गोविन्द दामोदर स्तोत्र बिल्वमङ्गलाचार्य — पृष्ठ 11–20

गोविन्द दामोदर स्तोत्र बिल्वमङ्गलाचार्य · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 11–20

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1 गोविन्द, दामोदर - स्तोत्र बुतकालय ५५ ( १५. ) जिनका मुखारविन्द बड़ा ही मनोहर है, समान अरुण अधरोंपर रखकर वंशीकी मधुर ध्वनि कदम्बके तले गौ, गोप और गोपियोंके मध्य में भगवान्का ' हे गोविन्द! हे दामोदर! हे माधव हुए सदा स्मरण करना चाहिये । ( १६ ) जो अपने विम्बके कर रहे हैं तथा जो विराजमान हैं उन ! इस प्रकार कहते व्रजाङ्गनाएँ ब्राह्ममुहूर्तमें उठकर और उन यशुमतिनन्दनकी बालक्रीड़ाओंकी बातोंको याद करके दही मथते - मथते ' गोविन्द! दामोदर! माधव! ' इन पदों को उच्च स्वरसे गाया करती हैं । ( १७ ) [ दधि मथकर माताने माखनका लौंदा रख दिया था । माखनभोगी कृष्णकी दृष्टि पड़ गयी, झट उसे धीरे से उठा लाये ] - कुछ खाया कुछ बाँट दिया । जब ढूँढ़ते - ढूँढ़ते न मिला तो यशोदामैयाने आपपर सन्देह करते हुए पूछा - ' हे मुरारे! हे गोविन्द! हे दामोदर! हे माधव! ठीक - ठीक बता माखनका लौंदा क्या हुआ? ( १८ ) जिसके हृदय में प्रेमकी वाढ़ आ रही है ऐसी माता यशोदा घरको लीपकर दही मथने लगी । तब और सब गोपाङ्गनाएँ तथा सखियाँ मिलकर ' गोविन्द! दामोदर! माधव! इस पदका गान करने लगीं । ( १ ९ ) किसी दिन प्रातःकाल ज्यों ही माता यशोदा दहीभरे भाण्डमें मथानीको छोड़कर उठी त्यों ही उसकी दृष्टि शय्यापर बैठे हुए मनमोहन मुकुन्दपर पड़ी । सरकारको देखते ही वह प्रेमसे पगली हो गयी और मेरा गोविन्द! मेरा दामोदर! मेरा माधव! ' ऐसा कहकर तरह - तरहसे गाने लगी । [ ९ गो ० दा ० २-CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

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गोविन्द - दामोदर -स्तोत्र ( २० ) क्रीडापरं भोजनमजनार्थ हितैषिणी स्त्री तनुजं आजूहवत् प्रेमपरिप्लुताक्षी गोविन्द दामोदर ( २१ ) सुखं शयानं निलये च विष्णुं देवर्षिमुख्या मुनयः तेनाच्युते तन्मयतां ब्रजन्ति गोविन्द दामोदर ( २२ ) विहाय निद्रामरुणोदये च यशोदा | माधवेति ॥

प्रपन्नाः ।

माधवेति ॥

विधाय कृत्यानि च विप्रमुख्याः । वेदावसाने प्रपठन्ति नित्यं गोविन्द दामोदर माघवेति ॥ ( २३ ) वृन्दावने गोपगणाश्च गोप्यो विलोक्य गोविन्दवियोगखिन्नाम् । राधां जगुः साधुविलोचनाभ्यां गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ( २४ ) प्रभातसञ्चारगता तु गाव-स्तद्रक्षणार्थं तनयं यशोदा । प्राबोधयत् पाणितलेन मन्दं गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ १० ] CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri क्रीडावि ज्ञान किया है और भोजन ओ माधव! [ और कुछ ख नारद अ इस प्रकार प्रार्थ पुरुष बालकृष्ण प्राप्त कर ली । वेदश कर्मोंको पूर्णकर माधव! इन वृन्दावन देख गोपगण ' हा गोविन्द! लगीं । प्रातःका उनकी रक्षाके को मीठी - मीठी मुन्ना माधव!

