हठ योग प्रदीपिका — पृष्ठ 281–288
हठ योग प्रदीपिका · Khemraj Krishna Das · पृष्ठ 281–288
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8. ] - ( ) संस्कृतटीका भाषाटीकासमेता । २७१ पूर्वकसजातीयप्रत्ययप्रवाहरूपस्य निदिध्यासनस्य उक्तलक्षणे ध्यानेंऽ-तर्भावः । तस्यापि तत्परिपाकरूपसमाधिनात्मसाक्षात्कारद्वारा मोक्ष-हेतुत्वमीश्वरार्पणबुद्धया निष्कामकर्मानुष्ठानलक्षणस्य कर्मयोगस्य 'तपःस्याध्यायेश्वरप्रणिधानानि क्रियायोगः ' इति पतंजलिप्रोक्ते नियमांतर्गत क्रियायोगेंऽतर्भावः । तत्र तप उक्तमीश्वरगीतायाम्-'उपवासपराकादिकृच्छ्रचांद्रायणादिभिः । शरीरशोषणं प्राहुस्तापसा- स्तप उत्तमम् ॥ ' इति । स्वाध्यायोऽपि तत्रोक्तः -'वेदांतशतरुद्रीय- प्रणवादिजपं बुधाः । सत्त्वशुद्धिकरं पुंसां स्वाध्यायं परिचक्षते ॥ ' इति । ईश्वरप्रणिधानं च तत्रोक्तम्-'स्तुतिस्मरणपूजाभिर्वाङ्मनःकाय- कर्मभिः । सुनिश्चला भवेद्भक्तिरेतदीश्वरपूजनम् ॥ ' इति । क्रियायो- गश्च परंपरा समाधिनात्मसाक्षात्कारद्वारेव मोक्षहेतुरिति समाधि- भावनार्थः । क्लेशतनूकरणार्थश्चेत्युत्तरसूत्रेण स्पष्टीकृतं पतंजलिना । भजते सेव्यते भगवदाकारमंतःकरणं क्रियतेऽनयेति भक्तिरिति करणव्युत्पत्त्या ' श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम् । अर्चनं चंदनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम् ॥ इति । नवधोक्ता साधनभक्तिर- भिधीयते । तस्या ईश्वरप्रणिधानरूपे नियमेंतर्भावः । तस्याश्च समा- धिहेतुत्वं चोक्तं पतंजलिना -'ईश्वरप्रणिधानाद्वा' इति । ईश्वरविषय- कात्प्रणिधानाद्भक्तिविशेषात्समाधिलाभः समाधिफलं भवतीति सूत्रार्थः । भजनमंतःकरणस्य भगवदाकारतारूपं भक्तिरिति भावव्यु- त्पत्त्या फलभूता भक्तिरभिधीयते सैव प्रेमभक्तिरित्युच्यते । तल्ल- क्षणमुक्तं नारायणतीर्थैः - 'प्रेमभक्तियोगस्तु ईश्वरचरणारविंदविषयकै- कांतिकात्यंतिकप्रेमप्रवाहोऽविच्छिन्नः' इति । मधुसूदनसरस्वती- भिस्तु-' द्रवीभावपूर्विका मनसो भगवदाकारतारूपा सविकल्पकवृत्ति- भक्तिः' इति । 'तस्यास्तु श्रद्धाभक्तिध्यानयोगादवेहि' इति श्रुतेः । 'भक्त्या मामभिजानाति' इति स्मृतेश्च । आत्मसाक्षात्कारद्वारा मोक्षहेतुत्वम् । भक्तास्तु सुखस्यैव पुरुषार्थत्वाद्दुःखासंभिन्ननिरति-
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( ) [ २७२ हठयोगप्रदीपिका । उपदेशः शयसुखदारारूपा प्रेमभक्तिरेव पुरुषार्थ इत्याहुः । तस्यास्तु संप्रज्ञात-समाधावंतर्भावः । एवं च अष्टांगयोगातिरिक्तं किमपि परमपुरुषार्थ-साधनं नास्तीतिसिद्धम् ॥ ११४ ॥
ग्राह्यमेव विदुषां हितं यतो भाषणं समयदर्यसंस्कृतम् ।
रक्ष गच्छति पयो न लेहितं ह्यंव इत्यभिहितं शिशोर्यथा ॥ १ ॥
सदर्थद्योतनकरी तमःस्तोमविनाशिनी ॥
ब्रह्मानंदेन ज्योत्स्त्रेयं शिवांघ्रियुगलेऽर्पिता ॥ २ ॥
इति श्रीहठयोगप्रदीपिकाव्याख्यायां ब्रह्मानंदकृतायां ज्योत्स्नाभिधायां समाधिनिरूपणं नाम चतुर्थोपदेशः ॥ ४ ॥
