हठ योग प्रदीपिका — पृष्ठ 21–30

हठ योग प्रदीपिका · Khemraj Krishna Das · पृष्ठ 21–30

पृष्ठ 21

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] ( ) १. संस्कृतटीका भाषाटीकासमेता । ११ आदि हठविद्याको जानतेहैं और उनकी कृपासे स्वात्माराम योगी ( मैं ) जानताहूँ ॥ ४ ॥

श्रीआदिनाथमत्स्येंद्रशाबरानंदभैरवाः ॥ चौरंगीमीनगोरक्षविरूपाक्षबिलेशयाः ॥ ५ ॥

हठयोगे प्रवृत्तिं जनयितुं हठविद्यया प्राप्तैश्वर्यान्सिद्धानाह-श्री-आदिनाथेत्यादिना ॥ आदिनाथः शिवः सर्वेषां नाथानां प्रथमो नाथः । ततो नाथसंप्रदायः प्रवृत्त इति नाथसंप्रदायिनो वदति । मत्स्येंद्राख्यश्च आदिनाथशिष्यः । अत्रैवं किंवदंती । कदाचिदादि-नाथः कस्मिश्चिद्वीपे स्थितः तत्र विजनमिति मत्वा गिरिजायै । योगमुपदिष्टवान् । तीरसमीपनीरस्थः कश्चन मत्स्यः तं योगोपदेशं श्रुत्वा एकाग्रचित्तो निश्चलकायोऽवतस्थे । तं तादृशं दृष्ट्वानेन योगः श्रुत इति तं मत्वा कृपालुरादिनाथो जलेन प्रोक्षितवान् । स च प्रोक्षणमात्राद्दिव्यकायो मत्स्येंद्र: सिद्धोऽभूत् । तमेव मत्स्येंद्रनाथ इति वदति । शाबरनामा कश्चित्सिद्धः । आनंदभैरवनामान्यः । एतेषामितरेतरद्वंद्वः । छिन्नहस्तपादं पुरुषं हिंदुस्थानभाषायां चौरं- गीति वदति । कदाचिदादिनाथाल्लब्धयोगस्य भुवं पर्यटतो मत्स्येंद्र- नाथस्य कृपावलोकनमात्रात्कुत्रचिदरण्ये स्थितश्चौरंग्यंकुरितहस्तपादो बभूव । स च तत्कृपया संजातहस्तपादोऽहमिति मत्वा तत्पादयोः प्रणिपत्य ममानुग्रहं कुर्विति प्रार्थितवान् । मत्स्येंद्रोपि तमनुगृहीत- वान् तस्यानुग्रहान्चौरंगीति प्रसिद्धः सिद्धः सोऽभूत् । मीनो मीन- नाथः गोरक्षो गोरक्षनाथः विरूपाक्षनामा बिलेशयनामा च । चौरंगी प्रभृतीनां द्वंद्वसमासः ॥ ५ ॥

भाषार्थ- अब हठयोगमें श्रोताओंकी प्रवृत्तिके हेतु उन सिद्धोंका वर्णन करते हैं कि, जिनको हठविद्यासे ऐश्वर्य मिलाहै और श्रीआदिनाथ अर्थात् ब नाथोंमें प्रथम शिवजी, शिवजीसेही नाथसंप्रदाय चलाहै । यह नाथसंप्रदायी लोग • कहतेहैं —और उनके शिष्य मत्स्येन्द्र- यहां यह इतिहास है किसी समयमें आदि-

