गर्ग संहिता — पृष्ठ 461–470

गर्ग संहिता · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 461–470

पृष्ठ 461

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अध्याय १३ ] अनिरुद्धका अन्तःपुरसे आज्ञा लेकर अश्वकी रक्षाके लिये प्रस्थान ४५५ भीतर सर्वत्र उसकी गति थी । वह छत्रसे सुशोभित वीणा आदि भी बजने लगे । मृदङ्गोंके शब्द और वंशीके था । उसमें स्वर्णनिर्मित सैकड़ों ध्वजा - पताकाएँ शोभा मधुर रागोंके साथ जय - जयकारकी ध्वनि सब ओर छा दे रही थीं । उससे मेघकी गर्जनाके समान उद्घोष होता गयी । वेद मन्त्रोंका घोष होने लगा । लावा, फूल और था । उस रथमें घंटों और मंजीरोंकी ध्वनि व्याप्त थी । मोतियोंकी वर्षा होने लगी । देवतालोग अनिरुद्धके ऊपर

उस समय शङ्ख और दुन्दुभियाँ बज उठीं । झाँझ और दिव्य पुष्प बरसाने लगे ॥ ११ - २४ ॥

इस प्रकार श्रीगर्गसंहिताके अन्तर्गत अश्वमेधखण्डमें ' अनिरुद्धका विजयाभिषेक ' नामक बारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२ ॥

तेरहवाँ अध्याय अनिरुद्धका अन्तःपुरसे आज्ञा लेकर अश्वकी रक्षाके लिये प्रस्थान; उनकी सहायताके लिये साम्बका कृतप्रतिज्ञ होना; लक्ष्मणाका उन्हें सम्मुख युद्धके लिये प्रोत्साहन देना; श्रीकृष्णके भाइयों और पुत्रोंका भी श्रीकृष्णकी आज्ञासे प्रस्थान करना तथा यादवोंकी चतुरङ्गिणी सेनाका विस्तृत वर्णन श्रीगर्गजी कहते हैं— राजन्! तदनन्तर गुरुजनोंको नमस्कार करके अनिरुद्ध देवकी, रोहिणी, रुक्मिणी, सत्यभामा तथा अन्य सम्पूर्ण श्रीहरि -वल्लभाओंसे आज्ञा लेनेके लिये अन्तः पुरमें गये । वहाँ उन सबकी आज्ञा ले, अपनी माता रति तथा रुक्मवती-को प्रणाम करके उनसे बोले - ' मैं अश्वकी रक्षा करनेके लिये जाता हूँ । इसके लिये महाराजने मुझे आज्ञा दी है । मेरे साथ अन्य बहुत से यदुवंशी वीर जा रहे हैं ' ॥ १-२ ॥ राजन्! अनिरुद्धका यह कथन सुनकर माताओंने उन्हें हृदयसे लगा लिया और गद्गदकण्ठसे उन प्रणत प्रद्युम्न कुमारको जानेकी आज्ञा देते हुए आशीर्वाद प्रदान किया । माताओंको नमस्कार करके वे अपनी पत्नियोंके महलोंमें गये । अपने पतिको आया देखकर ऊषा आदि तीनों पत्नियोंने उनका समादर किया । परंतु विरहकी सम्भावनासे उन सबका मन उदास हो गया । अनिरुद्ध उन प्यारी पत्नियोंको आश्वासन दे राजसभामें लौट आये ॥ ३–५ ॥ राजेन्द्र! उसके बाद यज्ञ - सम्बन्धी अश्वकी रक्षाके लिये यात्राके निमित्त ऋषि - मुनियोंने अनिरुद्धके उद्देश्यसे मङ्गलपाठ किया । फिर वे समस्त महर्षियों, गुरुजनों, महाराज उग्रसेन, शूरसेन, वसुदेव, बलराम, श्रीकृष्ण, अपने पिता प्रद्युम्न तथा अन्यान्य पूजनीय यादवोंको प्रणाम करके समस्त नागरिकोंद्वारा पूजित हुए । नरेश्वर! उन्होंने हाथोंमें धनुषबाण लिये, अँगुलियों में गोधाके चर्मसे बने हुए दस्ताने पहन लिये, कवच-कुण्डल धारण किये और पैरोंमें जूते पहनकर सिंहके समान पराक्रमी महावीर अनिरुद्धने ढाल, तलवार, किरीट एवं शक्ति ले, सोनेके बने हुए आभूषण धारण किये । फिर वे इन्द्रके दिये हुए दिव्य रथके द्वारा अपनी पुरीसे बाहर निकले । उस समय गाजे-बाजेकी आवाज और वेदमन्त्रोंके घोषके साथ यात्रा करते हुए अनिरुद्धपर चारों ओरसे चँवर डुलाये जा रहे थे । समस्त पुरवासी उनकी इस यात्राको देख रहे थे ॥ ६-११ ॥ तदनन्तर भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रने उनके साथ जानेके लिये उद्धव आदि मन्त्री तथा भोज, वृष्णि, अन्धक, मधु, शूरसेन और दशार्णकुलमें उत्पन्न वीर योद्धा भेजे । तदनन्तर राजा उग्रसेनने यदुवंशी वीरोंको सम्बोधित करके पूछा - ' यादवो! बताओ, युद्धमें अनिरुद्धकी सहायता करनेके लिये कौन जायगा? ' उग्रसेनकी यह बात सुनकर जाम्बवतीकुमार साम्बने सबके देखते - देखते राजाको नमस्कार करके यह बात कही ॥ १२–१४ ॥

पृष्ठ 462

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४५६ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ अश्वमेधखण्ड साम्ब बोले- राजेन्द्र! मैं महासमरमें सदा संनद्ध रहकर शत्रुओंसे अनिरुद्धकी रक्षा एवं सहायता करूँगा । यदि समराङ्गणमें मैं इनकी रक्षा न करूँ तो महाराज! उस दशामें मुझ सत्यवादीकी यह प्रतिज्ञा सुन लीजिये - ' मनुष्य त्याग देनेयोग्य दशमीविद्धा एकादशीका व्रत करके जिस गतिको प्राप्त होता है, मुझे भी निश्चय वही गति मिले । गोहत्यारों और ब्रह्महत्यारों-की जो गति होती है, वही गति यदि मैं यह रक्षणकार्य न कर सकूँ, तो मेरी भी हो ' ॥ १५ – १८ ॥ श्रीगर्गजी कहते हैं- ऐसी बात कहकर साम्ब वहाँसे अन्तःपुरमें गये । वहाँ माता जाम्बवतीको प्रणाम करके उन्होंने सारा अभिप्राय निवेदन किया । उनकी बात सुनकर माताने विरहकी अनुभूति करके बेटेको हृदयसे लगा लिया और आशीर्वाद दिया । तदनन्तर समस्त माताओंको नमस्कार करके वे पत्नीके घरमें गये । उन्हें आते देख शुभलक्षणा लक्ष्मणा बैठनेके लिये आसन दे आँसुओंसे कण्ठ अवरुद्ध हो जानेके कारण कुछ भी नहीं बोली । साम्बने उसे आश्वासन दे अपना अभिप्राय कह सुनाया । सुनकर विरहकी सम्भावनासे खिन्नचित्त हो वह पतिसे बोली ॥ १ ९ - २२ ॥ लक्ष्मणाने कहा- पतिदेव! आपको अनिरुद्ध-के अश्वकी सदा रक्षा करनी चाहिये । आप युद्धका अवसर आये तो सम्मुख होकर युद्ध करें । रणभूमिसे कभी विमुख न हों । आपके सहस्रों भाई हैं और उन सबकी सहस्रों मानवती स्त्रियाँ हैं । नाथ! यदि युद्धमें आपकी पराजय सुनकर वे आपकी प्रियतमा होनेके कारण मेरी ओर देखकर मुस्करा देंगी तो उस समय दुःखके कारण मेरी मृत्यु हो जायगी ॥ २३–२५ ॥ लक्ष्मणाकी यह बात सुनकर साम्ब हँसते हुए अपनी प्राणवल्लभासे बोले ॥ २५३ ॥

