हठ योग प्रदीपिका — पृष्ठ 11–20

हठ योग प्रदीपिका · Khemraj Krishna Das · पृष्ठ 11–20

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॥ श्रीः अथ हठयोगप्रदीपिका. संस्कृत टीका-भाषाटीकासमेता । प्रथमोपदेशः १: श्रीआदिनाथाय नमोऽस्तु तस्मै येनोपदिष्टा हठयोगविद्या ॥ विभ्राजते प्रोन्नतराजयोग- मारोडुमिच्छोरधिरोहिणीव ॥ १ ॥

गुरुं नत्वा शिवं साक्षाद्ब्रह्मानंदेन तन्यते ॥ प्रदीपिकाज्योत्स्ना योगमार्गप्रकाशिका ॥ १ ॥

saitianti सुबोधार्थमस्याः सुविज्ञाय गोरक्षसिद्धांतहार्दम् ।

मयामेरुशास्त्रिप्रमुख्याभियोगात्स्फुटं कथ्यतेऽत्यंतगूढोऽपिभावः २ ॥

जनहितार्थ राजयोगद्वारा कैवल्यफलां हठमदी पिकां विधित्सुः परमकारुणिकः स्वात्मारामयोगींद्रस्तत्प्रत्यूहनिवृत्तये हठयोगप्रवर्तक- श्रीमदादिनाथनमस्कारलक्षणं मंगलं तावदाचरति-श्रीआदिनाथा-येत्यादिना ॥ तस्मै श्रीआदिनाथाय नमोऽस्त्वित्यन्वयः । आदि-श्वासौ नाथश्च आदिनाथः सर्वेश्वरः शिव इत्यर्थः । श्रीमान् आदि-नाथः तस्मै श्रीआदिनाथाय । श्रीशब्द आदिर्यस्य सः श्रीआदिः श्रीआदिश्वास नाथश्च श्रीआदिनाथः तस्मै श्रीआदिनाथाय । श्रीना-थाय विष्णव इति वार्थः । श्रीआदिनाथायेत्यत्र यणभावस्तु 'अपि मापं मषं कुर्याच्छंदोभंगं त्यजेद्गिराम् ' इति च्छंदोविदां संप्रदाया

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( ) | [: २ हठयोगप्रदीपिका उपदेश दुच्चारणसौष्ठवाच्चेति बोध्यम् । वस्तुतस्तु असंहितपाठस्वीकारापेक्षया श्रीआदिनाथायेति पाठस्वीकारेऽप्रवृत्तनित्यविध्युद्देश्यतावच्छेदकाना-क्रांतत्वेन परिनिष्ठितत्वसंभवात् संप्रत्युदाहृतदृष्टांतद्वयस्यापीदृग्विषयवै- पम्पान्नित्यसाहित्यभंगजनितदोषस्य शाब्दिकाननुमतत्वाच्चासंमृष्टवि- यांशतारूपदीपस्य साहित्यकारैरुक्तत्वेऽपि क्वचित्तैरपि स्वीकृतत्वेन शाब्दिकाचार्यैरेकाजित्यादौ कर्मधारयस्वीकारेण सर्वथानात्वाच्च लाघवातिशय इति सुधियो विभावयंतु । नमः प्रह्वीभावोऽस्तु । प्रार्थ-नायां लोट् । तस्मै कस्मै इत्यपेक्षायामाह-येनेति । येन आदिनाथेन उपदिष्टा गिरिजायै हठयोगविद्या हश्च ठश्च हठौ सूर्यचंद्रौ तयोर्योगो हठयोगः । एतेन हठशब्दवाच्ययोः सूर्यचंद्राख्ययोः प्राणापानयोरैक्य- लक्षणः प्राणायामो हठयोग इति हठयोगस्य लक्षणं सिद्धम् । तथा चोक्तं गोरक्षनाथेन सिद्धसिद्धांतपद्धत - "हकारः कीर्तितः सूर्यष्ठकार- चंद्र उच्यते । सूर्याचंद्रमसोयगाठयोगो निगद्यते ॥ " इति । तत्म- तिपादिका विद्या हठयोगविद्या हठयोगशास्त्रमिति यावत् । गिरि- जाये आदिनाथकृतो हठविद्योपदेशो महाकालयोगशास्त्रादौ प्रसिद्धः । प्रकर्षेण उन्नतः प्रोन्नतः मंत्रयोगहठयोगादीनामधरभूमीनामुत्तरभू- मित्वाद्राजयोगस्य प्रोन्नतत्वम् । राजयोगश्च सर्ववृत्तिनिरोधलक्षणोऽ- संप्रज्ञातयोगः । तमिच्छोर्मुमुक्षोरधिरोहिणीव अधिरुह्यतेऽनयेत्यधिरो- हिणी निःश्रेणीव विभ्राजते विशेषेण भ्राजते शोभते । यथा प्रोन्नत--सौधमारोडुमिच्छोरधिरोहिण्यनायासेन सोधप्रापिका भवति एवं हठ- दीपिकापि प्रोन्नतराजयोगमारोदुमिच्छोरनायासेन राजयोगप्रापिका

