गर्ग संहिता — पृष्ठ 471–480

गर्ग संहिता · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 471–480

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अध्याय १७ ] स्त्री - राज्यपर विजय, रानी सुरूपाका और कब रात समाप्त हुई? वे सैकड़ों वर्षोंतक उसके साथ रमण करते रहे । काममोहित होनेके कारण वे प्रजाजनोंका न्याय भी नहीं करते थे । राजन्! उस समय सारी प्रजा दुःखसे पीड़ित हो रही थी । यादवेश्वर! प्रजाजनोंका पारस्परिक कलहसे विनाश होता देख राजवल्लभा मोहिनी अपनी शक्तिके अनुसार सारी प्रजाका न्यायकार्य स्वयं ही सँभालने लगी । एक दिन उस नरेशसे मिलनेके लिये महामुनि अष्टावक्र उनके अन्तःपुरमें आये । राजाका मन स्त्रीमें ही आसक्त रहता था । वे मुनिको आया देख जोर - जोरसे हँसने लगे और बोले- ' यह कुरूप यहाँ कैसे आ गया? ' ॥ २०–२६ ॥ तब मुनि रुष्ट होकर बोले- ' अरे! ओ मूर्ख नपुंसक! मेरी बात सुन ले, तू स्त्रियोंके हाथका खिलौना होकर मुनियोंका अपमान क्यों कर रहा है? तुम्हारे देशमें सदा स्त्रियाँ राज्य करेंगी । इस राज्यमें पुरुष - राजा जीवित नहीं रहेगा । अतः तू अभी इस राजभवनसे निकल जा । इस देशमें स्त्रीको पाकर जो प्रतिदिन उसका सेवन करेगा, वह एकवर्ष बीतनेके बाद निस्संदेह जीवित नहीं रहेगा ' ॥ २७ - २ ९ ॥ श्रीगर्गजी कहते हैं— राजन्! ऐसा कहकर मुनिश्रेष्ठ अष्टावक्र अपने आश्रमको चले गये । मुनिके चले जानेपर राजा उनके शापसे नपुंसक हो गये । ' यह सब दुर्दशा मुनिने ही की है ' - ऐसा जानकर राजा अत्यन्त दीन एवं दुःखसे व्याकुल हो गये और स्वयं ही अपनी निन्दा करने लगे ॥ ३०-३१ ॥ नारीपाल बोले- अहो! स्त्रीके वशीभूत रहने-वाले मुझ मन्दभाग्यने यह क्या किया? मुनियोंकी पूजा छोड़कर नरककी राह पकड़ ली । आज मुझ दुष्ट पापात्मापर यमदूतोंकी दृष्टि पड़ी है । अब मैं वैतरणीमें गिराये जानेयोग्य हो गया हूँ । इस दशामें देखकर मुझे कौन अपने तेजसे इस कष्टसे छुड़ायेगा? ॥ ३२-३३ ॥ ऐसा उद्गार प्रकट करके राजा घर छोड़कर वन-वनमें विचरने लगे । वे मुक्तिदाता भगवान् विष्णुके भजनमें लग गये और अन्तमें उन्होंने श्रीहरिका पद प्राप्त कर लिया । उस शापके भयसे राजालोग इस देशमें राज्य नहीं करेंगे; केवल नारियाँ ही यहाँ शासन अनिरुद्धकी प्रिया होनेके लिये द्वारका जाना ४६५ करेंगी, इसमें संशय नहीं है ॥ ३४-३५ ॥ श्रीगर्गजी कहते हैं— अनिरुद्ध और हेमाङ्गद इस प्रकार बातचीत कर ही रहे थे कि रोषसे भरी हुई वहाँकी पुंश्चली नारियाँ इनके पास आ गयीं और क्रोधपूर्वक अपने धनुषोंसे बाणोंकी वर्षा करने लगीं । उन स्त्रियोंको देखकर अनिरुद्ध विस्मित हो गये और ' मैं स्त्रियोंके साथ युद्ध कैसे करूँगा ' - ऐसा कहते हुए वे भयभीत से हो गये । उसी समय मण्डलेश्वरी सुरूपा स्त्रियोंके साथ उनके निकट आ गयीं और अनिरुद्धको देखकर बोली ॥ ३६–३८ ॥ रानीने कहा - वीर! रणभूमिमें खड़े हो जाओ, खड़े हो जाओ । मेरे साथ युद्ध करो । तुम तो बहुत बड़ी सेनाके साथ हो । फिर युद्धस्थलमें व्यर्थ सोचमें क्यों पड़ गये हो? तुम बड़े मानी हो । मैं इस समराङ्गणमें वृष्णिवंशी योद्धाओंसहित तुमको पराजित करके अपना क्रीड़ामृग बनाऊँगी; क्योंकि तुम्हें देखकर मैं मदन-ज्वरसे पीड़ित हो गयी हूँ ॥३ ९ -४० ॥ उसकी यह बात सुनकर अनिरुद्ध भयसे विह्वल हो गये । सब कुछ जान गये और दीन वाणीमें उस मण्डलेश्वरीसे बोले - ' रानी! तुम सर्वदेवेश्वर भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रके अश्वको यज्ञके लिये अपनी ही इच्छासे मुझे लौटा दो । सुमुखि! मैं तुम्हारे साथ युद्ध नहीं करूँगा; अत: तुम श्रीहरिके दर्शनके लिये द्वारका जाओ । भद्रे! जिनके नामका स्मरण करके मनुष्य कृतकृत्य हो जाता है, साक्षात् उन्हींके दर्शनका कैसा महान् फल है । यह तुम्हें क्या बताऊँ! ' वार्तालापमें चतुर अनिरुद्ध के इस प्रकार समझानेपर उसे पूर्वजन्मकी वार्ताका स्मरण हो आया और वह अनिरुद्धसे उसी प्रकार बोली- जैसे ब्रह्माजीसे मोहिनी बोली थी ॥ ४१ - ४५ ॥ सुरूपाने कहा – देव! मैं पूर्वजन्ममें स्वर्गकी एक प्रसिद्ध अप्सरा थी । मेरा नाम ' मोहिनी ' था । मेरे अङ्ग कमलके समान प्रफुल्ल एवं सुगन्धित थे । मेरे नेत्र भी कमलदलके समान विकसित एवं विशाल थे । एक दिनकी बात है - पद्मयोनि ब्रह्माजी हंसपर आरूढ़ हो कहीं जा रहे थे । उन्हें देखकर मैं उनके निकट गयी और बोली- ' आप मुझे अङ्गीकार करें । '