साम्बने कहा - भद्रे! युद्धभूमिमें मेरा सामना करनेके लिये यदि सारी त्रिलोकी उमड़ आये तो भी तुम सुनोगी कि मैंने उन सबका विदलन ( संहार ) कर दिया है । शुभे! यदि शूरवीर साम्ब रणभूमिसे विमुख हो जाय तो वह अपने पापसे वेद और ब्राह्मणोंका निन्दक माना जाय । उस दशामें मैं फिर तुम्हारे इस चन्द्रोपम मुखका दर्शन नही करूँगा ॥ २६-२८ ॥ श्रीगर्गजी कहते हैं - इस प्रकार अपनी पहली प्रियाको आश्वासन दे साम्बने दूसरी प्रियाको भी धीरज बँधाया । फिर वे अभिमन्यु और सुभद्रासे मिलकर घरसे निकले । धनुष और तलवार ले यात्राके लिये सुसज्जित साम्ब रथपर बैठे और यादवोंसे घिरे हुए उस उपवनमें गये, जहाँ अनिरुद्ध विद्यमान थे । तदनन्तर श्रीकृष्णने अपने गद आदि समस्त भाइयोंको और भानु तथा दीप्तिमान् आदि सभी पुत्रोंको भेजा । वे सब - के - सब शौर्यसम्पन्न और युद्धकुशल थे । उन्होंने धनुष धारण करके कवच बाँध लिया और चतुरङ्गिणी सेनाके साथ करोड़ोंकी संख्यामें वे नगरसे बाहर निकले । उनके दिव्य रथ ताल, हंस, मीन, मयूर और सिंहके चिह्नवाले ध्वजोंसे सुशोभित थे । उन रथोंका अङ्ग - प्रत्यङ्ग सुवर्णमण्डित था । प्रत्येक रथमें चार - चार घोड़े जुते थे । वे सभी रथ बहुत ऊँचे और देवताओंके विमानोंके समान सुशोभित थे । उनमें छत्र और चँवर लगे हुए थे । उन रथोंके ऊपर सोनेके कलश थे, जो सूर्यके समान चमक रहे थे । उनमें जालीदार बन्दनवारें लगायी गयी थीं । ऐसे रथोंद्वारा श्रीकृष्णके सभी पुत्र कुशस्थलीसे बाहर निकले ॥२ ९ –३४३ ॥ राजन्! तदनन्तर सोनेके हौदोंसे सुशोभित हाथी निकले, जिनके मुखपर गोमूत्र, सिन्दूर और कस्तूरीसे पत्ररचना की गयी थी । वे हाथी अञ्जन, कोयले और सजल जलधरोंके समान काले थे । सबके गण्डस्थलसे मद झर रहे थे । उनके श्वेत दाँत कमलकी नाल समान जान पड़ते थे । मृगद्वीपजातिके हाथी अत्यन्त ऊँचे होनेके कारण पर्वताकार दिखायी देते थे । उनके घंटे बज रहे थे और वे अत्यन्त उद्भट जान पड़ते थे । ऐरावतकुलमें उत्पन्न हाथी श्वेत वर्णके थे । उनके तीन-तीन शुण्डदण्ड और चार चार दाँत थे । उन सबको भगवान् श्रीकृष्ण भौमासुरकी राजधानीसे लाये थे । वे सब - के - सब पुरीसे बाहर निकले । एक लाख हाथी ऐसे थे, जिनकी पीठपर ध्वज फहरा रहे थे और उनके ऊपर एक लाख दुन्दुभियाँ रखी गयी थीं । लाख हाथी ऐसे थे, जिनपर कोई महावत नहीं बैठे थे । वे भी सुनहरी झूलोंसे अलंकृत थे । तदनन्तर एक करोड़

पृष्ठ 463

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अध्याय १३ ] अनिरुद्धका अन्तःपुरसे आज्ञा गजराज ऐसे निकले, जिनके ऊपर शूरवीर योद्धा सवार थे । जैसे समुद्रमें मगर विचरते हैं, उसी प्रकार उस सेनामें वे गजराज इधर - उधर घूमते विराज रहे थे । वे अपने शुण्डदण्डोंसे गुल्मोंको उखाड़कर आकाशमें फेंकते थे और मदकी धारासे पृथ्वीको भिगोते हुए पैरोंके आघातसे उसे कम्पित - सी कर रहे थे । अपने मस्तकोंकी टक्करसे महलों, दुर्गों और पर्वतशिखरोंको भी वे धराशायी करनेमें समर्थ थे । वे महाबली गजराज शत्रुओंकी सारी सेनाको कुचल देनेवाले थे । उनपर पड़ी हुई झूलें नीली, पीली, काली, सफेद और लाल थीं । वे सोनेकी साँकलोंसे युक्त थे और बड़ी शोभा पाते थे ॥ ३५ - ४३ ॥ राजन्! तत्पश्चात् जिन्हें नारदजीने अश्वशालामें देखा था, वे सभी अश्व सोनेके हारोंसे अलंकृत हो नगरसे बाहर निकले । कोई घोड़े बड़े चञ्चल थे, किन्हींका वर्ण धुएँके रंगका था और वे देखनेमें बड़े मनोहर थे । किन्हींके रंग काले और किन्हींके श्याम थे । कोई - कोई कमलके समान कान्तिवाले थे । उन सबके कंधे बड़े सुन्दर थे । कुछ घोड़े दूधके समान सफेद थे । कितने ही पानीके समान प्रतीत होते थे । किन्हींकी कान्ति हल्दीके समान पीली थी । कोई केसरिया रंगके थे और कुछ घोड़े पलाशके फूलके समान लाल थे । किन्हींके अङ्ग चितकबरे थे और किन्हींके स्फटिकमणिके समान स्वच्छ । वे सभी मनके समान वेगशाली थे । कोई हरे, कोई ताँबेके समान रंगवाले, कोई कुसुम्भकी - सी कान्तिवाले और कोई तोतेकी पाँखके समान प्रभावाले थे । कोई वीरबहूटीके समान लाल, कोई गौर और कोई पूर्ण चन्द्रमाके समान उज्ज्वल थे । वे सभी अश्व दिव्य थे । किन्हींके अङ्ग सिन्दूरके समान रंगवाले थे । कोई प्रज्वलित अग्नि और कोई बाल सूर्यके समान कान्तिमान् थे । राजन्! ये घोड़े