भवतीति । उपमालंकारः । इंद्रवज्राख्यं वृत्तम् ॥ १ ॥

नत्वा साम्वं ब्रह्मरूपं भाषायां योगबोधिका ॥

मया मिहिरचंद्रेण तन्यते हठदीपिका ॥ १ ॥

मोक्ष अभिलाषी जनोंके हितार्थ राजयोगकेद्वारा मोक्ष है फल जिसका ऐसी हठयोगप्रदीपिकाको रचतेहुये परमदयालु स्वात्माराम योगींद्र ग्रंथमें विघ्ननिवृत्तिके लिये हठयोगकी प्रवृत्तिके कर्ता जो श्रीमान् आदिनाथ ( शित्र )

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] - ( ) १. संस्कृतटीका भाषाटीकासमेता । ३ जी हैं उनके नमस्काररूप मंगलको ग्रंथके प्रारंभमें करते हैं कि, श्रीमान् जो आदिनाथ अर्थात् सनातन स्वामी शिवजी हैं उनको नमस्कार हो अथवा श्रीशब्द है आदिमें जिसके ऐसा जो नाथ ( विष्णु ) घा श्रीलक्ष्मीसे युक्त जो नाथ विष्णु हैं उनके अर्थ नमस्कार हो । कदाचित् कहो कि, श्रीआदिनाथाय इस पदमें श्रीशब्दके ईकारको इस सूत्रसे यकार क्यों नहीं होता सो ठीक नहीं, क्योंकि छंदके ज्ञाताओंका यह संप्रदाय है कि, चाहे माषके स्थानमें भी मषपदको लिखै परंतु छंदका भंग न करें और उच्चारण करनेमें भी सुगमताहै इससे सूत्रसे प्राप्तभी यकार ग्रंथकारने नहीं किया सिद्धांत तो यहहै कि, श्रीआदिनाथाय इसपाठकी अपेक्षा श्रयादिनाथाय यह पाठ लावत्रसे युक्तहै क्योंकि आदिनाथाय इस पाठमें व्याकरणके किसी सूत्रकी प्राप्ति नहीं है इससे यह परिनिष्ठित ( सिद्ध हुआ ) है और श्री आदिनाथाय इस पाठमें 'इकोयणचि' इस सूत्रकी प्राप्तिकी शंका बनी रहतीहै -और जो दो दृष्टान्त दिये हैं ( माष मष- उच्चारणमें सुगमता ) वे भी ऐसे विषयसे विषम हैं अर्थात् सूत्रकी प्राप्तिको नहीं हटा सकते और व्याकरणशास्त्रके ज्ञाता साहित्य ( छंद ) के भंगका जो दोष उसको नहीं मानते -और असंसृष्ट ( शास्त्रसे अशुद्ध ) विधानरूप दोष यद्यपि साहित्यके रचनेवालोंने कहाहै तथापि कहीं? उन्होंने भी मानाहै -और व्याक- रणशास्त्रके आचार्योंने ( एको ) इस पाठके स्थानमें कर्मधारय समास करके ( एकाज् ) असंसृष्ट विधानको नहीं माना है-इससे श्यादिनाथाय इस पाठमेंही है इस बातका बुद्धिमान् मनुष्य विचार करो -तात्पर्य यह है कि, उस आदिनाथको नमस्कारहैं जिसने पार्वतीके प्रति हठयोग विद्याका उपदेश किया और जिसप्रकार शिवजीने पार्वतीके प्रति हठयोगका उपदेश किया है। -वह प्रकार महाकाल योगशास्त्रमें प्रसिद्धहै और हठयोगविद्या शब्दका यह अर्थ है। कि, ह ( सूर्य ) ठ ( चंद्रमा ) इन दोनोंका जो योग ( एकता ) अर्थात सूर्यचंद्रमारूप जो प्राण अपान हैं उनकी एकतासे जो प्राणायाम वह हठयोग कहताहै सोई सिद्धसिद्धांतपद्धतिमें गोरक्षनाथ आचार्यने इस वचनसे कहाहै कि, हकारसे सूर्य और ठकारसे चंद्रमा कहा जाताहै सूर्य और चंद्रमाके योगसे हठयोग कहताहै-उस हठयोगका जिससे प्रतिपादनही उस विद्याको