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( ) [: १२ हठयोगप्रदीपिका । उपदेश -नाथ किसी द्वीपमें स्थित थे वहां जनरहित देश समझकर पार्वतीके प्रति योगका उपदेश करतेथे तीरके समीप जलमें टिकाहुआ कोई मत्स्य उस योगोपदेशको सुनकर एकाग्रचित्त होकर निश्चल देह टिकताभया । निश्चलकाय उस मत्स्यको -देखकर और इसने योगका श्रवण किया यह मानकर कृपालु आदिनाथजीने उसके ऊपर जलका सिंचन किया प्रोक्षण करनेसेही वह मत्स्येन्द्र सिद्ध होगया उसकोही -मत्स्येन्द्रनाथ कहतेहैं । और शावर नामका सिद्ध और आनंदभैरव और चौरंगी सिद्ध किसी समय आदिनाथसे मिलाहै योग जिनको ऐसे योगेन्द्रनाथ भूमिमें रटतेथे उन्होंने कृणसे किसी वनमें टिकेहुए चौरंगीको देखा उनके देखनेसेही चौरंगीके हाथ और पाद जम आये क्योंकि हिंदुस्थानकी भाषामें जिसके हाथ पैर कटजांय उसे चौरंगी कहते हैं वह चौरंगी इन्हींकी कृपासे मेरे हाथ पैर हुए हैं यह मानकर उनके चरणोंमें प्रणाम करके यह प्रार्थना करता भया कि, -मेरे ऊपर अनुग्रह करो । मत्स्येन्द्रने भी उसके ऊपर अनुग्रह किया उससे वह चौरंगी नामका सिद्ध प्रसिद्ध भया । और मीननाथ, गोरक्षनाथ, विरूपाक्षनाथ, बिलेशयनाथ ये सिद्ध हठयोगविद्याके हुए और ॥ ५ ॥

मंथानो भैरवो योगी सिद्धिर्बुद्धश्व कंथडिः ॥ कोरंटकः सुरानंदः सिद्विपादश्च चर्पटिः ॥ ६ ॥

कानेरी पूज्यपादश्च नित्यनाथो निरंजनः ॥ कपाली बिंदुनाथश्च काकचंडीश्वराह्वयः ॥ ७ ॥

अल्लामः प्रभुदेवश्च घोडा चोली च टिंटिणिः ॥ भानुकी नारदेवश्व खंडः कापालिकस्तथा ॥ ८ ॥

इत्यादयो महासिद्धा हठयोगप्रभावतः ॥ खंडयित्वा कालदंड ब्रह्मांडे विचरंति ते ॥ ९ ॥

मन्धान इति ॥ मंथानः भैरवः योगीति मंथानप्रभृतीनां सर्वेषां विशेषणम् ॥ ६ ॥ कानेरीति ॥ काकचंडीश्वर इत्याह्नयो नाम

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] - ( ) १. संस्कृतटीका भाषाटीकासमेता । १३ यस्य स तथा । अन्ये स्पष्टाः ॥ ७ ॥ अल्लाम इति ॥ तथाशब्दः

समुच्चये ॥ ८ ॥ इत्यादय इति ॥ इति पूर्वोक्ता आदयो येषां

ते तथा । आदिशब्देन तारानाथादयो ग्राह्याः । महांतश्च ते सिद्धाश्च अप्रतिहतैश्वर्या इत्यर्थः । हठयोगस्य प्रभावात्सामर्थ्यादिति हठयोग-प्रभावतः । पंचम्यास्तसिल् । कालो मृत्युः तस्य दंडनं दंड: देह--प्राणवियोगानुकूलो व्यापारः तं खंडयित्वा छित्त्वा । मृत्युं जित्वे- त्यर्थः । ब्रह्मांडमध्ये विचरंति विशेषेणाव्याहतगत्या चरंतीत्यर्थः । तदुक्तं भागवते-' योगेश्वराणां गतिमाहुरंतर्बहित्रिलोक्याः पवनांत- रात्मनाम्' इति ॥ ९ ॥

भाषार्थ-मन्थान- भैरव- सिद्धि- बुद्ध- कन्थडि- कोरंटक - सुरानंद- सिद्ध-पाद -चर्पटी-कानेरी- पूज्यपाद -नित्यनाथ-निरंजन -कपाली- विन्दुनाथ- काकचण्डीश्वर- अल्लाम--प्रभु-देव-घोडा-चोली -टिटिणि भानुकी-नारदेव खण्ड कापालिक ॥ ६ ॥ ७ ॥ ८ ॥