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४६६ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ अश्वमेधखण्ड जब ब्रह्माजीने मुझे ग्रहण नहीं किया, तब मैं शाप देकर ' ककुद्मती ' नदीके तटपर गयी और वहाँ दुष्कर तपस्या करने लगी । मेरी तपस्यासे ब्रह्माजी संतुष्ट हो गये । वे तपस्याके अन्तमें मेरे पास आये और प्रसन्नचित्त हो मुझ तपस्विनीसे बोले - ' वर माँगो । ' उनका यह कथन सुनकर मैं ( मोहिनी ) बोली- ' देवदेव! आपको नमस्कार है । लोकेश! मैं यही वर माँगती हूँ कि आप मुझ दीन तपस्विनीका वरण करें । मैं दुःखित होकर आपकी शरणमें आयी हूँ । यदि आप मुझे ग्रहण नहीं करेंगे तो मैं तपस्यासे क्षीण हुए इस शरीरको रोषपूर्वक त्याग दूँगी । ' मेरी यह बात सुनकर ब्रह्माजीने कहा- " भामिनि! शोक न करो । भद्रे! दूसरे जन्ममें तुम्हारा मनोरथ पूर्ण होगा । मैं द्वारकामें श्रीहरिका सुन्दर पौत्र होऊँगा । उस समय मेरा नाम ' अनिरुद्ध ' होगा और तुम स्त्रीराज्यकी रानी होओगी । भद्रे! उस समय मैं तुम्हें ग्रहण करूँगा । मेरी यह बात झूठी नहीं है । ", यह सुनकर मैं इस भूतलपर उत्पन्न हुई । यादवश्रेष्ठ! आप साक्षात् ब्रह्माजी हैं और मेरे लिये ही यहाँ पधारे हैं ॥ ४६–५४३ ॥ श्रीगर्गजी कहते हैं— सुरूपाका यह कथन सुनकर समस्त यादव आश्चर्यचकित हो गये । तब धर्मात्मा अनिरुद्ध ने उससे यह निर्मल वचन कहा ॥५५३ अनिरुद्ध बोले- भद्रे! तुम श्रीद्वारकाको जाओ । मैं वहाँ अपनी प्रियाके रूपमें तुम्हें ग्रहण करूँगा । इस समय तो मैं राजाओंसे अश्वकी रक्षा करते हुए उसीके साथ जाऊँगा ॥ ५६ ॥

तदनन्तर सुरूपा अनिरुद्धकी आज्ञासे अपनी श्रेष्ठ मन्त्रिणी प्रमिलाको राज्यपर स्थापित करके घोड़ा लौटाकर स्वयं द्वारकाको चली गयी ॥ ५७ ॥

इस प्रकार श्रीगर्गसंहिताके अन्तर्गत अश्वमेधखण्डमें ' स्त्रीराज्यपर विजय ' नामक सत्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १७ ॥

अठारहवाँ अध्याय राक्षस भीषणद्वारा यज्ञीय अश्वका अपहरण तथा विमानद्वारा यादव- वीरोंकी उपलङ्कापर चढ़ाई श्रीगर्गजी कहते हैं- राजन्! तदनन्तर अनिरुद्धके प्रयाससे छूटा हुआ वह दुग्धके समान उज्ज्वल यज्ञसम्बन्धी अश्व स्वेच्छासे सिंहलद्वीपके निकट विचरने लगा । वह प्याससे पीड़ित था । घोड़ेने देखा, सामने ही बहुतसे वृक्षोंद्वारा आवृत और जलसे भरी हुई एक बावड़ी है । उसे देख, वह स्वयं जाकर उसका पानी पीने लगा । बावड़ीमें अश्वको देखकर एक ' भीषण ' नामवाले राक्षसने उसके भालमें लगे हुए पत्रको पढ़ा और बड़ी प्रसन्नतासे उस घोड़ेको पकड़ लिया । उसी समय सब यादव, जिनकी दृष्टि घोड़ेपर ही लगी हुई थी, वहाँ आ पहुँचे । आकर उन्होंने देखा -' यज्ञके अश्वको एक राक्षसने पकड़ रखा है । ' तब वे युद्धशाली यादव उस राक्षससे बोले ॥ १-४ ॥ यादवोंने कहा - अरे! तू कौन है? जैसे सिंहकी वस्तुको सियार ले जाय, उसी तरह यादवेन्द्र महाराज उग्रसेनके घोड़ेको लेकर तू कहाँ जायगा? धूर्त! खड़ा रह, खड़ा रह । हमारे साथ धैर्यपूर्वक युद्ध कर! हम घोड़ेको तेरे हाथसे छुड़ा लेंगे तथा रणभूमि में तेरा वध कर डालेंगे । भाइयोंसहित शकुनि, नरकासुर, बाणासुर और कलङ्क - ये समस्त राक्षस - राज हमारे हाथसे मारे जा चुके हैं । तू तो उनके सामने तिनकेके तुल्य है । अतः हम युद्धमें तुझे कुछ भी नहीं गिनेंगे । तू घोड़ा देकर चला जा, चला जा, नहीं तो हम तुझे मार डालेंगे ॥ ५-८ उनका यह भाषण सुनकर देवताओंको भी भयभीत करनेवाले भीषणने शूल, गदा और खड्ग लेकर बड़े रोषके साथ उन सबसे कहा॥९॥

भीषण बोला- अरे! तुमलोग क्या मेरा सामना कर सकते हो । मनुष्य तो हमारे भोजन हैं । वे राक्षसोंके सामने कौन - सा पुरुषार्थ प्रकट करेंगे? पहले जब

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अध्याय १ ९ ] यादवों और निशाचरोंका घोर युद्ध ४६७ यादवराजने ‘ विश्वजित् यज्ञ ' किया था, तब मैं राक्षसोंको लानेके लिये लङ्का चला गया था । उन्हें लेकर जब मैं अपनी पुरीमें लौटा तो नारदजीके मुखसे सुना कि वह यज्ञ पूरा हो गया । अब तुमलोगोंने पुनः अश्वमेध यज्ञ करनेका प्रयास व्यर्थ ही किया है । तुमलोगोंमें कौन ऐसे वीर हैं, जो मेरे पकड़े हुए घोड़ेको छुड़ा सकें! अतः घोड़ेकी आशा छोड़कर तुमलोग जाओ, चले जाओ । नहीं तो मेरे चार लाख अनुयायी राक्षस तुम सबको खा जायँगे । इस स्थानसे बारह योजन दूर समुद्रमें मेरी बनायी हुई पुरी है, जिसका नाम ' उपलङ्का ' है । जैसे भोगवतीपुरी सर्पोंसे भरी रहती है, उसी प्रकार उपलङ्का निशाचरगणोंसे परिपूर्ण है ॥ १०- १६ ॥ राजन्! ऐसा कहकर घोड़ा लिये आकाशमार्गसे वह सहसा अपनी पुरीको चला गया और समस्त यादव शोक करने लगे । तब अनिरुद्ध कहने लगे-' भोजराजके इस अश्वको जिसे निशाचर ले गया है, हम कैसे छुड़ायेंगे ' ॥ १७-१८ ॥ उनका यह वचन सुनकर नीतिकुशल साम्ब आदि उनसे बोले- राजन्! चिन्ता छोड़ो । हमारे रहते तुम्हें क्या भय है? तुम्हारी हैं और बाण हैं । दोनों सम्पन्न महान् वीर घोड़ोंसे यात्रा करेंगे जायँगे; या भगवान् शत्रुओंकी नगरीपर सुनकर धनुर्धारियोंमें सेनामें पंखदार घोड़े हैं, विमान लोकोंपर विजय पानेवाले शौर्य-विद्यमान हैं । राजन्! हमलोग अथवा बाणोंसे पुल बाँधकर विष्णुके दिये हुए विमानसे आक्रमण करेंगे । सबकी बात श्रेष्ठ अनिरुद्धने मन्त्रिप्रवर उद्धवको बुलाकर इस प्रकार पूछा ॥ १ ९ –२२ ॥ अनिरुद्ध बोले – मन्त्रिवर! श्यामकर्ण हमारे हाथसे चला गया । अब हम क्या करें? भगवान्ने आपके आदेशानुसार ही कार्य करनेकी आज्ञा दी थी; अतः आप कोई उपाय बताइये । मेरे सब चाचा लोग जो उपाय बता रहे हैं, वह आपने भी सुना है । यदि आपकी भी आज्ञा हो जाय तो मैं वह सब करूँ॥२३-२४ ॥ अनिरुद्धकी यह बात सुनकर उद्धवजी लज्जित होकर बोले- भैया! मैं तो श्रीकृष्णका और विशेषतः उनके पुत्रों तथा पौत्रोंका भी सदा दास हूँ । निरन्तर आज्ञामें रहनेवाला सेवक हूँ । मैं क्या बताऊँगा । जो तुम्हारी और इन सबकी इच्छा हो, वह करो । निश्चय ही वह सफल होगी ॥ २५-२६ ॥ तब अनिरुद्धने कहा - यादवो! मैं भगवान् विष्णुके दिये हुए विमानद्वारा दस अक्षौहिणी सेनाके साथ दैत्यनगरी ( उपलङ्का ) में जाऊँगा । सारण, कृतवर्मा तथा सत्यकपुत्र युयुधान- ये लोग अक्रूरके साथ यहीं रहकर शेष सेनाकी रक्षा करें ॥ २७-२८ ॥ ऐसा कहकर अनिरुद्ध श्रीहरिके अठारह पुत्रों, उद्धव, गद और विशाल सेनाके साथ भगवान् विष्णुके दिये हुए विमानपर आरूढ़ हुए । श्रीकृष्णके पौत्र तथा यादव - वीरोंसे युक्त वह सूर्य - बिम्बके समान तेजस्वी विमान अपनी शक्तिसे चालित होकर उसी प्रकार शोभा पाने लगा, जैसे पूर्वकालमें कुबेरका विमान पुष्पक श्रीराम और कपिराजोंसे युक्त होकर सुशोभित होता था ॥ २ ९ -३० ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहिताके अन्तर्गत अश्वमेधखण्डमें ' विमानपर आरोहण ' नामक अठारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १८ ॥

उन्नीसवाँ अध्याय यादवों और निशाचरोंका घोर युद्ध; अनिरुद्ध और भीषणकी मूर्च्छा तथा चेतना एवं रणभूमिमें बकका आगमन श्रीगर्गजी कहते हैं - राजन्! तदनन्तर विषाक्त बाणोंद्वारा उस नगरीका और वहाँके वन-रुक्मवतीकुमार अनिरुद्ध कुबेरके समान विमानद्वारा उपवनोंका विध्वंस आरम्भ कर दिया । वहाँके क्रीडा-विशाल सेनाके साथ उपलङ्कामें गये । नरेश्वर! वहाँ स्थानों, द्वारों, भवनों, अट्टालिकाओं, छज्जों तथा जाकर यादवोंसहित अनिरुद्धने विषधर सर्पके समान गोपुरोंपर उस विमानके अग्रभागसे अस्त्र - शस्त्रोंकी वर्षा

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४६८ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ अश्वमेधखण्ड होने लगी । मुसल, शक्ति, परिघ, बाण और शिलाएँ भी निरन्तर पड़ने लगीं । राजन्! वहाँ प्रचण्ड वायु चलने लगी और सम्पूर्ण दिशाएँ धूलसे आच्छादित हो गयीं । इस प्रकार यादवद्वारा की गयी अस्त्र- वर्षासे अत्यन्त पीड़ित हुई भीषणकी वह नगरी कहीं भी कल्याण ( परित्राण ) नहीं पा रही थी । उसकी वही दशा हो गयी थी, जैसे पूर्वकालमें शाल्वदेशीय योद्धाओंके आक्रमणसे द्वारकापुरीकी हुई थी॥१-५ ॥ नृपश्रेष्ठ! उस समय उस नगरीमें हाहाकार मच गया । भीषण आदि असुर भयसे विह्वल हो गये । सारी नगरीको पीड़ित देख राक्षसराज भीषण ' डरो मत ' – इस प्रकार अभयदान दे राक्षसोंके साथ बाहर निकला । फिर तो उसकी पुरीमें निशाचरोंके साथ यादवोंका घोर युद्ध होने लगा । ठीक उसी तरह, जैसे पहले लंकामें वानरों और राक्षसोंमें युद्ध हुआ था । वृष्णिवंशी योद्धाओंके बाणसमूहोंसे कंधे कट जानेके कारण राक्षस आँधीके उखाड़े हुए वृक्षोंकी भाँति समुद्रमें गिरने लगे । कुछ निशाचर औंधे मुँह उस पुरीमें ही धराशायी हो गये । राजन्! कोई उतान होकर गिरे और कोई तत्काल पञ्चत्वको प्राप्त हो गये । वहाँ उन राक्षसोंके रक्तसे एक भयंकर दूषित नदी प्रकट हो गयी, जो महावैतरणीकी भाँति दुष्पार थी । वहाँ यादवोंका बल देखकर भीषणको बड़ा विस्मय हुआ । उसने टेढ़ी आँखोंसे यादवोंकी ओर देखकर कहा-' तुमलोगोंने निर्बलोंकी भाँति आकाशमें खड़े होकर युद्ध किया है । तुमलोग जो व्यर्थ वीरताका अभिमान करते हो, वह प्रशंसाके योग्य नहीं है । तुमलोगोंके शरीरोंमें यदि शक्ति हो तो सुनो- पृथ्वीपर उतर आओ और मेरे साथ युद्ध करो । ' उसकी यह बात सुनकर करुणामय प्रद्युम्नकुमार भूतलपर विमान उतारकर उस महान् असुरसे बोले ॥ ६ – १५ ॥ अनिरुद्धने कहा- महान् असुर! बहुत विचार करनेसे क्या होगा? तुम महासमरमें भय छोड़कर शीघ्र मेरे साथ युद्ध करो ॥ १६ ॥