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# 1 गोविन्द - दामोदर - स्तोत्र ( २० ) क्रीडाविहारी मुरारि बालकोंके साथ खेल रहे हैं [ । अभीतक न ज्ञान किया है न भोजन ] अतः प्रेममें विह्वल हुई माता उन्हें स्नान और भोजनके लिये पुकारने लगी- ' अरे ओ गोविन्द! ओ दामोदर! ओ माधव! [ आ बेटा! आ! पानी ठण्डा हो रहा है जल्दी से नहा ले और कुछ खा ले ] । ' ( २१ ) नारद आदि ऋषि ' हे गोविन्द! हे दामोदर! हे माधव! ' इस प्रकार प्रार्थना करते हुए घर में सुखपूर्वक सोये हुए उन पुराण-पुरुष बालकृष्णकी शरण में आये; अतः उन्होंने श्रीअच्युतमें तन्मयता प्राप्त कर ली । ( २२ ) वेदश ब्राह्मण प्रातःकाल उठकर और अपने नित्य नैमित्तिक कर्मोंको पूर्णकर वेदपाठके अन्तमें नित्य ही ' गोविन्द! दामोदर! माघव! ' इन मञ्जुल नामोंका कीर्तन करते हैं । ( २३ ) वृन्दावनमें श्रीवृषभानु कुमारीको वनवारीके देख गोपगण और गोपियाँ अपने कमलनयनोंसे ' हा गोविन्द! हा दामोदर! हा माघव! आदि लगीं । ( २४ ) प्रातःकाल होनेपर जब गौएँ वनमें चरने वियोग से विह्वल नीर बहाती हुई कहकर पुकारने चली गयीं तब उनकी रक्षा के लिये यशोदामैया शय्या पर शयन करते हुए बालकृष्ण-को मीठी - मीठी थपकियोंसे जगाती हुई बोलीं- ' बेटा गोविन्द! मुन्ना माघव! लल्लू दामोदर! [ उठ जा गौओंको चरा ला ] । ' [ ११ CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

पृष्ठ 14

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गोविन्द - दामोदर - स्तोत्र प्रबालशोभा मूले तरूणां एवं ब्रुवाणा ( २५ ) व दीर्घकेशा वाताम्बुपर्णाशनपूतदेहाः 1 मुनयः पठन्ति गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ( २६ ) विरहातुरा भृशं व्रजस्त्रियः कृष्णविषक्तमानसाः । विसृज्य लज्जां रुरुदुः स्म सुस्वरं गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ( २७ ) गोपी कदाचिन्मणिपिञ्जरस्थं आनन्दकन्द गोवत्स वालैः उवाच माता प्रभातकाले शुकं वचो वाचयितुं प्रवृत्ता । व्रजचन्द्र कृष्ण गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ( २८ ) शिशुकाकपक्ष बध्नन्तमम्भोजदलायताक्षम् । चिवुकं गृहीत्वा गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ( २ ९ ) Paragatar गोरक्षणार्थे धृतवेन्त्रदण्डाः । आकारयामासुरनन्तमाद्यं गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ १२ ] CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri केवल हैं, ऐसे प्रबाल जटाओंवाले म ' गोविन्द! द श्रीवन विविध प्रकार आर्चस्वर से रोने लगीं । गोपी तोते से बार-दामोदर! मा कमलन पूँछके बालोंस लगीं- ' मेरा प्रातःक छड़ी और ला प्यारे सखा माधव! ' कह

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I ॥ ॥ 1 ॥ गोविन्द - दामोदर - स्तोत्र ( २५ ) केवल वायु, जल और पत्तोंके खानेसें जिनके शरीर पवित्र होगये हैं, ऐसे प्रबालके समान शोभायमान लंबी - लंबी एवं कुछ अरुण रंगकी जटाओंवाले मुनिगण पवित्र वृक्षोंकी छाया में विराजमान होकर निरन्तर ' गोविन्द! दामोदर! माधव! इन नामोंका पाठ करते हैं । ( २६ ) श्रीवनमालीके विरह में विह्वल हुई व्रजाङ्गनाएँ उनके विषय में विविध प्रकारकी बातें कहती हुई लोक- लज्जाको तिलाञ्जलि दे बड़े आर्त्तस्वर से ' गोविन्द! दामोदर! माधव! ' कहकर जोर - जोरसे रोने लगीं । ( २७ ) गोपी श्रीराधिकाजी किसी दिन मणियोंके पिंजड़े में पले हुए तोतेसे बार - बार ' आनन्दकन्द! व्रजचन्द्र! कृष्ण दामोदर! माघव! ' इन नामोंको बुलवाने लगीं । ( २८ ) कमलनयन श्रीकृष्णचन्द्रको किसी गोपबालककी पूँछके बालोंसे बाँधते देख मैया प्यारसे उनकी ठोढ़ी को लगीं- ' मेरा गोविन्द! मेरा दामोदर! मेरा माधव! ' ( २ ९ ) प्रातःकाल हुआ, ग्वाल - बालोंकी मित्रमण्डली छड़ी और लाठी ले गौओको चरानेके लिये निकली । प्यारे सखा अनन्त आदिपुरुष श्रीकृष्णको गोविन्द माघव! ' कह - कहकर बुलाने लगे । ! गोविन्द! चोटी बछड़े की पकड़कर कहने हाथों में वेतकी तब वे अपने ! दामोदर! [ १३ CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