सभी देशोंसे द्वारकापुरीमें श्रीकृष्णके प्रतापसे आये थे ।

वे सभी उस दिन यात्राके लिये निकले ॥ ४४–४९ ॥

श्रीकृष्णकी अश्वशालामें जो घोड़े विद्यमान थे, लेकर अश्वकी रक्षाके लिये प्रस्थान ४५७ वे वैकुष्ठवासी तथा श्वेतद्वीपनिवासी थे । उनमेंसे कोई मयूरके समान कान्तिवाले थे और कोई नील-कण्ठके समान । किन्हींके वर्ण बिजलीके समान दीप्तिमान् थे और किन्हींके गरुडके समान । वे सभी अश्व दिव्य पंखोंसे अलंकृत थे । उनकी शिखाओंमें मणि प्रकाशित होती थी । वे श्वेत चामरोंसे अलंकृत थे । मुक्ताफलोंकी मालाओं तथा लाल रंगके वस्त्रोंसे विभूषित थे । उन सबका सुवर्णसे शृङ्गार किया गया था । उनकी पूँछ और मुखपट्टसे दिव्य प्रभा फैल रही थी । वे सर्वाङ्गसुन्दर दिव्य अश्व सहस्रोंकी संख्या में बाहर निकले ॥ ५०–५३ ॥ नरेश्वर! श्रीकृष्णके ये अश्व अपने पैरोंसे भूमिका स्पर्श नहीं करते थे । वे वायु और मनके समान वेगशाली, चञ्चल और मनोहर थे । राजन्! वे पानीके बबूलोंपर चल सकते थे, कच्चे सूतोंपर दौड़ सकते थे । कितने ही ऐसे थे, जो मकड़ीके जालों और पारदपर भी चलनेमें समर्थ थे । नृपेश्वर! वे समुद्रोंके जलपर भी निराधार चलते देखे जाते थे । राजन्! कुछ म्लेच्छ देशोंमें उत्पन्न अश्व भी वहाँ मौजूद थे, जो उस यात्रामें पुरीसे बाहर निकले । राजन्! उनमें कोटि - कोटि अश्व ऐसे थे, जो प्रतिदिन सौ योजन अविराम गतिसे दौड़ सकते थे । नरेश्वर! भगवान् श्रीकृष्णके घोड़े गड्ढे, दुर्गम भूमि, नदी, ऊँचे - ऊँचे महल तथा पर्वत आदिको भी लाँघ जाते थे । उन सभी घोड़ोंपर वीर योद्धा सवार थे ॥ ५४–५७ ॥ इसके बाद द्वारकापुरीसे समस्त पैदल सैनिक बाहर निकले । वे धनुष और कवचसे सुसज्जित शूरवीर तथा महान् बल - पराक्रमसे सम्पन्न थे । उनके कद ऊँचे थे । ढाल और तलवार धारण किये वे योद्धा लोहे के कवचसे मण्डित थे । हाथीके समान हृष्ट - पुष्ट शरीरवाले थे और युद्धमें बहुत - से शत्रुओंपर विजय पानेकी शक्ति रखते थे, इस प्रकार पुरीसे बाहर निकली हुई यादवोंकी उस विशाल सेनाको देखकर देवता, दैत्य और मनुष्य सबको महान् विस्मय हुआ ॥ ५८-६० ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहिताके अन्तर्गत अश्वमेधखण्डमें ' यादव - सेनाका निर्गमन ' नामक तेरहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३ ॥

पृष्ठ 464

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चौदहवाँ अध्याय अनिरुद्धका सेनासहित अश्वकी रक्षाके लिये प्रयाण; माहिष्मतीपुरीके राजकुमारका अश्वको बाँधना तथा अनिरुद्धका राजा इन्द्रनीलसे युद्धके लिये उद्यत होना श्रीगर्गजी कहते हैं— नरेश्वर! तदनन्तर राजा उग्रसेनकी आज्ञासे अनिरुद्धसे मिलनेके लिये वसुदेव, बलराम, श्रीकृष्ण, प्रद्युम्न तथा अन्य सब यादव रथों-द्वारा नगरसे बाहर निकले । वहाँ जाकर उन्होंने सेनासे घिरे हुए अनिरुद्धको देखा । भगवान् श्रीकृष्णने पहले राजसूय यज्ञके अवसरपर प्रद्युम्नको जिस नीतिका उपदेश दिया था, वही सारी नीति उस समय अनिरुद्धसे कह सुनायी ॥ १-३ ॥ राजन्! भगवान् श्रीकृष्णका वह उपदेश सुनकर अनिरुद्ध आदि समस्त यादवोंने प्रसन्नतापूर्वक उसे शिरोधार्य किया । तत्पश्चात् मुनिवर गर्ग, अन्यान्य मुनिवृन्द वसुदेव, बलराम, श्रीकृष्णचन्द्र तथा प्रद्युम्नको अनिरुद्धने प्रणाम किया । वसुदेव, बलराम, श्रीकृष्ण और प्रद्युम्न आदि यादव अनिरुद्धको शुभाशीर्वाद देकर रथोंद्वारा पुरीमें लौट आये । नरेश्वर! अनिरुद्धका अश्व देश - देशमें गया; किंतु श्रीकृष्णके भयसे कोई भूपाल उसे पकड़नेका साहस न कर सके । जहाँ - जहाँ वह घोड़ा गया, वहाँ -वहाँ सैनिकोंसहित अनिरुद्ध उसके पीछे शत्रुओंको जीतनेके लिये गये ॥४-८ ॥ इस प्रकार विभिन्न राज्योंका अवलोकन करता हुआ अनिरुद्धका वह अश्व नर्मदाके तटपर विराजमान माहिष्मतीपुरीको गया । उस पुरीमें चारों वर्णोंके लोग भरे थे और वह प्रस्तरनिर्मित दुर्गसे मण्डित थी । भगवान् शंकरके गगनचुम्बी मन्दिर उस पुरीकी शोभा बढ़ाते थे । पाँच योजन विस्तृत माहिष्मतीपुरी राजा इन्द्रनीलसे परिपालित थी । शाल, ताल, तमाल, वट, बिल्व और पीपल आदि वृक्ष उसकी श्रेयवृद्धि कर रहे थे । बहुत-से पोखरे और बावड़ियाँ वहाँ शोभा पाती थीं, जिनमें पक्षी कलरव करते थे । ऐसी नगरीको वहाँके उपवनमें पहुँचकर अश्वने देखा । राजा इन्द्रनीलके बलवान् पुत्रका नाम नीलध्वज था । वह सहस्रों वीरोंके साथ शिकार खेलनेके लिये पुरीसे बाहर निकला ॥ ९ -१३ ॥ उस राजकुमारने भालमें बँधे हुए पत्रके साथ श्यामकर्ण घोड़ेको देखा, जो फूलोंसे भरे उपवनमें कदम्बके नीचे खड़ा था । उसकी अङ्ग - कान्ति गायके दूधकी भाँति श्वेत थी । अनेक चामरोंसे अलंकृत वह अश्व वहाँ घूमता हुआ आ गया था । उसके शरीरपर स्त्रियोंके कुङ्कुमलिप्त हाथोंके छाप शोभा दे रहे थे तथा वह मोतीकी मालाओंसे मण्डित था । उस घोड़ेको देख राजकुमार नीलध्वजने अपने वाहनसे उतरकर बड़े हर्षके साथ खेल खेलमें ही उसके सिरका बाल पकड़ लिया । उसके भालमें यादवराज उग्रसेनने जो पत्र लगा दिया था, उसको राजकुमार पढ़ने लगा । उसमें लिखा था - ' द्वारकाके अधिपति, राजा उग्रसेन समस्त शूरवीरोंके शिरोमणि हैं । उनके समान महायशस्वी और चक्रवर्ती राजा दूसरा कोई नहीं है । उन्होंने पत्रसहित इस अश्वराजको स्वतन्त्र विचरनेके लिये छोड़ा है । अनिरुद्ध इसका पालन करते हैं । जो राजा अपनेको सबल समझते हों, वे इसे पकड़ें; अन्यथा अनिरुद्धके चरणोंमें प्रणाम करके लौट जायँ । ' यह अभिप्राय देखकर राजकुमार क्रोधसे बोल उठा — ' क्या अनिरुद्ध ही धनुर्धर हैं? हमलोग धनुर्धर नहीं हैं? मेरे पिताजीके रहते हुए कौन इस प्रकार वीरताका गर्व कर सकता है? ' ॥ १४–२०३ ॥ श्रीगर्गजी कहते हैं— राजन्! ऐसा कहकर राजकुमार घोड़ेको लेकर राजाके पास गया और उसने पिताके आगे उस घोड़ेका वृत्तान्त कह सुनाया । पुत्रका वचन सुनकर महाबली महामानी शिवभक्त राजा नीलने अपने पुत्रसे इस प्रकार कहा ॥ २१ - २२३ ॥ इन्द्रनील बोले- बेटा! पहले क्रतुश्रेष्ठ राजसूयके अवसरपर समर्थ होते हुए मैंने अपने कुबुद्धि मन्त्रीके कहनेसे प्रद्युम्नको कुछ भेंट दे दी थी । अब पुन: घोड़ेकी रक्षा करता हुआ अनिरुद्ध आ धमका है । अहो! दैवबल कैसा अद्भुत है? उससे कौन - सा उलट - फेर नहीं हो सकता है? अभी थोड़े ही दिन हुए