टीकाग्रंथसंख्या २४५० ॥ भाषार्थ-[ -अब अयोगियोंको ज्ञानका निराकरण करतेहुए योगियोंकोही ज्ञानकी उत्पत्तिका वर्णन करते हैं कि, जबतक सुपुम्नाके मार्गमें बहताहुआ प्राणवायु ब्रह्मरंध्रमें प्रविष्ट होकर स्थिर नहीं होता, क्योंकि सुषुम्नामें नहीं बहते हुए प्राणवायुको असिद्ध कहतेहैं. सोई अमृतसिद्धिमें कहा है कि, जबतक अपने मार्गसे वायु सुषुम्नामें प्राप्त होकर निश्चल न हो-कर्मवशके अनुयायी उस वायुको असिद्ध जाने और जीवनका आधाररूप जो प्राण उसके दृढबंधन अर्थात् कुंभ- कसे दृढ करनेसे जबतक बिंदु ( वीर्य ) स्थिर नहीं होताहै और प्राणवायुकी स्थिरतासे बिंदुकी स्थिरता इसी ग्रंथमें कह आयेहैं कि, मनकी स्थिरतासे वायु और वायुकी स्थिरतासे बिंदुकी स्थिरता होतीहै वह न होय तो योगी असिद्ध होताहै सोई अमृतसिद्धिमें कहा है कि, तबतक वृद्ध और असिद्ध यह सांसारिक जन मानाहै इतने रसेंद्र जो ब्रह्मरूप है वह देहमें स्थित हो अर्थात्अपने स्थानसे पतित होकर देहमें आजाय और ब्रह्मचर्यसे हीन उस मनुष्यको असिद्ध जानै और जरामरणसे युक्त और संपूर्ण क्लेशोंका आश्रय होताहै और जबतक चित्तरूप तत्त्वध्यानमें ध्येय चित्त नहीं होताहै अर्थात् स्वाभाविक ध्येयाकार जो वृत्ति-योंका प्रवाह उससे सहज सदृश प्राणके बंधनसे नहीं होताहै और वायुकी स्थिरतासे चित्तकी स्थिरता अमृतसिद्धिनें कही है कि, जब यह वायु सुषुम्नाके
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8.1 - ( ) संस्कृतटीका भाषाटीकासमेता ॥ २७३ योगसे मध्यमामें प्रविष्ट होजाताहै तब बिंदु और चित्त ये दोनों वायुके संग होकर मरजातेहैं और इसके अभावमें असिद्धताभी अमृतसिद्धिमें कही है कि, इतने बाह्य और भीतरकी वस्तुमें चित्तका स्पंदन ( चेष्टा ) होताहै, कर्मके गुणोंसे युक्त उस चित्तको असिद्ध जाने तबतक सो यह ज्ञान दंभमिथ्याप्रलाप होताहै अर्थात् मैं जगत्में पूज्य हूंगा इसप्रकार दंभपूर्वक ज्ञानके कथनसे बुद्धिसे मिथ्या-भाषणही होताहै क्योंकि प्राण, बिंदु, चित्त इनके जयके अभावसे ज्ञानका अभाव होताहै और उससे जन्ममरणरूप संसारकी निवृत्ति नहीं होसकतीहै सोई अमृत-सिद्धिमें कहा है कि, जब यह प्राणवायु चलताहै तब बिंदुभी चल कहाहै और जिसके अन्नमें बिंदु चंचल है उसका चित्तभी चंचल होताहै और बिंदु, चित्त, वायु इन तीनोंके चंचल होनेपर संपूर्ण जगत्उत्पन्न होताहै और मरताहै, यह वचन सत्य है योगबीजमेंभी कहा है कि, यदि चित्त नष्ट हुआ भासै तो वहां वायुकाभी नाश प्रतीत होताहै यदि चित्त वायुका नाश न होय तो उसको शास्त्रका ज्ञान और आत्माकी प्रतीति और गुरु और मोक्ष ये नहीं होतेहैं-इससे यह सूचित किया कि-प्राण, बिंदु, मन इन तीनोंके जयमें ज्ञानके द्वारा योगीकी मुक्ति होई जाती है - सोई अमृतसिद्धिमें कहा है कि, जिस अवस्थाको वायु प्राप्त होताहै उसी अवस्थाको बिंदुभी प्राप्त होजाताहै और जिसप्रकार वायु साध्य किया जाताहै उसी प्रकारसे बिंदु साध्य किया जाताहै और मूच्छित हुआ वायु व्याधियों को हरताहै और बंधन किया वायु आकाशगतिको देताहै और लयको प्राप्त हुआ निश्चल वायु संपूर्ण सिद्धियोंको करताहै और मुक्तिको देताहै और जैसी जैसी अवस्था बिंदुकी होती है तैसी २ ही अवस्था चित्तकी होती है -कदाचित् कोई