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( ) | [: ४ हठयोगप्रदीपिका उपदेश हठयोगविद्या कहते हैं अर्थात् हठयोगशास्त्रका नाम हठयोगविद्या हैं -और वह हठयोग विद्या सबसे उत्तम जो राजयोग अर्थात् संपूर्ण वृत्तियोंका निरोधरूप जो असंप्रज्ञातलक्षण समाधिहै उसके अभिलाषी मुमुक्षुको अधिरो-हिणी ( नसैनी ) के समान विराजती है जैसे ऊँचे महलपर बिना परिश्रमही नसैनी पहुँचा देती है, इसीप्रकार यह हठयोगविद्याभी सर्वोत्तम राजयोगपर चढनेके लिये मुमुक्षुको अनायाससे राजयोगमें प्राप्त कर देतीहै-इस लोकमें उपमा अलंकार और इंद्रवज्राछंद है-भावार्थ -यह है कि, जिस श्रीआदिनाथ. (शिवजी ) ने पार्वतीके प्रति वह हठयोगविद्या कही है जो सर्वोत्तम राजयोगपर चढनेके लिये अधिरोहिणीके समान है उस श्रीआदिनाथको नमस्कार हो अर्थात् उसको नमस्कार करताहूं ॥ १ ॥

प्रणम्य श्रीगुरुं नाथं स्वात्मारामेण योगिना ॥ केवलं राजयोगाय हठविद्योपदिश्यते ॥ २ ॥

एवं परमगुरुनमस्कारलक्षणं मंगलं कृत्वा विघ्नवाहुल्ये मंगलबाहु- ल्यस्याप्यपेक्षितत्वात्खगुरुनमस्कारात्मकं मंगलमाचरन्नस्य ग्रंथस्य विषयप्रयोजनादीन्प्रदर्शयति-प्रणम्येति । श्रीमंतं गुरुं श्रीगुरुं नार्थं श्रीगुरुनाथं स्वगुरुमिति यावत् । प्रणम्य प्रकर्षेण भक्तिपूर्वकं नत्वा स्वात्मारामेण योगिना योगोऽस्यास्तीति तेन । केवलं राजयोगाय केवलं राजयोगार्थं हठविद्योपदिश्यत इत्यन्वयः । हठविद्याया राज- योग एव मुख्यं फलं नं सिद्धय इति केवलपदस्याभिप्रायः । सिद्ध- यस्त्वानुषंगिक्यः । एतेन राजयोगफलसहितो हठयोगोऽस्य ग्रंथस्य विषयः । राजयोगद्वारा कैवल्यं चास्य फलम् । तत्कामश्चाधिकारी । ग्रंथविषययोः प्रतिपाद्यप्रतिपादकभावः संबंधः । ग्रंथस्य कैवल्यस्य च प्रयोज्यप्रयोजकभावः संबंधः । ग्रंथाभिधेयस्य सफलयोगस्य कैव- ल्यस्य च साध्यसाधनभावः संबंध इत्युक्तम् ॥ २ ॥

भाषार्थ-इसप्रकार परमगुरुको नमस्कार करके अधिक विघ्नोंकी आशंकामें अधिकही मंगलकी अपेक्षा होती है इस अभिप्रायसे अपने गुरुके नमस्काररूप

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] - ( ) १. संस्कृतटीका भाषाटीकासमेता । ५ मंगलको करते हुये ग्रंथकार ग्रंथके विषय, संबंध, प्रयोजन, अधिकारियोंको दिखाते हैं कि, श्रीमान् जो अपने गुरुनाथ ( स्वामी ) हैं उनको भक्तिपूर्वक नमस्कार करके स्वात्माराम नामका जो मैं योगी हूँ वह केवल राजयोगकी प्राप्तिके लिये हठविद्याका उपदेश ( कथन ) करता हूं-अर्थात् हठविद्याका मुख्य फल केवल राजयोगही है । सिद्धि नहीं है, क्योंकि सिद्धि तो यत्नके विना प्रसंगसेही होजाती है-इससे यह सूचित किया कि, राजयोगरूप फलसहित हठयोग इस ग्रंथका विषय है और राजयोगद्वारा मोक्ष फल ( प्रयोजन ) है- और फलका अभिलापी अधिकारी है और ग्रंथ और विषयका प्रतिपाद्यप्रतिपाद- कभाव संबंध है अर्थात् ग्रंथ विषयका प्रतिपादक है और विषय प्रतिपाद्य है और ग्रंथ और मोक्षका प्रयोज्य प्रयोजकभाव संबंध है क्योंकि ग्रंथभी हठयोगके द्वारा मोक्षका कारण है -और ग्रंथ और अभिधेय ( विषय ) फल योग और मोक्ष इनका साध्यसाधनभाव संबंध है ये सब बात इस श्लोकमें कही हैं । भावार्थ- यह है कि, मैं स्वात्माराम योगी अपने श्रीगुरुनाथको भलीप्रकार नमस्कार करके केवल राजयोगके लिये हठविद्याका उपदेश करताहूँ ॥ २ ॥

त्या बहुमतध्वांते राजयोगमजानताम् ॥ हठप्रदीपिकां धत्ते स्वात्मारामः कृपाकरः ॥ ३ ॥

ननु मंत्रयोगसगुणध्याननिर्गुणध्यानमुद्रादिभिरेव राजयोगसिद्धौ ..किं हठविद्योपदेशेनेत्याशंक्य व्युत्थितचित्तानां मंत्रयोगादिभी राज-'योगासिद्धेहठयोगादेव राजयोगसिद्धिं वदन् ग्रंथं प्रतिजानीते-भ्रां- त्येति ॥ मंत्रयोगादिबहुमतरूपे ध्वांते गाढांधकारे या भ्रांतिभ्रम- स्तया । तैस्तैरुपायै राजयोगार्थं प्रवृत्तस्य तत्रतत्र तदलाभात् । वक्ष्यति च 'विना राजयोगम्' इत्यादिना । तथा राजयोगं अजानतां न जानतीत्यजानंतः तेषाम् अजानतां पुंसां राजयोगज्ञानमिति शेषः । करोतीति करः कृपायाः करः कृपाकरः । कृपाया आकर इति वा । तादृशः । अनेन हठप्रदीपिकाकरणे अज्ञानुकंपैव हेतुरित्युक्तम् । स्वात्म-

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( ) | [: ६ हठयोगप्रदीपिका उपदेश न्यारमते इति स्वात्मारामः हठस्य हठयोगस्य प्रदीपिकेव प्रकाशक-त्वात् हठप्रदीपिका ताम् । अथवा हठ एव प्रदीपिका राजयोगप्रका.. शकत्वात् । तां धत्ते विधत्ते करोतीति यावत् । स्वात्माराम इत्यनेन ज्ञानस्य सप्तमभूमिकां प्राप्तो ब्रह्मविद्वरिष्ठ इत्युक्तम् । तथा च श्रुतिः-'आत्मक्रीड आत्मरतिः क्रियावानेष ब्रह्मविदां वरिष्ठः' इति । सप्त भूमयश्वोक्ता योगवासिष्ठे-'ज्ञानभूमिः शुभेच्छाख्या प्रथमा समुदा-हृता । विचारणा द्वितीया स्यात्तृतीया तनुमानसा ॥ सत्त्वापत्तिश्च- तुर्थी स्यात्ततोऽसंसक्तिनामिका । परार्थाभाविनी षष्ठी सप्तमी तुर्यगा स्मृता ॥ ' इति । अस्यार्थः । शुभेच्छा इत्याख्या यस्याः सा शुभे- च्छाख्या । विवेकवैराग्ययुक्ता शमादिपूर्विका तीव्रमुमुक्षा प्रथमा ज्ञानस्य भूमिः भूमिका उदाहृता कथिता योगिभिरिति शेषः १ ॥ विचारणा श्रवणमननात्मिका द्वितीया ज्ञानभूमिः स्यात् २ । अने- कार्थग्राहकं मनो यदाऽनेकार्थान्परित्यज्य सदेकार्थवृत्तिप्रवाहवद्भवति तदा तनुमानसे यस्यां सा तनुमानसा निदिध्यासनरूपा तृतीया ज्ञानभूमिः स्यादिति शेषः ३ । इमास्तिस्रः साधनभूमिकाः । आसु भूमिषु साधक इत्युच्यते । तिसृभिर्भूमिकाभिः शुद्धसत्वेंतःक रणेऽहं ब्रह्मास्मीत्याकारिकाऽपरोक्षवृत्तिरूपा सत्त्वापत्तिनामिका चतुर्थी ज्ञानभूमिः स्यात् । चतुर्थीयं फलभूमिः । अस्यां योगी ब्रह्म- विदित्युच्यते । इयं संप्रज्ञातयोगभूमिका ४ । वक्ष्यमाणास्तिस्रोऽसंप्र- ज्ञातयोगभूमयः । सत्त्वापत्तेरनंतर सत्त्वापत्तिसंज्ञिकायां भूमावुपस्थि- तासु सिद्धिषु असंसक्तस्यासंसक्तिनामिका पंचमी ज्ञानभूमिः स्यात् । अस्यां योगी स्वयमेव व्युत्तिष्ठते । एतां भूमिं प्राप्तो ब्रह्मविद्वर इत्यु- च्यते ५ | परब्रह्मातिरिक्तमर्थ न भावयति यस्यां सा परार्थाभाविनी षष्ठी ज्ञानभूमिः स्यात् । अस्यां योगी परप्रबोधितएव व्युत्थितो भवति । एतां प्राप्तो ब्रह्मविद्वरीयानित्युच्यते ६ । तुर्यगा नाम सप्तमी भूमिः स्मृता । अस्यां योगी स्वतः परतौ वा न व्युत्थानं प्राप्नोति । एतां प्राप्तो ब्रह्मविद्वरिष्ठ इत्युच्यते । तत्र प्रमाणभूता श्रुतिरत्रैवोक्त्ता ॥

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] - ( ) १. संस्कृतटीका भाषाटीकासमेता । ७ 'पूर्वमयमेव जीवन्मुक्त इत्युच्यते स एवात्र स्वात्मारामपदेनोक्तः इत्यलं बहूक्तेन ॥ ३ ॥

भाषाथ-कदाचित् कहो कि, मंत्रयोग सगुणध्यान -निर्गुणध्यान- मुद्रा आदिसेही राजयोग सिद्ध होजायगा हठयोगविद्याके उपदेशका क्या फल है सो ठीक नहीं, क्योंकि जिनका चित्त व्युत्थित ( चंचल ) है उनको मंत्रयोग आदिसे राजयोगकी सिद्धि नहीं होसकती इससे हठयोगके द्वाराही राजयोगकी सिद्धिको कहते हुये ग्रंथकार ग्रंथके आरंभकी प्रतिज्ञा करते हैं कि, मंत्रयोग आदि अनेक मतोंका जो गाढ अंधकार उसके विषे भ्रमसे राजयोगको जो नहीं जानते हैं उनकोभी राजयोगका ज्ञान जिससे हो ऐसी हठयोगप्रदीपिकाको कृपाके कर्ता ( दयालु ) स्वात्मारामयोगी अर्थात् अपने आत्मामें रमणके कर्ता स्वात्माराम करते हैं अर्थात् हठयोगके प्रकाशक ग्रंथको रचते हैं । अथवा राजयो-गके प्रकाशक जो हठ ( सूर्य चंद्र ) उनके प्रकाशक ग्रंथको रचते हैं - स्त्रात्मा-राम इस पदसे यह सूचित किया है कि, ज्ञानकी सातवीं भूमिकाको प्राप्त ब्रह्मवे- सोइ श्रुतिमें लिखा है कि, आत्मामें है क्रीडा और रमण जिसका ऐसा जो क्रियावान् है वह ब्रह्मज्ञानियोंमें श्रेष्ठ है और सात भूमि योगकी वासिष्टमें कही है कि, शुभेच्छा १, विचारणा २, तनुमानसा ३, सत्त्वापत्ति ४, असंसक्ति ९, परार्धभाविनी ६, तुर्यगा ७ ये सात ज्ञानभूमि योगकी हैं इन सातोंमें शुभेच्छा है नाम जिसका और विवेक और वैराग्यसे युक्त और शमदम आदि हैं पूर्व जिसके और तीव्र ( प्रबल ) है मोक्षकी इच्छा जिसमें ऐसी ज्ञानकी भूमि प्रथम योगीजनोंने कही है १ -और श्रवण मनन आदिरूप विचारणा ज्ञानकी दूसरी भूमि होती है २ - अनेक विषयोंका ग्राहक मन अनेक विषयोंको त्यागकर एक ( ब्रह्म ) विषयमें ही वृत्तिके प्रवाहवाला होजाय तनु ( सूक्ष्म ) है मन जिसमें ऐसी वह निदिध्यासनरूप तनुमानसा नामकी तीसरी भूमि होती है ३ ये तीन साधनभूमि कहाती हैं, इन भूमियोंमें योगी साधक कहाताहै । इन तीन भूमियोंसे शुद्ध हुये अंतःकरणमें मैं ब्रह्महूँ यह जो ब्रह्माकार अपरोक्ष ( प्रत्यक्ष ) वृत्तिहै वह सत्त्वापत्ति नामकी चौथी भूमि कहाती है ४

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( ) [: ८ हठयोगप्रदीपिका उपदेश इन चारोंसे अगली जो तीन भूमि हैं वे असंप्रज्ञात योगभूमि कहाती है -सत्त्वा-पत्तिके अनंतर इसी सत्त्वापत्ति भूमिमें उपस्थित ( प्राप्त ) हुई जो सिद्धि हैं उनमें असंसक्त योगीको असंसक्ति नामकी पांचवीं ज्ञानभूमि होती है । इस भूमिमें योगी स्वयंही व्युत्थित होता ( उठता ) है और वह ब्रह्मज्ञानियोंमें श्रेष्ठ कहाताहै । ५ जिसमें परब्रह्मसे भिन्नकी भावना ( विचार ) न रहैं वह परार्थ-भाविनी नामकी छठी भूमि होतीहै - इसमें योगी दूसरेके उठानेसेही उठाता है। और ब्रह्मज्ञानियोंमें अत्यंत श्रेष्ट कहाताहै ६- और जिसमें तुरीय पदमें योगी पहुँचजाय वह तुर्यगा नामकी सातवी ज्ञानभूमि है इसमें योगी स्वयं वा अन्य पुरुषसे नहीं उठता है इसमें प्राप्त हुआ योगी ब्रह्मज्ञानियोंमें अत्यंत श्रेष्ठ- सेभी उत्तम कहाताहै इसमें प्रमाणरूप यह श्रुतिही कहीहै कि, पहिली भूमियोंमें इसकोही जीवन्मुक्त कहते हैं और उसकोही इस सातवीं भूमिमें स्वात्माराम कहते हैं -इसप्रकार अधिक कहनेसे पूर्ण हुये अर्थात् अधिक नहीं कहते हैं । भावार्थ यह है कि, अनेकमतोंके किये हुये अंधकारमें राजयोगको जो नहीं जानसकते उनके लिये दयाके समुद्र स्वात्माराम " हठयोगप्रदीपिका " को करते हैं ॥ ३ ॥

विद्यां हि मत्स्येंद्रगोरक्षाद्या विजानते ॥ स्वात्मारामोऽथवा योगीजानीते तत्प्रसादतः ॥४ ॥

महत्सेवितत्वाद्धटविद्यां प्रशंसन्स्वस्यापि महत्सकाशाद्धठविद्याला-भाद्गौखं द्योतयति-हठविद्यां हीति ॥ हीति प्रसिद्धं मत्स्येंद्रश्च गोरक्षश्च तो आयौ येषां ते मत्स्येंद्रगोरक्षाद्याः आद्यशब्देन जालं- धरनाथभर्तृहरिगोपीचंद्रप्रभृतयो ग्राह्याः । ते हठविद्यां हठयोगविद्यां विजानते विशेषेण साधनलक्षणभेदफलैर्जानंतीत्यर्थः । स्वात्मारामः स्वात्मारामनामा । अथवा शब्दसमुच्चये । योगी योगवान् तत्प्र-सादतः गोरक्षप्रसादाज्जानीत इत्यन्वयः । परममहता ब्रह्मणापर्यं विद्या सेवितेत्यत्र योगियाज्ञवल्क्यस्मृतिः -' हिरण्यगर्भो योगस्य वक्ता नान्यः पुरातनः । ' इति वक्तृत्वं च मानसव्यापारपूर्वकं भव-

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] - ( ) १. संस्कृतटीका भाषाटीकासमेता । ९ तीति मानसो व्यापारोऽर्थादागमः । तथा च श्रुतिः -' यन्मनसा ध्यायति तद्वाचा वदति ' इति । भगवतेयं विद्या भागवतानुद्धवा- to प्रत्युक्ता | शिवस्तु योगी प्रसिद्ध एव । एवं च सर्वोत्तमैर्ब्रह्म- विष्णुशिवैः सेवितेयं विद्या । न च ब्रह्मसूत्रकृता व्यासेन योगी निराकृत इति शंकनीयम् । प्रकृतिस्वातंत्र्यविद्भिर्भेदांशमात्रस्य निरा-करणात् । न तु भावनाविशेषरूपयोगस्य । भावनायाश्च सर्वसंम- तत्वात्तां विना सुखस्याप्यसंभवात् । तथोक्तं भगवद्गीतासु-' नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चाsयुक्तस्य भावना । न चाभावयतः शांतिरश-तस्य कुतः सुखम् ॥ ' इति । नारायणतीर्थैरप्युक्तम्-' स्वातंत्र्यस त्यत्वमुखं प्रधाने सत्यं च चिद्भेदगतं च वाक्यैः । व्यासो निराचष्ट न भावनाख्यं योगं स्वयं निर्मितन्त्रह्मसूत्रः ॥ अपि चात्ममदं योगं

व्याकरोन्मतिमान्स्वयम् । भाष्यादिषु ततस्तत्र आचार्यप्रमुखैर्मतः ॥

मतो योगो भगवता गीतायामधिकोऽन्यतः । कृतः शुकादिभिस्त-स्मादत्र संतोऽतिसादराः ॥ ' इति । ' वेदेषु यज्ञेषु तपःसु चैव दानेषु यत्पुण्यफलं प्रदिष्टम् । अत्येति तत्सर्वमिदं विदित्वा योगी परं स्थान-सुपैति चाद्यम् ॥ ' इति भगवदुक्तेः । किं बहुना ' जिज्ञासुरपि यो-गस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते । ' इति वदता भगवता योगजिज्ञासोरप्यौ- कृष्टयं वर्णितं किमुत योगिनः । नारदादिभक्तश्रेष्ठैर्याज्ञवल्क्यादिज्ञा-निमुख्यैश्वास्याः सेवनाद्भक्तज्ञानिनामप्यविरुद्धेत्युपरम्यते ॥ ४ ॥

भाषार्थ -महान् पुरुषोंके माननेसे हठविद्याकी प्रशंसा करते हुये ग्रंथकार अपनेकोभी महत्पुरुषोंसेही हठविद्याका लाभ हुआहै इससे अपनाभी गौरव ( बडाई ) द्योतन करते हैं कि, मत्स्येंद्र और गोरक्ष आदि हठविद्याको निश्च-यसे विशेषकर जानते हैं यहां आद्यशब्दके पढनेसे जालंधरनाथ, भर्तृहरि, गोपीचंद आदि भी जानते हैं यह सूचित किया - अर्थात् साधन, लक्षणभेद, फल इनको भी जानते हैं अथवा स्वात्माराम योगी भी गोरक्षआदिके प्रसादसे हठविद्याको जानता है -और सबके परम महान् ब्रह्मानेभी इस विद्याका सेवन कियाहै इसमें यह योगीयाज्ञवल्क्यकी स्मृति प्रमाण है कि, सबसे पुराने योगके

पृष्ठ 20

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( ) | [ १० हठयोगप्रदीपिका उपदेशः वक्ता हिरण्यगर्भ हैं अन्य नहीं हैं और कहना तभी होता है जब मानसव्यापार ( मनसे विचार ) पहिले होचुका हो वह मानसव्यापार आगम ( वेद ) लेना सोई इस श्रुतिमें लिखा है कि, जिसका मनसे ध्यान करता है उसकोही वाणीसे कहता है - भगवान्ने भी यह विद्या उद्धवआदिभागवतोंके प्रति कहीहै और शिवजी तो योगी प्रसिद्धही हैं -इससे ब्रह्मा विष्णु शिव इन्होंनेभी इस हठयोग- विद्याका सेवन कियाहै —कदाचित् कहो कि, ब्रह्मसूत्रों के कर्ता व्यासने योगका खंडन कियाहै सो ठीक नहीं, क्योंकि प्रकृतिको स्वतंत्र मानते हुये उन्होंने भेदरूप आशंकाका ही खंडन कियाहै कुछ भावना विशेषरूप योगका खंडन नहीं कियाहै- और भावना तो व्यासको भी इससे संमतहै कि, भावनाके विना सुख नहीं होसकता सोई भगवद्गीतामें कहा है जो योगी नहीं है उसको बुद्धि नहीं है और न उसको भावना होती है-और भावनाके विना शांति नहीं होती और शांतिसे योग जिसको नहीं उसको सुख कहाँसे होसकताहै । नारायणतिथोंने भी कहा है कि, स्वतंत्र सत्यता है मुख्य जिसमें ऐसा सत्य जो चेतनके भेद प्रधान ( प्रकृति ) में प्रतीत होताहै उसका खंडन वाक्योंसे व्यासजीने कियाहै कुछ अपने रचेहुये ब्रह्मसूत्रोंसे वर्णन किये भावना नामके योगका खंडन व्यासजीने नहीं कियाहै | और आत्माके प्रापकयोगका कथन बुद्धिमान् व्यासजीने स्वयं किया है और तिसीसे भाव्य आदिमें आचार्यआदिकोंने मानाहै और भगवान् श्रीकृष्ण- चंद्र गीता अधिक योग मानाहै-और शुकदेव आदिकोंने भी योगको रचाहै- तिससे इस योगमें बहुत संतोंका अत्यन्त आदरहै- और भगवान्ने गीतामेंभी कहाहै कि, वेद -यज्ञ -तप -और दान इनमें जो पुण्य फल कहाहै- उस सबको योगी इस योगको जानकर लंघनकरताहै-और उत्तम जो सनातनका स्थान ( ब्रह्म ) है उसको प्राप्त होताहै - और योगको जाननेका अभिलाषी भी शब्द- ब्रह्मसे अधिक होताहै यह कहते हुए भगवान्ने योगके जिज्ञासुको भी उत्तम वर्णन कियाहै-योगी तो उत्तम क्यों न होगा और भक्तोंमें श्रेष्ठ नारद आदि मुनियोंमें मुख्य याज्ञवल्क्य आदिकोंने भी इस हठविद्याका सेवन कियाहै इससे भक्त और ज्ञानियोंकाभी इस विद्याके संग कुछ विरोध नहीं- इससे अधिक वर्णन करनेसे उपरामको प्राप्त होते हैं । भावार्थ-यह है कि, मत्स्येन्द्र और गोरक्षनाथ