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अध्याय १४ ] अनिरुद्धका सेनासहित द्वारिकामें वृष्णिवंशी बढ़ गये । अतः आज मैं अनिरुद्ध आदि समस्त यादवोंको परास्त करूँगा । उस मानीको श्यामकर्ण अश्व कदापि नहीं लौटाऊँगा । मैंने भक्ति-भावसे भगवान् ( शंकरको संतुष्ट किया है । वे युद्धमें मेरी रक्षा करेंगे॥२३–२६ ॥ ऐसा कहकर माहिष्मतीपुरीके वीरनरेशने सोनेकी रस्सीसे घोड़ेको बाँध लिया और सेनासहित जाकर युद्ध करनेका निश्चय किया । नरेश्वर! इतनेमें ही घोड़ेको देखते हुए सौ अक्षौहिणी सेनाके साथ अनिरुद्ध नर्मदाके तटपर आ पहुँचे । राजन्! साम्ब मधु बृहद्बाहु, चित्रभानु, वृक, अरुण, संग्रामजित्, सुमित्र, दीप्तिमान्, भानु, वेदबाहु, पुष्कर, श्रुतदेव सुनन्दन, विरूप, चित्रबाहु, न्यग्रोध तथा कवि - ये अनिरुद्धके सहायक भी वहाँ आ गये । गद, सारण, अक्रूर, कृतवर्मा, उद्धव और युयुधान नामवाले सात्यकि - ये सब वृष्णिवंशी शूरवीर भी अनिरुद्धकी सहायता करनेके लिये आ पहुँचे । वे भोज, वृष्णि तथा अन्धक आदि यादव नर्मदाके तटपर खड़े हो श्यामकर्ण अश्व-को न देखनेके कारण बड़े आश्चर्यमें पड़े और आपसमें इस प्रकार कहने लगे - ' मित्रो! महाराज उग्रसेनके पत्रसहित अश्वको कौन ले गया, जिससे वह श्यामकर्ण अश्व यहाँ हमें दिखायी नहीं देता है? पहले राजसूय यज्ञके अवसरपर मानव, दैत्य और देवताओंने तथा नौ खण्डोंके अधिपतियोंने भी परास्त होकर जिनके लिये भेंट दी थी, उन्हींके प्रचण्ड शासनका तिरस्कार करके जिस कुबुद्धि नरेशने अभिमानवश अश्वका अपहरण किया है, वह चोर है । उसे चोरीका दण्ड मिलना चाहिये । ' सबके मुँहसे यही बात सुनकर और सामने पुरीकी ओर देखकर रुक्मवतीनन्दन अनिरुद्ध मन्त्रि-प्रवर उद्धवसे बोले॥२७–३७ ॥ अनिरुद्धने कहा— नर्मदा नदीके तट पर यह किस राजाकी नगरी शोभा पाती है? मालूम होता है कि हमारा अश्व अवश्य इसी नगरीमें गया है ॥ ३८३ ॥

अश्वकी रक्षाके लिये प्रयाण ४५ ९ अनिरुद्धका यह वचन सुनकर श्रीकृष्ण - सखा उद्धव अत्यन्त प्रसन्न होकर बोले ॥ ३ ९ ॥ उद्भवने कहा- यह राजा इन्द्रनीलकी नगरी है । और इसका शुभ नाम ' माहिष्मतीपुरी ' है । इसमें रहने-वाले सभी वर्णोंके लोग भगवान् महेश्वरके पूजनमें रत रहते हैं । वृष्णिकुलवल्लभ! इस राजाने पूर्वकालमें नर्मदाके तटपर बारह वर्षोंतक नर्मदेश्वरकी पूजा की थी । उनके षोडशोपचार पूजनसे भगवान् शिव प्रसन्न हो गये और उन्हें दर्शन देकर वर माँगनेके लिये प्रेरित करने लगे । भगवान् शिवका वचन सुनकर माहिष्मतीपुरीके पालक नरेशने हाथ जोड़ गद्गद वाणीमें उन रुद्रदेवसे कहा – ' ईशान! आप सम्पूर्ण जगत् के गुरु तथा नर्मदेश्वर हैं । मैं आपको नमस्कार करता हूँ । आप सकाम पुरुषोंके कामनापूरक कल्पवृक्ष हैं । महेश्वर! आप दाता हैं । मैं आपसे यह वर चाहता हूँ कि आप सदा देवता, दैत्य और मनुष्योंसे प्राप्त होनेवाले भयसे मेरी रक्षा करें । ' राजाकी यह बात सुनकर भगवान् शंकरने प्रसन्न हो ' तथास्तु ' कह दिया । राजेन्द्र! ऐसा कहकर वे वहाँसे अन्तर्धान हो गये । कन्दर्पनन्दन! इस कारण भगवान् रुद्रके वरसे प्रभावित वह शूरवीर नरेश युद्ध किये बिना तुम्हें अश्व नहीं लौटायेगा ॥ ४०–४७३ ॥ उद्धवजीका यह कथन सुनकर बलवान् अनिरुद्धने समस्त यादवोंके समक्ष धैर्यपूर्वक कहा ॥ ४८ ॥

अनिरुद्ध बोले- मन्त्रिप्रवर! सुनिये, आपने यह बताया है कि इस राजाके सहायक साक्षात् भगवान् शिव हैं । परंतु जैसे इनपर शिवकी कृपा है, उसी प्रकार मेरे ऊपर भगवान् श्रीकृष्ण कृपा रखते हैं ॥ ४ ९ ॥ - ऐसा कहकर यादवसहित वीर रुक्मवती-कुमारने अश्वको बन्धनसे मुक्त करनेके लिये राजा इन्द्रनीलको जीतनेका विचार किया । जब प्रद्युम्नकुमार अनिरुद्ध कवच बाँधकर खड़े हुए तब समस्त यादव-योद्धा परिघ, खड्ग, गदा, धनुष और फरसे लेकर युद्धके लिये संनद्ध हो गये॥५०-५१ ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहिताके अन्तर्गत अश्वमेधखण्डमें ' अनिरुद्धका प्रयाण ' नामक चौदहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १४ ॥