उनकी यह बात सुनकर भयंकर पराक्रमी भीषणने अपने धनुषसे पाँच नाराच बाण अनिरुद्धके ऊपर चलाये । अनिरुद्धने उन्हें देखकर अपने बाणोंद्वारा उन नाराचोंके दो - दो टुकड़े कर दिये और खेल - खेलमें ही एक बाणसे उसके धनुषको काट दिया । भीषणने भी दूसरा धनुष लेकर उसपर प्रत्यञ्चा चढ़ायी और सर्पाकार सौ बाणोंद्वारा प्रद्युम्न कुमारको घायल कर दिया । उनका रथ खण्डित हो गया, सारथि मारा गया, सब घोड़े भी कालके गालमें चले गये और अनिरुद्ध मूच्छित हो गये । उस समय अपने सेनानायकको घिरा हुआ देख समस्त वृष्णिवंशी यादवोंके अधर - पल्लव रोषसे फड़क उठे और वे बाणोंकी वर्षा करते हुए वहाँ आ पहुँचे । उन बहुसंख्यक वीरोंको आया देख उस असुरने रोषपूर्वक धनुषको रखकर गदासे ही उन सबको मार गिराया, जैसे सिंह अपनी दाढ़ोंसे ही मृगोंको कुचल देता है । गदाकी मारसे पीड़ित हो यादव - सैनिक भूतलपर गिर पड़े । उनके सारे अङ्ग छिन्न - भिन्न हो गये थे । कितने ही योद्धा रणक्षेत्रमें धराशायी हो गये॥१७–२३ ॥ तब बलरामजीके छोटे भाई गदने अपनी गदा लेकर समरभूमिमें राक्षस भीषणके मस्तकपर प्रहार किया । राजन्! गदाके उस प्रहारसे व्यथित हो वज्रके मारे हुए पर्वतकी भाँति वह असुर वसुधाको कम्पित करता हुआ पृथ्वीपर गिर पड़ा । भीषणका सिर फट गया था । उसे मूच्छित होकर पड़ा देख वे असुर शस्त्र धारण किये गदको मारनेके लिये आ पहुँचे । परंतु नरेश्वर! नृसिंहने जैसे अपनी दाढ़ से हाथियोंको मार गिराया था, उसी प्रकार बलरामके छोटे भाई गदने अपनी वज्र- सरीखी गदासे उन सब असुरोंको धराशायी कर दिया ॥ २४-२७ ॥ इसके बाद अनिरुद्ध होशमें आकर खड़े हो गये और क्षणभरमें धनुष लेकर बोल उठे -'मेरा शत्रु दुष्ट भीषण कहाँ गया, कहाँ गया? ' श्रीहरिके पौत्रको खड़ा हुआ देख यादवपुंगव जय - जयकार करने लगे और समस्त देवताओंको भी बड़ा हर्ष हुआ ॥ २८-२९ ॥ तदनन्तर नारदजीसे सूचना पाकर भीषणका पिता निशाचर ' बक ' जंगलसे कुपित होकर वहाँ आया । महाराज! वह कज्जलगिरिके समान काला और ताड़के बराबर ऊँचा था । उसकी जीभ लपलपा रही थी, नेत्र भयंकर हो गये थे तथा वह त्रिशूल और गदा

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अध्याय २० ] बक और भीषणकी पराजय ४६ ९ लिये हुए था । एक हाथीको बायें हाथसे पकड़कर मुँह से चबाता हुआ वह राक्षस रक्तसे नहा गया था और बड़े भारी पिशाचके समान दिखायी देता था । उसके दोनों पैर ताड़के बराबर बड़े थे । वह उनकी कसे भूतलको कम्पित कर रहा था । देवताओंके हृदयमें भय उत्पन्न करनेवाला वह निशाचर जनताके लिये काल - सा दिखायी देता था । उसको आते देख वहाँ सब यादव आतङ्कित हो गये और श्रीकृष्णचन्द्रके चरणारविन्दोंका स्मरण करते हुए वे सब आपसमें इस प्रकार कहने लगे ॥ ३० – ३४ ॥ यादव बोले- मित्रो! बताओ, यह कौन हमारे निकट आ पहुँचा है? इसका रूप बड़ा ही बीभत्स है और यह कालके समान निर्भय प्रतीत होता है ॥ ३५ ॥

इस प्रकार जब सब लोग बोलने लगे तो वहाँ महान् कोलाहल छा गया । बकको देखकर वे सब निशाचर प्रसन्न हो गये । राजन्! भीषणको मूच्छित देख राक्षसराज बक संग्राममें बारंबार ' हा दैव! हा दैव! ' कहता हुआ शोकमग्न हो गया ॥ ३६-३७ ॥ नरेश्वर! तत्पश्चात् दो घड़ीमें मूर्च्छा त्यागकर भीषण उठा और कहने लगा- ' मेरे भयसे गद कहाँ भाग गया? " अपने पुत्रको उठा देख उस नरभक्षी राक्षसको बड़ा हर्ष हुआ । वह बोलनेमें बहुत कुशल था । उसने बेटेको हृदयसे लगाकर उत्तम वचनोंद्वारा उसे आश्वासन दिया । महाराज! पिताको सहायताके लिये आया देख भीषणने प्रसन्नचित्त होकर उन्हें प्रणाम किया ॥ ३८ - ४० ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहिताके अन्तर्गत अश्वमेधखण्डमें ' बकका आगमन ' नामक उन्नीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १ ९ ॥ बीसवाँ अध्याय बक और भीषणकी पराजय तथा यादवोंका घोड़ा लेकर आकाशमार्गसे लौटना श्रीगर्गजी कहते हैं— राजन्! तदनन्तर असुरोंके बीचमें खड़े होकर राक्षस बकने भीषणसे युद्धका अभिप्राय ( कारण ) पूछा- ' बेटा! इन तिनकोंके समान यादवोंके साथ किसलिये युद्ध हुआ था, जिससे तुम मूच्छित हो गये और बहुत - से राक्षस मारे गये? यह तो बड़े आश्चर्यकी बात है ' ॥१-२ ॥ राजन्! बकके इस प्रकार पूछनेपर भीषणने मुँह नीचे करके अश्वमेधके घोड़ेको पकड़ लानेके सम्बन्धमें सारी बात बतायी । पुत्रकी बात सुनकर बकने अपनी गदा ले ली और यादव - सेनामें उसी प्रकार प्रवेश किया, जैसे जंगलमें दावानल प्रकट हो जाता है । जैसे सिंह सोये हुए मृगोंको रौंद डालता है, उसी प्रकार सामने आये हुए यादवोंको बकने दोनों पैरोंसे, हाथसे, भुजाओंसे और गदाके आघातसे कुचल डाला । वह घोड़ोंको पकड़कर आकाशमें फेंक देता था, हाथियों तथा रथकी भी यही दशा करता था । बलवान् बक युद्धमें मनुष्योंको अपना भक्ष्य बनाता हुआ जोर - जोरसे गर्जना करने लगा । यदुकुलतिलक वज्रनाभ! उस राक्षसकी गर्जनासे लोकोंसहित सम्पूर्ण विश्व गूँज उठा । भूमण्डलकी जनमण्डली बहरी हो गयी । उसके इस विपरीत युद्धसे समस्त यादव हाहाकार करने लगे और मनमें अत्यन्त खिन्न हो गये । उस दुरात्मा राक्षससे अपनी सेनाको अत्यन्त पीड़ित होती देख प्रचण्ड पराक्रमी जाम्बवतीनन्दन साम्बने पाँच नाराच ले अपने धनुषपर रखकर तत्काल ही बकको लक्ष्य करके छोड़े । मानद नरेश! वे बाण उसके शरीरको विदीर्ण करते हुए तत्काल भूतलमें घुस गये और भोगवती गङ्गाका जल पीने लगे ॥३–११ ॥ राजन्! उन बाणोंके आघातसे बक पृथ्वीको कम्पित करता हुआ गिर पड़ा, किंतु पुनः उठकर मेघगर्जनाके समान सिंहनाद करने लगा । तब पुनः जाम्बवतीकुमारने उसे पाँच बाण मारे । उन बाणोंके आघातसे चक्कर काटता हुआ बक लङ्कामें जा गिरा । नरेश्वर! वहाँसे आकर उस राक्षसने अनिके समान प्रज्वलित तीन शिखाओंवाले त्रिशूलको लेकर साम्बपर दे मारा, जैसे किसीने फूलसे हाथीपर आघात किया