इत्यादि पूर्वोक्त महासिद्ध यहां आदिपदसे तारानाथ आदि लेने हठयोगके. प्रभावसे कालके दण्डको खण्डन करके अर्थात् देह और प्राण वियोगके जनक. मृत्युको जीतकर ब्रह्मांडके मध्यमें विचरतेहैं अर्थात् अपनी इच्छाके अनुसार ब्रह्मांडमें चाहें जहां जा सकते हैं सोई भागवतमें इस चचनसे कहाहै कि, पव- के मध्यमें है मन जिनका ऐसे योगीश्वरोंकी गति त्रिलोकीके भीतर और बाहर होती है ॥ ९ ॥

अशेषतापतप्तानां समाश्रयमठो हठः ॥ अशेषयोगयुक्तानामाधारकमठो हठः ॥ १० ॥

हठस्याशेषतापनाशकत्वमशेषयोगसाधकत्वं च मठकमठरूपके-णाह-अशेषेति ॥ अशेषाः आध्यात्मिकाधिभौतिकाधिदैविकभेदेन त्रिविधाः । तत्राध्यात्मिकं द्विविधम् । शारीरं मानसं च तत्र शारीरं दुःखं व्याधिजं मानसं दुःखं कामादिजम् । आधिभौतिकं व्याघ्र-सर्पादिजनितम् | आधिदैविकं ग्रहादिजनितम् । ते च ते तापाश्च चैस्तप्तानां संतप्तानां पुंसां हठो हठयोगः सम्यगाश्रीयत इति समा-

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( ) | [ १४ हठयोगप्रदीपिका उपदेशः श्रयः आश्रयः आश्रयभूतो मठः मठ एव । तथा हठः अशेषयोगयु-क्तानां अशेषयोगयुक्ताः मंत्रयोगकर्मयोगादियुक्तास्तेषामाधारभूतः कमठः एवम् । त्रिविधतापतप्तानां पुंसाम् आश्रयो हठः । यथा च विश्वाधारः कमठः एवं निखिलयोगिनामाधारो हठ इत्यर्थः ॥ १० ॥

भाषार्थ - अब हठयोगको संपूर्ण तापोंका नाशक और संपूर्ण योगोंका साधक मठ कमठरूपसे वर्णन करते हैं कि, संपूर्ण जो आध्यात्मिक आधिभौतिक आधिदैविक तीन प्रकारके ताप उनसे तपायमान मनुष्योंको हठयोग समानय -मठ ( रहनेका घर) रूपहै । उन तापोंमें आध्यात्मिक ताप दोप्रकारका है-=शारीर और मानस । उनमें शरीरका दुःख व्याधिसे होताहै और मनका दुःख काम आदिसे होताहै और व्याघ्र सर्प आदिसे उत्पन्न हुए दुःखको आधिभौतिक कहतेहैं और सूर्य आदि ग्रहोंसे उत्पन्न हुये दुःखको आधिदैविक कहते हैं इन तीन प्रकारके तापसे तप्तमनुष्योंको हठयोग इसप्रकार सुखदायीहै । जैसे सूर्यसे -तपायमान मनुष्योंको घर होताहै और अशेष ( संपूर्ण ) योगोंसे युक्त जो पुरुषहै उनका आधार इसप्रकार हठयोग है जैसे संपूर्ण जगत्का आधार कमठ है अर्थात्कच्छपरूप भगवानुरूप है । भावार्थ यहहै कि, संपूर्ण तापोंसे तपाय- -मान मनुष्योंका आश्रय मठरूप और संपूर्ण योगियोंका आधार ( आश्रय ) कमरूप हठयोग है ॥ १० ॥

हठविद्या परं गोप्या योगिना सिद्धिमिच्छता ॥ भवेद्वीर्यवती गुप्ता निर्वीर्या तु प्रकाशिता ॥ ११ ॥