शंका करै कि, मनुष्योंके कल्याण करनेकी इच्छासे ज्ञान कर्म भक्ति ये तीन योग मैने कहेहैं अन्य कोई उपाय किसी शास्त्रमें भी नहीं हैं इस भगवान्के वाक्यसे तीन मोक्ष उपाय हैं तो योगही मोक्षका उपाय कैसे कहा? सो ठीक नहीं, क्योंकि उनका योगके अंगोंमें अंतर्भाव है -सोई दिखातेहैं कि, आत्मा-देखने, सुनने, मानने, निदिध्यासन करने योग्य है । इस श्रुतिसे परम पुरुषार्थका साधन जो आत्माका साक्षात्कार है उसके हेतु, श्रवण, मनन, निदिध्यासन कहे हैं, उन १८
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( ) | [: २७४ हठयोगप्रदीपिका उपदेश तीनोंनें श्रवग मनन ये दोनों नियमके अंतर्गत होनेसे स्वाध्याय ( पठन ) में अंतर्गत होतेहैं और मोक्षशास्त्रके अध्ययनको स्वाध्याय कहतेहैं और वह अध्य- यनभी तालर्यार्थिके निश्चय पर्यन्त लेना वह तात्पर्यार्थके निर्णयका श्र होताहै इससे श्रवण मननका स्वाध्यायमें अंतर्भाव है-और नियमोंके विवरणमें याज्ञवल्क्यने कहा है कि, बुद्धिमान् मनुष्योंने वेदांतका श्रवण सिद्धांतश्रत्रण कहाहै इससे सष्टही श्रवगका नियममें अंतर्भाव कहाहै - और जिसने वेद पढा हो, सूत्र घा पुराण वा इतिहास पढे हों इनके अध्ययन और उत्तम अभ्यासको जप कहतेहैं इस युक्तिसे निरंतर अनुचितन है लक्षग जिसका ऐसा जो उत्तम अभ्यास रूप मनन है उसकाभी नियममें अंतर्भाव कहाहै -और विजातीय प्रतीतिके निरोध- पूर्वक सजातीय प्रत्ययका प्रवाहरूप जो निदिध्यासन है उसकाभी पूर्वोक्त ध्यानमें अंतर्भाव है. क्योंकि वहमी तिसके परिपाकरूप समाधिसे आत्मसाक्षात्कारके द्वारा मोक्षका हेतु है - और ईश्वरार्पण बुद्धिसे निष्काम कर्मका अनुष्ठानरूप जो कर्मयोग है उसका नियमके अंतर्गत इस पतंजलिके कहेहुए क्रियायोगमें अंतर्भाव है कि, तप, स्वाध्याय, ईश्वरका प्रणिधान ( स्मरण ) इनको क्रियायोग कहतेहैं और वे तीनों ईश्वरगीतामें इन वचनोंसे कहे हैं कि, उपवास पराफ और कृच्छ्रचांद्रायण आदि व्रत इनसे जो शरीरका शोषण वही तपस्वियोंने उत्तम तप कहा है और मनुष्योंके अंतःकरणकी शुद्धिका कर्ता जो वेदान्त, शतरुद्रीय प्रणव आदिका जप है वही बुद्धिमान् मनुष्योंने स्वाध्याय कहाहै और स्तुति, स्मरण, पूजा इनसे और वाणी मन काया कर्म इनसे जो भलीप्रकार निश्चल भक्ति वही ईश्वरपूजन कहाताहै और क्रियायोग परंपरासे समाधिसे आत्मसाक्षात्कारके द्वाराही मोक्षका हेतु होनेसे समाधिकी भावनाकेलिये और क्लेशोंको दूर करनेके लिये है. यह बात उत्तरसूत्रसे पतंजलिने स्पष्ट की है जिससे अंतःकरण भगवान्के आकार होजाय उसे भक्ति कहतेहैं, इसकारण व्युत्पत्तिसे वह नौ ९ प्रकारकी साधनभक्ति कही वह इस श्लोकमें वर्णन की है कि विष्णुका श्रवण, कीर्त्तन, स्मरण, पादसेवन, अर्चन, वंदन, दासता, मित्रता और आत्माका निवेदन, यह नव प्रकारकी भक्ति होतीहै और उस भक्तिका ईश्वरके प्रणिधानरूप नियममें अंतर्भाव है और उस भक्तिकी भी हेतुता समाधिमें पतंजलिने इस सूत्रसे कही है कि, ईश्वरविश्यक