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४७० गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ अश्वमेधखण्ड हो । त्रिशूलको आते देख साम्बने शीघ्र बाण मारकर अनायास ही युद्धस्थलमें उसके टुकड़े - टुकड़े कर डाले, जैसे गरुडने किसी नागको छिन्न - भिन्न कर डाला हो । महाराज! तब रणदुर्मद बकने भारी गदा लेकर साम्बके घोड़ों और सारथिको मार डाला । फिर रथ और पताकाको भी चूर - चूर करके वह साम्बसे बोला-' तुम दूसरे रथपर बैठकर मेरे साथ युद्ध करो । इस समय तुम रथहीन हो, इसलिये रणभूमिमें मैं अधर्म या अन्यायसे तुम्हें नहीं मारूँगा ' ॥ १२–१७३ ॥ उस दैत्यके ऐसा कहनेपर हँसते हुए साम्बने किंचित् कुपित होकर बककी कपाट - जैसी छातीपर शीघ्र ही गदासे आघात किया । युद्धस्थलमें उस गदासे आहत हुआ बक मन - ही - मन कुछ व्याकुल हो उठा । फिर वह साम्बकी कोई परवा न करके यादव सेनामें जा घुसा । वहाँ पहुँचकर उस निशाचरने गदाके आघातसे बहुतसे हाथियों, घोड़ों, रथों और मनुष्योंको उसी तरह मार गिराया, जैसे मृगराज सिंह मृगोंके समुदायको धराशायी कर देता है । नृपेश्वर! उस समय यादव - सेनामें हाहाकार मच गया । राजन्! यह देख रुक्मवतीनन्दन अनिरुद्ध रोषपूर्वक एक अक्षौहिणी सेनाके साथ वहाँ आये और सबको अभय देते हुए बोले ॥ १८-२२ ॥ अनिरुद्धने कहा – रे मूढ़! तू वीरपुरुषका सामना छोड़कर क्या युद्ध करेगा? निशाचर! भयभीतोंको मारनेसे तेरी प्रशंसा नहीं होगी । यदि तेरे शरीरमें शक्ति है तो मेरी बात सुन । मेरे सामने आकर यत्नपूर्वक युद्ध कर ॥२३-२४ ॥ राजन्! इस प्रकार अनिरुद्धकी बात सुनकर बकासुर रोषसे सर्पकी भाँति फुफकारता हुआ उनके सामने शीघ्र युद्धके लिये आया । युद्धस्थलमें उसे आया देख धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ अनिरुद्धने रोषपूर्वक उसे दस नाराच मारे । वे बाण शीघ्र ही उसके शरीरको छेदकर बाहर निकले और फिर भीषणको भी विदीर्ण करते हुए भूतलमें समा गये । तब भीषणसहित बक मूच्छित हो वज्रसे आहत हुए पर्वतके समान पृथ्वी-पर गिर पड़ा । उस समय यादव - सेनामें जय - जयकार होने लगा । दुन्दुभियाँ बज उठीं, नगाड़े पीटे जाने लगे और शङ्खों तथा गोमुखोंकी ध्वनि होने लगी । अपने दोनों स्वामियोंको गिरा हुआ देख समस्त राक्षसोंका हृदय क्रोधसे भर गया । वे यादवोंको मारनेके लिये एक साथ ही उनपर टूट पड़े । फिर तो समराङ्गणमें दोनों सेनाओंके बीच घोर युद्ध होने लगा । बाण, खड्ग, गदा, शक्ति और भिन्दिपालोंद्वारा परस्पर आघात - प्रत्याघात होने लगे । राजन्! राक्षसोंके तीव्र बलको देखकर श्रीहरिके साम्ब आदि अठारह पुत्र तीखे बाणोंद्वारा उनपर प्रहार करने लगे । वहाँ उन सबके बाणसमूहोंसे घायल हो बहुत - से राक्षस युद्धस्थलमें सदाके लिये सो गये । कुछ तो मौतके मुखमें पड़ गये और कुछ जीवित रहनेकी इच्छासे मैदान छोड़कर भाग गये ॥ २५–३३ ॥ राजन्! तदनन्तर दो घड़ीके बाद उठकर भयंकर असुर बक तत्काल ही अपने शत्रु अनिरुद्धके सम्मुख गया । वहाँ जाकर बकने अपने हाथमें एक भारी गदा लेकर उसे अनिरुद्धके सिरपर फेंका और कहा-' लो अब तुम मारे गये । ' महाराज! उस गदाको अपने ऊपर आती देख अनिरुद्धने यमदण्डसे उसे उसी तरह चूर - चूर कर दिया, जैसे कटुवचनसे मित्रता नष्ट कर दी जाती है । तब क्रोधसे भरा हुआ बक अपना मुखमण्डल फैलाकर अनिरुद्धको खा जानेके लिये उनकी ओर दौड़ा, मानो राहुने कहीं चन्द्रमापर ग्रहण लगानेके लिये आक्रमण किया हो । उसे निकट आया देख धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ अनिरुद्धने फिर यमदण्ड उठाकर उससे उसके ऊपर आघात किया । राजन्! उस आघातसे बकका मस्तक फट गया और वह मुखसे रक्त वमन करता तथा पृथ्वीको कँपाता हुआ मूर्च्छित होकर गिर पड़ा॥३४–३९ ॥ वज्रनाभ! पिताको मूच्छित हुए देख भीषण रणक्षेत्रमें परिघ लेकर यादवोंका संहार आरम्भ किया । तब बलवान् अनिरुद्धने रोषपूर्वक नागपाशसे भीषणको बाँधकर उसी प्रकार खींचा, जैसे गरुड सर्पको खींचते हैं । वरुणके पाशसे बँधकर उसने हतोत्साह होकर अपना मुँह नीचे कर लिया । उसे पराजित और बलहीन देख साम्ब बोले-" असुरेन्द्र! तुम्हारा भला हो । तुम अपनी पुरीमें जाकर शीघ्र विधिपूर्वक अनिरुद्धके यज्ञ - सम्बन्धी घोड़ेको