पृष्ठ 16

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गोविन्द - दामोदर स्तोत्र ( ३० ) जलाशये कालियामर्दनाय यदा कदम्वादपतन्मुरारिः । गोपाङ्गनाश्चुक्रुशुरेत्य गोपा अक्रूरमासाद्य तदा स गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ( ३१ ) यदा मुकुन्द-श्रापोत्सवार्थ मथुरां प्रविष्टः । पौरैर्जयतीत्यभाषि गोविन्द दामोदर माघवेति ॥ ( ३२ ) कंसस्य दूतेन यदैव नीतौ रुरोद गोपी सरोवरे चकुलुठन्त्यः अक्रूरा ऊचुर्वियोगात् १४ ] वृन्दावनान्ताद् वसुदेवसून् । भवनस्य मध्ये गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ( ३३ ) कालियनागवद्धं शिशुं यशोदातनयं निशम्य । पथि गोपवाला गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ( ३४ ) यदुवंशनाथं संगच्छमानं मथुरां निरीक्ष्य । किल गोपबाला गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri जिस स वृक्षसे कूदे, गोविन्द! हा व जिस स होने के लिये पुरवासीजन ह जय हो ' ऐसा जब कं वृन्दावनसे दूर गोविन्द! हा द यशोदान जकड़ा हुआ हा दामोदर! अक्रूर के - गोपबालाएँ वि हा दामोदर!

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11 ॥ 1 गोविन्द - दामोदर - स्तोत्र ( ३० ) जिस समय कालियनागका मर्दन करनेके लिये कन्हैया कदम्बके वृक्षसे कूदे, उस समय गोपाङ्गनाएँ और गोपगण वहाँ आकर ' हा गोविन्द! हा दामोदर! हा माधव! ' कहकर बड़े जोरसे रोने लगे । ( ३१ ) जिस समय श्रीकृष्णचन्द्रने कंसके धनुर्यज्ञोत्सवमें सम्मिलित होने के लिये अक्रूरजीके साथ मथुरामें प्रवेश किया, उस समय पुरवासीजन ' हे गोविन्द! हे दामोदर! हे माधव! तुम्हारी जय हो, जय हो ' ऐसा कहने लगे । ( ३२ ) जब कंसके दूत अक्रूरजी वसुदेवनन्दन श्रीकृष्ण और बलरामको वृन्दावनसे दूर ले गये तब अपने घरमें बैठी हुई यशोदाजी ' हा गोविन्द! हा दामोदर! हा माधव! ' कह कहकर रुदन करने लगीं । ( ३३ ) यशोदानन्दन बालक श्रीकृष्णको जकड़ा हुआ सुनकर गोपबालाएँ रास्तेमें हा दामोदर! हा माधव! ' कहकर जोरोंसे ( ३४ ) अक्रूरके रथपर चढ़कर मथुरा जाते गोपबालाएँ वियोगके कारण अधीर होकर कालियहृदमें कालियनागसे लोटती हुईं ' हा गोविन्द! रुदन करने लगीं । हुए श्रीकृष्णको देख समस्त कहने लगीं - ' हा गोविन्द! हा दामोदर! हा माधव! [ हमें छोड़कर तुम कहाँ जाते हो ] १ ' [ १५ CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

पृष्ठ 18

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गोविन्द - दामोदर स्तोत्र ( ३५ ) चक्रन्द गोपी नलिनीवनान्ते कृष्णेन हीना कुसुमे शयाना । प्रफुल्लनीलोत्पललोचनाभ्यां गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ( ३६ ) मातापितृभ्यां परिवार्यमाणा गेहं प्रविष्टा विललाप गोपी । आगत्य मां पालय विश्वनाथ गोविन्द दामोदर ( ३७ ) वृन्दावनस्थं हरिमाशु बुद्ध्वा गोपीगता कापि वनं तत्राप्यदृष्ट्रातिभयादवोचद् गोविन्द दामोदर ( ३८ ) सुखं शयाना निलये निजेऽपि माधवेति ॥

