ८४०. शतयाम, ८४१. शतक्रतु, ८४२. जागर, ८४३. सुप्त, ८४४. आसुप्त, ८४५. सुषुप्त, ८४६. स्वप्न, ८४७. उर्वर ॥ १० ९ ॥ ८४८. ऊर्ज, ८४ ९. स्फूर्ज, ८५०. निर्जर, ८५१ विज्वर, ८५२. ज्वरवर्जित, ८५३. ज्वरजित् ८५४. ज्वरकर्ता, ८५५. ज्वरयुक्त, ८५६. त्रिज्वर, ८५७ ज्वर ॥ ११० ॥
८५८. जाम्बवान्, ८५ ९. जम्बुकाशङ्की, ८६०. जम्बूद्वीप, ८६१. द्विपारिहा, ८६२. शाल्मलि ८६३. शाल्मलिद्वीप, ८६४. प्लक्ष, ८६५. प्लक्षवनेश्वर ॥ १११ ॥
८६६. कुशधारी, ८६७. कुश, ८६८. कौशी, ८६ ९. कौशिक, ८७०. कुशविग्रह, ८७१. कुशस्थलीपति, ८७२. काशीनाथ, ८७३. भैरवशासन ॥ ११२ ॥
८७४. दाशार्ह, ८७५. सात्वत, ८७६ वृष्णि, ८७७, भोज, ८७८. अन्धकनिवासकृत्, ८७ ९. अन्धक, ८८०, दुन्दुभि ८८ ९. खोत, ८८२. प्रद्योत ८८३. सात्वतां पति ॥ ११३ ॥
८८४. शूरसेन, ८८५. अनुविषय, ८८६. भोजेश्वर, ८८७. वृष्णीश्वर, ८८८. अन्धकेश्वर, ८८ ९. आहुक, ८ ९ ०. सर्वनीतिज्ञ, ८ ९९ उग्रसेन, ८ ९ २. महोग्रवाक् ॥ ११४ ॥
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अध्याय १३ ] बलभद्र - सहस्त्रनाम ४१३ ८ ९ ३. उग्रसेनप्रिय, ८ ९ ४. प्रार्थ्य, ८ ९ ५. प्रार्थ ८ ९ ६. यदुसभापति, ८ ९ ७ सुधर्माधिपति, ८ ९ ८. सत्व, ८ ९९. वृष्णिचक्रावृत, ९ ००. भिषक् ॥ ११५ ॥
९ ०१. सभाशील, ९ ०२. सभादीप, ९ ०३. सभाग्नि, ९ ०४. सभारवि, ९ ०५. सभाचन्द्र, ९ ०६. सभाभास, ९ ०७. सभादेव, ९ ०८. सभापति ॥ ११६ ॥
९ ० ९. प्रजार्थद, ९ १०. प्रजाभर्ता, ९ ११. प्रजा-पालनतत्पर, ९ १२. द्वारका दुर्गसंचारी, ९ १३. द्वारकाग्रहविग्रह ॥ ११७ ॥
९ १४. द्वारकादुःखसंहर्ता, ९ १५. द्वारकाजन-मङ्गल, ९ १६. जगन्माता, ९ १७. जगत्त्राता, ९ १८. जगद्भर्ता, ९ १ ९. जगत्पिता ॥ ११८ ॥
९ २०. जगबन्धु, ९ २१. जगद्धाता ९ २२. जगन्मित्र, ९ २३. जगत्सख, ९ २४. ब्रह्मण्य-देव, ९ २५. ब्रह्मण्य ९ २६. ब्रह्मपादरजो दधत् ॥ ११ ९ ॥ ९ २७. ब्रह्मपादरज: स्पर्शी, ९ २८. ब्रह्मपाद-निषेवक, ९ २ ९. विप्राङ्घ्रिजलपूताङ्ग, ९ ३०. विप्रसेवापरायण ॥ १२० ॥
९ ३१. विप्रमुख्य, ९ ३२. विप्रहित, ९ ३३. विप्रगीतमहाकथ, ९ ३४. विप्रपादजलार्द्राङ्ग, ९ ३५. विप्रपादोदकप्रिय ॥ १२१ ॥
९ ३६. विप्रभक्त, ९ ३७. विप्रगुरु, ९ ३८. विप्र, ९ ३ ९. विप्रपदानुग, ९ ४०. अक्षौहिणीवृत, ९ ४ ९. योद्धा, ९ ४२. प्रतिमापञ्चसंयुत ॥ १२२ ॥
९ ४३. चतुर, ९ ४४. अङ्गिरा, ९ ४५. पद्मवर्ती, ९ ४६. सामन्तोद्धृतपादक, ९ ४७. गजकोटि-प्रयायी, ९ ४८. रथकोटिजयध्वज ॥ १२३ ॥
९ ४ ९. महारथ, ९ ५०. अतिरथ, ९ ५१. जैत्रस्यन्दनमास्थित, ९ ५२. नारायणास्त्री, ९ ५३. ब्रह्मास्त्री, ९ ५४. रणश्लाघी, ९ ५५. रणोद्भट ॥ १२४ ॥
९ ५६. मदोत्कट, ९ ५७. युद्धवीर, ९ ५८. देवासुर- भयंकर, ९ ५ ९. करिकर्णमरुत्प्रेजत्कुन्तल-व्याप्तकुण्डल ॥ १२५ ॥
९ ६०. अग्रग, ९ ६१. वीरसम्मर्द, ९ ६२. मर्द्दल, ९ ६३. रणदुर्मद, ९ ६४. भटप्रतिभट, ९ ६५ प्रोच्य ९ ६६. बाणवर्षी, ९ ६७. इषुतोयद ॥ १२६ ॥
९ ६८. खड्गखण्डितसर्वाङ्ग, ९ ६ ९. षोडशाब्द, ९ ७०. षडक्षर, ९ ७१. वीरघोष, ९ ७२. अक्लिष्टवपु, ९ ७३. वज्राङ्ग ९ ७४. वज्रभेदन ॥ १२७ ॥
९ ७५. रुग्णवज्र, ९ ७६. भग्नदन्त, ९ ७७. शत्रु-निर्भर्त्सनोद्यत, ९ ७८. अट्टहास, ९ ७ ९. पट्टधर, ९ ८०. पट्टराज्ञीपति, ९ ८१. पटु ॥ १२८ ॥
९ ८२. कल, ९ ८३. पटहवादित्र, ९ ८४. हुंकार, ९ ८५. गर्जितस्वन, ९ ८६. साधु, ९ ८७. भक्तपराधीन, ९ ८८. स्वतन्त्र, ९ ८ ९. साधुभूषण ॥ १२ ९ ॥ ९९ ०. अस्वतन्त्र, ९९ १. साधुमय, ९९ २. मनाक्साधुग्रस्तमना, ९९ ३. साधुप्रिय, ९९ ४. साधुधन, ९९ ५. साधुज्ञाति, ९९ ६. सुधा-घन ॥ १३० ॥
९९ ७. साधुचारी, ९९ ८. साधुचित्त ९९९.
साधुवश्य, १०००. शुभास्पद ।
इस प्रकार भगवान् बलभद्रजीके एक सहस्र-नामोंका वर्णन किया गया ॥ १३१ ॥
माहात्म्य अध्ययन यह सहस्रनाम मनुष्योंको सब प्रकारकी सिद्धि और चतुर्वर्ग ( अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष ) फल प्रदान करनेवाला है । जो इसका सौ बार पाठ करता है, वह इस लोकमें विद्यावान् होता है । इस सहस्रनामका पाठ करनेसे मनुष्य लक्ष्मी, वैभव, सद्वंशमें जन्म, रूप, बल तथा तेज - सब कुछ प्राप्त करता है । गङ्गाजी एवं यमुनाजीके तटपर अथवा देवालय ( देवमन्दिर ) में इसके एक हजार पाठ करनेसे जबर्दस्ती सिद्धि मिलती है । इसके पाठसे पुत्रकी कामनावालेको पुत्र तथा धनार्थीको धन प्राप्त होता है । बन्धनमें पड़ा मनुष्य उससे मुक्त हो जाता है और रोगीका रोग चला जाता है । जो मनुष्य पुरश्चरणकी विधिसे पद्धति, पटल, स्तोत्र, कवचसहित इस सहस्रनामका दस हजार बार पाठ करता है तथा होम, तर्पण, गोदान तथा ब्राह्मणका पूजनरूप कर्म विधिवत् करता है, वह समस्त
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४१४ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ श्रीबलभद्रखण्ड भूमण्डलका स्वामी चक्रवर्ती राजा होता है । वह अनेक सामन्त राजाओंसे घिरा रहता है । मदकी गन्धसे विह्वल भ्रमर मतवाले हाथियोंके कानोंकी चपेटसे आहत हो उड़ते हुए उसके द्वारपर जाकर उसकी शोभा बढ़ाते रहते हैं । राजेन्द्र! यदि कोई मनुष्य निष्कामभावसे रेवती-रमण भगवान् बलभद्रजीकी प्रसन्नताके लिये इस सहस्रनामका पाठ करता है तो वह जीवन्मुक्त हो जाता है । अच्युताग्रज बलभद्रजी सदा - सर्वदा उसके घरमें निवास करते हैं । हे महाराज! घोर पापी मनुष्य भी यदि इस सहस्रनामका पाठ करता है तो उसके मेरुके समान सारे पाप कट जाते हैं और वह इस लोकमें सम्पूर्ण सुखोंका उपभोग करके अन्तमें परात्पर गोलोकधामको प्रयाण कर जाता है * ॥ १३२ – १४१ ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहितामें श्रीबलभद्रखण्डके अन्तर्गत नारदजी कहते हैं— अच्युताग्रज श्रीबलभद्रजीके इस पञ्चाङ्गको सुनकर धृतिमान् दुर्योधनने सेवा - भाव तथा परम भक्तिके साथ प्राविपाक मुनिकी पूजा की । तदनन्तर मुनीन्द्र प्राड्विपाकजीने दुर्योधनको आशीर्वाद देकर उनकी अनुमति प्राप्त कर हस्तिनापुरसे अपने आश्रमको गमन किया । परमब्रह्म परमात्मा भगवान् अनन्त श्रीबलभद्रजीकी कथाको जो पुरुष सुनता अथवा सुनाता है, वह आनन्दमय बन जाता है । नृपेन्द्र! मैं आपके सामने इन सब मनोरथोंको पूर्ण करनेवाले बलभद्रखण्डका वर्णन कर चुका । जो मनुष्य इसका श्रवण करता है, वह भगवान् श्रीहरिके शोकरहित अखण्ड आनन्दमय धामको प्राप्त हो जाता है ॥ १४२ - १४४ ॥ प्राविपाक - दुर्योधन- संवादमें ' श्रीबलभद्रसहस्रनाम ' नामक तेरहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३ ॥
॥ श्रीबलभद्रखण्ड सम्पूर्ण ॥ * इति नाम्नां सहस्रं तु सर्वसिद्धिप्रदं नृणां चतुर्वर्गफलप्रदम् । इन्दिरां च विभूतिं चाभिजनं रूपमेव च । गङ्गाकूलेऽथ कालिन्दीकूले देवालये तथा । पुत्रार्थी लभते पुत्रं धनार्थी लभते धनम् । अयुतावर्तपाठे च पुरश्चर्याविधानतः । पटलं पद्धति स्तोत्रं कवचं तु विधाय च । मत्तेभकर्णप्रहिता मदगन्धेन विह्वला । निष्कारणः पठेद्यस्तु प्रीत्यर्थं रेवतीपतेः । सदा वसेत्तस्य गृहे बलभद्रोऽच्युताग्रजः ।
छित्त्वा मेरुसमं पापं मुक्त्वा सर्वसुखं त्विह ।
बलभद्रस्य कीर्तितम् ॥
शतवारं पठेद्यस्तु स विद्यावान् भवेदिह बलमोजश्च पठनात्सर्वं प्राप्नोति मानवः सहस्रावर्तपाठेन बलात् सिद्धिः प्रजायते ॥ बन्धात्प्रमुच्यते बद्धो रोगी रोगान्निवर्तते होमतर्पणगोदानविप्रार्चनकृतोद्यमात् महामण्डलभर्ता स्यान्मण्डितो मण्डलेश्वरैः अलंकरोति तद्द्वारं भ्रमद्भृङ्गावली भृशम् ॥ नाम्नां सहस्त्रं राजेन्द्र स जीवन्मुक्त उच्यते महापातक्यपि जनः पठेन्नामसहस्रकम् परात्परं महाराज गोलोकं धाम याति हि
( गर्गसंहिता, बलभद्र ० १३ ।
॥
॥
॥
|| ॥ ॥ ॥ ॥ १३२ - १४१ )