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अध्याय २१ ] भद्रावतीपुरी तथा राजा यौवनाश्वपर अनिरुद्धकी विजय ४७१ लौटा दो । अनिरुद्ध महात्मा श्रीकृष्ण हरिके पौत्र हैं । ये घोड़ेकी रक्षाके बहाने मनुष्योंको अपने स्वरूपका दर्शन करानेके लिये विचर रहे हैं । देवता, दैत्य और मनुष्य सभी आकर इनके चरणोंमें मस्तक झुकाते हैं । ये मनुष्योंके समस्त पापोंका नाश करनेवाले हैं । तुम इन्हें श्रीकृष्णके समान ही समझो । राक्षस! ' तुम युद्धमें श्रीकृष्णसे पराजित हुए हो ' - ऐसा समझकर दुःख और चिन्ता त्याग दो और हमलोगोंके साथ श्रीकृष्णका दर्शन करनेके लिये चलो ' ॥ ४०-४६ ॥ श्रीगर्गजी कहते हैं— राजन्! साम्बके इस प्रकार समझाने और वरुणपाशसे मुक्त कर दिये जानेपर भीषणने पुरीमें जाकर वहाँसे द्रव्यराशिके साथ घोड़ा लाकर अनिरुद्धको लौटा दिया । तब अनिरुद्धने उससे भी अश्वकी रक्षाके लिये चलनेका अनुरोध किया । नरेश्वर! उनके इस प्रकार अनुरोध करनेपर भीषणने कुछ सोच - विचारकर उत्तर दिया ॥ ४७-४८ ॥ भीषणने कहा – ' मेरे असुरपालक पिता जब सचेत हो जायँगे, तब मैं उनकी आज्ञा लेकर आऊँगा, इसमें संशय नहीं है । ' भीषणके ऐसा कहनेपर प्रद्युम्नपुत्र अनिरुद्धने यादवसेनाके साथ यज्ञके घोड़ेको विमान-पर चढ़ा लिया और स्वयं भी उसपर आरूढ़ हो, वे आकाशमार्गसे चल दिये ॥ ४ ९ -५० ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहिताके अन्तर्गत अश्वमेधखण्डमें ' उपलङ्कापर विजय ' नामक बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥२० ॥

इक्कीसवाँ अध्याय भद्रावतीपुरी तथा राजा यौवनाश्वपर अनिरुद्धकी विजय श्रीगर्गजी कहते हैं - तदनन्तर विमानपर बैठे हुए ऊषावल्लभ अनिरुद्ध अपनी विजय- दुन्दुभि बजवाते हुए आकाशमार्गसे शीघ्र ही अपनी सेनाके पास आ गये । उन सबको आया देख अक्रूर आदि यादवोंने मिलकर सारा कुशलसमाचार पूछा और उन लोगोंने सब कुछ बता दिया ॥ १-२ ॥ तत्पश्चात् मूर्च्छा त्यागकर बक सहसा उठ खड़ा हुआ । वहाँ यादवोंको न देखकर उसने पुत्रसे रोषपूर्वक उनके चले जानेका कारण पूछा । तब भीषणने पितासे समस्त वृत्तान्त कह सुनाया । उसकी बात सुनकर रोषसे बकके ओठ फड़कने लगे और वह कुपित होकर बोला- ' मैं जानता हूँ, जैसे सिंहके डरसे हरिण भागते हैं, उसी प्रकार यादव मेरे भयसे विमानद्वारा भागकर कुशस्थलीको चले गये हैं । इसलिये मैं पृथ्वीको यादवोंसे सूनी कर दूँगा, इसमें संशय नहीं है । अब मैं कृष्णकी द्वारकामें जाकर समस्त यादवोंका संहार करूँगा ' ॥३–६ ॥ भीषणने कहा – महाराज! क्रोधको रोकिये, यह समय हमारे अनुकूल नहीं है । जब दैव प्रसन्न होगा, तब हम यादवोंको जीतेंगे ॥ ७ ॥

श्रीगर्गजी कहते हैं- राजन्! पुत्रके इस प्रकार समझानेपर बकासुर चुप हो गया और वन - जन्तुओंको खाता हुआ वनमें विचरने लगा ॥८ ॥

नृपेन्द्र! तदनन्तर अश्वका विधिपूर्वक अभिषेक करके श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको दान दे, विजयी प्रद्युम्नपुत्र अनिरुद्धने पुनः विजययात्राके लिये उसको छोड़ा । प्रद्युम्न कुमारके छोड़नेपर वह अश्व धैवत स्वरसे हिनहिनाता और बहुतसे वीरयुक्त देशोंका दर्शन करता हुआ भद्रावतीपुरीमें जा पहुँचा॥९ -१० ॥ राजेन्द्र! भद्रावतीपुरी अनेक उपवनोंसे सुशोभित थी । पर्वत, दुर्गसे घिरी हुई थी तथा रजतमय मन्दिर उसकी शोभा बढ़ाते थे । बड़े - बड़े वीर पुरुष उसमें निवास करते थे । राजा यौवनाश्व उस पुरीके रक्षक थे । लोहेके बने हुए कपाटोंसे वह पुरी अत्यन्त दृढ़ थी । उसमें जाकर वह अश्व राजाके सम्मुख खड़ा हो गया । राजाने उसे पकड़ा और सब बात जानकर वे क्रोधपूर्वक युद्ध करनेके लिये सेनासहित पुरीसे बाहर निकले । महाबली यौवनाश्वको सेनासहित सामने आया देख प्रद्युम्न कुमार अनिरुद्धने श्रीकृष्णभक्त मन्त्री उद्धवको बुलाकर पूछा ॥ ११–१४ ॥

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४७२ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ अश्वमेधखण्ड अनिरुद्धने कहा – मन्त्रीजी! यह सेनाके साथ कौन हमारे सम्मुख आया है? इसने अश्वका अपहरण किया है और यह हमारे शत्रुओंमें मुख्य है; अतः इसके विषयमें आप सारी बातें बताइये ॥ १५ ॥

उद्धव बोले - सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ अनिरुद्ध! इस राजाका नाम ' यौवनाश्व ' है । यह मरुधन्व देशके स्वामीका पुत्र है और अपने पिताके दिवंगत होनेपर यहाँ राज्य करता है । महाराज! अभी यह सोलह वर्षकी अवस्थाका है । अपने दुष्ट मन्त्रीके कहनेसे यह युद्ध अवश्य करेगा; परंतु आप इसका वध कदापि न करें ॥ १६-१७ ॥ यह सुनकर ' बहुत अच्छा ' कहकर अनिरुद्ध युद्ध -स्थलमें यौवनाश्वके साथ उसी प्रकार युद्ध करने लगे, जैसे सिंह हाथीसे लड़ रहा हो । ऊषापति अनिरुद्धने यौवनाश्वकी तीन अक्षौहिणी सेनाका संहार करके उसे रथहीन कर दिया और राजकुमारसे यह उत्तम बात कही ॥ १८-१९ ॥ अनिरुद्ध बोले- राजन्! मुझे अन्यथा मेरे साथ युद्ध करो ॥१ ९ उनकी यह बात सुनकर और पौत्र जान राजाको बड़ा भय हुआ । विधिपूर्वक यज्ञका घोड़ा समर्पित उनसे निमन्त्रित हो उस राजाने कहा ॥ २०-२१ ॥ यौवनाश्व बोला- - नृपेश्वर! घोड़ा लौटा दो, ॥ उन्हें श्रीकृष्णका उसने अनिरुद्धको कर दिया और हाथ जोड़कर जब द्वारकामें यज्ञ होगा, उस समय मैं भगवान् श्रीकृष्ण-चन्द्रके चरणारविन्दोंका दर्शन करनेके लिये आऊँगा ॥ २२ ॥

तदनन्तर अनिरुद्धने उसे उसके राज्यपर प्रतिष्ठित कर दिया । यौवनाश्वने उनके चरणोंमें प्रणाम किया और विजयी अनिरुद्धने उस श्रेष्ठ घोड़ेको पुनः विजयके लिये छोड़ा ॥२३ ॥

इस प्रकार श्रीगर्गसंहिताके अन्तर्गत अश्वमेधखण्डमें ' भद्रावतीपर विजय ' नामक इक्कीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २१ ॥