निशायाम् ।

माधवेति ॥

नामानि विष्णोः प्रवदन्ति मर्त्याः । ते निश्चितं तन्मयतां व्रजन्ति गोविन्द दामोदर माघवेति ॥ ( ३ ९. ) सा नीरजाक्षीमवलोक्य राधां रोद गोविन्द वियोगखिनाम् । सखी प्रफुल्लोत्पललोचनाभ्यां गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ १६ ] श्रीराधि शय्या पर सोकर ' हा गोविन्द! माता - पि विलाप करने ल माधव! ' तुम रात्रिका विहारी इस उसी ओर चल न देखा, तो माधव! ' कहन [ वनम करते हुए भी विष्णु भगवान् क भगवान्की तन कमलल देख कोई सख गोविन्द! हे CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

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1 " 1 गोविन्द - दामोदर - स्तोत्र ( ३५ ) श्रीराधिकाजी श्रीकृष्णके अलग हो जानेपर कमलवनमें कुसुम -शय्यापर सोकर अपने विकसित कमलसदृश लोचनोंसे आँसू बहाती हुई ' हा गोविन्द! हा दामोदर! हा माघव! ' कहकर क्रन्दन करने लगीं । ( ३६ ) माता - पिता आदि से घिरी हुई श्रीराधिकाजी घरके भीतर प्रवेशकर विलाप करने लगीं कि ' हे विश्वनाथ! हे गोविन्द! हे दामोदर! हे माघव! ' तुम आकर रात्रिका समय विहारी इस समय उसी ओर चल दी न देखा, तो डरसे माधव! ' कहने लगी मेरी रक्षा करो! रक्षा करो!! ( ३७ ) था, किसी गोपीको भ्रम हो गया कि वृन्दावन-वनमें विराजमान हैं । बस, फिर क्या था, झट । किन्तु जब उसने निर्जन वनमें वनमालीको काँपती हुई ' हा गोविन्द! हा दामोदर! हा । ( ३८ ) [ वनमें न भी जायँ ] अपने घरमें ही सुखसे शय्यापर शयन करते हुए भी जो लोग ' हे गोविन्द! हे दामोदर! हे माघव! ' इन विष्णुभगवान्‌ के पवित्र नामको निरन्तर कहते रहते हैं वे निश्चय ही भगवान्की तन्मयता प्राप्त कर लेते हैं ॥ ( ३ ९ ) कमललोचन राधाको श्रीगोविन्दकी विरहव्यथासे पीड़ित देख कोई सखी अपने प्रफुल्ल कमलसदृश नयनोंसे नीर बहाती हुई ' हे गोविन्द! हे दामोदर! हे माधव! ' कहकर रुदन करने लगी । [ १७ CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

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गोविन्द - दामोदर - स्तोत्र ( ४० ) जिह्वे रसज्ञे मधुरप्रिया त्वं सत्यं हितं त्वां परमं वदामि । आवर्णयेथा मधुराक्षराणि गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ( ४१ ) आत्यन्तिकव्याधिहरं जनानां चिकित्सकं वेदविदो वदन्ति । संसारतापत्रयनाशबीजं गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ( ४२ ) ताताशया गच्छति रामचन्द्रे सलक्ष्मणेऽरण्यचये ससीते । चक्रन्द रामस्य निजा जनित्री गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ * ( ४३ ) एकाकिनी दण्डककाननान्तात् सा नीयमाना दशकन्धरेण । सीता तदाक्रन्ददनन्यनाथा गोविन्द दामोदर माघवेति ॥ * ( ४४ ) रामाद्वियुक्ता जनकात्मजा सा विचिन्तयन्ती हृदि रामरूपम् । रुरोद सीता रघुनाथ पाहि गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ # * अत्र ' हे राम रघुनन्दन रामवेति ' इति पाठान्तरम् । १८ ] हे रसों प्यारी लगती ह सच्ची बात बत माधव! ' इन वेदवेत्ता ही लोगों की और संसारके तापोंके नाशका अपने सीता के साथ श माता श्रीकौशल रघुनन्दन! जब रा हरकर ले जाने नहीं है ऐसी स राम! हे रघुन रथमें हृदयमें अपने हा गोविन्द! हे राघव! मेरी CC - 0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri