गोविन्द दामोदर स्तोत्र बिल्वमङ्गलाचार्य — पृष्ठ 21–30

गोविन्द दामोदर स्तोत्र बिल्वमङ्गलाचार्य · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 21–30

पृष्ठ 21

गोविन्द दामोदर स्तोत्र बिल्वमङ्गलाचार्य, पृष्ठ 21 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

गोविन्द - दामोदर - स्तोत्र हे रसोंको चखनेवाली जिहे! तुझे मीठी चीज बहुत अधिक प्यारी लगती है, इसलिये मैं तेरे हितकी एक बहुत ही सुन्दर और सच्ची बात बताता हूँ | तू निरन्तर ' हे गोविन्द! हे दामोदर! हे माधव! ' इन मधुर मञ्जुल नामकी आवृत्ति किया कर । ( ४१ ) वेदवेत्ता विद्वान् ' गोविन्द! दामोदर! माधव! ' इन नामोंको ही लोगों की बड़ी से बड़ी विकट व्याधिको विच्छेद करनेवाला वैद्य और संसारके आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक तीनों तापोंके नाशका बढ़िया बीज बतलाते हैं । ( ४२ ) अपने पिता दशरथकी आज्ञासे भाई लक्ष्मण और जनकनन्दिनी सीताके साथ श्रीरामचन्द्रजी बीहड़ वनोंके लिये चलने लगे, तब उनकी माता श्रीकौशल्याजी ‘ हे गोविन्द! हे दामोदर! हे माधव! [ हे राम! हे रघुनन्दन! हे राघव! ] ' ऐसा कहकर जोरोंसे विलाप करने लगीं । ( ४३ ) जय राक्षसराज रावण पञ्चवटीमें जानकीजी को अकेली देख उन्हें हरकर ले जाने लगा, तब रामचन्द्रजीके सिवा जिनका दूसरा कोई स्वामी नहीं है ऐसी सीताजी ' हा गोविन्द! हा दामोदर! हा माधव! [ हे राम! हे रघुनन्दन! हे राघव! ] ' कहकर जोरोंसे रुदन करने लगीं । ( ४४ ) रथमें बिठाकर ले जाते हुए रावणके साथ, रामवियोगिनी सीता हृदयमें अपने स्वामी श्रीरामचन्द्रजीका ध्यान करती हुई ' हा रघुनाथ! हा गोविन्द! हा दामोदर! हा माधव! [ हे राम! हे रघुनन्दन । हे राघव! मेरी रक्षा करो ] ' इस प्रकार रोती हुई जाने लगी । [ १ ९ CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

पृष्ठ 22

गोविन्द दामोदर स्तोत्र बिल्वमङ्गलाचार्य, पृष्ठ 22 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

गोविन्द - दामोदर स्तोत्र ( ४५ ) प्रसीद विष्णो रघुवंशनाथ सुरासुराणां सुखदुःखहेतो । रुरोद सीता तु समुद्रमध्ये गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ * ( ४६ ) अन्तर्जले ग्राह गृहीतपादो विसृष्टविक्लिष्टसमस्तबन्धुः । तदा गजेन्द्रो नितरां जगाद गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ( ४७ ) हंसध्वजः शङ्खयुतो ददर्श पुत्रं कटाहे प्रतपन्तमेनम् । पुण्यानि नामानि हरेर्जपन्तं गोविन्द दामोदर माघवेति ॥ ( ४८ ) दुर्वाससो वाक्यमुपेत्य कृष्णा सा चाब्रवीत् काननवासिनीशम् । अन्तःप्रविष्टं मनसाजुहाव गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ( ४ ९ ) ध्येयः सदा योगिभिरप्रमेयः चिन्ताहरश्चिन्तित पारिजातः । कस्तूरिका कल्पितनीलवर्णो गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ * अत्र ' हे राम रघुनन्दन राघवेति ' इति पाठान्तरम् । २० CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri जब राव कहकर जोर - जोर देवताओंको सुख हे माधव! [ हे रा पानी पी लिया और उ गजराज अधी दामोदर! हे म अपने सुधन्वाको तस दामोदर! हे करते हुए देखा [ एक ऋषिने शिष्यो भोजन देना ' हे गोविन्द! योगी भ चिन्ताओंको कल्पवृक्षके स नीला है उन्हें स्मरण करना

पृष्ठ 23

गोविन्द दामोदर स्तोत्र बिल्वमङ्गलाचार्य, पृष्ठ 23 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

गोविन्द - दामोदर - स्तोत्र ( 84 ) जब रावणके साथ सीताजी समुद्रके मध्यमें पहुँचीं तब यह कहकर जोर - जोरसे रुदन करने लगीं- ' हे विष्णो! हे रघुकुलपते! हे देवताओंको सुख और असुरोंको दुःख देनेवाले! हे गोविन्द! हे दामोदर! हे माधव! [ हे राम! हे रघुनन्दन! हे राघव! ] प्रसन्न होइये; प्रसन्न होइये । ' ( ४६ ) पानी पीते समय जलके भीतरसे जब ग्राहने गजका पैर पकड़ लिया और उसका समस्त दुखी बन्धुओंसे साथ छूट गया तब वह गजराज अधीर होकर अनन्यभावसे निरन्तर ' हे गोविन्द | हे दामोदर! हे माधव! ऐसे कहने लगा । ( ४७ ) अपने पुरोहित शङ्खमुनिके साथ राजा हंसध्वजने अपने पुत्र सुधन्वाको तप्त तैलकी कड़ाही में कूदते और ' हे गोविन्द! हे दामोदर! हे माधव! इन भगवान् के परमपावन नामका जप हुए देखा । ( ४८ ) [ एक दिन द्रौपदीके भोजन कर लेनेपर असमयमें दुर्वासा ऋषिने शिष्यसहित आकर भोजन माँगा ] तब वनवासिनी द्रौपदीने भोजन देना स्वीकार कर अपने अन्तःकरणमें स्थित श्रीश्यामसुन्दरको ' हे गोविन्द! हे दामोदर! हे माधव! ' कहकर बुलाया । ( ४ ९ ) योगी भी जिन्हें ठीक - ठीक नहीं जान पाते, जो सभी प्रकारकी चिन्ताओंको हरनेवाले और मनोवाञ्छित वस्तुओंको देनेके लिये कल्पवृक्षके समान हैं तथा जिनके शरीरका वर्ण कस्तूरीके समान नीला है उन्हें सदा ही ' गोविन्द! दामोदर! माधव! ' इन नामोंसे स्मरण करना चाहिये । [ २१ CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

पृष्ठ 24

गोविन्द दामोदर स्तोत्र बिल्वमङ्गलाचार्य, पृष्ठ 24 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

गोविन्द - दामोदर - स्तोत्र ( ५० ) संसारकृपे पतितोऽत्यगाधे मोहान्धपूर्ण विषयाभितप्ते । करावलम्बं मम देहि विष्णो गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ( ५१ ) त्वामेव याचे मम देहि जिहे समागते दण्डधरे कृतान्ते । वक्तव्यमेवं मधुरं सुभक्तया गोविन्द दामोदर माघवेति ॥ ( ५२ ) भजस्व मन्त्रं भवबन्धमुक्त्यै द्वैपायनाद्यैर्मुनिभिः जिहे रसज्ञे सुलभं मनोशम् । प्रजन्तं गोविन्द दामोदर ( ५३ ) गोपाल वंशीधर रूपसिन्धो लोकेश नारायण उच्चस्वरैस्त्वं वद सर्वदैव गोविन्द दामोदर ( ५४ ) जिह्वे सदैवं भज सुन्दराणि नामानि कृष्णस्य समस्तभक्तार्तिविनाशनानि गोविन्द दामोदर २२ ] माघवेति ॥

दीनबन्धो ।

माधवेति ॥

मनोहराणि ।

माधवेति ॥

जो मोह है, ऐसे अथाह गोविन्द! हे दा हे जि वह यह कि जब तो बड़े ही प्रेम इन मञ्जुल नाम ज सर्वदा हे ' गोवि जप किया कर ऋषियोंने भी ज रेजिहे! नारायण! दीन उच्च स्वरसे कीर्ती जि माधव! इन म निवृत्ति करनेवा CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

पृष्ठ 25

गोविन्द दामोदर स्तोत्र बिल्वमङ्गलाचार्य, पृष्ठ 25 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

गोविन्द - दामोदर - स्तोत्र ( ५० ) जो मोहरूपी अन्धकारसे व्याप्त और विषयोंकी ज्वालासे सन्तस है, ऐसे अथाह संसाररूपी कूपमें मैं पड़ा हुआ हूँ । हे मेरे मधुसूदन! हे गोविन्द! हे दामोदर! हे माधव! मुझे अपने हाथका सहारा दीजिये । ( ५१ ) हे जिह्वे! मैं तुझसे एक भिक्षा माँगता हूँ, तू ही मुझे दे । वह यह कि जब दण्डपाणि यमराज इस शरीरका अन्त करने आवें तो बड़े ही प्रेमसे गद्गद स्वरमें ' हे गोविन्द! हे दामोदर! हे माघव! ' इन मञ्जुल नामका उच्चारण करती रहना । ( ५२ ) हे जिहे! हे रसज्ञे! संसाररूपी बन्धनको काटनेके लिये तू सर्वदा ' हे गोविन्द! हे दामोदर! हे माधव! जप किया कर, जो सुलभ एवं सुन्दर है और ऋषियोंने भी जपा है । ( ५३ ) रेजिहे! तू निरन्तर ' गोपाल! वंशीधर नारायण! दीनबन्धो! गोविन्द! दामोदर! उच्च स्वरसे कीर्तन किया कर । ( ५४ ) हे जिहे! तू सदा ही श्रीकृष्णचन्द्रके इस नामरूपी मन्त्रका जिसे व्यास, वसिष्ठादि । रूपसिन्धो! लोकेश! माघव! इन नामोंका ' गोविन्द! दामोदर! माधव! इन मनोहर मञ्जुल नामोंको, जो भक्तोंके समस्त सङ्कटोंकी निवृत्ति करनेवाले हैं, भजती रह । [ २३ CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

पृष्ठ 26

गोविन्द दामोदर स्तोत्र बिल्वमङ्गलाचार्य, पृष्ठ 26 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

गोविन्द - दामोदर - स्तोत्र ( ५५ ) गोविन्द गोविन्द हरे मुरारे गोविन्द गोविन्द मुकुन्द कृष्ण । गोविन्द गोविन्द रथाङ्गपाणे गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ( ५६ ) सुखावसाने त्विदमेव सारं दुःखावसाने त्विदमेव गेयम् । देहावसाने त्विदमेव जायं गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ( ५७ ) दुर्वारवाक्यं परिगृह्य कृष्णा मृगीव भीता तु कथं कथञ्चित् । सभां प्रविष्टा मनसाजुहाव गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ( ५८ ) श्रीकृष्ण राधावर गोकुलेश गोपाल गोवर्धन नाथ विष्णो । जिह्वे पिवस्वामृतमेतदेव गोविन्द दामोदर ( ५ ९ ) श्रीनाथ विश्वेश्वर विश्वमूर्ते श्रीदेवकीनन्दन जिहे पिवस्वामृतमेतदेव गोविन्द दामोदर २४ ] माघवेति ॥

दैत्यशत्रो ।

माधवेति ॥

जि गोविन्द! मु गोविन्द! दाम सुखके अ करने ] योग्य ह है, कौन - सा मन दुःशासन भयभीत हुई ' गोविन्द! दा करने लगी । हे जि गोवर्धन! विष निरन्तर पान क ज नन्दन! असु का निरन्तर पा CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

पृष्ठ 27

गोविन्द दामोदर स्तोत्र बिल्वमङ्गलाचार्य, पृष्ठ 27 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

गोविन्द - दामोदर - स्तोत्र ( ५५ ) हे जि! ' गोविन्द! गोविन्द! हरे! मुरारे! गोविन्द! गोविन्द! मुकुन्द! कृष्ण! गोविन्द! गोविन्द! रथाङ्गपाणे! गोविन्द! दामोदर! माधव! – इन नामोंको तू सदा जपती रह । ( ५६ ) सुखके अन्तमें यही सार है, दुःख [ की निवृत्तिके लिये ] यही [ कीर्तन करने ] योग्य है और शरीरका अन्त होने के समय भी यही मन्त्र जपने योग्य है, कौन - सा मन्त्र! यही कि ' हे गोविन्द! हे दामोदर! हे माधव! ' ( ५७ ) दुःशासनके दुर्निवार्य वचनोंको स्वीकारकर मृगीके समान भयभीत हुई द्रौपदी किसी - किसी तरह सभामें प्रवेशकर मन - ही - मन ' गोविन्द! दामोदर! माधव करने लगी । ( हे जिल्हे! तू श्रीकृष्ण गोवर्धन! विष्णो! गोविन्द! निरन्तर पान करती रह । ( हे जिह्वे! तू श्रीनाथ! ! इस प्रकार भगवान्‌का स्मरण ५८ ) ! राधारमण! ब्रजराज! गोपाल! दामोदर! माघव! इस नामामृतका ५ ९ ) सर्वेश्वर! श्रीविष्णुस्वरूप! श्रीदेवकी-नन्दन! असुरनिकन्दन! गोविन्द! दामोदर! माधव! इस नामामृत-का निरन्तर पान करती रह । [ २५ CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

पृष्ठ 28

गोविन्द दामोदर स्तोत्र बिल्वमङ्गलाचार्य, पृष्ठ 28 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

..गोविन्द - दामोदर - स्तोत्र ( ६० ) गोपीपते कंसरिपो मुकुन्द लक्ष्मीपते केशव जिह्वे पिवस्वामृतमेतदेव गोविन्द दामोदर ( ६१ ) गोपीजना ह्लादकर व्रजेश

वासुदेव ।

माधवेति ॥

गोचारणारण्यकृतप्रवेश जिह्वे पिवस्वामृतमेतदेव गोविन्द दामोदर ( ६२ ) प्राणेश विश्वम्भर कैटभारे वैकुण्ठ नारायण जिह्वे पिवस्वामृतमेतदेव गोविन्द दामोदर ( ६३ ) हरे मुरारे मधुसूदनाद्य श्रीराम सीतावर जिह्वे पिबस्वामृतमेतदेव गोविन्द दामोदर ( ६४ ) श्रीयादवेन्द्राद्विधराम्बुजाक्ष माधवेति ॥

चक्रपाणे ।

माधवेति ॥

रावणारे ।

माधवेति ॥

गोगोपगोपी सुखदानदक्ष जिह्वे पिवस्वामृतमेतदेव गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ २६ ] CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri हे जिले! केशव! वासुदेव निरन्तर पान कर जो व्रजर गौओं को चराने क मुरारिके ' गोविन्द पान करती रह । नारायण! चत्र नामामृतका निर ' हे हरे! -रावणारे! हे सीत -इस नामामृत हे जिहे । गोप और गोपि माधव! - इस

पृष्ठ 29

गोविन्द दामोदर स्तोत्र बिल्वमङ्गलाचार्य, पृष्ठ 29 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

३ गोविन्द - दामोदर - स्तोत्र 216 ( ६० ) हे जिल्हे! तू ' गोपीपते! कंसरिपो! मुकुन्द! केशव! वासुदेव! गोविन्द! दामोदर! माधव! ' – इस निरन्तर पान करती रह । ( ६१ ) जो ब्रजराज व्रजाङ्गनाओंको आनन्दित करनेवाले गौओंको चरानेके लिये बनमें प्रवेश किया है; हे जिह्वे लक्ष्मीपते! नामामृतका हैं, जिन्होंने ! तू उन्हीं मुरारिके गोविन्द! दामोदर! माधव! - इस नामामृतका निरन्तर पान करती रह । ( ६२ ) हे जिल्हे! तू ' प्राणेश! विश्वम्भर! कैटमारे! वैकुण्ठ! नारायण! चक्रपाणे गोविन्द! दामोदर । माधव! – इस नामामृतका निरन्तर पान करती रह । ( ६३ ) ' हे हरे! हे मुरारे! हे मधुसुदन! हे पुराणपुरुषोत्तम! हे रावणारे! हे सीतापते श्रीराम! हे गोविन्द! हे दामोदर! हे माधव! ' -इस नामामृतका है जिह्वे! तू निरन्तर पान करती रह । ( ६४ ) हे जिह्वे | तू ' श्रीयदुकुलनाथ! गिरिधर! कमलनयन! गौ, गोप और गोपियोंको सुख देनेमें कुशल! श्रीगोविन्द! दामोदर! माधव! — इस नामामृतका निरन्तर पान करती रह । [ २७ CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

पृष्ठ 30

गोविन्द दामोदर स्तोत्र बिल्वमङ्गलाचार्य, पृष्ठ 30 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

गोविन्द - दामोदर - स्तोत्र ( ६५ ) धराभरोत्तारणगोपवेष विहारलीलाकृतबन्धुशेष 1 जिहे पिवस्वामृतमेतदेव गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ( ६६ ) बकी बकासुर धेनुकारे केशीतृणावर्तविघातदक्ष 1: जिहे पिबस्वामृतमेतदेव गोविन्द दामोदर ( ६७ ) श्रीजानकीजीवन रामचन्द्र निशाचरारे जिह्वे पिबस्वामृतमेतदेव गोविन्द दामोदर ( ६८ ) नारायणानन्त हरे नृसिंह माधवेति ॥

भरताग्रजेश ।

माधवेति ॥

प्रह्लादवाधाहर हे कृपालो । जिहे पिवस्वामृतमेतदेव गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ( ६ ९ ) लीलामनुष्याकृतिरामरूप प्रतापदासीकृतसर्वभूप 1 जिहे. पिबस्वामृतमेतदेव गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ २८ ] CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri जिन्होंने धारण किया है अ अपना भाई बनाय माधव! -- इस जो पूतना, शत्रु हैं और केशी असुरारि मुरारिके तू निरन्तर पान ' हे जानव ईश! हे गोविन हे जिल्हे! तू नि हे प्रह्लाद अनन्त! हरे हे जिल्हे! तू निय जिहे! रामरूप प्रकट दास बना लिय गोविन्द! दाम करती रह ।