बाईसवाँ यज्ञके घोड़ेका अवन्तीपुरीमें जाना सेनासहित यादवोंका श्रीगर्गजी कहते हैं— महाराज! यदुकुलतिलक वीरवर अनिरुद्धका वह घोड़ा अनेक जनपदोंका अवलोकन करता हुआ ' राजपुर ' जनपदमें जा पहुँचा । मार्ग में सफरा ( शिप्रा ) नदीका दर्शन करके वह अवन्तिका ( उज्जयिनी ) के उपवनमें जा खड़ा हुआ । उसी समय श्रीकृष्णके गुरु महात्मा विप्रवर सान्दीपनि स्नान करनेके लिये घरसे चलकर वहाँ आये । उन्होंने तुलसीकी माला पहन रखी थी । कंधेपर धौत वस्त्र रख छोड़ा था और मुखसे वे श्रीकृष्ण नामका जप कर रहे थे । उन्होंने वहाँ पानी पीते हुए श्वेत एवं श्यामकर्ण घोड़ेको, जिसके भालदेशमें पत्र बँधा हुआ था, देखा । देखकर पूछा- ' किस नृपेश्वरने इस यज्ञके घोड़ेको छोड़ा है? ' ॥१-३ ॥ नरेश्वर! वहाँ राजकुमार बिन्दुको स्नान करते देख अध्याय और वहाँ अवन्तीनरेशकी ओरसे पूर्ण सत्कार होना उन्हें घोड़ेके विषयमें जानकारी प्राप्त करनेके लिये जाकर प्रेरित किया । महाराज! तब राजाधिदेवीके वीरपुत्र बिन्दुने अन्य बहुत - से वीरोंके साथ जाकर सहसा उस घोड़ेको पकड़ा और उसका भलीभाँति निरीक्षण करके लौटकर गुरु सान्दीपनिको प्रणाम कर उसके विषयमें बताया । तत्पश्चात् गुरुके आदेशसे प्रसन्न हो राजकुमार घोड़ा लेकर आये और हर्षपूर्वक गुरुजीको दिखलाने लगे । सान्दीपनिने भालपत्र पढ़कर प्रसन्नतापूर्वक राजाको बताया॥४–६ ॥ सान्दीपनि बोले- राजन्! इसे राजा उग्रसेनका घोड़ा समझो । प्रद्युम्रकुमार अनिरुद्ध इसकी रक्षामें आये हैं । यह अश्व अपने इच्छानुसार घूमता हुआ यहाँ-तक आ गया है । अब अनिरुद्ध भी यहाँ आयेंगे । उनके साथ और भी बहुत - से युद्धशाली यादव - वीर

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अध्याय २२ ] यज्ञके घोड़ेका पधारेंगे । घोड़ेका निरीक्षण करते हुए तुम्हारी बहिन मित्रबिन्दाके पुत्र भी आयेंगे । तुम्हें यहाँ श्रीकृष्ण-चन्द्रके सभी पुत्रोंका आदर - सत्कार करना चाहिये । मेरे कहने से तुम युद्धका विचार छोड़कर घोड़ा उन्हें लौटा देना ॥ ७ - ९ ॥ गुरुका यह कथन सुनकर धनुर्धर शूरवीर राजकुमार वहाँ चुप रह गया । उसका मन घोड़ेको पकड़ ले जानेका था । उसी समय यादव - सेनाका कोलाहल सुनायी पड़ा, जो समस्त लोकोंके मानका मर्दन करनेवाला था । दुन्दुभियोंका महानाद, धनुषोंकी टंकार, हाथियोंका चीत्कार, घोड़ोंकी हिनहिनाहट, रथोंका झणत्कार, वीरोंकी गर्जना तथा शतनियोंका महानाद - इन सबका तुमुल शब्द समस्त लोकोंके लिये भयदायक था । उसे सुनकर राजकुमार बिन्दुको बड़ा विस्मय हुआ । इतनेमें ही रथियों, हाथियों और घोड़ोंके साथ भोज, वृष्णि, अन्धक, मधु, शूरसेन तथा दशार्हवंशके समस्त यादव वहाँ आ पहुँचे । वे सेनाकी धूलिसे आकाशको व्याप्त तथा पैरोंकी धमकसे पृथ्वीको कम्पित करते हुए आये और सब - के - सब पूछने लगे – ' यज्ञका घोड़ा कौन ले गया, कहाँ गया? ' ॥१०–१५ ॥ उस समय समस्त अन्वेषकोंने पुष्पवाले वृक्षोंसे व्याप्त अत्यन्त अद्भुत उपवनमें चामर बँधे हुए घोड़ेको देखा, जिसे राजकुमार बिन्दुने अनायास ही पकड़ लिया था । देखकर सबने अनिरुद्धके निकट जाकर इसकी सूचना दी । सूचना पाकर धर्मज्ञ अनिरुद्ध विस्मित हुए । उन्होंने हँसते हुए बिन्दुके पास उद्धवजीको भेजा । महाराज! उस समय अवन्तीपुरीमें महान् कोलाहल छा गया । वहाँ एकत्र हुई भयंकर सेनाको देखकर सब लोग भयभीत हो उठे थे । इसी समय अपने भाईकी खोज - खबर लेनेके लिये भयभीत अनुबिन्दु एक करोड़ वीरोंके साथ अपनी पुरीसे बाहर निकला । वह दुग्धराशिके समान धवल एवं भालपत्रसे युक्त यज्ञ - सम्बन्धी अश्वको वहाँ अपने भाईके द्वारा पकड़ा गया देख उसे मना करता हुआ बोला ॥ १६- २१ ॥ अनुबिन्दुने कहा- भैया! भगवान् श्रीकृष्ण अवन्तीपुरमें जाना ४७३ जिनके देवता हैं, उन यादवोंका यह घोड़ा है । आप उनके साथ जो हमारा सम्बन्ध है, उसके बहाने या अपने कुलकी कुशलताके लिये इस घोड़ेको छोड़ दीजिये । यादवोंकी यह सेना तो देखिये । भैया! पहले जो राजसूय यज्ञ हुआ था, उसमें इन यादवोंने देवता, दैत्य, मनुष्य और असुर - सबपर विजय पायी थी ॥ २२-२३ ॥ अनुबिन्दुकी यह बात सुनकर बड़ा भाई बिन्दु हार मान गया । उसने घोड़ेपर चढ़कर आये हुए उद्धवजीसे कहा ॥ २४ ॥

बिन्दु बोला - मन्त्रिवर! मैंने मित्रोंके साथ मिलनके लिये घोड़ेको पकड़ रखा है । अतः आप सब लोगोंको निमन्त्रित किया जाता है । आज आपलोग यहीं ठहरें ॥ २५ ॥