अथाखिलविद्यापेक्षया हठविद्याया अतिगोप्यत्वमाह-हठविद्येति॥ सिद्धिमणिमाद्यैश्वर्यमिच्छता यद्वा सिद्धिं कैवल्यसिद्धिमिच्छता वां-च्छता योगिना हठयोगविद्या परमत्यंतं गोप्या गोपनाया गोपनार्हा-स्तीति । तत्र हेतुमाह यतो गुप्ता हठविद्या वीर्यवत्यप्रतिहतैश्वर्यज- ननसमर्था स्यात् । कैवल्यजननसमर्था कैवल्यसिद्धिजननसमर्था वा स्यात् । अथ योगाधिकारी । 'जिताक्षाय शांताय सक्ताय मुक्तौ विहीनाय दोषैरसक्ताय मुक्तौ । अहीनाय दोषेतरैरुक्तकर्त्रे प्रदेयोन

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] - ( ) १. संस्कृतटीका भापाटीकासमेता । १५ देयो हठश्चेतरस्मै ॥ ' याज्ञवल्क्यः -' विध्युक्तकर्मसंयुक्तः कामसंकल्प-वर्जितः । यमैश्च नियमैर्युक्तः सर्वसंगविवर्जितः ॥ कृतविद्यो जित-क्रोधः सत्यधर्मपरायणः । गुरुशुश्रूषणरतः पितृमातृपरायणः ॥ -स्वाश्रमस्थः सदाचारो विद्वद्भिश्च सुशिक्षितः ॥ ' इति । 'शिश्नोदर--रतायैव न देयं वेषधारिणे' इति कुत्रचित् । अत्र योगचिंतामणि- काराः यद्यपि-' ब्राह्मणक्षत्रियविशां स्त्रीशूद्राणां च पावनम् । शांतये कर्मणामन्यद्योगान्नास्ति विमुक्तये || ' इत्यादि पुराणवाक्येषु प्राणि- मात्रस्य योगेऽधिकार उपलभ्यते । तथापि मोक्षरूपं फलं योगे विरक्तस्यैव भवति । अतस्तस्यैव योगाधिकार उचितः । तथा च वायुसंहितायाम्-' दृष्टे तथानुश्रविके विरक्तं विषये मनः । यस्य तस्याधिकारोऽस्मिन्योगे नान्यस्य कस्यचित् ॥ ' सुरेश्वराचार्याः-. "इहामुत्र विरक्तस्य संसारं प्रजिहासतः । जिज्ञासोरेव कस्यापि योगेऽ- स्मिन्नधिकारिता ॥ ' इत्याहुः । वृद्धैरप्युक्तम्-" नैतद्देयं दुर्विनीताय जातु ज्ञानं गुप्तं तद्धि सम्यक्फलाय । अस्थाने हि स्थाप्यमानैव वाचां देवी कोपान्निर्दहेनो चिराय ॥ ' इति ॥ ११ ॥

भाषार्थ - अत्र संपूर्ण विद्याओंकी अपेक्षा हठयोग विद्याको अत्यंत गुप्त करने योग्य वर्णन करते हैं-सिद्धि अर्थात् अणिमा आदि ऐश्वर्य वा मोक्षके अभिलाषी योगीको हठविद्या अत्यंत गुप्त करने योग्यहै क्योंकि, गुप्त कीहुई हलविद्या वीर्यवाली होती है अर्थात् ऐसे ऐश्वर्यको पैदा करती है कि, जो कदा- चित् न डिगसकें और प्रकाश करनेसे वीर्यसे रहित हो जाती है अब प्रसंगसे योगके अधिकारीका वर्णन करते हैं कि जितेन्द्रिय शान्त भोगोंमें आसक्त न हो और दोषोंसे रहितहो और मुक्तिका अभिलाषी हो और दोषोंसे अन्य जो संसारके धर्म हैं उनसे हीन न हो और आज्ञाकारी हो उसको ही हठयोगविद्या देनी अन्यको नहीं । याज्ञवल्क्यने भी कहाहै कि, शास्त्रोक्त कर्मोंसे युक्त कामना और संकल्पसे रहित यम और नियमसे युक्त और संपूर्ण संगोंसे वर्जित और 'विद्यासे युक्त क्रोधरहित सत्य और धर्ममें परायण गुरुकी सेवामें रत पिता और साताका भक्त अपने गृहस्थ आदि आश्रममें स्थित श्रेष्ठ आचारी और विद्वानोंने