पृष्ठ 466

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पंद्रहवाँ अध्याय अनिरुद्ध और साम्बका शौर्य; माहिष्मती - नरेशपर इनकी विजय श्रीगर्गजी कहते हैं— तदनन्तर इन्द्रनीलका पुत्र महाबली नीलध्वज तीन अक्षौहिणी सेना साथ लेकर यादवोंको जीतनेके लिये अपने नगरसे बाहर निकला । वह अपने पिताजीकी बात सुनकर यदुवंशियोंके प्रति अत्यन्त रोषसे भरा था । उस राजकुमारको आया देख श्रीकृष्ण - पौत्र अनिरुद्ध धनुष हाथमें लेकर अकेले ही उसके साथ युद्ध करनेके लिये गये, मानो इन्द्र वृत्रासुरपर विजय पानेके लिये प्रस्थित हुए हों । संग्राम -भूमिमें जाकर अनिरुद्ध शत्रुओंके ऊपर तत्काल बाण -समूहोंकी वर्षा करने लगे । इससे उन सबके हृदयमें त्रास छा गया । फिर तो नीलध्वजके समस्त सैनिक भयभीत हो रणभूमिसे भागने लगे और प्रद्युम्रकुमारने विजयसूचक अपना शङ्ख बजाया॥१–४ ॥ अपनी सेनाको भागती देख बलवान् नीलध्वज धनुष टंकारता हुआ शीघ्र ही संग्राममण्डलमें आया । उसने धनुषकी प्रत्यञ्चासे अपनी सेनाको पुनः युद्धमें लौटनेके लिये प्रेरित किया । अनिरुद्धको शत्रुओंके बीचमें घिरा हुआ देख साम्बके रोषकी सीमा न रही । वे एक अक्षौहिणी सेनासे घिरे रोषपूर्वक धनुष टंकारते हुए वहाँ आ पहुँचे । उन्होंने बीस बाणोंसे नीलध्वजको और पाँच - पाँच बाणोंसे रथों, हाथियों, घोड़ों और पैदलोंको घायल कर दिया । साम्बके बाणोंकी चोट खाकर वे सब - के - सब धराशायी हो गये । हाथीके ऊपर हाथी, रथोंके ऊपर रथ, घोड़ोंपर घोड़े और पैदल मनुष्योंपर मनुष्य गिरने लगे । क्षणभरमें वहाँकी भूमिपर रक्तकी धारा बह चली । हाथी, घोड़े, रथ और पैदल छिन्न - भिन्न होकर वहाँ पड़े थे ॥५- १० ॥ राजन्! फिर अपनी सेनामें भगदड़ मची हुई देख नीलध्वज जिसके मनमें यादवोंको जीतनेकी बड़ी इच्छा थी, धनुष लेकर बाणोंकी वर्षा करता हुआ शत्रु सेनाके सम्मुख आया । राजन्! युद्धस्थलमें पहुँचकर रोषसे भरे हुए उस राजकुमारने दस बाणोंसे साम्बके धनुषको उसी तरह काट दिया, जैसे कोई दुर्वचन द्वारा प्रेम-सम्बन्धको छिन्न - भिन्न कर दे । बलवान् इन्द्रनील-कुमारने चार बाणोंसे साम्बके चारों घोड़े मार दिये, दो बाणोंसे उनके रथकी ध्वजा काट गिरायी, सौ बाणोंसे रथकी धज्जियाँ उड़ा दीं और एक बाणसे सारथिको कालके गालमें भेज दिया ॥११- १३ ॥ इस प्रकार साम्बको रथहीन करके राजकुमार नीलध्वजने पुन: सामने आयी हुई साम्बकी सेनाको बाणोंसे घायल करना आरम्भ किया । इतनेमें ही नीलध्वजकी सारी सेना भी लौट आयी और युद्ध-स्थलमें यादवोंकी विशाल वाहिनीको तीखे बाणोंसे घायल कर दिया । फिर तो रणक्षेत्रमें दोनों सेनाओंके बीच घमासान युद्ध होने लगा । खड्ग, परिघ, बाण, गदा और तीखी शक्तियोंद्वारा उभयपक्षके सैनिक परस्पर प्रहार करने लगे । साम्ब दूसरे रथपर आरूढ़ हो सुदृढ़ धनुषपर प्रत्यञ्चा चढ़ाकर रणक्षेत्रमें आये । वे बड़े बलवान् थे । उन्होंने सौ बाण मारकर नीलध्वजके रथको चूर - चूर कर दिया । मानद नरेश! उसका धनुष भी कट गया, तब उस रथहीन राजकुमारने गदा उठाकर क्रुद्ध हो युद्धस्थलमें बड़े वेगसे साम्बपर धावा किया । उसी समय साम्ब भी सहसा रथसे उतरकर गदा लिये नीलध्वजका सामना करनेके लिये रोषपूर्वक आगे बढ़े । साम्बको आया देख राजकुमारने उनपर गदासे चोट की, परंतु फूलकी मालासे चोट करनेपर जैसे हाथी विचलित नहीं होता उसी प्रकार साम्ब उस प्रहारसे विचलित न हो सके । तदनन्तर साम्बने अपनी गदासे राजकुमारपर आघात किया । उनके उस प्रहारसे राजकुमार रणभूमिमें गिर पड़ा और मूच्छित हो गया । फिर तो उसके सैनिक हाहाकार करते हुए भाग चले ॥१४- २१३ ॥ तब अत्यन्त क्रोधसे भरे हुए राजा इन्द्रनील स्वयं युद्धके लिये आये । उनके साथ दो अक्षौहिणी सेना थी और वे अपने धनुषसे बाणोंकी वर्षा कर रहे थे । उन्हें आया देख बलवान् धनुर्धर वीर श्रीकृष्णकुमार मधुने

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अध्याय १६ ] चम्पावतीपुरीके राजाद्वारा अश्वका पकड़ा जाना ४६१ अपने बाणोंकी मारसे इन्द्रनीलको रथहीन कर दिया । साथ ही अर्जुनके प्रिय शिष्य युयुधान सात्यकिने समराङ्गणमें आयी हुई इन्द्रनीलकी सेनाको अपने बार्णोद्वारा उसी प्रकार क्षत - विक्षत कर दिया जैसे किसीने कटुवचनोंसे मित्रताको छिन्न - भिन्न कर दिया हो । तदनन्तर यादवोंके छोड़ देनेपर राजा इन्द्रनील माहिष्मतीपुरीको लौट गये । वे दुःखसे व्याकुल हो रहे थे । उन्होंने पुरीमें पहुँचकर अपने स्वामी भगवान् शिवका स्मरण किया । तब भगवान् शिवने उन्हें परम उत्तम साक्षात् दर्शन देकर उनसे सारा वृत्तान्त पूछा । शिवजीकी बात सुनकर राजाने उनके समक्ष सारा वृत्तान्त निवेदन किया । इस प्रकार इन्द्रनीलका कथन सुनकर प्रमथोंके स्वामी भगवान् शिव बोले ॥२२-२७ ॥ शिवने कहा- राजेन्द्र! तुम शोक न करो । मेरा वरदान भी मिथ्या नहीं होगा । देवता, दैत्य और मनुष्य सब मिलकर भी तुम्हें जीतनेमें समर्थ नहीं हैं । महाराज! ये जो श्रीकृष्णके पुत्र हैं; ये उन्हींके अंशसे उत्पन्न हुए हैं । ये न तो देवता हैं, न दैत्य हैं और न मनुष्य ही हैं । नरेश्वर । इनसे पराजित होनेके कारण तुम मनमें दुःखी न हो । भूपाल! तुम्हें श्रीकृष्णका अपराध नहीं करना चाहिये । राजन्! इसलिये तुम शीघ्र ही विधिपूर्वक इन समागत यादव वीरोंको अश्वमेधका घोड़ा लौटा दो; इससे तुम्हारा भला होगा ॥ २८–३१ ॥ - ऐसा कहकर भगवान् रुद्र अदृश्य हो गये । उनके मुखसे जगदीश्वर भगवान् श्रीकृष्णका माहात्म्य जानकर राजाको बड़ी प्रसन्नता हुई । वे यज्ञका घोड़ा बहुत - से रल, सौ भार सुवर्ण, एक हजार मतवाले हाथी, एक लाख घोड़े और दस हजार रथ लेकर नीलध्वजके साथ जहाँ अनिरुद्ध थे, वहाँ उन्हें नमस्कार करनेके लिये गये । राजाके साथ और भी बहुत से लोग थे । अनिरुद्धके निकट जाकर राजाने विधिपूर्वक सारी वस्तुएँ निवेदित कीं और प्रणाम करके इस प्रकार कहा ॥ ३२–३५ ॥ इन्द्रनील बोले- श्रीकृष्ण, बलराम और महात्मा प्रद्युम्नको नमस्कार है । यदुकुलतिलक अनिरुद्धको बारंबार नमस्कार है । दैत्यसूदन! मुझे आज्ञा दीजिये, मैं आपकी क्या सेवा करूँ ॥३६ ॥

तब अनिरुद्धने उनसे कहा- नृपश्रेष्ठ! आप मेरे साथ रहकर मेरे इस अश्वको एक मित्रका अश्व मानकर शत्रुओंके हाथसे इसकी रक्षा कीजिये ॥ ३७३ ॥

श्रीगर्गजी कहते हैं— नरेश्वर! अनिरुद्धकी यह बात सुनकर राजाने ' बहुत अच्छा ' कहकर उनकी बात मान ली और नीलध्वजको राज्य देकर स्वयं यादव-सेनाके साथ जानेका निश्चय किया ॥ ३८-३९ ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहिताके अन्तर्गत अश्वमेधखण्डमें ' अनिरुद्धकी विजयका वर्णन ' नामक पंद्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५ ॥

सोलहवाँ अध्याय चम्पावतीपुरीके राजाद्वारा अश्वका पकड़ा जाना; यादवोंके साथ हेमाङ्गदके सैनिकोंका घोर युद्ध; अनिरुद्ध और श्रीकृष्णपुत्रोंके शौर्यसे पराजित राजाका उनकी शरणमें आना श्रीगर्गजी कहते हैं— राजन्! वहाँसे छूटनेपर वह अश्व सब देशका अवलोकन करता हुआ उशीनर -जनपदके अन्तर्गत चम्पावतीपुरीमें जा पहुँचा । राजा हेमाङ्गदसे परिपालित वह पुरी विशाल दुर्गसे मण्डित थी । उसके भीतर चारों वर्णोंके लोग निवास करते थे । वह पुरी गगनचुम्बी प्रासादोंसे परिवेष्टित थी । वहाँ पुण्यात्मा राजा हेमाङ्गद महान् शूरवीरोंसे घिरे रहकर अपने पुत्र हंसकेतुके साथ राज्य करते थे । नरेश्वर! उन्होंने यादवोंकी अवहेलना करके महात्मा अनिरुद्ध के उस अश्वको अनायास ही पकड़ लिया । मानद! राजा हेमाङ्गदने सोनेकी जंजीरसे घोड़ेको बाँधकर नगरके सभी दरवाजोंमें कपाट और अर्गला आदि दे दिये तथा यादवोंके विनाशके लिये दुर्गकी दीवारोंपर दो लाख शतनियाँ ( तोपें ) लगवा दीं और युद्धका ही निश्चय किया । तत्पश्चात् सेनासहित अनिरुद्ध घोड़ेकी राह देखते हुए वहाँ आ पहुँचे । उन्होंने चम्पावतीके उपवन में

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४६२ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ अश्वमेधखण्ड डेरा डाल दिया । वहाँ घोड़ेको न देखकर प्रद्युम्नकुमारने श्रीकृष्णचन्द्रके सखा उद्धवसे इस प्रकार पूछा ॥१-८ ॥ अनिरुद्ध बोले- मन्त्रिप्रवर! यह किसकी नगरी है? कौन मेरा घोड़ा ले गया है? महामते! आप जानते होंगे; सोच - विचारकर बताइये ॥ ९ ॥

उनका यह प्रश्न सुनकर बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ उद्धवने शत्रुओंके वृत्तान्तको समझकर यह बात कही ॥ १० ॥

उद्धव बोले- द्वारकानाथ! इस नगरीका नाम ' चम्पावती ' है । यहाँ अपने पुत्र हंसध्वजके साथ राजा हेमाङ्गद राज्य करते हैं । उन्होंने ही तुम्हारा घोड़ा पकड़ा है । यह राजा बड़ा शूरवीर है । युद्ध किये बिना यज्ञका घोड़ा नहीं देगा । यह नगरमें ही रहकर भुशुण्डियोंद्वारा दीर्घकालतक युद्ध करेगा । वह नरेश युद्धके लिये नगरसे बाहर नहीं निकलेगा । अतः नरेश्वर! तुम्हारी जैसी इच्छा हो वैसा करो ॥ ११ – १३३ ॥ उद्धवजीकी यह बात सुनकर अनिरुद्ध रोषपूर्वक बोले ॥ १४ ॥

अनिरुद्धने कहा -- सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ उद्धवजी! दुर्गमें रहकर युद्धमें लगे हुए इन बहुसंख्यक शत्रुओंको लोहेकी बनी हुई शक्तिके समान बाणोंद्वारा मैं आधे पलमें मार गिराऊँगा ॥ १५ ॥

उद्धवजीकी पूर्वोक्त बात सुनकर इस प्रकार रोषमें भरे हुए यदुकुलतिलक अनिरुद्ध उस पुरीका विध्वंस करनेके लिये शीघ्र ही गये और कोटि - कोटि बाणोंकी वर्षा करने लगे । अन्धकवंशी वीरोंके बाणसमूहोंसे उस पुरीमें कोलाहल मच गया । वीर हंसध्वज आदि समस्त शत्रु शङ्कित हो गये । तदनन्तर राजाके कहनेसे उन वीरोंने साहसपूर्वक दुर्गकी दीवारोंपर चढ़कर बाहर जमे हुए यादव - सैनिकोंको देखा । यदुकुलके श्रेष्ठ वीरोंको कवच आदिसे सुसज्जित देख वे सब - के - सब भयभीत हो उठे । यादव - योद्धा अस्त्र - शस्त्रोंसे परिमण्डित हो शस्त्रोंकी वृष्टि कर रहे थे । हेमाङ्गदके सैनिकोंने उनपर चारों ओरसे शतनियोंद्वारा आग बरसाना आरम्भ किया । वे इस निश्चयपर पहुँच गये कि हम सभी शत्रुओंको मौतके घाट उतार देंगे, घोड़ेको कदापि नही लौटायेंगे ॥ १६ - २० ॥ उस समय अनिरुद्धकी सेनामें महान् हाहाकार मच गया । शतघ्नियोंसे ताड़ित हो समस्त वृष्णिवंशी वीर विह्वल हो गये । उनके सारे अङ्ग क्षत - विक्षत हो गये । कितने ही योद्धा युद्धसे भाग चले । राजन्! कुछ सैनिक मूच्छित हो गये और कितने ही अपने प्राणोंसे हाथ धो बैठे । कोई युद्धमें जल गये और कोई भस्मीभूत हो गये । कितने ही लोगोंके हाथ - पैर और भुजाएँ कट गयीं । कुछ लोग शस्त्रहीन होकर गिर पड़े । कितनोंके कवच जल गये । कितने ही हाय - हाय करने लगे और कितने ही योद्धा बलराम तथा श्रीकृष्णके नाम ले - लेकर पुकारने लगे । उस युद्धक्षेत्रमें शतघ्नियोंकी मार खाकर सारे अङ्ग जर्जर हो जानेके कारण कितने ही हाथी भागते हुए गिर पड़े और मूर्च्छित होकर मर गये । संग्राममें उछलते - भागते हुए घोड़े शरीर छिन्न - भिन्न हो जानेके कारण मौतके मुखमें चले गये । कितने ही रथ चूर - चूर होकर धराशायी हो गये । सारी यादव - सेना आगकी लपेटमें आकर भयानक दिखायी देने लगी॥२१-२६३ ॥ यह सब देखकर अनिरुद्ध संग्राम - भूमिमें श्रीहरि-का स्मरण करते हुए कुछ सोचने लगे । तब श्रीकृष्ण-कृपासे ऊषावल्लभ अनिरुद्धको कर्तव्यबुद्धि सूझ गयी । उन्होंने शार्ङ्गधनुष लेकर तरकससे बाण निकाला और उसे धनुषपर रखकर उसमें पर्जन्यास्त्रका संधान किया । उस बाणके छूटते ही यादवसेनाके ऊपर मेघ छा गये । नरेश्वर! उन मेघोंने यादव - सैनिकोंकी रक्षा करते हुए भूरि - भूरि जलकी वर्षा की और चारों ओर फैली हुई आगको बुझा दिया । तब वृष्णिवंशी सैनिकोंके अङ्ग-अङ्ग शीतल हो गये । वे आगके भयसे छूट गये और अनिरुद्धकी प्रशंसा करते हुए पुनः युद्धके लिये उठ खड़े हुए । उन सबको सम्बोधित करके अनिरुद्धने कहा - ' मैं पंखवाले घोड़ेपर चढ़कर अकेला ही शत्रुओंके राजाको जीतनेके लिये चम्पावतीपुरीमें प्रवेश करूँगा ' ॥ २७–३२ ॥ श्रीगर्गजी कहते हैं- राजन्! अनिरुद्धकी यह बात सुनकर समस्त कृष्णकुमार साम्ब आदि अठारह महारथी उनसे बोल उठे ॥३३ ॥

हरिपुत्रोंने कहा- राजन्! तुम शत्रुओंकी नगरी-में न जाओ । हम सब लोग उस आततायी नरेशको

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अध्याय १६ ] चम्पावतीपुरीके राजाद्वारा अश्वका पकड़ा जाना ४६३ जीतनेके लिये वहाँ जायँगे ॥ ३४ ॥

- ऐसा कहकर रोषसे भरे हुए वे सब वीर हरिपुत्र सहसा पाँखवाले घोड़ोंपर चढ़कर दुर्गके परकोटेको लाँघते हुए चम्पावतीपुरीमें जा पहुँचे । वे सभी धनुर्धर, कवचधारी और युद्धकुशल थे । उन्होंने जाते ही सर्पाकार बाणोंसे शत्रुओंको मारना आरम्भ किया ॥ ३५-३६ ॥ नरेश्वर! वे शत्रु भी राजाकी आज्ञासे सहसा युद्धके लिये धनुष धारण किये क्रोधपूर्वक आ पहुँचे । उनकी संख्या एक करोड़ थी । रोषसे भरे और अस्त्र - शस्त्र उठाये उन बहुसंख्यक वीरोंको वहाँ आया देख साम्ब, मधु, बृहद्बाहु, चित्रभानु, वृक अरुण, संग्रामजित्, सुमित्र, दीप्तिमान्, भानु, वेदबाहु, पुष्कर, श्रुतदेव, सुनन्दन, विरूप, चित्रबाहु न्यग्रोध और कवि - इन समस्त श्रीकृष्णपुत्रोंने बाणोंद्वारा मारना आरम्भ किया । राजेन्द्र! फिर तो उस नगरीमें वीरोंके रक्तसे भयंकर नदी प्रकट हो गयी, जो नगरद्वारसे बाहर निकली । राजन्! उस घोर नदीको बहकर आती देख अनिरुद्ध शङ्क्ति हो गये । उनका मुँह सूख गया और वे रोषपूर्वक बोले- ' अहो! क्या मेरे पिताके सभी भाई मारे गये, जिसके कारण यह घोर नदी प्रकट हो हम सबको बहा ले जानेके लिये इधर ही आ रही है? मैं इस नदीको अपने अग्रिमय बाणोंद्वारा सोख लूँगा, इसमें संशय नहीं है । अपने पर्वतोपम गजराजोंद्वारा इस नगरीको ढहवा दूँगा ॥३७–४४ ॥ तदनन्तर अनिरुद्धके आदेशसे महावतोंसे प्रेरित हो बड़े - बड़े ऊँचे मदोन्मत्त और कज्जलगिरिके समान काले लाखों हाथी अपनी सूँड़ोंसे छोटे - छोटे वृक्षों एवं गुल्मोंको उखाड़ - उखाड़कर उस नगरमें फेंकने लगे । वे अपने पैरोंके आघातसे पृथ्वीको कम्पित करते हुए नगरके ऊपर जा चढ़े । नरेश्वर! वहाँ पहुँचकर उन समस्त गजराजोंने अपने कुम्भ-स्थलोंसे रोषपूर्वक सब ओरसे शीघ्र ही उस पुरीको ढाह दिया । सारे कपाट टूट - टूटकर गिर गये । द्वारोंकी सुदृढ़ शृङ्खलाएँ छिन्न - भिन्न हो गयीं । पुरीके दुर्गकी पथरीली दीवारें उन हाथियोंने तोड़ गिरायीं । नृपश्रेष्ठ! श्रीहरिके गजराजोंने किवाड़ों, अर्गलाओं और दुर्गको धराशायी करके पुरीमें पहुँचकर शत्रुओंके घरोंको गिराना आरम्भ किया । उस समय चम्पावतीमें महान् हाहाकार मच गया । राजा आदि सब लोग भयभीत हो बड़े आश्चर्यमें पड़ गये । तब पराजित हुए राजा हेमाङ्गद फूलोंके हारसे अपने दोनों हाथ बाँधकर ' पाहिमाम् ' कहते हुए हरिपुत्रोंके सम्मुख आये । उन नरेशको आया हुआ देख रणभूमिमें धर्मवेत्ता साम्बने भाइयोंको तथा दीनजनोंकी हत्या करनेवाले महावतों-को भी रोका । सबको रोककर वे राजासे इस प्रकार बोले ॥ ४५–५२३ ॥ साम्बने कहा- राजन्! आओ, तुम्हारा भला हो । मेरा घोड़ा लेकर अनिरुद्धके समीप चलो, तब तुम्हारे लिये श्रेष्ठ परिणाम निकलेगा ॥ ५३३ ॥

साम्बकी यह बात सुनकर राजा यज्ञका घोड़ा लिये हरिपुत्रोंके साथ पुरीसे बाहर निकले । राजन्! पुत्रके साथ अनिरुद्धके निकट जाकर राजाने घोड़ा और उसके साथ एक करोड़ स्वर्णमुद्राएँ भी अर्पित कीं । राजेन्द्र! तदनन्तर नीतिवेत्ता दीनवत्सल अनिरुद्धने पुष्पमालासे बँधे हुए उनके दोनों हाथ खोलकर इस प्रकार कहा - ' नृपश्रेष्ठ! मेरे साथ चलकर श्रीकृष्ण-की प्रसन्नताके लिये शत्रु - राजाओंसे इस घोड़ेकी रक्षा करो ॥ ५४ - ५७ ॥ अनिरुद्धकी बात सुनकर बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ राजा हेमाङ्गदने अपने पुत्रको राज्य देकर प्रसन्नतापूर्वक उनके साथ जानेका विचार किया ॥ ५८ ॥

इस प्रकार श्रीगर्गसंहिताके अन्तर्गत अश्वमेधखण्डमें ' चम्पावती - विजय- वर्णन ' नामक सोलहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १६ ॥

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सत्रहवाँ अध्याय स्त्री - राज्यपर विजय और वहाँकी कुमारी रानी सुरूपाका अनिरुद्धकी प्रिया होनेके लिये श्रीगर्गजी कहते हैं— तदनन्तर वहाँसे छूटनेपर परम उज्ज्वल अङ्गोंवाला अनिरुद्धका अश्व यदुकुलके प्रमुख वीरोंके साथ उशीनर - जनपदसे बड़े - बड़े वीरोंको देखता हुआ धीरे - धीरे बाहर निकला । राजन्! इस प्रकार विचरता हुआ वह श्रेष्ठ अश्व प्रत्येक राज्यमें गया और बहुत - से नरेशोंने उसको पकड़ा तथा छोड़ा । राजा इन्द्रनील और हेमाङ्गदको पराजित हुआ सुनकर अन्य मण्डलेश्वर नरेश अपने यहाँ आनेपर भी उस घोड़ेको पकड़नेका साहस न कर सके॥१-३ ॥ नृपश्रेष्ठ! बहुत - से वीरविहीन देशोंका अवलोकन करके वह श्रेष्ठ घोड़ा स्वेच्छासे घूमता हुआ स्त्रीराज्य -में जा पहुँचा । वहाँ कोई ' सुरूपा ' नामवाली सुन्दरी राजकन्या राज्य करती थी । कहते हैं, वहाँ कोई पुरुष राजा जीवित नहीं रहता । वज्रनाभ! उस देशमें किसी स्त्रीको पाकर जो कामभावसे उसका सेवन करता है, वह एक वर्षके बाद कदापि जीवित नहीं रहता ॥ ४-६ ॥ स्त्रीराज्यके नगरमें फूलोंसे भरा हुआ एक सुन्दर उद्यान था, जहाँ लवङ्ग - लताएँ फैली थीं और इलायचीकी सुगन्ध भीनी रहती थी । पक्षियों और भ्रमरोंकी मीठी बोली वहाँ गूँज रही थी । उस नगरमें पहुँचकर घोड़ा उस उद्यानमें एक इमली वृक्षके नीचे खड़ा हो गया । वहाँकी सब स्त्रियोंने देखा, बड़ा मनोहरश्यामकर्ण घोड़ा खड़ा है । वहाँके ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र भी उसे देखनेके लिये गये । नरेश्वर! उस घोड़ेको देखकर स्त्रियोंने अपनी स्वामिनीसे उसकी चर्चा की । वह चर्चा सुनकर रानी छत्र और चँवरसे वीजित हो रथपर बैठीं और करोड़ों स्त्रियोंके साथ उस घोड़ेको देखनेके लिये गयीं । घोड़ेको देखकर और उसके भालमें बँधे हुए पत्रको पढ़कर रानीको बड़ा रोष हुआ । उन्होंने नगरमें घोड़ेको बाँधकर उसके प्रतिपालकोंके साथ युद्ध करनेका द्वारकाको जाना निश्चय किया । कोई स्त्रियाँ हाथीपर, कोई रथपर और कोई घोड़े पर आरूढ़ हो कवच बाँधकर अस्त्र - शस्त्रोंसे सम्पन्न हो युद्धके लिये आयीं । सब स्त्रियाँ कुपित हो अस्त्र - शस्त्रोंकी वर्षा करती हुई आयीं । उन्हें देखकर अनिरुद्धने हेमाङ्गदसे पूछा ॥ ७ – १३ ॥ अनिरुद्ध बोले- राजन्! ये कौन - सी स्त्रियाँ हैं, जो युद्ध करनेके लिये आयी हैं । जिस उपायसे यहाँ मेरा कल्याण हो, वह विस्तारपूर्वक बताइये ॥ १४ ॥

हेमाङ्गदने कहा – नृपेश्वर! इस देशमें रानी राज्य करती है; क्योंकि राजा यहाँ जीवित नहीं रहता है । इसीलिये वह स्त्रियोंसे घिरी हुई आयी है । आपके घोड़ेको पकड़कर वह संग्राम करनेके लिये उपस्थित है ॥ १५ ॥

यह सुनकर अनिरुद्ध राजासे इस प्रकार बोले ॥ १५ ॥

अनिरुद्धने कहा- राजन्! यहाँपर स्त्री राज्य क्यों करती है तथा राजा क्यों जीवित नहीं रहता है? यह बात विस्तारपूर्वक बतलाइये; क्योंकि आप सब कुछ जानते हैं ॥१६-१७ ॥ अनिरुद्धकी यह बात सुनकर राजा हेमाङ्गदने अपने गुरु याज्ञवल्क्यजीके चरणारविन्दोंका चिन्तन करते हुए कहा – ' यादवेन्द्र! इस विषयका प्राचीन इतिहास मैंने चम्पापुरीमें पहले गुरुवर याज्ञवल्क्यजीके मुखसे सुना था, वही तुमसे कहूँगा; ध्यान देकर सुनो ॥१८-१९ ॥ राजन्! प्राचीन सत्ययुगकी बात है, इस देशमें ' नारीपाल ' नामसे विख्यात एक मण्डलेश्वर राजा हुए थे । उनके मोहिनी नामवाली पत्नी थी, जिसका जन्म सिंहलद्वीपमें हुआ था । वह पद्मिनी नायिका थी । उसकी चाल हंसके समान थी और मुख पूर्णचन्द्रके समान मनोहर था । राजा उसके सौन्दर्यके महासागरमें डूबकर यह भी नहीं जान पाते थे कि कब दिन बीता