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1 - ( ) ४. संस्कृतटीका भाषाटीकासमेता । २७५ जो भक्तिविशेषरूपप्रणिधान उससे समाधिका लाभ ( फल ) होताहै और अंत:- करणका भगवदाकारतारूप जो भजन उसे भक्ति कहतेहैं. इस भावव्युत्पत्तिसे तो फलभूत भक्ति कही है उसकोही प्रेमभक्ति कहतेहैं उसका लक्षण नारायणती- यौंने यह कहाहै कि,ईश्वरके चरणारविंदमें जो एकाग्रतासे निवच्छिन्न अत्यंत प्रेमका प्रवाह उसको प्रेमभक्ति कहते हैं और मधुसूदनसरस्वतियोंने तो भक्तिका यह लक्षण कहा है कि," द्रव होकर मनकी जो भगवदाकाररूप सविकल्पवृत्ति उसको भक्ति कहतेहैं वह भी आत्मसाक्षात्कारके द्वारा मोक्षका हेतु है क्योंकि इन श्रुति और स्मृति- योंमें यह लिखा है कि-श्रद्धा, भक्ति, ध्यान, योगसे आत्माको जानो और भक्तिसे मुझे जानताहै और भक्त तो यह कहतेहैं कि, सुखही पुरुषार्थ है इससे दुःखसे असंभिन्न जो सर्वोत्तम सुखरूप प्रेमभक्ति है वही पुरुषार्थ हैं उस भक्तिका संप्रज्ञात समाधिमें अंतर्भाव है -इससे यह सिद्ध भया कि, अष्टांगयोगसे भिन्न परम पुरुषार्थका कोईभी साधन नहीं है भावार्थ यह है कि, इतने गमन करता हुए प्राणवायु सुषुम्नाके मार्गमें प्रविष्ट न हों, और प्राणवायुके दृढबंधनसे इतने बिंदु स्थिर न हों और इतने चित्त ध्यानके विषय ध्येयकी तुल्य न हों तबतक ज्ञान दंभसे मिथ्याप्रलापरूप होताहै ॥ ११४ ॥
इति श्रीस्वात्मारामयोगीन्द्रविरचितायां हठप्रदीपिकायां श्रीयुतपण्डित- रामरक्षाङ्गजलाँखग्रामनिवासिपण्डित - मिहिरचंद्रकृतभाषाविवृत्तिसहितायां समाधिलक्षणं नाम चतुर्थोपदेशः समाप्तिमगात् ॥ श्रीरस्तु । पुस्तक मिलनेका पता- खेमराज श्रीकृष्णदास, " श्रीवेङ्कटेश्वर " स्टीम-प्रेस बंबई.
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कय्यपुस्तकें ( योगवैशेषिकसांख्यग्रंथाः । ) को. रु. आ. सर्वदर्शनसंग्रह- श्रीउदयनारायणसिंहकृत भाषाटीका सहित--इस ग्रंथमें-कमसे १ चार्वाकदर्शन, २ बौद्धदर्शन, ३ आर्हतदर्शन, ४ रामानुज दर्शन, पूर्णप्रज्ञ दर्शन वा वेदान्त दर्शन, ६ नकु- लीश पाशुपत दर्शन, ७ शैव दर्शन, ८ प्रत्यभिज्ञादर्शन, ९ रसेश्वरदर्शन, १० औलुक्य दर्शन, ११ अक्षपाद दर्शन, १२ जैमिनी दर्शन, १३ पाणिनि दर्शन, १४ सांख्य दर्शन, १५ पातंजल दर्शन-मतसम्प्रदाय सिद्धान्तोंका पूर्णतया, वर्णनहै..... २-० पातंजलयोगदर्शन - अत्युत्तम भाषानुवादसहित अष्टांगयोग- 1960.... निरूपण ०००० ०–१२ गोरखपद्धति-भापाटीकासहित । इसग्रंथमें योगाभ्यासकाफल वर्णितहै० - १० शिवसंहिता -भापाटीकासहित । इसमें शिवजीसे कहाहुआ योगोपदेश,.... ब्रह्मज्ञान हठयोगक्रिया राजयोगादिका वर्णनहै १-०शिवस्वरोदय-भाषाटीका सहित । इसमें स्वरोंका और इडा पिंगला सुषुम्ना नाडियों प्रश्नादि और राजयोग, हठयोग प्राणायामादि..... 004 पंचतत्त्वोंके जाननेकी विधि भलीप्रकार वर्णित है ०-८ योगतत्त्वप्रकाश-भाषामें अत्युत्तम योगमार्ग वर्णितहै........ ०-२ 0000 -ज्ञानस्वरोदय- चरणदासकृत ० २ संपूर्णपुस्तकोंका बडासूचीपत्र अलग है देखना होतो मँगालीजिये. पुस्तक मिलनेका ठिकाना- खेमराज श्रीकृष्णदास, 66 श्रीवेङ्कटेश्वर " स्टीम् प्रेस, खेतवाडी - बंबई.
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