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( ) [: १६ हठयोगप्रदीपिका । उपदेश जिसको भलीप्रकार शिक्षा दी हो ऐसा पुरुष योगका अधिकारी होताहै और यह भी कहीं लिखा है कि, जो योगीका वेषधारी कामदेव और उदरके वशीभूत हो उसको योगका उपदेश न करे । इस विषयमें योगचिंतामणिके कर्ता तो यह कहतेहैं कि, यद्यपि इत्यादि पुराणवचनोंमें प्राणिमात्रको योगमें अधिकार मिलताहै कि, ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र स्त्री इनको पवित्र करनेवाला कर्मोंकी शांतिके लिये और मुक्त अर्थ योगसे अन्य नहीं है तो भी मोक्षरूप जो फलहै वह योगसे विरक्त- कोही होताहै इससे विरक्तकोही योगका अधिकार उचितहै सोई वायुसंहितामें लिखाहै कि, लौकिक और वेदोक्त विषयोंमें जिसका मन विरक्त है उसकाही इस योग में अधिकार है अन्य किसीफा नहीं है । सुरेश्वराचार्यने भी कहाहै कि, इस लोक और परलोकके विषयोंमें जो विरक्त मनुष्य संसारके त्यागका अभिलाषी है ऐसे किसीही जिज्ञासु पुरुषका योगमें अधिकारहै-इति । वृद्धोंने भी कहा है कि, यह योग दुर्विनीत ( क्रोधी ) को कदाचित् न देना क्योंकि गुप्त रक्खाहुआ योग भली प्रकारके फलको देताहै और अस्थान ( कुपात्र ) में स्थापन करतेही क्रोधहुयी वाणी उसी समय दग्ध करती है कुछ चिरकालमें नहीं, भावार्थ यह है कि, सिद्धिका अभिलाषी योगी हठविद्याको भलीप्रकार गुप्त रक्खै क्योंकि गुह रखनेसे वीर्यवाली और प्रकाश करनेसे वीर्यरहित होती है ॥ ११ । सुराज्ये धार्मिके देशे सुभिक्षे निरुपद्रवे ॥ धनुःप्रमाणपर्यंतं शिलाग्निजलवर्जिते ॥ एकांते मठिकामध्ये स्थातव्यं हठयोगिना ॥ १२ ॥

अथ हठाभ्यासयोग्यं देशमाह सार्धेन सुराज्य इति ॥ राज्ञः कर्म भावो वा राज्यं तच्छोभनं यस्मिन्स सुराज्यस्तस्मिन्सुराज्ये । यथा राजा तथा प्रजा ' इति महदुक्तेः राज्ञः शोभनत्वात्प्रजानामपि शोभनत्वं सूचितम् । धार्मिके धर्मवति । अनेन हठाभ्यासिनोऽनुकू- लाहारादिलाभः सूचितः । सुभिक्ष इत्यनेनानायासेन तल्लाभः सूचितः । निरुपद्रवे चौरव्याघ्राद्युपद्रवरहिते । एतेन देशस्य दीर्घकालवासयो- ग्यता सूचिता । धनुषः प्रमाणं धनुःप्रमाणं चतुर्हस्तमात्रं तत्पर्यंत

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] - ( ) १. संस्कृतटीका भाषाटीकासमेता । १७ शिलाग्निजलवर्जिते शिला प्रस्तरः अग्निर्वह्निः जलं तोयं तैर्वजिते रहिते यत्रासनं ततश्चतुर्हस्तमात्रे शिलाग्निजलानि न स्युरित्यर्थः । तेन शीतोष्णविकाराभावः सूचितः । एकांते विजने । अनेन जनसमागमा- भावात्कलहाद्यभावः सूचितः | जनसंमर्दे तु कलहादिकं स्यादेव । तदुक्तं भागवते-' वासे बहूनां कलहो भवेद्वार्ता द्वयोरपि ' इति । तादृशे मठिकामध्ये । अल्पो मठो मठिका । अल्पीयसि कन् । तस्याः मध्ये हठयोगिना हठाभ्यासी योगी हठयोगी तेन । शाकपार्थिवादि-वत्समासः । स्थातव्यं स्थातुं योग्यम् । मठिकामध्य इत्यनेन शीता-तपादिजनितक्लेशाभावः सूचितः । अत्र ' युक्ताहारविहारेण हठयो- गस्य सिद्धये । ' इत्यर्ध केनचित्क्षिप्तत्वान्न व्याख्यातम् । मूलश्लो-कानामेव व्याख्यानम् । एवमग्रेऽपि ये मया न व्याख्याताः श्लोका हठप्रदीपिकायामुपलभ्येरंस्ते सर्वे क्षिप्ता इति बोद्धव्यम् ॥ १२ ॥

भाषार्थ -अब डेढ श्लोकसे हठयोगाभ्यासके योग्यदेशका वर्णन करतेहैं कि, जिस देशमें अच्छा राजा हो क्योंकि जैसा राजा वैसीही प्रजा इस महान् पुरुषोंके वचनसे शोभन राजाके होनेपर प्रजाभी शोभन होगी यह सूचित समझना । और जो देश धर्मवान् हो इससे यह सूचित किया कि, धार्मिक देशमें हठयोगके अभ्यासीको अनुकूल भोजन आदिका लाभ होता रहेगा और जिस देशमें भिक्षा अच्छी मिलती हो इससे यह सूचित किया कि, विना परिश्रम भिक्षाका लाभ होगा और जो चोर और व्याघ्र आदिके उपद्रवोंसे रहित हो इससे यह सूचित किया कि, वह देश दीर्घ कालतक वसने योग्य है और जहां आसन हो उसके चारों तरफ धनुष प्रमाण पर्यंत ( ४ हाथभर ) शि अनि जल ये नहीं इससे शीत उष्णके विकार का अभाव सूचित किया और जो एकांत ( विजन ) हो इससे जनोंके समागमाभावसे कलहआदिका अभाव सूचित किया, क्योंकि जहां जनोंका समूह होताहै वहां कलह आदि होतेहीहैं सोई भागवतमें कहाहै कि, बहुत मनुष्योंके वासमें कलह होताहै और दोमनुष्योंकी भी बात होने लगतीहै ऐसे पूर्वोक्त देशमें जो मठिका ( छोटा गृह)

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( ) [: १८ हठयोगप्रदीपिका । उपदेश उसके मध्यमें हठयोगका अभ्यासी योगी अपनी स्थिति करने योग्यहै इससे शीत धूप आदिके क्लेशका अभाव सूचित किया । यहां किसीने यह आधाइलोक प्रक्षिप्त ( बनाकर ) लिखा है उसका हमने अर्थ नहीं लिखा कि, वह प्रक्षिप्त है, क्योंकि मूलके श्लोकोंकाही व्याख्यान हमने कियाहै इसी प्रकार आगे भी जिन' श्लोकोंका हमने व्याख्यान नहीं किया और वे हठदीपिकामें मिलजांय तो बे सन प्रक्षिप्त जानने । भावार्थ यह है कि, जहाँ सुंदरराज्य हो जो धार्मिक हो जहाँ सुभिक्ष हो उपद्रव न हो और जहां धनुषके प्रमाणपर्यंत शिला अग्नि जल ये न हों और जो एकांत हो ऐसे देशमें छोटासा मठ बनाकर हठयोगी रहै ॥ १२ ॥

अल्पद्वारमरंध्रगर्तविवरं नात्युच्चनीचायतं सम्यग्गोमयसांद्रलिप्तममलं निःशेषजंतूज्झितम् ॥ बाह्ये मंडपवेदिकूपरुचिरं प्राकारसंवेष्टितं प्रोक्तंयोगमठस्यलक्षणमिदंसिद्धैर्हठाभ्यासिभिः १३ अथ मठलक्षणमाह-अल्पद्वारमिति ॥ अल्पं द्वारं यरिंमस्त- तादृशम् । रंध्रो गवाक्षादिः गर्यो निम्नप्रदेशः विवरो मूषकादिबिलं ते न संति यस्मिंस्तत्तादृशम् । अत्युच्चं च तन्नीचं चात्युञ्चनीचं तच तदायतं चात्युच्चनीचायतम् । विशेषणं विशेष्येण बहुलमित्यत्र बहुलग्रहणाद्विशेषणानां कर्मधारयः । ननूच्चनीचायतशब्दानां भिन्नार्थ- कानां कथं कर्मधारयः । तत्पुरुषः समानाधिकरणः कर्मधारय इति तलक्षणादिति चेन्न । मठे तेषां सामानाधिकरण्यासंभवात् । न चात्युच्चनीचायतं नात्युच्चनीचायतं नशब्देन समासान्नलोपाभावः नेति पृथक पदं वा । अत्युच्चे आरोहणे श्रमः स्यादतिनीचेऽवरोहणे श्रमो भवेत् । अत्यायते दूरं दृष्टिर्गच्छेत्तन्निराकरणार्थमुक्तं नात्युच्च- नीचायतमिति । सम्यक्समीचीनतया गोमयेन गोपुरीषेण सांद्र यथा भवति तथा लिप्तम् । अमलं निर्मलं निःशेषा निखिला ये जंतवो मशक मत्कुणाद्यास्तैरुज्झितं त्यक्तं रहितं वाह्ये मठाद्बहिः प्रदेशे मंडप

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] - ( ) १. संस्कृतटीका भाषाटीकासमेता । १ ९ शालाविशेषः वेदिः परिष्कृता भूमिः कूपो जलाशयविशेषः तै रुचिरं रमणीयं प्राकारेण वरणेन सम्यग्वेष्टितं परितो भित्तियुक्तमि- त्यर्थः । हठाभ्यासिभिः हठयोगाभ्यसनशीलैः सिद्धैः । इदं पूर्वोक्त- मल्पद्वारादिकं योगमठस्य लक्षणं स्वरूपं प्रोक्तं कथितम् । नंदिकेश्वर- पुराणे त्वेवं मठलक्षणमुक्तम्- ' मंदिरं रम्यविन्यासं मनोज्ञं गंधवा- सितम् । धूपामोदादिसुरभि कुसुमोत्करमंडितम् ॥ मुनितीर्थनदी- वृक्षपद्मिनीशैलशोभितम् । चित्रकर्मनिबद्धं च चित्रभेदविचित्रितम् ॥ कुर्याद्योगगृहं धीमान्सुरम्यं शुभवर्त्मना । दृष्ट्वा चित्रगताञ्छता- न्मुनीन्याति मनः शमम् ॥ सिद्धान्दृष्ट्रा चित्रगतान्मतिरभ्युद्यमें भवेत् । मध्ये योगगृहस्याथ लिखेत्संसारमंडलम् ॥ श्मशानं च महाघोरं नरकांश्च लिखेत्कचित् । तान्दृष्ट्रा भीषणाकारान्संसारे सार- वर्जिते ॥ अनवसादो भवति योगी सिद्धयभिलाषुकः । पश्यंश्च व्याधितान् जंतून्नतान्मत्तांश्चलणान् ॥ १३ ॥

भाषार्थ- अब मठके लक्षणका वर्णन करतेहैं कि, जिसका छोटा द्वार हो और जिसमें गवाक्ष आदि रंध्र ( छिद्र ) न हों और गर्त ( गढा ) न हो और जिसमें मूसे आदिका विवर ( बिल ) न हो और न अत्यन्त ऊँचाहो और न अत्यन्त नीचाहो और न अत्यन्त विस्तारसे युक्त हो क्योंकि अत्यंत ऊंचेपर चढनेमें और अत्यन्त नीचेसे उतरनेमें श्रम होताहै और अत्यन्त विस्तार संयुक्त दूर दृष्टि जातीहै इससे इन सब आसनोंका निषेध कियाहै । कदा- चित् कहो कि, अत्युच्च नीच आयत इन तीनों शब्दोंका अर्थ भिन्न २ है इससे -इनका कर्मचारय समास कैसे होगा क्योंकि कर्मधारयसमास उन पदोंका हुआ करहै जिनका अर्थ एक हुआ करताहै सोई इस सूत्रमें लिखाहै कि, समानाधि-करण तत्पुरुषको कर्मधारय कहते हैं सो ठीक नहीं क्योंकि मठमें तीनों पदोंका -सामानाधिकरण्य है अर्थात् अत्युच्च नीच आयतरूप जो मठ उससे भिन्न मठ हो क्योंकि अत्युच्चनीचआयत शब्दके संग नशब्दको समास होताहै और न नहीं होता अथवा न यह पृथकूही पद है- इससे यह विशेषण विशेष्यके संग समासको प्राप्त होताहै इस सूत्रसे कर्मधारय समास करनेमें कोई भी शंका नहीं है!

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( ) [ २० हठयोगप्रदीपिका । उपदेशः और जो मठ भलीप्रकार चिकने गोबरले लिपा हो और निर्मल ( स्वच्छ ) हो और जो मशक मत्कुण आदि जंतुओंसे रहित हो और जो मठके बाहर देशमें मंडप वेदी कूप इनसे शोभित हो और जो भलीप्रकार प्राकार ( परकोटा ) से वेष्टित ( भीतसे युक्त ) हो - यह पूर्वोक्त योगमठका लक्षण हठयोगके अभ्यास करनेवाले सिद्धोंने कहाहै । नंदिकेश्वर पुराणमें तो यह मठका लक्षण कहाहै कि, जिस मंदिरकी रचना,रमणीय हो, जो मनको प्रिय हो, सुगंधितहो, धूपकी अत्यन्तगंध गंध पुष्पोंके समूहसे मंडित हो और जो मुनि तीर्थ नदी वृक्ष कमलिनी पर्वत इनसे शोभित हो और जिसमें चित्राम निकसेहों और जो चित्रोंके भेदसे विचित्र हो बुद्धिमान् मनुष्य ऐसे रमणीय योग घरको शुभ मार्गसे करै- क्योंकि चित्रामों में लिखे शांत मुनियोंको देखकर मन शांत होताहै और चित्रामोंके सिद्धोंको देखकर बुद्धिमें उद्यम बढताहै । योगवरके मध्यमें संसारके मंडलको लिखे और कहीं २ इमशान और घोर नरकोंको लिखे क्योंकि उन भयानक नरकोंको देखकर सिद्धिके अभिलाषी योगीको असार संसारमें अनवसाद ( अनिश्चय ) होताहै क्योंकि नरकोंमें रोगी उन्मत्त व्रणी ( घाववाले ) जंतु दीखतेहैं — अर्थात् योगमें प्रवृत्ति न होगी तो ऐसेही नरक मुझे भी मिलेंगे । भावार्थ यह है कि, जिसका छोटासा द्वारहो जिसमें छिद्र गढे बिल न हों और जो अत्यन्त ऊंचा विस्तृत न हो और जो भलीप्रकार चिकने गोमयसे लिपाहो और जो स्वच्छ हो और जिसमें कोई जीव न हो और जिसके बाहर मंडपवेदी कूप हों और शोभित हो और जिसके चारों तर्फ प्राकार ( भींत ) हो यह योग मठका लक्षण हठयोगके अभ्यास कर्ता सिद्धोंने कहाहै ॥ १३ ॥

एवंविधे मठे स्थित्वा सर्वचिंताविवर्जितः ॥ गुरूपदिष्टमार्गेण योगमेव समभ्यसेत् ॥ १४ ॥

मलक्षणमुक्त्वा मठे यत्कर्तव्यं तदाह-एवंविध इति ॥ एवं पूर्वोक्ता विधा प्रकारो यस्य तथा पूर्वोक्तलक्षण इत्यर्थः । तस्मिस्थित्वा स्थितिं कृत्वा सर्वायाश्चितास्ताभिर्विशेषेण वर्जितो रहितोऽशेष- चिन्तारहितः । गुरुणोपदिष्टो यो मार्गः हठाभ्यासप्रकाररूपस्तेन