राजन्! यह सुनकर उद्धव बिन्दुकी सराहना करके बड़े प्रसन्न हुए और अनिरुद्धके निकट जाकर उन्होंने सब समाचार बताया । नरेश्वर! उद्धवजीका कथन सुनकर अनिरुद्धका मन प्रसन्न हो गया । उन्होंने सेनासहित अवन्तीपुरीमें शिप्रा नदीके तटपर पड़ाव डाल दिया । महाराज! वहाँ दस योजन दूरतकके भूभागमें रंग - बिरंगे अनेक शिविर पड़ गये । सभी सुवर्णकलशोंसे युक्त थे । वे सुन्दर शिविर वहाँ अद्भुत शोभा पा रहे थे । राजकुमार बिन्दुने वहाँ आये हुए सब लोगोंका भक्ष्य, भोज्य, लेह्य और चोष्य – इन चारों प्रकारके भोजनोंद्वारा आतिथ्य सत्कार किया । इसी तरह अवन्ती नरेशने सेनावर्ती पशुओंको भी घास-पात और अन्न आदि प्रदान किये । उन्होंने वृष्णिवंशी वीरोंका इस प्रकार स्वागत - सत्कार किया । राजाधि-देवी, उनके पति तथा दोनों राजकुमार - सब - के - सब श्रीहरिके समस्त पुत्रोंको देखकर बड़े प्रसन्न हुए ॥ २६-३१ ॥ तदनन्तर रातमें प्रद्युत्रपुत्र अनिरुद्धने अपने बाबाके गुरु सान्दीपनि मुनिको बुलाकर उनके चरणोंमें प्रणाम किया । उन्हें आसन देकर बैठाया और उत्तम रीतिसे उनका पूजन करके कहा - ' भगवन्! द्वारका भगवान् श्रीकृष्णकी आज्ञासे चक्रवर्ती यदुकुलतिलक महाराज उग्रसेन अश्वमेध यज्ञ कर रहे हैं । ब्रह्मन्!

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४७४ गोलोकधामाधिपतिं परेशं परात्परं त्वां शरणं व्रजाम्यहम् [ अश्वमेधखण्ड मुनिश्रेष्ठ! आप मुझपर कृपा करके उस श्रेष्ठ यज्ञमें वचन सुनकर श्रीकृष्ण दर्शनके अभिलाषी सान्दीपनि अपने पुत्रसहित अवश्य पधारें । ' अनिरुद्धका यह मुनिने वहाँ चलनेका निश्चय किया ॥ ३२-३५ ॥ इस प्रकार श्रीगर्गसंहिताके अन्तर्गत अश्वमेधखण्डमें ' अवन्तिकागमन ' नामक बाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २२ ॥

तेईसवाँ अध्याय अनिरुद्धके पूछनेपर सान्दीपनिद्वारा श्रीकृष्ण - तत्त्वका निरूपण; श्रीकृष्णकी परब्रह्मता एवं भजनीयताका प्रतिपादन करके जगत्से श्रीगर्गजी कहते हैं- राजन्! तत्पश्चात् वहाँ श्रीकृष्णपौत्र अनिरुद्धने मनमें कुछ संदेह लेकर सान्दीपनि मुनिसे उसी प्रकार प्रश्न किया, जैसे देवराज इन्द्र देवगुरु बृहस्पतिसे अपने मनका संदेह पूछा करते हैं ॥ १ ॥

अनिरुद्ध बोले- ' भगवन्! मुने! मुझे उस सारतत्त्वका उपदेश दीजिये, जिससे मैं जगत्‌के स्वप्न-तुल्य सुखोंको त्यागकर नित्यानन्द - स्वरूपमें रमण करूँ । ' राजन्! अनिरुद्धके इस प्रकार पूछनेपर सान्दीपनि मुनि हँसते हुए उसी प्रकार उन्हें उपदेश देने लगे, जैसे पूर्वकालमें राजा पृथुके पूछनेपर सनत्कुमार-ने उन्हें प्रसन्नतापूर्वक उपदेश दिया था ॥ २-३ ॥ सान्दीपनि बोले- लोकेश! तुम्हीं श्रीहरिके नाभिकमलसे उत्पन्न हुए आदिदेव हो; अतः तुम्हारे सामने मैं सारतत्त्वकी बात क्या कह सकूँगा । राजन्! तथापि तुम्हारे वचनका गौरव मानकर समस्त दीनचेता मनुष्योंके कल्याणके लिये कुछ कहूँगा । नरेश्वर! तुमने जो कुछ पूछा है, वह सब मेरे मुखसे सुनो । भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रके चरणोंका सेवन ही सारतत्त्व है, जिन चरणोंके पूजनमात्रसे ध्रुवजीने ध्रुवपद प्राप्त कर लिया । प्रह्लाद, अम्बरीष, गय और यदुने भी अक्षयपद प्राप्त किया । राजेन्द्र! इसलिये तुम भी मनसे यत्नपूर्वक श्रीकृष्णकी सेवा करो; क्योंकि यही सब साधनोंका सारभूत है । तुम सब लोग इस जगत् में बड़े सौभाग्यशाली हो; क्योंकि श्रीकृष्णके वंशमें उत्पन्न हुए हो, उनके कुटुम्बी और सम्बन्धी हो । श्रीहरिके प्रिय होनेके कारण तुम सब - के - सब जीवन्मुक्त हो । तुम यादवोंमेंसे कोई तो श्रीकृष्णको अपना बेटा समझते हैं, वैराग्य और भगवान्‌के भजनका उपदेश कोई भाई मानते हैं और कोई उन्हें पिता एवं मित्रके रूपमें जानते हैं । यदि उनका यह भाव सुदृढ़ रहा तो उनके लिये इससे बढ़कर उत्तम कर्तव्य और क्या होगा ॥ ४ -१० ॥ अनिरुद्धने पूछा- मुने! इस जगत्‌का आदि-भूत सनातन कर्ता कौन है, जिससे पूर्वकालमें इसका प्राकट्य हुआ था, इस बातका मुझसे विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये । महर्षे! भगवान् जगदीश्वर प्रत्येक युगमें किस - किस रूपसे धर्मका अनुष्ठान करते हैं, यह हम सब लोगोंको बताइये॥११-१२ ॥ सान्दीपनि बोले – यदुकुलतिलक अनिरुद्ध! जिनसे जगत् की उत्पत्ति और संहार होते रहते हैं, वह ईश्वर, परब्रह्म एवं भगवान् एक ही है । नृपश्रेष्ठ! युग - युगमें ( प्रत्येक कल्पमें ) ये दक्ष आदि प्रजापति उन्हींसे प्रकट होते हैं और फिर उन्हींमें लीन हो जाते हैं । विद्वान् पुरुष इस विषयमें कभी मोहित नहीं होता । राजन्! श्रीकृष्ण साक्षात् परब्रह्म हैं । जिनसे यह सारा जगत् प्रकट हुआ है, जो स्वयं ही जगत्स्वरूप हैं तथा जिनमें ही इस जगत्‌का लय होगा । वह ब्रह्म परमधाम है । वही सत् - असत्से परे परमपद है । यह सम्पूर्ण चराचर जगत् उससे भिन्न नहीं है । वही मूल प्रकृति है और वही व्यक्तरूपवाला संसार है । उसीमें सबका लय होता है और उसीमें सबकी स्थिति है । जिनसे प्रकृति और पुरुष प्रकट होते हैं, जिनसे चराचर जगत्का प्रादुर्भाव हुआ है तथा जो इस सकल दृश्य - प्रपञ्चके कारण हैं, वे परमात्मा श्रीकृष्ण मुझपर प्रसन्न हों । राजेन्द्र! चारों युगोंमें वे ही श्रीविष्णुरूपसे पालनरूप व्यापारका संचालन करते हैं । वे जिस